आप भी अम्माजी’ज़ आयुर्वेदिक रेस्तराँ का हिस्सा बन सकते हैं – 16 अक्टूबर 2014

कल मैंने आपको अपनी एक बड़ी परियोजना के बारे में बताया था: आयुर्वेदिक रेस्तराँ, आइसक्रीम और बेकरी सहित। मैंने ज़िक्र किया था कि आयुर्वेदिक रसोई के बारे में हमारा बहुत लम्बा अनुभव रहा है और रेस्तराँ खोलने से पहले हम अपने रसोइयों को कुछ समय तक प्रशिक्षण भी देंगे कि किन बातों का विशेष ध्यान रखना है। ब्रेड और आइसक्रीम बनाने का और यहाँ तक कि पास्ता और पित्ज़ा बनाने का भी हमें काफी अनुभव है लेकिन पश्चिमी खाद्यों के बारे में हम और विस्तार से जानकारी प्राप्त करना चाहेंगे और उनकी पाक-विधियाँ सीखना चाहेंगे!

हमारे मेनू कार्ड में यूरोपीय व्यंजन होंगे यह तय है: ताज़े ब्रेड रोल से लेकर कोसोंस और पित्ज़ा और केक तक। अगर आप बेकर, आइसक्रीम विशेषज्ञ या इतालवी रसोइये हैं- या पश्चिमी निरामिष भोजन तैयार कर सकने वाले अनुभवी रसोइये हैं तो हम आपके सामने आपसी विनिमय का यह प्रस्ताव रखना चाहते हैं:

भारत में स्थित हमारे आश्रम में पधारिए और अपने ज्ञान और अनुभव को हमारे साथ साझा कीजिए! हमें और हमारे रसोइयों को, जो वैसे भी अपने क्षेत्र के पेशेवर अनुभवी विशेषज्ञ हैं, प्रशिक्षित कीजिए- और बदले में दो सप्ताह हमारे साथ आश्रम में रहिए, पूरी तरह मुफ्त!

मुझे पूरा विश्वास है कि हमारे रसोइए पैनी नज़र रखते हैं और सब कुछ बहुत जल्द सीख लेंगे और आपको भी हमारे रेस्तराँ की रसोई में कुछ समय गुज़ारने पर कुछ नए गुर और पाक कला सम्बन्धी ज्ञान और अनुभव प्राप्त होगा।

जबकि यह प्रस्ताव आज से ही लागू हो गया है, हम भविष्य में कुछ आगे का भी विचार कर रहे है, जिसमें हम एक और प्रस्ताव लाने की योजना बना रहे हैं, इस विश्वास के साथ कि आगे चलकर जल्द ही हम अल्प बजट वाले विदेशी पर्यटकों के बीच पर्याप्त लोकप्रिय हो चुके होंगे: जब हमारा रेस्तराँ शुरू हो जाएगा, वहाँ व्यंजन बनाने से पहले की तैयारियाँ, साफ़-सफाई आदि जैसे बहुत से कामों को निपटाने वालों तथा पुरुष और महिला वेटर के रूप में काम करने वालों की हमें ज़रुरत होगी।

हमें अभी से बहुत से ऐसे लोगों के आवेदन प्राप्त हो रहे हैं, जिनके पास यात्रा का बड़ा बजट नहीं है और जो यहाँ रहकर कोई काम करना चाहते हैं। वर्त्तमान में हम सिर्फ कम्प्यूटर के काम का प्रस्ताव ही सामने रख पा रहे हैं और यह काम हर कोई नहीं कर सकता! परन्तु जैसे ही हमारा रेस्तराँ खुल जाएगा, हम यह प्रस्ताव बहुत से दूसरे लोगों के सामने भी रख सकेंगे!

अर्थात, चाहे आप विशेषज्ञ रसोइए के रूप में अपना ज्ञान साझा करना चाहते हों या रेस्तराँ के दूसरे कामों हेतु अपनी सेवाएँ प्रदान करना चाहते हों, आपके आवेदन प्राप्त करके हमें ख़ुशी होगी! बस, संक्षेप में अपने विषय में जानकारी देते हुए हमें इस पते पर ईमेल कीजिए: [email protected] और हम आपका यहाँ स्वागत करने के लिए तैयार बैठे हैं!

निश्चय ही, अगर आप इन पंक्तियों को पढ़ रहे हैं और आपको पश्चिमी भोजन बना सकने वाले या बेकिंग कर सकने वाले किसी पेशेवर रसोइए की जानकारी है, जो भारत आकर हमारे साथ रहने का इच्छुक हो तो कृपया इस ब्लॉग की लिंक उन्हें भेज दें!

