क्या सोशल नेटवर्किंग साइट्स जीवन में अकेलापन पैदा कर रहीं हैं? 14 दिसंबर 2015

क्या सोशल नेटवर्किंग साइट्स जीवन में अकेलापन पैदा कर रहीं हैं

मैं कभी-कभी सोच में पड़ जाता हूँ कि अंततोगत्वा, लंबे अंतराल के बाद सोशल मीडिया का हमारे समाज पर क्या असर होगा। हालांकि सोशल नेटवर्किंग की शुरुआत ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को आपस में जोड़ने के उद्देश्य से की गई थी, मुझे लगता है कि वास्तव में वह लोगों में अकेलापन पैदा कर रही हैं।

मैं इस नतीजे पर कैसे पहुँचा? बहुत आसान है: मैंने इस बात पर गौर किया है कि अधिकतर लोग सोशल नेटवर्किंग साइटों पर क्या देखते हैं और उस पर उनकी प्रतिक्रिया क्या होती है! उन साइटों के साथ उनका संबंध अत्यंत विरोधाभासी होता है: ऐसा प्रतीत होता है जैसे वहाँ उन्हें अपनी पसंद का पर्याप्त मसाला नहीं मिल पा रहा है और वे बार-बार उन्हीं साइटों को खोलते हैं लेकिन फिर खिन्न होकर उन्हें बार-बार बंद भी कर देते हैं। जो कुछ वे देखते हैं, उसी से यह उदासी पैदा होती है: वे क्या देखते हैं? पार्टियाँ करते हुए, प्रसन्नचित्त होकर समय बिताते हुए और कुल मिलाकर जीवन का आनंद लेते हुए मित्रों के चित्र-परिवार के साथ, अन्य मित्रों के साथ, बहुत सारे लोगों के बीच!

और आप? आप यहाँ बैठे हैं अकेले, अपने मोबाइल फोन, टेबलेट या कंप्यूटर स्क्रीन पर टकटकी लगाए। आप उस मौज-मस्ती का हिस्सा नहीं हैं। पार्टी आपके बगैर जारी है। आपका कोई अपना, साथी या जीवन साथी, नहीं है जो आपको कैंडल लाइट डिनर पर बुलाकर अचरज में डाल दे, जैसा कि एक मित्र ने पोस्ट किया है। आप किसी हिप पार्टी में नहीं जाते, जहाँ हर व्यक्ति झूम-झूमकर नाचता-गाता है और उल्लास में सुध-बुध भूल जाता है। और लगता है, आप उन सब मित्रों से भी दूर हैं, जो इनका विवरण नेट पर पोस्ट करते हैं।

आपका सोशल नेटवर्क, जिसे आपको दूसरे लोगों से जोड़ने के लिए बनाया गया है, वही आपको पूरी तरह अपने हाल पर छोड़ देता है, अकेला और तनहा। वह अगर न होता तो आपको पता ही नहीं चल पाता कि दूसरे किस प्रकार आपकी अनुपस्थिति में आपस में मिल-जुलकर मौज कर रहे हैं। संभव है, तब आप घर में कोई किताब पढ़ते हुए या नहाते हुए या कोई भी अपनी मर्ज़ी का काम करते हुए अपने आप में मस्त रहे आते।

या, कम्प्यूटर के पर्दे को ताकते हुए, नेट पर लिखने के लिए कोई समझदारी से भरी बात पर अपना दिमाग खपाते हुए या ख़ुशी मनाते हुए अपनी कोई पुरानी फोटो तलाशते हुए आप भी वास्तव में बाहर निकल सकते हैं। दोस्त क्या-क्या मौज-मस्ती कर रहे हैं, इसकी ऑनलाइन ताक-झाँक करने की जगह आप किसी दोस्त को फोन कर सकते हैं, उससे रूबरू बात कर सकते हैं!

