अपने दिमाग के दरवाजे दूसरों के लिए खुले छोड़ देने के खतरे – 18 मार्च 2015

यथार्थ से कोसों दूर, काल्पनिक दुनिया के निर्माण के चलते पेश आने वाले मानसिक और शारीरिक खतरों के विषय में कल मैंने लिखा था। इसके एक और खतरे की चर्चा मैंने अब तक नहीं की थी, जिसके बारे में कुछ और विस्तार से लिखने की आवश्यकता है: किसी को जब आप अपनी कल्पनाओं, आस्थाओं और इस तरह प्रकारांतर से आपकी दुनिया को भी प्रभावित करने की छूट दे देते हैं-और फिर वह उसका अनुचित लाभ उठाने लगता है!

अगर आपने परसों की यानी दिनांक 16 मार्च की मेरी टिप्पणी को ध्यान से पढ़ा होगा, जिसमें मैंने बताया था कि कैसे आप अपनी काल्पनिक निजी दुनिया निर्मित कर लेते हैं, तो आप समझ सकेंगे कि इससे मेरा क्या अभिप्राय है। साधारणतया हम अपने विचारों और कल्पनाओं के अनुसार व्यवहार करते हैं और जब हम कुछ आस्थाओं पर विश्वास करने का मन बना लेते हैं तो वे आपका यथार्थ बन जाती हैं। अब इस बात की कल्पना कीजिए कि कोई आपके विचारों को अपने पक्ष में प्रभावित कर रहा है! वह आपके उस यथार्थ को, आपकी उस दुनिया को भी प्रभावित और परिवर्तित कर रहा होगा जिसे आप अपने लिए निर्मित कर रहे हैं!

इस तरह आपको प्रभावित करने वाले बहुत से अलग-अलग व्यक्ति हो सकते हैं। इसकी शुरुआत अभिभावकों के साथ होती है और इसी कारण उनकी ज़िम्मेदारी भी बहुत बढ़ जाती है: सबसे कोमल और आसानी से प्रभावित हो सकने वाले दिमागों तक उनकी पहुँच होती है और उन्हें गढ़ने और जीवन के लिए तैयार करने की ज़िम्मेदारी उन पर आयद होती है। वे एक संसार का निर्माण करते हैं। आपका परिवार, फिर शिक्षक, दोस्त और उसके बाद बहुत से दूसरे लोग, जिन पर आप भरोसा करते हैं या जिन्हें आप विशेषज्ञ या अधिकारी समझते हैं, जिनके विचारों को आप पसंद करते हैं। इनमें विभिन्न धार्मिक, आध्यात्मिक और यहाँ तक कि राजनैतिक नेता भी शामिल होते हैं।

एक जिम्मेदार व्यक्ति उन लोगों का खयाल रखता है, जिन्हें वह प्रभावित कर सकता है। स्वाभाविक ही, इस शक्ति का दुरुपयोग भी किया जा सकता है-और शायद आप उन हजारों प्रकरणों के बारे में जानते होंगे जहाँ गुरुओं, धार्मिक नेताओं और विभिन्न संप्रदायों के मुखियाओं ने ठीक यही किया: वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल लोगों की भलाई के लिए नहीं बल्कि उन्हें अपनी आज्ञा का शब्दशः पालन करने, उन्हें अपने कहे अनुसार करने हेतु बाध्य करने में किया। उन पर प्रभुत्व स्थापित करके और छल-प्रपंच से इस तरह उनका इस्तेमाल किया कि सिवा उस नेता के किसी और का उससे कोई लाभ नहीं हो सकता था। उनका जबर्दस्ती मत परिवर्तन किया गया, उन्हें असंगत विचारों और कल्पनाओं की घुट्टी पिलाई गई, उनके साथ छल करके उन्हें एक दूसरी दुनिया में ले जाकर स्थापित कर दिया गया जो किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा निर्मित, नियंत्रित और संचालित थी।

