एक छोटी सी करतूत आपका जीवन बदल सकती है- होशोहवास के साथ जिएँ! 11 दिसंबर 2014

मैं अपना एक विचार आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। मूलतः विचार यह है: जीवन बहुत कीमती है-और किस तरह पल भर के हमारे काम उसमें तब्दीली ला सकते हैं या उसे पूरी तरह बरबाद कर सकते हैं। इसे हमेशा याद रखें!

जब आप अपनी आयु के मध्य में होते हैं, जब आप अपनी दिनचर्या में मसरूफ़ हो जाते हैं और सिर्फ घटनाओं, कार्यक्रमों, संयोगों और अपने कामकाज में उलझे होते हैं, कई बार आसपास हो रही घटनाओं का विस्तृत फ़लक आपकी नज़रों से ओझल हो जाता है। आप पाँच-पाँच काम एक साथ कर रहे होते हैं और जब आप उनमें उलझे होते हैं तब आप शुरू में ही एक कदम आगे रख चुके होते हैं। आप परेशान हो जाते हैं, आप उत्तेजित होते हैं और जबकि आप काम करते हुए भीतर ही भीतर अपने आप से जूझ रहे होते हैं। अपने आपसे, आसपास उपस्थित लोगों से लड़ते हैं और यह एक काल्पनिक संघर्ष होता है, जो आपको कहीं का नहीं छोड़ता। वह आपके विचारों को भीतर जकड़ लेता है, आपका मस्तिष्क सुप्त होता है और सिर्फ आपके हाथ मशीन की तरह काम कर रहे होते हैं।

आपका जीवन बीतता रहता है और आप बिना कुछ सोचे-विचारे ज़िंदगी जीते रहते हैं। आपको यह भी पता नहीं होता कि आप कर क्या रहे हैं।

आप भूल जाते हैं कि आपकी एक हरकत आपके जीवन को पूरी तरह बदलकर रख सकती है। घर में दिखाई गई लापरवाही का एक पल। एक जलती मोमबत्ती आपके धक्के से लुढ़क जाए, गॅस ठीक से बंद नहीं हुई। भीड़ भरे यातायात में गफलत। गाड़ी चलाते हुए चूक हो जाए। आगे बढ़ाया गया एक कदम गलत पड़ गया क्योंकि आपका ध्यान नहीं था कि आप किस जगह कदम रख रहे हैं।

ये भूलें आपका जीवन समाप्त कर सकती हैं। ये बातें या ये छोटी-छोटी घटनाएँ आपको सम्पूर्ण रूप से बदलकर रख सकती हैं-शारीरिक रूप से, मानसिक रूप से या भावनात्मक रूप से।

इसे याद रखें और पूरे होशोहवास के साथ ज़िंदगी गुजारें। उस पल पर ध्यान केन्द्रित करें जो अभी बीत रहा है-अपनी आध्यात्मिक यात्रा के अगले कदम के रूप में नहीं। जी नहीं, बल्कि ठीक तरह से, व्यवस्थित रूप से जीने के लिए, जिससे एक लापरवाह पल के लिए बाद में आपको कोई पछतावा न हो।

यह ब्लॉग कल की घटनाओं से प्रेरित है। इस पर मैं अगले सप्ताह विस्तार से लिखूँगा।

दुखद हादसों के बाद भी कैसे जीवन अपनी गति से चलता रहता है – 26 अक्टूबर 2014

सन 2006 की सर्दियों में जर्मनी वापस आकर मैं और यशेंदु उसी तरह काम करने लगे जैसे अपनी बहन की मृत्यु से पहले किया करते थे। एक के बाद दूसरी जगह यात्रा करते हुए, एकाध हफ्ता हर जगह रुककर अपनी कार्यशालाएँ और व्यक्तिगत-सत्र आयोजित करते हुए। जीवन में जब कोई दुखद हादसा होता है तब भी आपको अपना काम तो उसी तरह करते रहना पड़ता है लेकिन ऐसे हादसे आपका जीवन बदलकर रख देते हैं-और आप रोज़मर्रा के काम करते हुए भी इस परिवर्तन को महसूस करते हैं।

