बेतुका और हास्यास्पद विश्वास कि ईश्वर ने मंदिर तो बचा लिया जबकि हजारों लोगों की जान ले ली – 5 मई 2015

मैं आज फिर नेपाल के भूकंप के बारे में लिखना चाहता हूँ। सिर्फ इसलिए नहीं कि अभी भी वहाँ ज़रूरतमंदों के पास मदद नहीं पहुँच सकी है बल्कि इसलिए भी कि कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि जिस दिन भूकंप आया था, एक अलौकिक चमत्कार भी हुआ था: काठमांडू का मुख्य मंदिर, पशुपतिनाथ मंदिर ध्वस्त नहीं हुआ। मैं समझता हूँ कि इसे चमत्कार कहना या उससे बढ़कर 'ईश्वरीय शक्ति का प्रमाण' कहना बेहूदा और हास्यास्पद है!

भारतीय दृश्य मीडिया इसे बार-बार दिखा रहा है और बहुत से धार्मिक लोग सोशल मीडिया पर इस पर टिप्पणियाँ लिख रहे हैं और इस समाचार और संबंधित चित्रों को मित्रों के साथ साझा कर रहे हैं: सारा शहर तहस-नहस हो गया सिर्फ मंदिर अब भी खड़ा है! ईश्वर ने मंदिर को बचा लिया, वह इतना पवित्र था कि इतना भयंकर भूकंप भी उसका कुछ बिगाड़ न सका!

यही 2013 में भी हुआ था, जब उत्तरी भारत में भयंकर बाढ़ आई थी। हिमालय क्षेत्र में हजारों लोग मारे गए और न जाने कितने मकान तबाहो बरबाद हो गए! केदारनाथ नामक तीर्थस्थान में सारे मकान ध्वस्त हो गए मगर केदारनाथ मंदिर बचा रह गया।

मुझे इससे कोई मतलब नहीं है कि आप ईश्वर और धर्म पर विश्वास रखते हैं, आपकी आस्था आपको मुबारक, आप रोज़ प्रार्थना करें, आराधना करें या तीर्थ यात्रा करें-मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन मैं आपको एक मित्रतापूर्ण सलाह देना चाहता हूँ कि इस तरह की बात न कहें कि ‘ईश्वर का घर ध्वस्त नहीं किया जा सकता’ क्योंकि उससे आप असंवेदनशील नज़र आते हैं और ईमानदारी से कहा जाए तो, मूर्ख भी!

अगर वास्तव में आप विश्वास करते हैं कि धरती पर घटित होने वाला सब कुछ ईश्वर ही करता है तो इसका अर्थ यह हुआ कि वह भूकंप लेकर आया, वह बाढ़ लेकर आया, हजारों लोगों को मौत के मुँह में धकेला, लाखों-करोड़ों लोगों को कष्ट उठाने पर मजबूर किया-और किसी स्वार्थी व्यक्ति की तरह अपना घर बचा लिया? और फिर उन सैकड़ों मंदिरों के बारे में आपका क्या कहना है, जो पूरी तरह नेस्तनाबूद हो गए और जिनमें आराधना करने वाले सामान्य लोग और पुरोहित मारे गए? सैकड़ों नहीं, हजारों देवी-देवता, उनकी छोटी-छोटी मूर्तियाँ, जो ईश्वर के रूप में पूजी जाती थीं, टूट-फूट गईं, ध्वस्त हो गईं, मलबे में समा गईं! या फिर, क्या उनके लिए कोई दूसरा ईश्वर जिम्मेदार है? कमजोर ईश्वर, जो अपने घर की रक्षा नहीं कर सके?

लेकिन नहीं, आपके लिए यह बहुत ही शुभसूचक (मंगलकारी) घटना है कि मंदिर भूकंप के बावजूद खड़ा है-इसलिए नहीं कि हो सकता है, उसकी नींव मजबूत रही हो या उसका निर्माण बेहतर ढंग से किया गया हो, जैसा कि किया जाना संभव था क्योंकि उनके पास अधिक आर्थिक संसाधन होते हैं? निश्चित ही, उन गरीब ग्रामीणों से बहुत ज़्यादा, जिनके घर ध्वस्त हो गए और जो थोड़ी बहुत सरकारी या अंतर्राष्ट्रीय मदद का अब भी इंतज़ार कर रहे हैं!