नतीजा: जितनी बड़ी संख्या में लोग उनके प्रभाव में आते जाते हैं, उतना ही ये गुरु, संप्रदाय और संगठन अमीर होते जाते हैं। ये अनुयायी, अंधी भेड़ों की तरह उसी दुनिया में रहने लगते हैं, उनके आदेशों का पालन करते हैं और यहाँ तक कि खुद अपने सालों के संबंधों को तोड़ लेते हैं, मित्रता छोड़ देते हैं, यहाँ तक कि परिवार का परित्याग कर देते हैं। बहुत से लोग सालों उन धूर्तों के जाल में फँसे रहते हैं। कभी-कभी जीवन भर के लिए।

कुछ लोगों को एक सीमा के बाद अचानक शक होने लगता है। जैसे-जैसे शक बढ़ता जाता है, वे खुद अपने दिमाग से सोचने की ओर अग्रसर होते हैं। यह उन्हें बहुत कठिन और खतरनाक लगता है, एक तरह से वे एक लंबे अर्से बाद खुद अपने पैरों पर खड़े हो रहे होते हैं, धीरे-धीरे खुद चलना सीख रहे होते हैं! निश्चित ही यह परिवर्तन उनकी उस दुनिया को तहस-नहस कर देता है, जिसे उन्होंने खुद गढ़ा होता है और इतने सालों में जिसके वे आदी हो चुके होते हैं। जिस गुरु का वे इतना सम्मान करते थे, जिससे इतना प्यार करते थे, वह अचानक उनका दुश्मन हो जाता है और उसके साथ उनके वे सारे मित्र भी, जो उस गुरु के कारण इतने सालों से उनके मित्र बने हुए थे।

तो, अगर कोई व्यक्ति आपकी रचना-प्रक्रिया को समझ ले या उसमें प्रवेश पा ले तो वह आपके मस्तिष्क को नियंत्रित भी कर सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब आप उसे प्रवेश करने दें! इसलिए अगर किसी को अपने इतना नजदीक आने दे रहे हैं तो बहुत सतर्क रहें-और जब आपको लगे कि वह आपके द्वारा प्रदत्त इस सुविधा का गलत लाभ उठा रहा है या उसका इस्तेमाल ज़िम्मेदारी के साथ नहीं कर रहा है तो उसका प्रवेश वर्जित कर दें!

सतर्क रहें और अपना ध्यान रखें!

परमात्मा? हाँ, धर्म? ना – आध्यात्मिकता का आधुनिक विचार – 12 फरवरी 13

कल मैंने लिखा था कि कुछ लोग 'धार्मिक होते हुए अंधविश्वासी ना होने' का दावा करते हैं। मैंने आपसे कहा था कि यह मात्र धर्म को और वास्तव में पूरी धारणा को छोड़ने के मार्ग पर एक कदम की तरह प्रतीत होता है। दूसरी बहुत ही सामान्य अवस्था है, जिसमें लोग कहते हैं कि 'मैं परमात्मा में तो विश्वास करता हूं, लेकिन किसी धर्म में नहीं'। इस धारणा या मानसिकता पर मैँ अपने विचार बताता हूं।

सबसे पहले हम इस बात पर नजर डालते हैं कि 'परमात्मा' का विचार वास्तव में कहां से आया है। मैं ऐसा नहीं सोचता कि मनुष्य के स्वाभाविक विकास की शुरुआत में हमारे पूर्वज परमात्मा के बारे में सोच रहे थे। वास्तव में वे तो इस पर विचार कर रहे थे कि शिकार कैसे करें, क्या खाएं, और एक क्षण उन्होंने औजार बनाना सीख लिया और आग की खोज की। इस विकास में कुछ समय के बाद, वे बहुत कुछ जानते थे पर कुछ बातों को व्याख्यायित नहीं कर पाते थे। उन्होंने इन बातों को, प्राणियों को, प्रकृति को या परमात्मा को अलौकिक शक्ति का उत्तरदायी ठहराया। चूंकि विकास की गति पूरी दुनिया में एकसमान हो रही थी इसलिए परमात्मा के बहुत से नाम हैं।

