स्त्रियाँ और पुरुष, दोनों रोज़गार करते हैं मगर घर के कामों की ज़िम्मेदारी सिर्फ स्त्रियों की ही होती है – 10 दिसंबर 2015

कल मैंने दैनिक जीवन में लिंग आधारित भूमिकाओं के बारे में लिखना शुरू किया था और बताया था कि कैसे वे पश्चिमी समाजों में भी आज भी जारी हैं हालांकि उस शिद्दत से नहीं, जिस शिद्दत के साथ भारत में व्याप्त हैं। कल की चर्चा मैंने पुरुषों द्वारा घरेलू काम, जिन्हें पूरी तरह 'जनाना' काम समझा जाता है, न करने संबंधित दबावों पर केन्द्रित की थी लेकिन महिलाओं को भी आज भी लोगों के लिंग आधारित पुरातनपंथी विचारों से लोहा लेना पड़ता है।

निश्चित ही भारत के अधिकांश परिवार महिलाओं से अपेक्षा करते हैं कि वे घर में ही रहें जबकि पश्चिमी समाजों में कई पीढ़ियाँ गुज़र चुकी हैं, जिनमें माएँ बाहर निकलकर काम करती रही हैं- चाहे आधे दिन करें या पूरा दिन! वहाँ महिलाओं से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि विवाहोपरांत घरेलू स्त्रियाँ बनकर रहें। वहाँ कामकाजी महिलाओं के लिए मूलभूत सुविधाएँ बेहतर हुई हैं।

लेकिन वह दोषरहित नहीं है। महिलाएँ लिंग आधारित भूमिकाओं से बरी नहीं हुई हैं और न ही इस दबाव से कि दैनिक जीवन में उन्हें कैसा व्यवहार करना चाहिए। अभी भी कई मामलों में उन्हें बराबरी का दर्जा हासिल नहीं है: प्रबंधन के रोज़गारों में ऊपरी पायदानों पर पहुँचने के लिए उनके पास कम अवसर उपलब्ध हैं और समान पदों के लिए पुरुष सहकर्मियों की तुलना में उनका वेतन कम होता है! इसके अलावा, लोगों के दिमागों में यह असमानता का भाव अधिक व्यापक रूप से मौजूद है, जिसके कारण खुद महिलाएँ अपनी स्वायत्तता और परिवार या समाज में अपनी भूमिका को लेकर संदेहग्रस्त रहती हैं!

इस बात का प्रमाण आपको पारिवारिक ढाँचे में मिलता है। यह एक सामान्य बात हो सकती है कि माँ भी काम पर जा रही है लेकिन साथ ही आप यह भी देखेंगे कि इसके बावजूद घर के ज़्यादातर दैनिक कार्यों को निपटाने का काम भी वही करती है। अपने उद्यम में काम करते हुए वह कितना भी सख्त हो लेकिन घर में उसे यह उचित ही लगता है कि वह खाना बनाती है या वही बच्चों को स्कूल से लेकर भी आती है। उसका पति उसके बराबर ही काम करके घर लौटता है और सोफे पर पसरकर आराम फरमाता है। अक्सर दोनों ही इस व्यवस्था में कुछ भी गलत नहीं पाते लेकिन फिर अत्यधिक काम और तनाव के कारण अचानक किसी दिन वह क्लांत और शिथिल पड़ जाती है और अंततः तनावग्रस्त होकर अवसाद में चली जाती है। उसने सारे कामों का बोझ अपने ऊपर ले लिया था, एक आधुनिक कामकाजी महिला, एक सुघड़ गृहणी और स्नेहमयी माँ-सब कुछ एक साथ!

मैं बहुत सी महिलाओं से मिला हूँ, जिन्होंने ये सारे के सारे काम अपने सर ले रखे हैं। उन्होंने इस विचार को गले लगाया है कि वे भी आज़ादी की हवा में साँस ले सकती हैं, पुरुषों की बराबरी पर हैं और जितना श्रम पुरुष करते हैं, वे भी कर सकती हैं, जितनी देर तक पुरुष काम करते हैं, वे भी कर सकती हैं-लेकिन साथ ही वे अपने आप से अब भी अपेक्षा करती हैं कि वे घर के वे सारे काम भी करती रहें जो उनकी नानियाँ या दादियाँ अपने वक़्त में करती रही हैं और वह भी उसी सुघड़ता के साथ! वे भूल जाती हैं कि उनकी दादियाँ सिर्फ वही करती थीं, उतना ही करती थीं। यह नहीं कि उसका कोई महत्व नहीं है- लेकिन आप सुपरवूमन नहीं हो सकतीं कि हमेशा पूरी दक्षता के साथ बाहर नौकरी भी करें, घर के कामकाज भी निपटाएँ और बच्चों को भी संभालें!

दुर्भाग्य से पुरुष भी अपने रवैये से इस विश्वास को मज़बूती प्रदान करते हैं: पत्नी सारे काम करती रहे, यह कितना सुविधाजनक है! फिर क्यों परेशान हों, क्यों मदद करें? क्यों उठें और खुद बरतन धोना शुरू कर दें? शर्ट अपनी है मगर उस पर प्रेस खुद क्यों करें जब काम करने के लिए पत्नी मौजूद है?

इसलिए कि आप अपनी पत्नी से प्यार करते हैं और चाहते हैं कि आपकी बेटी भी आगे चलकर एक मज़बूत महिला बने। खुद घर के काम करके बेटों के सामने उदाहरण प्रस्तुत करें कि वे भी घर के कामों में मदद कर सकते हैं। अपनी बेटियों को दिखाएँ कि पुरुष और महिलाएँ मिलजुलकर और एक-दूसरे की मदद करते हुए न सिर्फ बाहर के बल्कि घर के काम भी पूरी निपुणता के साथ निपटा सकते हैं! घर के कामों की ज़िम्मेदारी उठाएँ-आखिर पत्नी भी पैसे कमाकर परिवार की आर्थिक मदद कर ही रही है!

हम अभी भी पुरानी लैंगिक भूमिकाओं से चिपके हुए हैं और इससे बाहर निकलने में और वास्तविक समानता प्राप्त करने की दिशा में अभी लंबा रास्ता तय किया जाना बाकी है। जब तक हम एक के बाद दूसरा कदम आगे रख रहे हैं, एक न एक दिन हम अवश्य अपनी मंज़िल पा लेंगे!

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