स्त्रियाँ और पुरुष, दोनों रोज़गार करते हैं मगर घर के कामों की ज़िम्मेदारी सिर्फ स्त्रियों की ही होती है – 10 दिसंबर 2015

कल मैंने दैनिक जीवन में लिंग आधारित भूमिकाओं के बारे में लिखना शुरू किया था और बताया था कि कैसे वे पश्चिमी समाजों में भी आज भी जारी हैं हालांकि उस शिद्दत से नहीं, जिस शिद्दत के साथ भारत में व्याप्त हैं। कल की चर्चा मैंने पुरुषों द्वारा घरेलू काम, जिन्हें पूरी तरह 'जनाना' काम समझा जाता है, न करने संबंधित दबावों पर केन्द्रित की थी लेकिन महिलाओं को भी आज भी लोगों के लिंग आधारित पुरातनपंथी विचारों से लोहा लेना पड़ता है।

निश्चित ही भारत के अधिकांश परिवार महिलाओं से अपेक्षा करते हैं कि वे घर में ही रहें जबकि पश्चिमी समाजों में कई पीढ़ियाँ गुज़र चुकी हैं, जिनमें माएँ बाहर निकलकर काम करती रही हैं- चाहे आधे दिन करें या पूरा दिन! वहाँ महिलाओं से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि विवाहोपरांत घरेलू स्त्रियाँ बनकर रहें। वहाँ कामकाजी महिलाओं के लिए मूलभूत सुविधाएँ बेहतर हुई हैं।

लेकिन वह दोषरहित नहीं है। महिलाएँ लिंग आधारित भूमिकाओं से बरी नहीं हुई हैं और न ही इस दबाव से कि दैनिक जीवन में उन्हें कैसा व्यवहार करना चाहिए। अभी भी कई मामलों में उन्हें बराबरी का दर्जा हासिल नहीं है: प्रबंधन के रोज़गारों में ऊपरी पायदानों पर पहुँचने के लिए उनके पास कम अवसर उपलब्ध हैं और समान पदों के लिए पुरुष सहकर्मियों की तुलना में उनका वेतन कम होता है! इसके अलावा, लोगों के दिमागों में यह असमानता का भाव अधिक व्यापक रूप से मौजूद है, जिसके कारण खुद महिलाएँ अपनी स्वायत्तता और परिवार या समाज में अपनी भूमिका को लेकर संदेहग्रस्त रहती हैं!

इस बात का प्रमाण आपको पारिवारिक ढाँचे में मिलता है। यह एक सामान्य बात हो सकती है कि माँ भी काम पर जा रही है लेकिन साथ ही आप यह भी देखेंगे कि इसके बावजूद घर के ज़्यादातर दैनिक कार्यों को निपटाने का काम भी वही करती है। अपने उद्यम में काम करते हुए वह कितना भी सख्त हो लेकिन घर में उसे यह उचित ही लगता है कि वह खाना बनाती है या वही बच्चों को स्कूल से लेकर भी आती है। उसका पति उसके बराबर ही काम करके घर लौटता है और सोफे पर पसरकर आराम फरमाता है। अक्सर दोनों ही इस व्यवस्था में कुछ भी गलत नहीं पाते लेकिन फिर अत्यधिक काम और तनाव के कारण अचानक किसी दिन वह क्लांत और शिथिल पड़ जाती है और अंततः तनावग्रस्त होकर अवसाद में चली जाती है। उसने सारे कामों का बोझ अपने ऊपर ले लिया था, एक आधुनिक कामकाजी महिला, एक सुघड़ गृहणी और स्नेहमयी माँ-सब कुछ एक साथ!

मैं बहुत सी महिलाओं से मिला हूँ, जिन्होंने ये सारे के सारे काम अपने सर ले रखे हैं। उन्होंने इस विचार को गले लगाया है कि वे भी आज़ादी की हवा में साँस ले सकती हैं, पुरुषों की बराबरी पर हैं और जितना श्रम पुरुष करते हैं, वे भी कर सकती हैं, जितनी देर तक पुरुष काम करते हैं, वे भी कर सकती हैं-लेकिन साथ ही वे अपने आप से अब भी अपेक्षा करती हैं कि वे घर के वे सारे काम भी करती रहें जो उनकी नानियाँ या दादियाँ अपने वक़्त में करती रही हैं और वह भी उसी सुघड़ता के साथ! वे भूल जाती हैं कि उनकी दादियाँ सिर्फ वही करती थीं, उतना ही करती थीं। यह नहीं कि उसका कोई महत्व नहीं है- लेकिन आप सुपरवूमन नहीं हो सकतीं कि हमेशा पूरी दक्षता के साथ बाहर नौकरी भी करें, घर के कामकाज भी निपटाएँ और बच्चों को भी संभालें!

दुर्भाग्य से पुरुष भी अपने रवैये से इस विश्वास को मज़बूती प्रदान करते हैं: पत्नी सारे काम करती रहे, यह कितना सुविधाजनक है! फिर क्यों परेशान हों, क्यों मदद करें? क्यों उठें और खुद बरतन धोना शुरू कर दें? शर्ट अपनी है मगर उस पर प्रेस खुद क्यों करें जब काम करने के लिए पत्नी मौजूद है?

इसलिए कि आप अपनी पत्नी से प्यार करते हैं और चाहते हैं कि आपकी बेटी भी आगे चलकर एक मज़बूत महिला बने। खुद घर के काम करके बेटों के सामने उदाहरण प्रस्तुत करें कि वे भी घर के कामों में मदद कर सकते हैं। अपनी बेटियों को दिखाएँ कि पुरुष और महिलाएँ मिलजुलकर और एक-दूसरे की मदद करते हुए न सिर्फ बाहर के बल्कि घर के काम भी पूरी निपुणता के साथ निपटा सकते हैं! घर के कामों की ज़िम्मेदारी उठाएँ-आखिर पत्नी भी पैसे कमाकर परिवार की आर्थिक मदद कर ही रही है!

हम अभी भी पुरानी लैंगिक भूमिकाओं से चिपके हुए हैं और इससे बाहर निकलने में और वास्तविक समानता प्राप्त करने की दिशा में अभी लंबा रास्ता तय किया जाना बाकी है। जब तक हम एक के बाद दूसरा कदम आगे रख रहे हैं, एक न एक दिन हम अवश्य अपनी मंज़िल पा लेंगे!

