मेरे विचार में सेक्स क्या है? 18 जून 2014

कल मैंने आपको ग्रान कनारिया में दिये गए अपने पहले व्याख्यान के बारे में बताया था। व्याख्यान के बाद मैंने श्रोताओं द्वारा पूछे गए बहुत से प्रश्नों के उत्तर दिये और मुझे लगता है कि उनमें से कुछ आपको भी दिलचस्प लगेंगे।

एक व्यक्ति ने पूछा कि वास्तव में सेक्स क्या होता है और जानना चाहा कि मैं उसे किस तरह परिभाषित करूंगा। उसने जोड़ा कि उसके विचार में चुंबन लेना भी एक तरह का सेक्स ही है। लेकिन भारत में उसे किस तरह परिभाषित किया जाता है?

मैंने उसे समझाया कि अधिकांश मामलों में-और खासकर सेक्स के मामले में-मेरे विचार आम भारतीय विचारों से भिन्न होते हैं। भारत में सेक्स के साथ बहुत सी वर्जनाएँ जुड़ी होती हैं और मैं कभी भी वहाँ होने वाले उस तरह के दमन का समर्थन नहीं कर सकता। मैं सिर्फ वही बात करता हूँ, जिसे मैं व्यक्तिगत रूप से ठीक समझता हूँ, जिस पर मैं विश्वास करता हूँ।

और मैं यही ठीक समझता हूँ: सेक्स सिर्फ संभोग तक सीमित नहीं है! महज लिंग-प्रवेश ही सेक्स नहीं है! यह सिर्फ शरीर तक महदूद नहीं है, यह दिल का मामला भी है! सेक्स बिना शरीर के भी संभव हो सकता है! कॉफी पीते हुए साथ बिताई गई हसीन शाम भी दो उत्कट प्रेमियों को वही दिव्य सुख प्रदान कर सकती है! एक चुंबन, एक कोमल स्पर्श, साथ बिताए कुछ रोमानी पल भी संभोग जैसे ही हो सकते हैं।

अपने भाषण की शुरुआत में मैंने ब्रह्मचर्य पर भी चर्चा की थी। मैंने कहा था कि यह सबसे अधिक अप्राकृतिक विचार है-और मैंने अपने श्रोताओं से कहा कि अब सेक्स की इस परिभाषा के नज़रिये से ब्रह्मचर्य को देखें। अगर सिर्फ स्पर्श भी सेक्स है तो कोई भी कैसे ब्रह्मचारी बना रह सकता है? अपने प्रेमी के साथ बिताई गई सुहानी शाम भी सेक्स है तो कैसे आप उससे अछूते रह सकते हैं?

बिलकुल नहीं, सेक्स की इस परिभाषा के साथ-और मैं पूरी गंभीरता के साथ यह मानता हूँ कि सेक्स लिंग-प्रवेश के अतिरिक्त भी बहुत कुछ है- ब्रह्मचर्य का प्रश्न ही नहीं उठता! और अगर आप इस विचार को मानते हैं कि ब्रह्मचर्य ऊर्जा बढ़ाता है, कि संभोग न करके आप ऊर्जा बचाते हैं या यह कि ब्रह्मचर्य आपको आध्यात्मिक ज्ञान की ऊंचाइयों पर पहुंचा सकता है तो आपको सेक्स संबंधी ऊपर वर्णित सभी गतिविधियां बंद कर देनी चाहिए और देखना चाहिए कि ऐसा करने पर आपके साथ क्या हो सकता है: यह आपको बीमार कर देगा!

आप इस विषय पर सोचना क्यों नहीं छोड़ देते? प्रेम करें, अपने करीबी लोगों के साथ बिताए जाने वाले समय का पूरा पूरा आनंद उठाएँ, जिस तरह से चाहें संभोग का मज़ा लें-चाहे किसी के साथ हमबिस्तर होकर, चुंबन लेकर, गले लगाकर या सिर्फ एक-दूसरे के साथ बैठकर समय बिताते हुए!

