क्या सकारात्मक नज़रिया आपको फूड पॉयज़निंग से बचा सकता है? 1 नवंबर 2015

कल के स्वादिष्ट व्यंजन के बाद मैं आज भोजन संबंधी एक और ब्लॉग लिखना चाहता हूँ। ठीक-ठीक कहें तो, भारतीय भोजन संबंधी। बल्कि कहें कि भारत में सड़क के किनारे मौजूद ठेलों पर मिलने वाले भोजन के संबंध में, तो अधिक उचित होगा। सामान्य रूप से वह भोजन और उन्हें स्वास्थ्य संबंधी कारणों से ग्रहण करना उचित होगा या नहीं, इस संबंध में।

पिछले हफ्ते हमारे मेहमानों के साथ हुई चर्चा में यह प्रश्न उभरकर सामने आया था। शहर की सड़कों पर उड़ने वाली धूल को इंगित करते हुए एक महिला अतिथि ने कहा कि वह बाहर सड़क पर मौजूद ठेलों पर कभी कोई चीज़ नहीं खाएगी क्योंकि वहाँ के खाने की गुणवत्ता और साफ़-सफाई संतोषजनक नहीं होती, कि सस्ती चाट के ठेले वाले आपको उच्चस्तरीय और साफ़-सुथरा भोजन उपलब्ध नहीं करा सकते। दूसरे मेहमान का तर्क था कि यह महज एक मानसिक स्थिति है, दिमाग की व्यर्थ कुशंका है और यदि आप सकारात्मक नज़रिया रखें तो ठेलों पर खाने से आपके सामने कोई समस्या पेश नहीं आएगी!

आप जानते हैं, मैं स्वयं सकारात्मक रवैया रखने का कायल हूँ। उसके बगैर न सिर्फ बहुत सी चीज़े उससे अधिक खराब नज़र आती हैं, जितनी कि वे वास्तव में होती हैं बल्कि वे और बदतर होती चली जाती हैं। निश्चय ही सकारात्मक होना आपको स्वस्थ रहने में मदद करता है। यदि आप अत्यंत नकारात्मक हैं तो आप ज़रा-ज़रा सी बात पर कुशंकाएँ करेंगे और भयभीत होंगे। उसके चलते आपका शरीर और मन और उनकी पूरी कार्यप्रणालियाँ हर वक़्त तनावग्रस्त रहेंगी। तनाव का मुकाबला करने में आपकी बहुत सारी शारीरिक और मानसिक ऊर्जा खर्च होती है जो अन्यथा आपके शरीर की सम्पूर्ण कार्यप्रणाली को मज़बूती प्रदान करती। इसलिए तनावग्रस्त होने पर रोगों से लड़ने वाले इम्यून सिस्टम को मज़बूती प्रदान करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त नहीं हो पाती। रोगों या व्याधियों का आक्रमण होने पर आपका शरीर पूरी शक्ति के साथ उनका मुकाबला नहीं कर पाता, जैसा सामान्यतया उसे करना चाहिए-और इसलिए आप आसानी से और जल्दी-जल्दी बीमार पड़ते रहते हैं। इसके अलावा, आपके नकारात्मक रवैये के चलते आपको मामूली चीजें और घटनाएँ ज़रूरत से ज़्यादा गंभीर लगती हैं!

स्वास्थ्य और सकारात्मकता के बारे में मेरे सोच का यह संक्षिप्त और तात्कालिक विवरण है। लेकिन कुछ इससे अधिक गंभीर कारक भी होते हैं, जैसे, जीवाणु, विषाणु और नुकसानदेह रसायन और ये कारक इससे अधिक महत्वपूर्ण है कि आप सकारात्मक रवैया रखते हैं या नहीं!

महज सकारात्मक होने के कारण आप ज़हर नहीं खा सकते! मैं बहुत से सकारात्मक लोगों को जानता हूँ, जिन्हें सकारात्मक रवैया रखने के बावजूद तरह-तरह की बीमारियों का मुकाबला करना पड़ता है, खान-पान संबंधी ही नहीं, दूसरी भी! मैं ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि महज सकारात्मक रवैया आपको स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से दूर नहीं रख सकता!

अब अगर आप भारत दौरे पर हैं और मुझसे या हमसे सलाह चाहते हैं तो मैं भी आपसे यही कहूँगा कि सड़क पर खोमचे या ठेले वालों के यहाँ मत खाइए। मैं खुद वहाँ कभी नहीं खाता क्योंकि मैं इस बात का पूरा ख़याल रखता हूँ कि कौन-कौन से और कैसे खाद्य पदार्थ मेरे पेट में और मेरे शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। हमारे आश्रम आने वाले बहुत से मेहमान जब तक यहाँ आश्रम का भोजन ग्रहण करते रहे, स्वस्थ रहते हैं लेकिन जैसे ही वे घूमने निकलते हैं और जहाँ, जैसा खाना मिलता है, खा लेते हैं तो वे बीमार पड़ जाते हैं।

भारतीय लोग उनका सेवन कर सकते हैं क्योंकि उनके शरीर उन बैक्टेरिया के आदी हो चुके हैं, जो इन ठेलों के खानों के ज़रिए पेट में पहुँचते होंगे। जीवन की शुरुआत से वे वहाँ हर तरह का भोजन, चाट-पकौड़े इत्यादि खाते रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे बैक्टेरिया उनके लिए अच्छे हैं-लेकिन आप लोग, जो पश्चिमी देशों से कुछ दिन के लिए यहाँ आते हैं और जिनके पेट ने पहले कभी ऐसे भोजन का अनुभव नहीं लिया, उन्हें खाकर अवश्य बीमार पड़ जाएँगे!

सकारात्मक रवैया होना निश्चय ही बड़ी अच्छी बात है लेकिन साथ ही आपको इस बात की सावधानी भी रखनी चाहिए कि आप कहाँ खा-पी रहे हैं और क्या और कैसा खा रहे हैं। सड़क के किनारे ठेलों पर खाने के स्थान पर किसी अच्छे रेस्तराँ में भोजन या नाश्ता-पानी कीजिए। सड़क पर खड़े होकर फलों का रस भी मत लीजिए, भले ही फल आपके सामने रखे हों और ताज़े ही क्यों न दिखाई दे रहे हों-आप नहीं जानते, कहाँ के पानी से उन्हें धोया गया है और जूसर में कौन-कौन से बैक्टेरिया पहले से मौजूद हैं!

मेरा उद्देश्य किसी को भयभीत करना नहीं है लेकिन यह बात हर टूरिस्ट गाइड बुक में निरपवाद रूप से लिखी होती है। कृपया अपने शरीर का ख़याल रखिए, भले ही आप कितना ही सकारात्मक रवैया रखते हों!