मेरे खयाल से अगर आप ऐसी बातें कहते हैं तो अपनी ही आस्थाओं का मज़ाक उड़ा रहे होते हैं। अगर ईश्वर का अस्तित्व मान भी लिया जाए तो क्यों आपके ईश्वर के पास इतनी शक्ति नहीं है कि अपने सभी घरों की रक्षा कर ले, नेपाल के सभी मंदिरों को ध्वस्त होने से बचा ले? और इसके बाद भी यह प्रश्न बरकरार रहता है: उसने इन लोगों पर इतनी बड़ी आफत क्यों ढाई? उन्हें इतने कष्ट उठाने के लिए मजबूर क्यों किया? और इस प्रश्न का उत्तर देते हुए ‘कर्म सिद्धान्त’ का तर्क इस्तेमाल न करें-मैं पहले ही इस हास्यास्पद विचार पर लिख चुका हूँ! जी नहीं, मेरे विचार से ऐसा कोई ईश्वर नहीं है जो भूकंप लाता है और फिर सिर्फ एक इमारत को बचा लेता है क्योंकि उसके मुताबिक वह महत्वपूर्ण है!

लेकिन जब कि हम इस विषय पर बात कर रहे हैं, मैंने यह भी सुना है कि वहाँ एक वेश्यालय भी था, और उस पर भी एक खरौंच तक नहीं आई… अब आप इस पर जो चाहे, सोचते रहें!

जब ईश्वर अपने सबसे गरीब श्रद्धालुओं की कोई मदद नहीं करता – हमारे स्कूल के बच्चे – 11 अप्रैल 2014

पिछले हफ्ते मैंने आपका परिचय वैशाखी और उसकी बहन, पल्लवी से करवाया था। मैंने बताया था कि वे लोग पश्चिम बंगाल की एक महिला के घर में रहते हैं। जब ये लड़कियां हमारे स्कूल आने लगीं तो वह महिला भी अपने बेटे को भर्ती कराने हमारे स्कूल आ गई। लड़के का नाम सुदीप है और वह 12 साल का है।

सुदीप के माता-पिता भी उसी धंधे में हैं, जिसमें उनके किराएदार हैं: वे भी आसपास के मंदिरों और आश्रमों में कीर्तन आदि करते हैं। जब कि सुदीप की माँ के पास 20 डॉलर यानी लगभग 1200 रुपए प्रतिमाह वेतन वाला पक्का रोज़गार है, उसके पति को कभी-कभार ही मौका मिल पाता है कि वह कुछ कमा सके। उनके लिए यह जानना मुश्किल होता है कि किसी माह में उनकी कितनी आमदनी होगी और इसीलिए उन्होंने अपने मकान के दो कमरे किराए पर उठा रखे हैं, जिससे थोड़ी बहुत नियमित आमदनी होती रहे।

इस घर में रहते हुए उन्हें एक साल हो गए हैं। उन्होंने यह घर थोड़ी-बहुत अपनी जमा-पूँजी और रिश्तेदारों से ऋण लेकर खरीदा था और इस ऋण का बोझ अब भी उन पर बना हुआ है।

जब हमने सुदीप से पूछा कि स्कूल में या आस-पड़ोस में उसके कोई मित्र हैं या नहीं तो उसने कहा कि नहीं हैं, उसकी माँ ने उसे दोस्त बनाने के लिए मना किया है। जब हम आश्चर्य से माँ की तरफ देखते हैं तो हमें यह स्पष्टीकरण प्राप्त होता है: 'फिर वह अपने दोस्तों के घर जाना चाहेगा और पता नहीं वे लोग कैसे हों!' इस तरह वे अपने बच्चे को स्कूल में या घर से बाहर कोई भी सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करने से मना करते हैं, जिससे वह किसी गलत सोहबत में न पड़े। यह एक सहज और भोले-भाले दिमाग में आया हुआ समाधान है। वे यह नहीं समझ पाते कि जीवन भर के लिए ये सामाजिक सम्बन्ध कितने महत्वपूर्ण हो सकते हैं!

हालाँकि उसके माता-पिता इस बात को ज्यादा पसंद नहीं करते मगर सुदीप अक्सर अपने पिता की साइकिल लेकर घर के आसपास चलाता रहता है। कभी-कभी साइकिल चलाने की ख़ुशी में कुछ दूर भी निकल जाता है और कभी-कभी तो वहां तक भी, जहाँ हमारे स्कूल के दूसरे बच्चे रहते हैं। बच्चों को आप मित्र बनाने से नहीं रोक सकते!