मुफ्त सुविधाओं का लाभ उठाते हुए आर्थिक बराबरी का उपदेश – 25 नवम्बर 2015

कुछ समय पहले हमारे आश्रम में एक बहुत कट्टर विचारों वाला व्यक्ति मेहमान बनकर आया। उसका विचार था कि हर व्यक्ति को एक-दूसरे के बराबर होना चाहिए। हम भी बराबरी के विचार के हामी हैं और आश्रम में भी बराबरी के इस विचार को प्रोत्साहित करते हैं लेकिन उसने अपने कुछ विचारों और आदर्शों का जैसा वर्णन किया, उससे हम कतई सहमत नहीं हो सकते थे। उनमें से एक यह था कि हर एक को काम के घंटों के अनुसार एक समान पारिश्रमिक दिया जाना चाहिए। और हर एक को उतने घंटे ही काम करना चाहिए, जितने घंटे वह करना चाहता हो। इस विचार को इस तथ्य के साथ जोड़कर देखने पर कि वह स्वयं बेहद आलसी था, उसकी बात से सहमत होना मेरे लिए असंभब था!

मैं उसके विचार के मर्म को समझ रहा हूँ और निश्चित ही उसके कुछ बिंदुओं से सहमत भी हो सकता हूँ: कि एक तरफ कुछ लोग हैं जो कम से कम समय श्रम करके इतना अधिक कमा लेते हैं कि उस पैसे को जीवन भर खर्च नहीं कर सकते और दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं जो दिन भर हाड़तोड़ मेहनत करते हैं, छुट्टियाँ भी नही ले पाते और बड़ी मुश्किल से अपना घर-खर्च चला पाते हैं। इस स्थिति में सुधार होना चाहिए और किसी व्यक्ति को पैसे की कमी के कारण भूखा मरने के लिए नहीं छोड़ देना चाहिए।

लेकिन अपने उस मेहमान के विचार में मैं इस समस्या का समाधान नहीं देखता! उसने मुझसे कहा कि एक डॉक्टर, वैज्ञानिक, एक निर्माण मजदूर और सफाई कर्मचारी को एक समान वेतन मिलना चाहिए। और साथ ही, हम सबको चाहिए कि अपनी ज़रूरतों को कम करें, अर्थात हमें कम से कम साधनों में जीवन यापन करना चाहिए। इस तरह हर किसी को उसकी आवश्यकतानुसार प्राप्त हो जाएगा।

सैद्धांतिक रूप से यह पूरी तरह सही विचार लगता है लेकिन व्यावहारिक जीवन में यह संभव नहीं है! निश्चित ही सभी का काम महत्वपूर्ण है, भले ही वे कोई भी काम कर रहे हों क्योंकि हमें फर्श भी लगवाना पड़ता है और उसे साफ़ भी करवाना पड़ता है और उसके बाद ही हम उस पर चल सकते हैं और उस पर प्रयोगशाला बनाकर वैज्ञानिक प्रयोग कर सकते हैं! लेकिन एक डॉक्टर ने अपनी पढ़ाई में सालों खर्च किए हैं और उसका काम जीवन बचाता है। वह बरतन भी साफ़ कर सकता है मगर इसका उल्टा संभव नहीं है! है क्या?

इसके अलावा, हम सब अलग-अलग लोग हैं! एक व्यक्ति किसी काम को किसी दूसरे के मुकाबले बहुत कम समय में पूरा कर सकता है। अगर यह बार-बार हो तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि पहला व्यक्ति उस काम में दूसरे से अधिक निपुण है-और तब यदि वह दूसरे से अधिक पैसे कमाता है तो इसमें कतई कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। है कि नहीं?

अब अगर आपका जवाब ‘नहीं’ है तो इसका अर्थ हुआ कि व्यक्तिगत क्षमता या दक्षता से कोई फर्क नहीं पड़ता और किसी काम पर जो जितना समय लगाएगा, उसी के अनुसार सबको भुगतान किया जाना चाहिए। तब मेरा प्रतिप्रश्न यह होगा: ‘उनका क्या किया जाएगा जो आलसी हैं’? और फिर एक प्रश्न और कि आप कौन होते हैं, किसी से उनकी ज़रूरतों को कम करने का आदेश देने वाले? हो सकता है, ज़रूरतों पर उनके एहसासात आपसे जुदा हों!

और इसीलिए उस पूरे विचार पर ही मैं हँसे बिना नहीं रह सका: जबकि वह बढ़िया गरम पानी से नहा-धोकर, स्वादिष्ट नाश्ता करके आराम से ए सी कमरे में बैठा हुआ था, अपना खुद का काम करने में उसकी कोई रुचि भी दिखाई नहीं दे रही थी।

इसलिए, जबकि वास्तव में मैं विश्वास करता हूँ कि हमें गरीबों की मदद करनी चाहिए और हममें से ज़्यादातर लोग थोड़ा न थोड़ा खर्च कम भी कर सकते हैं लेकिन जो लोग इसके समर्थन में सबसे अधिक भाषण झाड़ते हैं, वही अपने छोटे, सुखद दायरे में आराम फरमाते हैं और इस तरह अपने कथन के विरुद्ध आचरण करते हैं।

दिन भर के कामकाज और मेहनत के बाद क्या आप सेक्स के लिए बेहद थक जाते हैं? 10 अगस्त 2015

कुछ समय पहले मुझसे किसी ने अपनी एक व्यक्तिगत समस्या पर सलाह मांगी: दिन भर कामकाज में व्यस्त रहता था। जब घर लौटता था तो अपने काम के तनाव और श्रम के कारण मानसिक और शारीरिक रूप से अत्यंत शिथिल पड़ जाता था। या तो उसके पास समय नहीं होता था या समय होता था तो इतनी शक्ति नहीं होती थी कि पत्नी के साथ सम्भोग कर सके! इसके चलते स्वाभाविक ही पत्नी असंतुष्ट रह जाती थी और दुखी रहने लगी थी। उसे क्या करना चाहिए?

सर्वप्रथम तो यह कि यह बड़ी अच्छी बात है कि आप किसी दूसरे से सलाह मांगने की ओर उद्यत हुए हैं क्योंकि समय आ गया है कि आप इस विषय में गंभीर हो जाएँ! जब आपके संबंध उस स्तर तक पहुँच जाते हैं, जहाँ शिकायतों का स्वर तीक्ष्ण होने लगता है और दोनों एक-दूसरे से अप्रसन्न रहते हैं तब आपके लिए अपनी जीवन-चर्या पर गंभीरता पूर्वक विचार करना ज़रूरी हो जाता है! अच्छा हो अगर आप उसमें कुछ बड़े परिवर्तन भी कर सकें!

दूसरे, मैं आशा करता हूँ कि सहवास-सुख की कमी सिर्फ आपकी पत्नी नहीं, बल्कि आप भी महसूस कर रहे होंगे!

जब एक बार आप विवाह कर लेते हैं तो आपके साथ हाड़ मांस का एक और प्राणी भी साथ रहने लगता है, जिसकी आपसे कुछ जायज़ अपेक्षाएँ होती हैं। यहाँ मैं आर्थिक अपेक्षाओं की बात नहीं कर रहा हूँ! और स्पष्ट कहूँ तो मैं सिर्फ भौतिक अपेक्षाओं की बात भी नहीं कर रहा हूँ! असल में यह समस्या सेक्स से संबंधित है ही नहीं। वह भावनाओं और प्रेम से संबंधित है। परस्पर प्रेम के साझेदार के रूप में आपकी पत्नी का आपके हृदय और आपके समय पर कुछ अधिकार तो है ही!

