अपने बच्चों के साथ सेक्स के बारे में बात करना क्यों ज़रूरी है – 2 अप्रैल 2015

पिछले कुछ दिनों से मैं अपरा के साथ होने वाली अपनी चर्चा के बारे में लिख रहा हूँ, जिसमें मैंने बताया कि कैसे हम प्रेम के अलावा कैसे वह अपनी माँ के पेट में आई कैसे बच्चे प्रेम का नतीजा होते हैं, इन विषयों पर बात करते हैं। जहाँ मैं उसकी प्रतिक्रिया को लेकर प्रसन्न हूँ वहीं मैं देखता हूँ कि आज भी असंख्य लोग हैं जिन्हें मेरा अपनी बेटी के साथ इस तरह बात करना नागवार गुज़रता है-इस बात का अफसोस भी कि बात तो करता ही हूँ और ऊपर से उस चर्चा को दूसरों के साथ साझा भी करता हूँ।

सच कहूँ तो मुझे आशा नहीं थी कि इस ब्लॉग पर मुझे इतनी बड़ी संख्या में सकारात्मक प्रतिक्रियाएँ प्राप्त होंगी। मेरे पश्चिमी मित्रों ने तो उसे पसंद किया ही क्योंकि उनके लिए जीवन की उत्पत्ति के बारे में अपनी बेटी से बात करना कोई अनोखी बात नहीं है। लेकिन बहुत से भारतीयों ने भी मेरे आलेख को पसंद किया और वे समझ पाए कि अपनी बच्चों के साथ ऐसा खुला संबंध कितना सुंदर हो सकता है! मुझे लगता है कि अब इस देश में भी लोग अपने बच्चों को सामान्य नैसर्गिक परिवर्तनों और प्रक्रियाओं की जानकारी देने की आवश्यकता समझने लगे हैं!

हालांकि मुझे बहुत सकारात्मक फीडबैक प्राप्त हुए हैं लेकिन मैं जानता हूँ कि इस देश में बहुत से लोग न सिर्फ मेरा विरोध कर रहे हैं बल्कि सामान्य रूप से ही बच्चों के साथ ऐसी चर्चा करना उचित नहीं समझते जिसमें परोक्ष रूप से भी सेक्स इंगित हो रहा हो। जब अपनी पत्नी से भी यौन चर्चा वर्जित है तो फिर बच्चों से करना तो अकल्पनीय ही कहा जाएगा!

मैं ऐसा करता हूँ-और वह भी बहुत पहले से- क्योंकि मेरी नज़र में यह एक बहुत महत्वपूर्ण मामला है एक ऐसा मामला है जिस पर चर्चा करना हर अभिभावक की ज़िम्मेदारी है! अगर आप इस एक विषय पर बात नहीं करते तो उसे छिपा रहे होते हैं और फिर कुछ न कुछ छूटता चला जाता है! मैं तो यहाँ तक कहूँगा कि अगर आप सेक्स के बारे में अपने बच्चों से चर्चा नहीं करते तो अभिभावक के रूप में अपनी ज़िम्मेदारी से किनारा कर रहे होते हैं।

भारतीय माताओं और पिताओं, मैं जानता हूँ कि अब आपकी कल्पनाओं के पर लग गए होंगे! यौन शिक्षा और ‘सेक्स के बारे में चर्चा’ करने की वकालत करके मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि आप बच्चों को यौन मुद्राएँ सिखाएँ या उनके साथ पॉर्न वीडियो देखें! देखिए, हम जिस समय में रह रहे हैं, वहाँ हर व्यक्ति को यौन संबंधों के शारीरिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं को जानना-समझना चाहिए और इन्हीं बातों के प्रति आपके बच्चे जिज्ञासु होते हैं! वे नहीं जानते कि जब वे उत्तेजित होते हैं तो उनके शरीर में क्या चल रहा होता है और वे परेशान होते रहते हैं कि उनके शरीर में कुछ न कुछ गलत हो रहा है! और परेशान होकर वे सोचते हैं, उनमें ऐसी भावनाएँ क्यों पैदा हो रही हैं? जब उनके शरीर से कुछ द्रव विसर्जित होते हैं तो क्या यह कोई बीमारी है, कोई शारीरिक विकृति है? और विपरीत लिंगी व्यक्ति के प्रति वे आकर्षण क्यों महसूस करते हैं? क्या सही है और क्या गलत है?