ये लोग काफी धार्मिक नज़र आते हैं। वे मंदिरों में ही काम करते हैं और इस साल जब वार्षिक परीक्षाएं शुरू हुईं तो सुदीप की माँ कृष्ण भगवान की एक मूर्ति लेकर स्कूल आ गई, जिससे उनका लाड़ला बेटा परीक्षा शुरू होने से ठीक पहले एक बार और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सके।

बड़ी श्रद्धा-भक्ति और परिश्रम के साथ सालों-साल भजन गाकर और ईश्वर की स्तुति करने के बावजूद इस परिवार की हालत में ज़रा भी सुधार नहीं हुआ है। वे सब मिलकर अभी भी इतना नहीं कमा पाते कि घर की दीवारों पर प्लास्टर करवा सकें। घर में रखा पानी का कूलर टूट चूका है और उसकी जगह एक छोटे से पंखे ने ले ली है। और तो और, देवी यमुना हर साल अपनी बाढ़ से उनके घर का छोटा सा बगीचा तहस-नहस कर देती है। शायद वे अब भी इंतजार कर रहे हैं कि कभी न कभी ईश्वर की कृपा उन पर होगी।

जबकि ईश्वर उन पर खास मेहरबान नज़र नहीं आता, हम हर संभव कोशिश कर रहे हैं कि सुदीप की थोड़ी-बहुत मदद कर सकें, जिससे उसका भविष्य अच्छा हो सके। अभी वह हमारे स्कूल की दूसरी कक्षा में पढ़ रहा है और वह एक अच्छा विद्यार्थी है। शिक्षक उसके शांत स्वभाव और कक्षा में उसकी एकाग्रता से बहुत खुश और प्रभावित हैं।

अगर आप सुदीप जैसे बच्चों की मदद करना चाहते हैं तो किसी बच्चे को प्रायोजित कर सकते हैं या स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन का खर्च वहन कर सकते हैं। आइये, हम सब मिलकर सुदीप जैसे बच्चों की मदद करें, जिससे उनका भविष्य अच्छा हो सके।

श्रद्धा से नहीं, पैसे के लिए मंत्र-जाप और कीर्तन – 7 अप्रैल 2014

हमारे स्कूल में चल रही बच्चों की नई भर्तियाँ पूरी हो चुकी हैं। हमने यह प्रक्रिया 1 अप्रैल से शुरू की थी और दूसरे ही दिन हमारे पास इतने बच्चे आ गए कि हमारी नई लोअर केजी की कक्षा और ऊंची कक्षाओं की कुछ अतिरिक्त सीटें भर गईं। उसके बाद हमें प्रतीक्षा सूची बनानी पड़ी और अभिभावकों से कहना पड़ा कि अब कोई जगह उपलब्ध नहीं है। पहले दिन से ही रमोना और पूर्णेंदु भर्ती के लिए आए नए बच्चों के परिवारों के रहन-सहन के स्तर और उनकी आर्थिक स्थिति की जानकारी लेने उनके घरों की तरफ निकल पड़े हैं। स्वाभाविक ही उन्हें रोज़ एक से एक रोचक अनुभव प्राप्त होते हैं, जिनमें से कुछ मैं आज और अगले कुछ दिनों तक आपके साथ साझा करता रहूँगा।

हमारे स्कूल के किसी भी बच्चे के अभिभावक ज़्यादा नहीं कमाते। वे किसी बड़े सरकारी ओहदे पर नहीं होते, अक्सर उनकी कोई नियमित और तयशुदा आमदनी नहीं होती और वे अपने मासिक खर्चों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं। मज़ेदार बात यह है कि इसके लिए जो सबसे कड़ा संघर्ष कर रहे होते हैं वे मुख्य रूप से धार्मिक कामों में लगे हुए परिवार हैं!

जब उनसे पूछा जाता है कि वे अपने जीवन-यापन के लिए क्या करते हैं तो उनका उत्तर होता है कि वे आसपास के मंदिरों में पुजारी का काम करते हैं या यह कि वे कीर्तन करते हैं या मंत्र-जाप करते हैं। जो लोगों के घरों में जाकर धार्मिक कर्मकांड करवाते हैं या जो पुजारियों की मदद करते हैं, उनके लिए पूजा-सामग्रियाँ लेकर आते हैं, वे नहीं जानते कि उन्हें अगला काम कब उपलब्ध होगा। उनके लिए काम की उपलब्धता अनियमित है और खासकर इस शहर में ठीक यही काम करने वाले लोग हजारों की संख्या में हैं। वे यह काम सिर्फ इसलिए करते हैं कि वह बड़ा आसान होता है और अच्छा खासा चन्दा देने वाले तीर्थयात्री और धार्मिक लोग भी सहजता से उपलब्ध होते हैं। ऐसे धार्मिक लोग उपहार स्वरूप टीवी या फ्रिज भी दे देने में गुरेज नहीं करते, जैसा कि हमने कुछ घरों में देखा है।

जो लोग मंदिरों या आश्रमों में मन्त्र-जाप करके या कीर्तन करके पैसा कमाते हैं वे अक्सर नियमित कमाई कर पाते हैं। वे रोज़ नियमित रूप से, उदाहरण के लिए, सुबह सात से आठ बजे तक उसी मंदिर में या उसी आश्रम में जाकर भजन गाते हैं। रोज़ एक घंटे कीर्तन करने, भजन गाने या मंत्र-जाप करने पर वे लगभग 13 डॉलर यानी लगभग 800 रुपए प्रति माह कमा पाते हैं।

जब आप तीर्थयात्री या पर्यटक के रूप में हमारे शहर आएँ और मंदिर में बैठे लोगों को सारा दिन समर्पित भक्तिभाव से भजन गाते या ईश्वर की स्तुति करते हुए देखकर प्रभावित होने लगें तो एक मिनट रुकिए, अब आपको उसके पीछे छिपी वास्तविकता का पता चल गया है: भक्तिभाव नहीं, पैसा है इसके पीछे। जीविका कमाने की मजबूरी! अपने काम के प्रति वास्तविक प्रेम का पता आपको तब लगेगा जब इन लोगों द्वारा बेहद बेसुरी, नीरस और उबाऊ आवाज़ में गाए जाने वाले कीर्तन चिंघाड़ते लाउड-स्पीकरों के जरिये आपके कानों तक पहुंचेंगे।

किसी ने यह तर्क दिया कि यह तो अच्छी बात है कि धर्म के कारण उन्हें रोजगार मिला हुआ है। मुझे लगता है कि यह मानव-संसाधन का दुरुपयोग है। मैं जिन लोगों के बारे में बात कर रहा हूँ वे खासे हट्टे-कट्टे, वयस्क युवा हैं लेकिन इस देश के विकास में योगदान देने की जगह दिन भर भजन गाते हुए बैठे रहते हैं! इस तरह वे खुद अपने लिए भी कुछ नहीं करते! ऐसा करते हुए वे ध्यान नहीं कर रहे होते और न ही आंतरिक आत्मशांति पाते हैं-वे वहाँ सिर्फ बैठे रहते हैं क्योंकि उन्हें उसके थोड़े-बहुत पैसे मिल जाते हैं और यह पैसा कमाने का आसान जरिया है!

ऐसे बहुत से अभिभावक हैं जो पैसा कमाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, एक निर्माण स्थल से दूसरे तक ईंटें और सीमेंट ढोते हैं। दिन के आखिर में वे जैसे भवन का हिस्सा ही प्रतीत होने लगते हैं। धर्म उन दूसरे अभिभावकों को माइक्रोफोन पर गाते रहने को मजबूर करता है, अपनी कर्कश आवाज़ से आस-पड़ोस के लोगों को परेशान करता है और राह चलते पर्यटकों और श्रद्धालुओं को इस भ्रम में रखता है कि ये गाने वाले ईश्वर को समर्पित महान भक्त हैं।

नहीं, पहले ही मैं धर्म का विशेष प्रशंसक नहीं हूँ-और जब मैं यह सब सोचता हूँ तो धर्म के बारे में मेरे विचार और दृढ़ हो जाते हैं!

