यूरोप में शरणार्थियों की दुखद परिस्थिति – 31 अगस्त 2015

पिछले कुछ हफ्तों से मुझे बड़ी संख्या में बेहद विचलित और विक्षुब्ध कर देने वाले समाचार मिल रहे हैं-क्योंकि लाखों लोग तकलीफ झेल रहे हैं।

कहा जा सकता है कि यूरोप में शरणार्थियों की बाढ़ आई हुई है। यह भी कहा जा सकता है कि कुछ देशों में लंबे समय से चले आ रहे खराब हालात अब चरम पर पहुँच गए हैं और लाखों लोग अपने घर-बार और देश छोड़कर, जहाँ सिर समाए भाग निकलने को मजबूर हो चुके हैं। और वही लोग अब यूरोप पहुँच रहे हैं, अक्सर बड़े खतरनाक रास्तों से और बेहद तकलीफदेह यात्राएँ करके। सिर्फ शरणार्थियों की विशाल संख्या ही यूरोपीय देशों को प्रलयंकारी नज़र आ रही हैं। और इसलिए शरणार्थी आवास, अस्थाई कैंप, व्यायामशालाएँ, टाउनहॉल, पुराने मालगोदाम, और ऐसी ही दूसरी तमाम जगहें लोगों से बजबजाई हुई हैं। सरकारें संघर्ष कर रही हैं कि प्रशासन तेज़ गति से काम करे और दफ्तरी औपचारिकताओं को जल्द से जल्द निपटाया जाए।

रिपोर्टों का अवलोकन करने, उनकी कहानियाँ पढ़ने और यह जानने के बाद कि वे लोग किन बदतरीन स्थितियों से गुज़र रहे होंगे, आप अवसादग्रस्त हो जाते हैं कि इस तरह की चीज़ें वर्तमान में, आज की दुनिया में भी संभव हैं। परिवार, जिन्होंने यह यात्रा साथ-साथ शुरू की थी, बीच रास्ते में इधर-उधर बिखर गए। अभिभावक अपने बच्चों की खोज में लगे हुए हैं, पति अपनी पत्नियों को ढूँढ़ रहे हैं। दूसरे बहुत से हैं, जो जान गए हैं कि अब अपने रिश्तेदारों को ढूँढ़ना व्यर्थ है, वे अब ज़िंदा नहीं बचे हैं।

वे सैकड़ों, हजारों मील लंबा रास्ता पैदल चलकर आए हैं। उनमें से बहुत से उस भयानक जहाजों और नावों में सवार थे और किसी तरह भूमध्य सागर पार करने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन बहुत सी नावें बीच समुद्र में डूब गईं, अर्थात उनमें सवार हजारों लोग निश्चित ही मारे गए। पिता अपने बेटों और बेटियों को डूबता देखता रह गया-उन्हें अमानवीय दैत्यों ने जहाज़ से उठाकर बाहर फेंक दिया, जबकि सुरक्षित उस पार पहुँचाने की एवज में वे पहले ही बहुत बड़ी रकम ले चुके थे।

दलाल, बिचौलिये, गुंडे, अपराधी, सभी उन लोगों का शोषण कर रहे हैं, जो पहले ही युद्ध और अपने देशों के तानाशाहों की प्रताड़ना से बुरी तरह टूट चुके हैं, अपने धर्म और अपनी जाति के कारण आतंकियों के ज़ुल्मों सितम झेल चुके हैं। इस आशा में कि उन्हें कहीं कोई शांतिपूर्ण, सुरक्षित जगह रहने को मिल पाएगी- कहीं न कहीं, कहीं भी, थोड़ी सी जगह – वे यह भयंकर शोषण, मारपीट, अपमान सहन करते चले जा रहे हैं और अंततः यूरोप के किसी अजनबी हाइवे पर किसी ट्रक के पीछे दम घुटने से मारे जा रहे हैं या और भी कई तरह से मृत्यु का खतरा उठा रहे हैं।

वे काँटेदार तारों की बाड़ लांघकर या नीचे से निकलकर सीमा पार करते हैं। बिना टिकिट ट्रेनों में चढ़ जाते हैं। वे गैरकानूनी रूप से सुरंग के भीतर प्रवेश कर जाते हैं और समुद्र के नीचे 50-50 किलोमीटर पैदल चलकर किसी न किसी तरह उस पार निकल जाते हैं। वे पहले से खुद ही गैरकानूनी हो चुके हैं, उनमें अब कोई शक्ति नहीं बची है, प्राणों के सिवा वे अपना सब कुछ खो चुके हैं और क्वचित ही किसी का कोई रिश्तेदार बचा है। इससे बुरा और क्या हो सकता है?

ओह! क्या ऐसा भी हो सकता है! दुर्भाग्य से यह सच सिद्ध हो रहा है: जब उन्हें वादे के मुताबिक़ किसी जगह पर पहुँचा दिया जाता है कि अब वे वहाँ रह सकेंगे, कागज़ी कार्यवाहियाँ चल रही हैं, शायद वीजा मिल जाएगा, मामूली रोज़गार करने की इजाज़त मिल जाएगी, सम्भव है, शरण भी मिल जाए- तभी उनका सामना लोगों की भीड़ से होता है, जो उनके अस्थाई आवासों के सामने आंदोलन कर रहे होते हैं, नारेबाज़ी कर रहे होते हैं, उन्हें उनका वहाँ होना पसंद नहीं है! उनके आबाद होने से पहले ही, उनके सामने कुछ लोगों ने उनके घरों में आग लगा दी है! सुना है, लोग सड़कों पर निकल आए हैं और उन्हें निकाल बाहर करने की मांग कर रहे हैं- उनकी उपस्थिति उन्हें पल भर के लिए भी बर्दाश्त नहीं है!

इतनी दूर बैठकर भी ये समाचार देखकर मेरा मन दुःख और अवसाद से भर उठता है, कि हालत यहाँ तक पहुँच गई है! बहुत से लोगों के जीवन में न सिर्फ इतना भयानक परिवर्तन आया हुआ है बल्कि उसने उन्हें बरबाद कर दिया है, वे परिस्थितियों के ग्रास बन रहे हैं, मर-खप रहे हैं! इतनी बड़ी संख्या में लोग भीषण दुःख उठा रहे हैं, जबकि कुछ लोगों ने अपने लिए आवश्यकता से अधिक सरंजाम इकठ्ठा कर रखा है!