आप खुद निर्णय करें: आपके लिए क्या महत्वपूर्ण है? क्या आप अपने काम के लिए जी रहे हैं या सिर्फ आजीविका के लिए काम कर रहे हैं? आपको अपना काम ज़्यादा प्रिय है या पत्नी के साथ समय बिताना?

मुझे गलत न समझें- अपने काम में भी आपको मज़ा आना चाहिए। लेकिन ज़्यादा आनंद आपको अपने परिवार या साथी के साथ समय बिताने में आना चाहिए। अगर इस तरह आप अपना दिल पत्नी के सामने नहीं खोल सकते तो आपको जीवन जीने का कोई और तरीका अख्तियार करना चाहिए था!

बहुत से लोग कहेंगे: 'मैं यह सब, इतनी कड़ी मेहनत उन्हीं के लिए कर रहा हूँ, अपने परिवार के लिए, उनके भविष्य के लिए और बच्चों के लिए!' विशेष रूप से, जब आपके बच्चे भी हैं तो आपको यह समझना चाहिए कि आप ऐसे आनंद में अपना समय नहीं गुज़ार सकते। मेरा दावा है कि अगर आप कुछ कम काम करते हैं, थोड़ा कम पैसा कमाते हैं लेकिन कुछ अधिक समय परिवार और पत्नी के साथ गुज़ारते हैं तो आपका जीवन वास्तव में बेहतर हो जाएगा!

अगर आप इसी तरह चलते रहे, अपना रवैया नहीं बदला तो आप और आपका साथी एक-दूसरे से और दूर होते चले जाएँगे। अब आपको तय करना होगा कि आप साथ रहने में और एक-दूसरे से प्रेम करने में ज़्यादा रुचि रखते हैं या अपने काम में ही रमे रहना चाहते हैं। अगर आप अपने काम को चुनते हैं और पत्नी भी किसी दूसरी बात में मन लगा लेती है, कोई ऐसी रुचि पैदा कर लेती है, जहाँ वह अपना समय बिताना चाहती है तो फिर आपके पास शिकायत का कोई कारण नहीं होना चाहिए!

अपनी पत्नी से यह अपेक्षा न करें कि वह ताजिंदगी घर की सफाई करती रहेगी, बच्चों की देखभाल करती रहेगी और आपका इंतज़ार करती रहेगी कि जब आपको समय मिलेगा तो आप आएँगे और उसके साथ समय बिताएँगे। या उसके साथ बिस्तर साझा करेंगे- हालांकि इस मामले में सेक्स सिर्फ एक निशानी है कि आप लोग आपस में कितना करीब हैं। वह सिर्फ परस्पर प्रेम का भौतिक इज़हार है! और फिलहाल आपका काम उसे धीरे-धीरे खत्म कर रहा है!

आपके लिए आवश्यक है कि दैनिक जीवन में आप अपने प्रेमीजनों के लिए समय निकालें और फिर सप्ताहांत को वास्तविक सप्ताहांत बनाएँ- परिवार के साथ कहीं छुट्टियों पर निकल जाएँ या दो दिन का समय उनके साथ कुछ अलग तरह से बिताने की कोशिश करें। सिर्फ समय न गुजारें- ज़िंदगी का लुत्फ उठाएँ!

भूखे रह सकते हैं मगर झाड़ू-पोछा नहीं करेंगे – भारतीय समाज में व्याप्त झूठी प्रतिष्ठा की धारणा – 16 जुलाई 2015

हमारे स्कूल का नया सत्र शुरू हुए अब दो सप्ताह हो गए हैं और धीरे-धीरे अब लगने लगा है कि शिक्षिकाओं और बच्चों ने अपनी दैनिक लय पा ली है। नएपन की वह उत्तेजना अब नहीं रह गई है क्योंकि सभी एक-दूसरे के आदी होते जा रहे हैं और बच्चे स्कूल और आसपास के माहौल से काफी हद तक परिचित हो चुके हैं। बच्चों की आमद के बाद हमने भी आश्रम-कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि की है क्योंकि खाना बनाने और स्कूल और आश्रम की साफ-सफाई के लिए हमें अतिरिक्त कर्मचारियों की आवश्यकता होगी। सफाई-कर्मचारियों की बात निकलते ही हमारा सामना एक व्यर्थ तर्क-वितर्क से हो रहा है, भारतीय समाज में व्याप्त एक बेतुका और हास्यास्पद विचार: बहुत से गरीब लोग भूखे रह लेंगे मगर सफाई (घरेलू नौकरानी) का काम नहीं करेंगे।

इससे अधिक तर्कसंगत बात क्या हो सकती है?: हमें कर्मचारियों की आवश्यकता है, हम जानते हैं की बच्चों के अभिभावक बहुत गरीब हैं और उन्हें रोज़ काम की खोज में भटकना पड़ता है। इसके अलावा, उनके पास कोई विशेष शैक्षणिक योग्यता भी नहीं है कि कहीं ऊँची तनख्वाह वाली नौकरी पा सकें। तो फिर क्यों न हम इन बच्चों के अभिभावकों को अपने यहाँ सफाई-कर्मचारियों के रूप में रख लें, जिससे उनके पास एक ऐसी स्थाई नौकरी हो जाएगी, जिसमें पढ़ाई-लिखाई की ज़रूरत नहीं होती?

कुछ हद तक तो हम यह करते ही हैं। हम कोशिश करते हैं कि अपने यहाँ आश्रम और स्कूल की साफ़-सफाई और खाना बनाने के लिए अपने स्कूल के बच्चों के अभिभावकों को ही काम पर रख लें। दुर्भाग्य से, अक्सर वे लोग रसोई में काम करने को तो तैयार हो जाते हैं मगर झाड़ू को हाथ तक लगाना नहीं चाहते!

