गहरे अवसाद और बर्न आउट के बाद वापस सामान्य होने की लम्बी और थका देने वाली प्रक्रिया- 22 अगस्त 2013

कल मैंने इस बारे में लिखा था कि कैसे आजकल बहुत से लोग काम के दबाव और उसके तनावों के कारण शारीरिक और मानसिक क्षय से पीड़ित होकर टूट जाते हैं और अंततः गहरे अवसाद में डूब जाते हैं। आज मैं संक्षेप में ऐसी क्षरण की स्थितियों से उबरने की प्रक्रिया के बारे में लिखना चाहता हूँ।

अपने व्यक्तिगत परामर्श-सत्रों में और अपने आश्रम में मैं कई क्षयग्रस्त लोगों से मिलता रहा हूँ और मैंने कई मनोचिकित्सकों के साथ भी इस विषय पर काम किया है, इसलिए ऐसी स्थितियों में फंसे व्यक्तियों की मानसिक हालत और उनकी भावनाओं की मुझे काफी हद तक ठीक-ठीक समझ है-और इस बात की भी कि अब उन्हें क्या करना चाहिए, जिससे वे सामान्य जीवन में वापस आ सकें।

कल मैंने यह भी लिखा था कि दरअसल उन्हें ‘वापस उसी अवस्था’ में आने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनकी क्षय से पहले की, तथाकथित सामान्य जीवन-पद्धति, उनका जीने का तरीका, उनकी सोच और व्यवहार ने ही मिलकर उन्हें इस हालत में पहुंचाया था! अब तो उन्हें सब कुछ नए सिरे से और नए तरीके से शुरू करना होगा!

जो शारीरिक और मानसिक रूप से क्षयग्रस्त है उसे सबसे पहले किसी पेशेवर की मदद लेनी होगी क्योंकि वह बीमारी की अंतिम अवस्था में पहुँच चुका है। कई लोगों को चिकित्सालय में कुछ दिन रहना भी पड़ सकता है क्योंकि वे अभी यह भी नहीं समझ पाते कि कैसे जिएँ, क्यों जिएँ?-उनके जीवन का मूल उद्देश्य ही अर्थहीन हो चुका होता है! अक्सर अपने अस्तित्व को वे अपनी नौकरी, अपने पद, अपने काम से पूरी तरह जोड़ चुके होते हैं और उन्हें यह एहसास ही नहीं होता कि अपने आप पर उन्होंने असीमित दबाव डाला हुआ है। इस पतन ने उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली है। उनका शरीर अब जवाब दे गया है और कह रहा है कि इसे अब और चलते रहने नहीं दिया जा सकता, कि वे अब अपनी, खुद की जरूरतों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।

आम तौर पर डॉक्टर ऐसे क्षयग्रस्त लोगों को दवाइयाँ खिलाते हैं-अवसाद-रोधी, नींद की गोलियां और कुछ अन्य दवाइयाँ। शुरुआत में या आपातकाल में ये दवाइयाँ अच्छा असर दिखाती हैं, लेकिन कुछ समय बाद, और यह समय कुछ महीने हो सकता है, उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होना सीखना होगा और खुद शारीरिक और मानसिक स्थिरता की तलाश करनी होगी। यही वह समय है, जब वे अपनी भीतरी खोज शुरू कर सकते हैं और इसी हालत में हमारे आश्रम में कुछ दिन विश्राम लेना कई लोगों को लाभ पहुंचा चुका है।

जब आप ऐसी हालत में होते हैं तो सबसे मुख्य बात आपको यह करनी होती है कि आप अपने आपको खोजें। पैसे और सफलता की दौड़ में आपने अपने आपको पूरी तरह खो दिया है, आपको खुद अपना कोई एहसास नहीं होता। आप कौन हैं? अपने जीवन में आप क्या करना चाहते हैं? क्या करके आप प्रसन्न होते हैं? ये और ऐसे ही कुछ और प्रश्न हैं, जिनका जवाब आपको देना होगा। उसके बाद ही कोई क्षयग्रस्त मरीज अपने जीवन के टुकड़ों को बटोरकर पुनः स्थिरचित्त हो सकता है। कई लोग अपनी नौकरी या कार्यक्षेत्र बदलने का निर्णय लेते हैं, क्योंकि जो वे इतने दिन करते रहे थे, अब नहीं कर सकते क्योंकि वैसा करने पर वे अपने शारीरिक दबाव और मानसिक तनाव से उबर नहीं पाएंगे।

लेकिन बाहरी चीजों और वातावरण के बदलाव से ही बात नहीं बनेगी, बहुतेरे आंतरिक प्रतिमानों और विचारों से भी आपको मुक्ति पानी होगी! और शुद्धिकरण की इस प्रक्रिया को कार्यान्वित करने के लिए अपने सामान्य और उबाऊ वातावरण से बाहर निकलकर बिल्कुल नई और अलग जगह पर कुछ दिन बताने से बढ़कर क्या बात होगी! ऐसी परिस्थितियों में हमारे आश्रम आकर आयुर्वेदिक-योग-अवकाश लेने वाले लोगों के साथ हमारा अनुभव बहुत सुखद, प्रेरणास्पद और आशाप्रद रहा है।