अपने आस-पास नज़र दौड़ाएँ और देखें कि कोई भूखा तो नहीं सो रहा! 4 मई 2015

आज मैं आपके लिए कुछ आँकड़े लेकर हाजिर हुआ हूँ:

विश्व

– दुनिया की 80% आबादी प्रतिदिन 10 डॉलर से कम आमदनी पर गुज़ारा करती है।

– दुनिया के 64% सबसे गरीब लोग सिर्फ पाँच देशों में निवास करते हैं।

– दुनिया के सिर्फ 85 धनवान लोगों की संपत्ति कुल 3.5 बिलियन डॉलर है, जो सबसे गरीब लोगों की कुल संपत्ति का आधा है।

– दुनिया के 805 मिलियन गरीब लोगों को आज भी पर्याप्त भोजन प्राप्त नहीं होता।

– इनमें से 791 मिलियन लोग विकासशील देशों में निवास करते हैं।

– विकासशील देशों के 13.5 % लोग कुपोषित हैं।

– एशिया के 526 मिलियन लोगों को रोज़ सिर्फ आधा पेट भोजन ही मिल पाता है।

– दुनिया का हर नवाँ व्यक्ति रोज़ भूखे पेट सोता है।

– दुनिया के पाँच साल से कम उम्र के 45% बच्चे कुपोषण से मृत्यु का शिकार होते हैं और 20% सामान्य से कम वज़न होने के कारण पैदा होने वाली बीमारियों के नतीजे में।

– दुनिया में हर साल एड्स, मलेरिया और टीबी से मरने वाले कुल मनुष्यों की संख्या से भूख से मरने वाले लोगों की संख्या कहीं ज्यादा है।

– दुनिया में 20000 बच्चे रोज़ भूख के कारण मारे जाते हैं।

भारत

– भारत में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवार अपनी आमदनी का 70% भोजन की मद में खर्च करते हैं।

– गरीबी रेखा से ऊपर वाले परिवार अपनी आमदनी का 50% भोजन की मद में खर्च करते हैं।

– मध्य वर्गीय परिवार भोजन पर अपनी आमदनी का 30% खर्च करते हैं।

– भारत में पैदा होने वाले 40% फल और सब्जियाँ तथा 20% अनाज आपूर्ति के खराब प्रबंधन के कारण नष्ट हो जाते हैं-और भोजन सामग्री गरीब उपभोक्ताओं तक पहुँचने से पहले ही नष्ट हो जाती है।

– भारत में 190 मिलियन लोग भूखे रहने को मजबूर हैं।

– भारत में 5 वर्ष से कम उम्र के 30.7% बच्चों का वज़न सामान्य से कम है।

– भारत का हर चौथा बच्चा कुपोषण का शिकार है।

– पाँचवे जन्मदिन से पहले मौत के मुख में समाने वाले दुनिया के कुल बच्चों में से 24% भारत में बसते हैं।

– भारत में प्रतिदिन 3000 बच्चे कुपोषण से मरते हैं।

– 30% नवजात भारतीय बच्चे बचपन में ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं।

ये तथ्य अत्यंत दुखदायी हैं और इस बात का बहुत बड़ा प्रमाण भी कि दुनिया भर में इस बारे में अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। अगर हम सभी अपनी संपत्ति या अपनी आमदनी में से कुछ पैसे जरूरतमंदों के साथ साझा करें तो किसी के लिए भी भूख के कारण मरने की नौबत नहीं आएगी! और भले ही आप सोचते हों कि ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते, आप जो भी बन पड़े, करें। आप अकेले भूख का अंत नहीं कर सकते-लेकिन सब मिल-जुलकर उसका अच्छी तरह मुक़ाबला कर सकते हैं!

भारत के गरीब बच्चों का भरण-पोषण करने के हमारे काम में आप भी हमारी मदद कर सकते हैं- हमारे स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके!

आँकड़ों का स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया

क्या आप अपने शरीर से नाखुश हैं, मनपसंद खाना खाने के बाद क्या आप पछताते या ग्लानि महसूस करते हैं? 23 फरवरी 2015

आज मैं एक ऐसे विषय पर लिखना चाहता हूँ, जो सबके, यानी पुरुषों और महिलाओं, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है: आपको अपने शरीर में अच्छा महसूस करना चाहिए। वह स्वस्थ होना चाहिए और उसकी देखभाल करना आपके लिए ज़रूरी है। लेकिन साथ ही आपको सुंदरता संबंधी किसी स्थापित आदर्श के पीछे भागने की ज़रूरत नहीं है और न ही ‘आदर्श वज़न’ की जानकारी देने वाले आंकड़ों को पाने की कोशिश करनी चाहिए। आपको ‘दुखी या नाखुश’ करने के प्रयास में उन्हें सफल मत होने दीजिए!

सबसे पहले तो मैं यह कहना चाहता हूँ कि वास्तव में मैं स्वस्थ भोजन और स्वस्थ वज़न का पक्षधर हूँ। जब मैं कहता हूँ कि आपको अपने शरीर से प्रेम करना चाहिए तो इसका अर्थ यह नहीं है कि आप अपने अतिरिक्त वज़न की अनदेखी करें, जो आपके शरीर में पीठ, कूल्हों और घुटनों की समस्याएँ और मधुमेह जैसी खतरनाक बीमारियाँ स्वास्थ्य संबंधी तकलीफ़ें पैदा कर रहा है। जब मैं कहता हूँ कि आप अपने शरीर में अच्छा महसूस करें तब आपको अस्वास्थ्यकर अतिरिक्त वज़न लेकर चलने के लिए प्रेरित नहीं कर रहा होता। वास्तव में वह तो बड़ा खतरनाक सिद्ध हो सकता है।

लेकिन मोटापे और दुबलेपन के बीच बहुत बड़ा विस्तार है। और यही वह बात है, जिसे अक्सर बहुसंख्य लोग स्वीकार नहीं करते। सुंदरियाँ, जिनका प्रचार अधिकांश मिडिया कर रहा होता है, हमेशा एक ही चीज़ दिखाते हैं: एक जैसी शरीर-यष्टि, एक जैसा वज़न, एक विशेष तरीका, जैसा आपको होना चाहिए। यह बेहद अस्वाभाविक या अप्राकृतिक है बल्कि यह असंभव है कि धरती पर रहने वाले सभी लोग उसे प्राप्त कर सकें और उनके जैसे दिखाई दें।

और इन आदर्शों की नकल करके इतने कम अंतराल में आप अपने शरीर को किस तरह बदल पाएँगे? दस साल से शरीर में मौजूद मांसल गोलाइयों को मिटाकर अगले दशक में आप शरीर को छरहरा किस तरह बना लेंगे? आपको एक ही शरीर प्राप्त हुआ है और आप उसमें में दोनों चीजें एक साथ नहीं पा सकते!

इसलिए मैं कहता हूँ कि अच्छा महसूस करना अत्यंत आवश्यक है! उस आदर्श वज़न सीमा से आपका वज़न ज़्यादा हो या कम, जब तक आप स्वस्थ हैं, आपको अच्छा महसूस करते रहना चाहिए! और इसमें भोजन, खाना-पीना और व्यायाम, सभी सम्मिलित हैं!

वास्तव में मैं तो अच्छे खाने का बहुत शौकीन हूँ और अपना दैनिक योगाभ्यास और व्यायाम भी मुझे बहुत प्रिय है। लेकिन मैंने बहुत सी औरतों से सुना है कि भोजन करते वक़्त वे अपनी एक-एक कैलोरी गिनती हैं और हर त्योहारी खाने के बाद या यूँ ही अपना मनपसंद खाना खाने के बाद अपराधी सा महसूस करती हैं-जब कि वास्तव में अपना मनपसंद खाना खुशी-खुशी ग्रहण करना चाहिए! नतीजा यह होता है कि भोजन करने का समय उनके लिए बड़ा त्रासदायक समय होता है और वह कई तरह के विकारों का कारण भी बन सकता है!

पुरुष भी इन समस्याओं से घिरे पाए जाते हैं, अंतर सिर्फ इतना होता है कि सुडौल मांसपेशियाँ बनाने के चक्कर में और भोजन के साथ ली गई अतिरिक्त कैलोरियों को पसीने के साथ बहाने के लिए उन्हें खेलकूद और व्यायाम की धुन लग जाती है। अच्छे, पसीना बहाने वाले, श्रमसाध्य व्यायामों से कोई गिला नहीं, लेकिन अगर आपको रोज़ जिम जाना पड़ता हो और हर त्योहारी खाने के बाद कैलोरी जलाने के लिए घंटों दंड-बैठक लगाना (वर्क-आउट करना) पड़ता हो, तो फिर यह एक असहज बाध्यता बन जाती है। यह व्यवहार अपने शरीर के प्रति प्रेम प्रकट नहीं करता।

खाने को लेकर कोई अपराधबोध या ग्लानि महसूस न करें, उसका आनंद लें। व्यायाम भी मज़ा लेते हुए करें, मजबूरी में नहीं। और अगर किसी दिन नहीं कर पाते या किसी दिन कम व्यायाम कर पाते हैं तो अफसोस न करें। किसी भी आदर्श के लिए बाहरी दबाव महसूस न करें- और अपने शरीर से प्रेम करें। जीवन का आनंद लें-अगर आप उसके विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर देंगे तो यह संभव नहीं हो सकता!

