आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए फंदा: अस्तित्वहीन की खोज का अंतहीन सिलसिला – 30 जुलाई 2014

कल मैंने इस बात की ओर इशारा किया था कि गुरु और धर्म लोगों को आध्यात्मिक साधक या जिज्ञासु बनाने के ज़िम्मेदार हैं। मेरा विश्वास है कि ऐसा जानबूझकर किया जाता है- जिससे वे ज़्यादा से ज़्यादा शक्तिशाली हो सकें!

मैं आपको बता चुका हूँ कि इसे किस तरह अंजाम दिया जाता है: मान लीजिए कोई वास्तव में अपने जीवन से असंतुष्ट है। उसका परिवार, उसका काम-धंधा, उसकी आर्थिक स्थिति या उसका व्यक्तिगत अथवा यौन जीवन, कुछ न कुछ होता है जो ठीक नहीं चल रहा होता। उसे एहसास होता है कि कोई चीज़ है जो उसके पास नहीं है मगर क्या, वह समझ नहीं पाता। बेचैन होकर वह उसकी खोज में, उसे किसी भी तरह प्राप्त करने की कोशिश में लग जाता है। और जो उसे मिलता है वह होता है इस खोज में उसकी सहायता का जबरदस्त आश्वासन-आध्यात्मिक गुरुओं की ओर से, साधु-संतों और स्वामियों की ओर से और सीधे-सीधे धर्मों (धर्मग्रंथों) की ओर से!

अब यह व्यक्ति अपने आपको ‘आध्यात्मिक साधक या जिज्ञासु या अन्वेषक कहता है और समझता है कि निश्चय ही उसने कुछ न कुछ खो दिया है। उसे यह विश्वास दिलाया जाता है कि उसे उनका अनुसरण करना चाहिए जो कथित रूप से, यह जानते हैं कि उसने क्या खोया है। जो उसे रास्ता दिखा सकता है। लेकिन वह नहीं समझता कि उसकी तलाश कभी ख़त्म नहीं होने वाली है!

साधु-संत, गुरु और धर्म (धर्मग्रन्थ), ये सब यही सिखाते हैं कि कोई न कोई ऐसी रहस्यमय चीज़ मौजूद है जिसे आप नहीं समझ सकते, जज़्ब नहीं कर सकते और यह भी कि उसे आप सिर्फ उन्हीं के ज़रिए जान सकते हैं, प्राप्त कर सकते हैं। आपके पास अब यही काम रह जाता है कि उसे खोजें लेकिन आप उस पहेली को कभी भी हल नहीं कर सकते, उस भूलभुलैया से किसी भी हालत में बाहर नहीं निकल सकते।

सिर्फ आपके चलते, जो अपने आपको आध्यात्मिक साधक मानता है, उनका धंधा-पानी चल सकता है। वे तभी सफल ही सकते हैं जब आप जैसे अधिक से अधिक लोगों को अपने साथ जोड़ सकें। उन्हें इस विश्वास का भुलावा देकर कि वे आपको कुछ दे सकते हैं, कि वे आपको सुख-शांति की ओर ले जाने वाला सही रास्ता दिखा सकते हैं। वास्तव में वे चाहते ही नहीं हैं कि आप उस चीज़ को पा सकें, जिसकी खोज में आप लगे हुए हैं। इसलिए आप एक तरह की माया, मृगतृष्णा के पीछे भागते रह जाते हैं। एक प्रायोजित अयथार्थ, असार, बनावटी चीज़ के पीछे। परमानंद के मायाजाल के पीछे, जिसका वास्तविक आनंद से कोई संबंध नहीं है।

आपका दुख और अवसाद ईश्वर के खो जाने से नहीं है। आप उनके द्वारा प्रस्तावित और प्रदान की गई काल्पनिक चीजों से कभी भी संतुष्ट नहीं हो सकते। क्योंकि आप अपने भौतिक जीवन की किसी बात से नाखुश हैं। आप प्रेम खो बैठे हैं, या सम्मान या प्रशंसा, रुपया-पैसा या सफलता, किसी दोस्त या भावनात्मक सहारे को खो बैठे हैं।