उन्होंने हमें बताया है कि रोजाना नियमित आयुर्वेदिक मालिश किस तरह इसमें सहायक रही क्योंकि उन्हें महसूस हुआ कि कोई है, जो पूरे एक घंटे उन पर और उनके शरीर के छोटे-छोटे अंगों पर पूरा ध्यान केन्द्रित किए हुए है। कई सालों से उनका शरीर अपने प्रति उनकी लापरवाही झेल रहा था। वह उनके ध्यान से वंचित था और ठीक यही पाने के लिए वह बेताब था! यह उपचार उन्हें, शारीरिक और मानसिक रूप से विष-मुक्त करने में बहुत सहायक रहा। दैनिक योग-सत्रों में आप शरीर के प्रति अपने प्रेम को पुनर्जीवित करते हैं। खुद से ऊंची से ऊंची अपेक्षाओं के दबाव में, एक नियुक्ति से दूसरी की तरफ भागने-दौड़ने की मजबूरी में आप अपने शरीर के प्रति यह प्रेम-भावना भूल ही चुके थे!

और फिर, और शायद सबसे महत्वपूर्ण भी, आप यहाँ ऐसा वातावरण और परिवेश प्राप्त करते हैं, जहां आप इस खोज को ज़्यादा अच्छी तरह अंजाम दे सकते हैं कि आप कौन हैं और आपके जीवन का उद्देश्य क्या है, आप क्या चाहते हैं? आप अपने आप में मगन रह सकते हैं-स्वतंत्र, बच्चों के साथ, हमारे परिवार और आश्रम के बच्चों के बीच या विश्रांति के लिए आए दूसरे मेहमानों के साथ। आप विश्राम कर सकते हैं या हमारे कामों में हमारे सहभागी हो सकते हैं, आप पढ़-लिख सकते हैं, ध्यान में लीन हो सकते हैं, दिल जो कहे, वह सब कुछ आप करने के लिए स्वतंत्र हैं। और यह बहुत बड़ा मौका है:आप अपने दिल की आवाज़ सुनना शुरू कर सकते हैं। यही तो आपने आज तक नहीं किया था कि अपने दिल की तनावपूर्ण, चीखती आवाज़ को आप कभी सुन लेते और जिसका खामियाजा आप आज भुगत रहे हैं!

मानसिक रूप से पूरी तरह ध्वस्त होने के बाद, धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे लोग अपनी पूर्वावस्था में लौट पाते हैं और अधिकतर लोग यही कहते हैं कि यह बाद की अवस्था उनकी पिछली अवस्था से बहुत बेहतर है! मैं कामना करता हूँ कि उन सभी लोगों को, जो ऐसी स्थिति को प्राप्त हुए हैं, यह शक्ति प्राप्त हो कि वे अपने वास्तविक स्वत्व को प्राप्त कर सकें और उनके लिए, जो अब भी पैसे और सफलता की अंधी दौड़ के चलते शारीरिक दबाव और मानसिक तनाव से ही जूझ रहे हैं, यह कि वे यह समझ सकें कि जो वे कर रहे हैं वह उन्हें बड़ी गहरी पीड़ा पहुंचा सकता है।

और जब कभी भी आप अपने परिवेश और वातावरण से दूर कहीं जाना चाहें, हमारे आश्रम के दरवाजे आपके लिए सदा खुले हैं।

सफलता और शिखर पर पहुँचने की महत्वाकांक्षा कहीं तनाव, अवसाद और पतन की राह पर न ले जाए! 21 अगस्त 2013

कल मैंने कामकाजी जीवन में लोगों के बीच होने वाली प्रतिस्पर्धा के विषय में लिखा था। ये प्रतिस्पर्धाएँ इसलिए आयोजित की जाती हैं कि लोग सफलता के पीछे दौड़ें और थोड़ा बहुत अतिरिक्त आर्थिक लाभ अर्जित कर सकें। इससे लोगों के जीवन में काम का शारीरिक दबाव और मानसिक तनाव बढ़ते जाते हैं और जैसे-जैसे वे ऊपर उठते जाते हैं, यह दबाव और तनाव भी बढ़ता जाता है और अंततः वह आपको क्षीण और जर्जर बना देता है। इसे अंग्रेज़ी में बर्न-आउट कहते हैं। हम इसे शारीरिक और मानसिक क्षय कह सकते हैं, जो आगे चलकर लंबे अवसाद में तब्दील हो जाता है और उसके बाद उससे उबरने के लंबे प्रयास और अंततः व्यक्तिगत लक्ष्य और जीवन का अर्थ खोजने की लंबी प्रक्रिया में उलझकर रह जाता है।