आयुर्वेदिक रेस्तराँ की परियोजना का स्वप्न साकार होना – 15 अक्टूबर 2014

कल मैंने अपने जीवन की सबसे बड़ी परियोजना का ज़िक्र किया था: हम "अम्माजी' के नाम से आयुर्वेदिक रेस्तराँ" का निर्माण कर रहे हैं।

"अम्माजी'ज़ आयुर्वेदिक रेस्तराँ"

जी हाँ, आप ठीक पढ़ रहे हैं। हम एक रेस्तराँ खोलने जा रहे हैं। इस साल की शुरुआत में, 15 फरवरी 2014 के दिन हमने आश्रम परिसर में, मुख्य द्वार से सटकर सड़क के किनारे, जिससे सड़क से गुज़रने वाला हर व्यक्ति उसे देख सके, एक और इमारत का निर्माण शुरू किया है। और वहाँ से आजकल बड़ी संख्या में लोग गुज़रते हैं क्योंकि दिल्ली और आगरा के बीच एक नए हाइ-वे का निर्माण पूरा हो चुका है, जिसे यमुना एक्सप्रेस-वे कहा जाता है और जिसकी एक शाखा वृन्दावन से होते हुए निकलती है। हमारे लिए ख़ुशी की बात यह है कि हाइ-वे की यह शाखा हमारे आश्रम-द्वार के ठीक सामने से गुज़रती है! एक साल से हम सपना देख रहे थे कि एक रेस्तराँ खोला जाए और अब वह सपना साकार होने जा रहा है।

इमारत लगभग पूरी हो चुकी है, अंदरूनी हिस्से की सजावट (इंटीरियर डेकोरेशन) का काम चल रहा है और नीचे दिए गए चित्र में आप रसोई के साज़ो सामान की पहली खेप के रूप में एक बड़ा सा ओवन देख रहे हैं, जो जन्मदिन के उपहार के रूप में अपने कुछ मित्रों की ओर से कल ही मुझे प्राप्त हुआ है! आशा है कि इस साल के अंत तक निर्माण-कार्य संपन्न हो चुका होगा और अगले साल की शुरुआत से हम अपने मेहमानों का रेस्तराँ में स्वागत कर सकेंगे!

हमारे मेहमानों को कुछ नया और अनोखा देखने को मिलेगा: यह एक आयुर्वेदिक रेस्तराँ होगा जहाँ उन्हें सामान्य भोजन के साथ ही ऑर्गेनिक (जैविक) भोजन भी उपलब्ध होगा और वे दोनों में से किसी का भी चुनाव कर पाएँगे। यूरोप में लोग इस विषय में अधिकाधिक जागरूक होते जा रहे हैं कि वे अपने भोजन में क्या ग्रहण कर रहे हैं और अब ऑर्गेनिक खाद्यों का इस्तेमाल महज फैशन नहीं रह गया है बल्कि भोजन में उसका समावेश करने वालों की संख्या लगातार बढती जा रही है! इसके विपरीत, भारत में स्थिति बहुत बुरी है: खाद्य सामग्रियों का उत्पादन बढ़ाने के लिए भारी मात्रा में रसायनों का उपयोग किया जाता है और सब्जियों के आकार और वज़न में रातोंरात वृद्धि करने के लिए ओक्सिटोसिन के इंजेक्शन का प्रयोग किया जाता है और इन रसायनों और रासायनिक खादों के दुष्परिणामों के समाचार और आलेख रोजाना अखबारों की सुर्खियाँ बनते रहते हैं। यह अब एक सामान्य बात हो गई है और हमने निर्णय किया है कि हम अपने मेहमानों को अपने रेस्तराँ में कुछ अलग चुनने की आज़ादी प्रदान करेंगे: कीटनाशक और हार्मोन रहित खाद्य सामग्री का चुनाव करने की आज़ादी!

लेकिन ऑर्गेनिक आहार सामग्रियाँ उपलब्ध करवाने के साथ ही हम लोगों को आयुर्वेद के नजदीक भी लेकर आना चाहते हैं और यह दिखाना चाहते हैं कि सिर्फ उचित खान-पान से ही किस तरह आप न सिर्फ अपने आपको स्वस्थ रख सकते हैं बल्कि स्वास्थ्य सम्बन्धी बहुत सी परेशानियों से बच सकते हैं और कुछ बीमारियों का इलाज भी कर सकते हैं। हमारे आयुर्वेदिक रेस्तराँ में आप ऑर्गेनिक आहार तो प्राप्त कर ही सकेंगे मगर इसके अतिरिक्त हम आपको बताएँगे कि किस तरह का भोजन आपके शरीर की बनावट और प्रकृति के लिए उपयुक्त होगा। वात, पित्त और कफ का शमन करने वाले खाद्यों का प्रयोग भी आप कर सकेंगे या फिर आप इन दोषों को नियंत्रण में रखने हेतु एक संतुलित आहार का चुनाव भी कर सकते हैं।

पिछले कई सालों से हम आयुर्वेद पर काम कर रहे हैं, अपनी रसोई में विभिन्न जड़ी-बूटियों, मसालों और अन्य भोजन सामग्रियों पर प्रयोग करते हुए उनके असरात का अध्ययन कर रहे हैं। हम दुनिया भर में आयुर्वेदिक व्यंजन-विधियों पर कार्यशालाएँ आयोजित करते रहे हैं और अपने आश्रम में आयुर्वेदिक रसोई शिविर और प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाते रहे हैं। आम तौर पर यशेंदु उन कार्यक्रमों का कर्ताधर्ता होता है और उसकी अनुपस्थिति में या जब वह अत्यधिक व्यस्त होता है, मैं खुद यह काम संभालता हूँ। हर शनिवार आप यहाँ, मेरे ब्लॉग में विभिन्न व्यंजन तैयार करने की हमारी विधियों को पढ़ते ही रहते हैं। इस तरह हमारे पास आयुर्वेदिक ज्ञान और अनुभव का बहुत बड़ा ज़खीरा उपलब्ध है, जिसे हम अपने रेस्तराँ में इस्तेमाल करने का इरादा रखते हैं और इस दिशा में मैंने यशेंदु और पूर्णेंदु के साथ मिलकर काफी काम पहले से ही शुरू कर दिया है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए मैं स्वयं रेस्तराँ के निर्माण की प्रक्रिया में शामिल रहा हूँ, हम लोग अलग-अलग समूहों में दिल्ली जाकर विभिन्न उपकरण और दूसरे सामान मँगवाते रहे हैं और हम तीनों के अलावा रमोना, मेरे पिता और कई मित्रों के बीच इस विषय पर गहन चर्चा और चिंतन-मनन होता रहा है, जिसके परिणामस्वरूप बहुत से नए विचार सामने आए हैं, जिनका हम भविष्य में उपयोग करेंगे।

इसके अतिरिक्त, अगर जन्मदिन पर मुझे प्राप्त उपहारों की बात करें तो, हम अपने आपको सिर्फ भारतीय भोजन तक सीमित नहीं कर रहे हैं। जी नहीं, अम्माजी’ज़ आयुर्वेदिक रेस्तराँ में विभिन्न पाक-शैलियों का समन्वय किया जाएगा, जिसमें उत्तर और दक्षिण भारतीय और यूरोपीय व्यंजनों को भी शामिल किया गया है। इसके अलावा दो और खास प्रस्तुतियाँ भी होंगी: जर्मन बेकरी और इटालियन आइसक्रीम पार्लर!

