स्त्रियाँ और पुरुष, दोनों रोज़गार करते हैं मगर घर के कामों की ज़िम्मेदारी सिर्फ स्त्रियों की ही होती है – 10 दिसंबर 2015

कल मैंने दैनिक जीवन में लिंग आधारित भूमिकाओं के बारे में लिखना शुरू किया था और बताया था कि कैसे वे पश्चिमी समाजों में भी आज भी जारी हैं हालांकि उस शिद्दत से नहीं, जिस शिद्दत के साथ भारत में व्याप्त हैं। कल की चर्चा मैंने पुरुषों द्वारा घरेलू काम, जिन्हें पूरी तरह 'जनाना' काम समझा जाता है, न करने संबंधित दबावों पर केन्द्रित की थी लेकिन महिलाओं को भी आज भी लोगों के लिंग आधारित पुरातनपंथी विचारों से लोहा लेना पड़ता है।

निश्चित ही भारत के अधिकांश परिवार महिलाओं से अपेक्षा करते हैं कि वे घर में ही रहें जबकि पश्चिमी समाजों में कई पीढ़ियाँ गुज़र चुकी हैं, जिनमें माएँ बाहर निकलकर काम करती रही हैं- चाहे आधे दिन करें या पूरा दिन! वहाँ महिलाओं से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि विवाहोपरांत घरेलू स्त्रियाँ बनकर रहें। वहाँ कामकाजी महिलाओं के लिए मूलभूत सुविधाएँ बेहतर हुई हैं।

लेकिन वह दोषरहित नहीं है। महिलाएँ लिंग आधारित भूमिकाओं से बरी नहीं हुई हैं और न ही इस दबाव से कि दैनिक जीवन में उन्हें कैसा व्यवहार करना चाहिए। अभी भी कई मामलों में उन्हें बराबरी का दर्जा हासिल नहीं है: प्रबंधन के रोज़गारों में ऊपरी पायदानों पर पहुँचने के लिए उनके पास कम अवसर उपलब्ध हैं और समान पदों के लिए पुरुष सहकर्मियों की तुलना में उनका वेतन कम होता है! इसके अलावा, लोगों के दिमागों में यह असमानता का भाव अधिक व्यापक रूप से मौजूद है, जिसके कारण खुद महिलाएँ अपनी स्वायत्तता और परिवार या समाज में अपनी भूमिका को लेकर संदेहग्रस्त रहती हैं!

इस बात का प्रमाण आपको पारिवारिक ढाँचे में मिलता है। यह एक सामान्य बात हो सकती है कि माँ भी काम पर जा रही है लेकिन साथ ही आप यह भी देखेंगे कि इसके बावजूद घर के ज़्यादातर दैनिक कार्यों को निपटाने का काम भी वही करती है। अपने उद्यम में काम करते हुए वह कितना भी सख्त हो लेकिन घर में उसे यह उचित ही लगता है कि वह खाना बनाती है या वही बच्चों को स्कूल से लेकर भी आती है। उसका पति उसके बराबर ही काम करके घर लौटता है और सोफे पर पसरकर आराम फरमाता है। अक्सर दोनों ही इस व्यवस्था में कुछ भी गलत नहीं पाते लेकिन फिर अत्यधिक काम और तनाव के कारण अचानक किसी दिन वह क्लांत और शिथिल पड़ जाती है और अंततः तनावग्रस्त होकर अवसाद में चली जाती है। उसने सारे कामों का बोझ अपने ऊपर ले लिया था, एक आधुनिक कामकाजी महिला, एक सुघड़ गृहणी और स्नेहमयी माँ-सब कुछ एक साथ!

मैं बहुत सी महिलाओं से मिला हूँ, जिन्होंने ये सारे के सारे काम अपने सर ले रखे हैं। उन्होंने इस विचार को गले लगाया है कि वे भी आज़ादी की हवा में साँस ले सकती हैं, पुरुषों की बराबरी पर हैं और जितना श्रम पुरुष करते हैं, वे भी कर सकती हैं, जितनी देर तक पुरुष काम करते हैं, वे भी कर सकती हैं-लेकिन साथ ही वे अपने आप से अब भी अपेक्षा करती हैं कि वे घर के वे सारे काम भी करती रहें जो उनकी नानियाँ या दादियाँ अपने वक़्त में करती रही हैं और वह भी उसी सुघड़ता के साथ! वे भूल जाती हैं कि उनकी दादियाँ सिर्फ वही करती थीं, उतना ही करती थीं। यह नहीं कि उसका कोई महत्व नहीं है- लेकिन आप सुपरवूमन नहीं हो सकतीं कि हमेशा पूरी दक्षता के साथ बाहर नौकरी भी करें, घर के कामकाज भी निपटाएँ और बच्चों को भी संभालें!

दुर्भाग्य से पुरुष भी अपने रवैये से इस विश्वास को मज़बूती प्रदान करते हैं: पत्नी सारे काम करती रहे, यह कितना सुविधाजनक है! फिर क्यों परेशान हों, क्यों मदद करें? क्यों उठें और खुद बरतन धोना शुरू कर दें? शर्ट अपनी है मगर उस पर प्रेस खुद क्यों करें जब काम करने के लिए पत्नी मौजूद है?

इसलिए कि आप अपनी पत्नी से प्यार करते हैं और चाहते हैं कि आपकी बेटी भी आगे चलकर एक मज़बूत महिला बने। खुद घर के काम करके बेटों के सामने उदाहरण प्रस्तुत करें कि वे भी घर के कामों में मदद कर सकते हैं। अपनी बेटियों को दिखाएँ कि पुरुष और महिलाएँ मिलजुलकर और एक-दूसरे की मदद करते हुए न सिर्फ बाहर के बल्कि घर के काम भी पूरी निपुणता के साथ निपटा सकते हैं! घर के कामों की ज़िम्मेदारी उठाएँ-आखिर पत्नी भी पैसे कमाकर परिवार की आर्थिक मदद कर ही रही है!

हम अभी भी पुरानी लैंगिक भूमिकाओं से चिपके हुए हैं और इससे बाहर निकलने में और वास्तविक समानता प्राप्त करने की दिशा में अभी लंबा रास्ता तय किया जाना बाकी है। जब तक हम एक के बाद दूसरा कदम आगे रख रहे हैं, एक न एक दिन हम अवश्य अपनी मंज़िल पा लेंगे!