विशेषकर बड़ी कंपनियाँ किसी व्यक्ति की कोई परवाह नहीं करतीं। यह बात हर व्यक्ति जानता है लेकिन एक बार जब आप वहाँ पहुँच जाते हैं, आंकड़ों और पुरस्कारों के उस तंत्र (व्यवस्था) का हिस्सा बन जाते हैं तो यह बात बिल्कुल भूल जाते हैं और अपने सहयोगियों को अपना प्रतिस्पर्धी मानकर व्यवस्था द्वारा प्रायोजित उस दौड़ में शामिल हो जाते हैं। आपकी नज़रें कंपनी के लक्ष्यों पर होती हैं और दाएँ-बाएँ आपको कुछ भी दिखाई नहीं देता। लक्ष्य महज एक आंकड़ा होता है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं। आपको एक दिन में इतने लोगों से मिलना है, मिले गए इतने लोगों में से इतना प्रतिशत बिक्री में तब्दील हो जाना चाहिए, उतने लोगों से इकरारनामे पर दस्तखत करा लें और अंततः, उतना लाभ, रुपए की शक्ल में कंपनी के खाते में जमा हो जाना चाहिए! आप समझते हैं कि आपने कोई महत्वपूर्ण काम अंजाम दिया है और पूरी कंपनी और उसका नेतृत्व आपसे प्रसन्न हैं और आप पर गर्व करते हैं। जब कि वास्तविकता यह होती है कि कंपनी और उसका नेतृत्व अपनी सफलता पर खुश हैं, आंकड़ों पर खुश हैं, अपने खाते में आई हुई रकम से खुश हैं, आप पर गर्वित नहीं हैं! जब कि आप अपने अस्तित्व को कंपनी के साथ, उसके लिए निष्पादित अपने महत्वपूर्ण काम के साथ और उसके लिए प्राप्त अपनी सफलता के साथ जोड़ लेते हैं जब कि वास्तविकता यह होती है कि कंपनी को लक्ष्य तक पहुँचाने की व्यवस्था के काम में आप महज एक छोटे से पुर्जे होते हैं!

इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि जो बड़ी कंपनियों में काम नहीं करते वे इन दबावों और तनावों से बचे रहते हैं। विशेषकर स्वरोजगारी और छोटी कंपनियों के मालिकों को भी उतना ही तनाव झेलना पड़ता है क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी सफलता स्वयं उन पर निर्भर है। पैसा आता रहे, इसके लिए उन्हें अक्सर कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ती है लेकिन वे भी ज़्यादा से ज़्यादा धन कमाने, ज़्यादा से ज़्यादा सफलता अर्जित करने के चक्कर में उसके साथ मुफ्त मिलने वाले तनावों और दबावों के मकड़जाल में उलझकर रह जाते हैं। और आसपास के लोग, समाज, विज्ञापन आदि सभी सफलता के लिए जारी इस अंधी दौड़ को प्रोत्साहित करते हैं।

यह कहना कोई नई बात नहीं होगी कि यह समाज धन-केन्द्रित है। यह भी कोई नई बात नहीं है कि व्यापक जनसमुदाय व्यक्ति की कोई परवाह नहीं करता। लेकिन आप खुद क्या सोचते हैं? आप क्यों इस खेल में लगे हुए हैं? आप क्यों इस तरह की जीवन पद्धति अपनाए हुए हैं, प्रोग्राम्ड कंप्यूटर या किसी मशीन जैसी? आप अपने मनोरंजन के लिए कुछ नहीं करते, अपने कार्य में सफलता के अलावा कोई दूसरी बात आपको प्रसन्न नहीं कर पाती, आप खुद अपना स्वार्थ भूल जाते हैं, आपका सामाजिक जीवन मृतप्राय होता जा रहा है और आप स्वयं अपनी और ध्यान नहीं देते। महत्वपूर्ण सिर्फ एक बात होती है: काम और उसमें ज्यादा से ज्यादा सफलता! किसी दूसरी बात के लिए आपके पास समय ही नहीं है।

यही वह घड़ी होती है, जब लोग शारीरिक और मानसिक रूप से क्षयग्रस्त हो जाते हैं। वे टूट जाते हैं और इसका अर्थ यह होता है कि उनकी शारीरिक और मानसिक शक्तियों का पूरी तरह क्षरण हो चुका होता है। कई लोगों को स्मृतिह्रास या स्मृतिभ्रम हो जाता है-वे सारे अंक और नाम, जो उनके लिए पहले बड़े महत्वपूर्ण थे अब उनकी स्मृति से विलुप्त हो जाते हैं। कई लोगों के लिए, उसके बाद, अवसाद के कठिन समय की शुरुआत हो जाती है। प्रतिपल, क्रमशः उनका पूरा जीवन धराशायी होता चला जाता है, अक्सर आसपास के लोगों ने ऐसी अपेक्षा नहीं की होती। उन्हें पेशेवर सलाहकार की आवश्यकता होती है और जब कि वे हर सप्ताह, नियमित रूप से मनोचिकित्सक के पास जाते हैं, सामान्य हालत में वापस लौटने के लिए उन्हें स्वयं भी इस पर अथक प्रयास करना होगा।

दरअसल, ‘लौटना’ नहीं, वापस, वही जीवन नहीं! नए जीवन की शुरुआत कीजिए, अपने लिए एक अलग जीवन की तलाश कीजिए, एक संतुलित और शांत जीवन!