धर्म की स्थापना तब हुर्इ जब लोगों ने उस रूप के हर ओर नियम बनाने शुरू किए, जिस शक्ति को परमात्मा कहा जाता है । उन्होंने लोगों द्वारा एक-दूसरे को बतार्इ गर्इ बातों पर कहानियां लिखी। साथ ही जो लोग दूसरों को डराने या धोखा देने के लिए अतिरिक्त शक्ति का अंश या भाग चाहते थे उन पर भी कहानियां लिखी। उन्होंने अपने परमात्मा को परिभाषित किया और दुनिया की जनसंख्या विभिन्न समूहों में बंट गर्इ।

बहुत से लोग स्वयं कर्इ वर्षों तक धार्मिक रहने के बाद, धर्म की वजह से जो भी गलत हुआ आमतौर पर उन बातों को समझते हैं। उन्हें गलती का एहसास होता है, वे अनैतिकपक्ष देखते हैं और वे समझने लगते हैं कि धर्म ने कैसे लोगों के बीच भय, क्रोध, पीड़ा, युद्ध और घृणा पैदा कर दी है।वे धर्म और संगठित धर्म कहे जाने को इसलिए छोड़ देते हैं।वे मन्दिर, चर्च, मस्जिद या परमात्मा के अन्य घरों में नहीं जाते, प्रचारकों और पुजारियों से दूर रहते हैं और घर में रखे धर्मग्रंथों को भी स्वयं से दूर कर देते हैं।

हालांकि वे सबकुछ त्यागना नहीं चाहते। उन्हें किसी पर निर्भर रहने की आवश्यकता होती है जो उन्हें कह सके कि जिस पर तुमने इतने लंबे समय से विश्वास रखा वो पूर्णतया गलत नहीं था। वे परमात्मा पर विश्वास रखने का निर्णय लेते हैं। उनके लिए परमात्मा उनके जीवन का आश्रय होता है, भले ही उनका परमात्मा धर्म द्वारा वर्णित परमात्मा से बहुत भिन्न लगता हो।

र्इमानदारी से कहूं तो मुझे इस अवधारणा से कोर्इ समस्या नहीं है। मैं समझ सकता हूं कि आप अपने जीवन में अलौकिक शक्ति की ईच्छा रखते हैं। आप चाहते हैं कि जब आपअपनी जिम्मेदारियों के बारे में सोचें, भविष्य की चिंता करें या आपको मृत्यु का भय हो तो वो शक्ति आपको शान्ति दे। वो परमात्मा दिव्य शक्ति का रूप या मात्र प्रकृति भी हो सकता है। ये कोई अन्य व्यक्ति जैसे- गुरु, संगी या बच्चा भी हो सकता है।यह मन की आवाज या अनुभूति भी हो सकती है जिसका आप पालन करना चाहते हैं। मैं इस पर विश्वास नहीं करता, लेकिन जब तक आप स्वयं में परमात्मा का विश्वास रखेंगे, दूसरों पर ये थोपना नहीं चाहेंगे और स्वयं व दूसरों को हानि नहीं पहुंचाएंगे मैं इसे पूरी तरह से स्वीकार करूंगा और इसके खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहूंगा।

हालांकि आपको या दूसरों को हानि पहुंचाने वाली किसी भी बात का मैं विरोध करूंगा। ना तो किसी को धोखा दीजिए ना ही किसी के धोखे में आइए।अपने स्वभाव और ईच्छा के विरुद्ध मत जाइए।जो ऐसा ढ़ोग करते हों कि केवल वे ही परमात्मा की सेवा कर रहे हैं अन्य धर्म नहीं उनके प्रलोभन में आकर दूसरे धार्मिक संप्रदाय में मत जाइए।

कई संप्रदाय हैं जिन्हें धर्म से अलग एक आम प्रवृति का एहसास हो गया है। ये है विमुखता, जो संगठित धर्म के विरुद्ध उत्पन्न हुई है। वे धर्म को छुपाकर प्रतिक्रिया करते हैं।एक प्रयोग कीजिए, हिन्दुत्व और धर्म के बारे में इस्कॅान भक्त या पुजारी के समक्ष कुछ प्रश्न उठाइए! वे आपसे कहेंगे कि वे धर्म के लिए नहीं परमात्मा के लिए सबकुछ करते हैं।वे दावा करते हैं कि उनका धर्म से लेना-देना नहीं है और वे तो मात्र कृष्ण के भक्त हैं। लेकिन कृष्ण कौन हैं? कृष्ण हिन्दू भगवान हैं ! धर्म के बिना, हिन्दुत्व के बिना कोई कृष्ण नहीं होंगे!

इसलिए ऐसे आडंबरयुक्त और मत परिवर्तन के प्रयासों का शिकार मत बनिए जो आपको अन्य धर्म संप्रदाय से जोड़ना चाहते हों। अगर आप किसी में विश्वास रखना चाहते हैं, अच्छा है, उसे बनाए रखिए।अपने लिए उस पर भरोसा रखिए और इसे व्यक्तिगत रूप से आपकी सहायता करने दीजिए लेकिन अपना ख्याल रखिए और इसे दूसरो पर मत थोपिेए।

हिन्दू धर्म की एक मूलभूत अवधारणा को नज़रअंदाज़ किए बिना आप हिन्दू धर्म में शामिल नहीं हो सकते- 5 जुलाई 2012

कल मैंने वृन्दावन के मंदिरों के बारे में लिखा था और इस्कॉन मंदिर का ज़िक्र करते हुए कहा था कि वहाँ बहुत से विदेशी जाते हैं, पूजा-अर्चना और दूसरे कर्मकांड करते हैं और उस मंदिर को आराधना का एक पवित्र स्थान समझते हैं। इस तरह, जहां अधिकांश भारतीयों के लिए वह मंदिर महज एक पर्यटन स्थल है, विदेशी उसके बारे में बिल्कुल अलग सोचते हैं। लेकिन आज मैं इस दिलचस्प विरोधाभास पर कुछ भी कहने नहीं जा रहा हूँ बल्कि यह बताने जा रहा हूँ कि ऐसे गैर-हिंदुओं के साथ हिन्दू धर्म किस तरह से पेश आता है, जो हिन्दू धर्म में आस्था रखते हैं और हिन्दू मंदिरों में जाते हैं।

साफ शब्दों में कहा जाए तो किसी दूसरे धर्म से हिन्दू धर्म में धर्मांतरण संभव ही नहीं है। ऐसा कोई धर्मग्रंथ नहीं है, जो किसी अन्य धर्म को छोड़कर हिन्दू धर्म अपनाने की कोई विधि, कोई प्रक्रिया या कोई कर्मकांड निर्धारित करता है। दूसरे धर्मो की तरह हिन्दू धर्म में किसी बप्तिस्मे की व्यवस्था नहीं है और न ही कुछ धार्मिक सूक्तों, श्लोकों या स्तोत्रों को याद कर लेना हिन्दू होने का प्रमाण माना जाता है। कुछ भी कर लें आप हिन्दू धर्म में धर्म-परिवर्तन कर ही नहीं सकते। इसके विपरीत ऐसी ऋचाएँ और सूक्तियाँ मिल जाएंगी जो यह कहती हैं: "वही व्यक्ति हिन्दू है, जिसने हिन्दू के रूप में जन्म लिया है।"

दूसरे धर्मों के जो लोग यह कहते हैं कि वे हिन्दू धर्म में शामिल हो गए हैं वे हिन्दू धर्मग्रंथों के इन हिस्सों को ठीक तरह से नहीं समझते या हिन्दू धर्म में शामिल होने के व्यामोह और जल्दबाजी में इस बात को नज़रंदाज़ करते हैं। मुझे लगता है कि नए धर्म में प्रवेश का यह तरीका संदेहास्पद है! अगर आप किसी धर्म में विश्वास करना चाहते हैं तो आपको उसे ठीक तरह से समझना होगा और सबसे पहले यह देखना होगा कि क्या आप उसके सदस्य बन भी सकते हैं या नहीं! अगर वह धर्म यह कहता है कि नहीं बन सकते तो आपको उसका अनुसरण करने की आवश्यकता ही क्या है?

तो इस लिहाज से शुरू से ही धर्म परिवर्तन का यह पूरा मामला मज़ाक बन कर रह जाता है! वृन्दावन आने वाले बहुत से विदेशी इस्कॉन के विदेशी भक्तों को धार्मिक हिंदुओं की तरह वस्त्र पहने और चन्दन और चोटियाँ धारण किए देखते हैं तो हैरान रह जाते हैं। यह वाकई हैरानी की ही बात है!

यह और भी हास्यास्पद हो जाता है, जब वे पाते हैं कि धार्मिक नियमों का पालन करने में ये इस्कॉन के भक्त बहुत सख्त हैं-या संकीर्ण हैं, जो भी आप कहना चाहें! इसके कई उदाहरण मौजूद हैं। आपको माथे पर रोज़ धार्मिक ‘मेकअप’ करना होता है। एक तय संख्या में धार्मिक मंत्रों का जाप करना आवश्यक है-भले ही आप यह काम बाज़ार में सौदा खरीदते हुए करें। पुरुषों को सिर मुंड़ाकर सिर के पीछे चोटी रखनी पड़ती है। पुरुष भक्तों को प्रभुजी और महिला भक्तों को माताजी पुकारना होता है, भले ही आपके साथ उसका कोई दूसरा रिश्ता ही क्यों न हो या उम्र में वह आपसे छोटी ही क्यों न हो। आपको अपना नाम भी बदलना पड़ता है-भले ही आपकी भाषा से बहुत अलग होने के कारण संस्कृत के उस शब्द का उच्चारण भी आप ठीक से न कर पाते हों। इन सब बातों के कारण हालत यह हो जाती है कि सामान्य हिंदुओं को उनके काम बड़े हास्यास्पद नज़र आते हैं।

तब बड़ी हंसी आती है जब ये लोग, जो धर्म परिवर्तन करके हिन्दू धर्म अपनाने के भुलावे में रहते हैं और इस संप्रदाय के सदस्य बन जाते हैं, हिन्दू दिखाई देने के उत्साह में धार्मिक कार्यों में इतने अधिक लिप्त हो जाते हैं कि सामान्य, आधुनिक हिंदुओं को भी मात करते हैं। विडम्बना यह है कि वे कितनी भी कोशिश कर लें, वास्तविकता यही है कि वे किसी भी हालत में हिन्दू नहीं माने जाएंगे क्योंकि धर्म परिवर्तन करके हिन्दू बनना संभव ही नहीं है।

इस बात से हम यह सीखते हैं कि आप किसी भी धर्म या किसी दूसरे व्यक्ति के धर्म की कुछ बातों का दूर से मज़ा ले सकते हैं, कि आप उन विश्वासों को अपने जीवन में उतार सकते हैं लेकिन इसके लिए आपको औपचारिक रूप से ‘धर्म-परिवर्तन’ करने की आवश्यकता नहीं है। आपको किसी व्यक्ति या उसके धार्मिक व्यवहार की नकल करने की जरूरत नहीं है। किसी की प्रतिलिपि मत बनिए! दूर से उसे सराहिए, उसकी अच्छी बातों की कदर कीजिए मगर स्वयं मौलिक बने रहिए, जैसे हैं, वही। जो आप हैं, उससे अलग कोई दूसरा बनना आपको मनोवैज्ञानिक रूप से बुरी तरह प्रभावित करता है। अगर आप इस आत्म-संदेह की मनोदशा में लम्बे समय तक रहे तो यह आपके मस्तिष्क, भावनाओं और व्यक्तिगत जीवन को नुकसान पहुंचा सकता है। मैंने अपनी यात्राओं में और व्यक्तिगत सत्रों के दौरान बहुत से ऐसे प्रकरण देखे हैं। आपको अपना धर्म छोड़कर किसी और धर्म में शामिल होने की ज़रूरत नहीं है-खासकर उसमें तो बिल्कुल नहीं, जो आपको अपने में शामिल करने से ही इंकार करता है!