और बहुत से लोग हैं जो उनके विरुद्ध अपमानजनक नारे लगा रहे हैं, अखबारों में लेख लिख रहे हैं, आंदोलन कर रहे हैं कि इन पीड़ित, मार खाए लोगों को वे बर्दाश्त नहीं करेंगे। यह आश्चर्यजनक है, मेरी कल्पना से बाहर की बात है!

लेकिन अंत में आशा की किरण भी दिखाई देती है, लंबी अँधेरी गुफा के बाद प्रकाश चमक रहा है क्योंकि और भी लोग हैं- ऐसे लोग, जो अलग तरह से सोचते हैं, जिनकी इंसानियत अभी मरी नहीं है, वे मदद का हाथ बढ़ा रहे हैं! लेकिन उनके विषय में मैं कल लिखूँगा।

दुखद हादसों के बाद भी कैसे जीवन अपनी गति से चलता रहता है – 26 अक्टूबर 2014

सन 2006 की सर्दियों में जर्मनी वापस आकर मैं और यशेंदु उसी तरह काम करने लगे जैसे अपनी बहन की मृत्यु से पहले किया करते थे। एक के बाद दूसरी जगह यात्रा करते हुए, एकाध हफ्ता हर जगह रुककर अपनी कार्यशालाएँ और व्यक्तिगत-सत्र आयोजित करते हुए। जीवन में जब कोई दुखद हादसा होता है तब भी आपको अपना काम तो उसी तरह करते रहना पड़ता है लेकिन ऐसे हादसे आपका जीवन बदलकर रख देते हैं-और आप रोज़मर्रा के काम करते हुए भी इस परिवर्तन को महसूस करते हैं।

हम अपने भारतीय बाँसुरी-वादक के साथ यूरोप के कई शहरों और कस्बों में घूमे। हम बेहद दुखी थे लेकिन ऐसी मानसिक अवस्था में भी लोगों से मिलते, अपनी कार्यशालाएँ आयोजित करते, उनके साथ मुस्कुराते और आपसी अनुभव साझा करते। जब आप अपने मस्तिष्क को अपने दुःख से इतर किसी दूसरी बात में व्यस्त कर देते हैं तो दुःख के बारे में न सोचना आसान हो जाता है, उसी दुःख में हर वक़्त लिप्त न रहना आसान हो जाता है और सामान्य रूप से सोचना, बातचीत करना, प्रतिक्रिया व्यक्त करना संभव हो पाता है। लेकिन अपने व्यक्तिगत सत्रों के दौरान मुझे बहन की याद बार-बार आती रही।

मेरे पास लोग अपनी समस्याएँ लेकर आते हैं और अक्सर वे मानसिक समस्याएँ होती हैं। तो उस बार, जब एक महिला मेरे पास आई और बताया कि उसके पति का देहांत हो गया है तो मुझे अपनी बहन की याद कैसे न आती? मैंने उससे अपना दुःख भी साझा किया। कुछ देर हम यूँ ही मौन बैठे हुए अपने-अपने गुज़र चुके प्रियजन को महसूस करते रहे और फिर उसके बगैर दैनिक जीवन में होने वाले अनुभवों और एहसासात को साझा किया। अंत में मैंने उससे कहा कि हमें अपना जीवन जीते रहना होगा और हमने एक-दूसरे की आँखों में देखा और महसूस किया कि हम ऐसा ही करेंगे।

फिर एक बार एक और महिला आई और बताया कि उसके भाई के साथ उसका झगड़ा हुआ है। इतनी बुरी तरह लड़ाई हुई है कि उसने अपने भाई के साथ सारे सम्बन्ध तोड़ लिए है। भरी आँखों से उसने कहा कि वह उससे प्रेम तो करती है मगर भविष्य में कभी भी उसका मुँह नहीं देखना चाहती। लगता था, वह परस्पर विरोधी भावनाओं के बीच उलझ गई है, किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई है। यह सोचकर मैं खुश हुए बगैर नहीं रह सका कि मेरे और मेरी बहन के बीच कभी भी इस तरह झगड़ा नहीं हुआ। मैंने उसे इस सचाई का एहसास कराने की कोशिश की कि जीवन बहुत छोटा हो सकता है। जब वह उसे प्रेम करती है तो हमेशा इस बात को याद रखे और इस झगड़े को अपने सम्बन्ध का आखरी पड़ाव न बनने दे। एक छोटी सी लड़ाई पर सम्बन्ध समाप्त न करे- कल क्या होगा, आप नहीं जानते!

मैं उन मित्रों के साथ, जो उसे भी जानते थे, कई बार बैठकर रोता रहा। हम उसे याद करते रहे और मुझे चाहने वालों ने एक बार फिर मुझे ढाढ़स बंधाया।

वास्तव में जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता रहा और साथ ही परा हर वक़्त मेरे साथ बनी रही और एक दिन भी ऐसा नहीं गुज़रा जब मैंने उसे याद न किया हो या उसके बारे में न सोचा हो।

प्रियजन के विछोह को शब्दों में वर्णन करना संभव नहीं! 5 अक्टूबर 2014

पिछले रविवार को मैंने आपको बताया था कि 18 सितंबर 2006 के दिन मेरी बहन की मृत्यु कैसे हुई। उसकी मृत्यु के बाद के दिन एक धुंधलके की तरह गुज़र गए। मुझे याद नहीं है कि उस समय ठीक-ठीक क्या हुआ था लेकिन उस समय हम पर छाए हुए गहरे शोक की याद आज भी ताज़ा है।

उसकी मृत्यु के बाद हम लोग घर पर क्या कर रहे थे? वास्तव में हमारे पास करने के लिए कुछ भी नहीं था। सिर्फ हम लोग एक-दूसरे को कसकर थामे हुए थे, अपने विषाद में एक-दूसरे का ढाढ़स बंधा रहे थे। नानी जी ने अपनी नातिन को खोया था। बब्बाजी और अम्माजी ने अपनी एकमात्र बेटी खो दी थी और हम तीन भाइयों ने अपनी बहन को खोया था।

शुरू में, काफी समय तक मैं बुरी तरह सदमे में रहा। मैं रोया नहीं था। मैंने अपनी रोती माँ को अपनी बाँहों में भरा हुआ था, मैं इतना शोकाकुल था कि आज तक वैसा दुखी कभी नहीं हुआ मगर मैं रो नहीं पा रहा था। हम परा के बारे में बातें करते रहे और सोचते रहे कि उसके बिना हमारा भविष्य कैसा होगा। वह बेहद मटमैला, विषादग्रस्त और एकाकी दिखाई दे रहा था। सब रोए-मगर मैं रो ही नहीं पा रहा था।