अम्माजी’ज़ रेस्तराँ की इमारत के निर्माण की प्रगति संबंधी फोटो आप यहाँ देख सकते हैं

मेरी दिवंगत बहन का जर्मनी प्रवास और पहली पकवान्न कार्यशाला (पाकशाला)- 4 अगस्त 2013

सन 2005 ही वह साल भी था जब मेरी दिवंगत बहन परा पहली बार जर्मनी गई। मेरे भाइयों की तरह उसने भी आश्रम आने वाले बहुत से यूरोप के लोगों से मित्रता गांठ ली थी मगर तब तक यूरोप की यात्रा नहीं की थी। इसलिए वह न सिर्फ यूरोप की यात्रा को लेकर बहुत उत्साहित थी बल्कि अपने इन मित्रों से मिलने के लिए भी बहुत उत्सुक थी।

हम दोनों की एक साझा मित्र कोलोन में रहती थी और हम दोनों ही उनके छोटे से घर पर रुके। जर्मन्स के नज़रिये से उनका घर तीन लोगों के रहने के लिए काफी छोटा था लेकिन मैं और मेरी बहन उनके लिविंग रूम में रखे बड़े से बिस्तर पर एक साथ सो लेते थे।

फिर मैं जर्मनी में ही अपनी अगली यात्राओं पर निकल गया जिसका कार्यक्रम पहले ही नियत था। परा के पास तीन या चार सप्ताह थे जिसे उसने नई जगह देखने-परखने में, घूमने-फिरने में और वहाँ का मज़ा उठाने में खर्च किया। कोलोन वाली हमारी मित्र के दो और मित्र थे जो हमारे आश्रम आ चुके थे और जिन्हें मेरी बहन भी जानती थी। वे हॅम्बर्ग में, जो उत्तरी जर्मनी में स्थित है, रहते थे और मेरी बहन एक हफ्ते के लिए उनके यहाँ भी हो आई। हॅम्बर्ग से लूनेबर्ग ज़्यादा दूर नहीं है, जहां मेरा पुराना जर्मन डाक्टर मित्र रहता है। तो वह कोलोन लौटने से पहले उनके यहाँ भी गई।

मैं इससे ज़्यादा ठीक-ठीक नहीं जानता कि यूरोप में रहते हुए वह और क्या-क्या करती रही मगर इतना मुझे याद है कि हम बाद में ज्यूरिख में मिले थे। वहाँ एक सप्ताह से वह कुछ भारतीय मित्रों के यहाँ रह रही थी जो वृन्दावन से आकर कुछ साल पहले ही स्विट्जरलैंड में स्थायी रूप से रह रहे थे। मुझे याद आता है कि यहीं से हम दोनों ट्रेन पकड़कर साथ-साथ हाईडेलबर्ग (मध्य जर्मनी में स्थित) गए थे। उस यात्रा में जिस तरह हम दोनों रास्ते में आने वाले सुंदर, बर्फीले नज़ारों को देखकर मंत्रमुग्ध रह गए थे और उसका भरपूर आनंद उठाया था, वह मैं कभी भूल नहीं सकता। वह शायद नवंबर की शुरुआत थी और सारे परिदृश्य पर बर्फ की सफ़ेद चादर फैली हुई थी। उस वक़्त बहुत ज़्यादा बर्फ थी और वह वाकई एक आश्चर्यचकित कर देना वाला बेहद मनमोहक दृश्य था।

परा सिर्फ छुट्टियाँ मनाने यूरोप आई थी मगर बड़ी सहजता से वह एक कार्यशाला आयोजित करने के काम में व्यस्त हो गई। उसे पता ही नहीं चला और जैसे खेल-खेल में ही सारे कार्यक्रम की रूपरेखा बन गई और अंततः बहुत शानदार कार्यशाला सफलता पूर्वक आयोजित की गई जिसका मुख्य अंग आयुर्वेदिक पाक विद्या से संबन्धित था जो बाद में हमारी कार्यशालाओं का भी बहुत लोकप्रिय हिस्सा बन गया। दरअसल, कोलोन की उसकी मित्र और उसके कुछ और मित्रों ने उससे कहा कि वे लोग भारतीय खाना पसंद करते हैं और उसे पकाने का तरीका सीखना चाहते हैं। वह हमारे आश्रम में आई थी और जानती थी कि मेरी बहन बहुत स्वादिष्ट खाना पका सकती है। और मेरी बहन निस्संकोच तुरंत तैयार हो गई और इस तरह उसने जर्मनी में अपनी पहली खाना पकाने की कार्यशाला आयोजित की।

जब परा जर्मनी में थी तभी मेरे घनिष्ठ मित्र गोविंद ने मुझे समाचार दिया: वह शादी करने जा रहा है। कुछ हफ्तों बाद ही शादी होने वाली थी और मेरा कार्यक्रम पहले से तय था। मेरा उसकी शादी में सम्मिलित होना संभव नहीं था, इसलिए मैंने उससे फोन पर कहा कि "मैं परा को तुम्हारी शादी में शामिल होने के लिए भेज दूंगा।" उन्हीं दिनों के लिए परा का टिकिट वैसे भी पहले से ही आरक्षित किया जा चुका था। शादी के कुछ दिन पहले ही वह भारत पहुँच गई।

कहने की आवश्यकता नहीं कि उसने अपने और मेरे दोस्तों के साथ यूरोप में बहुत आनंददायक समय गुज़ारा और मुझे भी उसका यूरोप में साथ रहना बहुत अच्छा लगा।