स्कूलों में बच्चों को ईश्वर और धर्म से क्यों प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए – 25 अगस्त 2015

यदि आपने कल का ब्लॉग पढ़ा है तो आपको पता चल गया होगा कि किस तरह हम बच्चों को समानता का पाठ पढ़ाते हैं और आजकल उनसे मिलकर विभिन्न विषयों पर चर्चा भी कर रहे हैं। स्वाभाविक ही कई विषयों में एक विषय नास्तिकता का भी होता है, या कहें कि हम उनके सामने प्रदर्शित करते हैं कि कैसे धर्म कई प्रकार से गलत बात करता है, यहाँ तक कि कई प्रकार से हमें हानि पहुँचाता है। इससे उन्हें एक नए नजरिए से परिचित होने का मौका मिलता है और जहाँ बहुत से स्कूल कई तरह से बच्चों को धार्मिक और पारंपरिक शिक्षा प्रदान करते हैं, मेरा मानना है कि धर्म का स्कूलों में कतई कोई स्थान नहीं होना चाहिए। दुर्भाग्य से बहुत से शिक्षकों का नजरिया इससे बिल्कुल विपरीत होता है और बहुत सी पाठ्य पुस्तकें भी धार्मिक शिक्षा का समर्थन करती प्रतीत होती हैं!

पिछले साल हमने नोटिस किया कि हमारे स्कूल की कई पाठ्य पुस्तकों में कई बार ईश्वर का ज़िक्र आता है। विशेष रूप से 'नैतिक शिक्षा' या मॉरल साइंस नामक विषय की पुस्तकों में तो सब कुछ यही है कि क्या ईश्वर स्वीकार करेगा और क्या नहीं तथा क्या वह चाहता है कि आप करें या न करें। यही कारण रहा कि इस साल हमने अपना प्रकाशक ही बदल दिया है!

अब हमने उन्हीं पुस्तकों को रखा है जिनमें ईश्वर का ज़िक्र कम से कम आता है- और हमने अपने शिक्षकों से भी कह रखा है कि वे उन पाठों को को छोड़ दें। उदाहरण के लिए ‘हिन्दी’ विषय में एक और ‘अंग्रेज़ी’ में भी एक प्रार्थना है। आम तौर पर इन प्रार्थनाओं को विद्यार्थियों को कंठस्थ करने के लिए कहा जाता है और परीक्षाओं में उन्हें मौखिक सुनाने के लिए कहा जाता है। इसी तरह एक पाठ का एक पैरा पूरी तरह हटा दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि हमारे दिन का एक हिस्सा सिर्फ प्रार्थनाओं और पूजा-अर्चना में खर्च किया जाना चाहिए और यह भी कि अच्छे बच्चे रोज़ ईश्वर की प्रार्थना करते हैं।

मैं नहीं जानता कि ऐसी पुस्तकें भारत में उपलब्ध हैं या नहीं, जिनमें इन बातों का ज़िक्र नहीं होता। अगर मुझे शिक्षकों से पाठ्य पुस्तकों के कुछ भागों को न पढ़ाने के लिए न कहना पड़े तो मुझे अच्छा लगेगा! बल्कि अगर उनमें धार्मिक गुरुओं और बाबाओं और उनकी कारगुजारियों के विषय में आलोचनात्मक लेख या पाठ हो तो मुझे और खुशी होगी! यदि मेरा कोई नास्तिक मित्र प्राथमिक कक्षाओं के लिए उपयुक्त ऐसी पाठ्य पुस्तकों के बारे में जानता हो तो मुझे भी उनके बारे में जानकर प्रसन्नता होगी!

अपने बच्चों को मैं वे संभावनाएँ उपलब्ध कराना चाहता हूँ जो उन्हें अन्यथा तथा अन्यत्र उपलब्ध नहीं होतीं: पढ़ते-लिखते हुए और सीखते हुए किसी विषय का आलोचनात्मक दृष्टि से अध्ययन करना, प्रश्न पूछना, दिमाग खुला रखना और चीजों को बिना किसी धार्मिक पूर्वाग्रहों के जानने-समझने की कोशिश करना। दरअसल इन बच्चों के मस्तिष्क को आस्था और परंपरा के बादलों ने आच्छादित कर रखा है और मेरा विश्वास है कि एक न एक दिन ये काले बादल अवश्य छँटेंगे और वे अपने चारों ओर देख सकेंगे और अलग तरह से सोच-विचार कर सकेंगे।

तब वे यह समझ पाने में समर्थ हो सकेंगे कि ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है और आप बिना उसकी दैनिक पूजा-अर्चना किए भी एक अच्छे इंसान हो सकते हैं। वे इस बात को समझेंगे कि नैतिक व्यवहार सिर्फ धार्मिक लोगों की बपौती नहीं है! एक दिन ये बच्चे यह देखने में सक्षम होंगे कि अपनी प्रगति के लिए वे ईश्वर की मर्ज़ी पर निर्भर नहीं हैं।

मैं पहले ही आपको बता चुका हूँ कि हमारे रेस्तराँ की शुरुआत और उसके हमारे स्कूल को आर्थिक सहारा देने लायक हो जाने के बाद हम स्कूलों से जुड़े हुए और भी कई रेस्तराँ खोलने की योजना बना रहे हैं। ये स्कूल पूरी तरह मुफ्त होंगे- और वे भी इसी स्कूल की तरह बच्चों में शुरू से ही तर्कवाद को प्रोत्साहित करने का लक्ष्य सामने रखकर ही खोले जाएंगे।

इस स्वप्न को यथार्थ में परिणत करने के लिए हमें कई तर्कवादी शिक्षकों की भी आवश्यकता होगी। अन्यथा बच्चों को विज्ञान और तर्कशास्त्र समझाना कठिन होगा और यह बताना भी मुश्किल होगा कि धर्म और आस्था में तर्क और विज्ञान का अभाव होता है। क्योंकि धार्मिक शिक्षक स्वयं भी उन्हीं बातों में आस्था रखने वाले होंगे!

फिलहाल हमारे संसाधन सीमित हैं और चाहते हुए भी मैं एक साथ इतने सारे कदम नहीं उठा सकता, लेकिन समय के साथ भविष्य में मुझे पूरा विश्वास है कि बच्चों को यह शिक्षा देने की दिशा में कि वे ईश्वर, धर्म और परम्पराओं के पीछे न भागें, मैं बहुत दूर तक की यात्रा करने के लिए सन्नद्ध हूँ।

माफ कीजिए, मैं नास्तिक गुरु नहीं हो सकता – 6 अगस्त 2015

आप पहले ही पढ़ चुके हैं कि नास्तिकों के लिए कोई संगठन स्थापित करने की मेरी कतई कोई इच्छा नहीं है और न ही कोई इरादा है। कल मैंने बताया कि उसके एक धर्म में तब्दील हो जाने का बहुत बड़ा खतरा है और यह भी कि नास्तिकता को परिभाषित करने के परंपरावादी तरीके से हमें दूर रहना चाहिए। आज मैं आपको इसका एक और कारण बताता हूँ: ऐसे किसी संगठन के लिए आवश्यक ढाँचा मुझे नापसंद है!