इस तरह सोशल मीडिया आपको अकेलेपन की ओर ले जा सकता है, जैसा कि इंटरनेट के आने से पहले संभव नहीं था। तब आप हर वक़्त उपलब्ध होते थे, तब आप अपने सभी स्कूली और कॉलेज के दोस्तों से, अपने कार्यालयीन सहकर्मियों से और अपने रिश्तेदारों से एक साथ और हर समय जुड़े होते थे।

इस बात को तब आप अधिक शिद्दत के साथ नोटिस करते हैं जब आप किसी परेशानी में होते हैं और किसी दोस्त की मदद चाहते हैं, जब आप संदेशों के ज़रिए तो लोगों के सम्पर्क में होते हैं लेकिन उनसे रूबरू सम्पर्क नहीं होता। क्योंकि जब आप पर आसमान टूट पड़ा है, आपको किसी गले लगाने वाले की ज़रूरत होती है, न कि किसी आभासी आलिंगन की। कोई वास्तविक कंधा, जिस पर सिर रखकर आप आँसू बहा सकें। कोई आपके पास आए और आपकी बात सुने, आपके वास्तविक जीवन में आपके साथ खड़ा होने वाला ऐसा कोई शख्स।

न भूलें कि सोशल नेटवर्क महज साधन है, ऐसी सुविधा, जिससे आप वास्तविक जीवन के अनुभवों को अधिक गतिशील और पुख्ता बना सकें, न कि वह यथार्थ का विकल्प है कि उसमें लिप्त होकर आप अपनी वास्तविक दुनिया से ही कट जाएँ। अपने सामाजिक जीवन में उसे आनंद-वृद्धि का साधन बनाएँ। उसके गुलाम बनकर उसे यह इजाज़त न दें कि वह आपको अकेलेपन और अवसादग्रस्तता की ओर खींच ले जाए!

भारतीय पुरुषों, अगर आप अपनी पश्चिमी साथी के साथ विदेश में बसने का मन बना रहे हैं तो कृपया इसे अवश्य पढ़ें – 6 जुलाई 2015

भारतीय पति या साथी के साथ भारत में बसने आई पश्चिमी महिलाओं के सामने आने वाली समस्याओं और चुनौतियों के बारे में लिखने के बाद आज और शायद अगले कुछ दिनों तक मैं बाज़ी पलटकर उन भारतीय पुरुषों के बारे में लिखूँगा, जो अपनी पश्चिमी पत्नियों या साथी के साथ पश्चिम में बसना चाहते हैं। अपने संबंधों में सामंजस्य पैदा करने के अलावा भी बहुत कुछ बाकी रह जाता है! और एक बहुत बड़ी बात होती है संयुक्त परिवार में सारा जीवन बिताने के बाद अचानक आप अपने आपको ऐसे समाज में पाते हैं, जहाँ वैयक्तिकता का बोलबाला है। पश्चिम में मैं जहाँ भी गया हूँ मैंने इसे सामान्य रूप से हर जगह मौजूद पाया है।

पहली बात- आप यह मानकर चलिए कि आप अपने साथी के माता-पिता या किसी दूसरे परिवार वाले के साथ रहने नहीं जा रहे हैं। अगर आपने इसके बारे में पहले सुन नहीं रखा है तो आपको यह बड़ा अजीब सा लग सकता है लेकिन 18 या 20 साल की उम्र में घर से बाहर निकल पड़ना पश्चिम में सामान्य सी बात है। इसलिए नहीं कि उनके घर में कोई समस्या है या उनकी आपस में पटती नहीं है- बल्कि यही वहाँ का रिवाज है। और जबकि भारत में भी युवक दूसरे शहरों में पढ़ने जाते हैं लेकिन वे सामान्यतया घर वापस लौट आते हैं, जिससे जहाँ तक हो सके, अपने माता-पिता और संयुक्त परिवार के साथ रह सकें।

पश्चिम में बिल्कुल शुरू से ही बच्चों को अपना काम भरसक खुद करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। यह एक तरह का व्यक्तिवाद है, 'मेरा' 'तुम्हारा' वाली सोच, जो कभी-कभी आपको बड़ा अजीब और औपचारिक लग सकती है। अधिकतर भारतीयों को यह एकाकी लगता है।

एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जो अपने भाई-बहनों, चाचा-चाचियों और दादा-दादी के साथ रहकर बड़ा हुआ है, अचानक एक खाली फ्लैट में पहुँचना बड़ा आश्चर्यजनक अनुभव हो सकता है। न बच्चों की खिलखिलाहटें, न परिवार के सदस्यों की शोरभरी बातचीत, न रसोई में बर्तनों का खड़कना! पूरे घर में ज़्यादा से ज़्यादा आपके एकमात्र साथी का स्वर- वह कितना हो सकता है? खैर, भारत में हर जगह मौजूद शोर की तुलना में पश्चिमी दुनिया के अधिकतर भागों में बेहद कम शोर होता है- लेकिन अपने घर में आप इस कमी को सबसे अधिक महसूस करते हैं। इस तथ्य का, कि घर में बस आप दो प्राणी ही हैं, आपको बहुत जल्दी आदी होना पड़ेगा या फिर तुरत-फुरत एक बच्चे के बारे में निर्णय लेना होगा!