आपके बच्चे इन्हीं रहस्यमय बातों की जानकारी प्राप्त करने की तलाश में होते हैं और आप उनके विकासशील दिमाग को उनकी इस जिज्ञासा के साथ अकेला छोड़ देते हैं! उनके सामने ऐसे प्रश्न उपस्थित होना स्वाभाविक है और अगर आप इसके जवाब प्रस्तुत नहीं करते तो वे और कहीं जाकर उनके जवाब तलाश करेंगे। अगर आप जवाब देते हैं तो आपको पता होता हैं कि वे कितना जानते हैं-अगर आप जवाब देने से किनारा करते हैं तो यह भी हो सकता है कि उन्हें पूरी तरह गलत जानकारी प्राप्त हो! सेक्स के बारे में बात न करके ऐन मुमकिन है, आप उन्हें झूठे और विकृत विचारों की ओर ढकेल रहे हों, हो सकता है वे अपने शरीर को लेकर परेशान हो जाएँ और अंततः मानसिक रूप से आहत हों, अंजाने में अपने शरीर के साथ खिलवाड़ कर बैठें, उसे क्षतिग्रस्त कर बैठें!

संभव है इन विषयों पर मेरे और आपके विचार भिन्न हों कि सेक्स कब किया जा सकता है, किसके साथ किया जा सकता है, यौन संबंध बनाते समय किस तरह की सावधानियाँ रखनी चाहिए, कौन सा गर्भ निरोधक इस्तेमाल करना चाहिए आदि आदि, लेकिन विवाह पूर्व यौन संबंध को दो टूक शब्दों में वर्ज्य कह कर आप अपनी ज़िम्मेदारी की इतिश्री नहीं मान सकते बल्कि आपको इस पर विस्तार से बात करनी चाहिए-आपको अपनी बात का अर्थ स्पष्ट करना चाहिए, इतना भर कह देने पर बात पूरी नहीं होती कि विवाह के बाद तो सेक्स ठीक है मगर विवाह से पहले पाप है! जैसा कि मैंने कहा, विवाह पूर्व यौन सम्बन्धों पर मेरे विचार क्या हैं, यह अलग बात है लेकिन आपको अपने बच्चों के साथ सेक्स पर बात अवश्य करनी चाहिए!

इस विषय पर बात न करके आप उन्हें एक झूठी और रहस्यमय दुनिया में अकेला छोड़ देते हैं और सोचते हैं कि विवाह के बाद उन्हें यह जानकारी खुद-ब-खुद हो जाएगी। मैं कहना चाहता हूँ कि आपके बच्चे बड़ी तेज़ी से यथार्थ की पथरीली ज़मीन पर औंधे गिरेंगे! उनके साथ बॉलीवुड या आपसे छिपाकर पढ़ी जाने वाली सस्ती पत्रिकाओं से सीखी हुई बातों जैसा कुछ भी नहीं होने वाला है।

और इसका गुनहगार कौन होगा?

मेरा जवाब है: आप! और इसीलिए मैं अपनी बेटी को दुनिया के हर विषय पर, उसकी उम्र के अनुसार जितना बता सकता हूँ, सब कुछ बताऊँगा-जी हाँ, सेक्स के बारे में भी!

बच्चों से सेक्स के बारे में बातें कब और कैसे करनी चाहिए? 23 जून 2014

मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ कि ग्रान कनारिया में "सेक्स और स्वतंत्रता" पर मैंने एक व्याख्यान दिया था। इस व्याख्यान के दौरान एक महिला ने मुझसे पूछा कि मेरे विचार में बच्चों को सेक्स विषयक जानकारी कब और कैसे दी जानी चाहिए। बच्चे की किस उम्र में उसके साथ इस विषय पर बात की जा सकती है और बातचीत का स्वरुप क्या होना चाहिए? मुझे लगता है बाल-बच्चों वाले बहुत से अभिभावकों के सामने यह प्रश्न उपस्थित होता होगा, खासकर इसलिए कि सदियों से सेक्स सम्बन्धी चर्चा के साथ तरह-तरह की वर्जनाएँ जुड़ी हुई हैं। इसीलिए मैं समझता हूँ, इस पर तुरंत विचार करना आवश्यक हो गया है।