आप जानते ही हैं कि आश्रम में इतने सारे नास्तिकों से मिलकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई थी और मैंने उनके सान्निध्य का बहुत आनंद उठाया। भविष्य में भी मैं नास्तिकों को अपने आश्रम में आमंत्रित करना चाहूँगा, जिससे वे एक-दूसरे के साथ मिल-बैठकर चर्चा कर सकें, नज़दीक आ सकें और ऐसी सभाओं के लिए कोई नियत स्थान भी उपलब्ध हो सके। चाहे ऑनलाइन हो चाहे रूबरू, मुझे उनके साथ बातचीत करना पसंद है, उन्हें अपने विचार बताना, उनके विचारों से अवगत होना और अपनी ओर से उनकी समस्याओं के हल की दिशा में हरसंभव मदद करना! लेकिन यह सब करने के लिए मैं कोई संगठन खड़ा करना नहीं चाहता!

बहुत से लोगों ने इसके लिए मुझसे व्यक्तिगत रूप से निवेदन किया है और इसलिए, मुझे लगता है, विशेष रूप से उन लोगों को मुझे कोई न कोई उत्तर देना चाहिए: आप एक ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें आप अपनी नास्तिकता को फिट कर सकें। लेकिन नास्तिकता का तकाज़ा है कि वह मौजूदा व्यवस्था के विरुद्ध हो!

बहुत से लोगों के लिए नास्तिक होने का कारण यह होता है कि वे पुरोहितों को धर्म द्वारा प्रदत्त अनुक्रमणीय आधिपत्य को पसंद नहीं करते! मैं ऐसे किसी संगठन का मुखिया होना पसंद नहीं करूँगा क्योंकि युवावस्था में और वयस्कता की शुरुआत से ही मैं लगभग ऐसे ही पद का, धार्मिक और आध्यात्मिक गुरु के पद का, अनुभव प्राप्त कर चुका हूँ! मैं लोगों को उपदेश दिया करता था कि उन्हें क्या करना चाहिए, कैसे जीवन बिताना चाहिए। मैं उसे पीछे छोड़ चुका हूँ- दूसरे कारणों के अलावा इसलिए भी कि मैं सबके समान होना चाहता था! सामने वाले के साथ मैं सामान्य बातचीत कर सकूँ, यह चाहता था, न कि यह कि बातचीत के दौरान वह मेरे पैर पकड़ ले!

तो, अगर अब मैं कोई संगठन शुरू करता हूँ तो मैं उसका मुखिया होऊँगा। कुछ दूसरे निर्देशक भी होंगे। उसकी व्यवस्था देखने वाले लोग होंगे, जो एक सीढ़ी नीचे होंगे- संगठन में दूसरे नंबर पर। और इसी तरह चलता रहेगा, जिसके चलते होगा यह कि कुछ ऊपर होंगे और कुछ निचली पायदानों पर! मैं मानता हूँ कि हम सब मनुष्य हैं और हम सबको एक-दूसरे के बराबर होना चाहिए। व्यापारिक कंपनियों में यह ढाँचा आवश्यक है, जिससे व्यापार सुचारु रूप से चलाया जा सके लेकिन नास्तिक मित्रों के बीच ऐसी गैर बराबरी देखना मैं पसंद नहीं करूँगा! क्योंकि यही बात दुनिया भर के धर्मों में अत्यंत घृणित रूप से मौजूद है!

क्या करे, किधर जाएँ, कौन सा रास्ता चुनें, यह बताने के लिए आपको किसी और की ज़रूरत क्यों पड़नी चाहिए? आप ऐसे किसी व्यक्ति या समूह की खोज में क्यों लगे हुए हैं? अगर आप खुद पर और अपने अनुभवों पर भरोसा करते हैं तो आप स्वयं ज़्यादा बेहतर तरीके से इस संदेश का प्रसार कर सकते हैं! बिना किसी संगठन के नास्तिकता के बारे में आप लोगों को क्यों नहीं बता सकते?

मैं यह नहीं चाहता। मेरे खयाल से, अगर हमने यह किया तो हम भी किसी संगठित धर्म से और उसके अनुयायियों से बेहतर नहीं होंगे।

तो, जब मैं कहता हूँ कि मैं कभी भी ऐसा कोई संगठन नहीं बनाऊँगा तो मुझ पर विश्वास कीजिए। मज़ाक में भी जब कोई व्यक्ति मुझे 'नास्तिक गुरु' कहता है तो मुझे हँसी आती है लेकिन मैं ऐसा कुछ नहीं होना चाहता!

मैं नास्तिकों का कोई संगठन या धर्म क्यों नहीं बनाउंगा! 5 अगस्त 2015

मैंने आपको हमारे आश्रम में हुए नास्तिक सम्मेलन के बारे में बताया था और अपने ब्लॉग में नास्तिकता के विषय में अपने विचार भी रखे थे। उस सम्मेलन में और उसके बाद सोशल मीडिया में भी, मुझसे कई बार पूछा गया कि क्या मैं नास्तिकों का कोई संगठन बनाने जा रहा हूँ। इस दौरान हुए अनुभवों ने मेरे ऐसा कुछ न करने के पूर्व-निर्णय को सही साबित किया है!

मेरा मानना है कि ऐसा करने पर एक न एक दिन उस संगठन का अपने आप में एक धर्म बन जाने का खतरा होगा! आप सभी को पता है कि धर्म के बारे में मैं क्या सोचता हूँ– और मैं ऐसा कभी भी नहीं चाहूँगा! लोग कहते हैं कि वह धर्म नहीं बनेगा क्योंकि मैं ईश्वर को नहीं मानता! लेकिन यदि आप बौद्ध धर्म के आरंभ पर नज़र दौड़ाएँ तो पाएँगे कि वहाँ भी बिलकुल ऐसा ही हुआ था! बुद्ध कहते थे, आप स्वयं अपना प्रकाश बनिए और आज बौद्ध धर्म पाँचवा वैश्विक धर्म है!

ईश्वर पर आस्था सभी धर्मों का आधार नहीं है। ऐसे बहुत से लोग, संप्रदाय और धर्म हैं, जिनके पास ईश्वर की कोई धारणा नहीं है। लेकिन वे भी बहुत सी मूर्खताओं पर विश्वास करते हैं! मेरे लिए, नास्तिकता केवल ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास न करना ही नहीं है। मैं हर तरह के अंधविश्वासों को नकारता हूँ और उसके साथ पुनर्जन्म, स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य और वैसी ही बहुत सी दूसरी मिथ्या अवधारणाओं और विचारों को भी!

कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि हिंदुओं के सबसे प्राचीन धर्मग्रंथों में, अर्थात वेदों में, पहले से कुछ ऋचाएँ मौजूद हैं, जो कम से कम अज्ञेयवादी नज़र आती हैं अर्थात उनमें ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह व्यक्त किया गया है। विशेष रूप से ऋग्वेद बताते हैं कि हम नहीं जानते कि सृष्टि की रचना किसने की। मैंने जवाब दिया कि हो सकता है कि आप नहीं जानते लेकिन फिर भी इससे लगता है जैसे 'कोई न कोई' है, जिसने इस संसार की रचना की है। ठीक? दूसरे धर्मग्रंथों का हवाला देते हुए भी कुछ लोग कहते हैं कि ईश्वर रहित संसार की अवधारणा बहुत समय पहले से ही मौजूद रही है।

मुझे समझ में नहीं आता कि हमें इन उदाहरणों की ज़रूरत क्यों है! जिन लोगों ने इन धर्मग्रंथों की रचना की थी, कितने भी समय पहले की हो, वे भी हमारे जैसे इंसान ही थे। उनके मन में कुछ विचार आए और उन्होंने उन्हें लिखकर रख लिया। अगर आप उनके लिखे शब्दों को ध्यान से पढ़ें, उनका अध्ययन करें, उनसे कुछ सिद्ध करना चाहें या उनसे कोई रहस्य खोज निकालना चाहें तो आप उसी रास्ते पर होंगे, जिन पर चलकर सभी धर्म आज इस हालत में पहुँचे हैं। आप इन धर्मग्रंथों को एक सहारे की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं, उससे मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहते हैं कि किस पर भरोसा किया जाए।

मेरी नज़र में नास्तिकता यह कभी नहीं हो सकती। शून्य से लोगों के विचारों का नेतृत्व करने का काम इसका नहीं है और इसका कारण सिर्फ एक है: यह एक प्रतिक्रिया स्वरुप रखा गया कदम है! यह रास्ता आपने अपने पहले कदम के साथ नहीं चुना है बल्कि यह रास्ता आपने तब चुना, जब आपने धर्म के रास्ते को निरस्त किया! यह रास्ता ईश्वर के भ्रमजाल के विरुद्ध है, धार्मिक व्यवस्था के विरुद्ध एक बागी विचार। आप धर्म पर, अन्धविश्वास पर और ईश्वर की मिथकीय छवि पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। अगर आस्तिकता न होती तो नास्तिकता की भी ज़रूरत नहीं होती। धर्म की अनुपस्थिति में या बिना ईश्वर की कल्पना से अवगत हुए विकसित हो रहा बच्चा नास्तिक भी नहीं होगा। वह महज सहज स्वाभाविक होगा।

नास्तिकता एक प्रतिक्रिया है। और इसलिए मुझे पढ़ने वाले सभी नास्तिकों से मैं कहना चाहता हूँ कि कृपया किसी नास्तिक धर्म की स्थापना के इरादे से किसी धर्मग्रंथ की खोज करने की कोशिश न करें। नास्तिकता किसी रूढ़ि का अनुसरण नहीं करती, वह पूर्णतः व्यक्तिगत विचार है। अपने स्वयं के अनुभवों के बारे में बात करें, अपने विचार, अपनी भावनाएँ व्यक्त करें। आज के बारे में बात करें, अतीत की किसी पुस्तक के बारे में नहीं! यह आपके बारे में है!

कोई भी संगठन इन भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को, उनकी अलग-अलग भावनाओं को, अलग-अलग शख़्सियतों को एक सूत्र में नहीं बांध सकता और न ही उन सबके लिए एक निश्चित नियमावली या ढाँचा तैयार कर सकता है। ऐसा करने पर लोगों को एक बार फिर किसी के आदेशों का अनुपालन करना होगा और वे अपना व्यक्तित्व खो देंगे। यही धर्म का काम है। इसलिए, नहीं! मैं किसी नास्तिक धर्म की स्थापना करने नहीं जा रहा हूँ!

नास्तिकता का प्रसार करके क्या हम दुनिया को बेहतर जगह बना सकते हैं? 4 अगस्त 2015

कल मैंने बताया था कि नास्तिकता और आस्था का प्रश्न भारत में क्यों पश्चिम के मुकाबले अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। इसलिए कि यहाँ लोग ईश्वर और धर्म की परवाह ज़्यादा करते हैं! मैंने ज़िक्र किया था कि मेरे मुताबिक़, जब अधिक से अधिक लोग धर्म का त्याग कर देंगे और नास्तिक बन जाएँगे तब यह संसार अधिक बेहतर जगह हो जाएगी। आज मैं इस कथन की कुछ विस्तार से व्याख्या करते हुए स्पष्ट करना चाहता हूँ कि क्यों ईश्वर पर आपकी आस्था या अविश्वास से कोई फर्क नहीं पड़ता!

मैं इस बात को एक बार और स्पष्ट करना चाहता हूँ: वास्तव में मैं इस बात की ज़्यादा परवाह नहीं करता कि आप ईश्वर पर आस्था रखते हैं या नहीं। दोनों ही स्थितियों में मैं आपका दोस्त बन सकता हूँ-और दोनों ही स्थितियों में मैं आपका मित्र नहीं भी हो सकता। अगर बीस, सौ या एक हज़ार लोग कह दें कि वे ईश्वर पर आस्था नहीं रखते तो यह तथ्य भी इस संसार को बेहतर स्थान नहीं बना सकता। वास्तव में आस्था के खिलाफ मैं नहीं हूँ बल्कि लोगों की आस्था का लाभ उठाकर उनका शोषण करने, उनके साथ धोखेबाज़ी करने, उनके मस्तिष्क को बरगलाने की घिनौनी हरकतों के खिलाफ हूँ!

इसलिए मैं अपने विचारों और शब्दों को सिर्फ हिन्दू धर्म या भारत के संदर्भ में सीमाबद्ध नहीं करता! मुझे लगता है कि वे दूसरे धर्मों और आस्थाओं के लिए भी उतने ही प्रासंगिक हैं क्योंकि आस्था का सवाल आने पर लोगों का शोषण और भी कई तरीकों से किया जा रहा है! मैं यहाँ रहस्यवादी रीति-रिवाजों और ‘आध्यात्मिकता’ को भी साफ तौर पर इसमें शामिल करना चाहता हूँ!

ये सब एक ही हैं: कुछ लोगों का समूह एक किताब लिखता है और वह धर्मग्रंथ बन जाता है और फिर दूसरों के लिए उसका अनुसरण करना आवश्यक बना दिया जाता है। किसी धर्म का मुखिया कोई किताब छपवाता है और फिर दूसरों को उन नियमों में बंधकर रहना लाज़िमी है। ऐसे गुरु, जो अपने अनुयायियों को बताते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। संप्रदायों के नेता, जो अपने भक्तों को भेड़ों की तरह हाँकते हैं। अतीन्द्रियदर्शी, जो यह देखने का दावा करते हैं कि भविष्य में क्या होने वाला है। अलौकिक ज्ञान का दावा करने वाले छद्म मनोविज्ञानी, जो उनका अनुसरण करने वालों को बताते हैं कि उनके मृत पूर्वज उनसे किन कार्यों की अपेक्षा कर रहे हैं।

जब मैं कहता हूँ कि मैं नास्तिक हूँ तो मैं इस संसार का निर्देशन करने वाले किसी "ब्रह्माण्ड" या किसी काल्पनिक आसमानी शक्ति पर भी विश्वास नहीं करता। संभव है, दूसरे लोग कुछ दूसरा सोचते हों। सिर्फ इस तथ्य से कि एक व्यक्ति ईश्वर या ऐसी ही किसी सत्ता पर विश्वास नहीं करता, दुनिया बेहतर नहीं हो जाने वाली है।

लेकिन, जब मैं कहता हूँ कि मैं अपनी मर्ज़ी से चलूँगा, जो काम मुझे अच्छा लगता है और जिससे दूसरों का भला होता है, वही करूँगा; दूसरों को नुकसान पहुँचाने वाले, दुःख देने वाले काम नहीं करूँगा, उन्हें धोखा नहीं दूँगा, उनके साथ छल नहीं करूँगा- और कोई दूसरा भी मेरे पास आकर यही कहता है कि वह भी इसी नतीजे पर पहुँचा है- तब, मुझे लगता है कि दुनिया वाकई बेहतर जगह हो जाएगी!