जी नहीं, घर की सफाई करना सिर्फ स्त्रियों का काम ही नहीं है! 9 दिसंबर 2015

कल जब मैं उस स्कूली किताब के बारे में लिख रहा था जिसमें बताया गया था कि आपको परिवार के कम से कम एक सदस्य से डरना चाहिए-जो ज़ाहिर है, अधिकतर पिता ही होंगे-तब मुझे लगा कि लैंगिक भूमिकाओं पर मुझे थोड़ा और विचार करना चाहिए। बहुत सोचने पर मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि आधुनिक देशों में भी आज भी सिर्फ इसलिए कि वे पुरुष हैं या महिला, लोग इस उधेड़बुन में रहते हैं कि किन कामों को करने की उनसे अपेक्षा की जाती है।

स्वाभाविक ही, भारत में लिंग के आधार पर कामों का परंपरागत विभाजन पूरी तरह लागू होता है। पुरुष परिवार का अन्नदाता है। बहुत से परिवारों में महिलाएँ काम के लिए तभी घर से निकलती हैं जब बिल्कुल खाने-पीने के लाले पड़ जाते हैं और पैसे कमाने के लिए बाहर निकलना अवश्यंभावी हो जाता है। हमारे स्कूल के गरीब परिवारों में भी कुछ पिता शर्म से डूब मरेंगे अगर उनकी पत्नी को भी बाहर काम करके परिवार की आमदनी में योगदान देना पड़े! अर्थात वे भूखे पेट सो जाना पसंद करेंगे लेकिन अपनी पत्नियों को बाहर काम करने की इजाज़त नहीं देंगे। तब भी जब खुद पत्नी शिद्दत से चाहती है कि बाहर निकलकर खुद भी परिवार के लिए पैसे कमाए!

निश्चित ही भारत में आज भी विवाह के बाद और बच्चे हो जाने के बाद ज़्यादातर महिलाएँ घर में ही रहती हैं भले ही वे विश्वविद्यालय में पढ़कर डिग्रियाँ हासिल कर चुकी हों उनके पास स्नातकोत्तर डिग्रियाँ हैं लेकिन क्योंकि वे स्त्री हैं, उनका काम सिर्फ घर पर रहकर वहाँ की व्यवस्था बनाए रखना और बच्चों की देखभाल करना भर है।

लेकिन पश्चिम में भी मैंने देखा है कि आज भी पुरुष और महिलाओं में अपनी-अपनी परंपरागत भूमिकाओं को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है और वे उन्हें पूरी तरह छोड़ने में हिचकते हैं। आज भी यह पूरी तरह स्वीकार्य है कि पत्नी बच्चे हो जाने के बाद घर में बैठकर घर के काम-काज देखे और बच्चों की परवरिश करे। अगर यह आर्थिक रूप से संभव है और पत्नी को घर पर रहना पसंद है तो मैं भी उसकी सिफ़ारिश करूँगा उसे प्रोत्साहित करूँगा कि वही करे! लेकिन साथ ही अगर पति यही करना चाहे तो वह भी सबको स्वीकार्य होना चाहिए! पत्नी काम पर जाए और घर के खर्चे उठाए जबकि पति घर के कपड़े धोने से लेकर बच्चों की चड्ढियाँ साफ करे!

दुर्भाग्य से जो पुरुष इसकी पहल करते हैं, उनकी हँसी उड़ाई जाती है। इस दिशा में उनके प्रयासों का अनादर किया जाता है-और यह यही दर्शाता है कि आप वास्तव में उन महिलाओं को कितना कमतर आँकते हैं जो पहले ही इन कामों में लगी हुई हैं! अभी भी आप समझते हैं कि घर के काम कम महत्वपूर्ण हैं, कम मुश्किल हैं और उन्हें कोई भी ऐसा व्यक्ति कर सकता है जो अपनी अल्प योग्यता के चलते पैसे कमाने वाले ‘बड़े काम’ नहीं कर सकता! यह हास्यास्पद है! इसका सबसे अच्छा इलाज यह होगा कि ऐसा समझने वाले को खुद ये काम करके देखना चाहिए! चुनौती स्वीकार करें और मुझे दिखाएँ कि आप किस तरह सारे घर की साफ-सफाई करते हैं, बाज़ार जाकर राशन लाते हैं, सारे परिवार के लिए खाना पकाते हैं और सबके मैले कपड़े धोते हैं, जबकि आपके दो छोटे-छोटे बच्चे सारे घर में धमाचौकड़ी मचा रहे हैं!

क्या यह अविश्वसनीय नहीं है कि आज, 21 वीं सदी के 15 साल गुज़र जाने के बाद भी बहुत से लोग यही मानते हैं कि अपने कपड़े साफ करना, अपने लिए खाना पकाना पुरुषों के करने योग्य काम नहीं हैं-अपनी संतान को खाना खिलाने जैसे कामों की बात तो छोड़ ही दीजिए जबकि ये काम एक दिन आपकी संतान भी आपके लिए करेगी?

और जब लोग यह सोचते हैं कि पुरुषों को रोना नहीं चाहिए, तो इसका कारण भी यही होता है। और, क्योंकि स्नेह का प्रदर्शन महिलाओं के खाते में आता है इसलिए पश्चिम में आप महिलाओं को तो आपस में हाथों में हाथ डाले घूमता हुआ देख सकते हैं लेकिन पुरुषों को नहीं। ऐसा क्यों? क्यों स्नेह का प्रदर्शन महिलाओं के लिए आरक्षित है जबकि पुरुषों के लिए अपनी कोमल भावनाओं को दूसरों से साझा करने की जगह शराब को ही समस्या का समाधान मान लिया जाता है!

एक तरफ लोग महिलाओं की क्षमता का सम्मान नहीं करते, उनकी नज़रों में उसकी कोई कीमत नहीं और दूसरी तरफ पुरुषों के कंधों पर बहुत ज़्यादा भार डाल देते हैं! कृपया ऐसा न करें। महिलाओं के पास उनके अपने बोझ लदे हैं- लेकिन उनके संबंध में कल चर्चा करेंगे।

हम इतने नकारात्मक हैं कि हमें हर जगह लिंगभेद और दूसरी बुराइयाँ दिखाई देती हैं – 25 अक्टूबर 2015

आज मैं लैंगिक समानता, नारीवाद और हर चीज़ में कोई न कोई नुस्ख निकालने वाले लोगों के रवैये पर अपने विचार लिखने जा रहा हूँ। इसके अलावा मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि इन सब बातों का हमारे आश्रम की रसोई से क्या ताल्लुक है।

आज आश्रम के कुछ मेहमान हमारी आयुर्वेदिक पाक-कार्यशाला में सम्मिलित हुए। सुबह उन्होंने पनीर बनाना सीखने से शुरुआत की और दोपहर में सारे लोग प्रवेश हाल में इकट्ठे बैठकर पालक की पत्तियाँ चुन रहे थे। खुशनुमा माहौल था और तीन महिला कर्मचारियों के अलावा मेरी नानी और हमारे महिला मेहमान साथ बैठे थे। मुझे लगा, यह बड़ा सुंदर दृश्य है और मैंने एक फोटो ले लिया।

जब मैंने उसे फेसबुक पर पोस्ट किया तो बहुत सारे सकारात्मक टिप्पणियाँ प्राप्त हुईं मगर दो एक जैसी थीं:

"क्या आपके आश्रम में सिर्फ महिलाओं से ही रसोई का काम कराया जाता है?" और "आपकी पिछली पोस्ट्स देखकर मैं आशा कर रही थी कि आपके आश्रम में पुरुष भी खाना बनाने के काम में हिस्सा लेते होंगे!"