और अंत में इस विषय पर मेरा जवाब बहुत साधारण सा था: इसे स्वाभाविक रहने दें! जब भी सेक्स की बात चलती है तो सभी इतने सकुचा जाते हैं कि बच्चे तुरंत जान जाते हैं कि उसके साथ कोई न कोई अनुचित बात जुड़ी हुई है! लेकिन उसमें कुछ भी अनुचित नहीं है! अगर आप बच्चे को बताना चाहते हैं कि सेक्स एक साधारण सी नैसर्गिक चीज़ है-जोकि वह है ही-तो इस बात को आप बहुत सहज-स्वाभाविक तरीके से कहें!

अपने जननांगों और विपरीत लिंगी जननांगों के प्रति उत्तेजक भावनाएँ, यौनिकता और उसके प्रति संवेदनशीलता हर व्यक्ति में स्वाभाविक रूप से मौजूद होती हैं। स्वाभाविक ही ये भावनाएँ समय के साथ विकसित होती हैं और आप चार साल के बच्चे से वही बातें नहीं कर सकते जो आप किसी पंद्रह साल के किशोर के साथ करते हैं। आप किसी दूध पीते बच्चे को कंडोम और सम्भोग के बारे में नहीं बताएँगे-लेकिन एक थोड़ी बड़ी बच्ची के सामने यह प्रश्न उपस्थित हो ही सकता है कि लड़कों और पुरुषों के पास लिंग क्यों होता है। स्वाभाविक ही छोटे बच्चे भी यह देखते हैं कि उनके पिता उनकी माँओं से अलग दिखाई देते हैं। इसलिए "उसकी तरफ मत देखो" या उससे बढ़कर, "वह गन्दी चीज़ है, उधर मत देखा करो", यह कहने की जगह आप उन्हें बता सकते हैं कि कि पुरुषों की शारीरिक बनावट ऐसी ही होती है और महिलाएँ उनसे अलग दिखती हैं। बस-इतना कह देने से, उचित ही, आप जननांगों को वर्जना के दायरे से बाहर कर देते हैं!

जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है तरह-तरह के एहसासात और उनके साथ तरह-तरह के प्रश्न जन्म लेते हैं। जब भी वे ऐसे प्रश्न लेकर आपके सामने आएँ, उनसे बात कीजिए लेकिन ध्यान रखिए कि जवाब देते हुए सहज-स्वाभाविक और उन्मुक्त बने रहिए। किसी भी हालत में बच्चे से यह मत कहिए कि अपने और दूसरों के लिंग के बारे में या प्रेम, आकर्षण या सेक्स के बारे में प्रश्न पूछना अनुचित है! यह स्वाभाविक ही है कि समय के साथ सेक्स के प्रति उत्सुकता में वृद्धि होती जाए और आपको इसे एक अवसर की तरह देखना चाहिए जब आप अपने बच्चे को सेक्स के प्रति सामान्य और स्वाभाविक रवैया रखने के लिए प्रेरित कर सकते हैं!

अब पुनः ब्रह्मचर्य पर लौटते हैं-जब आप बच्चों में मौजूद यौनिकता को रोज़ देखते हैं तो कैसे कह सकते हैं कि उसका दमन उचित है? वह उनमें जन्मजात मौजूद है, किसी को बताने की ज़रुरत नहीं है-अर्थात यह एक नैसर्गिक तथ्य है और उसके साथ आपका व्यवहार उसके अनुरूप होना चाहिए! उसका दमन मनुष्य की नैसर्गिक प्रवृत्तियों के विरुद्ध है लेकिन अगर आप अपने कम उम्र के बच्चों से यह कहते हैं कि सेक्स एक बुरी चीज़ है तो आप उनके साथ यही कर रहे होते हैं। उनमें पैदा होने वाली मानसिक समस्याओं, आपसी रिश्तों से सम्बंधित परेशानियों और भविष्य में प्रेम और सेक्स सम्बन्धी दिक्कतों की जड़ यही है!

इसलिए आपसे हाथ जोड़कर विनती है कि बच्चे के साथ सेक्स सम्बन्धी बातचीत करते समय अपना व्यवहार सहज-स्वाभाविक रखें!