इसका संबंध किसी न किसी सांसारिक कमी से है-और इसमें मैं प्रेम को भी शामिल करता हूँ-जिसने आपको इस खोज की ओर प्रवृत्त किया है। और एक बार फिर मैं यह बात दोहराता हूँ: खोजना बंद करें और आपको मिलेगा। ऐसे किसी व्यक्ति के चंगुल में न फँसें, जिसका धंधा ही आध्यात्मिक जिज्ञासुओं को उनकी समस्याओं के मायावी और काल्पनिक समाधान की ओर उद्यत करना है!

अगर पाना चाहते हैं तो खोजना बंद करें! 29 जुलाई 2014

कल मैंने आपको एक व्यक्ति के बारे में बताया था जो मेरे व्यक्तिगत-सत्र में आया था और जीवन के उद्देश्य के बारे में पूछ रहा था। कई लोग मुझसे ऐसे दार्शनिक प्रश्न पूछते रहते हैं और लगभग हमेशा ही वे मुझसे कहते हैं: ‘मैं जिज्ञासु अथवा साधक हूँ’। इस जानकारी के बाद जो भी वे पूछते हैं, वह उनका अगला कदम होता है। लेकिन सबसे पहले मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि मेरे विचार से यह दृष्टिकोण ही गलत है!

लोग मुझसे कहते हैं, वे किसी की खोज में लगे हुए हैं। वे यह बात कुछ इस तरह कहते हैं जैसे किसी चीज़ का वर्णन कर रहे हों, अपनी परिभाषा बता रहे हों, किसी ज़ाहिर सी बात पर उँगली रख रहे हों, अपने आप को किसी खाँचे में ढाल रहे हों। लेकिन मुझे बताइए, आप यह खोज किसलिए कर रहे हैं? ईश्वर के लिए?

अगर आप कुछ खोज रहे हैं तो इसका अर्थ यह है कि कुछ खो गया है। कुछ अधूरा है, आपकी कोई चीज़ गुम हो गई है, आप कुछ भूल रहे हैं और आपने ऐसा कुछ खो दिया है जिसे अब आप ढूंढ़ रहे हैं। अगर आपको ऐसा महसूस हो रहा है कि आप ईश्वर को खोज रहे हैं, किसी उच्च शक्ति को या हर जगह मौजूद कोई ऊर्जा, जिसकी आप कल्पना कर रहे हैं, तो मुझे आपसे एक बात पूछनी है: क्या ईश्वर वास्तव में गुम हो गया है? अगर वह खो सकता है तो क्या आप उसे कोई उच्च शक्ति मान सकते हैं? वह अपना इतना भी ख्याल नहीं रख सकता कि न गुमे! नहीं, ऐसा तो नहीं हो सकता।

इसका जवाब देते हुए लोग मुझसे कहते हैं कि दरअसल ईश्वर नहीं गुमा है, वे स्वयं गुम गए हैं।

एक और विचलन, एक दूसरा ही खयाल। अब यह कि आपने ध्यान नहीं दिया और ईश्वर गुम गया। क्या अब आपको नहीं लगता कि काश कोई गुरु होता, जिसका हम अनुसरण कर पाते, एक गुरु या धर्म जैसी कोई संस्था, कोई संगठन, जिसकी सहायता से आप अपना रास्ता खोज सकते? देखा, कितनी खूबसूरती से आपको इस दलदल में खींच लिया गया है!

अगर इस तरह खोजते रहे तो आप जीवन भर खोजते ही रहेंगे और किसी हालत में वह नहीं मिल पाएगा जिसकी खोज में आप लगे हुए हैं! आप हमेशा-हमेशा के लिए एक साधक या किसी के अनुयायी ही बने रहेंगे।

मैंने आज तक नहीं सुना कि किसी ने कहा हो: ‘मैं जिज्ञासु था और अब मैंने वह ढूंढ़ लिया है, जिसकी तलाश मैं कर रहा था!’