निश्चित ही इन दोनों टिप्पणीकारों ने आश्रम संबंधी एक चित्र को, फोटो में कैद एक पल को देखकर यह मान लिया था कि जो महिलाएँ पालक चुन रही हैं, वही सारा भोजन भी तैयार करती होंगी। कि खाना पकाने की सारी ज़िम्मेदारी सिर्फ महिलाओं के सिर पर डाल दी गई है।

मैंने आश्रम की रसोई का एक दूसरा चित्र, जिसमें बहुत से पुरुष कर्मचारी रोटियाँ बेल और सेंक रहे थे, पोस्ट करके बताने का प्रयत्न किया कि पुरुष भी रसोई में काम करते हैं। मैंने चुटकी लेते हुए कहा कि अब यह चित्र यह विवाद न खड़ा कर दे कि रसोई में महिलाओं का प्रवेश क्यों वर्जित है!

निश्चित ही ये टिप्पणीकार हमारे यहाँ कभी नहीं आए और न तो मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ और न ही उन्हें हमारे आश्रम की कार्यप्रणाली की, हमारे कर्मचारियों और मेरे परिवार की रत्ती भर जानकारी है।

जो भी ये फोटो देख रहे हैं, खातिर जमा रखें कि हर क्षेत्र में पुरुष और महिलाएँ दोनों मिल-जुलकर अपने-अपने हिस्से का काम करते हैं! इस समय हमारी रसोई का मुख्य रसोइया पुरुष है। उसके सहायक पुरुष और महिलाएँ, दोनों हैं। सभी सब्जियाँ काटते हैं, बरतनों में सब्जियाँ चलाते हैं और टेबल पर खाना परोसते हैं! हमें इस बात से कोई परेशानी नहीं होगी अगर कल को कोई महिला रसोई की मुखिया बन जाती है! जब मेरी माँ ज़िंदा थीं, वही रसोई का इंतज़ाम देखती थीं और उनके जाने के बाद मेरे भाइयों और मैंने वह ज़िम्मेदारी वहन कर ली है-इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारे यहाँ काम करने वाला कोई कर्मचारी महिला है या पुरुष, इतना काफी है कि उसे पता हो कि उसे क्या काम दिया गया है और वह उस काम को अच्छी तरह अंजाम दे!

इसलिए लिंग भेद का प्रश्न मेरे दिमाग से बहुत जल्दी निकल गया क्योंकि मैं जानता हूँ कि हम यहाँ किसी के साथ किसी प्रकार का भेद नहीं करते-लेकिन मेरे मन में उन टिप्पणीकारों की मानसिकता के बारे में कई तरह के खयाल आते-जाते रहे। मैं सोचता हूँ कि जब आप हर बात में किसी नकारात्मकता की तलाश करते हैं तो वह आपके मन को प्रतिबिम्बित करता है। बिना अधिक जानकारी प्राप्त किए आप किसी चीज़ का गलत अर्थ लगा लेते हैं।

कुछ बातों को आप सामान्य रूप से क्यों नहीं ले सकते? क्यों नहीं आप एक रोचक चित्र का आनंद लेकर, उसमें नुस्ख निकालने कि जहमत उठाए बिना उसे जस का तस ग्रहण करते?

हमारे स्कूल में व्यावहारिक उदाहरणों की सहायता से समानता का सिद्धान्त की शिक्षा – 24 अगस्त 2015

जो भी यहाँ एक बार भी आया है, हमारे स्कूल के बारे में जानने का उसे मौका अवश्य मिलता है। इन आगंतुकों में से अधिकांश लोग हममें से किसी एक के साथ चलकर स्कूल परिसर का दौरा अवश्य करते हैं और हमारे स्कूल के सिद्धांतों के बारे में जानकारी हासिल करते हैं: अहिंसा और समानता।

जी हाँ, हमारा स्कूल बराबरी की नींव पर खड़ा है और यह इस विचार से उद्भूत है कि सभी बच्चों को एक समान होना चाहिए, चाहे वे कितने भी गरीब क्यों न हों। लेकिन यह विचार और आगे निकल गया: हमारे यहाँ जाति को लेकर कतई कोई भेदभाव नहीं किया जाता, जिसका चलन भारत भर के अधिकांश स्कूलों में आज भी मौजूद है! और यही बात धर्म को लेकर भी सही है कि हम किसी प्रकार का धार्मिक भेदभाव भी नहीं करते।

बिल्कुल, हमारे स्कूल में उच्च जाति के ब्राह्मणों, पुरोहितों-पंडितों के बच्चे भी पढ़ते हैं और बहुत से तथाकथित ‘अछूत जातियों’ के बच्चे भी। और हमारे यहाँ हिन्दू बच्चे भी पढ़ते हैं और मुसलमान बच्चे भी।

गरीबी धर्म और जातियों में कोई भेद नहीं करती! हम धार्मिक परिवारों के बच्चों को, सिर्फ इसलिए कि हम उनके विचारों और नज़रिए से सहमत नहीं हैं, भर्ती करने से इंकार नहीं करते! हम ऐसे बच्चों को भी शिक्षा प्रदान करते हैं, जो पूरी तरह धार्मिक परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। वे धार्मिक पाखंड में रचे-बसे माहौल में बड़े होकर यहाँ आते हैं और स्वाभाविक ही, वही विचार अपने साथ लेकर स्कूल आते हैं। घर में उनकी आस्थाएँ जो भी हों, अभिभावक उन्हें स्कूल भेजने में आर्थिक कठिनाई महसूस करते हैं और यही हमारे लिए भर्ती का एकमात्र मानदंड होता है।

और वे यहाँ सबसे प्रमुख बात यह सीखते हैं कि वे सब बराबर हैं। वे सब एक साथ अगल-बगल बैठते हैं, चाहे उनका परिवार किसी भी जाति या धर्म से संबंध रखता हो, एक साथ कतार में बैठकर भोजन करते हैं। वे सब हिल-मिलकर एक-दूसरे के साथ खेलते हैं और छुट्टी के बाद सब एक साथ अपने घर जाते हैं। अगर उनके अंदर बराबरी के विचार का यह बीज स्कूल में ही रोप दिया जाए तो भविष्य में कभी न कभी उनका मन घर में बचपन से सीखी गई बातों से अलग तरह से सोचने को तैयार होगा।

हमने आजकल एक नया काम शुरू किया है। हर शनिवार हमारे यहाँ कुछ बड़ी कक्षाओं के बच्चों आते हैं और विभिन्न विषयों पर चर्चा करते हैं- निश्चित ही, नास्तिकता पर भी और जाति-प्रथा, अंधविश्वास, लैंगिक भूमिकाओं पर, सुंदरता के कथित आदर्श और दूसरे बहुत से विषयों पर।