हम अपने भारतीय बाँसुरी-वादक के साथ यूरोप के कई शहरों और कस्बों में घूमे। हम बेहद दुखी थे लेकिन ऐसी मानसिक अवस्था में भी लोगों से मिलते, अपनी कार्यशालाएँ आयोजित करते, उनके साथ मुस्कुराते और आपसी अनुभव साझा करते। जब आप अपने मस्तिष्क को अपने दुःख से इतर किसी दूसरी बात में व्यस्त कर देते हैं तो दुःख के बारे में न सोचना आसान हो जाता है, उसी दुःख में हर वक़्त लिप्त न रहना आसान हो जाता है और सामान्य रूप से सोचना, बातचीत करना, प्रतिक्रिया व्यक्त करना संभव हो पाता है। लेकिन अपने व्यक्तिगत सत्रों के दौरान मुझे बहन की याद बार-बार आती रही।

मेरे पास लोग अपनी समस्याएँ लेकर आते हैं और अक्सर वे मानसिक समस्याएँ होती हैं। तो उस बार, जब एक महिला मेरे पास आई और बताया कि उसके पति का देहांत हो गया है तो मुझे अपनी बहन की याद कैसे न आती? मैंने उससे अपना दुःख भी साझा किया। कुछ देर हम यूँ ही मौन बैठे हुए अपने-अपने गुज़र चुके प्रियजन को महसूस करते रहे और फिर उसके बगैर दैनिक जीवन में होने वाले अनुभवों और एहसासात को साझा किया। अंत में मैंने उससे कहा कि हमें अपना जीवन जीते रहना होगा और हमने एक-दूसरे की आँखों में देखा और महसूस किया कि हम ऐसा ही करेंगे।

फिर एक बार एक और महिला आई और बताया कि उसके भाई के साथ उसका झगड़ा हुआ है। इतनी बुरी तरह लड़ाई हुई है कि उसने अपने भाई के साथ सारे सम्बन्ध तोड़ लिए है। भरी आँखों से उसने कहा कि वह उससे प्रेम तो करती है मगर भविष्य में कभी भी उसका मुँह नहीं देखना चाहती। लगता था, वह परस्पर विरोधी भावनाओं के बीच उलझ गई है, किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई है। यह सोचकर मैं खुश हुए बगैर नहीं रह सका कि मेरे और मेरी बहन के बीच कभी भी इस तरह झगड़ा नहीं हुआ। मैंने उसे इस सचाई का एहसास कराने की कोशिश की कि जीवन बहुत छोटा हो सकता है। जब वह उसे प्रेम करती है तो हमेशा इस बात को याद रखे और इस झगड़े को अपने सम्बन्ध का आखरी पड़ाव न बनने दे। एक छोटी सी लड़ाई पर सम्बन्ध समाप्त न करे- कल क्या होगा, आप नहीं जानते!

मैं उन मित्रों के साथ, जो उसे भी जानते थे, कई बार बैठकर रोता रहा। हम उसे याद करते रहे और मुझे चाहने वालों ने एक बार फिर मुझे ढाढ़स बंधाया।

वास्तव में जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता रहा और साथ ही परा हर वक़्त मेरे साथ बनी रही और एक दिन भी ऐसा नहीं गुज़रा जब मैंने उसे याद न किया हो या उसके बारे में न सोचा हो।

सिर्फ असंतुष्ट लोग ही जीवन के मकसद के बारे में पूछते हैं – 28 जुलाई 2014

मैंने अभी हाल ही में एक व्यक्ति के साथ व्यक्तिगत सत्र किया, जिसके मन में कुछ अजीबोगरीब प्रश्न घूम रहे थे। स्वाभाविक ही, जब मेरी किसी के साथ इस तरह की बातचीत होती है तो मुझे अपने ब्लॉग का विचार आता है और आपका भी कि निश्चय ही आप लोग होते तो इस कमरे में हमारी बातचीत में शामिल होकर उसका भरपूर आनंद ले सकते थे। क्योंकि यह संभव नहीं है मैं इस ब्लॉग के माध्यम से अपनी चर्चा आप तक पहुँचाने की कोशिश करता हूँ।