रमोना ने बताया कि कैसे वे लोग मई के महीने में नए बच्चों की भर्ती के सिलसिले में घर-घर घूमते थे और परिवारों से मिलकर उनकी आर्थिक स्थिति का जायज़ा लेते थे कि अभिभावक-गण क्या काम करते हैं। ज़्यादातर घरों में सिर्फ पिता ही कोई काम करता था क्योंकि माँ को घर और बच्चों की देखभाल के लिए घर पर ही रहना होता था। लेकिन एक घर में हमें ऐसी कहानी सुनने को मिली, जिसने हमें उनके प्रति सहानुभूति से भर दिया: माँ और दो बच्चे बच्चों के पिता के घर में रहते हैं लेकिन पिता किसी काम का नहीं है। वह धेले भर का काम नहीं करता, ऊपर से शराबी और जुआरी भी है और जब भी कुछ पैसे पाता है, इन्हीं व्यसनों में उड़ा डालता है।

इसलिए माँ को अपने और अपने बच्चों के लालन-पालन और दीगर खर्चों के लिए अपने जेठों और सास की दया पर निर्भर रहना पड़ता है! वह थोड़ा-बहुत कढ़ाई-बुनाई का काम करती है मगर, क्योंकि वह इस काम में बहुत दक्ष नहीं है, अधिक कमा नहीं पाती कि अपनी जीविका चला सके। उसके जेठों ने शिकायती लहजे में कहा, ‘वह बहुत थोड़े से रुपए कमाती है, हम कब तक उसका खर्च उठाते रहेंगे?

रमोना को आश्चर्य हुआ और उसने सीधे-सीधे कह दिया, ‘क्यों? अगर वह कुछ घरों में झाड़ू-पोछा ही कर ले तो आधा दिन, जब बच्चे स्कूल में होते हैं, काम करके अच्छा-ख़ासा पैसा कमा सकती है!’ और यह सही बात है, जो महिलाएँ घरों में चौका-बासन या झाड़ू-पोछा करती हैं, वे यहाँ काफी पैसे कमा लेती हैं! लेकिन, जैसे ही उन्होंने रमोना के मुँह से ये शब्द सुने, उन्हें सांप सूंघ गया! सब चुप, जैसे यह सलाह देकर उसने कोई बुरी, घृणास्पद बात कह दी हो!

शुरू में वे बहाने बनाते रहे और फिर बात बदलते हुए इस प्रश्न से ही किनारा कर लिया कि जैसा चल रहा है, वही ठीक है, कि वह घर के कामों में ही मदद करती रहे, बाहर जाने की उसे कोई ज़रूरत नहीं है!

तो, एक तरफ लोग जीवन-यापन का मामूली घरेलू खर्च चलाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे हैं, काम की खोज में दर-दर भटकते हैं कि बच्चे भूखे न रहें और दूसरी तरफ उन्हें अपने रिश्तेदारों का मोहताज होना मंज़ूर है, बुरे वक़्त की मार झेलना मंज़ूर है लेकिन साफ़-सफाई का काम करना मंज़ूर नहीं, दूसरों के जूठे बरतन साफ़ करना मंज़ूर नहीं!

यह रवैया बहुत बुरा है, नकारात्मक है। झूठा अहं है, प्रतिष्ठा का आत्मघाती पाखंड है और सबसे बड़ी बात, एक साधारण से काम के प्रति सदियों से जड़ जमाए बैठी गलत धारणा है।

आयुर्वेदिक रेस्तराँ के काम की प्रगति – 22 फरवरी 2015

आज रविवार है और आज मैं अपने व्यक्तिगत जीवन में तीव्रगति से हो रही दैनिक हलचलों के बारे में आपको बताना चाहता हूँ। वास्तव में अभी, इस वक़्त दिनचर्या बड़ी व्यस्त चल रही है, बहुत सारी घटनाएँ हो रही हैं, बहुत सारे कामों को अंजाम दिया जा रहा है और मैं वाक़ई बहुत, बहुत व्यस्त हो गया हूँ और रोज़ ब रोज़ व्यस्तता बढ़ती ही जा रही है। साथ ही बड़ा मज़ा आ रहा है! कितना कुछ हो रहा है- वाह, बड़ा अच्छा लग रहा है!

स्वाभाविक ही, बहुत सी रोज़मर्रा की चीजें हैं: जैसे ईमेल, यह ब्लॉग और निश्चित ही हमारे मेहमान और उनके विश्रांति सत्र आदि। पूर्णेन्दु हमारे दो मेहमानों का गाइड बनकर बाहर निकला हुआ है। वे लोग राजस्थान गए हुए हैं-जयपुर और पुष्कर हो आए हैं और इस समय जोधपुर घूम-फिर रहे हैं और आज वहाँ रहकर कल फालोदी, जैसलमेर आदि जाएँगे, जहाँ ऊँट की सवारी करेंगे, एक दिन रेगिस्तान में बिताएँगे और उसके बाद बीकानेर होते हुए दिल्ली लौटेंगे। वह होली मनाने वापस आ जाएगा-जिसकी हम सभी यहाँ जोर-शोर से तैयारियाँ कर रहे हैं!

और फिर हमारी सबसे बड़ी परियोजना तो चल ही रही है: हमारा आयुर्वेदिक रेस्तराँ 'अम्माजी'ज़'! कुछ माह पहले मैंने उसके बारे में आपको बताया था। आम भारतीय परम्परा के अनुसार इसमें भी काफी विलम्ब हो गया। इस विषय में आप ज़्यादा कुछ कर भी नहीं सकते- आर्किटेक्ट शुरू में बनाई गई योजना से अधिक वक़्त लेता है, कोई भी निर्माण कार्य समय पर पूरा नहीं होता और लोग किसी काम को दस दिन में निपटाने का वादा करके अक्सर उसे बीस या तीस दिन में पूरा करते हैं!

लेकिन अब रेस्तराँ के भवन का ईंट-गारे वाला काम पूर्ण हो चुका है और उसे फर्नीचर आदि से सुसज्जित करने का काम, आतंरिक रूप-सज्जा और रेस्तराँ के आसपास की जगह को सँवारने काम किया जाना बाकी है, जिससे वह हमारी पूर्व परिकल्पना के मुताबिक एक सुन्दर और आधुनिक रेस्तराँ दिखाई दे! हमें बहुत सी बातों पर विचार-विमर्श करके निर्णय लेने हैं, बहुत से लोगों को रेस्तराँ के बारे में बताना है, कुछ लोगों से सलाह-मशविरा करना है और उन लोगों व्यापारियों, दूकानदारों से भी चर्चा करनी है, जिनसे हम भविष्य में आवश्यक सामान खरीदेंगे और सबसे बड़ी बात, इन सबको सुगठित रूप से संचालित करने का महती कार्य भी करते चलना है, जिससे हमारे बीच अच्छा तालमेल बन सके! तो यह सब बड़े और चुनौतीपूर्ण काम हैं- मगर इसमें आनंद भी बड़ा है!