अंत में यह कि जैसा कि हम जानते हैं इस इलाके में बच्चों के खेलने की ऐसी कोई जगह नहीं है; कोई पार्क नहीं, कोई खुला मैदान नहीं, जहाँ वे सुरक्षित रूप से खेल सकें। इस तरह वे खेल सकते हैं तो सिर्फ घर में। हमने अपने आश्रम में सामने की तरफ, रेस्तराँ से लगी हुई बच्चों के खेलने की जगह बनाई है, जहाँ रेत बिछाकर झूले, फिसलपट्टियाँ और कुछ दूसरे खेल-कूद के उपकरण लगवाएंगे, जहाँ बच्चे मज़े में खेलते रह सकते हैं जबकि उनके अभिभावक लंच या डिनर लेते हुए निश्चिंत होकर गप-शप और आपसी चर्चा कर सकते हैं!

आज पहली बार हमने अपने रेस्तराँ के आगामी कुछ महीनों में होने वाले शुभारंभ की सार्वजनिक घोषणा की है। पहले दिन से ही हम अपनी एक और वैबसाइट www.ammajis.com पर रेस्तराँ के निर्माण में हो रही प्रगति के फोटो अपलोड कर रहे हैं। हमने एक फेसबुक पेज भी बनाया है और अगले कुछ महीनों में होर्डिंग्ज, पोस्टर्स, पैम्फलेट्स और परिचय पुस्तिकाओं के जरिये हम इसका विज्ञापन और प्रचार भी करने जा रहे हैं।

इस तरह हमारा यह सपना जल्द ही साकार होने जा रहा है। यह बताना आवश्यक नहीं कि हमने रसोई में जो कुछ भी सीखा है, अपनी माँ से सीखा है, जिन्हें हम अम्माजी कहा करते थे और जो दो साल पहले सदा-सदा के लिए हमें छोडकर चली गईं थीं। इसीलिए उनकी याद में हमने रेस्तराँ का नामकरण किया है: “अम्माजी’ज़”-भोजन, जो सिर्फ आपकी माँ बना सकती है।

वैश्वीकरण के खतरे – जब सारी अच्छी चीज़ें निर्यात कर दी जाती हैं! 10 जुलाई 2014

कल मैंने आपको बताया था कि कैनेरी द्वीप पर हमारे लिए अच्छे टमाटर प्राप्त करना मुश्किल हो गया था-बल्कि कहें, असंभव हो गया था क्योंकि वहाँ पैदा होने वाले सबसे बेहतरीन टमाटर अक्सर दूसरे देशों को निर्यात कर दिए जाते हैं। लेकिन यह समस्या सिर्फ इन द्वीप-समूहों या सिर्फ स्पेन की नहीं है! यह एक विश्वव्यापी समस्या है, एक अलाभकारी व्यवस्था, एक बहुत बड़ा खतरा, जिसने वैश्वीकरण के चलते दुनिया भर को अपनी जकड़ में ले लिया है।

ठीक इसी समस्या का सामना हम भारत में भी कर रहे हैं! दुनिया में आम का सबसे अधिक उत्पादन भारत में होता है। फिर भी देशवासियों की हमेशा यह शिकायत रहती है कि उन्हें अपने ही देश में पैदा होने वाले सबसे बेहतरीन आम देखने तक को नहीं मिलते! पेड़ों पर से उतारकर उन्हें सीधे विदेशी बाज़ारों में बिकने के लिए रवाना कर दिया जाता है।

चावल पर भी यही बात लागू होती है! विदेश में रहते हुए हर व्यक्ति भारतीय चावलों की गुणवत्ता जानते हैं और जब आप यहाँ खरीदे गए चावल घर पर पकाते हैं तो सारी रसोई गमक उठती है- लेकिन भारत में यह चावल मुश्किल से मिल पाता है!

भारत में चाय और कॉफ़ी भी बहुत पैदा होती है! आसाम और दार्जिलिंग की चाय दुनिया भर में मशहूर है लेकिन कल ही किसी ने मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी करते हुए बताया कि भारत की सबसे उत्कृष्ट चाय तो सीधे निर्यात कर दी जाती है! उसी व्यक्ति ने आश्चर्य व्यक्त किया कि आखिर भारत में हर कोई इंस्टेंट कॉफ़ी क्यों पीता है-सारी असली, शुद्ध कॉफी कहाँ गायब हो जाती है?

यह सब पैसे का खेल है। पश्चिमी देश कुछ सामानों की ज़्यादा कीमत अदा करते हैं लिहाजा उन चीजों को निर्यात कर दिया जाता है भले ही उन्हें पैदा करने वाले ही उन सामानों से महरूम हो जाएँ। यह सामान उन्हें कम मात्रा में ही उपलब्ध हो पाता है और जो होता है, वह भी कम गुणवत्ता वाला, घटिया होता है। इसमें लाभांश तो बहुत अधिक है मगर देशवासियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है और इसके अलावा इस व्यवस्था में उन सभी बातों की उपेक्षा की जाती है जिसे आप संवेदनशीलता, मानवता और सहज-बुद्धि कहते हैं!

सिर्फ आप अफ्रीका की हालत पर नज़र दौड़ा लीजिए! विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनी, नेस्ले ने अफ्रीका के तमाम पानी के स्रोत खरीद लिए हैं और वहाँ के गाँवों को और स्थानीय लोगों को उनके खेतों के लिए पानी मिलना मुश्किल हो रहा है! उनके पानी का निजीकरण कर दिया गया है और अब ये कम्पनियाँ उसे बोतलों में भरती हैं और दुनिया भर के बाजारों में बेचकर अनाप-शनाप मुनाफा कमाती हैं। या फिर उन्हीं देशों में महँगे दामों में बेचकर मुनाफा कमाती हैं-उन्हीं लोगों को बेचकर, जिन्हें पहले पानी मुफ्त उपलब्ध था! और इस बात का तो सवाल ही नहीं उठता कि वे उन लोगों को, जो उन्हीं की फैक्ट्रियों में काम करते हैं, पर्याप्त मजदूरी अदा करते होंगे कि वे उनका बोतलबंद पानी पीने के बाद अपने परिवार का भरण-पोषण भी ठीक तरह से कर सकें! इसलिए अब स्थानीय लोगों को हैण्ड-पम्प से पानी भरने बहुत दूर जाना पड़ता है और उसे किफ़ायत के साथ इस्तेमाल करना पड़ता है कि दिन भर के लिए पर्याप्त पानी घर में हर वक़्त उपलब्ध रहे।

पानी। चावल। फल। बहुत साधारण, रोज़मर्रा की चीजें! वैश्वीकरण के चलते हर कोई चाहता है कि अच्छी से अच्छी चीजें उसे हर वक़्त, उसके घर पर उपलब्ध हों। क्या हम पल भर ठहरकर यह विचार नहीं कर सकते कि भले ही यह सब हमारे लिए बड़ा सुविधाजनक हो मगर इसका हमारी धरती पर विनाशकारी असर होता है? कि लोग भूखे मर रहे हैं और उनके पास पीने का पानी नहीं है क्योंकि दूसरे कुछ लोगों को सिर्फ अपनी सुविधा और आराम की चिंता है या सिर्फ इस बात की कि ज़्यादा से ज़्यादा लाभांश कैसे कमाया जाए, अमीर कैसे हुआ जाए!

आप कहेंगे कि यह तो दुनिया भर की विशाल और ताकतवर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मामला है, हम क्या कर सकते हैं? लेकिन नहीं, आप बहुत कुछ कर सकते हैं!

