जर्मनी में हमारी मौज-मस्ती – 29 नवंबर 2015

जर्मनी में हमारा एक और हफ्ता गुज़र गया और इस हफ्ते भी हमें इतनी बड़ी संख्या में एक से एक बढ़कर अनुभव प्राप्त हुए कि उन्हें सिर्फ एक ब्लॉग में समेटना बड़ा मुश्किल है! फिर भी मैं कोशिश करता हूँ:

पिछले रविवार को हैम्बर्ग में अपने बर्फ़बारी के अनुभव के विषय में मैं पहले ही लिख चुका हूँ। उस रोमांचक दिन के बाद सोमवार को हम एक और ट्रिप पर निकल पड़े, इस बार हैम्बर्ग नहीं बल्कि लुनेबर्ग में ही, उसके निचले हिस्से में स्थित थर्मल बाथ की ओर! जबकि पहले हम खुले स्वीमिंग पूल में कई बार गए हैं, इनडोर स्वीमिंग पूल में तैरने का यह अपरा और मेरा भी पहला अवसर था। यह अपने आप में गज़ब का अनुभव रहा! वहाँ कई अलग अलग पूल थे, एक में तेज़ लहरें उठ रही थीं और भँवर भी थे, एक बिल्कुल नन्हे बच्चों के लिए था और एक और, कुछ बड़े बच्चों के लिए। एक पूल नमकीन गर्म पानी वाला पूल था और वहीं एक खुला स्वीमिंग पूल भी उपलब्ध था! जब अपरा घुटनों तक गहरे पूल के पानी में कुछ अभ्यस्त हो गई तो हम उसे अपने साथ भँवर में फिसलने के लिए भी ले गए और उसे वहाँ खूब मज़ा आया। वह मेरी पीठ पर लेटकर खूब तैरी और कुल मिलाकर हमने वहाँ के रोमांच का भरपूर आनंद लिया!

इसके अलावा कई और तरीकों से हमने लुनेबर्ग के अपने निवास को ढेर सारी खुशियों और आनंद से परिपूर्ण कर दिया! आंद्रिया हमें खेल के मैदान ले गई, फिर हम खरीदारी करने बाज़ार गए थे, जो अपरा के लिए सदा एक रोमांचित कर देने वाला अनुभव होता है और फिर बहुत से दोस्त भी हमसे मिलने घर आए थे! हमने घर में ही एक से एक बढ़कर स्वादिष्ट खाने-पीने की वस्तुएँ तैयार कीं और शाम के समय साथ बैठकर शांति और सुकून में बहुत खूबसूरत समय गुज़ारा!

और लूनेबर्ग निवास के अंतिम दिन यानी बुधवार को हमने एक और विशेष काम किया: हम लूनेबर्ग के क्रिसमस मार्केट गए। और वहाँ भी अपरा ने जीवन में पहली बार कुछ देखा और जिसे देखना मेरे लिए हमेशा सुखकर अनुभव होता है। वहाँ लोग बहुत अच्छे मूड में थे, वहाँ बहुतेरी मिठाइयाँ थीं, बच्चे झूला झूल सकते थे और हवा में शानदार संगीत झंकृत हो रहा था। मास्क्ड बाल के बारे में अपरा ने किताबों में पढ़ रखा था और अपरा भी अपना मास्क लगाकर हिंडोले पर भी झूली और ट्रेन की सवारी भी की। फिर उसने दिल के आकार की अदरक की ब्रेड खाई और हमारे साथ गरमागरम चॉकलेट का आस्वाद भी लिया!

गुरुवार को हमने आंद्रिया और माइकल से बिदा ली और आउसबर्ग की ट्रेन पकड़ी, जहाँ अपरा के नाना-नानी रहते हैं! यह ट्रेन यात्रा भी बहुत यादगार रही और इसी सफर में मैंने और रमोना ने अपने जर्मन विवाह की पाँचवी सालगिरह मनाई! पाँच साल पहले ही कुछ कागजों पर दस्तखत बनाने हम अपने दोस्तों के साथ वीजबाडेन आए थे-समय कितनी तेज़ी से गुज़र जाता है!

परसों हम म्यूनिख के लिए रवाना हुए। म्यूनिख के म्यूज़ियम में बच्चों के देखने लायक बहुत सी दर्शनीय वस्तुएँ हैं लेकिन हम वहाँ का शानदार म्यूज़ियम देखने ही नहीं बल्कि रमोना के दूसरे कुछ रिश्तेदारों से मिलने भी गए थे, विशेष रूप से उसके चचेरे भाई का बेटा, जो कुछ दिन बाद ही तीन साल का होगा! हमारे लिए भी और अपरा के लिए भी फिर से एकत्र होने का सुअवसर! वह उपहार लेने और देने के मामले में बड़ी उत्साहित रहती है तो यह भी किया गया! रमोना और उसके चचेरे भाई ने एक लट्टू चलाकर देखा और अपरा उसे देख-देखकर बड़ी खुश और रोमांचित होती रही।

कल घर वापस लौटने के बाद जब हम सोकर उठे तो अपने आपको जर्मन सर्दियों के हिमाच्छादित आश्चर्यलोक में पाया! सुबह लगातार बर्फ़बारी होती रही और हमें बर्फ का स्नोमैन तैयार करने का मौका मिल गया। यह हम पिछले सप्ताह की बर्फ़बारी में नहीं कर पाए थे और रमोना, उसके पिता और अपरा ने मिलकर खेल-खेल में एक सुंदर स्नोमैन बना डाला! और उसमें गाजर की नाक भी लगाई!

दोपहर में अपरा ने आइस स्केटिंग करने की कोशिश की! उनके घर के ठीक सामने एक कृत्रिम आइस फील्ड है, जहाँ किराए पर स्केट्स मिल जाते हैं-और मुझे कहना पड़ेगा कि अगर अपरा रोज़ वहाँ अभ्यास के लिए जाए तो वह जल्द ही बढ़िया स्केटिंग करने लगेगी!

अंत में हम अपरा की जर्मन नानी, नाना और मौसी के साथ आउसबर्ग के क्रिसमस मार्केट गए। सारे शहर में मोमबत्तियाँ लगाई गई हैं, जो देखने में बड़ी भली लगती हैं। शाम छह बजे सब टाउन हाल के सामने इकट्ठा हुए, यह देखने के लिए कि किस तरह नन्हे बच्चे, किशोर और युवा, फरिश्तों की तरह वस्त्र पहनकर और अपने-अपने हार्प, बांसुरियाँ और ऑर्गन लेकर खिड़कियों पर, बालकनियों पर आकर खड़े हो जाते हैं। फिर वे अपने अपने वाद्य यंत्रों को बजाने लगे और कुछ लोग अपने स्वर्गिक स्वरों में गाने भी सुनाने लगे-लेकिन अपरा का एक ही प्रश्न था: वे उड़ क्यों नहीं रहे हैं? 🙂

अब देखते हैं कि आज हम क्या करने वाले हैं-कल हमें वापस वीज़बाडेन भी निकलना है इसलिए हम यह सुनिश्चित करेंगे कि दिन का बचा हुआ समय परिवार के साथ हँसते-खेलते गुज़ारें। हम इस समय बेहद सुंदर अवकाश यात्रा पर हैं और अपनी प्यारी नन्ही परी को जर्मनी की स्वच्छंद सैर करवा रहे हैं!

2016 में रंगों के त्यौहार, होली की मस्ती में हमारे साथ शामिल हों – 22 अक्टूबर 2015

अगर आपको हमारा न्यूज़-लेटर लगातार मिल रहा है तो आपको उसके साथ हमारा एक निमंत्रण-पत्र भी प्राप्त हुआ होगा: 2016 की होली पर हमारे द्वारा आयोजित ‘होली रिट्रीट 2016’ का निमंत्रण! जबकि पिछले वर्षों में उत्सव की विशेष छूट के साथ हम सभी लोगों को सामान्य रूप से आमंत्रित करते थे, इस बार हमने संपूर्ण ब्यौरेवार कार्यक्रम तैयार करके लोगों को भारत के, हमारे आश्रम के और निश्चय ही, होलिकोत्सव की मौज-मस्ती और उससे जुड़े समारोहों के प्रत्यक्ष अनुभव का अवसर प्रदान करने की योजना बनाई है!

जो लोग नहीं जानते, उन्हें बता दूँ कि होली भारत के दो सबसे बड़े वार्षिक त्योहारों में से एक है! वास्तव में यह रंगों का विशाल समारोह है और जबकि, सारा भारत इसे वसंत ऋतु में सिर्फ एक दिन मनाता है, यहाँ, वृंदावन में सारा शहर पूरे एक सप्ताह तक रंगों में सराबोर रहता है!

साल का यह सबसे अनोखा समय होता है जब आप ऐसा अनुभव करते हैं जैसे आपका बचपन पुनः लौट आया हो! आप एक-दूसरे को छका सकते हैं, मूर्ख बना सकते हैं, अपने कपड़ों की चिंता किए बगैर एक-दूसरे पर रंग डाल सकते हैं, उनके चेहरों पर रंग मल सकते हैं!

हमारे होली रिट्रीट कार्यक्रम के ज़रिए आप भारतीय संस्कृति का आंतरिक आनंद प्राप्त कर सकेंगे-जिसकी शुरुआत होगी आश्रम में आयोजित स्वागत समारोह से और उसके पश्चात एक गाइड के साथ वृंदावन शहर के विस्तृत भ्रमण का इंतज़ाम भी होगा, जिससे आप उस धार्मिक और ऐतिहासिक शहर को आतंरिक रूप से जान-पहचान सकें, जहाँ आप अगले एक या दो सप्ताह रहने वाले हैं। उसके बाद आप देखेंगे कि वृंदावन के मुख्य मंदिर में होली का त्यौहार कैसे मनाया जाता है, कैसे हम खुद प्राकृतिक ताज़े रंग तैयार करते हैं और उसके बाद होली के अंतिम दिन, आश्रम में आप स्वयं होली समारोह में हिस्सा ले सकेंगे। हमारे आश्रम के निजी समारोह में आप पूर्णतः सुरक्षित वातावरण में होली की मौज-मस्ती, हुड़दंग और उसकी दीवानगी में सराबोर हो सकेंगे!

होली का त्यौहार संपन्न हो जाने के बाद आपकी छुट्टियाँ कुछ शांतिपूर्वक बीतेंगी किंतु खातिर जमा रखें, ज़रा भी कम रोमांचक नहीं होंगी! अब आप हमारे स्कूल का दौरा करेंगे और स्कूल के बच्चों से मिलेंगे, यशेंदु के साथ प्रश्नोत्तर चर्चा में भाग लेंगे, जहाँ आप अपने मनचाहे सवाल पूछ पाएँगे और निश्चय ही, ताजमहल देखने हेतु आगरा भी जाएँगे! भारतीय मसालों के प्रदर्शन होंगे, जिसमें आप जान सकेंगे कि कौन से मसाले आश्रम के भोजन में ऐसा लाजवाब स्वाद भर देते हैं और आयुर्वेदिक पाक-कार्यशाला में आप इन व्यंजनों को खुद अपने घर में बनाना सीख सकेंगे। समारोह-कार्यक्रम का अंतिम पड़ाव, होगा शाम को यमुना नदी के किनारे आयोजित होने वाले अग्नि अनुष्ठान के साथ और उसके पहले थोड़ी-बहुत खरीदारी होगी और शहर का एक और चक्कर लगाया जाएगा। उसके बाद एक बिदाई पार्टी होगी और फिर आप अपने दिल में यहाँ की सुखद यादों को लेकर अपने-अपने गंतव्य-स्थानों की ओर प्रस्थान करेंगे।

इस बीच हर दिन योग-सत्र आयोजित किए जाएँगे और आपको आश्रम में आराम करने का, आयुर्वेदिक मालिश और इलाज करवाने का, बच्चों के साथ मिलने-जुलने और खेलने का, वृंदावन के बाज़ारों की रंगीनियों में खरीदारी करने का और आसपास के वातावरण का जायज़ा लेने का भरपूर वक़्त भी मिलेगा!

इस होली रिट्रीट में हम चाहते हैं कि होली समारोह की मौज मस्ती के साथ आपको भारत की आश्चर्यजनक संस्कृति में यह एहसास भी हो कि आपका ध्यान रखा जा रहा है-और हम अभी से आपके साथ रंगों में तरबतर होने का इंतज़ार कर रहे हैं!

यहाँ आप होली रिट्रीट-2016 के सभी विवरण प्राप्त कर सकते हैं!

और यहाँ आप पिछले होली समारोह के चित्र देख सकते हैं।

दोस्तों के साथ मौजमस्ती से भरपूर समय बिताना – 18 अक्टूबर 2015

गज़ब! कितना मज़ेदार, सुखद समय! जी हाँ, वाकई शानदार-हम सब बहुत व्यस्त हैं, लोग आ रहे हैं, जा रहे हैं, रोज़ एक नया समारोह चल रहा है और इस वक़्त हमारे यहाँ, आश्रम में हमारे बहुत करीबी और बेहद शानदार मित्र आए हुए हैं और हम उनके साथ अपना सर्वश्रेष्ठ समय गुज़ार रहे हैं!

शुक्रवार को थॉमस और आइरिस हमारे साझा मित्र, पीटर और हाइके, उनके बेटे और अपने दो और मित्रों के साथ आए। एक दिन आराम करने के बाद कल हमारे यहाँ शानदार बर्थडे पार्टी हुई! हमने कोई बहुत बड़ा आयोजन नहीं किया था कि बहुत सारी तैयारियों की ज़रूरत हो, लेकिन फिर भी वह वाकई बहुत ख़ास पार्टी रही: शाम को सुस्वादु भोजन की व्यवस्था की गई थी और उसके बाद थोड़ा नाच-गाना हुआ! फिर सबके लिए चॉकलेट केक और फिर से थोड़ा सा नृत्य वगैरह! अपरा, प्रांशु और गुड्डू, हमारे सबसे छोटे बच्चों ने अपने-अपने नृत्य प्रस्तुत किए-दिखाया कि उन्होंने इस बीच क्या-क्या नया सीखा है-और उसके बाद फ़्रांस से आई हमारी मित्र, मेलनी ने अपना फायर डांस प्रदर्शित किया। अंत में जर्मन मित्रों द्वारा लाए गए विभिन्न वाद्ययंत्रों पर निबद्ध संगीत कार्यक्रम के साथ शाम के कार्यक्रम का समापन हुआ।

वह बहुत खूबसूरत शाम थी और हम सबने उसका भरपूर आनंद लिया-परिवार के सदस्यों ने, दोस्तों और हमारे अतिथियों ने! हमारी तीन महिलाओं के लिए राजस्थान यात्रा पर निकलने से पूर्व आश्रम में वह अंतिम शाम थी। हमने उनकी राजस्थान यात्रा का इंतज़ाम किया था और आज तड़के वे तीनों जयपुर के लिए रवाना हो गईं, जहाँ से वे जैसलमेर जाएँगी और फिर अंत में दिल्ली लौटेंगी, जहाँ से उनमें से एक घर चली जाएगी और दो यहाँ, वृंदावन वापस आएँगी।

इस तरह आज हमारे यहाँ मेहमानों और मित्रों की संख्या कुछ कम है लेकिन हम सब साथ बैठकर इस दौरान एक-दूसरे के जीवनों में घटित घटनाओं का जायज़ा ले रहे हैं, पुराने समय को याद कर रहे हैं और निकट भविष्य में कुछ रोमांचक कार्यक्रमों की योजना तैयार करते हुए समय का पूरा आनंद उठा रहे हैं।

थॉमस यहाँ आए हुए हैं इसलिए अपरा ख़ुशी से फूली नहीं समा रही है और वह सारा दिन उनके साथ खेलती-कूदती रहती है। कभी वह हमें बताती है कि उन दोनों ने मिलकर दिन भर क्या-क्या किया तो कभी बताती है कि आगे क्या-क्या करने वाले हैं। जब घर लोगों से भरा-पूरा होता है तब वह बहुत खुश रहती है और विशेष रूप से तब, जब अनजान लोगों के साथ बहुत से वे दोस्त भी होते हैं, जिनके साथ वह लगभग हर हफ्ते स्काइप पर रूबरू बात करती है!

इन सब बातों के अलावा हमारे सभी जर्मन मित्र अपरा और आश्रम के दूसरे बच्चों के लिए बहुत सारे उपहार भी लेकर आए हैं। हर बच्चा नए-नए खिलौनों को आजमाकर देखने और उनसे खेलने में व्यस्त हैं और साथ ही एक से एक बढ़कर स्वादिष्ट जर्मन मिठाइयों का आस्वाद भी ले रहे हैं! वास्तव में हम सब बहुत सुखद और शानदार समय बिता रहे हैं!

वाकई जीवन बहुत सुंदर है!

जब अपरा ने शेर को नहलाया – 28 सितंबर 2015

कुछ दिन पहले दोपहर के समय अपरा ने धड़धड़ाते हुए हमारे ऑफिस में प्रवेश किया। रमोना कंप्यूटर पर काम कर रही थी और अपरा की आहट सुनकर उसने पलटकर देखा। अपरा ने अपने कपड़ों से हाथ बचाते हुए हाथ आगे कर दिए और कहा, 'माँ, मुझे हाथ धोना है!'

रमोना ने उसके हाथों की ओर देखा- वे तो साफ़ थे। फिर भी वह उसके साथ बाथरूम की ओर जाने लगी और रास्ते में पूछा, 'तुमने अपने हाथ कहाँ गंदे कर लिए?’

‘मैं अपने शेर को धो रही थी,’ उसने जवाब दिया। उसका इशारा उसके कमरे में भूसा भरकर रखे बड़े से स्टफ़्ड शेर की तरफ था।

‘काहे से?’ रमोना ने पूछा, जैसे वास्तव में जानना चाहती हो। ‘पानी से?’

‘अरे नहीं। ऐसे ही,’ दरवाजे से बाथरूम में प्रवेश करते हुए अपरा ने कहा।

‘लेकिन काहे से? कपड़े से, ब्रश से या किसी और चीज़ से? काहे से?’ रमोना ने ज़ोर देकर कहा कि बच्ची कुछ विस्तार से बताए।

‘हाँ, कपड़े से,’ पुनः संक्षिप्त सा जवाब आया और अब अपरा एक कुर्सी खींचकर बेसिन के सामने कुर्सी पर चढ़कर खड़ी हो गई थी।

‘गीले कपड़े से?’ रमोना ने आगे पूछा। हालांकि उसके जवाब का अनुमान वह लगा चुकी थी, जवाब उसके अनुमान से अधिक विस्तृत था:

‘हाँ, गीले कपड़े से और साबुन लगाकर! अब उसे छूना मत नहीं तो तुम्हारे हाथ भी गंदे हो जाएँगे!’ बेटी ने आगाह करते हुए कहा।

इस बिन्दु पर मैं भी वहाँ पहुँच गया था और रमोना ने, जो अपने काम के बीचोंबीच उठकर आई थी, मुझसे कहा, ‘क्या तुम इस शेर वाली समस्या को देख सकते हो?’ 🙂

खैर, एक समर्पित पति और पिता को क्या-क्या नहीं करना पड़ता? स्वाभाविक ही, शेर की सफाई करना उसके काम का ही हिस्सा है!

तब अपरा, प्रांशु और गुड्डू की संयुक्त कमान लेकर हम उस विशाल शेर को बाथरूम तक लेकर आए और साबुन में सनी उसकी पूँछ को तब तक धोते रहे जब तक कि पूँछ से साबुन का फोम निकलना बंद नहीं हो गया। उसके बाद अपरा ने एक टॉवल लेकर उसकी पूँछ को सुखाया और लड़कों ने कमरे को सुखाया। अब वह किसी स्वीमिंग पूल के शावर रूम जैसा नहीं लग रहा था!

अपने लिए निर्धारित लक्ष्य प्राप्त कर लेने के बाद अपरा बहुत संतुष्ट है: शेर अब बहुत साफ-सुथरा नज़र आ रहा है और अपरा भी इतना मज़ेदार और रोमांचक समय बिताकर बहुत खुश है!

भारत में महिलाओं के साथ हाथ मिलाने के मौके पर अजीब परिस्थिति – हाथ मिलाएँ या नहीं मिलाएँ? 22 मार्च 2015

कल रमोना और मैं दिल्ली में आयोजित एक मीटिंग में शामिल हुए। मीटिंग किस तरह की थी या किस सिलसिले में थी, यह मैं बाद में किसी समय बताऊँगा, अभी मैं आपको एक ऐसे विषय पर लिखना चाहता हूँ, जिस पर मैं और रमोना बहुत हँसे थे: भारत में हाथ मिलाने को लेकर पैदा होने वाली अटपटी स्थितियाँ।

यह नहीं कि भारतीय हाथ मिलाते ही नहीं। मिलाते हैं और मीटिंगों, सभा-सम्मेलनों और विभिन्न आयोजनों में दूसरे देशों की ही तरह जमकर हाथ मिलाए जाते हैं। वे भी 'हैलो' कहकर एक-दूसरे का अभिवादन करने का यह अंतर्राष्ट्रीय तरीका खुलकर इस्तेमाल करते हैं। थ्री-पीस सूट में पुरुष अपना हाथ आगे बढ़ाते हैं, दूसरे का लंबी बाँह वाली शर्ट या पुलोवर से ढँका हाथ अपने हाथ में लेते हैं और ज़ोर-शोर से झटकते हुए हाथ मिलाते हैं। कोई नया व्यक्ति प्रवेश करता है और सबसे पहले एक के बाद दूसरे व्यक्ति की ओर बढ़ता है, सबसे हाथ मिलाता है और पूरी कोशिश करता है कि कोई व्यक्ति छूट न जाए। अब मान लीजिए, किसी पुरुष के साथ, बगल में एक महिला भी खड़ी है….

हा, हा…उसे छोड़ दिया जाता है!

जी हाँ, बेचारी महिलाएँ अक्सर उस सुदृढ़-या कोमल-पंजों के स्पर्श से महरूम रह जाती हैं। या, आप कह सकते हैं कि उनके साथ अधिक नम्रता के साथ पेश आया जाता है: प्रणाम में जुड़े हाथों के साथ उन्हें 'नमस्ते' कहा जाता है, कभी हल्के से सिर हिलाकर तो कभी बाकायदा सिर झुकाकर!

मैंने बहुत स्पष्टता के साथ नोटिस नहीं किया है लेकिन स्वाभाविक ही रमोना ने किया है, यह समझने की कोशिश करते हुए कि भारत में लोगों का अभिवादन करते समय ठीक-ठीक क्या किया जाना चाहिए! मुझे लगता है, इससे ज़्यादा तकलीफदेह कुछ नहीं हो सकता कि आप किसी से हाथ मिलाने के लिए हाथ बढ़ाएँ और वह आपको पूरी तरह अनदेखा करके किसी और से हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ जाए। और शायद उससे भी अधिक बुरा तब लगता है, जब सबसे हाथ मिलाने के बाद वह आपके पास आता है और हाथ बढ़ाता है लेकिन तब तक आपने उनकी झिझक देखते हुए निर्णय ले लिया होता है कि हाथ जोड़कर नमस्ते करना ही बेहतर होगा!

कई प्रयासों के बाद और उपरोक्त प्रक्रियाओं से गुज़रने के बाद भी हाथ मिलाने में असफल रहने पर उसने आशा छोड़ दी। आजकल वह सिर्फ मुस्कुराकर या हल्के से सिर हिलाकर अभिवादन करती है! 🙂

रमोना को बड़ा विचित्र लगा और वह इस व्यवहार के मूल कारणों तक पहुँचने का प्रयास करने लगी। हाथ मिलाने की प्रथा अंग्रेजों के आधिपत्य के साथ भारत आई लेकिन भारतीय संस्कृति में महिलाओं को छूने के प्रति झिझक, बल्कि उसकी वर्जना के चलते उसके प्रति आज भी संदेह बना हुआ है! हम यह सोचकर बहुत हँसे कि आज भी हाथ मिलाकर अभिवादन करना अशोभनीय और अभद्र माना जा रहा है। खासकर अभी, जब कि नवरात्रि का समय है और लोग उपवास रखते हैं! क्या पत्नी के अतिरिक्त किसी दूसरी महिला के स्पर्श को वे एक अनुचित यौन व्यवहार या घोर पाप समझते हैं, जिसके कारण उनका व्रत भंग हो जाएगा?

हमारे मूढ़ विचारों को क्षमा करें लेकिन हम बहुत हँसे और उसे बहुत गंभीरता से लिए बगैर और बिना किसी दुर्भावना के उसका मज़ा लेते रहे। मैं इसे सबके साथ साझा करना चाहता था-एक तरह की अजीबोगरीब लेकिन साथ ही मज़ाकिया स्थिति। साझा इसलिए करना चाहता था कि भविष्य में जब कभी आपके सामने ऐसी स्थिति पैदा हो तो आप निर्णय कर सकें कि आपको ठीक-ठीक क्या करना चाहिए: किसी विपरीत लिंगी को सामने पाकर हल्के से सिर डुलाकर गंभीर, संकोची और औपचारिक बने रहा जाए या कुछ लोगों को अचंभित करते हुए कसकर आलिंगनबद्ध कर लिया जाए – या गाल पर एक चुंबन? 🙂

अगर आप बहुत व्यस्त होने के कारण मौज-मस्ती नहीं कर पाते तो आपके साथ कहीं न कहीं कोई गड़बड़ ज़रूर है – 2 मार्च 2015

वृन्दावन में होली-समारोह की शुरुआत हो चुकी है! अगर आप होली के बारे में अभी भी नहीं जानते तो यह समझिए कि यह रंगों का मस्ती भरा त्योहार है, जो एक दिन के लिए तो भारत भर में मनाया ही जाता है लेकिन हमारे इलाके, ब्रज में यह पूरे एक सप्ताह चलता है! पुरातन काल में फसल कटाई के बाद धन्यवाद देने के लिए मनाए जाने वाले समारोह के साथ इसकी शुरुआत हुई थी और आज इसे हर तरह के हँसी-मज़ाक और अराजक मौज-मस्ती के साथ मनाया जाता है। एक दूसरे पर रंगीन पानी की बौछार की जाती है और सूखे रंगों का प्रयोग भी किया जाता है। थोड़ा हुड़दंग और बहुत सारी मौज-मस्ती होती है!

बहुत से लोग समझते हैं कि होली सिर्फ बच्चों का त्योहार होता है। स्वाभाविक ही बच्चे सारा साल इस त्योहार का इंतज़ार करते हैं लेकिन इस त्योहार में वयस्कों के लिए भी बहुत से मौज-मस्ती के अवसर उपलब्ध होते हैं! और अगर आप इसमें कोई मज़ा नहीं पाते तो मैं यही कहूँगा कि आप कुछ गलत कर रहे हैं, कुछ खो रहे हैं! मैं कहना चाहता हूँ कि यह बात सिर्फ होली के लिए ही सही नहीं है बल्कि हर तरह के समारोह के लिए, जिसे नीचे दिए गए कारणों से आप छोड़ देते हैं, सही है।

संभव है, आप इतना व्यस्त रहते हैं कि त्योहार मनाने का या समारोहों में सक्रिय भागीदारी का आपके पास समय नहीं होता। मैं जानता हूँ कि आपके पास बहुत काम है। कई परियोजनाएँ हैं, जिनकी ज़िम्मेदारी आप पर है, लोगों को फोन करना है, उनसे मिलना-जुलना है और बहुत सी कागजी कार्यवाहियाँ पूरी की जानी हैं। आपके जीवन का यह सबसे व्यस्त समय है और आप अपने ग्राहकों या अपने कंप्यूटर को छोड़कर कहीं नहीं जा सकते कि त्योहारों का या समारोहों का आनंद ले सकें।

हो सकता है कि आप किसी कारण से उदास हैं और सोचते हैं कि त्योहार मनाने का आपका मूड नहीं हैं। आप कमरे में बैठे हुए पाते हैं कि आप बहुत अवसाद ग्रस्त हैं और इतना दुखी हैं कि खुश होने का आपका मन ही नहीं है। या शायद आप अपने दुख में ही खुश हैं!

ये बेहूदी या निरर्थक बातें हैं! अगर आप हर वक़्त व्यस्त रहते हैं, इतने तनाव में हैं कि जीवन का आनंद ही नहीं ले सकते तो फिर आखिर जीवन किसलिए है? और क्या आप नहीं समझते कि मनमौजी लोगों के साथ घुलमिलकर, मौज-मस्ती करके, खुशमिजाज़ मित्रों के साथ मिलकर थोड़ा हँसी-मज़ाक करके आपका मूड ठीक ही होगा?

अगर आप अभी बाहर नहीं निकलते, अपने बच्चों, अपने साथी या अपने मित्रों के साथ या अपने आप में, खुद ही त्योहार का मज़ा नहीं लेते तो भविष्य में आप अवश्य पछताएंगे। अगर आज आप बाहर निकलकर लोगों के साथ त्योहारों का रस लेते हैं तो आप न सिर्फ आज खुश होंगे बल्कि आने वाले वर्षों में भी आपका बहुत सारा समय इन पलों को याद करके भी इस खुशी में सराबोर रहेगा। इस मौज-मस्ती की यादें आपको सदा गुदगुदाती रहेंगी!

कभी-कभी थोड़ा सा अंदरूनी परिवर्तन, एक सक्रिय कदम, समारोहों और त्योहारों में शामिल होने का निर्णय-खुश होने का, उल्लसित होने का निर्णय आवश्यक होता है!

जब एक परिचयात्मक शब्द सब कुछ बदलकर रख देता है! 4 फरवरी 2015

हमारे स्कूल में हाल ही में शिक्षक के एक रिक्त पद पर नई नियुक्ति का अवसर आया। जब भी कोई स्थान रिक्त होता है तो पहले से प्राप्त आवेदनों पर हम पहले विचार करते हैं और अपने मित्रों से भी कहते हैं कि अगर उनका कोई पढ़ाने वाला मित्र यह नौकरी चाहता हो, तो बताएँ। इस बार हमारे पास एक ऐसी अनुशंसा आई, जिस पर पहले हमें आश्चर्य हुआ और फिर ज़ोर की हँसी!

रमोना को एक मित्र ने बताया कि उसकी कोई सहेली है, जो पहले शिक्षक रह चुकी है और हमारे यहाँ नौकरी करना चाहेगी। उसके शब्दों में, जो उसने कहा: "वह disabled (विकलांग) है इसलिए वह हर हाल में यह नौकरी चाहती है!"

रमोना ने उसकी सहेली को साक्षात्कार के लिए बुलवाया और इस विषय में हमें भी बताया। हमने आपस में बात की और सोचा इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, बल्कि हमारे बच्चों के लिए यह अच्छा ही होगा कि वे किसी विकलांग को-जो भी उसकी विकलांगता हो, जैसे मान लीजिए किसी लंगड़ी महिला को-पढ़ाता हुआ देखेंगे! यह उन्हें बताएगा कि हम कैसे भी नज़र आएँ, समाज के लिए हम सब समान रूप से उपयोगी हैं! वे यह भी सीखेंगे कि जो भी कठिनाई हो, अगर उसे हम सकारात्मक रूप से ग्रहण करें तो सबका कोई न कोई हल निकलता है और हममें इतनी शक्ति फिर भी बची होती है कि जीवन में कठिनाइयों का मुक़ाबला करते हुए सफलता पूर्वक आगे बढ़ सकें!

यही सब सोचते हुए हम उस महिला का इंतज़ार कर रहे थे कि वह आए, अपना लिखित परिचय दे और हम उसका साक्षात्कार ले सकें। फिर एक महिला आई और उसने हमारी उसी मित्र की मित्र होने की बात कहते हुए अपना परिचय दिया। हम समझ गए कि यही वह महिला है, जिसके विषय में हम लोग बात कर रहे थे। लेकिन यह क्या? यह तो किसी तरह भी विकलांग नहीं दिखाई दे रही है!

तो रमोना ने उसका साक्षात्कार लेना शुरू किया। उसने उसका लिखित परिचय पढ़ा, शिक्षक के रूप में उसके अनुभव की जानकारी ली, उसके जीवन के लक्ष्य के बारे में पूछा। पूरी बातचीत के दौरान रमोना अपनी बारीक नज़र से यह भाँपने की कोशिश कर रही थी कि वह किस विकलांगता से ग्रस्त है, जिसका बयान उसकी सहेली ने इतनी आजिज़ी के साथ किया था। उसकी दोनों बाहें अक्षुण्ण थीं, दोनों पैर भी सही-सलामत थे। हाथों में पाँच उँगलियाँ थीं, कुछ भी ऐसा नहीं था, जो ठीक तरह से काम न कर रहा हो। दो आँखें, नाक, मुँह, सब कुछ सामान्य, हम-आप सबके जैसा!

एक और विचार कौंधा: हो सकता है रमोना की मित्र का अर्थ उसकी ‘मानसिक विकलांगता’ से हो! लेकिन नहीं, यह भी संभव नहीं था-फिर वह इस विकलांगता के बावजूद कैसे इतना पढ़-लिख पाई और इतने दिन बच्चों को पढ़ाती रही? और, कुछ भी हो-बातचीत में कुछ भी ऐसा दिखाई नहीं दे रहा था कि उसे सोचने-समझने में या बात करने में या अपने आपको अभिव्यक्त करने में कोई परेशानी हो!

तो बाद में जब हम अपनी उस मित्र से मिले, रमोना ने पूछा: उसका साक्षात्कार अच्छा रहा-लेकिन तुमने यह क्यों कहा कि वह विकलांग है?

जवाब बिल्कुल स्पष्ट था: "वह वाकई विकलांग है! उसका परिवार बहुत गरीब है, वे अपने भोजन और कपड़ों तक का इंतज़ाम नहीं कर पा रहे हैं!"

हम आश्चर्य से उसकी तरफ देखते रह गए-और फिर ठहाका मारकर हँसने लगे! हमारी मित्र नम्र दिखाई देना चाहती थी और अंग्रेजी में ‘poor’ (गरीब) होने की जगह ‘disabled’ (विकलांग) कहना उसे बेहतर नज़र आया! अरे भई, ऐसी भी क्या बात है? हम भी गरीबों की सहायता करके खुश होते हैं!

दर्द, नुकसान और राहत – 25 जनवरी 2015

मेरे शरीर का एक हिस्सा उखाड़कर निकाला जा रहा है। यह बड़ा हिंसक और रक्तरंजित है।

मुझे कुछ भी महसूस नहीं हो रहा है।

प्रतिरोध असंभव है- मेरी ज़बान सुन्न है जैसे लकवा मार गया हो, अस्पष्ट फुसफुसाहटों के अतिरिक्त कुछ भी पैदा करने में असमर्थ।

मैं यह होने दे रही हूँ। मैंने नियति के सम्मुख समर्पण कर दिया है।

मशीनों की खरौंचों, अपने मांस पर चलती आरियों के बीच मैं स्थिरचित्त बैठी हुई हूँ। एक बार आँख झपकाई है, एक बार आह भरी है, बस।

ऊपर तेज़ प्रकाश है। चमकदार, इतना चमकदार कि कमरे का बाकी हिस्सा धुंधले साए में समा गया है। यह रुचिकर नहीं है। लेकिन यह अंत नहीं है।

अचानक मैं कमर सीधी करके नीचे, उधर देखती हूँ जहाँ वह दिखाई दे रहा है जो कुछ समय पहले तक मेरे शरीर का हिस्सा था।

दो टुकड़े, हड्डियों जैसे, चार छोटे-छोटे पैर, मुड़े-तुड़े, टूटे-फूटे।

मैं उनकी अनुपस्थिति महसूस कर रही हूँ, जैसे अपने मांस में कोई सूराख। उनके निशान वहाँ मौजूद हैं।

अलविदा, अक्कल-दाढ़, मेरी अक्कल-दाढ़, अलविदा!

🙂

इस गद्यांश की लेखक: मेरी पत्नी रमोना। परसों दो खराब निचली अक्कल-दाढ़ों को शल्यक्रिया द्वारा निकलवाने के तुरंत बाद लिखा गया। वैसे चिंता न करें, वह स्वस्थ हैं और निश्चय ही नुकसान के एहसास से उबर चुकी हैं।

कुत्ते चॉकलेट के साथ ही योनि पसंद करते हैं! 11 अगस्त 2014

जर्मनी में मेरा एक दोस्त है, जिसने मुझे एक जबरदस्त कहानी सुनाई, जिसे सुनकर मैं हँसते-हँसते लोट-पोट हो गया। सालों बीत गए, जब भी वह कहानी हम लोग आपस में और दूसरों के साथ साझा करते हैं तो हँसी रोकना असंभव होता है-कभी उस कहानी की याद आती है तो पागलों की तरह अकेले भी हँस लेते हैं। कहानी की सबसे अच्छी बात यह है कि वह पूरी तरह सत्य और यथार्थ घटना है!

उस दिन मेरे दोस्त के एक दोस्त का जन्मदिन था। वह खुद शहर में उपस्थित नहीं था लेकिन उनके साझा दोस्तों ने 'बर्थडे गर्ल' से पूछा कि उसके जन्मदिन पर क्या आयोजन किया जाए। वह किसी को घर नहीं बुलाना चाहती थी और न कहीं पार्टी में बाहर जाना चाहती थी इसलिए उसने कहा कि वह घर में रहकर एक सामान्य, सुकून से भरी शाम बिताना चाहती है। लेकिन उसके दोस्त उत्सव मनाना चाहते थे! लिहाजा उन्होंने गुप्त रूप से एक पार्टी रखी, जिससे उसे चौंकाकर खुश कर सकें। दोस्तों में से एक के पास उसके फ़्लैट की चाभी थी-योजना की सफलता के लिए यह अनुकूल ही था!

वह एक सामान्य कामकाजी दिन था और सभी दोस्त जानते थे कि वह अपने काम से कब घर लौटती है। इसलिए उसके वे आठ दोस्त-पुरुष और महिलाएँ-कुछ मिठाइयाँ आदि और पीने-पिलाने की कुछ चीज़े लेकर उसके घर में घुसकर बैठ गए। उसके छोटे से कुत्ते के लिए भी, जो लगभग हर जगह उसके साथ हुआ करता था, कुछ खाने की चीज़ें लाना वे नहीं भूले!

वह एक बेडरूम वाले फ्लैट में रहती थी, जिसमें एक बैठक और रसोईघर भी था। सभी आठ लोग छिपने की जगह ढूँढ़कर छिपकर बैठ गए और पार्टी के लिए साथ लाई खाने-पीने की चीजों को भी छिपाकर रख दिया! वे पर्दों के पीछे, आलमारी के भीतर, खाने की मेज़ के नीचे और सजावटी पेड़ों में छिपे बैठे थे। वह घर आती तो उसे उनकी उपस्थिति का आभास होना संभव नहीं था!

और यही हुआ! जब दरवाज़ा खोलने की आवाज़ आई, सब लोग बेआवाज़ और स्थिर हो गए। उस कुत्ते की हाँफने की आवाज़ को छोड़कर, सारे घर में निस्तब्धता छाई थी। कुत्ता दौड़कर आया और उसके क़दमों में लिपट गया जबकि वह अपना पर्स एक तरफ रखकर जैकेट के बटन खोल रही थी। दोस्त इस बात के इंतज़ार में थे कि वह एक जगह आकर सुकून के साथ बैठ जाए तो वे बाहर निकलें। लेकिन उसने जो किया उससे सारे दोस्त हतप्रभ रह गए: जैकेट उतारने के बाद भी वह नहीं रुकी! जैकेट के बाद उसने बेल्ट खोला और एक-एक कर उसके कपड़े फर्श पर गिरते चले गए, यहाँ तक कि उसके बदन पर एक भी कपड़ा न रहा।

जैसे बिजली का झटका लगा हो, उसके मित्र जड़ होकर यह नज़ारा देख रहे थे: वह उठी और रसोई में आकर न्यूटेला का डिब्बा उठा लाई, जिसमें यहाँ का लोकप्रिय चोकलेट का गाढ़ा मिश्रित-खाद्य (chocolate-hazelnut spread) था। आराम से सोफे पर बैठकर उसने उँगलियों से काफी सारा चोकलेट निकाला। मगर यह क्या? उसे उसने अपने मुँह में नहीं डाला बल्कि पैरों को चौड़ा करके अपनी योनि पर चुपड़ दिया! और कुत्ता, जो अब तक उसके पैरों के आसपास लगातार कुलबुला रहा था, अब अपने दोनों पैर सोफे पर रखकर योनि में लगा चोकलेट चाटने लगा!

गज़ब! अपनी छिपने की जगहों पर बर्फ की शिला बने वे दोस्त कुत्ते की ज़बान से उसे सेक्स का आनंद लेता देखकर पता नहीं क्या महसूस कर रहे होंगे! और इसकी कल्पना करना भी आसान नहीं है कि पता नहीं कब वे बिचारे अटपटे ढंग से, गिरते-पड़ते, आँख बचाते, अपने गुप्त स्थानों से बाहर निकले होंगे, पर्दों के पीछे से, टेबल के नीचे से घिसटते हुए!

हाँ, इस घटना के बाद बर्थडे गर्ल ने न सिर्फ वह फ्लैट और वह शहर छोड़ दिया बल्कि वह देश और वह महाद्वीप भी छोड़कर चली गई। मैंने सुना कि वह आस्ट्रेलिया में जाकर बस गई है-मगर मैं नहीं जानता कि वह अपने कुत्ते को साथ ले गई या नहीं! 🙂

नोट: इस पोस्ट का उद्देश्य किसी का मजाक उड़ाना नहीं केवल परिस्थितिजन्य हास्य का मजा लेना है. मैं उस प्रकार की सेक्स फैंटेसी को गलत नहीं समझता जिसमें कि किसी के ऊपर कोई अत्याचार न हो!

जर्मन ट्रेनों में भारतीय तरीके से सफर – 22 जुलाई 2014

ट्रेन में बैठे-बैठे, इस बार वीसबाडन से ल्युनेबर्ग के बीच कहीं, हम अपनी पिछली जर्मन यात्रा के बारे में चर्चा करने लगे और एक बार फिर खूब हँसे। वह वास्तव में एक दिलचस्प और यादगार सफ़र था-और मुझे लगता है आपको भी उसके बारे में पढ़कर मज़ा आएगा।

एक बार जब हम सबेरे-सबेरे अपने सफ़र पर निकले तो हमने टिकिट पर ध्यान से नज़र दौड़ाई और पाया कि गंतव्य तक पहुँचने के लिए हमें कई जगह ट्रेनें बदलनी हैं और ऐसा करने के लिए हमें बहुत कम समय मिलने वाला है-पाँच ट्रेनें और हर बार बस, कुछ मिनट ही! लेकिन क्या किया जा सकता था, सोचा थोड़ी भागदौड़ होगी, चलो, इस रोमांच का भी मज़ा लिया जाए!

एक-दो घंटे में ही हमें हँसने के बहुत से कारण मिले क्योंकि बार-बार हम टिकिट को देखते फिर यात्रा-कार्यक्रम के बारे में सोचते, फिर पता चलता, स्टेशन आ गया है, उतरकर दूसरी ट्रेन पकड़ना है और फिर घड़ी की तरफ नज़र चली जाती। इस यात्रा के कुछ हिस्सों का सफर आधे घंटे से भी कम का रहा और एक बार तो सिर्फ तीन मिनट का! हर बार स्टेशन पर हम लोग भाग-दौड़ करते हुए दूसरे प्लेटफोर्म पर पहुँचते और अगली ट्रेन पकड़ते।

लेकिन एक स्टेशन पर, जो किसी गाँव का बहुत छोटा सा स्टेशन था, हमें प्लेटफॉर्म तो बदलना था मगर उस पार जाने के लिए कोई फ़्लाइओवर या सबवे नहीं था और बैरियर लाँघकर उस पार जाना था और बैरियर नीचे गिरा हुआ था! हमारे साथ चार जर्मन भी थे, जो बैरियर के सामने जाकर खड़े हो गए कि अब क्या करें, कैसे उस पार जाएँ! दरअसल यहाँ भारतीय जोश की ज़रूरत थी! पल भर की हिचकिचाहट के बाद यशेंदु और मैंने बैरियर को निखालिस भारतीय तरीके से पार करने का निर्णय किया-रेल लाइन के किनारे-किनारे थोड़ा चलकर रेल लाइन पार कर ली जाए! जैसे ही हमे अवरोध की बगल से रेल लाइन की ओर चले, सभी ने हमारा अनुसरण किया और हम अंततः ट्रेन पकड़ने में कामयाब हो गए। हम ऐसा न करते तो उस दिन हमारी ट्रेन अवश्य छूट जाती!

खैर, जब सबसे तेज़ ट्रेन की बारी आई, जिसमें हमें दो घंटे का लम्बा सफ़र तय करना था, हम लोग कुछ आश्वस्त और स्थिर हुए। तब हमने सबसे पहला काम किया कि अपना नाश्ता खोलकर बैठ गए-और जैसे ही हमने अपने डिब्बे खोले, आसपास बैठे लोगों की विस्फारित आँखें हमें ताकने लगीं, हम लोग अवश्य ही उन्हें काफी मनोरंजक लगे होंगे!

हमारे सबसे करीब वाली सीटों पर दो बुज़ुर्ग महिलाएँ बैठी थीं और आपस में बातें कर रही थीं: ‘ये लोग जहाँ के रहने वाले हैं वहाँ सिर्फ सूरज की किरणों से बचने के लिए कपड़ों की ज़रुरत पड़ती है, ठण्ड से बचने के लिए नहीं!’, ‘लगता है, बहुत भूखे हैं!’ आदि आदि। और जब भरपेट नाश्ता करने के बाद हमें थोड़ी झपकी आने लगी तब उनमें से एक ने कहा: ‘सब के सब सो गए हैं, सिर्फ वह छोटी सी बच्ची बीच-बीच में उन्हें जगा देती है; बड़ी चंचल है, उसे नींद नहीं आ रही है!’ पूरे सफ़र में दोनों महिलाएँ हमारे बारे में बातें करती रहीं और बीच-बीच में मुस्कुराती जातीं। और इधर हम उनका मज़ा ले रहे थे कि कैसे पूरे सफर में हम उनके आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।

लेकिन सबसे मज़ेदार बात हुई जब हम फ्रेंकफर्ट पहुँचे, जहाँ हमें आखिरी बार वीसबाडन जाने के लिए ट्रेन बदलनी थी। जब ट्रेन रुकने को हुई, सब लोग उठकर दरवाज़ों की ओर बढ़ने लगे। हम लोग उठने वाले आखिरी लोग थे और जैसे ही हम खड़े हुए, हममें से किसी ने वह काम किया, जिसके बारे में जर्मनी के लोग बताते हैं कि वे कभी नहीं करते: गर्जना के साथ एक ज़ोरदार पादने की आवाज़ सारी ट्रेन में गूँज उठी!

लोगों की प्रतिक्रिया बहुत मज़ेदार थी! वे दो बुज़ुर्ग महिलाएँ, जो हमारे सामने बैठी थीं और पिछले दो घंटे से हम पर नज़र रखे हुए थीं और लगातार हम पर आपस में फब्तियां कसे जा रही थीं, अचानक सकुचा गईं और उन्होंने बड़ी शालीनता के साथ नज़रें फेर लीं और उनके आसपास के दूसरे लोग भी नम्रतापूर्वक अपनी हँसी रोकने की कोशिश करने लगे। जबकि यह देखकर हमारी हँसी काबू में न रही! हम लोगों ने एक साथ ठहाका लगाया और फिर बिना रुके लगातार हँसते ही चले गए! इसके कारण आसपास और अफरा-तफरी मच गई! हम नीचे भी उतर गए मगर हमारी हँसी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी!

वह बेहद रोमांचक अनुभव था-और अभी इस वक़्त एक दूसरे रोमांचक अनुभव से हम गुज़र रहे हैं-हमारी ट्रेन दो घंटा देर से आने वाली है!