उपलब्धियां और सफलताएँ जब खुशियों से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं! 20 अगस्त 2013

कल मैंने आपको अपनी नई परियोजना के विषय में बताते हुए ज़िक्र किया था कि कई खेल ऐसे हैं जो प्रतिस्पर्धा की भावना पैदा करते हैं जब कि आगे चलकर बच्चों को जीवन में प्रतिस्पर्धा का सामना करना ही है। वैसे स्पर्धायुक्त खेल मज़ेदार हो सकते हैं और उनसे दूर रहना हमेशा उचित नहीं कहा जा सकता लेकिन वह प्रतिस्पर्धा, जिसका उन्हें वास्तविक जीवन में, खासकर अपने कामकाजी जीवन में, सामना करना है, वह बहुत सा अनावश्यक और हानिकारक दबाव और तनाव पैदा कर देती है।

दरअसल, यह आजकल स्कूलों में शुरू हो चुका है। जब परीक्षाओं में प्राप्त अंकों की घोषणा होती है तब, स्वाभाविक ही, हमेशा माहौल प्रतिस्पर्धात्मक हो जाता है। हर विद्यार्थी यही देखता है कि उसकी कक्षा के दूसरे बच्चों ने क्या परिणाम हासिल किए हैं और फिर अपने अंकों की तुलना उनके अंकों से करता है और सोचता है कि उनसे कितना अच्छे या बुरे अंक उसे प्राप्त हुए हैं। वह शिक्षा प्रणाली नैसर्गिक प्रतिस्पर्धा को पोषित और पल्लवित करती है जो विभिन्न क्षेत्रों मे पुरस्कार देने की हामी है और हमेशा ‘सर्वप्रथम’ का सम्मान करती है। इससे दूसरे बच्चे भी प्रशंसा प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं और वही सफलता प्राप्त करने में जी-जान लगा देते हैं।

यह स्कूल है, अभी भी यहाँ सुरक्षित वातावरण में, नियमानुसार और स्पष्ट ढांचे में काम होता है। यह वास्तविक जीवन के बीहड़ में संभावित कटु अनुभवों का आधार तैयार करता है। अगर आपने इस मंज़िल तक आकर भी सफलता प्राप्त करने लायक कुछ नहीं सीखा, तो फिर आगे आने वाली ज़िंदगी में वही बातें सीखने के लिए बहुत कड़ा परिश्रम करना होगा।

आप एक बड़ी कंपनी में नौकरी करते हैं क्योंकि आपको लगता है कि उसमें आगे बढ़ने की ज़्यादा संभावनाएं हैं-अधिक से अधिक सफलता प्राप्त करने के अवसर। आप पूरी ताकत लगा देते हैं और कोई उपलब्धि प्राप्त करते हैं, अपने इलाके में सबसे अधिक विक्रय, साल में सबसे ज़्यादा लाभ। आपको ‘साल का नया चेहरा’ या ‘न्यूकमर ऑफ द ईयर’ नामक पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है, वेतन में संभावित बढ़ोत्तरी के साथ आपका सम्मान होता है। अगर आप दूसरे नंबर पर हैं तो आपको कुछ नहीं मिलता। कंपनी की कार्य-प्रदर्शन सूची के अनुसार अगर आप कहीं बीच में हैं या बिलकुल नीचे के कुछ लोगों में आपका नाम आता है तो आप समझिए कि आपका कोई मूल्य नहीं है। आप पर कोई तवज्जो नहीं दी जाएगी और आपको नीची नज़र से देखा जाएगा। आप कंपनी की सूची में हैं, बस!

मुझे लगता है कि मुझे बहुत ज़्यादा विस्तार से बताने की ज़रूरत नहीं है कि यह व्यवहार कंपनी में किस तरह का वातावरण निर्मित करता है, उन लोगों के दिलों में किस किस्म की भावनाएँ जन्म लेती हैं, जो जीत नहीं पाए और पीछे रह गए! आधुनिक समाज लोगों को यह सिखाता है: अगर आप उत्कृष्ट हैं तो आप अच्छे हैं। आप अच्छे हैं अगर आप ‘नंबर वन’ हैं। अगर आप ऊपरी लोगों में से एक हैं तो आपका अहं कृत्रिम रूप से बढ़ जाता है और आप और भी अधिक अच्छा काम करना चाहते हैं, जिससे आप कंपनी की बिक्री और लाभ बढ़ा सकें।