पीछे मुड़कर देखिए और विचार कीजिए कि आपका भोजन कहाँ से प्राप्त होता है! जब भी संभव हो, स्थानीय सब्जियाँ और फल खरीदें; जैविक (आर्गेनिक) खेती या जैविक पैदावार का लेबल देखकर ही चीजें खरीदें; हमेशा न्यायपूर्ण लेन-देन (व्यापार) सुनिश्चित करें भले ही आपको कुछ महँगा खरीदना पड़े। अपने आप पर और अपने उपभोग पर नज़र रखें।

अगर हम इतना भर कर सकें तो हम सब मिल-जुलकर इस संसार को अच्छी रहने लायक जगह बना सकते हैं!

शामनिज्म (ओझागिरी) और योग के बीच संघर्ष – 8 जून 2014

मैंने आपको बताया था कि मेरे एक समलैंगिक पुरुष मित्र की अपने गुरु के साथ अनबन हो गई थी क्योंकि उसका गुरु उसकी यौन प्रवृत्तियों को स्वीकार नहीं करता था। यह उसका एकमात्र आतंरिक संघर्ष नहीं था- एक और कारण से उसके भीतर उथल-पुथल मची हुई थी, जिसे उसने मेरे अलावा मेरे और भी कई मित्रों के साथ साझा किया था: जिस तरह वह योग की तरफ आकृष्ट था उसी तरह वह शामनवाद की तरफ भी आकृष्ट था। लेकिन योगी शाकाहारी होते हैं जबकि शामन मांसाहारी होते हैं! यह एक रोचक द्वंद्व है, जिस पर 2006 में मैंने बहुत विचार किया था।

इस द्वंद्व में पड़े मेरे एक दोस्त ने मुझे सारी स्थिति से अवगत कराया क्योंकि मैं नहीं जानता था कि आखिर इस शामनवाद में क्या-क्या सन्निहित होता है। हाँ, इतना सुना था कि वे लोग मांस बहुत खाते हैं। मैंने यह अफवाह भी सुनी थी कि वे पशुओं की बलि चढ़ाते हैं-और मेरी नज़र में यह एक बहुत क्रूर और अमानवीय प्रथा है, विशेषकर उनके संदर्भ में जो अपने आपको आध्यात्मिक कहते हैं!

मेरे एक मित्र ने बताया कि यह सच है कि जो लोग शामनवाद में रुचि रखते हैं वे साधारणतया बल्कि अक्सर ही शाकाहारी नहीं होते, भले ही वे ईश्वर की पूजा-अर्चना के लिए अपने खरगोश या अपने गिनी पिग की हत्या न करते हों। इस तरह वे उस क्रूर हत्या से अवश्य दूर रहते हैं मगर मांसाहारी होने के कारण इन हत्याओं में परोक्ष रूप से थोड़े से शामिल तो होते ही हैं!

मेरे दोस्त ने कहा कि ठीक यही उसकी समस्या थी! वह इस विचार के प्रति आकृष्ट था, जिसमें बहुत से कर्मकांड होते हैं, हर जीव में, हर चीज़ में, यहाँ तक कि पत्थरों में, पेड़-पौधों में और आंधी-तूफान में भी आत्मा होने का दर्शन होता है। लेकिन इसके बावजूद वह न सिर्फ योगिक दर्शन का अनुसरण करता था बल्कि योगिक खान-पान में भी विश्वास रखता था! वह पक्का शाकाहारी था और हाल ही में उसने पूरी तरह शाक-सब्जियों पर गुज़ारा करना शुरू कर दिया था- और यह शाकाहार का फैशन शुरू होने से बहुत पहले की बात है!

एक तरफ तो आप कहें कि हर जीव में आत्मा होती है और फिर उन जीवों का मांस खाएं? मृत पशुओं का? उसने मुझसे उस उत्तर का ज़िक्र किया जो उसका हर शामनवादी मित्र दिया करता था: खाने से पहले हम उस पशु का धन्यवाद करते हैं कि उसने हमारा भोजन बनने के लिए अपने जीवन की कुर्बानी दी।

जी नहीं! सिर्फ इतने से ही उसका मांस खाना उचित नहीं हो गया। वह नहीं समझता कि सिर्फ ‘धन्यवाद’ कह देने भर से उस पशु की तकलीफ कम हो जाती है और न ही उसकी कुर्बानी की कीमत अदा होती है।

मैंने उसके द्वंद्व को समझा और उससे कहा कि उसे शाकाहारी ही बने रहना चाहिए और अपने शाकाहार के व्रत पर ही चलना चाहिए। ऐसे रास्तों पर जाना ही क्यों, जो आपको ठीक नहीं लगते? यह ठीक है कि आप अपने लिए कुछ कर्मकांड तय कर लें और अपने जीवन में उनका पालन करें। आप हवाओं और बारिश, सूरज और चाँद के साथ बात करना चाहते हैं तो अवश्य कीजिए। अपने तरीके से कीजिए, अपने शब्दों में कीजिए।

अपना स्वत्व न छोड़ें मतलब आप जो हैं, वही बने रहें। अपनी संवेदनाओं को स्वीकार करें, उनका आदर करें और वही सुनें जो आपका शरीर और मन-मस्तिष्क कहता है। तब किसी तरह का द्वंद्व नहीं रह जाएगा!

एक पश्चिमी व्यक्ति की नज़र में भारतीय विवाह-समारोह – 26 नवंबर 2013

कल मैंने भारतीय विवाहों के बारे में और उन रोचक प्रश्नों के विषय में बताना शुरू किया था, जो विशेष रूप से हमारे पश्चिमी मेहमान अक्सर पूछते रहते हैं। आज मैं ऐसे ही एक विवाह समारोह के पूरे माहौल का विवरण लिख रहा हूँ और यह बताना चाहता हूँ कि क्यों पहली बार भारतीय विवाह में शामिल होने वाले विदेशी मेहमान उन्हें देखकर अभिभूत और मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

अगर आप कार में हैं तो समारोह में पहुँचने के लिए आपको बिजली के रंगीन लट्टुओं (बल्बों) और फूलों से सजाए गए एक विशाल गेट से होकर गुजरना होता है। शादी हाल की तरफ बढ़ते हैं तो रास्ते के दोनों तरफ आपको विविध रंगों के बिजली के लट्टुओं (बल्बों) की लड़ियां देखने को मिलती है। आजकल थीम-कलर का चलन हो गया है और इन लड़ियों से आपको पता चल जाता है कि समारोह का थीम-कलर क्या है। मेरी पत्नी बताती हैं कि आजकल बैंगनी और फ़ीरोज़ी रंग फैशन में है। आगे एक विशाल टीवी स्क्रीन आपको दिखाई देगा।

जी हाँ, टीवी स्क्रीन, जो बड़े से हाल के बाहर और भीतर चल रहे विभिन्न दृश्यों को हर कोण से दिखाता रहता है। अभी आप गेट का दृश्य देख रहे थे, जहां से होकर आप आए, फिर वह भीतर बैठे हुए लोगों को दिखा रहा था और अब आप अपने आपको अपनी ओर आता देख रहे हैं! जी हाँ, कैमेरामैन घूमता रहता है और आपको मुस्कराते रहना है! उसके बगल में मेहमानों का स्वागत करने के लिए दुल्हन के माता-पिता और कुछ रिश्तेदार हाथ बांधे खड़े हैं।

उस गलियारे को पार करने के बाद आप सजे हुए हाल के आश्चर्यलोक में पहुँच जाते हैं! हाल में एक तरफ स्टेज बना हुआ है, जिस पर सुरुचिपूर्ण ढंग से सजा हुआ एक सोफ़ा या दो सजी हुईं कुर्सियाँ रखे हुई हैं। उनकी सजावट किसी राजा-महाराजा के सिंहासन को मात करती हैं! स्टेज के सामने कतार में बहुत सी कुर्सियाँ रखी हुई हैं। चकराकर (सम्मोहित से) आप चारों तरफ देखते हैं और सामने आपको एक दूसरा स्क्रीन दिखाई देता है, जिसमें आने वाले मेहमान दिखाई दे रहे हैं। अपने सबसे अच्छे कपड़ों में सजे-धजे ये मेहमान, सारे हाल में बिखरे दिखाई दे रहे हैं। हर तरफ सुरुचिपूर्ण सूटों में पुरुष और रंगीन सलमे-सितारे जड़ी साड़ियों और गले, कान और हाथों में महंगे, खूबसूरत गहनों में महिलाएं दिखाई देते हैं। सिर्फ उन्हें देख लेना ही अपने आपमें खासा अनुभव है!

