भूखे रह सकते हैं मगर झाड़ू-पोछा नहीं करेंगे – भारतीय समाज में व्याप्त झूठी प्रतिष्ठा की धारणा – 16 जुलाई 2015

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

हमारे स्कूल का नया सत्र शुरू हुए अब दो सप्ताह हो गए हैं और धीरे-धीरे अब लगने लगा है कि शिक्षिकाओं और बच्चों ने अपनी दैनिक लय पा ली है। नएपन की वह उत्तेजना अब नहीं रह गई है क्योंकि सभी एक-दूसरे के आदी होते जा रहे हैं और बच्चे स्कूल और आसपास के माहौल से काफी हद तक परिचित हो चुके हैं। बच्चों की आमद के बाद हमने भी आश्रम-कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि की है क्योंकि खाना बनाने और स्कूल और आश्रम की साफ-सफाई के लिए हमें अतिरिक्त कर्मचारियों की आवश्यकता होगी। सफाई-कर्मचारियों की बात निकलते ही हमारा सामना एक व्यर्थ तर्क-वितर्क से हो रहा है, भारतीय समाज में व्याप्त एक बेतुका और हास्यास्पद विचार: बहुत से गरीब लोग भूखे रह लेंगे मगर सफाई (घरेलू नौकरानी) का काम नहीं करेंगे।

इससे अधिक तर्कसंगत बात क्या हो सकती है?: हमें कर्मचारियों की आवश्यकता है, हम जानते हैं की बच्चों के अभिभावक बहुत गरीब हैं और उन्हें रोज़ काम की खोज में भटकना पड़ता है। इसके अलावा, उनके पास कोई विशेष शैक्षणिक योग्यता भी नहीं है कि कहीं ऊँची तनख्वाह वाली नौकरी पा सकें। तो फिर क्यों न हम इन बच्चों के अभिभावकों को अपने यहाँ सफाई-कर्मचारियों के रूप में रख लें, जिससे उनके पास एक ऐसी स्थाई नौकरी हो जाएगी, जिसमें पढ़ाई-लिखाई की ज़रूरत नहीं होती?

कुछ हद तक तो हम यह करते ही हैं। हम कोशिश करते हैं कि अपने यहाँ आश्रम और स्कूल की साफ़-सफाई और खाना बनाने के लिए अपने स्कूल के बच्चों के अभिभावकों को ही काम पर रख लें। दुर्भाग्य से, अक्सर वे लोग रसोई में काम करने को तो तैयार हो जाते हैं मगर झाड़ू को हाथ तक लगाना नहीं चाहते!

रमोना ने बताया कि कैसे वे लोग मई के महीने में नए बच्चों की भर्ती के सिलसिले में घर-घर घूमते थे और परिवारों से मिलकर उनकी आर्थिक स्थिति का जायज़ा लेते थे कि अभिभावक-गण क्या काम करते हैं। ज़्यादातर घरों में सिर्फ पिता ही कोई काम करता था क्योंकि माँ को घर और बच्चों की देखभाल के लिए घर पर ही रहना होता था। लेकिन एक घर में हमें ऐसी कहानी सुनने को मिली, जिसने हमें उनके प्रति सहानुभूति से भर दिया: माँ और दो बच्चे बच्चों के पिता के घर में रहते हैं लेकिन पिता किसी काम का नहीं है। वह धेले भर का काम नहीं करता, ऊपर से शराबी और जुआरी भी है और जब भी कुछ पैसे पाता है, इन्हीं व्यसनों में उड़ा डालता है।

इसलिए माँ को अपने और अपने बच्चों के लालन-पालन और दीगर खर्चों के लिए अपने जेठों और सास की दया पर निर्भर रहना पड़ता है! वह थोड़ा-बहुत कढ़ाई-बुनाई का काम करती है मगर, क्योंकि वह इस काम में बहुत दक्ष नहीं है, अधिक कमा नहीं पाती कि अपनी जीविका चला सके। उसके जेठों ने शिकायती लहजे में कहा, ‘वह बहुत थोड़े से रुपए कमाती है, हम कब तक उसका खर्च उठाते रहेंगे?

रमोना को आश्चर्य हुआ और उसने सीधे-सीधे कह दिया, ‘क्यों? अगर वह कुछ घरों में झाड़ू-पोछा ही कर ले तो आधा दिन, जब बच्चे स्कूल में होते हैं, काम करके अच्छा-ख़ासा पैसा कमा सकती है!’ और यह सही बात है, जो महिलाएँ घरों में चौका-बासन या झाड़ू-पोछा करती हैं, वे यहाँ काफी पैसे कमा लेती हैं! लेकिन, जैसे ही उन्होंने रमोना के मुँह से ये शब्द सुने, उन्हें सांप सूंघ गया! सब चुप, जैसे यह सलाह देकर उसने कोई बुरी, घृणास्पद बात कह दी हो!

शुरू में वे बहाने बनाते रहे और फिर बात बदलते हुए इस प्रश्न से ही किनारा कर लिया कि जैसा चल रहा है, वही ठीक है, कि वह घर के कामों में ही मदद करती रहे, बाहर जाने की उसे कोई ज़रूरत नहीं है!

तो, एक तरफ लोग जीवन-यापन का मामूली घरेलू खर्च चलाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे हैं, काम की खोज में दर-दर भटकते हैं कि बच्चे भूखे न रहें और दूसरी तरफ उन्हें अपने रिश्तेदारों का मोहताज होना मंज़ूर है, बुरे वक़्त की मार झेलना मंज़ूर है लेकिन साफ़-सफाई का काम करना मंज़ूर नहीं, दूसरों के जूठे बरतन साफ़ करना मंज़ूर नहीं!

यह रवैया बहुत बुरा है, नकारात्मक है। झूठा अहं है, प्रतिष्ठा का आत्मघाती पाखंड है और सबसे बड़ी बात, एक साधारण से काम के प्रति सदियों से जड़ जमाए बैठी गलत धारणा है।