हमें रसोई के लिए बहुत सारी चीज़ें खरीदनी हैं और उसके साथ ही बहुत से जर्मन मित्र, जो अगले दो महीनों में यहाँ आएँगे, पूछते रहते हैं कि वे जर्मनी से क्या लेकर आएँ, यहाँ तक कि हम खुद ही कुछ जर्मन मित्रों और परिचितों से कहते हैं कि अपनी रसोई में देखें कि उनके पास रसोई में काम आने वाली कोई चीज़ अतिरिक्त तो नहीं है या उन्हें अब उनकी ज़रूरत नहीं है। जब वे हमें किसी ऐसी चीज़ के बारे में बताते हैं तो हम उन्हें उन मित्रों का पता बता देते हैं, जो भारत आते वक़्त यह सामान अपने साथ ला सकते हैं। हमें लगता है कि यह बड़ा दुखद होगा कि कोई उपयोगी वस्तु, जो सही-सलामत है, ठीक से काम कर रही है, यूँ ही फेंक दी जाए-और इस तरह वे लोग हमारे रेस्तराँ के निर्माण में अपना योगदान देते हैं और हमारी इस परियोजना का हिस्सा बन रहे हैं!

हमें अभी भी विश्वास है कि हम अगले माह रेस्तराँ का शुभारंभ कर देंगे-लेकिन हम भारत में हैं, कुछ भी निश्चित रूप से कहना मुश्किल है!

जब वह मुबारक दिन बहुत करीब आ जाएगा, मैं आप सबको अवश्य सूचित करूँगा!

कृपया इसे अवश्य पढ़ें यदि आप रोजमर्रा की जिन्दगी से बचने के लिए छुट्टियाँ मनाने जाते हैं! 2 फरवरी 2015

कल मैंने आपको सारांश में बताया था कि जब मैं छुट्टियाँ बिताने कहीं बाहर जाता हूँ तो मैं क्या महसूस करता हूँ। मैं जानता हूँ कि छुट्टियों के बारे में मैं दूसरों से कुछ अलग विचार रखता हूँ। और मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि कई लोग जब अपनी छुट्टियों के बारे में बताते हैं तो लगता है जैसे वे कुछ गलत काम कर रहे हों। अपनी छुट्टियों को लेकर नहीं बल्कि अपने दिनचर्या को लेकर!

मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि मुझे छुट्टियाँ पसंद हैं। मुझे पत्नी के साथ किसी दूसरे शहर जाकर छुट्टियाँ मनाना पसंद है, वहाँ जाकर बिना किसी निश्चित कार्यक्रम के अपनी मर्ज़ी से कुछ दिन गुज़ारना पसंद है, यह सोचकर ही मुझे बड़ा अच्छा लगता है कि अगर हम चाहेंगे तो किसी होटल में सारा दिन अकेले रहकर गुज़ार सकते हैं और अपने मनपसंद रेस्तराँ में रात का खाना खा सकते हैं। मैं ये सब बातें पसंद करता हूँ-लेकिन यह मेरे जीवन के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। मैं अपनी छुट्टियों के अधीन नहीं हूँ। मेरा पूरा साल मेरी छुट्टियों पर केन्द्रित नहीं है। जब हम वापस लौटते हैं तो हम बात करते हैं कि छुट्टियाँ कितनी अच्छी रहीं और अपने काम पर लग जाते हैं।

मैंने कुछ दिन पहले ही आपको बताया था कि मैं अपने काम से प्यार करता हूँ। सिर्फ काम से ही नहीं, अपने जीवन से, अपने आश्रम से, अपने स्कूल से, अपने चैरिटी के काम से, अपने व्यवसाय से, अपने परिवार, दोस्तों, मिलने-जुलने वालों, बच्चों और अपने मेहमानों से। और मैं ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूँ जो ऐसा महसूस नहीं करते। जो अपने सामान्य जीवन में अपने रूटीन से खुश नहीं हैं।

आश्रम से बिदा लेते समय अकसर लोगों की आँखें भर आती हैं। स्वाभाविक ही हम यह जानकर खुश होते हैं कि आश्रम में उनका समय बहुत अच्छा रहा और दुनिया के इस कोने में बने अपने मित्रों को छोड़कर जाना उनके लिए मुश्किल हो रहा है और इस कारण उनकी आँखों में आँसू आ गए! लेकिन कभी-कभी ये आँसू निश्चित रूप से यह नहीं बताते कि यहाँ उनका समय अच्छा रहा बल्कि यह बताते हैं कि आगे आने वाला समय अच्छा नहीं होगा! घर जाना उन्हें अच्छा नहीं लग रहा होता और उन्हें दुख होता है कि अब उन्हें वहीं वापस जाना होगा।

चाहे वह उनका काम हो, व्यवसाय हो, उनकी पारिवारिक स्थिति हों या सामान्य अकेलापन या जीवन से असंतोष हो-उनकी छुट्टियाँ उनके लिए खुशियाँ लेकर आती हैं जब कि सामान्य रूप से अपने जीवन में वे खुश नहीं होते। छुट्टियों को सामान्य जीवन से ‘पलायन’ नहीं होना चाहिए जबकि उन्हें आजकल इसी तरह विज्ञापित किया जा रहा है! जी हाँ, छुट्टियों में आप अपने भीतर ऊर्जा का पुनर्संचार करते हैं और कुछ अलग, नया देखते हैं, कुछ अलग करते हैं और नए लोगों से मिलते-जुलते हैं। लेकिन अपने सामान्य जीवन, अपने रूटीन से भागकर आपको छुट्टियों का कार्यक्रम नहीं बनाना चाहिए!

इस तरह अपने सामान्य जीवन को आपकी ऊर्जा पूरी तरह निचोड़ लेने की इजाज़त मत दीजिए! अगर आपको लगे कि आप सिर्फ इसलिए जीवित हैं कि कुछ महीनों बाद कहीं बाहर जाकर छुट्टियाँ बिता सकें, अगर आप अपनी छुट्टियों का इंतजार कर रहे हैं और उनसे पलायन की कल्पना कर रहे हैं तो समझ लीजिए कि आप अपना जीवन नहीं जी रहे हैं। तब शायद साल में आप सिर्फ चार सप्ताह की ज़िंदगी जी रहे हैं!

अपने जीवन को बरबाद न होने दें। उसमें परिवर्तन लाने की कोशिश करें और अभी, इसी समय से यह कोशिश शुरू कर दें!

मैं घर से किया जाने वाला अपना काम (व्यवसाय) क्यों पसंद करता हूँ – 22 जनवरी 2015

जबकि काम के बारे में लिखते हुए कल ही मैंने आपको बताया था कि क्यों आपको अपने काम से प्रेम होना चाहिए, मुझे लगता है कि खुद मुझे भी अच्छी तरह सोच-समझकर अपनी परिस्थिति का आकलन करना चाहिए। क्योंकि मैं इस बात में विश्वास रखता हूँ कि हर एक को सकारात्मक समाचार और सुखद अनुभूतियों को दूसरों के साथ साझा करना चाहिए, मैं आज अपने विचार और भावनाएँ आपके साथ साझा करना चाहता हूँ!