पिछले सप्ताह हमने जाति-प्रथा पर चर्चा की थी और बच्चों ने बताया कि कैसे उनके घरों में उनके अभिभावक निचली जातियों के बच्चों के साथ खेलने से मना करते हैं। और कैसे वे उनसे छिपकर उनके साथ खेलने निकल जाते हैं- क्योंकि उन्हें ऐसे किसी अंतर का पता ही नहीं होता।

जाति-प्रथा को लेकर बच्चों की समझ बहुत सीमित होती है क्योंकि वैसे भी यह प्रथा पूरी तरह अतार्किक भेदभाव पर आधारित है और अगल-अलग समूहों में इस तरह लोगों को बाँटना पूरी तरह अर्थहीन है। लेकिन बचपन से उनके मन में लगातार यही विचार भरा जाता है जिससे वे भी अपने अभिभावकों जैसा व्यवहार करने लगते हैं और स्वाभाविक ही आपस में भी एक-दूसरे के साथ भेदभाव करते हैं। हम आशा करते हैं कि हम उनके भविष्य में बदलाव ला सकेंगे।

नहीं! हम सिर्फ आशा नहीं करते बल्कि हमें पूरा विश्वास है कि अवश्य ला सकेंगे। एक न एक दिन ये बच्चे आपस में मिलेंगे और अपने स्कूली दिनों की याद करेंगे। वे पुनः एक टेबल पर बैठकर हँसते-गाते, खुशी और संतोष के साथ याद करेंगे कि बचपन में भी वे इसी तरह साथ बैठकर भोजन किया करते थे!

हो सकता है कि वे एक दिन इस अन्याय के खिलाफ उठ खड़े हों। संभव है वे अपने बच्चों के साथ अलग तरह का व्यवहार करें। कुछ भी हो, वे इस समय यहाँ बराबरी का व्यवहार पा रहे हैं और निश्चित ही यह उनके जीवन में बदलाव लेकर आएगा।

अपने बच्चों के सामने दूसरे बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करें – 18 अगस्त 2015

हमारे यहाँ, आश्रम में हमेशा बच्चे मौजूद होते हैं और स्वाभाविक ही पिछले साढ़े तीन साल से उनके बीच हमारी बेटी भी है। वह अब भी उन बच्चों में सबसे छोटी है और जब कि वह हमारे लिए हमेशा कुछ ख़ास रहेगी, हम उसे एक बात सिखाने की भरसक कोशिश करते हैं: हम सब बराबर है। तुम और दूसरे सभी बच्चे एक जैसे हैं। मुझे लगता है, बहुत से अभिभावक अपने बच्चों के मन यह संदेश बिठाने के लिए परिश्रम करते होंगे और इसीलिए मैं आज यह ब्लॉग लिख रहा हूँ।

हमारे स्कूल का एक बुनियादी उसूल है, मेरे जीवन का भी यह बुनियादी उसूल है और अपनी बेटी को भी मैं यही बात सिखाना चाहता हूँ: हम सब बराबर हैं। कोई भी आपसे ऊपर नहीं है, दूसरे जो भी काम कर सकते हैं, आप भी कर सकते हैं। लेकिन साथ ही, कोई भी आपसे छोटा नहीं है।

निश्चित ही आपका बच्चा आपके लिए हमेशा ख़ास होगा। आप सोचेंगे कि वह अधिक बुद्धिमान, अधिक सुन्दर है, हर चीज़ में दूसरे बच्चों से बढ़-चढ़कर है। यहाँ तक सब कुछ ठीक है, आप इस एहसास में खुश रहें, आनंदित हों और जब भी वह कुछ अच्छा करे, उसकी तारीफ़ करें।

लेकिन उसे यथार्थ की सीमा में रखें: बच्चे सभी एक जैसे होते हैं। कुछ बच्चे किसी क्षेत्र में प्रतिभाशाली होते हैं तो दूसरे किसी दूसरे क्षेत्र में। हम ही होते हैं जो उन्हें एक काम में या किसी और काम में प्रशिक्षित करते हैं और संभवतः उसमें उसे आगे और विकसित करने में अपना योगदान देते हैं!

लेकिन साथ ही हम ही होते हैं जो उन्हें इस बात की शिक्षा देते हैं कि एक-दूसरे के साथ परस्पर समान व्यवहार किया जाना चाहिए। हमें इसका उदाहरण बनना चाहिए। न सिर्फ दूसरे वयस्कों के साथ समान व्यवहार करके और यह दर्शा के कि हमें अपने साथ बराबरी का व्यवहार पसंद है, बल्कि दूसरे बच्चों के साथ वैसा ही व्यवहार करके, जैसा हम अपने बच्चे के साथ करते हैं।

आप नहीं चाहेंगे कि आपका बच्चा दूसरों को नीची नज़र से देखे। तो फिर आप भी वैसा ही करें और उसके सामने अपना उदाहरण प्रस्तुत करें।

मेरी बेटी मेरे लिए सदा कुछ ख़ास रहेगी और निश्चित ही मेरे पूरे परिवार के लिए भी। वह हमारे लिए राजकुमारी है- लेकिन हमारे साथ और भी दूसरे बच्चे रहते हैं। वे सभी एक से नियम सीख रहे हैं और जब भी हमारी बेटी उन नियमों से विचलित होती है तो उसे भी तुरंत आगाह किया जाता है।

स्वाभाविक ही वह हमारी थाली में खाएगी, हमारे साथ सोएगी। वह हमारे लिए खास होगी लेकिन मैं उसे सिखाना चाहता हूँ कि जब कि वह अपने आसपास के लोगों के लिए कुछ खास है, उसके आसपास मौजूद हर व्यक्ति भी कुछ और लोगों के लिए खास है। और जितने ज़्यादा खास लोग तुम्हारे आसपास मौजूद होंगे उतना ही खुश तुम रहोगी।

हम सब बराबर हैं, हम सब खास हैं!

और अब हम पवन के भाई, गुड्डू का जन्मदिन मनाने जा रहे हैं, जो अब हमारे साथ ही रह रहा है। वह उसका खास दिन होगा- हम सुनिश्चित करेंगे कि उसे महसूस हो कि वह हम सबके लिए कितना खास है!

अश्लील फिल्में बलात्कार का कारण नहीं हैं। क्यों? 2 जून 2015

कल मैंने एक परिचित का ज़िक्र किया था, जिसकी निगाह में, अश्लील फिल्मों के कारण भारत में बलात्कार के प्रकरण बढ़े हैं। मैं पहले ही बता चुका हूँ कि मेरे विचार में काम-वासना एक सुंदर एहसास है। आज मैं उन गलत तर्कों के बारे में लिखना चाहता हूँ, जिनके द्वारा यह प्रमाणित करने की कोशिश की जाती है कि अश्लील फिल्मों के कारण बलात्कारों की संख्या में इजाफा हो रहा है क्योंकि वे कामोत्तेजना पैदा करती हैं।

साधारण शब्दों में कहा जाए तो यह निष्कर्ष पूरी तरह गलत है। अश्लील फिल्में बलात्कार का कारण नहीं हैं। यह गलत है कि पुरुष अश्लील फिल्में देखते हैं, कामोत्तेजित होते हैं और किसी तरह संतुष्ट नहीं हो पाते तो बाहर निकलकर स्त्रियॉं के साथ बलात्कार करना शुरू कर देते हैं। अश्लील फिल्में देखने का अर्थ यह नहीं है कि आप लोगों के साथ बलात्कार करने लगते हैं!