लेकिन, क्योंकि धर्म में और आध्यात्मिकता में भी इतना अधिक छल-कपट है, ऐसा होने की अधिक संभावना तभी है जब कि आप धर्म और ईश्वर का त्याग कर देंगे । और मैं अपने इस विचार को अधिक से अधिक लोगों को बताता हूँ, और उसके बारे में लिखता रहता हूँ तो इसलिए कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इस नतीजे पर पहुँचें और आगे किसी के झाँसे में न आएँ, दूसरों को अपना शोषण करने की इजाज़त न दें!

लोगों के जीवन पर धर्म और ईश्वर का प्रभाव – भारत और पश्चिमी देशों के बीच तुलना – 3 अगस्त 2015

पिछले सप्ताह मैं नास्तिकता के विषय पर काफी विस्तार से लिखता रहा हूँ और निश्चित ही अभी भी इस विषय पर मेरे मन में अनेकानेक विचार, अवधारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, जिन्हें मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। लेकिन इस समय मुझे अपने पश्चिमी पाठकों का भी विचार करना चाहिए। मैं जानता हूँ कि वहाँ बहुत से लोगों के लिए इस बात का वास्तव में कोई महत्व नहीं है कि ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं। और दरअसल यही बात मैं अपने भारतीय मित्रों के साथ साझा करना चाहता हूँ और यह करते हुए पश्चिमी मित्रों को भी सहज ही यह पता चल जाएगा कि क्यों भारत में यह विषय इतना विस्फोटक है!

वास्तव में इसका संबंध संस्कृतियों के बीच मौजूद अंतर से है: पश्चिम में मेरे बहुत से मित्र हैं, जिनके बारे में ठीक तरह से मैं भी नहीं जानता कि वे ईश्वर पर आस्था रखते हैं या नहीं। भारत में यह तुरंत पता चल जाता है। पश्चिम में मेरे बहुत से मित्र हैं, जो किसी न किसी धर्म का, ज़्यादातर ईसाईयत का, अनुसरण करने वाले हो सकते हैं- लेकिन इसके बावजूद, अधिकांश विषयों पर हमारे विचार एक समान ही हैं! यह एक ऐसी बात है, जो भारत में सहज संभव नहीं है।

यह एक तथ्य है कि पश्चिम में बहुत बड़ी संख्या में लोगों के लिए धर्म और ईश्वर का विशेष महत्व नहीं है। वे एक विशिष्ट धार्मिक घेरे के भीतर रहकर बड़े होते हैं, बप्तिस्मा करवाते हैं, यौवन के ईसाई पुष्टिकरण कर्मकांड आयोजित करते हैं और फिर चर्च में जाकर शादी भी करते हैं। संभव है, वे क्रिसमस और ईस्टर के दिन चर्च भी जाते हों। लेकिन उसके बाद उनके सामान्य जीवन में धर्म की कोई दखलंदाज़ी नही होती, अक्सर वे धर्म और ईश्वर के विषय में बात करना भी पसंद नहीं करते। दैनिक जीवन में वे ईश्वर का विचार तक मन में नहीं लाते, भले ही उनके प्रति उनका बुनियादी रवैया कुछ भी हो।

इसलिए जब दो ऐसे लोग आपस में मिलते हैं तो उनके बीच उनकी आस्थाओं का व्यवधान नहीं होता। वे इसकी कतई परवाह नहीं करते कि सामने वाला ईश्वर पर विश्वास रखता है या नहीं क्योंकि वे नहीं समझते कि इसका ज़रा सा भी महत्व है। परिवार में अगर उनका लड़का कहे कि वह भविष्य में चर्च नहीं जाना चाहता या अपना विवाह चर्च में नहीं बल्कि कोर्ट में पंजीकृत करवाना चाहता है तो माता-पिता आसानी से उसकी बात मान लेते हैं। इसी तरह कोई लड़की क्रिसमस के दिन चर्च चली जाएगी, भले ही वहाँ के पादरी की कही बातों पर उसका एक रत्ती भरोसा न हो।

भारत में मामला बहुत अलग है। यहाँ आस्थाओं के प्रश्न परिवारों को जुदा कर देते हैं! दैनिक जीवन में आस्था बहुत बड़ी भूमिका अदा करती है और जितना अधिक आपके आसपास के लोग धार्मिक और परम्परावादी होंगे उतना ही आपका बचपन धार्मिक त्योहारों, समारोहों, रस्म-रिवाजों और कर्मकांडों के बीच गुज़रेगा। कुछ नियत दिन या सप्ताह होंगे जब उपवास रखना होगा, कुछ अवसरों पर मन्दिर जाना ज़रूरी होगा तो कुछ दिन आप मन्दिर नहीं जाएँगे। दूसरों की धार्मिक भावनाएँ न दुःखें या देवता अप्रसन्न न हो जाएँ इसलिए कुछ अवसरों पर धारण किए जाने वस्त्रों के बारे में आपको कुछ नियम याद रखने होंगे और यह भी कि किन भावभंगिमाओं या मुद्राओं और शब्दों का उपयोग करना है और किनका नहीं करना है। यहाँ इस बात पर लोगों की बहुत गहरी आस्था होती है कि आपका अच्छा-बुरा इन सब बातों पर निर्भर होता है!

इसलिए जब बेटा घोषणा करता है कि वह ईश्वर पर विश्वास नहीं रखता तो अभिभावक चिंताग्रस्त हो जाते हैं, गुस्सा होते हैं, उन्हें समझ नहीं आता कि अब क्या किया जाए। यार-दोस्त समझ नहीं पाते और सामान्य दैनिक कार्यकलापों पर विराम सा लग जाता है क्योंकि कोई भी अंतहीन वाद-विवाद, तनातनी और झगड़े नहीं चाहता! उनकी पुरानी जीवन-चर्या समाप्त हो जाती है, अपने परिवेश से कटकर वे पूरी तरह अलग, कोई नई सामाजिक मंडली खोजने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

इसीलिए यहाँ यह चर्चा बहुत महत्वपूर्ण है। यह आपके दैनिक जीवन के बारे में है, सिर्फ सालाना दो छुट्टियों के बारे में ही नहीं। आपके रवैये और नज़रिए की जड़ कहाँ है, इस बारे में है। और इसलिए मुझे हमेशा लगता रहा है कि मैं इस विषय में पहल करूँ, बातचीत करूँ- क्योंकि आम तौर पर लोग इस विषय में चर्चा करते हुए घबराते हैं!

मैं खुद एक धार्मिक और आस्तिक से नास्तिक हुआ हूँ। मुझे महसूस हुआ है कि उसके बाद मेरे बहुत से भारतीय मित्र मुझसे दूर हो गए, यहाँ तक कि दोस्ती तोड़ ली। लेकिन मेरे पश्चिमी मित्रों के साथ मुझे यह अनुभव नहीं झेलना पड़ा- ज़्यादातर लोगों के साथ मुझे लगता रहा कि इससे उन्हें कोई मतलब ही नहीं है! इसे इस तरह समझिए कि आस्था से ज़्यादा उनके लिए व्यक्ति का महत्व था!

मैं पहले कह चुका हूँ कि ज़्यादा से ज़्यादा नास्तिक होंगे तो दुनिया बेहतर जगह हो जाएगी। इसका संबंध इस बात से नहीं है कि आप ईश्वर को मानते हैं या नहीं। और इसीलिए यह बात दुनिया के लिए इतनी आवश्यक है! लेकिन उस विषय में आगे चर्चा कल!

भविष्य की योजनाओं को लेकर मैं परेशान क्यों नहीं होता: मुझे भरोसा है, मगर ईश्वर पर नहीं – 14 जून 2015

मेरे जीवन में बातचीत के सर्वश्रेष्ठ साथी मेरी पत्नी और दोनों भाई हैं। इन तीन लोगों के साथ मैं दुनिया भर के हर विषय पर चर्चा करता हूँ, चाहे व्यक्तिगत बातें हों, चाहे सामाजिक या व्यावसायिक। हाल ही में जब मैं अपनी पत्नी के साथ बात कर रहा था तो हमने दोनों के बारे में और भविष्य की अपनी योजनाओं और निर्णयों पर अपने रवैयों के बारे में बात की- और मैंने उसे बताया कि क्यों मैं भविष्य को लेकर न तो उद्विग्न होता हूँ, न परेशान होता हूँ, न चिंता करता हूँ।

अधिकांश निर्णय हम लोग आपस में चर्चा करके लेते हैं, साथ मिलकर प्लान करते हैं और नए, रोमांचक उपक्रम शुरू करते हैं- व्यापार और व्यक्तिगत जीवन संबंधी, दोनों! इन सबके बीच रमोना मुझसे कभी-कभी पूछती है, 'तुम्हें डर नहीं लगता कि यह काम सुचारू रूप से हो भी पाएगा या नहीं?' या कहती है कि वह हमारे द्वारा शुरू की गई किसी ख़ास परियोजना के नतीजों को लेकर कुछ परेशान है। सचाई यह है कि मैं बिल्कुल परेशान नहीं होता। मैं उस पर एकाग्र हो जाऊँगा, अपना पूरा ध्यान उसी काम पर केन्द्रित कर दूंगा लेकिन मुझे किसी तरह की कोई घबराहट या चिंता या परेशानी नहीं घेरती!

ऐसा क्यों होता है? हमने आज इसी विषय पर बात की।

मैंने कहा, "मुझे विश्वास होता है कि इस बारे में सब ठीक होगा।" और रमोना ने पूछा, "लेकिन तुम किस पर विश्वास करते हो?" निश्चित ही किसी दैवी शक्ति पर नहीं! मैं ईश्वर पर विश्वास नहीं रखता इसलिए मुझे सब कुछ उस पर छोड़ देने की इच्छा नहीं होती- मुझे लगता है कि लोग सिर्फ मानसिक रूप से आश्वस्त होने के लिए या मानसिक शक्ति प्राप्त करने के लिए ऐसा करते हैं, क्योंकि ऐसा कोई सर्वशक्तिमान मौजूद नहीं है जो "सब कुछ ठीक" कर दे। इसी तरह, मेरा इस पर भी विश्वास नहीं है कि ईश्वर जैसी कोई आसमानी ताकत है, जो हर चीज़ को सुचारू रूप से चलाती है या चला सकती है।

क्या मैं खुद पर भरोसा करता हूँ? बिल्कुल। जी हाँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैं क्या कर रहा हूँ। जब मैं कोई निर्णय लेता हूँ तो मैं कोशिश करता हूँ कि उसके सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर अच्छी तरह विचार कर लूँ और किसी खास परिस्थिति में अपनी सहज प्रवृति या सहज बुद्धि पर भरोसा करूँ। लेकिन मैं जानता हूँ कि मैं सब कुछ नहीं जानता। उन क्षेत्रों में, जिनके बारे में मुझे अधिक जानकारी नहीं है, मैं किसी जानकार या विशेषज्ञ की सलाह ले सकता हूँ! मैं जीवन भर सीखता रहूँगा और ज़्यादा से ज़्यादा ज्ञान हासिल करना कितना अच्छा है!

सामान्यतया मैं हर बात के प्रति सकारात्मक रवैया रखता हूँ, चीजों को देखने का मेरा नज़रिया सकारात्मक होता है और मैं हमेशा आशा से भरा रहता हूँ कि भविष्य में अच्छी बातें ही होंगी। उन बातों को लेकर व्यर्थ परेशान रहने की मेरी आदत नहीं है, जिन्हें मैं बदल नहीं सकता या जिन पर मेरा कोई ज़ोर नहीं है। कोई भी काम मैं पूरी शक्ति लगाकर करूँगा और जो बातें मेरे हाथ में नहीं हैं, उन पर गहरी नज़र भी रखूँगा लेकिन उन्हें लेकर व्यर्थ परेशान नहीं होऊँगा!

अंत में, यह प्रश्न हमेशा बना रहता है कि ज़्यादा से ज़्यादा बुरा क्या हो सकता है। कामों और उनके नतीजों पर यथार्थवादी रवैया रखें तो पता चलेगा कि ज़्यादातर नतीजे उतने बुरे नहीं होते, जितना आप उनके बारे में सोच-सोचकर डरे हुए होते हैं। आप मर नहीं जाएँगे। और अगर मरना सबसे बुरी बात है, जो आपके साथ हो सकती है-तो क्या? उस पर तो आपका कोई बस ही नहीं है!

और बाकी सब तो ऐसी बातें हैं, जो हो भी जाएँ तो उनसे हम निपट सकते हैं। तब तक मैं और हम किसी भी काम को हर संभव अच्छे से अच्छा करने की कोशिश करते हैं। डर और चिंताएँ तो काम में व्यवधान ही उपस्थित करते हैं!

बेतुका और हास्यास्पद विश्वास कि ईश्वर ने मंदिर तो बचा लिया जबकि हजारों लोगों की जान ले ली – 5 मई 2015

मैं आज फिर नेपाल के भूकंप के बारे में लिखना चाहता हूँ। सिर्फ इसलिए नहीं कि अभी भी वहाँ ज़रूरतमंदों के पास मदद नहीं पहुँच सकी है बल्कि इसलिए भी कि कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि जिस दिन भूकंप आया था, एक अलौकिक चमत्कार भी हुआ था: काठमांडू का मुख्य मंदिर, पशुपतिनाथ मंदिर ध्वस्त नहीं हुआ। मैं समझता हूँ कि इसे चमत्कार कहना या उससे बढ़कर 'ईश्वरीय शक्ति का प्रमाण' कहना बेहूदा और हास्यास्पद है!

भारतीय दृश्य मीडिया इसे बार-बार दिखा रहा है और बहुत से धार्मिक लोग सोशल मीडिया पर इस पर टिप्पणियाँ लिख रहे हैं और इस समाचार और संबंधित चित्रों को मित्रों के साथ साझा कर रहे हैं: सारा शहर तहस-नहस हो गया सिर्फ मंदिर अब भी खड़ा है! ईश्वर ने मंदिर को बचा लिया, वह इतना पवित्र था कि इतना भयंकर भूकंप भी उसका कुछ बिगाड़ न सका!

यही 2013 में भी हुआ था, जब उत्तरी भारत में भयंकर बाढ़ आई थी। हिमालय क्षेत्र में हजारों लोग मारे गए और न जाने कितने मकान तबाहो बरबाद हो गए! केदारनाथ नामक तीर्थस्थान में सारे मकान ध्वस्त हो गए मगर केदारनाथ मंदिर बचा रह गया।

मुझे इससे कोई मतलब नहीं है कि आप ईश्वर और धर्म पर विश्वास रखते हैं, आपकी आस्था आपको मुबारक, आप रोज़ प्रार्थना करें, आराधना करें या तीर्थ यात्रा करें-मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन मैं आपको एक मित्रतापूर्ण सलाह देना चाहता हूँ कि इस तरह की बात न कहें कि ‘ईश्वर का घर ध्वस्त नहीं किया जा सकता’ क्योंकि उससे आप असंवेदनशील नज़र आते हैं और ईमानदारी से कहा जाए तो, मूर्ख भी!

अगर वास्तव में आप विश्वास करते हैं कि धरती पर घटित होने वाला सब कुछ ईश्वर ही करता है तो इसका अर्थ यह हुआ कि वह भूकंप लेकर आया, वह बाढ़ लेकर आया, हजारों लोगों को मौत के मुँह में धकेला, लाखों-करोड़ों लोगों को कष्ट उठाने पर मजबूर किया-और किसी स्वार्थी व्यक्ति की तरह अपना घर बचा लिया? और फिर उन सैकड़ों मंदिरों के बारे में आपका क्या कहना है, जो पूरी तरह नेस्तनाबूद हो गए और जिनमें आराधना करने वाले सामान्य लोग और पुरोहित मारे गए? सैकड़ों नहीं, हजारों देवी-देवता, उनकी छोटी-छोटी मूर्तियाँ, जो ईश्वर के रूप में पूजी जाती थीं, टूट-फूट गईं, ध्वस्त हो गईं, मलबे में समा गईं! या फिर, क्या उनके लिए कोई दूसरा ईश्वर जिम्मेदार है? कमजोर ईश्वर, जो अपने घर की रक्षा नहीं कर सके?

लेकिन नहीं, आपके लिए यह बहुत ही शुभसूचक (मंगलकारी) घटना है कि मंदिर भूकंप के बावजूद खड़ा है-इसलिए नहीं कि हो सकता है, उसकी नींव मजबूत रही हो या उसका निर्माण बेहतर ढंग से किया गया हो, जैसा कि किया जाना संभव था क्योंकि उनके पास अधिक आर्थिक संसाधन होते हैं? निश्चित ही, उन गरीब ग्रामीणों से बहुत ज़्यादा, जिनके घर ध्वस्त हो गए और जो थोड़ी बहुत सरकारी या अंतर्राष्ट्रीय मदद का अब भी इंतज़ार कर रहे हैं!

मेरे खयाल से अगर आप ऐसी बातें कहते हैं तो अपनी ही आस्थाओं का मज़ाक उड़ा रहे होते हैं। अगर ईश्वर का अस्तित्व मान भी लिया जाए तो क्यों आपके ईश्वर के पास इतनी शक्ति नहीं है कि अपने सभी घरों की रक्षा कर ले, नेपाल के सभी मंदिरों को ध्वस्त होने से बचा ले? और इसके बाद भी यह प्रश्न बरकरार रहता है: उसने इन लोगों पर इतनी बड़ी आफत क्यों ढाई? उन्हें इतने कष्ट उठाने के लिए मजबूर क्यों किया? और इस प्रश्न का उत्तर देते हुए ‘कर्म सिद्धान्त’ का तर्क इस्तेमाल न करें-मैं पहले ही इस हास्यास्पद विचार पर लिख चुका हूँ! जी नहीं, मेरे विचार से ऐसा कोई ईश्वर नहीं है जो भूकंप लाता है और फिर सिर्फ एक इमारत को बचा लेता है क्योंकि उसके मुताबिक वह महत्वपूर्ण है!

लेकिन जब कि हम इस विषय पर बात कर रहे हैं, मैंने यह भी सुना है कि वहाँ एक वेश्यालय भी था, और उस पर भी एक खरौंच तक नहीं आई… अब आप इस पर जो चाहे, सोचते रहें!

अगर आप ईश्वर या धर्म पर कोई आस्था नहीं रखते तो फिर अपनी शुभकामनाओं को ‘प्रार्थना’ क्यों कहते हैं? 30 अप्रैल 2015

इस सप्ताह की शुरुआत मैंने यह बताते हुए की थी कि प्रार्थनाओं से नेपाल के भूकंप पीड़ितों का कोई भला नहीं होने वाला। दूसरे दिन मैंने आपको एक बेहूदा टिप्पणी दिखाई थी, जिसमें कहा गया था कि प्राकृतिक हादसे ईश्वर के भले काम हैं। उसके जवाब में मैंने कर्म-सिद्धांत की चर्चा करते हुए अपनी बात को और स्पष्ट किया था। लेकिन आज मैं अपनी मूल बात अर्थात, ‘प्रार्थना’ पर लौटना चाहता हूँ। क्यों? क्योंकि कुछ लोगों ने मुझसे कहा है कि प्रार्थना करते हुए भी वास्तव में वे ईश्वर की आराधना नहीं कर रहे होते।

मुझे यह बार-बार यह बात पढ़ने-सुनने को मिली और ये ब्लॉग लिखने के दौरान ही मेरे मन में यह बात घर कर गई कि बहुत से ऐसे लोग भी हैं, जो प्रार्थनाओं पर तो विश्वास करते हैं मगर धर्म पर नहीं। कुछ ईश्वर पर भी आस्था नहीं रखते लेकिन फिर भी प्रार्थना करते हैं। कुछ और हैं, जो प्रार्थना का इस्तेमाल अपनी संवेदनाएँ या शुभकामनाएँ व्यक्त करने हेतु करते हैं। वास्तव में मैं पूछना चाहता हूँ कि आखिर ये सब लोग इन संवेदनाओं की अभिव्यक्ति को ‘प्रार्थना’ क्यों कहते हैं?

खुद मैंने अपने आपको एक बहुत धार्मिक व्यक्ति से एक नास्तिक के रूप में परिवर्तित किया है और जानता हूँ कि आप भी उसी राह पर आगे बढ़ रहे हैं। प्रार्थना करने की वर्षों की आदत के पश्चात उसे अचानक छोड़ देना बहुत मुश्किल होता है। और उन प्रार्थनाओं पर विश्वास न रखना भी। अर्थात, प्रार्थना का असर मुख्यतः मनोवैज्ञानिक होता है: आप अपनी शुभकामनाओं या संवेदनाओं को दोहराते हैं, मन ही मन और कभी-कभी तेज़ स्वर में और इस तरह अपने लक्ष्य और अपनी इच्छा की तसदीक करते हैं, बल्कि अक्सर अपने आपको इस बात का विश्वास भी दिलाते हैं कि अब चिंता की कोई बात नहीं है। आपके भीतर यह एहसास अब भी बना रहता है कि आपने अपने आपको किसी और के सहारे (हाथ में) छोड़ दिया है और अब ज़िम्मेदारी उसकी है। जो लोग अब भी ईश्वर पर तो आस्था रखते हैं मगर धर्म पर नहीं, वे इस विचार के बीच झूलते रहते हैं। और जो दोनों पर भरोसा नहीं करते, वे इसके तथाकथित लाभ से वंचित नहीं रहना चाहते!

मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि आप अब भी यही करते रह सकते हैं-लेकिन मुझे लगता है, आपको उसे ‘प्रार्थना’ नहीं कहना चाहिए! इस शब्द का अपना एक इतिहास है और वह सदा से धर्म और ईश्वर के सन्दर्भ में प्रयुक्त होता है। उसे आप 'भावनाओं की अभिव्यक्ति' क्यों नहीं कहते? या 'शुभकामनाओं की अभिव्यक्ति'? तब वह, एक लिहाज से, किसी खास विचार पर ध्यान लगाने का ही एक अंग हो जाएगा, एकाग्रता का एक सचेत तरीका।

जब कोई व्यक्ति मुश्किल में होता है तो हम उसके लिए कामना करते हैं कि वह उस मुश्किल से सकुशल बाहर निकल आए। फिर नेपाल के भूकंप पीड़ितों के लिए संवेदना व्यक्त करते हुए ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता? आप कह सकते हैं कि आप उनकी पीड़ा और मुश्किलों में सहभागी हैं, कि न सिर्फ उनके प्रति आप शुभकामना व्यक्त कर रहे हैं बल्कि उनके स्वास्थ्य, उनके शीघ्र स्वास्थ्य-लाभ और सौभाग्य की कामना भी करते हैं। कि उन्हें जिस चीज़ की भी आवश्यकता हो, वह उन्हें प्राप्त हो, किसी तरह की मदद में किसी तरह की कमी न रहे।

अब, उदाहरण के लिए, नेपाल में स्थिति अभी भी गंभीर बनी हुई है। काठमांडू विमानतल पर स्थान की और आपसी तालमेल की कमी है। यह एक विकट समस्या है और वहाँ अटके पर्यटकों को रवाना करने में बड़ी दिक्कतें पेश आ रही हैं। इन्हीं कारणों से त्वरित अंतर्राष्ट्रीय मदद पहुँचने में भी देर हो रही है। बारिश के चलते भी लोगों को मदद पहुँचाना मुश्किल हो रहा है और जिनके घर-बार बरबाद हो चुके हैं, वे खुले में पड़े हैं और उन पर बरसात का कहर टूट पड़ा है। भोजन, पानी और दवाइयाँ आदि उन लोगों तक नहीं पहुँच पा रही हैं, जिन्हें उनकी तुरंत सख्त आवश्यकता है तथा अभी एपिसेंटर तक भी नहीं पहुँचा जा सका है।

इन लोगों को मदद की सख्त ज़रूरत है। चैरिटी संगठनों को आर्थिक सहयोग प्रदान करके आप उनकी मदद कर सकते हैं। अगर आप यह न कर सकें तो अपना समय देकर और श्रमदान करके भी उनकी मदद कर सकते हैं। और अगर आप इनमें से कुछ भी नहीं कर सकते और सिर्फ अपने मित्रों से अपनी भावनाएँ व्यक्त करना चाहते हैं तो प्यार भरे शब्दों में अपनी संवेदनाएँ और शुभकामनाएँ व्यक्त करें, प्रार्थना करके नहीं।

कर्म सिद्धान्त के अनुसार नेपाल के भूकंप पीड़ित सहायता के पात्र नहीं हैं – 29 अप्रैल 2015

कल मैंने आपको एक टिप्पणीकर्ता के बारे में बताया था, जिसका भरोसा है कि ईश्वर जो भी करता है, अच्छा करता है। अगर आपको लगता है कि कुछ बुरा हुआ है तो आपको समझना होगा कि यह उस व्यक्ति के कर्मों का फल है! भले ही वह नेपाल में आया भूकंप ही क्यों न हो! इस दृष्टिकोण से सोचने पर अंततः इस बात पर पहुँचकर भ्रमित रह जाएँगे: जब आप कोई काम करते हैं, तब आपको कैसे पता चले कि आप वह काम ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध नहीं कर रहे हैं?

अगर आप यह मानते हैं कि किसी व्यक्ति के साथ जो भी बुरा होता है, उसके पिछले कर्मों के नतीजे में होता है तो फिर जो भी होता है, वही होना भी चाहिए। बल्कि वह ईश्वर की इच्छा भी है क्योंकि वह जो भी करता है, सबके भले के लिए ही करता है। तब आप ऐसे पीड़ितों की मदद करते हैं तो वास्तव में ऐसा काम कर रहे होते हैं, जो ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध है!

ऐसी स्थिति में सवाल पैदा होता है कि फिर आप किसी पीड़ित की मदद करें ही क्यों? अपने कर्म की सज़ा भुगत रहे किसी व्यक्ति के लिए आप अपनी सहायता का हाथ क्यों बढ़ाएँ? अगर आप मदद नहीं करेंगे तो और उसका और भी बुरा हाल हो सकता है। सोचने वाली बात यह है कि कर्म-सिद्धान्त के अनुसार उस अतिरिक्त दंड का पात्र भी वह व्यक्ति होगा! क्या नहीं होगा? और अगर आप उसकी सहायता करते हैं तो आप उस संयोग में व्यवधान उपस्थित कर रहे होते हैं!

आप कैसे जानेंगे कि ईश्वर की इच्छा क्या है? हर एक को अच्छे और बुरे कर्म प्राप्त होते हैं और अगर आप किसी की मदद भी करते हैं तो सिद्धांततः आपको कुछ अच्छे कर्म प्राप्त होते हैं। लेकिन अगर आप ईश्वर की तयशुदा योजना के साथ छेड़खानी करते हैं और उस व्यक्ति को, उसके बुरे कर्मों का पूरा परिणाम भुगतने नहीं देते तो हो सकता है कि आप उतने भाग्यशाली न हों और अच्छे कर्मों की आपकी पोटली में कोई इज़ाफ़ा न हो! बल्कि आप ईश्वर के इरादों में रोड़े अटका रहे हैं और इस तरह तो निश्चय ही आपको बुरे कर्म ही प्राप्त हो रहे होंगे!

जी हाँ, मेरी नज़र में यह हास्यास्पद है। धार्मिक लोग अपने ही नियम और सिद्धांतों को तोड़ते-मरोड़ते रहते हैं और जिस बात के पक्ष में वे होते हैं, उसके समर्थन में उनका रुख मोड़ देते हैं। जादू के कमाल से अमीरों के लिए हवा में से सोना और गरीबों के लिए राख निकालने वाले सत्य साईं बाबा जैसे नकली गुरुओं पर मैंने एक बार लिखा था: कि जो सोना वे निकालते हैं, उससे उन्हें गरीबों के लिए भोजन की व्यवस्था करनी चाहिए। मुझे बताया गया कि गरीब अपने कर्मों के कारण गरीब हैं। और इसलिए उनके गुरु भी उनकी कोई सहायता नहीं कर सकते!