इसके अलावा आपको यह भी समझना होगा कि इसका अर्थ है, पारिवारिक लोग भी आपस में उतने निकट नहीं होते जितने भारत में होते हैं। सामान्यतया वे भारतीयों जैसे जबरदस्त रूप से भावुक नहीं होते! भारत में परंपरागत रूप से पत्नी के घर में दामाद का स्वागत किसी राजकुमार की तरह किया जाता है। अगर आप अपने ससुर के यहाँ ऐसे किसी स्वागत की अपेक्षा कर रहे हैं तो, माफ़ कीजिए, वहाँ आपको बुरी तरह निराश होना पड़ेगा- सिर्फ इसलिए कि वे उतने भावुक नहीं होते कि भारत की तरह अपने रिश्तेदारों की आमद को किसी बड़े त्यौहार की तरह समारोह पूर्वक मनाएँ!

निश्चय ही, परिवार के सदस्यों के बीच आपसी प्रेम भी होता है और अलग-अलग परिवारों में आपसी निकटता की मात्रा ज़्यादा या कम हो सकती है। कहा जाना चाहिए कि यह संबंधित लोगों के अलग-अलग स्वभावों पर निर्भर करता है।

लेकिन अगर आप अकेलापन महसूस करने लगें तो हमेशा इस बात का स्मरण करें कि आप यहाँ, इस अजनबी मुल्क में क्यों आए हैं- उसके साथ जीवन बिताने के लिए, जिससे आप सबसे अधिक प्यार करते हैं! इसलिए उठिए और अच्छे विचार मन में लाइए और साथी के साथ अपने संबंधों पर मन को एकाग्र कीजिए! या इस बात का आनंद लीजिए कि अब आप एक भिन्न देश और भिन्न सांस्कृतिक वातावरण में जीवन बिता रहे हैं! इस पहलू पर मैं अधिक विस्तार से कल लिखूँगा।

अकेलेपन के एहसास से कैसे निपटें? 12 नवम्बर 2014

कुछ दिन पहले आश्रम में हमारे आयुर्वेद-योग अवकाश शिविर में भाग लेने एक महिला आई थी। आज मैं उसकी एक समस्या का ज़िक्र करूँगा और साथ ही उस समस्या का सामना करने के लिए उसे दी गई हमारी सलाहों के बारे में भी बताऊँगा। ऐसा करते हुए, स्वाभाविक ही मैं उसका परिचय गुप्त रखूँगा। मेरा विश्वास है कि उसका मामला और उसकी भावनाएँ दूसरे बहुत से लोगों से मिलती-जुलती हैं, विशेष रूप से पश्चिमी देशों में: वह अक्सर अकेलापन महसूस करती है।

पश्चिमी समाजों में व्यक्तिवाद को व्यापक रूप से दिए जाने वाले महत्व के बारे में मैं कई बार लिख चुका हूँ। शुरू से ही आपको स्वावलंबी होना सिखाया जाता है, न सिर्फ स्वतंत्रता पूर्वक रहना बल्कि अकेलापन महसूस न करना भी। यह सिखाया जाता है क्योंकि समाज में अक्सर बड़े, संयुक्त परिवार नहीं होते और लोग ज़्यादातर अकेले रहते हैं या कभी-कभी किसी महिला या पुरुष के साथ और कभी-कभी उनके एक या दो बच्चे भी हो जाते हैं। लेकिन ऐसा करते हुए भी इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि आपको कोई उपयुक्त साथी मिल ही जाए-और इसीलिए इस बात की भी कोई गारंटी नहीं होती कि आप अकेलेपन का सामना करना सीख सकें!