मुझे लगता है कि सदमे ने मेरे मस्तिष्क को बुरी तरह झँझोड़ दिया है। मुझे अधिक नींद की ज़रूरत कभी नहीं पड़ी लेकिन उन दिनों मैं बुरी तरह सोता था। ऐसी ही किसी रात के बाद सबेरे अपने कमरे से लगभग उनींदा सा मैं बाहर आया तो मेरे मन में एक हास्यास्पद विचार कौंधा, जो पल भर के लिए मुझे हर बात का समाधान नज़र आ रहा था। जब मुझे यशेंदु दिखाई पड़ा तो मैंने उससे कहा कि तुरंत कंप्यूटर चालू करे: हम गूगल पर उसे ढूँढ़ते हैं! हाँ, वह कहीं नहीं गई है, हम उसे पा लेंगे! मैं उस कड़ुवी सच्चाई को हजम नहीं कर पा रहा था, यथार्थ का सामना करना मेरे लिए असंभव हो रहा था।

परा की मृत्यु के बाद कुछ दिनों तक बहुत से लोग घर आते रहे। यहाँ तक कि दुनिया के कोने-कोने से बहुत से दोस्तों ने अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए ईमेल भेजे, मोबाइल संदेश भेजे या फोन किया। हर ईमेल के बाद, उनके हर शब्द के बाद, जिसमें वे उसके साथ बिताए समय का ज़िक्र करते या सिर्फ मानसिक संवेदना प्रेषित करते, मैं महसूस करता कि सिर्फ मैंने और मेरे परिवार ने ही उसे नहीं खोया है बल्कि और भी बहुत सारे लोगों ने उसे खो दिया है। वह अभी बहुत छोटी थी, दुनिया में उसे बहुत कुछ देखना बाकी था और उसके साथ दुनिया में न जाने कितने लोगों के दिलों को स्पंदित होना था!

यहाँ तक कि एक करीबी मित्र, जिसके यहाँ परा को जर्मनी पहुँचने के बाद रुकना था, फ्लाइट पकड़कर आश्रम आ गई। सिर्फ हमारे साथ रहने के लिए, परा के लिए हमारे शोक में शामिल होने के लिए, वह इतनी दूर चली आई।

लेकिन आखिर वह समय भी आया जब मैं अपने दुख को निसृत कर पाया, उसे आंसुओं में बहा सकता था। और जब मैंने रोना शुरू किया तो तब तक रोता रहा जब तक सारे आँसू समाप्त नहीं हो गए। यह एक तरह की मुक्ति थी, एक भुलावा, जैसे मैंने अपने दुख को आंसुओं के जरिये बहा दिया हो-लेकिन शोक में ज़रा सी भी कमी नहीं आई। जो खाली स्थान वह छोड़कर गई है, उसे कभी भी किसी दूसरी चीज़ से भरा नहीं जा सकता।

मेरे जीवन का सबसे बुरा वक़्त: जब मैंने अपनी बहन को खो दिया – 28 सितम्बर 2014

सितम्बर 2006 में, वृन्दावन में परिवार के साथ उल्लासपूर्ण समय बिताने के बाद मैंने दक्षिण अफ्रीका के लिए उड़ान भरी। वहाँ मुझे बहुत थोड़े समय के लिए रुकना था और उसके बाद मेरे जीवन में आज तक का सबसे दुखद समय आने वाला था।

जिस तरह मैं हर जगह पहुँचते ही अपने काम में व्यस्त हो जाता था, यहाँ भी अपने व्यक्तिगत सत्रों, कार्यशालाओं और व्याख्यानों में व्यस्त हो गया। कुछ दिन बाद, 18 सितम्बर 2006 के दिन सबेरे-सबेरे मेरे पास फोन आया। जर्मनी से यशेंदु का फोन था। भरे गले से आँसुओं में भरकर उसने मुझे वह भयंकर खबर दी और एक भाई द्वारा दूसरे भाई को दी जा सकने वाली सबसे दर्दनाक खबर मैंने सुनी: एक कार हादसे में हमारी बहन का देहांत हो गया है।

उस रात पूर्णेंदु और परा विमान तल की ओर निकले हुए थे। परा को जर्मनी के लिए उड़ान भरनी थी, जहाँ वह यशेंदु से मिलने वाली थी और बाद में मैं भी उनके साथ शामिल होने वाला था। वह जर्मनी की उसकी दूसरी यात्रा थी।

लेकिन अब वह अपनी अंतिम यात्रा पर निकल चुकी थी। कार हादसा हुआ था। पूर्णेंदु अस्पताल में भर्ती था। यशेंदु ने कहा, वह तुरंत वापसी का टिकिट कटा रहा है।

मेरे हाथ-पाँव काँप रहे थे। मैं पसीने से लथपथ हो रहा था और कुछ मिनट तक मेरे लिए कुछ भी सोच पाना नामुमकिन हो रहा था। फिर मैंने अपने पिताजी को फोन किया और कहा कि मैं तुरंत पहुँच रहा हूँ।

दिल्ली के लिए अगली उड़ान दुबई से होते हुए जाती थी। मैंने टिकिट खरीदा और तुरंत विमान तल की ओर रवाना हो गया। मैं अपनी भावनाएँ व्यक्त करने में असमर्थ हूँ। उससे पहले और उसके बाद आज तक मैंने वैसा आघात, वह दर्द नहीं झेला। और पहले अविश्वास और फिर यथार्थ का एहसास होते ही पुनः भयंकर टीस। मेरी आँखों से एक आँसू नहीं निकला। किसी तरह मैंने कुछ घंटों का वह बेहद लम्बा सफ़र तय किया, जीवन की सबसे कठिन, सबसे तकलीफदेह उड़ान।

दूसरे दिन सबेरे मैं दिल्ली पहुँचा। अस्पताल में मेरे माता-पिता और यशेंदु मेरा इंतजार कर रहे थे। पूर्णेंदु अस्पताल के अपने कमरे में था। उसके एक पैर की हड्डी टूट गई थी और उस पर प्लास्टर चढ़ा था। इसके अतिरिक्त उसे कोई खतरनाक चोट नहीं थी। कहीं-कहीं खुरच गया था, मामूली चोटें थीं और यहाँ-वहाँ सफ़ेद पट्टियाँ बंधी हुई थीं। इतने बड़े हादसे को देखते हुए कुल मिलाकर वह ठीक-ठाक ही था। हादसे से ठीक पहले वह नींद में था और उसके बाद बेहोश। उसे बहुत देर बाद अस्पताल में ही होश आया। परा के देहांत की दर्दनाक खबर उस तक पहुँचाने का कठिन काम मुझे ही करना पड़ा।