आपको यह खोज बंद करनी होगी। अन्यथा आपका सारा जीवन इसी खोजबीन में मर-खप जाएगा। आप अपने जीवन से असंतुष्ट हैं और यही कारण है कि आप लगातार इस खोज की आवश्यकता महसूस करते हैं! एक बार यदि आप इस बात को समझ लें और अपने सामान्य जीवन की ओर लौट सकें तो आप देख सकेंगे कि आपके पास कितना कुछ उपलब्ध है। इसलिए यह तलाश करने की कोशिश करें कि अपने जीवन का कौन सा हिस्सा, अपने जीवन की कौन सी बात आपको दुखी करती है। ठीक-ठीक कौन सी चीज़ है जो आपके पास नहीं है, जिसकी आप आवश्यकता महसूस करते हैं? निश्चय ही, इस बात का मैं आपको भरोसा दिला सकता हूँ कि आपको पता चलेगा, वह चीज़ ईश्वर नहीं है, न ही वह कोई रहस्यमय वस्तु है।

आपको अपने वास्तविक जीवन में तृप्ति और संतोष की खोज करनी चाहिए न कि किसी काल्पनिक, अवास्तविक और मायावी संसार की खोज में अपना जीवन बरबाद करना चाहिए! कल्पनाएँ आपके मन में संदेह पैदा करती हैं-आपका वास्तविक जीवन ही आपको वास्तविक ख़ुशी प्रदान कर सकता है!

अपने आसपास के संसार का आनंद लें। जी हाँ, भौतिक संसार का, भले ही आपके आध्यात्म से ग्रसित कानों को यह कितना भी अजीब क्यों न लगे। भौतिक संसार का आनंद लेने का अर्थ है जीवन की चंचल सुन्दरता में डुबकी लगाना, उसके विभिन्न रंगों का आस्वाद लेना! अगर आप जीवन में प्रसन्न और संतुष्ट हैं तो आपके मन में किसी काल्पनिक वस्तु को खोजने, प्राप्त करने या कोई लक्ष्य हासिल करने का ख़याल तक नहीं आएगा। आपके सामने यह बात स्पष्ट हो जाएगी कि वह तो यहीं है, पहले से आपके पास मौजूद है।

प्रेम, सुख, संतोष।

खोज बंद कीजिए और ये आपको खुद ब खुद मिल जाएँगे।

सिर्फ असंतुष्ट लोग ही जीवन के मकसद के बारे में पूछते हैं – 28 जुलाई 2014

मैंने अभी हाल ही में एक व्यक्ति के साथ व्यक्तिगत सत्र किया, जिसके मन में कुछ अजीबोगरीब प्रश्न घूम रहे थे। स्वाभाविक ही, जब मेरी किसी के साथ इस तरह की बातचीत होती है तो मुझे अपने ब्लॉग का विचार आता है और आपका भी कि निश्चय ही आप लोग होते तो इस कमरे में हमारी बातचीत में शामिल होकर उसका भरपूर आनंद ले सकते थे। क्योंकि यह संभव नहीं है मैं इस ब्लॉग के माध्यम से अपनी चर्चा आप तक पहुँचाने की कोशिश करता हूँ।

जो व्यक्ति मेरे पास व्यक्तिगत सत्र हेतु आया था, उसने बताया कि कुल मिलाकर वह अपने जीवन से पूरी तरह खुश और संतुष्ट है। वह एक अवकाशप्राप्त व्यक्ति था, जिसका एक परिवार था और उसके कुछ शौक थे, जिन्हें पूरा करके वह खुशी से भर उठता था। योग उनमें से एक था। लेकिन उसने यह भी जोड़ा कि उसकी योग कक्षाओं में अधिकतर लोग अपने आपको जिज्ञासु मानते हैं और उससे पूछते हैं कि क्या "जीवन के मूलभूत प्रश्नों" के उत्तर जानने की उसे कोई जिज्ञासा नहीं होती: जैसे, मैं इस धरती पर क्यों आया हूँ? या यह कि मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?