यही कारण है कि मेरी बहुत से ऐसे लोगों से मुलाक़ात होती रहती है जो मुझे बताते हैं की उनके पास बहुत अच्छी नौकरी है, वे बहुत रूपया-पैसा भी कमाते हैं लेकिन फिर भी नितांत एकाकी हैं और लोगों का साथ पाने को सदा लालायित रहते हैं। और अक्सर वे अपनी इस छोटी सी कामना की पूर्ति नहीं कर पाते।

जो महिला यहाँ आई थी, उसकी भी यही समस्या थी। वह तीस से अधिक उम्र की महिला थी और उसका न तो कोई साथी था और न कोई बाल-बच्चे थे। सिर्फ कुछ मित्र थे, जो शादीशुदा, बाल-बच्चेदार लोग थे। उसने बताया कि वह बहुत सामाजिक व्यक्ति नहीं है, बाहर निकलकर लोगों से मिलना-जुलना भी उसे अधिक पसंद नहीं है और नए मित्र बनाने में उसे बहुत वक़्त लगता है।

आयुर्वेद-योग अवकाश सत्र में हमने कुछ व्यायामों और मालिश की सहायता से उसकी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के इलाज के उपाय बताए लेकिन उसकी मानसिक और भावनात्मक समस्या अर्थात उसके अकेलेपन के निदान हेतु भी कुछ सुझाव दिए:

हमने उससे कहा कि वह कुछ देर बगीचे में काम करे और स्कूल के काम में भी मदद करे। जी हाँ, हमने उससे कहा कि अपने अकेलेपन से लड़ने के लिए उसे थोड़ा समय बच्चों के साथ और कुछ समय प्राकृतिक वातावरण में गुज़ारना चाहिए।

बच्चों के पास ऐसी शक्ति होती है, जो किसी पास नहीं होती: जब आप उनके साथ होते हैं तो किसी एक विषय या किसी ख़ास विषय पर बात करने की ज़रुरत नहीं होती, आपको उनकी किसी अपेक्षा की पूर्ति नहीं करनी पड़ती और न ही आपको उन्हीं की भाषा में बात करने की ज़रुरत पड़ती है। आप सिर्फ उनके साथ रहें और वे आपके साथ उसी तरह रहते हैं, उसी तरह का बर्ताव करते हैं जो वे दूसरे सभी लोगों के साथ करते हैं। आप उनके साथ, उनके लायक किसी न किसी गतिविधि में लग जाएँ तब आप देखेंगे कि आपको कितना आनंद प्राप्त होता है! एक ऐसा एहसास, जो आपके अकेलेपन के एहसास के साथ लड़ता है क्योंकि अचानक आपके पास बहुत सारे मित्र मौजूद होते हैं!

और प्रकृति का भी, हालाँकि बहुत अलग ढंग से मगर पूरी तरह वही असर होता है। बाहर निकलकर समय गुज़ारें, पेड़-पौधों के साथ, फूल-पत्तों और उनकी जड़ों के साथ सम्बन्ध बनाएँ। मैं जानता हूँ कि अब आप सोच रहे होंगे कि मित्रों के साथ, वास्तविक मनुष्यों के साथ निकटता के यह विकल्प नहीं हो सकते और हो सकता है कि कुछ हद तक आप सही हों। लेकिन घर में बैठने की जगह बाहर निकलने की कोशिश कीजिए। बाहर समय बिताइए और आप देखेंगे कि उससे आपमें एक तरह का संतुलन पैदा हो रहा है, दूसरी चीजों के साथ आपको सामंजस्य का एहसास होगा। कंक्रीट की चार दीवारों के भीतर अपनी बैठक में टीवी सीरियल देखते हुए आपको यह एहसास कभी नहीं होगा!

अब आप मेरे विचारों के विरुद्ध बहुत से तर्कवितर्क और दलीलें लेकर आएँगे। उनकी तरफ ध्यान न दें, बस इन उपायों पर अमल शुरू कर दीजिए। प्रकृति, कोई बगीचा या पार्क आपको हर कहीं मिल जाएँगे। स्वाभाविक ही हर जगह, आसपास आपको प्राथमिक शालाएँ या बालविहार (किंडरगार्टन) नहीं मिलेंगे, जहाँ आप बच्चों के साथ समय बिता पाएँ। लेकिन ऐसी बहुत सी परियोजनाएँ होती हैं, कई संगठन होते हैं या दूसरी जगहें (बच्चों के संस्थान) होते हैं, जो ठीक यही चाहते हैं कि कोई आकर उनके बच्चों के साथ समय बिता सके, उनके साथ खेल सके, बातचीत कर सके। ऐसी जगहों को ढूँढ़कर वहाँ पहुँचें और उनकी मदद करें और आप महसूस करेंगे कि आप सिर्फ उनकी मदद नहीं कर रहे है बल्कि खुद अपनी भी कर रहे है!