जैसे ही पूर्णेंदु को अस्पताल से छुट्टी मिली, हम अस्पताल से परा के मृत शरीर को लेकर वृन्दावन की ओर निकल पड़े। रास्ते में फोन करके हमने वहाँ लोगों को अंतिम संस्कार की सब तैयारियाँ करने की सब हिदायतें दे दीं। आवश्यकता से अधिक एक पल भी हम ज़ाया नहीं करना चाहते थे। सभी आँसुओं में डूबे हुए थे, अम्माजी अपनी इकलौती बेटी की मृत्यु की खबर सुनकर टूट चुकी थीं और अभी यह जानलेवा खबर नानी को देना बाकी था, जो हमारा इंतज़ार कर रही थीं, इस त्रासदी की भयावहता से पूरी तरह अनजान।

आश्रम में लोग अंतिम संस्कार की तैयारियाँ शुरू कर चुके थे और इसलिए नानीजी को अंदाजा हो चुका था कि कुछ न कुछ बहुत बुरा घटित हो चुका है। हमारे परिवार के लिए वे कुछ घंटे किसी अँधेरी खोह की मानिंद थे, जिसमें से होकर अब हमें गुज़रना था।

हर कोई रो रहा था लेकिन मुझे रोने के लिए न तो समय मिल रहा था और न कोई ऐसी जगह, जहाँ जी भरकर आँसू बहा सकूँ। ऐसा लगता था जैसे मेरा मन अभी भी मानने को तैयार नहीं है कि वास्तव में इतना बड़ा हादसा हो चुका है। यहाँ तक कि एक बार मैंने बहन के शव पर पड़ा सफ़ेद कपड़ा उठाकर उसके चेहरे को गौर से देखा जैसे विश्वस्त होना चाहता होऊँ कि वास्तव में वह जा चुकी है। वही थी। मृत।

उसके मृत शरीर को हम दाह संस्कार की जगह लेकर आए। पैर टूटा होने के कारण पूर्णेंदु नहीं आ पाया। मृत्यु को मैंने पहले और बाद में भी कई बार देखा है मगर वह पल मेरे जीवन का आज भी सबसे दर्दनाक समय बना हुआ है: जब हमने अपनी बहन की देह के नीचे रखी लकड़ियों में आग लगाई। वह चली गई।

अपने दुख का मुकाबला कैसे करें? क्या उसे दबाकर? क्या उसका दमन करके? 12 दिसंबर 2013

कल मैंने बताया था कि मेरे विचार में अपने प्रियकर के निधन की पीड़ा में धार्मिक दर्शन किसी तरह मदगार साबित नहीं होते। मैंने कहा था कि आपको यह दर्दनाक सत्य स्वीकार करना ही पड़ता है। निश्चय ही यह एक वास्तविकता है लेकिन इस दुख के कई चरण होते हैं और मैं चाहूँगा कि खुद अपने अनुभवों का संदर्भ लेकर उन पर कुछ प्रकाश डालूँ।

पहला चरण होता है, ज़बरदस्त सदमा। इसकी विकरालता और मियाद इस बात पर निर्भर करती है कि आप उसकी मृत्यु की संभावना और स्वाभाविकता से किस हद तक वाकिफ थे तथा मृतक से आपके कितने प्रगाढ़ संबंध थे।

अगर अपने बारे में कहूँ तो यह मियाद एक हफ्ते की रही, जब मैं 2006 में विदेश दौरे पर था और वहीं मुझे एक दर्दनाक कार हादसे में अपनी छोटी बहन के देहांत की खबर मिली। मैं अपना होशोहवास खो बैठा और यह हालत पूरे एक सप्ताह रही। मैं इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं था कि ऐसा हो सकता है। मैं रोया नहीं और अपने दर्द को बाहर निकालना मेरे लिए मुश्किल हो गया। एक दिन, सबेरे-सबेरे मैंने अपने छोटे भाई से कहा, उसे गूगल में देखो, वह हमें वहाँ मिल जाएगी, चलो हम उससे बात करते हैं। मैं मानने के लिए तैयार ही नहीं था कि वह अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन अंततः एक दिन वास्तविकता मेरे सामने अपने विराट रूप में प्रकट हुई और मेरे आंसुओं का बांध टूटकर बह निकला।

और अम्माजी के देहांत के वक़्त हम सब उनके पास थे और जब अम्माजी को दिल का दौरा पड़ा, हम सब उनके आसपास ही थे लेकिन अस्पताल ले जाने की हमारी हर कोशिश के बावजूद वे हमें छोड़ कर चली गईं। यह स्पष्ट होने के बाद से कि वह सदा-सदा के लिए हमें छोड़ कर चली गई हैं उनके दाहसंस्कार तक मेरी आँख से आंसू नहीं निकले। लेकिन जब मैं आश्रम वापस आया तो बिना माँ का आश्रम बहुत खाली-खाली लगा और दुख अचानक आंसुओं के रूप में फूट निकाला। फिर हम सब साथ-साथ रोने लगे।

मेरे विचार में यह दूसरा चरण होता है और बहुत महत्वपूर्ण होता है। दुख को पूरी तीव्रता के साथ महसूस करें। फिर उसे बाहर निकलने दें, आंसुओं की, सिसकियों की शक्ल में रोएँ। इस प्रक्रिया का पूरा होना आवश्यक है, इस दौरान अपनी भावनाओं को रोकने की कोशिश बिल्कुल न करें!

मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग इस प्रक्रिया को ठीक तरह से पूरा नहीं होने देते। अपनी प्रकृति और स्वभाव के चलते या अपनी सांस्कृतिक परंपरा के चलते, वे अपने दिल के चारों ओर पत्थर की कठोर दीवार निर्मित कर लेते हैं और अपने दर्द को बाहर नहीं निकलने देते। वे संयमी होने का नाटक करते हुए उसका दमन करते हैं, जो कि ठीक नहीं है। उसे बाहर निकलने का रास्ता दें। चाहें तो बंद कमरे में आँसू बहाएँ लेकिन मैं कहता हूँ कि लोग उन आंसुओं को देखकर आपके विषय में कोई धारणा नहीं बनाने वाले! अपने दुख को दूसरों के साथ साझा करने पर आप अधिक शीघ्रता के साथ उससे मुक्त हो सकेंगे और आप दूसरों के साथ स्थायी रूप से जुड़ पाएंगे!