सबसे पहली बात तो यह कि मुझे यह बड़ा अच्छा लगता है कि काम करने के लिए मुझे कहीं बाहर नहीं जाना पड़ता। यहाँ मैं विदेशों में आयोजित अपनी कार्यशालाओं या व्याख्यानों के बारे में बात नहीं कर रहा हूँ- वैसे भी वह अब मेरा मुख्य काम नहीं रह गया है। मुख्यतः मैं अपने घर से ही, कंप्यूटर पर अपना काम करता हूँ और आश्रम आए हुए मेहमानों के संपर्क में रहता हूँ और उनके साथ काम करता हूँ।

कुछ लोग कहते हैं कि वे कभी भी घर से अपना काम या व्यवसाय करना नहीं चाहेगे। वे अपनी कार्यालयीन ज़िंदगी और अपनी निजी ज़िंदगी के बीच स्पष्ट दूरी बनाए रखना पसंद करते हैं। मेरे खयाल से इसीलिए कुछ लोगों के दोहरे व्यक्तित्व होते हैं: एक अपने काम के लिए और दूसरा अपनी निजी ज़िंदगी के लिए! ये लोग अपने कार्यालय में ऐसे मित्र नहीं बनाते जो उनकी निजी ज़िंदगी में भी मित्र हो सकें!

मेरे लिए मेरा सारा घर ही मेरा काम है और मेरा काम ही मेरा घर है। क्या आपको इसमें कुछ अतिरेक नहीं लगता? यदि हाँ, तो इसलिए कि आप अपने काम से उस तरह प्यार नहीं करते जिस तरह मैं करता हूँ!

काम करने की मेरी कोई तय समय-सीमा नहीं है। स्वाभाविक ही, इसका अर्थ यह होता है कि मैं अक्सर कार्यालय में काम या व्यवसाय करने वाले सामान्य लोगों से अधिक काम करता हूँ; लेकिन साथ ही इसका यह भी अर्थ है कि मैं अपरा से खेलने का या शाम को यूँ ही आग तापने का समय पा जाता हूँ। लेकिन फिर यह भी एक तरह का काम ही होता है-क्योंकि वहाँ मैं आश्रम आए मेहमानों और अपने ग्राहकों के साथ बैठता हूँ, उनसे मिलता-जुलता हूँ, बातचीत करता हूँ-तो इसे आप इस तरह भी देख सकते हैं।

मैं अपने पूरे परिवार के साथ मिलकर किसी दूसरे के पैसों के लिए काम नहीं कर रहा हूँ बल्कि दूसरों की भलाई के लिए काम कर रहा हूँ। आश्रम आए मेहमानों के स्वास्थ्य के लिए, विश्राम करने आए सहभागियों के लिए, अपने स्कूल के बच्चों की मदद के लिए, बाल-श्रम और गरीबी के विरुद्ध मेरा काम है।

स्वाभाविक ही, चैरिटी से आपको संतुष्टि प्राप्त होती है। और यही तब भी होता है जब आप दूसरों के स्वास्थ्य के लिए और उनकी ख़ुशी के लिए काम करते हैं: जब लोग आश्रम से प्रसन्नतापूर्वक बिदा होते हैं, हमें धन्यवाद कहते हैं और दोबारा वापस आना चाहते हैं तो हमें बहुत ख़ुशी होती है! और क्योंकि यह अक्सर होता है, हम न सिर्फ काम करते समय खुश रहते हैं बल्कि उसके नतीजों को देखकर भी हमें बड़ी ख़ुशी मिलती है।

और सबसे बड़ी बात यह कि मैं अपना काम अपने परिवार के साथ मिलकर कर रहा होता हूँ, पत्नी और भाइयों के साथ। हम एक दूसरे को इतनी अच्छी तरह जानते हैं कि कई बार यह महसूस होता है जैसे आपके पास काम करने के लिए चार-चार शरीर हैं। साथ ही अगर आप किसी बात को समझ नहीं पा रहे हैं तो आपके पास उस पर सोचने के लिए चार दिमाग भी हैं!

दुनिया भर से आने वाले ऐसे मेहमानों को पाना जो मित्र बन गए, घर पर रहकर अपना काम और व्यवसाय करना और अपने सभी मित्रों को अपने जीवन के समारोह में आमंत्रित करना और उनकी मेज़बानी का सौभाग्य हासिल करना, ये कुछ और बिंदु हैं जो मेरी इस धारणा को और भी मज़बूत करते हैं:

मैं अपने काम और व्यवसाय से प्यार करता हूँ!

अपने जीवन का समय बरबाद न हो इसलिए अपने काम से प्रेम करें – 21 जनवरी 2015

कल चिकित्सा व्यवसाय पर लिखने के पश्चात आज मैं सामान्य रूप से सभी पेशों में काम करने वाले लोगों से यह कहना चाहता हूँ कि जिस काम को आपने अपने जीवन का ध्येय बनाया है उससे प्यार करें। मेरे विचार में जिस काम को आप करें उससे आपको प्यार भी करना चाहिए!

बहुसंख्यक लोगों के लिए उनका काम उनके दिन का बड़ा हिस्सा ले लेता है। सामान्य रूप से अधिकतर लोग दिन में आठ घंटे काम करते हैं और कुछ लोग इससे भी ज़्यादा। अगर यह माना जाए कि आप आठ घंटे सोते हैं, व्यक्तिगत कामों और बाथरूम में एक घंटा लगता है-कुछ लोगों को इससे भी अधिक समय लगता है-और अपने काम की जगह जाने और वापस लौटने में भी आपका एक घंटा चला जाता है तो आपके पास दिन भर में सिर्फ छह घंटे बचते हैं। इन छह घंटों में आपको घर का सामान आदि लाना होता है या कोई और ख़रीदारी करनी होती है, घर के कुछ काम निपटाने होते हैं और खाना-पीना होता है। अंत में आपके पास बहुत कम समय बचता है कि आप अपने मनबहलाव के लिए भी कुछ कर सकें या दोस्तों या रिश्तेदारों के साथ समय गुज़ार सकें, बच्चों के साथ खेल सकें या आपसी सम्बन्धों के लिए कुछ समय निकाल सकें।

ज़्यादा नहीं बचता, है न?

जबकि कई देशों में अधिकांश लोगों के लिए हफ्ते में काम के पाँच दिन ही होते हैं, कुछ दूसरों के लिए छह दिन और कुछ लोगों के लिए सात दिन काम के होते हैं, जिसमें से एक दिन आधे दिन तक ही काम होता है।

तो अपने काम में आप इतना अधिक समय व्यतीत करते हैं कि जो आप कर रहे हैं उसमें आपकी रुचि होना अत्यंत आवश्यक है! क्या आप यह नहीं देख पा रहे हैं कि अगर ऐसा नहीं है तो आप अपने जीवन के साथ क्या कर रहे हैं? हर दिन, हर सप्ताह, हर माह और हर साल आप ऐसे काम में अपना समय खर्च कर रहे हैं जिसे आप पसंद नहीं करते, बल्कि उससे घृणा करते हैं!