पुनः एक परिवार की तरह कैसे रहा जा सकता है, इस पर तीन सलाहें – 4 जून 2014

कल मैंने आपको बताया था कि कैसे चीजों को ‘पश्चिमी’ और ‘भारतीय’ खांचों में विभक्त करना मुश्किल हो गया है और आज मैं एक ऐसे तथ्य पर अपने विचार रखूँगा, जो शायद सांस्कृतिक और परंपरागत भिन्नता के कारण, पश्चिम में ज़्यादा अनुभव किया जाता है: बहुत से परिवारों में पारिवारिक जीवन लगभग नदारद होता है। अभिभावक अपना जीवन जीते हैं और बच्चे अपना अलग जीवन- वे साथ में कुछ भी नहीं करते और कहा जा सकता है कि अब वास्तव में वे एक-दूसरे को जानते भी नहीं हैं।

मुझे लगता है कि बढ़ते व्यक्तिवाद के चलते समाज में यह परिघटना देखने में आ रही है, जिसे पश्चिम में और अब भारत में भी अधिक से अधिक प्रोत्साहित भी किया जाता है। विभिन्न कारणों से परिवार के दोनों अभिभावक काम पर चले जाते हैं और बच्चे पहले विभिन्न शिक्षा संस्थानों में पढ़ने जाते हैं और जब वे पर्याप्त आयु प्राप्त कर लेते हैं तो अपनी राह आप चुन लेते हैं- दोस्तों के साथ बाहर निकल जाते हैं और अपना भला-बुरा खुद तय करते हैं।

मैं जानता हूँ कि समय के साथ ये बातें वैसे भी होने ही वाली होती हैं। बच्चे बड़े होते हैं, किशोरावस्था प्राप्त करते हैं और फिर वयस्क हो जाते हैं और उसके बाद अभिभावक बच्चों की गतिविधियों में शामिल नहीं होते। लेकिन यह दस साल की उम्र में नहीं होना चाहिए! वास्तव में अभी आप बहुत कुछ साथ मिलकर कर सकते हैं, उनकी किशोरावस्था तक भी। और मुझे लगता है कि आपको ऐसा करना चाहिए!

आप पूछेंगे कि वे सामान्य गतिविधियां क्या हो सकती हैं तो मेरे पास आपके लिए कुछ सुझाव हैं:

1. सारे परिवार के सदस्य दिन भर में एक बार भोजन साथ करें। मैं समझ सकता हूँ कि दोपहर के भोजन के वक़्त सारे सदस्य घर में नहीं हो सकते लेकिन रात का भोजन तो साथ कर सकते हैं! आपके बच्चे शिकायत करेंगे कि उन्हें टीवी देखना है मगर आप अभिभावक हैं और आपको घर के नियम तय करना है। एक बार समय निकालकर साफ-साफ़ बता दें कि सबको रात के भोजन के वक़्त टेबल पर उपस्थित होना है और आप खुद भी इस नियम कड़ाई के साथ पालन करें!

2. छुट्टियाँ मनाने साथ-साथ जाएं। जी हाँ, एक उम्र के बाद आपके बच्चे अपना खुद का कोई अलग कार्यक्रम रखना चाहेंगे लेकिन फिर भी साल में दोबारा एक बार आप परिवार के साथ, एक या दो सप्ताह का कोई न कोई कार्यक्रम अवश्य रखें जब आप सभी परिवार के सदस्य एक साथ समय गुज़ार सकें! अगर आप लम्बी दूरी का कार्यक्रम न रख सकें तो एक दिन के लिए ही कहीं साथ जाकर शिविर लगा लें या रिश्तेदारों के यहाँ हो आएँ। सौ बात की एक बात: फुरसत के समय परिवार और बच्चों के साथ मिलकर कुछ न कुछ अवश्य करें!