लेकिन मेहमान सिर्फ यूंही खड़े नहीं हैं, जैसा कि पहली नज़र में आपको महसूस हो सकता है। जी नहीं, वे लोग धीरे-धीरे खाने के स्टालों की तरफ सरक रहे हैं, जिन्हें अब आप हाल के दूसरी तरफ देख पा रहे हैं। देखिये, यह सारे हाल का सबसे बड़ा हिस्सा घेरे हुए है! एक के बाद एक स्टाल, जैसे किसी मेले में खाने-पीने की दुकाने लगी होती हैं, लेकिन यहाँ सब कुछ फ्री (मुफ्त) है! आप अपनी मर्ज़ी के मुताबिक सबसे जायकेदार और राजशाही डिश ले सकते हैं और दिल की तसल्ली तक सिर्फ उसी को खाकर अपनी क्षुधा शांत कर सकते हैं। दस तरह की तो रोटियाँ ही हैं, जिनमें नान जैसी लोकप्रिय तंदूरी-रोटी से लेकर विभिन्न अनाजों को मिलाकर बनाई जाने वाली मिस्सी रोटी तक उपलब्ध है। एक तरफ दक्षिण भारतीय इडली-दोसा है तो दूसरी तरफ पंजाबी छोले-भटूरे भी हैं। पनीर और काजू और क्रीम के शोरबे में तैयार तरह-तरह की सब्जियाँ हैं। हर तरह के चावल हैं, कॉफी है, कोल्ड-ड्रिंक और पानी भी मौजूद है। और लीजिये, एक तरफ, एक कोने में सिर्फ मिठाइयों के स्टॉल लगे हैं, जिनमें ठंडी और गरम दोनों तरह की हर प्रकार की भारतीय मिठाइयों के अलावा आइसक्रीम भी है। ऐसा भोजन करके आपको लगेगा कि आप स्वर्ग में हैं और वहाँ किसी प्रीतिभोज में शामिल हो रहे हैं!

लेकिन बहुत से व्यंजनों का स्वाद लेना अभी भी बाकी है। भारतीय, चीनी और पश्चिमी ढंग के नाश्ते भी वहाँ उपलब्ध हैं-चाहे भल्ले, पानीपूरी खा लें, चाहे चाओमिन, पिज्जा-बर्गर का आनंद उठाएँ! मुझे पता चला है कि आजकल ताज़े कटे फल और सलाद का भी चलन बढ़ता जा रहा है: मौसम के अनुसार आप अनन्नास, आम, किवीस, तरबूज आदि फलों का आस्वाद भी ले सकते हैं। भोजन का एक और अनिवार्य हिस्सा है, जो शुरू में ही आपको दिखाई दे जाता है और जिसकी तरफ हमारे विदेशी मेहमान बड़ी उत्सुकता से लपकते हैं, लेकिन जब तक कोई बताए नहीं, समझ नहीं पाते कि क्या है: देखते ही मुंह में पानी आ जाए ऐसे लाल, हरे, भूरे रंग के मसालों से शराबोर, छोटे-छोटे टुकड़े दर्जन-भर बर्तनों में रखे हुए हैं! इन बर्तनों में हर तरह का अचार रखा है।

अब अगर आप इस लज़ीज़ खानों की तरफ बढ़ ही रहे हैं तो मेरी एक हिदायत सुन लीजिए: जो भी लें, थोड़ा सा लें और चख लें-वह आपके लिए बहुत मसालेदार और तीखा हो सकता है! भारतीय तीखा खाना पसंद करते हैं और विवाह का प्रीतिभोज इससे अछूता नहीं रह सकता!

मेरे पश्चिमी मित्रों, अगर आपको ऐसे विवाह-समारोह में शिरकत का अवसर प्राप्त हो रहा है तो अवश्य उसमें शामिल होइए, लोगों को गौर से देखिये, शानदार कपड़ों, अद्भुत सजावट को आँखों में भर लीजिए और शाही खाने का लुत्फ उठाइए! विवाह के आनंद में डूब जाइए!

बच्चों का मनोहारी खेल अगर धार्मिक वयस्कों द्वारा खेला जाए तो हास्यास्पद तमाशा लगता है- 19 सितम्बर 2013

कल मैंने आपको बताया था कि कैसे हम धर्म और उसके द्वारा स्फूर्त अंधविश्वासों से दूर रखते हुए अपरा का लालन-पालन कर रहे हैं। जब वह खिलौनों के साथ खेल रही होती है, मैं उसे खेलते हुए देखता हूँ और पाता हूँ कि उसके खेल धार्मिक लोगों की बहुत सी क्रियाओं से मेल खाते हैं। जब मैं इस बात पर गौर करता हूँ तो इनके बीच मौजूद अनोखे और दिलचस्प अंतर पर ध्यान केन्द्रित हो जाता है: जब अपरा ऐसा करती है तो वह बड़ा मनोहारी लगता है लेकिन जब कोई वयस्क वही बात करता है तो वह बेहूदा लगने लगता है!

इसका सबसे बड़ा उदाहरण तब मिलता है जब हमारी बेटी रुई के भरकर बनाए गए खिलौनों के साथ खेलती है। उनमें भालू, कुत्ते, बत्तखें और कई जानवर होते हैं और वे मनुष्यों की तरह व्यवहार करते हैं। वह उनके साथ बात करती है, उनके साथ चलती-फिरती है और उन्हें सुलाती और खिलाती भी है। निर्जीव खिलौनों के साथ खेलती बच्ची की यह छवि मुझे हिंदुओं के उस व्यवहार की याद दिलाती है, जिसमें वे भगवान की मूर्तियों को तरह-तरह की खाने की वस्तुएँ अर्पित करते हैं।

यह बच्ची अभी कल्पना-लोक में विचर रही है, इस बच्ची की अवस्था अभी इतनी कम है कि वह कुछ भी कल्पना कर सकती है और इस तरह वह अपना जन्मदिन भी इन निर्जीव जानवरों के साथ मना लेती है और सोचती है कि उसने अपने कई दोस्तों के साथ जन्मदिन की पार्टी की है। वह उन्हें काल्पनिक केक खिलाती है या काजू के टुकड़े उनके मुंह के रखकर सोचती है कि उन्होंने काजू खा लिए, जबकि हर बार वह स्वयं ही सब कुछ चट करती रहती है। यह सब करते हुए वह बिल्कुल स्वाभाविक लगती है और मैं बताना चाहता हूँ कि वह पूरी निष्ठा, 100% निष्ठा, के साथ उन्हें खिलाती है। हम सब देखते रहते हैं और उसका यह भोलापन हमें बहुत रमणीय और आकर्षक लगता है।

जब धार्मिक लोग ऐसा करते हैं तब वास्तव में वे अपनी कल्पना का उपयोग नहीं करते। उनसे कहा गया है कि अपने भोजन को, खुद खाने से पहले, भगवान को भोग लगाओ और वे एक नीरस काम की तरह वैसा करते रहते हैं। शायद कुछ लोग पूरे भक्तिभाव के साथ ऐसा करते हों परन्तु अगर आप तटस्थ रहते हुए उन्हें ध्यान से देखें तो मुझे विश्वास है कि आपको भी उनकी हरकतें कुछ अजीब ही लगेगी: एक वयस्क, समझदार व्यक्ति नीचे झुककर एक मूर्ति को, जो अपरा के खिलौनों से ज़्यादा प्राणवान नहीं है, भोजन करा रहा है! मैं यह देखता हूँ और सोचता हूँ कि धर्म एक वयस्क व्यक्ति की भी क्या दशा कर सकता है!