जब मैंने एक ब्रह्मचारी महिला को अपने प्रथम यौन संबंध के बारे में बताया- 6 अक्तूबर 2013

जब मैं 2005 में आस्ट्रेलिया के सफर पर था, एक और ऐसी जगह भी मैं गया, जिसका नाम मुझे याद नहीं है लेकिन लोग याद हैं। खासकर, उनके साथ हुई बातचीत आज भी दिमाग में बनी हुई है।

मेरा एक आयोजक 65 या 70 साल का एक व्यक्ति था। वह योग गुरु था और अपने शहर में और दूसरों के स्टूडिओज में लोगों को योग सिखाता था। उसने अपने कार्यक्रमों और व्याख्यानों में आने वाले शिष्यों से और कुछ मित्रों से, जिनसे बाद में भी मैं उसके घर पर मिला, मुझे मिलवाया।

एक दिन हम तीन लोग बैठे बातें कर रहे थे: मेरा आयोजक, एक महिला, जो मेरे खयाल से उसकी मित्र थी और मैं। उन्होंने मुझे बताया कि वे दोनों एक भारतीय गुरु के शिष्य हैं, जिन्हें संयोग से, मैं जानता था। जिज्ञासावश महिला ने मुझसे पूछा कि क्या मैंने कभी यौन संबंध स्थापित किया है या कि मैं भी आजन्म ब्रह्मचारी ही हूँ।

इस यात्रा में मेरे साथ यौन विषयों को लेकर कई अजीबोगरीब वाकए पेश आए थे लेकिन मैं बहुत खुले विचारों वाला व्यक्ति हूँ-और हमेशा से रहा हूँ-और इस तरह के हादसे इसे बदल नहीं सकते थे। इसलिए मैंने उस महिला से कहा कि मैं ब्रह्मचारी नहीं हूँ और मैंने जीवन में कई बार यौनानुभव प्राप्त किया है। फिर मैंने उसे अपने उस अनुभव के बारे में बताया, जब मैं तीस साल की उम्र में, जर्मनी में एक महिला के साथ पहली बार हमबिस्तर हुआ था।

वह बड़ी दिलचस्पी के साथ सुनती रही-जैसा कि ऐसे किस्सों के साथ अक्सर होता है-लेकिन उसकी प्रतिक्रिया, शायद आपकी अपेक्षित प्रतिक्रिया से बहुत भिन्न थी। महिला ने मेरी तरफ इस तरह देखा जैसे उसे मुझ पर तरस आ रहा हो और दूसरे ही पल उसने अपनी बात कह भी दी: "अरे! कितना अच्छा होता अगर आपने उस महिला के साथ यौन संबंध नहीं बनाए होते!" उसकी आँखों में मेरे इस व्यवहार को लेकर इतनी खिन्नता थी, मानो किसी ने उस रात मेरी कोई अनमोल वस्तु चुरा ली हो! कोई बहुमूल्य आभूषण, जिसे मैंने तीस साल तक लोगों की नज़रों से बचाए रखा था, उस दिन, सिर्फ पापी शरीर के वशीभूत, खो दिया! मेरा खजाना लुट गया था, जिसे वापस पाने की अब कोई उम्मीद नहीं थी! वह समझ नहीं पा रही थी कि मुझे इस बात का पश्चात्ताप क्यों नहीं है, मैं अपने इस कुकर्म को लेकर दुखी क्यों नहीं हूँ! मैं शुरू से जान रहा था कि वह ऐसा क्यों समझ रही है।