3. परिवार के दूसरे सदस्यों के जीवनों में भागीदारी कीजिए। एक-दूसरे के साथ बातचीत कीजिए, घर के किसी भी काम की योजना को आपस में चर्चा करने के बाद अंतिम रूप दीजिए और बच्चे जिन बातों को महत्वपूर्ण समझते हैं, उनमें शामिल होइए। अगर बच्चे किसी तैराकी प्रतियोगिता में हिस्सा ले रहे हैं तो उन्हें प्रोत्साहित करने उनके साथ अवश्य जाइए! स्कूल के समारोहों में उनके साथ जाइए! उन्हें भी बताइए कि आपके लिए जीवन में क्या महत्वपूर्ण है!

परिवार को पुनः जोड़ने की दिशा में ये कुछ सुझाव और विचार हैं। गलत मत समझिए: न तो मैं पुरानी पारिवारिक परम्पराओं को बचाकर रखना चाहता हूँ और न ही पुराने मूल्यों को बनाए रखना चाहता हूँ। मैं जीवन जीने के आधुनिक तौर-तरीकों के खिलाफ भी नहीं हूँ लेकिन मेरा विश्वास है कि बच्चों के लिए अकेले व्यक्ति के रूप में, एक-दूसरे से अलग रहना ठीक नहीं कहा जा सकता बल्कि उनके लिए सबके साथ रहना बहुत महत्वपूर्ण है!

पश्चिमी देशों में एकाकी वृद्धों की समस्या – 14 अप्रैल 2013

2005 में जिन लोगों से मैं मिला उनमें एक अवकाश प्राप्त अधेड़ भी था जिससे मेरे दोस्ती हो गई थी और जिसने अपनी कथा मुझसे साझा की थी। मैं पहले भी उससे मिलते-जुलते बहुत से प्रकरण देख चुका था मगर क्योंकि इससे मेरे घनिष्ठता हो गई थी इसलिए इस प्रकरण को मैंने अधिक विस्तार से जाना और उसने मेरे सामने यह स्पष्ट किया कि अपने परिवार से अलग जीने की पश्चिमी पद्धति मानसिक और भावनात्मक दृष्टिकोण से उचित नहीं है, खासकर बुढ़ापे में। वह उन्हें एकाकी बना देती है।

अपने नए मित्र की कहानी सुनते हुए बार-बार मुझे मुख्य रूप से यही महसूस हुआ। अपनी पत्नी के साथ रहने के बावजूद वह एकाकी था। उसके ज़्यादा नजदीकी मित्र नहीं थे और उनके पारिवारिक संबंध भी मजबूत नहीं थे। इसके विपरीत अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ उसका वाद-विवाद और झगड़ा भी होता रहता था।

मुझे वह भावनात्मक रूप से बहुत विक्षुब्ध प्रतीत हुआ, अपने गुस्सैल पिता द्वारा शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित और सारी दुनिया से खफा और निराश। मेरा यह अनुमान तब पक्का हो गया जब उसने बताया कि वह दो बार आत्महत्या की कोशिश भी कर चुका था, ज़ाहिर है असफल रहा।

मेरी इच्छा थी कि उसकी कुछ सहायता करूँ और हम दोस्त बन गए। मैंने सोचा कि जब कोई अकेलापन महसूस करता है तो उनकी सहायता करने के लिए कुछ खास नहीं करना पड़ता, सिर्फ उनके साथ बने रहिए।

तो मैं उसके साथ रहा। उसने अपने घर कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए मुझे आमंत्रित किया और मैं चला गया। कार्यक्रम हमेशा की तरह बड़ा सफल रहा। वह नई जगह थी और कार्यक्रम के दौरान बहुत से लोगों से मिलकर उसे अच्छा लगा। वह सोच रहा था कि कम से कम कुछ लोगों से तो वह दोस्ती कर ही सकता है और यह जानकर मुझे भी बड़ी खुशी हुई। मैंने भी उसे आमंत्रित किया और कुछ समय बाद वह अपनी पत्नी के साथ भारत आया।