कुछ लोग प्रथम श्रेणी वाले, सबसे श्रेष्ठ समूह में दौड़े (काम किया), भरसक कठोर प्रयास किया और अंततः दबाव में आकर टूट गए। दूसरे कुछ वहाँ पहुँचने की बहुत कोशिश करते हैं लेकिन हमेशा मध्यम श्रेणी में बने रहते हैं और कभी भी वहाँ नहीं पहुंच पाते और अवसाद में घिर जाते हैं क्योंकि उन्हें कभी भी वह महत्व प्राप्त नहीं होता, जिसके लिए वे पूरे वक़्त लालायित रहे। फिर वे लोग भी हैं जिन्हें कभी मौका ही नहीं मिला, जो सदा निचली श्रेणी में ही रहे। वे हमेशा इस डर में रहते हैं कि उनकी जगह किसी और को रख लिया जाएगा और कंपनी में भी जड़वत काम करते रहते हैं-क्योंकि वे जानते हैं कि वे कभी भी ‘नंबर वन’ नहीं बन पाएंगे।

हम हमेशा इस तरह नहीं चल सकते! इसे बदलना होगा, थोड़ा सा बैठकर सोचना होगा और इस बात को समझना होगा कि सिर्फ आपकी सफलता ही आपकी पहचान नहीं है। यह हमारे लिए कोई खुशी नहीं लाएगा और न ही कोई आपको उस तरह से पसंद करेगा, जैसा कि वह किया करता था। अगर आप समझते हैं कि आपकी कंपनी आपसे इसलिए प्रेम करती है क्योंकि आप लाभ कमा रहे हैं तो इस बात को भी समझने की कोशिश कीजिए कि आप सिर्फ और सिर्फ इसलिए कंपनी के लिए महत्वपूर्ण हैं या उसके प्रेमपात्र हैं कि आप उनके लिए लाभ कमाते हैं।

यह आपके लिए कठिन होगा लेकिन मुझे लगता है कि अगर आप अपने आपको पूरी तरह टूटकर बिखरने से बचाना चाहते हैं तो आपको इस बात की गंभीरता को समझना ही होगा! आप इस प्रतिस्पर्धा में सफल हों या न हों, अपनी खुशी और आनंद को पूरी तरह इस खेल पर निर्भर न करें! भरपूर प्रयास करें मगर उसमें सम्मान या प्रशंसा की अपेक्षा न करें! आपको अपने परिवार और दोस्तों का एक तानाबाना विकसित करना चाहिए और अपने लिए एक आंतरिक स्वयोग्यता पैदा करनी चाहिए, जो ऐसी प्रतियोगिता से परे हो। अन्यथा आपका गिरना तय है और वह आपको तगड़ी चोट पहुंचाएगा। यह सुनिश्चित करें कि आपका स्व-सम्मान सिर्फ कार्यक्षेत्र में आपकी सफलता के चलते नहीं होना चाहिए। ध्यान से देखें कि आप कौन हैं, समझें कि आप आप हैं और सिर्फ यही बात, अपने आप में आपको प्रसन्न करने के लिए काफी है। यह आवश्यक नहीं है कि आप सर्वश्रेष्ठ ही हों। आप नंबर वन हों, यह ज़रूरी नहीं। अगर आपको मज़ा आ रहा है तो खेल में बने रहिए, जब तक मज़ा आ रहा है, खेलते रहिए। जब वह मज़ा, वह आनंद न मिले तो खेल से बाहर निकल आइये।

अंधविश्वासियों की किस्में – 4: भारत के लोकप्रिय क्रिकेटर और अन्य खिलाड़ी – 14 मार्च 13

अपने भारतीय पाठकों के लिए मैं अंधविश्वासियों की एक और किस्म की चर्चा कर रहा हूं। ये हमारे खिलाड़ी हैं जो लाखों भारतीय युवाओं के आदर्श हैं और मेरा मानना है कि इसी वजह से इन्हें किसी प्रकार के अंधविश्वास में यकीन नहीं करना चाहिए।

अंधविश्वासी क्रिकेट खिलाड़ी

अंधविश्वासी व्यवसायी के बारे में लिखते हुए मैंने कहा था कि उसे अपने कौशल और मेहनत पर पूरा भरोसा नहीं होता, इसलिए वह अपनी सफलता का पूरा श्रेय किसी अदृश्य शक्ति को देता है। यही बात भारत के क्रिकेट व अन्य खेलों के खिलाड़ियों पर भी लागू होती है। बहुत से खिलाड़ी बड़े अंधविश्वासी होते हैं। उनके पास धन – दौलत है, बहुत सारे रिकॉर्ड्स इनके नाम हैं लेकिन इसके बावजूद वे मानते हैं कि यह उनकी प्रतिभा, मेहनत और अभ्यास का फल नहीं है कि उन्हें कामयाबी मिली है।

भारत की राष्ट्रीय क्रिकेट टीम के कुछ खिलाड़ी अपनी जन्मतिथि के नंबर वाली जर्सी पहनकर खेलते हैं और यह विश्वास करते हैं की यह उनके लिए भाग्यशाली होगा। मिसाल के तौर पर कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की का नम्बर 7 छपा होता है क्योंकि उनकी जन्मतिथि है 7 जुलाई। इसी तरह युवराज सिंह जिनकी जन्मतिथि 12 दिसम्बर है, उनकी जर्सी का नम्बर 12 होता है।