बहरहाल, यह बताना आवश्यक है कि महिलाएँ भी अश्लील फिल्में देखती हैं! कुछ लोगों को यह बात थोड़ी आश्चर्यजनक लग सकती है लेकिन यह एक तथ्य है। फिर क्यों नहीं वे भी कामोत्तेजना में पागल होकर बलात्कार करने निकल पड़तीं? इस विचार पर हँसे नहीं-जी हाँ, ऐसा भी होता है, जहाँ महिलाएँ बलात्कार करती हैं और पुरुष पीड़ित की भूमिका में होता है। बस ऐसा कभी-कभी ही होता है और सिर्फ एक मामूली अपराध मानकर उसे दबा दिया जाता है। लेकिन यह सच है कि महिलाएँ भी अश्लील फिल्में देखती हैं। तो फिर उनकी काम-वासना कहाँ निकलती है?

पहले जब अश्लील फिल्में नहीं हुआ करती थीं तब भी बहुत सी दूसरी कलाएँ और साहित्य होता था, जैसा कि मैने कल ज़िक्र भी किया था। यह हजारों सालों से हो रहा है, यह नई बात नहीं है! खजुराहो के मंदिरों में उकेरे गए कामोद्दीपक मूर्तिशिल्पों की कल्पना करें! आपके अनुसार तो यह होना चाहिए कि इन कामोत्तेजक मूर्तियों को देखने वाला हर शख्स, भले ही वे मूर्तियाँ तकनीकी रूप से उतनी विकसित न हों, काम-वासना में इस कदर पागल हो जाना चाहिए कि किसी भी स्त्री को पकड़कर बलात्कार शुरू कर दे। उन पर्यटकों की कल्पना करें, जो इन कामसूत्र मंदिरों को देखने के लिए पैसे खर्च करते हैं और मूर्तियों को देखकर इतने कामोत्तेजित हो जाते हैं कि पास से निकल रही किसी महिला पर्यटक को दबोच लेते हैं! वाकई ये मंदिर बहुत खतरनाक हैं और उन्हें वैश्विक-घरोहर माना गया है! आश्चर्य है!

मज़ाक छोड़िए। मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि न तो अश्लील फिल्में और न ही काम-वासना बलात्कार का कारण होते हैं।

कुछ लोग कहते हैं कि महिलाओं के कपड़े बलात्कार का कारण है। कुछ दूसरे कहते हैं, भारतीय समाज का पश्चिमीकरण इसका कारण है। कुछ ज़्यादा ही मूर्ख लोग कहते हैं कि गलती मोबाइल फोनों की और पश्चिमी खान-पान की है-और बहुत से लोग उनकी बात पर यकीन भी कर लेते हैं! आप अपने विचार अपने पास रखें, मैं आपसे सहमत नहीं हूँ। मेरी नज़र में, कामोत्तेजना का दमन ही इसका मुख्य कारण है और कुछ मामलों में-स्त्रियॉं का दमन करने के इरादे से और उन्हें उनकी औकात बताने तथा दूसरी वस्तुओं की तरह, उपभोग की वस्तु मान लेना बलात्कार कारण है।

आप समझ गए होंगे कि मैं किस ओर इशारा कर रहा हूँ: जो समाज सेक्स को लेकर ज़्यादा खुले हुए हैं और जहाँ लैंगिक समानता काफी हद तक मौजूद है, वहाँ उन मुल्कों के मुकाबले, जहाँ स्त्रियों का दमन किया जाता है और सेक्स अब भी वर्जनामुक्त नहीं है, यौन अपराध कम होते हैं! जहाँ वर्जनाएँ हैं, दमन है और जहाँ सेक्स संबंधी हर बात आप छिपाते हैं या उन्हें छिपाकर करना पड़ता हैं तो परिणामस्वरूप यह दमन और ये वर्जनाएँ विस्फोटक रूप से सामने आती हैं।

उन पुरुषों के लिए, जो महिलाओं के दमन में विश्वास रखते हैं, बलात्कार अपने शक्ति-प्रदर्शन का और महिलाओं को उनका नीचा स्थान दिखाने का ज़रिया बन जाता है। एक ऐसा दुष्कर्म, जिससे वे महिलाओं की इच्छाशक्ति का खात्मा कर देना चाहते हैं और सिद्ध करना चाहते हैं कि वह उससे कमज़ोर है। इसके लिए कामोत्तेजना की ज़रूरत नहीं है, इसमें किसी तरह का यौन-आनंद प्राप्त नहीं होता। मेरा विश्वास है कि बलात्कारी भी इससे कोई संतोष प्राप्त नहीं कर सकता!

और, जैसा कि मैंने पहले भी इशारा किया, महिलाओं की और खुद अपनी नैसर्गिक सहज-प्रवृत्ति और यौन ज़रूरत के इस दमन के मूल में धर्म मौजूद है। धर्म, परंपरा और संस्कृति ने अप्राकृतिक ढंग से यौनेच्छाओं को लोगों के मन में एक मानसिक दैत्य में तब्दील कर दिया है। आपको स्वतंत्र रूप से अपनी सेक्स विषयक इच्छाओं के विषय में निर्णय लेने की अनुमति नहीं है, आपको सेक्स के बारे में सोचने की या उसका आनंद उठाने की अनुमति नहीं है! यह दमन ही एक सीमा के बाद उसे एक विस्फोट के रूप में फटने के लिए मजबूर कर देता है!

अगर आपका सहजीवन (वैवाहिक जीवन) सुखद और प्रेममय है तो स्वाभाविक ही, आपकी काम-वासना को बाहर निकलने का मौका मिल जाता है और आप दमित कामेच्छा से मुक्त होते हैं। जिस व्यक्ति को यौन संतुष्टि प्राप्त है वह भला बलात्कार क्यों करेगा? अगर आपके आसपास कोई नहीं है, जिससे आप यौन संतुष्टि प्राप्त कर सकें तो फिर बात अलग है। लेकिन ऐसी स्थिति में भी बलात्कार कतई तार्किक परिणति नहीं है! सभी जानते हैं कि इसका भी उपाय है: आप खुद अपनी मदद कर सकते हैं! जी हाँ, पुरुष और महिलाएँ, दोनों के पास अपनी यौन क्षुधा शांत करने के उपाय उपलब्ध हैं। दुर्भाग्य से उन पर भी पाबंदी है: धर्म कहता है कि वे उपाय करने से आप अंधे हो जाएँगे, कि आप अपनी ऊर्जा व्यर्थ खो बैठेंगे, कि ऐसा करना पापकर्म है! आगे किसी दिन मैं एक पूरा ब्लॉग हस्तमैथुन पर लिखना चाहूँगा, जिसमें मैं उन समस्याओं पर भी प्रकाश डालूँगा, जिनके चलते लोग हस्तमैथुन करके अपराध बोध से ग्रसित हो जाते हैं।

और अंत में हम इसी नतीजे पर पहुँचते हैं कि अश्लील फिल्में बलात्कार का कारण नहीं हैं। कारण काम-वासना का दमन है-और भारत में बढ़ते यौन अपराधों की भयावह स्थिति भी इसी का नतीजा है!