जब हम और नजदीक आए, उसने मुझे भाई कहना शुरू कर दिया क्योंकि पहले उसने किसी के साथ ऐसा भ्रातृवत संबंध महसूस ही नहीं किया था, यहाँ तक कि अपने सगे भाई से भी नहीं। मेरे लिए यह ठीक ही था-भारत में तो जिसे आप चाहें संबंधी बना लेने का चलन आम है, किसी को भी आप भाई, बहन, चाची या चाचा कह सकते हैं, यह दर्शाने के लिए कि उन्हें आप इन रिश्तों जितना ही करीबी और अपना समझते हैं।

लेकिन उसके लिए यह बड़ा ज़बरदस्त अनुभव था और पुनः मुझे दोनों संस्कृतियों के बीच के अंतर का एहसास हुआ। भारत में आम तौर पर परिवारों में कोई न कोई रिश्तेदार आपके आसपास होता है जो उसी घर में निवास करता है, आप उसके साथ दिन-रात बातचीत करते हो, जिसके साथ आप समय गुजारते हो और जिस पर आपका किसी भी दूसरे व्यक्ति से अधिक भरोसा होता है। परिवारों में बंधन आम तौर पर बड़े मजबूत होते हैं।

पश्चिम में, जैसा कि मैं इस व्यक्ति को और कई दूसरे व्यक्तियों को देखकर भी कह सकता हूँ कि वहाँ लोग इस बात को बड़ा महत्व देते हैं कि आप पूर्णतः स्वतंत्र रहें। वे परिवार के साथ नहीं रहना चाहते। अगर आप वैसा करते हैं तो आपको कमजोर समझा जाता है, अर्थात आप इतने मजबूत नहीं हैं कि अकेले रह सकें, अपना बोझ खुद उठा सकें। बचपन से ही सिखाया जाता है कि उन्हें खुद अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए। अगर आपने अपना जीवन साथी खोज लिया है तो ठीक है। अगर आपके बच्चे हैं तो आप उनकी युवावस्था तक उनके साथ रह सकते हैं लेकिन उसके बाद, जब आप खुद बूढ़े हो जाएंगे, आपको अकेले रहना होगा।

लोगों को इससे तकलीफ है मगर यही वहाँ का यथार्थ है और उन्हें यह स्वीकार करना पड़ता है। वे अपने परिवार से निराश होते हैं, पूरी व्यवस्था से ही दुखी हैं मगर सच्चाई यही है कि यह एक सामान्य बात है। इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता और एक के बाद एक पीढ़ियाँ गुज़रती रहती हैं, अपनी वृद्धावस्था अकेलेपन में व्यतीत करते हुए, अपने प्रियजनों के विरह में, अपने परिवार के प्रेम की कमी महसूस करते हुए।

एकाकी व्यक्ति की मदद करने के बदले में मिली हावी होने की तीव्र इच्छा – 17 फरवरी 13

अपनी यात्राओं के दौरान मैं किस्म किस्म के लोगों से मिलता रहता हूं। पिछले कुछ हफ्तों में मैंने आपको बताया भी था कि सन 2005 में एसोटेरिक्स (आधुनिक अध्यात्मवादी) से कई बड़ी दिलचस्प मुलाकातें हुईं। मैं हीलिंग, योग और ध्यान के सत्र कर रहा था तो ज़ाहिर है कि मैं हमेशा ‘ऊर्जा’ में रुचि रखने वाले लोगों से घिरा रहता था। कई बार मुझे ऐसा महसूस होता था कि इस बारे में उनकी आस्था मेरी तुलना में अधिक गहन थी। इन लोगों में एक बात मैं नोट किया करता था कि इनमें से अधिकतर घोर एकाकीपन की समस्या से ग्रस्त थे।

पश्चिमी देशों में सालोंसाल सैंकड़ों व्यक्तिगत सत्रों के दौरान मैंने अकसर यह सुना कि लोग खुद को अकेला महसूस करते थे और इस बात से नाखुश थे कि उनके जीवन में ऐसे लोग नहीं हैं जो उन्हें प्यार दे सकें या वे लोगों को प्यार दे सकें। जीवन में आदान और प्रदान दोनों का बराबर महत्व है। इन लोगों को इस बात की कमी सालती थी ज़िंदग़ी में कभी भी उन्हें स्नेहभरा स्पर्श नहीं मिला। यह बात भी उन्हें उतना ही दुख पहुंचाती थी उनके जीवन में कोई ऐसा नहीं है जिसको उनकी जरूरत हो, जिसकी जरूरतों के बारे में वे सोच सकें या बस यूंही किसी के काम आ सकें।