तो आप अपने सिद्धांत को अपनी मर्ज़ी से जिधर चाहें, मोड़ दें मगर मेरे लिए वह तर्क से परे ही होगा। और मेरी नज़र में तर्क तो यही कहता है कि आपका ईश्वर बड़ा ही क्रूर है। बेहद क्रूर! अच्छे कर्म से उसकी क्रूरता में कोई कमी नहीं आती। और हाँ, मुझे मेरे कर्मों के लिए आगाह करने की जगह आपको इस बात की चिंता करनी चाहिए कि किसी की मदद करके कहीं आप ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध तो कोई काम नहीं कर रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि दूसरों के लिए प्रार्थना करते-करते आप अपने लिए बुरे कर्मों का ज़खीरा न इकठ्ठा कर रहे हों-क्योंकि दूसरों की सहायता करना ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध है!

"’ईश्वर महज अपना काम कर रहा है" – धार्मिक आस्थावानों का नेपाल के भूकंप पर स्पष्टीकरण – 28 अप्रैल 2015

अपने ब्लॉग में प्रस्तुत विचारों पर कल मुझे इतना रोचक फीडबॅक प्राप्त हुआ है कि उसे मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ, जिससे आप जान सकें कि लोगों के मन में कैसे-कैसे खयाल आ सकते हैं। और संभव है कि उस टिप्पणी पर मेरा जवाब, जिसे मैं टिप्पणीकार के लिए लिख रहा हूँ, शायद आपको भी रुचिकर लगे। बल्कि सभी दूसरे पाठक उसे पढ़कर आनंदित होंगे क्योंकि टिप्पणीकर्ता को यह जवाब पाने की कतई उम्मीद नहीं होगी!। तो चलिए, स्वयं देखिए, मामला क्या है!

टिप्पणी की शुरुआत उन्हीं शब्दों से हुई थी, जिनके बारे में शुरू से मुझे पता था कि लोग इसी बात से शुरू करेंगे: कि प्रार्थनाएँ काम करती हैं क्योंकि हम सब एक-दूसरे के साथ एक उच्चतर परा-शक्ति के ज़रिए जुड़े हुए हैं, जिसके हम सभी अलग-अलग, सूक्ष्म हिस्से हैं। चलिए मान लेते हैं-क्योंकि मैं इस आपसी संपर्क पर विश्वास नहीं करता इसलिए मुझे विश्वास नहीं है कि इस अर्थ में प्रार्थनाएँ किसी तरह का लाभ पहुँचा सकती हैं।

लेकिन आगे वह व्यक्ति किसी दूसरी ही दिशा में चल पड़ा:

"…ईश्वर अपना काम कर रहा है। हम सब अपने कर्मों का फल पाते हैं और यह बात हम भूले रहते हैं जब कि हमें अच्छे कर्म करना चाहिए। ईश्वर हमारे हृदय, नाड़ी को चलायमान रखता है, हमारी नसों में रक्त प्रवाहित करता है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि उसी की कृपा से हम साँस लेते और छोड़ते हैं। उसने हमें देखने, सुनने, बोलने, सूंघने और छूने आदि की शक्ति देकर अपना काम कर दिया है। वह सर्वव्यापी है। वह हमारा कुछ भी बुरा नहीं कर सकता बल्कि वह हमसे प्रेम करता है, भले ही आप उस पर विश्वास करें या न करें। कृपा करके दूसरों को बहकाने की कोशिश न करें।"

तो आपके अनुसार ईश्वर अपना काम कर रहा है? अच्छा, तो इसीलिए उसने इतने लोगों की जान ले ली…

लेकिन आप तो यह कह रहे हैं कि जो भी होता है हमें स्वीकार कर लेना चाहिए क्योंकि सब कुछ ईश्वर ने ही किया है। अगर आप किसी बात को बुरा महसूस करते हैं तो वह तो उस व्यक्ति के कर्म का परिणाम होता है, जो कि वास्तव में लोगों की भलाई के लिए ही है। इसका मतलब तो यह हुआ कि बुरी बातें भी अच्छी ही हैं- और कल मैंने ठीक यही लिखा था! कि अगर आप ईश्वर पर विश्वास करते हैं तो आपको इन पंक्तियों पर भी विश्वास करना चाहिए

करते रहिए, लेकिन अगर आप इस तरह से सोचते हैं तो मैं आपके लिए दुखी हुए बगैर नहीं रह सकता! क्या यह बहुत अच्छी बात नहीं है कि ईश्वर सिर्फ अच्छा करता है! तदनुसार, जब किसी बच्ची के साथ बलात्कार होता है तो वह भी ईश्वर की इच्छा से होता है, उस लड़की के कर्मों के फल का नतीजा होता है! जब बच्चे बिना भोजन के या इसलिए कि चिकित्सा सेवाओं तक उनकी पहुँच नहीं है, मारे जाते हैं तो वह भी उनके कर्मों का फल ही होता है और वह सब भी उसी तरह होता है, जैसा ईश्वर चाहता है। निश्चित ही नेपाल में आया भूकंप भी सिर्फ ईश्वर की मर्ज़ी से ही आया था! स्वाभाविक रूप से वह ईश्वर के प्रेम का इज़हार था-क्या यह बात आपको समझ नहीं आ रही है?

मैं जानता हूँ कि इस तरह सोचने वालों के साथ वाद-विवाद करना समय और ऊर्जा की बरबादी के सिवा कुछ भी नहीं है। आप उन्हें कभी भी, किसी भी हालत में सहमत नहीं कर सकते। लेकिन कभी-कभी यह बात बहुत खलती है कि लोग ऐसी क्रूरता को भी अपने सर्वशक्तिमान ईश्वर की इच्छा मानते हैं और यहाँ तक कि, उसके प्रेम की निशानी भी!

मुझे नेक सलाह भी प्राप्त हुई है कि मैं इस तरह बात करना बंद करूँ और अपने कर्मों की चिंता करूँ। लेकिन मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि आप मेरी चिंता न करें, वास्तव में मैं कर्म-सिद्धान्त पर विश्वास ही नहीं करता और इसलिए इस बात पर भी मेरी कोई आस्था नहीं है कि कोई परा-शक्ति इन निर्भीक शब्दों के लिए मुझे कोई सज़ा दे सकेगी। परेशानी आपकी है, मेरी नहीं।

इन बेकार के विचारों से परेशान होने की जगह मैं बच्चों को भोजन कराऊँगा और शिक्षा प्रदान करके उनकी मदद करूँगा, अच्छे कामों में आर्थिक सहयोग प्रदान करूँगा और इस विषय पर लगातार लिखता रहूँगा कि कभी कोई भूला-भटका व्यक्ति इसे पढ़ेगा और शायद उससे प्रभावित होकर सही रास्ते पर आएगा और इस ओर सक्रिय होगा।

अच्छे काम करते हुए, सिर्फ प्रार्थना करके नहीं!