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स्त्रियाँ और पुरुष, दोनों रोज़गार करते हैं मगर घर के कामों की ज़िम्मेदारी सिर्फ स्त्रियों की ही होती है – 10 दिसंबर 2015

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स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि कैसे लैंगिक भूमिकाओं को स्त्रियाँ और पुरुष, दोनों ज़िंदा रखे हुए हैं। जैसे, घर के कामों का सारा बोझ स्त्री उठाती है और पुरुष को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता और वह मदद के लिए सामने नहीं आता!

जी नहीं, घर की सफाई करना सिर्फ स्त्रियों का काम ही नहीं है! 9 दिसंबर 2015

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स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि किस प्रकार परंपरागत लैंगिक भूमिकाएँ आज भी सिर्फ भारत में ही नहीं, पश्चिम में भी समस्याएँ बनी हुई हैं। यहाँ पढिए, कौन से काम पुरुषोचित हैं और कौन से स्त्रियोचित, इस विषय में लोगों की प्रचलित धारणाओं के बारे में!

जनतंत्र का अतिरेक – 20 मई 2014

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स्वामी बालेन्दु बता रहे हैं कि हालाँकि जनतंत्र निस्संदेह सबसे अच्छी राज्य-व्यवस्था है-मगर कभी-कभी इसका अतिरेक भी हो जाता है!

तब तक लड़कियां पैदा करते रहना जब तक एक लड़का नहीं हो जाता – 9 अप्रैल 2014

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स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि अपने स्कूली बच्चों के घरों के दौरों के दौरान उन्हें गलियों में लड़कों और पुरुषों की तुलना में ज़्यादातर लड़कियां और औरतें क्यों दिखाई देती हैं।

जीवन एक संघर्ष है – लेकिन टीवी बहुत ज़रूरी है! 8 अप्रैल 2014

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स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि गरीब घरों में भी टीवी होना कितनी सामान्य बात हो गई है-इसके अलावा वे इस स्थिति के दुष्परिणामों की तरफ ध्यान भी आकृष्ट कर रहे हैं।

महिलाएं प्रेम करती हैं मगर पुरुष सिर्फ कामुक होते हैं! नारीवादी किस तरह लिंगभेद के खिलाफ काम करती हैं-13 फरवरी 2014

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स्वामी बालेंदु नारीवादियों के बीच लोकप्रिय एक जुमले का ज़िक्र करते हुए बता रहे हैं कि कैसे यह जुमला लैंगिक-समानता के कतई पक्ष में नहीं है!

यह आपका जीवन है – ध्यान रहे, समाज आप पर कोई दबाव न बना पाए- 13 अगस्त 2013

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स्वामी बालेंदु उन लोगों के बारे में लिख रहे हैं, जिन्होंने अपने जीवन की एक ऐसी विशेष रूपरेखा (कार्ययोजना) बनाई थी, जो समाज के सामान्य नियमों और परम्पराओं के विपरीत थी।

देशों और संस्कृतियों की तुलना करनी चाहिए मगर यह काम बहुत मुश्किल है – 15 जुलाई 2013

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स्वामी बालेंदु देशों और संस्कृतियों की तुलना करते हुए यह प्रश्न कर रहे हैं कि क्या उन देशों के लोगों की हालत सिर्फ इसलिए दयनीय कही जा सकती है कि वहाँ के लोग आपसे गरीब हैं?

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