यह आपको सुखी नहीं रख सकता, यह आपको संतुष्टि प्रदान नहीं कर सकता। उल्टे यह आपको बीमार कर देगा।

हाँ हाँ मैं जानता हूँ कि लोग कहेंगे: ‘लेकिन मुझे गुज़ारा करने के लिए कोई न कोई काम तो करना ही होगा!’ वे तर्क देंगे कि आप इसका चुनाव नहीं कर सकते कि नौकरी के लिए आपको किस जगह स्वीकार किया जाता है। लेकिन अगर आप ठीक तरह से सोचें तो आपको पता चलेगा कि अधिकतर मामलों में आपके पास विकल्प होता है! आप बहुत सा समय अपने समय के साथ सुलह-समझौते में ही लगे रहकर ऐसी नौकरी या ऐसे व्यवसाय में बने रहते हैं जिसे आप पसंद नहीं करते। नौकरी या व्यवसाय में रुचि या अरुचि के अलावा इसके और भी कई कारण होते हैं मगर सबसे मुख्य कारण पैसा होता है।

अगर वे इस बात को मंजूर कर लें कि यदि उनके काम या व्यवसाय से उन्हें कम आमदनी होती है तो भी कोई बात नहीं मतलब कि अगर वे कम पैसे में भी संतुष्ट हो जाएँ तो कई लोगों के लिए यह संभव हो सकता है कि वे ऐसे काम या व्यवसाय का चुनाव कर पाएँ जो उन्हें प्रसन्न भी रखे और उससे उन्हें संतुष्टि भी प्राप्त हो। वे भूखों नहीं मरेंगे और न ही उन्हें कोई ज़्यादा आर्थिक परेशानी होगी-होगी भी उतनी नहीं कि उसे बरदाश्त न किया जा सके।

और इसीलिए मैं सभी को प्रोत्साहित करता हूँ कि प्रसन्न रहने का तरीका खोजें। अपने काम को पसंद करने का, उससे प्रेम करने का तरीका सीखें या फिर उस काम को छोड़कर किसी दूसरे काम का चुनाव करें। यह भी संभव है कि आप अपने वर्तमान काम या व्यवसाय में काम करने के घंटे कम कर दें और बचे हुए समय में कोई दूसरा काम शुरू करें जो आपके लिए अधिक आनंददायक और संतुष्टि प्रदान करने वाला हो। यह भी संभव है कि सिर्फ अपने खर्चे कम करके आप पूरी तरह से कोई नया काम या व्यवसाय शुरू कर सकें। हो सकता है कि आप अपना कोई व्यापार शुरू कर दें, उसमें ज़्यादा समय दें, अधिक मेहनत करें लेकिन उसी काम ले लिए जिसे आप शिद्दत के साथ पसंद करते हैं।

मेहरबानी करके ऐसा काम करते हुए अपनी ज़िंदगी का बहुमूल्य समय बर्बाद न करें जिसे आप पसंद नहीं करते।

चिकित्सा क्षेत्र के पेशेवर लोगों के लिए – आवश्यक जुड़ाव और दूरी – 20 जनवरी 2015

कल मैंने आपको बताया था कि मैं पिछले कई हफ्तों और महीनों से कितना व्यस्त रहा हूँ और यह भी कि इस बात से वास्तव में अब हम बड़ी खुशी महसूस कर रहे हैं। क्योंकि हमने कई घंटे अस्पताल में बिताए हैं, मेरे मन में उन लोगों के विषय में बहुत से विचार आ रहे हैं, जो वहाँ काम करते हैं- क्योंकि डॉक्टर या नर्स से अधिक अपने काम में व्यस्त रहने वालों की आप कल्पना नहीं कर सकते।

सबसे पहली बात तो यह कि आपको वास्तव में अपने काम से प्रेम करना चाहिए, तभी आप उसे ठीक तरह से कर पाएँगे। मुझे लगता है कि चिकित्सा-क्षेत्र में काम करने वालों पर यह और अधिक लागू होता है। यह एक प्रायोगिक काम है जिसे हाथों से करना होता है। नर्स, डॉक्टर यहाँ तककि उनके सहायक तक को पूरे समय लोगों के साथ, उनके करीब रहना होता है लेकिन वे वह सामान्य, सुविधाजनक दूरी बनाए नहीं रख सकते जो सामान्यतः दूसरे हर क्षेत्र में काम करने वाले बनाए रख पाते हैं। दूसरों को छूना आवश्यक होता है, दूसरों के शरीर के विभिन्न हिस्सों को नजदीक से देखना, उनकी बात सुनना ज़रूरी होता और वह भी पूरी बारीकी, एकाग्रता और तन्मयता के साथ!

वे लंबी शिफ्टें करते हैं और सारा दिन पूरी तरह उसी माहौल में रहते हैं: आपातकालीन फर्ज़, लंबी शल्यक्रियाएँ, मरीजों के इलाज के पहले और बाद में पेश आने वाली चिकित्सकीय चुनौतियाँ, सफलता के किस्से और त्रासदियाँ। अपने काम में पूरी तरह संलग्न हुए बगैर कोई चारा नहीं। साथ ही हर समय अपने आपको चैतन्य और तरोताजा बनाए रखने के लिए उन्हें अपने मरीजों से एक खास पर्याप्त दूरी भी बनाकर रखनी पड़ती है।

हर व्यक्ति अपने लिए अपनी निजी ज़िंदगी भी चाहता है। दूसरों के लिए किए जा रहे किसी काम के लिए अपने आपको 100% समर्पित कर देना असंभव होता है। ऐसा काफी समय तक, बहुत लंबे समय तक भी संभव हो सकता है लेकिन अगर आप अपने निजी जीवन के लिए वक़्त नहीं निकालते तो कभी न कभी ऐसा एक लम्हा आएगा जहाँ आप टूट जाएँगे!

मरीज आते रहेंगे और इलाज कराके वापस चले जाएँगे। कुछ अधिक दिन रहेंगे और उनके साथ आप एक तरह का जुड़ाव महसूस करने लगेंगे जबकि कुछ लोग एकाध दिन के लिए आएँगे और चल देंगे। कुछ कहानियाँ होंगी, जो आपके मन को छू लेंगी-जैसे मोनिका की कहानी ने हमारे अस्पताल में कई दिलों को भीतर तक स्पर्श किया। आप दूसरों की सेवा करके, उनके लिए चिंतित होकर और उनकी देखभाल करके गौरवान्वित महसूस करेंगे।

दुर्भाग्य से ऐसे भी लोग आपके पास लाए जाएँगे, जिनके लिए किसी भी तरह की सहायता में देर हो चुकी होगी। तब आपको उनकी मदद करनी होगी, जो पीछे छूट जाएँगे।

यह सब सोचते हुए मैं एक बार फिर सबका ध्यान इस बात की ओर ले जाना चाहता हूँ कि यह काम हम सबके लिए कितना बहुमूल्य है। उन सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया जो चिकित्सा क्षेत्र में काम कर रहे हैं। और उनके लिए एक सलाह भी: याद रखें कि आपकी भी अपनी एक निजी ज़िंदगी है और उसका भी आपको खयाल रखना है। आपको अपने काम से एक दूरी बनाए रखनी है, छोटी सी मगर एक आवश्यक दूरी, भले ही आप कितना भी अपने काम के प्रति समर्पित हों!