महिलाओं की यौन इच्छाओं से पुरुषों की सुरक्षा करना – लैंगिक समानता की दिशा में एक और तर्क – 7 मई 2015

कल वैवाहिक बलात्कारों के संबंध में लिखते हुए मैंने नोटिस किया कि सेक्स पर विचार करते हुए हमेशा महिलाओं की सहमति का सवाल उठता रहा है। मैंने आज तक यह कभी नही पढ़ा कि सेक्स के लिए पुरुषों की सहमति होनी चाहिए या नहीं! मैंने इन चर्चाओं में यह भी कभी नहीं पढ़ा कि महिलाओं को भी सेक्स की आवश्यकता होती है! यह कैसे?

जैसा कि कल मैंने स्पष्ट किया था, हिन्दू धर्म महिलाओं से यह अपेक्षा करता है कि वे हर हाल में अपने पति की आज्ञा का पालन करेंगी। अर्थात, अगर पति सेक्स करना चाहता है तो उसे तुरंत अपने आपको पति के सामने प्रस्तुत कर देना चाहिए। इस्लाम भी, जैसा कि आप कल्पना कर सकते हैं, महिलाओं के प्रति इतना ही असभ्य व्यवहार करता है। असल में, मैंने हाल ही में कहीं पढ़ा कि मुहम्मद ने इस बारे में ब्योरेवार विस्तृत नियम बता रखे हैं कि पत्नी को अपने आपको किस तरह हर वक़्त तैयार रखना चाहिए: चाहे महिला ‘ऊँट पर बैठी’ हुई ही क्यों न हो, उसे पति के साथ संभोग के लिए हर वक़्त तैयार रहना चाहिए!

वाह! पैगंबर की स्वैर कल्पनाएँ बेहद विषद, गजब और सजीव हैं! क्या नहीं?

तो सारी चर्चा महिला की सहमति के इर्द-गिर्द घूम रही है। उसे पति के साथ सेक्स के लिए हर वक़्त तैयार रहना चाहिए। लेकिन क्या हो अगर उसका पति सेक्स के लिए उद्यत ही न हो, खुद होकर कभी उससे कहे ही नहीं-या कभी-कभार, क्वचित ही कहे? तब पत्नी की यौनेच्छा का क्या होगा, सेक्स की उसकी आवश्यकता का क्या हो?

पूरी चर्चा इस बात की है कि सिर्फ पुरुष ही हमेशा सेक्स की मांग करे, चाहे जब, दिन में कभी भी! न सिर्फ दिन में कभी भी, बल्कि इस बात की चिंता किए बगैर कि उसकी पत्नी किस अवस्था में है-सिर्फ मासिक धर्म के समय को छोड़कर, क्योंकि तब वह अपवित्र और अस्पृश्य होती है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि वास्तव में पुरुष की सेक्स करने की इच्छा न हो?

जी हाँ, इसके विपरीत अगर महिला की सेक्स की इच्छा अधिक प्रबल हो? महिलाओं की यौनेच्छा को कम करके न आँकें! जब उनकी इच्छा होती है, बल्कि कहा जाए कि जब उन्हें सेक्स की अत्यंत आवश्यकता होती है तब कई महिलाएँ किसी पुरुष के साथ सोने की इच्छा में बड़ी दूर तक जा सकती हैं, कई खतरे मोल ले सकती हैं! कमजोर सेक्स कई बार असाधारण शक्ति प्राप्त कर लेता है और उसके तरकश में पुरुषों से कहीं ज़्यादा प्रकार के तीर होते हैं, क्योंकि पुरुषों में, जैसा कि हम जानते हैं, रक्तसंचार जब दक्षिण दिशा की ओर प्रवाहित होने लगता है, उनका मस्तिष्क ठीक तरह से काम नहीं करता! और ऐसी स्थिति में मस्तिष्क का बेहतर उपयोग करते हुए यह सीधी-सादी लगने वाली औरत अपना कम अबोध रूप भी दिखा सकती है!

इसलिए मैं पुरुषों की ओर से यह याचना करता हूँ कि बिना सहमति के किए जाने वाले सेक्स के बारे में चर्चा करते समय उनकी सहमति या असहमति पर भी चर्चा की जानी चाहिए! पुरुषों की अकामुकता के साथ हो रहे भेदभाव के विरोध में एक अपील और लैंगिक समानता की मांग!

पढ़े-लिखे उच्च वर्ग में भी लड़की के जन्म पर निराशा व्यक्त की जाती है! 14 जनवरी 2015

कल मोनिका के बारे में लिखते हुए मैं उसकी पारिवारिक स्थिति पर पुनः विचार करने को मजबूर हो गया। मुझे उसकी माँ के अतीत का खयाल आया, जिसकी दो लड़कियों को दत्तक दे दिया गया क्योंकि वे लड़के नहीं, लडकियाँ थीं। रमोना ने कुछ समय पहले अपनी स्त्री-रोग विशेषज्ञ (गाइनकालजिस्ट) से बात की-और जो उसने बताया उससे एक बार फिर यह साबित हो गया कि बहुत से उच्च वर्ग के लोगों की ज़िंदगी का यह आज भी एक कटु सत्य बना हुआ है!