जो व्यक्ति मेरे पास व्यक्तिगत सत्र हेतु आया था, उसने बताया कि कुल मिलाकर वह अपने जीवन से पूरी तरह खुश और संतुष्ट है। वह एक अवकाशप्राप्त व्यक्ति था, जिसका एक परिवार था और उसके कुछ शौक थे, जिन्हें पूरा करके वह खुशी से भर उठता था। योग उनमें से एक था। लेकिन उसने यह भी जोड़ा कि उसकी योग कक्षाओं में अधिकतर लोग अपने आपको जिज्ञासु मानते हैं और उससे पूछते हैं कि क्या "जीवन के मूलभूत प्रश्नों" के उत्तर जानने की उसे कोई जिज्ञासा नहीं होती: जैसे, मैं इस धरती पर क्यों आया हूँ? या यह कि मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?

उसने आगे कहा कि अब उसे भी यह महसूस होने लगा है कि उसे भी इन प्रश्नों का उत्तर जानना चाहिए या कम से कम इसकी खोज करने का प्रयास तो करना ही चाहिए। इस दिशा में वह विभिन्न संभावनाओं पर विचार भी कर चुका था, जिनमें से एक यह विचार था कि उसका यह जीवन उसका एक अवतार मात्र है और इस जीवन को उसे अच्छे कर्म करते हुए बिताना चाहिए, जिससे एक दिन उसे निर्वाण यानी पूर्ण मुक्ति प्राप्त हो सके। उसने मुझसे पूछा कि मैं उसके इस विचार के बारे में क्या सोचता हूँ।

मैंने जवाब दिया कि मेरा मानना यह है कि ये सारे प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं हैं। आपका अस्तित्व यहाँ और अभी है। जब तक आप यहाँ, इस दुनिया में हैं और आपके पास सभी आवश्यक सुख सुविधाएँ मौजूद हैं तो फिर इस बारे में व्यर्थ परेशान होने की आवश्यकता ही क्या है? आप स्वस्थ हैं, आपके पास पर्याप्त भोजन उपलब्ध है, आपके बहुत से यार-दोस्त और भरा-पूरा परिवार है। इसके अलावा आप कह रहे हैं कि इस वक़्त आप वास्तव में बड़े खुश हैं! तो फिर वास्तव में ऐसे प्रश्नों का क्या मतलब रह जाता है?

ये प्रश्न उन लोगों के लिए हैं बल्कि उन्हीं लोगों द्वारा पैदा किए गए हैं, जो नाखुश हैं। जो लोग उन चीजों से संतुष्ट नहीं हैं जो जीवन में उनके पास मौजूद हैं। आप इस वक़्त यहाँ हैं! इस बात पर ध्यान केन्द्रित करने की जगह, इस बात को सुनिश्चित करने की जगह कि आपके जीवन में जो कमी है उसे पूरा करने का प्रयास करें, आप उस समय के बारे में सोचते हैं जो आपकी मृत्यु के बाद आने वाला है!

कोई नहीं जानता कि आगे क्या होने वाला है और हमारी आखिरी साँस के बाद क्या होगा। लेकिन मेरे विचार से उसका कोई महत्व भी नहीं है। वास्तव में जीवन के इस पल में यह बात पूरी तरह अप्रासंगिक है।

मुझे लगता है कि सिर्फ धर्म और वे लोग, जो दूसरों के आध्यात्मिक भ्रमों से लाभ उठाते हैं, इन प्रश्नों का समर्थन और प्रचार करते हैं, इन प्रश्नों को बड़े से बड़ा बनाकर पेश करते हैं और इस तरह उसे इतना महत्वपूर्ण बना देते हैं, जितने महत्वपूर्ण वे कतई नहीं होते।

सिर्फ यहाँ और अभी खुश रहने की कोशिश कीजिए। आपका अस्तित्व है या नहीं? अगर हैं तो फिर उन बातों को, उन चीजों को खोजना शुरू मत कीजिए, जिनका अस्तित्व ही नहीं है या उन प्रश्नों से भ्रमित न होइए, जिनका वास्तव में कोई उत्तर है ही नहीं। दूसरों को आपके जीवन में भ्रम पैदा करने मत दीजिए! जो आप हैं और जो आपके पास उपलब्ध है, उसी में खुश रहिए- आपको किसी काल्पनिक या वायवीय चीज़ को खोजने की ज़रूरत नहीं है!