उसने आगे कहा कि अब उसे भी यह महसूस होने लगा है कि उसे भी इन प्रश्नों का उत्तर जानना चाहिए या कम से कम इसकी खोज करने का प्रयास तो करना ही चाहिए। इस दिशा में वह विभिन्न संभावनाओं पर विचार भी कर चुका था, जिनमें से एक यह विचार था कि उसका यह जीवन उसका एक अवतार मात्र है और इस जीवन को उसे अच्छे कर्म करते हुए बिताना चाहिए, जिससे एक दिन उसे निर्वाण यानी पूर्ण मुक्ति प्राप्त हो सके। उसने मुझसे पूछा कि मैं उसके इस विचार के बारे में क्या सोचता हूँ।

मैंने जवाब दिया कि मेरा मानना यह है कि ये सारे प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं हैं। आपका अस्तित्व यहाँ और अभी है। जब तक आप यहाँ, इस दुनिया में हैं और आपके पास सभी आवश्यक सुख सुविधाएँ मौजूद हैं तो फिर इस बारे में व्यर्थ परेशान होने की आवश्यकता ही क्या है? आप स्वस्थ हैं, आपके पास पर्याप्त भोजन उपलब्ध है, आपके बहुत से यार-दोस्त और भरा-पूरा परिवार है। इसके अलावा आप कह रहे हैं कि इस वक़्त आप वास्तव में बड़े खुश हैं! तो फिर वास्तव में ऐसे प्रश्नों का क्या मतलब रह जाता है?

ये प्रश्न उन लोगों के लिए हैं बल्कि उन्हीं लोगों द्वारा पैदा किए गए हैं, जो नाखुश हैं। जो लोग उन चीजों से संतुष्ट नहीं हैं जो जीवन में उनके पास मौजूद हैं। आप इस वक़्त यहाँ हैं! इस बात पर ध्यान केन्द्रित करने की जगह, इस बात को सुनिश्चित करने की जगह कि आपके जीवन में जो कमी है उसे पूरा करने का प्रयास करें, आप उस समय के बारे में सोचते हैं जो आपकी मृत्यु के बाद आने वाला है!

कोई नहीं जानता कि आगे क्या होने वाला है और हमारी आखिरी साँस के बाद क्या होगा। लेकिन मेरे विचार से उसका कोई महत्व भी नहीं है। वास्तव में जीवन के इस पल में यह बात पूरी तरह अप्रासंगिक है।

मुझे लगता है कि सिर्फ धर्म और वे लोग, जो दूसरों के आध्यात्मिक भ्रमों से लाभ उठाते हैं, इन प्रश्नों का समर्थन और प्रचार करते हैं, इन प्रश्नों को बड़े से बड़ा बनाकर पेश करते हैं और इस तरह उसे इतना महत्वपूर्ण बना देते हैं, जितने महत्वपूर्ण वे कतई नहीं होते।

सिर्फ यहाँ और अभी खुश रहने की कोशिश कीजिए। आपका अस्तित्व है या नहीं? अगर हैं तो फिर उन बातों को, उन चीजों को खोजना शुरू मत कीजिए, जिनका अस्तित्व ही नहीं है या उन प्रश्नों से भ्रमित न होइए, जिनका वास्तव में कोई उत्तर है ही नहीं। दूसरों को आपके जीवन में भ्रम पैदा करने मत दीजिए! जो आप हैं और जो आपके पास उपलब्ध है, उसी में खुश रहिए- आपको किसी काल्पनिक या वायवीय चीज़ को खोजने की ज़रूरत नहीं है!