जिस अस्पताल में रमोना की स्त्री-रोग विशेषज्ञ (गाइनकालजिस्ट) काम करती है, वहीं अपरा का जन्म हुआ था और वहीं इस वक़्त मोनिका का इलाज चल रहा है। जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूँ, वह एक बहुत अच्छा अस्पताल है। अर्थात, यहाँ डॉक्टर जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं, यहाँ के कर्मचारी बहुत दोस्ताना और निपुण हैं और स्वाभाविक ही आप इन सेवाओं की अच्छी-ख़ासी कीमत भी अदा करते हैं। जब कोई डॉक्टर वहाँ भर्ती (बच्चे को जन्म देने वाली) किसी महिला के बारे में बताता है तो स्वाभाविक ही वह किसी अच्छे खाते-पीते, पढ़े-लिखे, उच्च वर्गीय खानदान की सदस्य होती है। वे अच्छी ख़ासी पढ़ी-लिखी होती हैं और अक्सर कोई न कोई काम करती हैं और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया से उनका संपर्क होता है, आधुनिक जीवन और आचार-व्यवहार को वे अच्छी तरह जानती हैं। इसके अलावा वे पुराने दक़ियानूसी मूल्यों की सच्चाई के बारे में भी अच्छी तरह वाकिफ होती हैं।

लेकिन दुर्भाग्य से, जो डॉक्टर ने बताया वह बड़ा निराशाजनक था। उसने बताया कि अक्सर ये महिलाएँ भी बड़ी अंधविश्वासु होती हैं और पुराने, भद्दे, दक़ियानूसी मूल्यों की गुलाम और विचारों से बहुत गँवार होती हैं। उसे अकसर ऐसे अनुरोध प्राप्त होते रहते हैं, जिनमें महिलाएँ विनती करती हैं कि उनका सी-सेक्शन ठीक उनके द्वारा बताए गए ‘मुहूरत’ पर हो, जिसे ग्रहों और नक्षत्रों की अवस्थिति के अनुसार किसी पंडित ने निश्चित किया होता है, जिससे होने वाले बच्चे की बढ़िया से बढ़िया कुंडली तैयार हो सके।

इतना ही नहीं, स्वाभाविक ही ऐसी हालत में, लड़की पैदा करने वाली महिलाओं को सांत्वना देना भी उसका फर्ज़ बन जाता है। बहुत सी उच्च शिक्षा प्राप्त डिग्री धारी महिलाएँ, लड़के की अभिलाषा में लंबी प्रसव-पीड़ा सहन करती हैं और लड़की पैदा होने पर आँसुओं में डूब जाती हैं। ये आँसू पीड़ा-मुक्ति की खुशी के आँसू नहीं होते और न ही थकान के कारण बह रहे होते हैं बल्कि निराशा और अवसाद के कारण पैदा होते हैं। ‘लड़की पैदा हुई है’ वाक्य उनके अंदर किसी तरह की खुशी या उत्साह पैदा नहीं कर पाता!

अब आप ही देखिए कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि महिला पढ़ी-लिखी है या नहीं, पहले उसका कोई लड़का है या नहीं, उसकी धारणा भी यही होती है कि लड़की के मुक़ाबले लड़का अधिक मूल्यवान है। उसकी परवरिश इसी माहौल में हुई है, वह यही सुनते हुए बड़ी हुई है और वह जानती है कि उसका परिवार उससे एक लड़का पैदा करने की अपेक्षा कर रहा होगा।

जब हम बच्चों से उनके परिवार के विषय में कुछ पूछते हैं, जैसे यह कि क्या उनके चाचा या मौसी के बच्चे हैं तो वे इस तरह जवाब देते हैं: ‘उनकी तीन लड़कियाँ हैं, लड़का एक भी नहीं है’। लड़कियाँ अक्सर आपस में कहती रहती हैं कि हमारे घर की हालत बहुत खराब है क्योंकि ‘हम इतनी सारी बहनें हैं’। जब रमोना गर्भवती थी तब कम से कम दस लोगों ने कहा था: ईश्वर करे, लड़का ही हो’!

भारत विकास और प्रगति कर रहा है लेकिन ऐसे भयावह विचारों, रवैयों और मूल्यों से मुक्ति पाने की दिशा में अभी बहुत काम किया जाना बाकी है!

सभी बच्चे बराबर हैं और उनमें मेरी बेटी भी शामिल है – 25 नवंबर 2014

कल मैंने आपको बताया था कि मेरी बेटी स्कूल के दूसरे बच्चों के साथ भोजन करती है या नहीं। जब कि मैं समझ रहा हूँ कि उस व्यक्ति का प्रश्न महज खाने की गुणवत्ता से सम्बद्ध था लेकिन इसका एक और अर्थ निकाला जा सकता है: हो सकता है कि उसने पूछा हो कि हम अपनी बच्ची को दूसरे बच्चों के साथ वास्तव में खाना खाने की इजाज़त देते हैं या नहीं।

पश्चिमी लोगों के लिए मुझे इस बात को कुछ विस्तार से समझाना पड़ेगा। भारत में वे लोग, जो आज भी परंपरागत मूल्यों पर विश्वास करते हैं और पुरानी, रूढ़िवादी और भयानक जाति-प्रथा को मानते हैं, आज भी इस बात पर ज़ोर देते हैं कि ऊँची जाति वालों को निचली जाति वालों या सबसे ‘नीची जाति’ वालों के साथ, जिन्हें वे अछूत कहते हैं, बैठकर भोजन नहीं करना चाहिए। उस व्यक्ति के हाथ का पकाया खाना वे नहीं खाना चाहेंगे, जिसे वे ‘नीची जाति’ का व्यक्ति समझते हैं और निश्चय ही नहीं चाहेंगे कि उनके बच्चे भी उस जाति के बच्चों के साथ बैठकर खाना खाएँ।

यह आपको मध्य काल की बात लग रही होगी! लेकिन यह बात भारत में आज भी यथार्थ बनी हुई है। ऐसी खबरें मिलती रहती हैं, जिनके अनुसार, यह जानने के बाद कि स्कूल का रसोइया निचली जाति का है, कुछ अभिभावक और बच्चे स्कूल में दिए जाने वाले भोजन का बॉयकॉट करते हैं!

हम इस तरह की किसी भी मूर्खताओं में विश्वास नहीं करते और अपने स्कूल में भी इसकी अनुमति नहीं देते। हमारे यहाँ हर जाति के बच्चे पढ़ते हैं-सबसे ऊँची जातियों से लगाकर सबसे नीची जाति के बच्चे-क्योंकि जाति आपकी आर्थिक स्थिति नहीं दर्शाती। और सभी बच्चे साथ खाना खाते हैं, एक-दूसरे के अगल-बगल बैठते हैं और इससे कोई मतलब नहीं होता कि वे किस जाति से आते हैं, वे सिर्फ अपने भोजन का आनंद लेते हैं। हम उनके बीच कोई भेदभाव नहीं करते और सबको सख्ती के साथ इसका पालन करने की हिदायत भी देते हैं।

अब संभव है इस व्यक्ति ने सोचा हो कि शायद हम अपने आदर्शों पर अडिग नहीं होंगे। हो सकता है, हम इन गरीब बच्चों को तो एक साथ खाना खिलाते हों लेकिन अपनी बेटी को, क्योंकि वह हर तरह से बेहतर स्थिति में है, उन बच्चों के साथ भोजन करने नहीं देते होंगे।

मैं फिर कहूँगा कि यह विचार बहुत आश्चर्यजनक नहीं है। कई लोग खुद को तो दूसरों से बेहतर समझते ही हैं, अपने बच्चों को भी गरीब तबके से आए बच्चों से बेहतर समझते हैं।

लेकिन हम ऐसा नहीं समझते। जो हम कहते हैं, हम उस पर वास्तव में सख्ती और धैर्य के साथ चलते हैं। हम वही करते हैं, जो कह रहे होते हैं और इसीलिए अपरा भी इन बच्चों के साथ बैठकर भोजन कर सकती है, उनके साथ खेल सकती है और उनकी कक्षाओं में जाकर, उनके साथ बैठकर पढ़ना-लिखना सीख सकती है-जैसा कि वह कभी-कभी करती भी रहती है।

अगर आप इस पर विश्वास न कर पाएँ तो एक बार यहाँ आएँ। मैं जानता हूँ कि कई ऐसी जगहें हैं, जहाँ बच्चों तक के साथ बराबरी का व्यवहार नहीं किया जाता। बच्चे वही एक ही होते हैं। इसलिए वैसा ही उनके साथ व्यवहार करें, भेदभाव न करें!