ऐसा वह सोच रही थी क्योंकि वह एक भारतीय सन्यासी की शिष्या थी, जो ब्रह्मचर्य का उपदेश देते है, उसे बहुत बड़ा नैतिक गुण मानते हैं और जिसे हासिल करने के लिए आपको जी-जान से कोशिश करनी चाहिए। मैंने जानबूझकर उसे यह नहीं बताया कि उसके गुरु भी, निश्चय ही जैसा वह उनके बारे में सोच रही है वैसे, यानी ब्रह्मचारी, नहीं हैं। सच बात तो यह है कि मैं जानता हूँ कि उसकी कई महिला शिष्याएँ हैं, जो समझती हैं कि उन्होंने पृथ्वी पर उपलब्ध जीवन का सबसे बड़ा प्रसाद प्राप्त किया है-गुरु के साथ शारीरिक अंतरंग संबंध बनाकर। उन शिष्याओं में से एक तो हमारे आश्रम के पास ही रहती है।

मेरी कभी भी ब्रह्मचर्य में दिलचस्पी नहीं रही और मैं शुरू से विश्वास करता हूँ कि यह एक मूर्खतापूर्ण, अप्राकृतिक विचार है लेकिन अपने सामने बैठी हुई इस महिला से इस विषय में कुछ कहना मुझे न ही उचित जान पड़ा, न ही आवश्यक! वह चली गई, चलते हुए भी शायद उसे मुझ पर तरस आ रहा था। और मुझे वहीं बैठे रहना था, इस बात से अनभिज्ञ कि अब मुझे अपने मेजबान से भी, जो खुद भी उसी गुरु का शिष्य है, पूरे समय इसी विषय पर चर्चा करनी है और इस बात से भी कि उसकी पत्नी के सामने इस विषय में चर्चा करते हुए मुझे कितनी असुविधा होगी! लेकिन वह एक अलग कहानी है और एक अलग ब्लॉग की मांग करती है, जिसे मैं अगले सप्ताह, इतवार के दिन लिखूंगा।

क्या आप ध्यान साधना की अवधि से किसी की चेतना के स्तर को नाप सकते हैं? – 4 अप्रैल 2013

हमारे आश्रम में कुछ दिन पहले एक मेहमान आए थे। उनके साथ मेरी जो बातचीत हुई मैं उसे आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। हम ध्यान के बारे में बात कर रहे थे, ध्यान साधना के बारे में मेरे विचार और उसके बारे में आम तौर पर प्रचलित या प्रचारित विचार और दोनों के बीच भेद।

मैं अपने मेहमान के पास बैठा और कुछ इधर-उधर की बातचीत के बाद उन्होंने पूछा, 'अच्छा बताइए, आप दिन भर में कितना समय ध्यान में व्यतीत करते हैं?' वे मेरी तरफ जिज्ञासु आँखों से देख रहे थे और लगता था कि वे एक प्रभावशाली उत्तर की अपेक्षा कर रहे हैं। वे अनुमान लगा रहे थे कि मैं कम से कम एक घंटा तो अवश्य ही ध्यान और चिंतन-मनन में व्यतीत करता हूंगा, क्योंकि वे स्वयं काम पर जाने से पहले ऐसा करते हैं।

मैं उनकी तरफ देखकर मुस्कुराया और बताया कि क्योंकि हमारी नन्ही बच्ची अपरा हमारे साथ है, मैं उसके साथ खेलते हुए ध्यान में मग्न हो जाता करता हूँ। मेरा सारा ध्यान और चिंतन-मनन उसके साथ होना, उसके साथ समय बिताना है । उसे हँसाना, उसके साथ खेलना, किस तरह वह गेंद या दीवार पर चढ़ते छिपकली के पीछे भाग रही है यह सब देखते हुए ही मेरी ध्यान साधना हो जाती है।