सन 2005 में एक ऐसे ही व्यक्तिगत हीलिंग सत्र के दौरान एक महिला से मेरी मुलाकात हुई। उसने बताया कि बचपन में उसके पिता उसका यौन शोषण करते रहे। इस अनुभव ने उसके दिल पर गहरे ज़ख्म छोड़े और यही कारण है कि उसके जीवन में कभी कोई पुरुष नहीं रहा। उसे इस बात का कोई अफसोस नहीं था उसका कोई प्रेमी नहीं था। हां, ज़िंदग़ी में बच्चों की कमी उसे ज़रूर सालती थी। मैंने उसे कहा,” आप मुझे अपना बेटा मान सकती हैं।“

मैं उसे इस अहसास से मुक्ति दिलाना चाहता था कि वह इस दुनिया में नितांत अकेली है और इसीलिए मैंने घनिष्ठ मैत्री का सुझाव दिया था। मैं कई बार उसके घर गया और उसे भारत में मेरे घर आने का निमंत्रण भी दिया। वह भारत आई भी और उसे बहुत अच्छा लगा। मैं स्वभावतः अपनी भावनाओं को साझा करने में गुरेज़ नहीं करता था और साथ ही उसकी भावनाओं को भी सुनता था। मुझे यकीन था की हमारी इस दोस्ती ने उसके एकाकीपन के अहसास को कम करने में मदद की थी।

कुछ समय तक तो सब कुछ ठीक चलता रहा। मेरे ख्याल से वह वास्तव में मुझसे प्यार करती थी परंतु कुछ समय बाद मुझे लगने लगा कि इस प्यार में उम्मीदें बहुत थीं। वह मुझ पर अधिकार जताने लगी थी। शायद वह चाहती थी कि मैं बिल्कुल उस जैसा बन जाऊं। उसकी उम्मीदें पूरी करना मेरे लिए नामुमकिन था और न ही मैं यह करना चाहता था। मेरे विचार से गहरी दोस्ती वह होती है जहां दो अलग अलग व्यक्तित्व एक दूसरे को प्यार देते हैं किंतु फिर भी जीवन के प्रति अपना अलग अलग नज़रिया रखते हैं, धारणाएं रखते हैं। उसकी धारणाएं, उसका ज़िंदगी जीने का तरीक़ा और खासकर उसकी एसोटेरिक अवधारणाएं मैं अपने जीवन में कदापि स्वीकार नहीं कर सकता था और न ही करना चाहता था।

मुझे लगने लगा था कि वह मुझ पर अपना नियंत्रण चाहती थी, वह चाहती थी कि मैं भी उसकी तरह सोचने लगूं। बातों ही बातों में कई बार उसने मुझे इशारा भी दिया कि वह सोचती है कि उसकी मृत्यु के बाद उसके मकान का क्या होगा। उसने मुझे साफ शब्दों में कहा भी कि यदि हम दोनों साथ रहें और जैसा वह चाहती है वैसा मैं करूं तो मैं उसके मकान का वारिस बन सकता हूं। इस सारे प्रकरण में मेरी ऊर्जा नष्ट होने लगी थी। मैं मानसिक तौर पर कमजोरी महसूस करने लगा था और मेरे शरीर पर भी इसका दुष्प्रभाव पड़ने लगा था।

मैं अपनी तरफ से भरसक कोशिश की मगर अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाया। इस महिला के जीवन के खालीपन को भरने के बजाए, उसके एकाकीपन को कम करने के बजाए, मैं एक अजीब सी भावना से ग्रस्त हुआ जा रहा था। मैं यह भी जानता था कि यह सब बहुत लंबा नहीं चल सकता था। जो भी हो रहा था वह न मेरे लिए श्रेयस्कर था और न ही उसके लिए। अंततः मैंने अपने मन की बात उसके सामने रख दी और और हमारे संबंध का अंत हो गया। इस सारे प्रकरण से एक बात जो उभरकर सामने आई वह यह कि कुछ अवधारणाएं, कुछ विश्वास मेरी जीवनशैली से मेल नहीं खाते थे।