गुरु से दीक्षा लेने से मना करना यानी मुसीबत मोल लेना!- 21 जुलाई 2013

जब मेरे जर्मन मित्र, जिनके भारतीय विवाह के बारे में मैं पिछले हफ्ते लिख चुका हूँ, 2005 में भारत आए तो उन्हें एक और अनुभव हुआ, जो बड़ा मज़ेदार है और जो भारत आने वाले और भी लोगों के साथ घटित हो सकता है। चलिए, मैं उसके बारे में विस्तार से बताता हूँ।

जब वे हमारे आश्रम आए तो पेशोपेश में पड़ गए। हाल ही में हमने दूसरी मंज़िल का निर्माण करवाया था और कुछ काम अभी भी चल ही रहा था। इमारत का काम अभी जारी था, आने जाने के रास्ते पर मुरुम पड़ी थी और हालांकि दीवारों पर प्लास्टर चढ़ाया जा चुका था, उनमें पुताई का काम होना बाकी था।

उपलब्ध कमरों में से चुनकर उन्हें सबसे बढ़िया कमरा दिया गया था और हालांकि उस वक़्त वह साधारण सा कमरा था, वे वहाँ आराम से रहने लगे। उन्हें वृन्दावन में ही एक पुजारी का भी निमंत्रण था। वह पुजारी पुरानी परंपरा का संगीतकार था, जिसमें हमारे मित्रों की रुचि थी। यह निमंत्रण पाकर वे बहुत सम्मानित महसूस कर रहे थे और उन्होंने मेरे भाई से कहा कि वे उसके यहाँ जाना चाहते हैं। लेकिन यह मुलाक़ात उनकी अपेक्षा से थोड़ा भिन्न रही!

वे वहाँ गए तो उन्हें पता चला कि वह व्यक्ति, संगीतकार, जिससे वे मिलना चाहते थे, घर पर नहीं था। और उनकी अपेक्षा के विपरीत वहाँ संगीत का कोई कार्यक्रम होने वाला है, इसकी कोई हलचल भी नहीं थी। लेकिन पुजारी के परिवार ने उनका स्वागत किया और उनसे उनके यहाँ रुकने का अनुरोध किया। घर की महिला ने उनके लिए भोजन तैयार किया-खास भारतीय खाना और स्वाभाविक ही, बहुत तीखा-और भोजन के दौरान बार-बार अपने द्वारा बनाए गए व्यंजनों को दोबारा लेने का आग्रह करती रहीं। मित्र नम्र थे और जो भी परोसा जाता, खाते रहे और खाना कुछ ज़्यादा ही हो गया। उन्होंने मन में यह भी सोचा कि इन्हें खुश करने के लिए हमने जितना भी संभव था, सब कुछ किया, लेकिन भीतर से नजदीकी का एहसास गायब है। उन्हें महसूस हो रहा था, जैसे वह परिवार उनसे कुछ अपेक्षा कर रहा है और जल्द ही पता भी चल गया कि वे लोग उनसे क्या चाहते हैं: उनकी अपेक्षा थी कि हमारे जर्मन मित्र उनसे दीक्षा ग्रहण कर लें!

सौभाग्य से, इतने अच्छे स्वागत से भी वे इतने प्रभावित नहीं थे कि दीक्षा ही ले लेते! मेरा मित्र पहले भी भारत आ चुका था और इस तरह के अनुभवों से गुज़र चुका था और जानता था कि दीक्षा का अर्थ यह है कि आप गुरु की सेवा करते रहें। गुरु के ज्ञानपूर्ण वचनों पर सिर हिलाते रहें, उसकी सलाह मानें और अपनी आमदनी का एक हिस्सा गुरु के चरणों में अर्पित करें। दीक्षा कई जिम्मेदारियों को जन्म देती हैं और उसके गंभीर परिणाम भी हो सकते हैं। उन्होंने भरसक नम्रता के साथ उन्हें मना करने की कोशिश की, लेकिन यह भी महसूस किया कि उनके इंकार से माहौल अचानक बदला-बदला नज़र आने लगा है। मेजबान लगभग ज़बरदस्ती पर उतर आए थे और साफ दिखाई देता था कि वे गुस्से में हैं। लेकिन जल्द ही वे समझ गए कि वे हमारे मित्रों का निर्णय बदल नहीं सकते और यह सोचकर उनके मुंह लटक गए।

हमारे मेहमानों को उनका कमरा दिखाया गया-एक बहुत साधारण कमरे में सोने के लिए एक तखत रखा था मगर गद्दा नदारद था। कमरे में मच्छर भिनभिना रहे थे। कमरा दिखाकर उन्होंने मेहमानों से कहा कि वे शाम के पूजा समारोह में आएँ और उसके बाद वहीं से 10 किलोमीटर की पैदल परिक्रमा के लिए भी निकलना होगा। इस परिस्थिति से हमारे मेहमान, स्वाभाविक ही, बहुत खुश नहीं थे।

तो वे इस हालत में मंदिर में बैठे हुए थे, आज्ञाकारी ढंग से, शाम का आयोजन देखते हुए और सोचते हुए कि इस झमेले से कैसे मुक्त हुआ जाए। वे वहाँ एक पल भी रुकना नहीं चाहते थे मगर उन्हें डर था कि उनका इस तरह चले जाना, एक अशिष्ट व्यवहार होगा और उनके मेजबान को बुरा लगेगा!

इसी समय किसी भूत की तरह मंदिर में पूर्णेन्दु अवतरित हुए, शुभ्र सफ़ेद कपड़ों में, काला चश्मा लगाए! वह उनके पास जाकर बैठ गया और उनसे पूछा कि "क्या हाल-चाल है?" प्रश्न सुनते ही सारी कटुता और बेचैनी उनके मुंह से पूरी ताकत के साथ बाहर निकल आई। विस्मित, पूर्णेन्दु ने उनकी ओर देखा और कहा, "अगर आप लोग यहाँ नहीं रहना चाहते तो बिल्कुल मत रहिए। आश्रम वापस चले चलिए!"

पूर्णेन्दु ने पुजारी को बड़ी नम्रता के साथ सारी बात विस्तार से समझाई और इस तरह वे आश्रम वापस आ गए। उसके बाद उन मित्रों को न तो अनपुती दीवारें नज़र आईं और न ही निर्माणाधीन इमारत का रेत-गारा और दिया गया कमरा भी उन्हें अपने बेडरूम की तरह आरामदेह और पुरसुकून महसूस हुआ। उन्हें लगा जैसे वे स्वर्ग में आ गए हों।

इस घटना से यही सीख मिलती है कि आपको अपनी भावनाओं का अनुसरण करना चाहिए, वही करना चाहिए जिससे आपको खुशी मिले-और याद रखें, भारत आपके सामने ऐसे रोमांचक अवसर अक्सर प्रस्तुत करता रहता है!

आस्था और अंधविश्वास में कोई फर्क नहीं – अपनी आस्था पर विश्वास करना बंद करें! 5 जुलाई 2013

कल वाले विषय पर बहुत से धार्मिक व्यक्ति मुझसे कहते हैं कि मैं इन दो बातों को गड्ड-मड्ड कर रहा हूँ: आस्था और अंधविश्वास। मुझसे कहा जाता है कि मैं धार्मिक आस्था को अंधविश्वास न कहूँ क्योंकि दोनों में बहुत अंतर हैं और मुझे इन बातों को बारीकी से समझने के लिए दोनों के बीच के अंतर को समझना चाहिए। अपने ब्लॉग की आज की प्रविष्टि में मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैं 'अंधविश्वास' शब्द को लेकर बिल्कुल गफलत में नहीं हूँ और न ही इस आस्था और अंधविश्वास के बीच कोई घालमेल करने की मेरी मंशा है। मैं इस बात को समझ रहा हूँ जो आप मुझसे कह रहे हैं लेकिन मैं आपसे यह निवेदन करना चाहता हूँ कि मेरे विचार में धर्म और अंधविश्वास के बारे में आपके सभी विचार एक ही श्रेणी में रखे जा सकते हैं। कैसे, मैं समझाने की कोशिश करता हूँ।

यह तो स्पष्ट ही है कि ऐसी बातें सिर्फ धार्मिक और ईश्वर पर विश्वास करने वाले लोग ही किया करते हैं। क्यों? इसलिए कि उन्हें अंधविश्वासी समझा जाना अच्छा नहीं लगता! जब मैं कहता हूँ कि धार्मिक कृत्य दरअसल में अंधविश्वास ही हैं तो उन्हें बुरा लग जाता है। उनके अनुसार भगवान के चरणों में फूल चढ़ाना आस्था है जब कि दुष्ट शक्तियों से या बुरी नज़र से बचने के लिए दरवाजे पर नींबू और मिर्ची टांगना अंधविश्वास है! मेरी नज़र में, दोनों में कोई बहुत ज़्यादा अंतर नहीं है- दोनों ही बातें इस विश्वास पर आधारित हैं कि कोई न कोई अलौकिक शक्ति मौजूद है जो आपके इन कामों पर अपनी प्रतिक्रिया देती हैं। आपको उस पर विश्वास करने के लिए कहा गया है, जब कि उसका कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। आपको किसी की पूजा करनी है जिसके अस्तित्व के बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। इसे आप आस्था कहते हैं और मैं कपोल-कल्पित कथा कहता हूँ।

इसी संदर्भ में मुझसे एक बार किसी ने पूछा कि क्या मंदिर जाना भी अंधविश्वास ही है। मैंने कहा कि आप स्वयं इसका उत्तर दे सकते हैं! मंदिर क्या है? वह एक घर या कमरे जैसा होता है जिसकी दीवारें सोने और चाँदी से मढ़ी होती हैं और बीचोंबीच पूजाघर होता है जहां एक सिंहासन पर पत्थर या सोने या चाँदी के भगवान विराजमान होते हैं। आप वहाँ जाते हैं और उस मूर्ति के सामने कुछ खाने का सामान रखते हैं और घंटी बजाते हैं। आप यह काम जीवन भर करते रहते हैं और आप अच्छी तरह जानते हैं कि खाने के सामान को आज तक कभी भी भगवान द्वारा छूआ तक नहीं गया। भोजन कम कभी नहीं हुआ। फिर भी आप दावा करते हैं कि भगवान हर बार उसे खाते हैं और वह आपके लिए पवित्र प्रसाद हो जाता हैं जिसे आप श्रद्धापूर्वक स्वयं खाते हैं और लोगों में बांटते हैं कि इससे आपका कुछ भला होगा। अगर आपने उसे ईश्वर को नहीं चढ़ाया होता तो वह भोजन उतना अच्छा नहीं होता। क्या यह सब अंधविश्वास नहीं है?

मंदिर जाने का विचार ही मूलतः अंधविश्वास से परिपूर्ण है। आपका धर्म आपसे कहता है कि ईश्वर हर जगह निवास करता है। अगर यह सच है तो उससे मिलने के लिए आपको मनुष्य द्वारा निर्मित किसी इमारत तक क्यों जाना पड़ता है? हिन्दू धर्म के संदर्भ में कहें तो ईश्वर को उसे नहलाने-धुलाने, कपड़े पहनाने, खाना खिलाने और यहाँ तक कि उसकी रक्षा करने के लिए नौकरों की ज़रूरत क्यों पड़ती है? अगर वे नौकर उसकी ठीक तरह से देखभाल न करें, अगर उनके हाथ गंदे हों या अगर वे उसकी सेवा में कोई चूक कर दें तो समझा जाता है कि यह उनके लिए अशुभ होगा। क्या यह भी अंधविश्वास नहीं है?

यह सब आपके धर्म का हिस्सा है लेकिन मैंने आपको बताया कि कैसे यह अंधविश्वास भी है। मैं एक और बात आपको बताता हूँ: आपका धर्म आपको मेरे जैसे लोगों से वाद-विवाद करने से रोकता भी है। अपने धर्मग्रंथ पढ़ें, वहाँ लिखा हुआ है! क्यों? क्योंकि आप, वैसे भी, कुछ सिद्ध नहीं कर पाएंगे। लेकिन धर्म पर विश्वास करने वाले इससे कोई सबक नहीं लेते। वे तर्क करते हैं और अपने प्रयास में दो-तीन बार असफल हो जाने के बाद पैर पीछे खींच लेते हैं और गोलमोल सी कुछ बातें कहते हैं, "ईश्वर की लीला अपरंपार है, रहस्यमय है", या "दिल में प्रेम हो तो भ्रम दूर हो जाते हैं और सब ठीक नज़र आता है!"

नहीं, वे कुछ नहीं सीखेंगे और यह भी अंधविश्वास का ही एक और चिह्न हैं। क्योंकि कोई प्रमाण नहीं है, इसलिए आपको विश्वास ही करना पड़ता है, भले ही वह तर्कहीन और अक्सर गलत सिद्ध होने वाली बात ही क्यों न हो!

इस चर्चा के बाद आस्था और अंधविश्वास उतने भिन्न दिखाई नहीं देते! आपका क्या विचार है?