उन्मुक्त सेक्स संबंध बनाना गलत नहीं है परन्तु मुझे लगता है, वे सफल नहीं हो पाते – 3 दिसंबर 2015

पिछले तीन दिन से खुले संबंधों के बारे में लिखने के बाद और यह बताने के बाद कि क्यों वे अक्सर असफल रहते हैं, आज मैं एक और बात बहुत स्पष्ट कर देना चाहता हूँ: जबकि मेरा विश्वास है कि वे सफल नहीं हो सकते, अगर लोग इन संबंधों को आजमाना चाहते हैं तो मैं नहीं समझता कि उसमें कुछ भी गलत है।

मैं सामान्य रूप से खुले दिमाग वाला और खुले और स्पष्ट रवैए वाला व्यक्ति हूँ, विशेष रूप से सेक्स को लेकर। मैं मानता हूँ कि यह पूरी तरह आपका चुनाव होना चाहिए कि आप किसके साथ सेक्स संबंध रखना चाहते हैं। अगर आप कई अलग-अलग लोगों के साथ सम्भोग करना चाहते हैं तो कीजिए। अगर आप किसी एक व्यक्ति के साथ बंधे नहीं रहना चाहते तो वैसा ही करें। अगर आप किसी एक व्यक्ति के साथ सुदीर्घ और पक्का संबंध रखते हुए आपसी समझौते के तहत अधिक पार्टनर्स रखने की स्वतंत्रता चाहते हैं तो वह भी मेरे लिए पूरी तरह स्वीकार्य है।

सेक्स एक वर्जना बन चुका है, जबकि यह दुनिया में सबसे अधिक आनंददायक कार्य है और इसके साथ तरह-तरह के प्रयोग करना, और नई-नई चीजें आजमाना और भी आनंददायक उत्तेजना प्रदान करता है। शायद इसी आनंद के चलते इसका दमन किया जाता है, जिससे लोगों को अपने काबू में रखा जा सके।

इसकी जगह आप अपने आपको शक्तिशाली बनाने में सेक्स का उपयोग कर सकते हैं। लेकिन जब मैं यह कहता हूँ तो मेरा मतलब यह नहीं होता कि सिर्फ इसलिए कि समाज इसे वर्जित करता है, ज़्यादा से ज़्यादा लोगों के साथ संभोग करने से आप अधिक शक्तिशाली और कार्यक्षम हो जाते हैं। जी नहीं, मेरा मतलब होता है कि आप अपने दिल की सुनें और अपने शरीर की आवश्यकता तो पूरी करें ही, अपनी भावनात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति भी करें। कि अपनी दिली इच्छाओं के सामने आप परम्पराओं और सामाजिक नियमों को व्यवधान न बनने दें।

लेकिन मेरा विश्वास है कि देर-सबेर अधिकतर लोगों का मन उन्हें बता देगा: यही है वह! वह व्यक्ति, जिसे मैं किसी और के साथ साझा नहीं करना चाहता और जिसके लिए मैं स्वयं एकमात्र व्यक्ति बने रहना चाहता हूँ।

मेरी नज़र में अन्य सभी संबंध सफल नहीं हैं।

एक से अधिक सेक्स पार्टनर के साथ आपसी संबंधों में रोमांच, थ्रिल, उत्तेजना और असफलता – 1 दिसंबर 2015

कल मैंने आपको बताया था कि कैसे बहुत से खुले संबंध टूटने लगते हैं क्योंकि संबंधित लोग वास्तव में खुला और स्वतंत्र होने के स्थान पर मुख्य पार्टनर के साथ अपने संबंध में लिप्त रहे आते हैं। एक और परिस्थिति है, जिसका सामना होने पर भी अक्सर संबंध टूटते हैं: जब पार्टनरों में से कोई एक अपने साथी में रुचि खो देता है, क्योंकि एक के साथ अधिक समय बिताने के बाद वह उससे बोर होने लगता है!