जीवन रुकता नहीं है। अपने आपको परिस्थितियों के अनुकूल ढालना पड़ता है और संभव है मृतक द्वारा छोड़ी जगह कभी भर न पाए। कुछ समय के लिए मैं अपनी बहन की तस्वीर की तरफ देख भी नहीं पाता था। अम्माजी की तस्वीर की तरफ देखना भी बहुत समय तक बड़ा मुश्किल था। लेकिन उन स्मृतियों को बीच-बीच में बाहर निकालकर उसमें डूब जाना अच्छी बात है, अतीत की ऐसी स्मृतियाँ सुखद ही होती हैं।

ऐसी परिस्थितियों में कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं जो भविष्य में गकड़िया (जलते कोयले पर सिंकी मोटी रोटियाँ) या गाजर का हलुवा नहीं खाएँगे क्योंकि हमारी माँ ये व्यंजन दुनिया में सबसे अच्छा बनाती थीं। और हमेशा वह उनके हाथों ही उपलब्ध हुआ करता था। लेकिन हम ये व्यंजन बनाना जानते हैं और हमारे पास अम्माजी से सीखे हुए कर्मचारी भी हैं इसलिए हम अक्सर उन्हें बनाते-खाते हैं। जब हम उन्हें खाते हैं तो उन गकड़ियों और गाजर के हलुवे की याद करते हैं, जिसे अम्माजी हमें बनाकर खिलाया करती थीं और साथ-साथ एकाध आँसू बहा लेते हैं या बस उनकी याद में भीगे हुए चुपचाप खाते रहते हैं।

संसार (जीवन) चलता रहता है और उसके अनुसार हमारा जीवन गुज़रता रहता है। हमारे मस्तिष्क में सुखद स्मृतियाँ होती हैं और दिल में प्रेम। स्मृतियों को अपने दिल से दूर न करें। उन्हें जियेँ, उनसे प्रेम करें और आप अनुभव करेंगे कि वह व्यक्ति आपके बिल्कुल करीब आ गया है, आपके दिल में बस गया है।

अपने प्रिय से हमेशा के लिए बिछुड़ने के गम में धार्मिक दर्शन किसी काम नहीं आते- 11 दिसंबर 2013

यह ठीक बात है कि अम्माजी के देहांत के बाद मैं अपने दुख से निपटने के विषय में सोच रहा था, देहांत के तुरंत बाद और अब भी, एक साल बाद पीछे मुड़कर देखते हुए। वह यह कि: जब आपका कोई प्रिय व्यक्ति आपको सदा-सदा के लिए छोड़कर चला जाता है तब आप अपनी भावनाओं के साथ क्या करें?

किसी के लिए भी अपने प्रियकर की आकस्मिक मृत्यु, जैसे अम्माजी की तरह हार्ट अटैक से या मेरी बहन की तरह किसी दुर्घटना स्वरूप, एक भयानक सदमा होती है। बहुत समय से बीमार, महीनों या सालों से तकलीफ झेलते या बहुत वृद्ध लोगों के साथ, जहाँ मृत्यु कभी भी हो सकती है, आप बहुत हद तक मृत्यु का स्वीकार करने के लिए तैयार होते हैं।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मृत्यु अचानक आई है या वह अपेक्षित थी, दुख तो होना ही है और कई बार यह दुख इतना ज़बरदस्त होता है कि आपको हर तरफ से जकड़ लेता है। तो फिर क्या किया जाए?

विभिन्न धर्मों में देखें तो आप दुखी परिवार वालों को सांत्वना प्रदान करने के अलग-अलग तरीके दिखाई देते हैं। एक धर्म आपसे कहता है कि मरने वाला एक पुण्यात्मा व्यक्ति था और अगले जन्म में भी वह उच्च योनि प्राप्त करेगा इसलिए उसके लिए दुखी होने की आवश्यकता नहीं है। मृतक इस वक़्त स्वर्ग में होगा और ईश्वर ने उसे अपने आलिंगन में ले लिया होगा। वह अपने उन परिवार वालों से मिल रहा होगा जो पहले से वहाँ मौजूद हैं। उसे उनसे मिलकर कितनी खुशी हो रही होगी! आदि आदि…

एक दूसरा विचार यह है कि यह शरीर आत्मा (जीव) का एक निवास-स्थान मात्र है, एक तरह का वाहक, जो अब पुराना पड़ गया था और उसे त्याग देना ही उपयुक्त था। आत्मा मरी नहीं है, वह अब भी यहीं आसपास मौजूद है, आपके साथ, आपको दिलासा देने हेतु और जीवन में आपकी मदद के लिए। कुछ धर्म दावा करते हैं कि आत्मा एक दिन कोई दूसरा शरीर प्राप्त कर लेगी और इस तरह पुनः जन्म लेगी, इस धरती पर वापस आएगी और इसलिए पुराने शरीर की मौत पर दुखी होने की कोई आवश्यकता नहीं है।

वास्तविकता यह है कि ऐसी हालत में आप कितना भी दर्शन-शास्त्र का हवाला देते रहें या कोई भी फिलोसोफी बघारें, समझदारी की बातें करें, दुखी व्यक्ति को सिर्फ यही पता होता है कि उसका प्रिय व्यक्ति अब उसके पास नहीं है, उसने उसे खो दिया है। ऐसा आध्यात्मिक ज्ञान दूसरों पर झाड़ना आसान है मगर जब आप पर पड़ती है तब आप अपना सारा ज्ञान और समझदारी भूल जाते हैं। आप यह समझने की कोशिश कीजिए कि अगर यह व्यक्ति मरा नहीं होता तो आप उसके साथ किस तरह हंस-खेल रहे होते, मज़े कर रहे होते। इस मामले में कोई भी स्पष्टीकरण, व्याख्या या समझाहट एक तरह का भ्रम ही है इसलिए व्यर्थ भी। मेरा अनुभव यह है धर्म के सिद्धांतों में इसका कोई हल नहीं है, उसका दर्शन आपको कोई सांत्वना नहीं दे सकता-और जब कि लोग इस बात को जानते हैं फिर भी वे दुखी व्यक्ति के सामने वही सब प्रस्तुत करते रहते हैं और सोचते हैं कि इससे उसे कुछ तो दिलासा मिलेगा।

लेकिन ऐसा नहीं होता। इस तथ्य को मानना ही पड़ता है: आपका यह प्रियकर हमेशा हमेशा के लिए आपको छोड़कर चला गया है। यह घटना अपरिवर्तनीय है, इसे आप किसी भी हालत में बदल नहीं सकते। आपको इस आघात को सहन करना ही होगा। उसकी यादों और उसके प्रेम को अपने दिल में बसाए रखिए, वही आपके साथ रहेंगे और आपको दिलासा देते रहेंगे।

अम्माजी के बगैर एक साल- 10 दिसंबर 2013

आज अम्माजी के देहांत की पहली बरसी है। एक साल हो गया मगर उस रात और उस दिन को हम इस तरह याद करते हैं जैसे कल ही की बात हो। पूरा एक साल बीत गया लेकिन एक दिन भी ऐसा नहीं गुज़रा जब हमने उन्हें याद न किया हो, उनकी कमी महसूस न की हो।

बहुत दिनों तक उनके जाने का दर्द इतना सघन था कि हम उनकी कोई तस्वीर नहीं लगा सके। मुझे कंप्यूटर पर उनके चित्रों को देखना भी गवारा नहीं था, खासकर जब अपरा आसपास होती थी। अपरा बेतरह उनकी कमी महसूस करती थी और हम देखते थे कि जब भी वह उनकी कोई तस्वीर देखती है तो उदास हो जाती थी। उसका छोटा सा दिल यह समझ पाने में असमर्थ था कि क्यों अम्माजी अब उसके साथ नहीं रहतीं। आखिरकार इस दीवाली पर हमने उनका एक बड़ा-सा चित्र बनवाया और बब्बाजी के कमरे में एक दीवार पर टांग दिया।

बब्बाजी बताते हैं कि आजकल वे उस फोटो की तरफ देखते हुए अम्माजी से ‘सुप्रभात’ और ‘शुभरात्रि’ कहते हैं। उनके बिस्तर पर अम्माजी का स्थान खाली पड़ा रहता है और हम लोग अम्माजी से उनके वियोग की कल्पना करते रहते हैं, जिनके साथ उन्होंने प्रेम-प्लावित पचास वर्ष व्यतीत किए थे।

10 दिसंबर 2012 के बाद हम सभी के जीवन पूरी तरह बदल चुके हैं। पूरे आश्रम में तब्दीली आ गई है। रसोई उनका साम्राज्य था, जिसने अपनी साम्राज्ञी को खो दिया है। ज़्यादातर हमारे कर्मचारी वही हैं और उन्हीं के द्वारा प्रशिक्षित हैं लेकिन फिर भी हम यह नोटिस करते रहते हैं कि अब रोज़मर्रा के काम उतनी सहजता और निर्विघ्नता से पूरे नहीं होते। सब कुछ उसी तरह चल रहा है, कुछ भी रुकता नहीं है, मगर अब वे दो हाथ अनुपस्थित हैं। भोजन स्वादिष्ट है मगर उसमें अम्माजी का प्रेम नहीं है।

अब वही आस्वाद मिलना मुश्किल है और इसलिए उनके प्रेम-पगे व्यंजनों को याद करते हुए, उनके खास व्यंजनों को सगर्व ग्रहण करते हुए अनायास आँखों में पानी भर आता है। लेकिन हम अब भी नए से नए व्यंजन बनाने की कोशिश करते रहते हैं, तरह-तरह से मसालों को मिलाकर प्रयोग करते हैं और सोचते हैं कि काश आज हमें ऐसा करते हुए देखने के लिए वह हमारे पास होतीं। कैसे वह हमारे प्रयोगों के दौरान उन्हें और ज़्यादा स्वादिष्ट बनाने के लिए सलाह देतीं। कैसे वह बतातीं कि मसालों का अनुपात क्या हो, या उसमें कोई और मसाला मिलाने पर वह अधिक स्वादिष्ट हो सकता है। कैसे अपरा को वह रोटी बेलना या सब्जियाँ चलाना सिखातीं।

अम्माजी का सब्जियों का बाग उनके साथ ही चला गया। हममें से किसी में भी न तो इतना धीरज है न ही समर्पण कि उनकी तरह आश्रम परिसर में ही सब्जियाँ उगा लें। अब कोई बगीचे की बाड़ पार करके भीतर प्रवेश ही नहीं करना चाहता, उसके मन में सगर्व अपने हाथों में मैथी, पालक, गोभी या बैंगन उठाए अम्माजी की तस्वीर उभर आती है और वह हताश हो उठता है।

उनकी और भी बहुत सी यादें हैं, उनसे संबन्धित बहुत से विचार, भावनाएँ हैं और सभी एक ही बात की तरफ इशारा करते हैं: हम सभी अपनी माँ की, पत्नी, बेटी, सास और दादी की कमी महसूस कर रहे हैं। लेकिन अपरा को बड़ा करने के सुख के साथ हर दिन हमारी दुनिया अम्माजी को याद करते हुए एक-एक कदम आगे सरक रही है।

शोक के समय एक मौन सांत्वना – 7 जुलाई 2013

राधाष्टमी समारोह के तुरंत बाद, 2005 में मैं पुनः यूरोप दौर पर निकल गया था। मेरी यात्रा में कई पड़ाव आए और मैं जर्मनी भी वापस आया था। मगर इस यात्रा के दौरान मैंने कुछ वक़्त बिल्कुल एकांत और मौन में बिताने का निर्णय किया था। मैं पहले भी ऐसा कर चुका था और हर बार वह मेरे लिए एक सुकून से भरा अनुभव हुआ करता था।

दरअसल मैं पूरे प्रवास में मौन रहने वाला नहीं था। लगातार, सारा दिन भी नहीं। मैं कुछ घंटे, शायद छह या आठ घंटे, इसके लिए नियत कर लेता था, और उस दौरान मौन रहता था। वैसे मैं रोज़मर्रा के कार्य यथावत निपटाता चलता था, बस बात नहीं करता था। मैंने अपने इस निर्णय से अपने आयोजकों को अवगत करा दिया था और हालांकि उनके लिए यह एक नई बात थी, वे समझ गए कि मैं ऐसा क्यों करना चाहता हूँ। महज अपनी इंद्रियों को सबसे अलग करके अंतर्मुखी होने की यह प्रक्रिया थी जिससे बात करने से होने वाले ऊर्जा के अपव्यय से बचा जा सके।