बच्चा बड़ा होकर एक दिन जान जाता है कि उसके कठपुतलियों जैसे खिलौने वास्तविक नहीं हैं और उन्हें भोजन कराना आवश्यक नहीं है। उन्हें भूख नहीं लगती जबकि वास्तविक जानवर और बगीचे में उड़ते पक्षी खाने की तलाश में इधर-उधर भटकते रहते हैं क्योंकि ज़िंदा रहने के लिए भोजन अनिवार्य है। अब बच्चे ने यह जान लिया है।

इस तरह धर्म आपको उसी, दो साल के बच्चे की, मानसिक अवस्था में पहुंचा देता है, जिसके प्रभाव में आप एक मूर्ति को खाना खिलाने का नाटक करने लगते हैं और समझते हैं कि जो भोजन आप उसके सामने रखते हैं, वाकई वह उसे ग्रहण करता है? जबकि आप भी जानते होते हैं कि यह सच नहीं है!

मैं हमेशा कहता रहता हूँ कि बच्चे की तरह होना अच्छी बात है और मैं यह भी कहूँगा कि रचनात्मकता को अक्षुण्ण रखने के लिए अपनी कल्पनाशीलता को बनाए रखें और आसपास के लोगों से अलग सोचने का साहस दिखाएँ। लेकिन अपनी कल्पना का सकारात्मक उपयोग करने में और धर्म-ग्रन्थों और पोंगा-पंडितों के आदेश पर एक नीरस दैनिक अनुष्ठान करने में अंतर है। यह न सिर्फ हास्यास्पद है, बल्कि पूरी तरह मूर्खतापूर्ण और हानिकारक भी है।

जब एक बच्चा ऐसा करता है तो वह मनोहारी लगता है। अगर वही बात एक वयस्क करता है तो वह अजीबोगरीब और बेतुका लगता है। कई बार लगता है कि यह हँसकर टालने की बात नहीं है, शोक मनाने की बात है। यह धर्म की एक चाल है कि आपके मस्तिष्क को इतना सुन्न कर दिया जाए कि आप उसके आदेशों पर प्रश्न ही ना कर सकें, भले ही वह आदेश कितना भी मूर्खतापूर्ण क्यों न हो। आपसे कहा जा रहा है कि आप अपने दिमाग का दरवाजा बंद करके, जैसा कहा जा रहा है वैसा करते चले जाएँ।

यही अंतर है- अपरा अपनी बिल्लियों, भालुओं और चिड़ियों को भोजन कराती है क्योंकि उसे इस तरह खेलने में मज़ा आता है। धार्मिक लोग समझते हैं कि ऐसा न करना पाप है। अपरा का मस्तिष्क अभी विकास करेगा और एक दिन उसकी समझदारी उसे ऐसा करने से रोक देगी। लेकिन, धार्मिक लोग सदा के लिए अपने इस मतिभ्रम के साथ जीते रहेंगे।

तीन बार भोजन – क्या यह बच्चों के लिए विलासिता है? – 11 जून 2013

मैंने कल यूनिसेफ द्वारा अमीर मुल्कों, खासकर यूरोपीय देशों में मौजूद गरीब बच्चों पर किए गए एक अध्ययन के बारे में चर्चा की थी। अध्ययन में 14 प्रकार के अभावों की एक तालिका दी गई है जिनमें से किन्हीं दो या अधिक की अनुपलब्धता उस बच्चे को गरीब मानने का पर्याप्त कारण हो सकती है। इस सूची को पढ़ते हुए मैं अपने देश, भारत के बच्चों के बारे में सोचे बगैर नहीं रह सका; आश्रम में रह रहे बच्चों के बारे में और उससे ज़्यादा उन बच्चों के बारे में जो आश्रम के स्कूल में पढ़ने आते हैं मगर अपने गरीब परिवार के साथ वहीं आसपास रहते हैं। स्पष्ट ही यूनिसेफ ने यह सूची विकसित देशों के गरीबों को ध्यान में रखकर बनाई है लेकिन उनकी आवश्यकताओं से युक्त इस सूची की तुलना भारत के गरीबों के लिए बनाई गई काल्पनिक सूची से करते हुए यह देखना कि उस सूची में कौन से बिन्दु होंगे और कौन से नहीं होंगे, बहुत रोचक हो सकता है। मैंने सोचा कि क्रमवार एक-एक बिन्दु को ध्यान में रखते हुए अपने विचार आज और कल की डायरियों में दर्ज करूँ।

1. तीन बार भोजन

2. कम से कम रोज़ एक वक्त मांस या मछली युक्त भोजन (या समतुल्य निरामिष आहार)

3. रोज़ ताज़ी सब्जियाँ और फल

अगर हम इन पहले तीन बिन्दुओं पर दृष्टिपात करें तो मैं कह सकता हूँ बहुत से भारतीय परिवार पहले बिन्दु पर ही संघर्ष करते नज़र आएंगे। दूसरे बिन्दु को पाना उनके लिए टेढ़ी खीर या लगभग असंभव होगा और तीसरे बिन्दु को तो भारत के संदर्भ में पूरी तरह छोड़ देना ही उपयुक्त है। भारत में ताज़े फल और सब्जियाँ बहुत महंगे होते हैं। आलू सबसे सस्ता होता हैं और अक्सर भोजन में पाया जाता है। भोजन की दूसरी वस्तुएँ कभी-कभार, विशेष आयोजनों पर थाली में दिखाई देती हैं। मौसमी सब्जियाँ और फल, जो सस्ते मिल जाते हैं सिर्फ अपने मौसमों में भोजन का हिस्सा बनते हैं।

फिर भी हर परिवार अपने बच्चों से प्रेम करता है और भरसक कोशिश करता है कि अपने बच्चों को अच्छे से अच्छा खाना खिलाए। हमारे स्कूल में जो बच्चे पढ़ने आते हैं उनके माता पिता भी इस आशा में ही अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं कि कम से कम यहाँ उन्हें भरपेट अच्छा भोजन प्राप्त होगा, जोकि स्कूल में उन्हें प्राप्त होता ही है। ऐसा होने पर उनकी कम से कम एक समस्या का समाधान हो जाता है। कम से कम उनके बच्चों का पेट भरा हुआ होता है!

4. उम्र के मुताबिक उपयुक्त पुस्तकें और जानकारियाँ (पाठ्य पुस्तकों के अतिरिक्त)

गरीब भारतीय अभिभावकों की शिक्षा का स्तर यूरोप के अभिभावकों के मुक़ाबले बहुत नीचा होता है। शायद ही यूरोप में कोई अशिक्षित व्यक्ति होगा जब कि, उदाहरण के लिए, हमारे प्रदेश में हर दूसरा व्यक्ति अनपढ़ है। ऐसे लोग अपने बच्चों के लिए स्कूली किताबों के अलावा दूसरी किताबें क्यों खरीदेंगे? बच्चों को पढ़कर कौन सुनाएगा? वे स्कूली किताबें खरीद पाए यही उनके लिए पर्याप्त संतोष की बात होती है, और इतना भी कर पाना अधिकांश परिवारों के लिए काफी मुश्किल होता है। इसीलिए हमारे स्कूल में स्कूली किताबें मुफ्त मुहैया कराई जाती हैं, और कुछ कहानियों की किताबें भी होती हैं जिससे बच्चे कम से कम यहाँ पढ़ने में आनंद का अनुभव कर सकें।

5. खेलने के मैदान और उपकरण जैसे साइकिल, रोलर स्केट्स आदि

यह बिन्दु ‘विश्रांति’ के बारे है। हर व्यक्ति को विश्रांति की आवश्यकता होती है, अपने मन के मुताबिक खेलने की या थोड़ा-बहुत मौज-मस्ती करने की; लेकिन इसके उपकरण भारत में मूल आवश्यकता की सूची में नहीं आ सकते। इस देश में जहां भूख और बाल-मजदूरी के खिलाफ लड़ाई अभी जारी है आपके रोलर स्केट्स और साइकिलें भारत के संदर्भ में गरीबी का पैमाना नहीं बन सकते।

एक अप्रासंगिक बात और! मैं अभी उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ जब भारत की सड़कों पर पहला व्यक्ति रोलर स्केटिंग करेगा। गुड लक!