आप भी जानते हैं कि शुरू में सब कुछ बड़ा उत्तेजक और रोमांचक लगता है लेकिन कुछ हिचकिचाहट भी होती है: इन संबंधों को समाज उचित नहीं मानता अर्थात समाज में यह एक टैबू ही है। इसलिए वे डरते हैं कि लोगों को पता चलने पर वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? या भविष्य में किसी दिन मुझे पता चलेगा कि मैं ज़िन्दगी भर वैश्यागीरी करता रहा? सबसे प्रमुख संबंध यानी जिसके साथ सबसे पहले संबंधों की शुरुआत हुई थी, एक तरह की सुरक्षा जैसा होता है, एक सुरक्षित सहारा-समाज के दूसरे लोगों के सन्दर्भ में भी और खुद अपनी भावनाओं और विचारों के सन्दर्भ में भी। यह एक सुविधाजनक ढाँचा होता है, जिसकी कार्यविधि और व्यवस्था के बारे में आपको पता होता है कि वह कैसे काम करता है और दूसरे सेक्स संबंधों के रोमांच से तुष्ट होकर या ऊबकर आप पुनः जिसके पास निःसंकोच वापस जा सकते है।

लेकिन कुछ समय बाद वे इस रोमांच से आश्वस्त होते जाते हैं। बार-बार पार्टनर बदलने की उन्हें आदत पड़ जाती है बल्कि इस जीवन-शैली को अपनाने वाले ज़्यादा से ज़्यादा लोगों से मिलने के बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ जाता है। आप तुरंत अनुमान लगा सकते हैं कि उसके बाद क्या होता होगा: उन्हें किसी सहारे की ज़रूरत नहीं पड़ती!

नियमित रूप से किसी एक व्यक्ति के साथ रहना बहुत उबाऊ हो जाता है, बहुत से उत्तेजक, विविधतापूर्ण, नए से नए और तैयार विकल्प मौजूद होते हुए किसी एक के साथ रहना! सीधी सी बात है, खुले संबंध में भी सुदीर्घ संबंधों के कारण होने वाली दिक्कतों को क्यों भुगता जाए?

पहला मुख्य पार्टनर जो दे सकता है, वह अब इतना आकर्षक नहीं रह गया है कि उसी के साथ रहने की कोई मजबूरी हो। अगर दोनों एक जैसा महसूस कर रहे हों तो ये संबंध आपसी समझौते के तहत बिना किसी बड़ी मुसीबत के समाप्त हो जाते हैं और दोनों अपने-अपने अलग रास्तों पर निकल पड़ते हैं। अगर दोनों की जीवन शैली यही है तो भविष्य में वे एक रात के साथियों की तरह मिल भी सकते हैं लेकिन इससे ज़्यादा कुछ नहीं।

लेकिन अगर दोनों में से सिर्फ एक की जीवन शैली ऐसी है तो दूसरे का दुखी होना अपरिहार्य है और पता चलते ही वह इन खुले संबंधों को कोसना शुरू कर देगा और उसका अहं यह सोचकर चोट खा सकता है कि सामने वाले को कभी भी उससे अधिक प्रिय व्यक्ति नहीं मिल सकेगा! पूरी संभावना होती है कि ऐसा व्यक्ति स्थिर संबंध की ओर वापस लौट आए, जिसमें इतना अनुशासन होगा कि अपने मुख्य संबंध के बाहर किसी और से सम्भोग का त्याग कर दे। जब आप इस दर्द का अनुभव कर लेते हैं तो उसके बाद उन्हीं खुले संबंधों के अनुभव को आप दोहराना नहीं चाहेंगे!

लेकिन इस प्रकरण के सन्दर्भ में मूल समस्या दूसरी है: जब लोग सेक्स को प्यार से नहीं जोड़ते। लेकिन उस विषय पर विस्तार से कल…

क्या आप भी अपने आपको सेक्स का सबसे बड़ा खिलाड़ी समझते हैं – 30 नवंबर 2015

मैंने पहले कई बार खुले संबंधों के बारे में लिखा है और उन पर विस्तार से अपना मत भी रखा है। हालांकि अब भी इस विषय में मेरा मत काफी हद तक वही है जो पहले था, मैं आज अपने ब्लॉग का उपयोग इसी स्वच्छंद जीवन शैली पर लिखने के लिए करना चाहता हूँ-क्योंकि मुझे अब भी लगता है कि यह किसी भी हालत में ज़्यादा समय तक सुचारू रूप से नहीं चल सकता!