तो मैं कुछ समय के लिए मौन रहता था और सबने उसे सहजता के साथ स्वीकार कर लिया। बल्कि लोगों ने उसके महत्व को समझा भी और कुछ लोगों ने मुझे देखकर अंतर्मुखी होने के इस उपाय को स्वयं आजमाने का प्रयास भी किया। इस दौरान मैं सिर्फ आँखों से अपनी बात कहता था, संवाद के किसी और तरीके का इस्तेमाल नहीं करता था। चिह्न बनाकर या लिखकर भी नहीं- वैसा करने से इस क्रिया से अपेक्षित लाभ प्राप्त नहीं होता। इस तरह मैं किसी तरह के संवाद से आम तौर पर दूर ही रहता था।

मैं नहीं जानता कि यह कैसे हुआ मगर एक दिन मैंने अचानक देखा कि मेरा फोन ब्लिंक कर रहा है। उस पर एक संदेश प्राप्त हुआ था। मैंने उसे उठाया और वह बुरी खबर पढ़ी: कई वर्षों के मेरे मित्र ने (मेरा पहला जर्मन मित्र, जो ल्युनेबर्ग में डॉक्टर था) दो शब्दों में सूचित किया था कि उसके पिताजी का देहांत हो गया है।

स्वाभाविक ही इस सूचना ने मुझे दुखी कर दिया। इस बात की चिंता भी थी कि मेरा मित्र किस तरह इस सदमे को बर्दाश्त कर रहा होगा। मैं स्टुटगार्ट में था जो वहाँ से कुछ सौ किलोमीटर दूर था लेकिन ल्युनेबर्ग जाने का मेरा कार्यक्रम पहले से तय था और कुछ सप्ताह बाद हम आपस में मिलने वाले थे। लेकिन, अभी, तुरंत अपनी ओर से सांत्वना का कोई चिह्न उस तक पहुंचाना आवश्यक था।

मैंने उसे एक ब्लैंक संदेश भेज दिया।

मेरा मित्र जानता था कि मैंने अभी मौन-व्रत लिया हुआ है। वह अपने मृत पिता के पास बैठा हुआ था कि उसे मेरा संदेश मिला। यह सोचते हुए कि उसमें कोई सामान्य सा संदेश होगा, वह फोन पर नज़र दौड़ाने लगा। खाली जगह। मौन। आलिंगन, प्रेम, सब कुछ उस खाली जगह में व्यक्त हो रहा था। ऐसे दुखदाई समय में भी उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।…….. "सिर्फ और सिर्फ बालेंदु ही ऐसा कर सकता है!"…. उसने सोचा। जब भी इस दुखद घटना की चर्चा होती है, यह बताना वह नहीं भूलता।

आयरिश लोग और शराब – अपने पूर्वाग्रह की पुष्टि होते हुए देखना – 19 मई 2013

मैंने अपनी पिछली आयरलैंड की यात्राओं में, जैसे 2005 की गर्मियों में, वहाँ के निवासियों के साथ हुए अपने अनुभवों के बारे में बताते हुए कहा था कि वे बहुत खुशमिजाज, मनमौजी और खुले दिल के लोग होते हैं। लेकिन एक और बात मैंने महसूस की जिसे आप उसे मेरे पूर्वाग्रह की पुष्टि कह सकते हैं: एक आम रूढ़िबद्ध धारणा कि आयरिश लोग पियक्कड़ होते हैं। बेहद पियक्कड़!

मैंने वहाँ बहुत से व्यक्तिगत सत्र लिए और अधिकांश लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए मेरे पास आते थे। ये समस्याएं जीवन के हर क्षेत्र से जुड़ी और कई तरह की होती थीं, जैसे संबंधो के बारे में, भावनात्मक, दर्द और बीमारियों, मानसिक व्याधियों, दुखों और बेचैनियों के बारे में। कुछ लोग आंतरिक शांति चाहते थे तो कुछ स्वास्थ्य और ताकत, तो कुछ अपने किसी व्यसन से छुटकारा पाना चाहते थे। लेकिन आयरलैंड के अपने सत्रों में यह बात तुरंत समझ में आ जाती थी कि शराब से किसी न किसी रूप में जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए यहाँ सबसे ज़्यादा लोग आते थे।

गहरे अवसाद में डूबा हुआ एक व्यक्ति मेरे पास आया और बताया कि उसकी गर्लफ्रेंड के उसे छोडकर जाने के बाद से ही यह अवसाद शुरू हो गया था। वह दुखी था इसलिए अपने एक मित्र के साथ एक जाम लेने का निर्णय किया। उसे अच्छा लगा, शायद शराब के कारण या मित्र के साथ के कारण। जिससे उसे लाभ हुआ था उसने दूसरे दिन भी उसे ही आजमाया। शायद शराब उसके दर्द को हल्का करती थी और उसे दूसरी बातों में मन लगाने में मदद करती थी, इसके सिवा कुछ नहीं। वह धीरे-धीरे शराब की मात्रा बढ़ाने लगा और एक वक़्त आया जब शराब से उसे किसी तरह का लाभ होना बंद गया। बल्कि वह उसे चिड़चिड़ा और उदास कर देती थी। उसने अपने इस व्यसन का उपचार भी कराया और शराब छोड़ दी मगर उसकी मनोदशा में कोई सुधार नहीं हुआ और चित्त अस्थिर ही बना रहता था।

एक महिला ने मुझे बताया कि वह इतने अर्से से शराब पी रही है कि अब उसे कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं ने आ घेरा है। उसका वज़न बहुत बढ़ गया है जिसका कारण, जैसा कि उसने बताया, शराब ही है और उसे डॉक्टरों ने तुरंत शराब छोडने की सलाह दी है, अन्यथा उसका लीवर क्षतिग्रस्त हो सकता है। लेकिन उसे शराब की लत लग गयी है और उससे छुटकारा पाने की शक्ति उसमें नहीं है।

एक और व्यक्ति ने मुझे रोते हुए बताया कि शराब ने उसके जीवन को बरबाद करके रख दिया है। उसके स्वर में इतना दर्द था कि उसकी बात सुनना भी बहुत दर्दनाक था। एक बार वह और उसका दोस्त एक पार्टी में शामिल हुए थे और सारे लोग खूब शराब पी रहे थे। वह रात भर वहाँ रहा और आखिर में एक सोफ़े पर लुढ़क गया। उसके दोस्त उसे कार में बिठाकर घर ले जा रहे थे मगर बारिश हो रही थी और फिसलन भरी सड़क पर नशे की हालत में चालक का संतुलन बिगड़ गया और कार पलट गई। उसके दो दोस्त दुर्घटना का शिकार हो गए। फिर कुछ साल बाद उसकी पत्नी ऑफिस से घर आ रही थी और एक शराबी चालक ने उसकी कार में टक्कर मार दी। उसकी पत्नी जीवित घर नहीं लौट सकी।