प्रबंधन के क्षेत्र में ज़्यादा से ज़्यादा महिलाएँ होनी चाहिए! 8 मई 2014

कल का ब्लॉग पढ़ने के बाद किसी ने कहा कि मुझे उस महिला मेहमान की प्रतिक्रिया पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आखिर वह महिला थीं और स्पष्ट ही अपने पुरुष सहकर्मियों के मुकाबले बेहतर काम अंजाम दे रही थीं। ऐसे पदों पर आसीन महिलाओं को अक्सर वह सराहना, मान्यता और सम्मान नहीं मिल पाते, जिसकी वे हकदार होती हैं। यह जानकारी मेरे लिए रोचक तो थी मगर साथ ही कष्टकर भी थी और इसलिए मैं चाहता हूँ कि इस विषय पर कुछ और विचार किया जाए।

सर्वप्रथम यह कि प्रबंधन के मामले में पुरुषों का दबदबा अभी भी कायम है। प्रबंधन में महिलाएं मौजूद अवश्य हैं और बहुत से देशों में ऊंचे पदों पर भी मौजूद हैं मगर उनका प्रतिशत यह ज़ाहिर करता है कि पुरुष ही अधिकतर प्रबंधन के ऊंचे ओहदों तक पहुँचते हैं। आइए इसके कारणों पर, जैसे बाद में महिलाओं की गर्भावस्था और मातृत्व का समय आदि पर चर्चा करें और इसके परिणामों पर ध्यान केन्द्रित करें।

तो माना कि दस लोगों के एक समूह में सिर्फ एक महिला है। परिणामों के आंकड़े बताते हैं कि महिला का प्रदर्शन सभी पुरुषों से बेहतर है जबकि पुरुषो के मन में अभी भी यही विचार बना हुआ है: 'आखिर एक महिला मेरा काम कैसे कर सकती है?' जी हाँ! दुर्भाग्य से यही विचार, महिलाओं को कमतर समझने का यह रवैया अभी भी जड़ जमाए हुए है। लैंगिक-समानता में काफी प्रगति होने के बाद भी समाज सामान्य रूप से यही सोचता है कि कुछ कार्यक्षेत्र सिर्फ पुरुषों के लिए और कुछ दूसरे सिर्फ महिलाओं के लिए उपयुक्त हैं।

अब पुनः प्रबंधन पर लौटें। पुरुष सोचते हैं कि महिलाएँ कभी भी उतनी कठोर और निष्ठुर नहीं हो सकतीं जितने वे होते हैं। यह उनके स्वाभाव में ही नहीं होता। वे अपने कर्मचारियों पर चीखने-चिल्लाने में संकोच करती हैं। अगर यही बात है कि दृढ़ता तभी व्यक्त होगी जब आप अपने मातहतों पर चीखेंगे-चिल्लाएँगे, शोर मचाएंगे और उन्हें अपने से तुच्छ समझेंगे तो मुझे लगता है कि ज़्यादा से ज़्यादा महिलाओं को प्रबंधन के उच्च पदों तुरंत पदोन्नत कर दिया जाना चाहिए। अगर पुरुष स्वभावतः अपना गुस्सा काबू में नहीं रख सकते तो फिर महिलाओं को ऊंचे पदों पर आकर यह ज़ाहिर करना और पुरुषों को सिखाना चाहिए कि किस तरह दूसरों का अपमान किए बगैर और उन्हें अपना साथी समझकर और उन्हें अपने से नीचा समझे बगैर भी सख्त हुआ जा सकता है! कि आप बिना कर्कश हुए भी सख्त हो सकते हैं। कि आप विनम्र और सौम्य बने रहते हुए भी अपनी टीम को सफलता की ओर ले जा सकते हैं।

ऊंचे पदों पर ज़्यादा महिलाओं की नियुक्ति होने पर दूसरी सभी समस्याएँ खुद-ब-खुद समाप्त हो जाएंगी। कोई यह नहीं समझेगा कि ये काम पुरुषों के लिए आरक्षित हैं। अगर कोई महिला किसी पुरुष से बेहतर परिणाम प्राप्त करने में सफल रहती है तो पुरुष को तकलीफ नहीं होनी होगी! और तब किसी पुरुष की यह हिम्मत नहीं होगी कि वह किसी भी महिला को किसी काम को करने का बेहतर तरीका बताए!

मैं जानता हूँ कि पश्चिम में बहुत सी महिलाओं को ऊँचे पदों पर काम करते हुए इस तरह की समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता या पुरुष सहकर्मियों की तुलना में पर्याप्त सम्मान न पाने का बहुत हल्का सा एहसास भर उनके मन में रहता है। लेकिन यह होता है और यह बात, मैं क्या कह रहा हूँ यह वही समझ सकता है, जिसने इन अनुभवों को झेला है, जब कोई सहकर्मी आपको यह बताने की चेष्टा करता है कि आप किसी काम को करने में उतने सक्षम नहीं हैं, जितना कि वह है।

पश्चिमी देशों में, जहाँ महिला सशक्तिकरण के आन्दोलन काफी सफलता प्राप्त कर चुके हैं, स्थिति काफी अच्छी है मगर भारत में माहौल बिल्कुल अलग बल्कि निराशाजनक है। बड़ी कंपनियों के निर्णायक रूप से महत्वपूर्ण पदों पर महिलाओं की संख्या बहुत कम है और वैसे भी कुल मिलाकर नौकरियाँ या अपना खुद का काम-धंधा करने वाली महिलाओं की संख्या ही नगण्य है।

तो आप उनकी परिस्थिति की कल्पना कर पा रहे होंगे- निचले पदों पर, पुरुष कर्मचारियों से कम पैसों में तो महिलाएं काम कर सकती हैं मगर कठिन कामों के लिए उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

दुनिया भर में इस बारे में अब भी बहुत परिवर्तन की आवश्यकता है। पूर्वी देशों में और पश्चिमी देशों में भी। बराबरी का स्वप्न पूरा हो सके इसलिए, सबके सम्मान के लिए और काम के बेहतर माहौल की स्थापना के लिए। ज़्यादा से ज़्यादा लोग सुखी हों, इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए।