आयुर्वेदिक रेस्तराँ के काम की प्रगति – 22 फरवरी 2015

मेरा जीवन

आज रविवार है और आज मैं अपने व्यक्तिगत जीवन में तीव्रगति से हो रही दैनिक हलचलों के बारे में आपको बताना चाहता हूँ। वास्तव में अभी, इस वक़्त दिनचर्या बड़ी व्यस्त चल रही है, बहुत सारी घटनाएँ हो रही हैं, बहुत सारे कामों को अंजाम दिया जा रहा है और मैं वाक़ई बहुत, बहुत व्यस्त हो गया हूँ और रोज़ ब रोज़ व्यस्तता बढ़ती ही जा रही है। साथ ही बड़ा मज़ा आ रहा है! कितना कुछ हो रहा है- वाह, बड़ा अच्छा लग रहा है!

स्वाभाविक ही, बहुत सी रोज़मर्रा की चीजें हैं: जैसे ईमेल, यह ब्लॉग और निश्चित ही हमारे मेहमान और उनके विश्रांति सत्र आदि। पूर्णेन्दु हमारे दो मेहमानों का गाइड बनकर बाहर निकला हुआ है। वे लोग राजस्थान गए हुए हैं-जयपुर और पुष्कर हो आए हैं और इस समय जोधपुर घूम-फिर रहे हैं और आज वहाँ रहकर कल फालोदी, जैसलमेर आदि जाएँगे, जहाँ ऊँट की सवारी करेंगे, एक दिन रेगिस्तान में बिताएँगे और उसके बाद बीकानेर होते हुए दिल्ली लौटेंगे। वह होली मनाने वापस आ जाएगा-जिसकी हम सभी यहाँ जोर-शोर से तैयारियाँ कर रहे हैं!

और फिर हमारी सबसे बड़ी परियोजना तो चल ही रही है: हमारा आयुर्वेदिक रेस्तराँ 'अम्माजी'ज़'! कुछ माह पहले मैंने उसके बारे में आपको बताया था। आम भारतीय परम्परा के अनुसार इसमें भी काफी विलम्ब हो गया। इस विषय में आप ज़्यादा कुछ कर भी नहीं सकते- आर्किटेक्ट शुरू में बनाई गई योजना से अधिक वक़्त लेता है, कोई भी निर्माण कार्य समय पर पूरा नहीं होता और लोग किसी काम को दस दिन में निपटाने का वादा करके अक्सर उसे बीस या तीस दिन में पूरा करते हैं!

लेकिन अब रेस्तराँ के भवन का ईंट-गारे वाला काम पूर्ण हो चुका है और उसे फर्नीचर आदि से सुसज्जित करने का काम, आतंरिक रूप-सज्जा और रेस्तराँ के आसपास की जगह को सँवारने काम किया जाना बाकी है, जिससे वह हमारी पूर्व परिकल्पना के मुताबिक एक सुन्दर और आधुनिक रेस्तराँ दिखाई दे! हमें बहुत सी बातों पर विचार-विमर्श करके निर्णय लेने हैं, बहुत से लोगों को रेस्तराँ के बारे में बताना है, कुछ लोगों से सलाह-मशविरा करना है और उन लोगों व्यापारियों, दूकानदारों से भी चर्चा करनी है, जिनसे हम भविष्य में आवश्यक सामान खरीदेंगे और सबसे बड़ी बात, इन सबको सुगठित रूप से संचालित करने का महती कार्य भी करते चलना है, जिससे हमारे बीच अच्छा तालमेल बन सके! तो यह सब बड़े और चुनौतीपूर्ण काम हैं- मगर इसमें आनंद भी बड़ा है!

हमें रसोई के लिए बहुत सारी चीज़ें खरीदनी हैं और उसके साथ ही बहुत से जर्मन मित्र, जो अगले दो महीनों में यहाँ आएँगे, पूछते रहते हैं कि वे जर्मनी से क्या लेकर आएँ, यहाँ तक कि हम खुद ही कुछ जर्मन मित्रों और परिचितों से कहते हैं कि अपनी रसोई में देखें कि उनके पास रसोई में काम आने वाली कोई चीज़ अतिरिक्त तो नहीं है या उन्हें अब उनकी ज़रूरत नहीं है। जब वे हमें किसी ऐसी चीज़ के बारे में बताते हैं तो हम उन्हें उन मित्रों का पता बता देते हैं, जो भारत आते वक़्त यह सामान अपने साथ ला सकते हैं। हमें लगता है कि यह बड़ा दुखद होगा कि कोई उपयोगी वस्तु, जो सही-सलामत है, ठीक से काम कर रही है, यूँ ही फेंक दी जाए-और इस तरह वे लोग हमारे रेस्तराँ के निर्माण में अपना योगदान देते हैं और हमारी इस परियोजना का हिस्सा बन रहे हैं!

हमें अभी भी विश्वास है कि हम अगले माह रेस्तराँ का शुभारंभ कर देंगे-लेकिन हम भारत में हैं, कुछ भी निश्चित रूप से कहना मुश्किल है!

जब वह मुबारक दिन बहुत करीब आ जाएगा, मैं आप सबको अवश्य सूचित करूँगा!

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