इसके बावजूद लोग मुझे बताते रहते थे कि युवा पीढ़ी अपने से पहले वाली पीढ़ी से ज़्यादा पियक्कड़ है। नशे में धुत्त हो जाने के इरादे से कम समय में बहुत ज़्यादा शराब पी लेना (binge drinking) आजकल फैशन हो गया है और सबेरे किसी अस्पताल में लोगों की नींद खुलना आम बात हो गई है। शराब समाज के लिए एक अभिशाप बन चुका है और अधिकतर लोगों की अस्वस्थता का और दुख का कारण भी।

मैं यह नहीं जानता था कि आयरिश लोगों की यह छवि एक यथार्थ है। निस्संदेह, ऐसे लोग भी हैं जो बिल्कुल नहीं पीते और आध्यात्मिक परिदृश्य में इतना समय गुजारने के कारण ऐसे बहुत से लोगों से मैं मिला भी हूँ, क्योंकि ऐसे लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक भी होते हैं और शराब और दूसरे नशीले पदार्थों से भी दूर रहना पसंद करते हैं। इसके बावजूद मैं कहूँगा कि मेरा ऐसी दुखद कहानियों से बहुत वास्ता पड़ता रहा है और यह मुझे ग्लानि से भर देता है।

मैं आशा करता हूँ कि न सिर्फ आयरिश जनता बल्कि सारी दुनिया के लोग इस बात को समझेंगे कि शराब कितनी नुकसानदेह चीज़ है।

समय आपके सारे दुख-दर्द हर लेगा, उसे अवसर दीजिए – 4 जनवरी 13

कुछ दिनों के भीतर अम्माजी को गुज़रे हुए एक महीना हो जाएगा। मैंने पहले ही बताया है कि यह पूरा महीना हमारे लिए बहुत तनावपूर्ण रहा है और इस दौरान जब मैं अपने आप को और अपनी संवेदनाओं, भावनाओं को क़रीब से देख रहा था, मैंने एक बार फिर यह महसूस किया कि जीवन में समय की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है और बीत रहा हर पल हमारी भावनाओं पर कितना असर डालता है। मैं मानता हूं कि समय वास्तव में दुख से उबारता है – और आप यह भरोसा कर सकते हैं कि समय अवश्य आपको आपकी भावनाओं से निपटने में सहायता करेगा।

बिल्कुल प्रारंभ में, अम्माजी के गुज़रने के पहले कुछ घंटों में मैं सदमें में था। कोई आंसू नहीं थे। और मैं ऐसा महसूस कर रहा था जैसे अभी वास्तव में वे गई नहीं हैं। मस्तिष्क वहीं था, यह सोचता हुआ कि अम्माजी जा चुकी हैं, बब्बाजी और नानीजी को उनकी पीड़ा में देखता हुआ लेकिन भावनाएं सत्य के उस बिंदु पर तब तक नहीं पहुंची थीं। यह सत्य मुझ तक तब जाकर पहुंचा जब हम यमुना पर थे। जब मैं उस शुरुआती सदमे से निकला तब जाकर आंखों से आंसू बहने लगे और उनके गुज़र जाने का सत्य और उससे जुड़ी भावनाएं मेरे दिल तक पहुंच सकी।

उनकी मृत्यु के बाद कई दिनों तक जब कभी हम उनके बारे में बात करते, हम सब रोने लगते। कोई भी बात जो उनसे किसी भी तरह जुड़ी थी, जिनमें उनकी याद शामिल थी, हमारा गला अवरुद्ध कर देती, हमारी आंखों से आंसू बहने लगते। हमने उनके बारे में बहुत बातें की और मैंने उन बातों को, उन ख़्यालों को यहां आपके साथ इस डायरी में साझा भी किया। उनका ख़्याल हमेशा आता रहा. सब कुछ किसी न किसी तरह उनसे जुड़ा होता और अगर कुछ ऐसा हो जिसका वास्तव में उनसे कोई संबंध न हो तब भी हम कह देते, “उनका इससे कोई लेना-देना नहीं था!” हम उनकी चप्पल देखते, उनका बगीचा देखते, जहां वो हमेशा बैठा करती थीं वो ख़ाली जगह देखते। हम बात करते और रोते।

कुछ दिनों के बाद, हमने सब कुछ कह लिया था। अम्माजी से जुड़ी हर छोटी और बड़ी चीज़ के बारे में हमने बातें कर ली थीं, रो लिया था। फिर एक समय ऐसा आया जब कहने को बहुत कुछ बचा नहीं क्योंकि सारी बातें कही जा चुकी थीं। हालांकि फिर भी उनका ख़्याल आता और मुझे उदास कर देता। सारे ख़्याल मुझे रुलाते नहीं थे लेकिन कभी-कभी रोना भी आ जाता। उन सत्यों को स्वीकार करना धीरे-धीरे आने लगा था जिन्हें आप बदल नहीं सकते।

आज भी हालांकि, सुबह का सबसे पहला ख़्याल अम्माजी से जुड़ा होता है। वह दृश्य जब वे हमें छोड़ गईं, हमारे साथ बिताए उनके आख़िरी पल, सब कुछ मस्तिष्क में बिल्कुल स्पष्ट है और मेरी आंखों के आगे वह दृश्य अक्सर घूमता रहता है। कल मैंने अपरा को जिसे सर्दी लग गई थी, अपनी बांहों में लिया हुआ था, और मुझे याद आ रहा था कि कैसे मैं जब छोटा था, अपनी मां की बाहों में रहना चाहता था। स्मृतियां हैं और हमेशा रहेंगी. लेकिन समय के साथ भावनाओं का उबाल और उनसे उपजा तनाव कम हुआ है लेकिन हम उन्हें याद तो हमेशा ही करेंगे।

खुद को वक़्त दीजिए। यह एक नैसर्गिक प्रक्रिया है, समय आपके दुखों को धीरे-धीरे हर लेता है। समय के इस खेल पर मैं एक बार फिर मोहित हो गया हूं। यह ज़रूरी है कि समय को अपना काम करने दीजिए, न कि सहिये, बर्द्दाश्त कीजिए, रोने का मन करे तो रो लीजिए, खुद को रोकिए मत क्योंकि यह समय उसके लिए सही है। दुबारा हंसने का समय भी आएगा लेकिन अपने दुखों को भी जगह दीजिए ताकि समय आपको उनसे उबार सके।