जब मैं भोजन और शौच का समय निर्धारित नहीं कर पाया – 3 मार्च 13

सन 2005 लगातार वह पांचवां साल था जब मैं जर्मनी में प्रवास कर रहा था और हर बार यहां मेरे प्रवास की अवधि थोड़ी लंबी हो जाती थी। ज़ाहिर था कि अब मैं यहां के लोगों के बारे में बहुत कुछ जानने लगा था। कहने का अभिप्राय यह कि अब मैं धीरे धीरे न केवल पाश्चात्य और भारतीय संस्कृति एवं व्यवहार के बीच अंतर को पहचानने लगा था बल्कि उन खासियतों को भी बखूबी पहचानने लगा था जो विशेष रूप से जर्मनों में पाई जाती हैं। एक बात जो मैं जर्मनों के बारे में निश्चित रूप से कह सकता था वो यह कि इनकी जीवनचर्या बहुत ही सुव्यवस्थित और सुनियोजित जीवन होती है।

एक बार मैं अपनी एक कार्यक्रम आयोजक के साथ ठहरा हुआ था और उसके यहां प्रवास के दौरान जर्मनों की खासियत से जो मेरा परिचय हुआ वह काफी सख्त किंतु रोचक था। हुआ यों कि मैं उसके घर में ठहरा हुआ था और जिस शाम मैं उसके यहां पहुंचा, उसने मुझसे पूछा कि मैं कल सुबह नाश्ता किस वक़्त करना पसंद करूगा। मैंने उसकी तरफ देखा, मैं थोड़ा चकित था। उसने ‘किस समय’ शब्दों पर इतना जोर दिया था कि मुझे यकायक समझ नहीं आया कि क्या जवाब दूं। शाम के समय मुझे यह भी मालूम नहीं था कि मैं सुबह किस वक़्त उठ पाऊंगा और इसी वजह से कोई निश्चित समय बता पाना मेरे लिए मुश्किल था। मुझे यह पता था कि मेरे सत्र (सेशन) दस बजे शुरु होंगें, तो मैंने उसे कहा कि मैं उससे पहले नाश्ता कर लुंगा ताकि समय पर आयोजन स्थल पहुंचा जा सके।

अगले दिन मैं क़रीब नौ बजे नीचे आया तो मेरी आयोजक तैयार थी और हम दोनों ने साथ नाश्ता किया। दिनभर काम करने के बाद हमने डिनर भी साथ किया। जब मैं सोने के लिए ऊपर जाने वाला था तो उसने पूछा, "तो आप कल भी नौ बजे नाश्ता करेंगें?" मैंने हां कहा और सोने चला गया।

अगले दिन सुबह जब मैं नीचे आया तो वह पहले से ही खाने की मेज़ पर बैठी हुई थी और कल की तरह ही नाश्ता मेज पर लगा हुआ था। इससे पहले कि वह मुझे देख पाती मैंने उसे देख लिया और जो मैंने देखा उससे मैं एक तरह की अपराधभावना से ग्रस्त हो गयाः वह बड़ी बेसब्री से अपनी अंगुलियों से मेज पर तबला सा बजा रही थी और बार बार घड़ी की तरफ देखे जा रही थी। मैंने भी घड़ी की तरफ देखा, नौ बजकर पांच मिनट हो चुके थे। ज़ाहिर था कि वह इस बात से बेचैन थी कि मै अभी तक नाश्ते की मेज पर नहीं पहुंचा हूं। जो समय मैंने दिया था उससे पांच मिनट देरी से मैं पहुंचा था। जब मैं कमरे में प्रविष्ट हो गया तो उसने मुड़कर मेरी तरफ देखा और मुस्कराई। मैंने राहत की सांस ली और हमने आनंदपूर्वक नाश्ता किया।

मैं छोटी छोटी बातों को लेकर घड़ी की तरफ नहीं देखता था और कभी भी इस वजह से कार्यक्रम के लिए देरी नहीं हुई लेकिन किसी एक नियत समय पर भोजन करना मैं कभी निश्चित नहीं कर पाया। यही कारण था कि मैं अगली सुबह ठीक नौ बजे नाश्ते की मेज़ पर नहीं पहुंच पाया था और मैंने तुरंत इस बात पर अफसोस भी महसूस किया। उसने फिर पूछा कि मुझे देरी क्यों हो गई थी। तो मुझे लगा कि बहुत हो चुका, अब मुझे इस बारे में बात करनी ही पड़ेगी। मैंने उसे बताया कि मैं पहले से यह नहीं बता सकता हूं कि मुझे कब भूख लगेगी। मेरी बात उसके गले नहीं उतरी। मुझे लगा कि कहीं यह मुझसे यह न पूछ बैठे कि मैं शौच किस वक़्त जाऊंगा और अग़र निर्धारित वक़्त पर नहीं गया तो यह सवाल करेगी, "लेकिन आपने तो कहा था कि इस वक़्त जाएंगें"!

मुझे ग़लत न समझें, मैं यह जानता था कि वह महिला मुझसे स्नेह करती थी। वह यह ध्यान से देखती थी कि मैं क्या खाता हूं और ब्रेड पर क्या लगाकर खाता हूं और इस तरह वह मेरी पसंद व नापसंद की पूरी जानकारी रखती थी। अगले दिन वही सब चीज़ें नाश्ते में होती थी जो मुझे कल पसंद आई थीं। मेरी छोटी छोटी पसंद का ध्यान रखना यह दर्शाता था कि वह मुझसे कितना स्नेह करती थी।

उसी शहर में कुछ और लोग मिले जो अपने घर पर मेरा कार्यक्रम आयोजित करना चाहते थे। जब 2005 में मैं उनके यहां पहुंचा तो मुझे पता चला कि मेरी वह आयोजक अपना स्नेह प्रकट करने के चक्कर में कुछ ज्यादा ही आगे चली गई थी, उसने मेरे नए मेज़बानों को एक पूरी लिस्ट थमा दी थी जिसमें लिखा हुआ था कि मैं खाने में क्या पसंद और क्या नापसंद करता हूं।

यह बात और है कि वह लिस्ट ग़लत थी। मुझे उसका यह तरीका कतई पसंद नहीं आया। मैं कोई गुरु नहीं हूं। लिहाजा आपको ऐसा प्रदर्शित नहीं करना चाहिए कि आप मेरे निकटतम शिष्य हैं और आप लोगों को यह समझाते फिरें कि वे मेरे साथ किस तरह पेश आएं! मैं भी आप सब की तरह एक इंसान हूं। कुछ जानना चाहते हैं तो मेरे पास आइए और मुझसे पूछ लीजिए!

तो यह था मेरा अनुभव अति व्यवस्थित और अति नियोजित जर्मन जीवनशैली के साथ जो यह देखकर उलझन में पड़ जाते हैं कि आज आप निर्धारित समय से भिन्न समय पर पेशाब करने क्यों गए थे! अब मैं तो किसी एक निर्धारित समय पर पेशाब करने नहीं जाता हूं तो ऐसी अति नियोजित दिनचर्या का पालन करना मेरे बस की बात नहीं है!