मोनिका की पृष्ठभूमि – पिता, जो परिवार के भरण-पोषण के लिए कुछ नहीं करता! 17 दिसंबर 2014

मोनिका के साथ हुए अपघात के बारे में बताने के बाद और यह बताने के बाद कि क्यों हमने एक निजी अस्पताल को उसके इलाज के लिए चुना, अब मैं आपको उसकी, उसके परिवार की और घर की पृष्ठभूमि के विषय में कुछ बताना चाहता हूँ।

मोनिका की माँ अपढ़ नहीं है। वह 8वीं कक्षा तक पढ़ी है और जिस प्रदेश में साक्षारता दर 50% है वहाँ इतनी शिक्षा कोई कम या छोटी बात नहीं है। उसका और उसकी बहन का विवाह एक साथ, दो भाइयों के साथ कर दिया गया था, जिसका अर्थ था कि वे न सिर्फ बहनें थीं बल्कि आपस में देवरानी-जेठानी भी थीं! सुनने में अच्छा लगता है मगर दुर्भाग्य से आज उनके बीच बातचीत भी बंद है।

मोनिका के पिता के परिवार का कोई भी सदस्य उनके साथ बातचीत तक नहीं करता। माँ बताती है कि सभी एक ही मकान में रहते हैं मगर वे लोग सबसे कटे हुए एकाकी हैं। उसका पिता चार भाइयों में एक भाई है। सबसे बड़े भाई का देहांत हो चुका है और मृत भाई की पत्नी मकान की मालकिन है। मोनिका की दादी और मोनिका का सबसे छोटा चाचा भी अपने परिवार के साथ वहीं रहते हैं। कुल मिलाकर एक कमरा और एक रसोई मोनिका के परिवार का घर है।

क्या कारण है कि कोई भी उनसे किसी तरह का संबंध नहीं रखना चाहता? संभवतः मोनिका के पिता के कारण। वह एक साल भी स्कूल नहीं गया और इस तरह पूरी तरह अपढ़ है। उनके विवाह के तुरंत बाद मोनिका की माँ को पता चला कि वास्तव में उसके पास कोई नियमित काम नहीं है। कुछ समय तक वह यहाँ-वहाँ काम करता था मगर किसी भी काम में वह टिक नहीं पाता था। कुछ समय पहले तक उसके पास एक ठेला था, जिसमें वह सब्जियाँ, फल इत्यादि और कुछ दूसरे सामान रखकर फेरी लगाता था। उसके भाई भी कुछ समय तक उसकी मदद करते रहे लेकिन कभी भी वह कुछ कमा-धमाकार नहीं लाता था या लाता भी था तो बहुत कम। वृन्दावन के मुख्य मंदिर के पास स्थित अपने भाई की दुकान में भी वह कुछ समय तक काम करता रहा मगर निश्चय ही वह अपना काम ठीक तरह से नहीं करता होगा इसलिए उसके भाई ने उसे निकाल बाहर किया।

आप स्वयं उनके घर की आर्थिक स्थिति की कल्पना कर सकते हैं, जहाँ माँ को सोचना पड़ता हो कि किस तरह अपनी तीन-तीन बेटियों का पेट भरा जाए! वे परेशानियाँ, जो आज भी उसके साथ लगी हुई हैं! अपने पति के लिए भावनाएँ, जो उसके दिल में होंगी!

जब कोई भी मदद के लिए सामने नहीं आता, माँ के माता-पिता ही उसके सहायक बनकर साथ खड़े होते हैं। रसोई में आवश्यक बरतन और कपड़े इत्यादि देकर वे अक्सर उसकी मदद करते रहते हैं। एक बार, जब उसके पति के साथ उसका झगड़ा हुआ तो महीनों वह अपने बच्चों को लेकर अपने माता-पिता के यहाँ रहने चली गई थी। उस समय उसके बच्चे स्कूल भी नहीं जाते थे।

जब उसने अपनी दुखद कहानी अपनी सहेलियों को सुनाई तो उन्होंने सलाह दी: तुम्हें खुद नौकरी कर लेनी चाहिए! खुद पैसे कमाओगी तो फिर तुम्हें पैसे के लिए अपने पति का मुँह नहीं देखना पड़ेगा!

जब उसके बड़े बच्चे स्कूल चले जाते थे, उसने थोड़ा सक्रिय होने का मन बनाया। फिर वह अपनी छोटी बच्ची को माँ के पास छोड़कर एक बड़े स्थानीय मन्दिर में सुरक्षा कर्मचारी के रूप में काम करने लगी! आज वही है, जो घर में थोड़ा-बहुत कमाकर लाती है!

लेकिन, स्वाभाविक ही, इससे उनकी सारी समस्याएँ हल नहीं हो सकती थीं! वह बहुत अधिक नहीं कमा पाती- 5000 रुपए यानी लगभग 80 डॉलर्स। लेकिन इतनी आमदनी से कम से कम वह अपने बच्चों का पेट भर सकती थी और साथ ही कुछ अतिआवश्यक वस्तुएँ खरीद सकती थी। इसके अलावा उसका भाई मोनिका के इलाज का सारा खर्च उठा रहा था और उसी ने एम्बुलेंस लाने के लिए पैसे उधार दिए थे। अपघात के बाद, क्योंकि माँ काम पर चली जाती थी, मोनिका अकेली घर में बिस्तर पर पड़ी रहती। ऐसे समय में उसके माता-पिता ने ही टीवी कनेक्शन लेने के लिए पैसे मुहैया कराए, जिससे मोनिका को अधिक अकेलापन महसूस न हो।

और उसका पति? वह सिर्फ समस्याएँ पैदा कर रहा है। किस तरह की समस्याएँ? इस बारे में कल विस्तार से!

इस बीच, बड़ा अच्छा होगा यदि आप यह संदेश दूसरों के साथ साझा करें और मोनिका के बारे में अपने जान-पहचान वालों और यार-दोस्तों को बताएँ और उसके साथ हुई दुर्घटना के बारे में मेरे ब्लॉग और हमारा 'प्रोजेक्ट पेज' साझा करें, जहाँ वे आर्थिक सहायता प्रदान कर सकते हैं! आइए, हम सब मिलकर उसकी मदद करें!