बहुत से खिलाड़ी अपनी पतलून की बाईं जेब में रूमाल रखते हैं, कईयों के रुमाल का रंग लाल होता है जबकि कई पीले रुमाल में विश्वास रखते हैं। उनका विश्वास है कि यदि वे ग़लत रंग का रुमाल रखेंगें या रुमाल को ग़लत जेब में रखेंगें तो जीत हासिल नहीं होगी। युवराज सिंह और विराट कोहली रुमालों में तो यकीन नहीं रखते लेकिन कलाई पर काले रंग का बैंड बुरी नज़र से उनकी रक्षा करता है।

भारत के सफलतम क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर हमेशा पहले बाएं पैर पर पैड बांधते हैं और उसके बाद दाएं पर। वह इस बात का खास ध्यान रखते हैं ताकि उनके खेल पर बुरा प्रभाव न पड़े। इस बात में कोई अचरज नहीं है कि जादूगर स्वर्गीय सत्य सांईबाबा उनके गुरु थे। ये वही पाखंडी सांई बाबा थे जो हवा में सोना पैदा करके अपने भक्तों का बेवकूफ बनाते थे। अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि बड़े बड़े रिकॉर्ड बनाने वाले सचिन ऐसे ढोंगी बाबा के भक्त थे।

मैंने पढ़ा है कि ये महान खिलाड़ी टीम की बस में भी अपनी सौभाग्यप्रदाता सीटों पर ही बैठते हैं क्योंकि उनका विश्वास है कि अग़र 'अपनी' सीट पर नहीं बैठेंगें तो उस दिन उनका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहेगा और इसीलिए बस मे बैठने की व्यवस्था में कभी कोई बदलाव नहीं होता। एक और क्रिकेटर है श्रीसंत। चाहे कुछ भी हो जाए वह सबसे आखिर में बस से उतरते हैं। शायद उनका विश्वास है कि ऐसा करने से वह सबसे आखिर में आउट होंगें।

एक बहुत ही प्रचलित अंधविश्वास है 'सौभाग्यसूचक आइटम' का। यदि आप कोई खास कैप, रुमाल, दस्ताना, जूता या अन्य कोई आइटम पहनकर बहुत अच्छा खेलें हैं या जीत हासिल की है तो अगली बार खेलने जाते वक़्त आप उस आइटम को साथ ले जाना नहीं भूलते हैं। हद तो तब हो गई जब भारत के अधिकारिक क्रिकेट संगठन BCCI ने सितम्बर 2012 में राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ियों को नई डिजाइन की हुई जर्सियां न पहनने की सलाह दी क्योंकि आम जनता के सामने वे जर्सियां पहले ही प्रदर्शित हो चुकी थीं। उनसे कहा गया कि वे सब अपनी वही जर्सियां पहनें जिन्हें पहनकर उन्होंने पिछले साल विश्व कप जीता था।

खेलों में, विशेषकर क्रिकेट में अंधविश्वास का बोलबाला है। यह सब कोरी बक़वास है और एक मनोवैज्ञानिक भ्रमजाल है जो खिलाड़ियों ने अपने लिए रच रखा है। वे अपनी क्षमताओं में विश्वास रखने की अपेक्षा स्वयं को रुमाल जैसी चीजों का दास बनाना ज्यादा पसंद करते हैं। वे अपनी प्रतिभा के बल पर नहीं बल्कि बस में मिली मनचाही सीट के बल पर जीत हासिल करते हैं। उन्होंने सही मौके पर गेंद को लपक लिया इसकए लिए वे अपनी पैनी नज़र और ट्रेनिंग को इसका श्रेय देने के बजाए भाग्यशाली दस्ताने का शुक्रिया अदा करते हैं।

क्या खिलाड़ी हमें यह संदेश देना चाहते हैं कि गुरु, धर्मशास्त्र और अन्य अंधविश्वासी लोग सही है और वैज्ञानिक तथा नास्तिक ग़लत। ये खिलाड़ी हमारे युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं। उन्हें चाहिए कि वे आचरण के ऊंचे मानदंड स्थापित करें और ऐसी बेहूदा बातों में यकीन करना बंद करें।

अंधविश्वासियों की किस्में – 3: सफल, धनवान व्यवसायी – 13 मार्च 13

अनपढ़ ग्रामीण और आम मध्यमवर्गीय आदमी के बाद आज मैं अंधविश्वासियों की तीसरी किस्म के बारे में चर्चा करूंगाः

अंधविश्वासी, सफल व्यवसायी

मैं इस श्रेणी के लोगों को बखूबी जानता हूं क्योंकि अपने जीवन के पिछले हिस्से में, जब मैं भारत में एक गुरु हुआ करता था, इनमें से बहुतों के साथ मेरा काफी नज़दीकी संपर्क रहा था। जब कभी भी मैं लैक्चर या प्रवचन देता था तो वहां हमेशा बड़ी तादाद में दौलतमंद लोग उपस्थित रहते थे। अकसर वे ही मेरे कार्यक्रमों के आयोजक होते थे और इसी वजह से मैं इन सफल व्यवसाइयों की सोच को समझ पाया। धनवान होने के साथ ये सभी धार्मिक और अंधविश्वासी भी होते हैं।

यहां भी भीरुता की वजह से अंधविश्वास पनपता है। जितनी बड़ी सफलता, उतना बड़ा भय। शुभमुहूर्त पर ही इनकी सफलता का दारोमदार टिका रहता है। अशुभ मुहूर्त में किया गया काम यानी असफलता की गारंटी। हो सकता है कि आप दिवालिया हो जाएं। दीवालिया होने का मतलब आप अब दुनिया के लिए किसी काम के नहीं रहे।

अंधविश्वासी व्यवसायी जमकर व्यापार करते हैं लेकिन इस बात का खास ध्यान रखते हैं कि सभी महत्वपूर्ण मीटिंग 'शुभ समय' पर हों। यदि यह संभव नहीं हो पाता है तो उस अशुभ समय का संतुलन बैठाने के लिए पूजापाठ करवाते है। समय के साथ उनकी यह धारणा बलवती होती जाती है कि उनकी सफलता अंधविश्वासों पर निर्भर करती है। अंधविश्वासों की परिधि से बाहर जाकर काम करने के ख्याल से ही उनकी रूह कांपने लगती है। यदि उन्हें लगता है कि उनकी सफलता कि पीछे किसी बाहरी शक्ति, उसके आशीर्वाद या किसी अन्य ऊर्जा का हाथ है तो उन्हें हर पल यह भय सताता रहता है कि यदि उन्होंने उसका अनादर किया तो वह शक्ति अपना वरदहस्त वापिस खींच लेगी।

आखिर ये लोग ऐसा क्यों करते है? सीधी सी बात है – उन्हें स्वयं पर और अपनी क्षमताओं पर भरोसा नहीं है। उनमें आत्मविश्वास की बेहद कमी होती है और वे यह मानकर बैठे हैं कि उनकी सफलता के पीछे उनके कठिन परिश्रम या कौशल का कोई हाथ नहीं है, यह तो किसी रहस्यमयी शक्ति के चमत्कार का परिणाम है। निश्चय ही वे असुरक्षा की भावना से घिरे रहते हैं क्योंकि उन्हे हर वक़्त यही भय सताता रहता है कि पता नही कब सौभाग्य उनका साथ छोड़कर चला जाए। उन्हें अपनी काबिलियतों पर भरोसा नहीं होता और इसीलिए वे अंधविश्वास की बैसाखियों का सहारा लिए रहते हैं। वह अदृश्य शक्ति उनका साथ छोड़कर न चली जाए इसके लिए दिनरात उसे मनाने का प्रयास करते रहते हैं।

यदि आप इस बात में विश्वास नहीं कर पा रहे हैं कि एक सफल उद्योगपति इतना अंधविश्वासी हो सकता है तो मैं आपको विश्वास दिलाने के लिए एक सटीक उदाहरण देता हूं। मुकेश अंबानी, जो खरबों डॉलर की दौलत के साथ भारत का सबसे अमीर और दुनिया में नौवे नम्बर का सबसे दौलतमंद शख्स है, ने एक अरब डॉलर की लागत से मुम्बई में एक सत्ताईस मंजिला घर बनाया। गृहप्रवेश से पहले उसे लगा कि घर में कोई वास्तुदोष है और परिवार के लिए इसकी ऊर्जा हितकर नहीं रहेगी। इसी बात पर गॄहप्रवेश स्थगित कर दिया गया। महीनों तक उस वास्तुदोष के निवारण के लिए यज्ञ, हवन और अन्य पूजापाठ चलते रहे। अंततः उस दोषमुक्ति के बाद ही उन्होंने अपने नए घर में पैर रखा। तो आपने देखा भारत का सबसे धनवान व्यक्ति, जिसकी बहुत अधिक आलोचना हुई थी इतना बेशकीमती घर बनाने के लिए, ने भी पंडितों, ज्योतिषियों और धर्मगुरुओं का आशीर्वाद लेने के बाद ही गृहप्रवेश किया।

सपनों और आशाओं को मरने मत दीजिये – मग़र निराशाओं से सबक सीखिए! 25 फरवरी 13

हम सब खुश रहना चाहते है। परंतु दुर्भाग्य से कई लोग अपने दैनिक जीवन में इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाते हैं। जब प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों, तो स्पष्टतया प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत स्थिति पर इसका उत्तर निर्भर करता है। लेकिन एक जवाब जो हम अकसर सुनते हैं और जो लगभग सभी पर एक समान लागू होता है, वह यह है कि वे सभी लोग बहुत सारी और बहुत ही ऊंची अपेक्षाएं रखते हैं। मैंने भी आशा और निराशा पर बहुत कुछ लिखा और कहा है। लेकिन आपके जीवन में इसका वास्तविक अर्थ क्या है, यह जानना आव्श्यक है ।

कई लोग सोचते हैं कि उनकी अपेक्षाएं बहुत ऊंची हैं लेकिन जब वे निराशा से बचने के लिए इस समस्या का हल खोजने लगते हैं तो वे विपरीत की पराकाष्ठा पर पहुंच जाते हैं और यह सोच लेते हैं कि उन्हें अपेक्षाएं रखनी ही नहीं चाहिएं। वे किसी भी चीज़ की उम्मीद करना छोड़ देते हैं, ऊंचे लक्ष्य निर्धारित करना छोड़ देते हैं। जब कभी भी उन्हें यह महसूस होता है कि वे कुछ चाहते हैं तो वे तुरंत ही खुद समझाने लगते हैं सपने देखना व्यर्थ है। वे अपना दिमाग़ वहां से हटा लेते हैं और वापिस अपने दैनिक कामों में लग जाते हैं।

नतीज़ाः वे पहले की तुलना में अधिक व्याकुल और मायूस हो जाते हैं! अपेक्षाएं ना रखने पर भी जब खुशी नहीं मिलती तब वे स्वयं से सवाल करते हैं कि उनके जीने का आखिर अर्थ ही क्या है। अगर कुछ पाने के इच्छा ही नहीं है तो मेरी ज़िंदगी के मायने ही क्या हैं? जीवन का कोई उद्देश्य ही न हो तो मैं क्या करूं?

मेरा मानना है कि इन दोनों के बीच का भी एक रास्ता है। आप उम्मीदों के बिना एक सामान्य जीवन नहीं जी सकते। आप सामान्य जीवन की गतिविधियों से पूरी तरह विमुख होकर एकांतवास में जा सकते हैं। यदि आप स्वयं को मित्रों, परिवार और सामाजिक जीवन से अलग कर सकते हैं, यदि आप सारे काम छोड़कर केवल ध्यान में मग्न हो सकते हैं तो संभव है कि आप उस अवस्था के नज़दीक पहुंच सकते हैं। परंतु दोस्तों, परिवार और दैनिक कामकाज के बीच यह कर पाना संभव नहीं है। यदि आप ध्यान करने में समय व्यतीत करते हैं तो भी यह संभव है कि आप पूर्ण समाधि में उतरने की अपेक्षा करने लगें। हो सकता है कि ऐसा ना हो पाए। तब पुनः आप निराश और नाखुश होंगें। जहां अपेक्षाएं होती हैं, वहां निराशाओं की गुंजाइश अवश्य रहती है।

निराशा के भय को अपने ऊपर हावी न होने दें। इस भय की वजह से अपने लिए उच्चतम लक्ष्य निर्धारित करने से पीछे न हटें। यदि आप ऐसा करते हैं तो आप स्वयं अपने विकास का रास्ता अवरुद्ध कर रहे हैं। आपका विकास नहीं होगा तो ज़िंदगी में कोई मुकाम हासिल करने की आशा ही समाप्त हो जाएगी।

अपनी अपेक्षाओं को घटाकर शून्य पर लाने की ग़लती कदापि न करें। बल्कि इसके बजाए उनसे उचित तरीके से निपटना सीखें। बेशक़ आप समय – समय पर यह जांच कर सकते हैं कि आपकी अपेक्षाएं जायज़ हैं या नहीं। और यदि वे जायज़ हैं और उन्हें पूरा कर पाने की ज़रा सी भी संभावना आप देखते हैं, तो ज़रूर आगे बढ़ें। जी-जान लगाकर कोशिश करें। यदि फिर भी निराशा हाथ लगती है तो भी छोटी-छोटी निराशाओं से घबराएं नहीं, ये तो आपको और अधिक मज़बूत बनाती हैं और आपके विकास में मदद करती हैं।

एक बार प्रयास करने पर यदि असफलता हाथ लगती है तो आप दोबारा प्रयास कर सकते हैं। इस बार आपका यह प्रयास अधिक विश्वास से भरपूर और सटीक होगा क्योंकि अब आपके पास एक प्रयास का अनुभव जो है। केवल इसी रास्ते पर चलकर आप अपने लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। यदि आप किसी भी दिशा में पूरी शिद्दत से प्रयास करते हैं तो कुछ न कुछ नतीजा अवश्य निकलेगा। चाहे मंज़िल तक न पहुंच पाएं हों लेकिन फिर भी एक कदम तो आपने आगे बढ़ाया है। जितना आगे बढ़ते जाएंगें, उतना ही आपके अनुभवों में वृद्धि होती जाएगी।

यदि आशाएं, सपने और उम्मीदें नहीं होंगी तो ज़िंदगी थम सी जाएगी। जीवन नीरस हो जाएगा, आप कहीं के भी नहीं रहेंगें और सबसे बड़ी बात, आप खुश नहीं रह पाएंगें। नहीं, आप अपने जीवन के साथ ऐसा नहीं कर सकते। सपने देखें, अपेक्षाएं रखें, कल्पना की उड़ान भरें और साथ ही अपने सपनों को साकार करने के लिए दिमाग और हाथ-पैरों का इस्तेमाल करें।