मैं देख रहा था कि उनका मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया। कोशिश तो की, मगर मेरे इस ईमानदार उत्तर पर अपनी निराशा को वे छिपा नहीं पाए। मैं जानता हूँ कि उनके मन में यह विचार आ रहा है कि मैंने अपना आत्मनियंत्रण खो दिया है, कि मैं अपनी पहले अर्जित आध्यात्मिकता से बहुत नीचे आ गया हूँ। अपनी मानसिक स्थिति के बारे में मैं लापरवाह हो गया हूँ और यह भी कि उपयुक्त और धर्मसम्मत मार्ग से मैं भटक गया हूँ। अपने बारे में ऐसी बातें मैं पहले भी कई लोगों से सुन चुका था, इसलिए मुझे आश्चर्य नहीं हुआ।

ज़ाहिर है कुछ लोग मेरे विवाह या मेरी पत्नी जो एक पश्चिमी महिला हैं, को इसका दोष देने लगते हैं कि उसने इस आध्यात्मिक या धार्मिक व्यक्ति को बिगाड़ दिया और उसे उसकी आध्यात्मिक साधना से दूर कर दिया। जो ऐसा करते हैं वे नहीं जानते कि ध्यान साधना के बारे में हमेशा से मेरे विचार आम पारंपरिक विचारों से ज़रा हटकर रहे हैं। आम तौर पर यह धारणा है कि एक आध्यात्मिक व्यक्ति को विवाह नहीं करना चाहिए या बच्चे पैदा नहीं करने चाहिए।

लेकिन यह तो तब ठीक माना जाएगा जब आप ध्यान को किसी प्रतियोगिता ही तरह समझें। जो ध्यान लगाकर सबसे ज्यादा समय तक बैठ सकता है वह जीता! ऐसा व्यक्ति इस प्रतियोगिता में दूसरों से पहले ज्ञान प्राप्त कर लेगा या उसे ज्ञान प्राप्त हो चुका है! जो आधा घंटा भी एक मुद्रा में नहीं बैठ सकते वे तो अभी शुरुआत कर रहे हैं, हार चुके हैं, भौतिकवादी हैं और आध्यात्मिक व्यक्ति हैं ही नहीं!

मैं ध्यान साधना को बिल्कुल अलग दृष्टि से देखता हूँ। मैं नहीं समझता कि इसके लिए आपको पद्मासन लगाकर ही बैठना होगा, आँखें बंद करनी होंगी और गहरी सांसें ही लेनी होंगी। ध्यान का अर्थ है कि आपकी चेतना सदा वर्तमान में उपस्थित रहे, अतीत या भविष्य के बारे विचार स्थगित रखते हुए आपको बोध होना चाहिए कि आप उस क्षण क्या कर रहे हैं, कर भले ही कुछ भी रहे हों!

और ठीक यही मैं करता हूँ जब अपरा के साथ होता हूँ। आपके पास ध्यान लगाने के अलावा कोई मौका ही नहीं होता जब आप अपरा के साथ होते हैं क्योंकि वह उस क्षण आपका सारा ध्यान अपनी ओर खींचे रहती है। आपको उसे देखते रहना पड़ता है और आप वही अनुभव करते हैं जो वह अनुभव कर रही होती है। आप उसके चेहरे की ओर देखें तो आपको पता चल जाता है कि वह क्या सोच रही है। उसके साथ खेलना, बात करना, अपने विचारों की तरफ उसे आकृष्ट करना और अपनी दुनिया दिखाना; इन सब बातों का मुझ पर अद्भुत असर होता है जो ध्यान साधना ही है। इससे मुझे परम आनंद और असीम शांति का अनुभव होता है।

बहुत बड़ा साधक होने का दिखावा करने के लिए अगर मुझे दिन के कई घंटे किसी बंद कमरे के एकांत में रहना पड़े तो वह मेरी कमी महसूस करेगी और मैं भी उसे मिस करूंगा। अपनी बेटी के साथ होना ही मेरा ध्यान है और मैं प्रसन्न हूँ कि मैं उसके साथ इस तरह समय व्यतीत कर सकता हूँ और उसे और अपने आपको खुश कर पाता हूँ।