मैं बहुत से ऐसे लोगों से मिल चुका हूँ जिन्हें स्वच्छंद और खुले संबंध पूरी तरह स्वीकार्य हैं, कुछ दूसरे हैं जो किसी के साथ इसे शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और कुछ और हैं जो पहले ही इसमें लिप्त हो चुके हैं। और एक वर्ग उनका भी है जो पहले इसमें मुब्तिला रह चुके हैं। ज़्यादातर लोगों को शुरू में बहुत रोमांच होता है लेकिन समय के साथ अंततः उन्हें पता चलता है कि वे भ्रमित थे। अब वे उससे निराश हो चुके हैं क्योंकि अब उन्हें लगता है कि उसके बारे में जैसा उन्होंने सोचा था, उनका अनुभव वैसा नहीं रहा है।

जो लोग इस तरह जीवन बिताना चाहते हैं, स्वाभाविक ही, शुरू में उन्हें इसमें बड़ी उत्तेजक सम्भावनाएँ दिखाई देती हैं। बिना अपने मुख्य पार्टनर की सुरक्षा खोए स्वच्छंद रूप से किसी भी पुरुष या महिला के साथ सोने की आज़ादी। तीसरे या चौथे व्यक्ति को भी बिस्तर पर लाकर सेक्स के ज़ायके को और चटपटा बनाने की संभावना भी। ईर्ष्या या ऐसे ही दूसरे अप्रिय एहसासों से निपटने का कोई झंझट नहीं क्योंकि समझौते के मुताबिक आखिर हर कोई दूसरे यौन साथियों का चुनाव करने के लिए स्वतंत्र है!

दुर्भाग्य से, मैंने देखा है कि यही तथ्य लोगों के सामने सबसे बड़ी समस्याएँ खड़ी करता है! वे समझते हैं कि यह बड़ा मज़ेदार है, वे किसी दूसरे के साथ संभोग करते रहेंगे और उनके पार्टनर को इस बात से ईर्ष्या नहीं होगी-लेकिन पार्टनर के प्रति अपने अनुराग को और अपनी ईर्ष्या को वे खुद ठीक से नहीं समझ पा रहे हैं, उसे कम आँक रहे हैं! वे नहीं समझते कि उनका पार्टनर भी यही कर सकता है-वह भी दूसरों के साथ यौन संबंध बना सकता है!

वास्तव में मैंने पाया है कि बिस्तर पर प्रवीणता के संदर्भ में यह समस्या अतिशय अहं से संबंधित है। जैसे हर महिला समझती है कि बिस्तर पर वह सबसे प्रवीण स्त्री है वैसे ही हर पुरुष अपने आपको सेक्स का सबसे शक्तिशाली, प्रवीण और उत्तेजक खिलाड़ी समझता है! एक तरफ महिला पार्टनर समझती है कि पुरुष पार्टनर को मिलने वाली कोई भी स्त्री सेक्स के मामले में मेरे जितनी प्रवीण हो ही नहीं सकती तो दूसरी तरफ पुरुष सोचते हैं कि मेरे अंदर सेक्स की इतनी दक्षता और क्षमता है कि कोई स्त्री एक बार मेरे साथ सो ले तो किसी दूसरे के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकती!

एक बार जब आप इस संभावना को अपने लिए खोल देते हैं तो आपको जल्द ही पता चलता है कि वास्तविकता कुछ अलग है! अचानक आप नोटिस करते हैं कि सिर्फ आप ही माह में तीन या चार अलग-अलग लोगों के साथ मौज नहीं ले रहे हैं या एक रात के साथियों के साथ संभोगरत नहीं हो रहे हैं बल्कि आपका पार्टनर भी उसी राह पर चल पड़ा है। स्वाभाविक ही, उस पर भी दूसरे विपरीतलिंगियों की नज़रें हैं और वह भी इस स्वच्छंदता का भरपूर आनंद ले रहा है या ले रही है!

मेरे प्रिय मित्रों, यहीं से असली समस्या की शुरुआत होती है। ईर्ष्या, हर वक़्त दबा हुआ गुस्सा-क्योंकि जो आप स्वयं कर रहे हैं, उसी बात पर आप अपने पार्टनर पर नाराज़ नहीं हो सकते- आपको सामान्य नहीं रहने देता। ईर्ष्या के कारण उपजे इसी दुःख और कथित अपमान के चलते छोटी-छोटी बातों पर आपस में झगड़े शुरू हो जाते हैं!

मैंने कई खुले संबंधों को इसी तरह असफल होते हुए देखा है, जिसका कारण यही होता है कि दोनों पार्टनर पर्याप्त खुले और लचीले नहीं थे और अपने मुख्य पार्टनर से उतने अलिप्त नहीं हो सके थे, जितना वे समझते थे कि हो गए हैं!