गहरे अवसाद और बर्न आउट के बाद वापस सामान्य होने की लम्बी और थका देने वाली प्रक्रिया- 22 अगस्त 2013

कल मैंने इस बारे में लिखा था कि कैसे आजकल बहुत से लोग काम के दबाव और उसके तनावों के कारण शारीरिक और मानसिक क्षय से पीड़ित होकर टूट जाते हैं और अंततः गहरे अवसाद में डूब जाते हैं। आज मैं संक्षेप में ऐसी क्षरण की स्थितियों से उबरने की प्रक्रिया के बारे में लिखना चाहता हूँ।

अपने व्यक्तिगत परामर्श-सत्रों में और अपने आश्रम में मैं कई क्षयग्रस्त लोगों से मिलता रहा हूँ और मैंने कई मनोचिकित्सकों के साथ भी इस विषय पर काम किया है, इसलिए ऐसी स्थितियों में फंसे व्यक्तियों की मानसिक हालत और उनकी भावनाओं की मुझे काफी हद तक ठीक-ठीक समझ है-और इस बात की भी कि अब उन्हें क्या करना चाहिए, जिससे वे सामान्य जीवन में वापस आ सकें।

कल मैंने यह भी लिखा था कि दरअसल उन्हें ‘वापस उसी अवस्था’ में आने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनकी क्षय से पहले की, तथाकथित सामान्य जीवन-पद्धति, उनका जीने का तरीका, उनकी सोच और व्यवहार ने ही मिलकर उन्हें इस हालत में पहुंचाया था! अब तो उन्हें सब कुछ नए सिरे से और नए तरीके से शुरू करना होगा!

जो शारीरिक और मानसिक रूप से क्षयग्रस्त है उसे सबसे पहले किसी पेशेवर की मदद लेनी होगी क्योंकि वह बीमारी की अंतिम अवस्था में पहुँच चुका है। कई लोगों को चिकित्सालय में कुछ दिन रहना भी पड़ सकता है क्योंकि वे अभी यह भी नहीं समझ पाते कि कैसे जिएँ, क्यों जिएँ?-उनके जीवन का मूल उद्देश्य ही अर्थहीन हो चुका होता है! अक्सर अपने अस्तित्व को वे अपनी नौकरी, अपने पद, अपने काम से पूरी तरह जोड़ चुके होते हैं और उन्हें यह एहसास ही नहीं होता कि अपने आप पर उन्होंने असीमित दबाव डाला हुआ है। इस पतन ने उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली है। उनका शरीर अब जवाब दे गया है और कह रहा है कि इसे अब और चलते रहने नहीं दिया जा सकता, कि वे अब अपनी, खुद की जरूरतों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।

आम तौर पर डॉक्टर ऐसे क्षयग्रस्त लोगों को दवाइयाँ खिलाते हैं-अवसाद-रोधी, नींद की गोलियां और कुछ अन्य दवाइयाँ। शुरुआत में या आपातकाल में ये दवाइयाँ अच्छा असर दिखाती हैं, लेकिन कुछ समय बाद, और यह समय कुछ महीने हो सकता है, उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होना सीखना होगा और खुद शारीरिक और मानसिक स्थिरता की तलाश करनी होगी। यही वह समय है, जब वे अपनी भीतरी खोज शुरू कर सकते हैं और इसी हालत में हमारे आश्रम में कुछ दिन विश्राम लेना कई लोगों को लाभ पहुंचा चुका है।

जब आप ऐसी हालत में होते हैं तो सबसे मुख्य बात आपको यह करनी होती है कि आप अपने आपको खोजें। पैसे और सफलता की दौड़ में आपने अपने आपको पूरी तरह खो दिया है, आपको खुद अपना कोई एहसास नहीं होता। आप कौन हैं? अपने जीवन में आप क्या करना चाहते हैं? क्या करके आप प्रसन्न होते हैं? ये और ऐसे ही कुछ और प्रश्न हैं, जिनका जवाब आपको देना होगा। उसके बाद ही कोई क्षयग्रस्त मरीज अपने जीवन के टुकड़ों को बटोरकर पुनः स्थिरचित्त हो सकता है। कई लोग अपनी नौकरी या कार्यक्षेत्र बदलने का निर्णय लेते हैं, क्योंकि जो वे इतने दिन करते रहे थे, अब नहीं कर सकते क्योंकि वैसा करने पर वे अपने शारीरिक दबाव और मानसिक तनाव से उबर नहीं पाएंगे।

लेकिन बाहरी चीजों और वातावरण के बदलाव से ही बात नहीं बनेगी, बहुतेरे आंतरिक प्रतिमानों और विचारों से भी आपको मुक्ति पानी होगी! और शुद्धिकरण की इस प्रक्रिया को कार्यान्वित करने के लिए अपने सामान्य और उबाऊ वातावरण से बाहर निकलकर बिल्कुल नई और अलग जगह पर कुछ दिन बताने से बढ़कर क्या बात होगी! ऐसी परिस्थितियों में हमारे आश्रम आकर आयुर्वेदिक-योग-अवकाश लेने वाले लोगों के साथ हमारा अनुभव बहुत सुखद, प्रेरणास्पद और आशाप्रद रहा है।

उन्होंने हमें बताया है कि रोजाना नियमित आयुर्वेदिक मालिश किस तरह इसमें सहायक रही क्योंकि उन्हें महसूस हुआ कि कोई है, जो पूरे एक घंटे उन पर और उनके शरीर के छोटे-छोटे अंगों पर पूरा ध्यान केन्द्रित किए हुए है। कई सालों से उनका शरीर अपने प्रति उनकी लापरवाही झेल रहा था। वह उनके ध्यान से वंचित था और ठीक यही पाने के लिए वह बेताब था! यह उपचार उन्हें, शारीरिक और मानसिक रूप से विष-मुक्त करने में बहुत सहायक रहा। दैनिक योग-सत्रों में आप शरीर के प्रति अपने प्रेम को पुनर्जीवित करते हैं। खुद से ऊंची से ऊंची अपेक्षाओं के दबाव में, एक नियुक्ति से दूसरी की तरफ भागने-दौड़ने की मजबूरी में आप अपने शरीर के प्रति यह प्रेम-भावना भूल ही चुके थे!

और फिर, और शायद सबसे महत्वपूर्ण भी, आप यहाँ ऐसा वातावरण और परिवेश प्राप्त करते हैं, जहां आप इस खोज को ज़्यादा अच्छी तरह अंजाम दे सकते हैं कि आप कौन हैं और आपके जीवन का उद्देश्य क्या है, आप क्या चाहते हैं? आप अपने आप में मगन रह सकते हैं-स्वतंत्र, बच्चों के साथ, हमारे परिवार और आश्रम के बच्चों के बीच या विश्रांति के लिए आए दूसरे मेहमानों के साथ। आप विश्राम कर सकते हैं या हमारे कामों में हमारे सहभागी हो सकते हैं, आप पढ़-लिख सकते हैं, ध्यान में लीन हो सकते हैं, दिल जो कहे, वह सब कुछ आप करने के लिए स्वतंत्र हैं। और यह बहुत बड़ा मौका है:आप अपने दिल की आवाज़ सुनना शुरू कर सकते हैं। यही तो आपने आज तक नहीं किया था कि अपने दिल की तनावपूर्ण, चीखती आवाज़ को आप कभी सुन लेते और जिसका खामियाजा आप आज भुगत रहे हैं!

मानसिक रूप से पूरी तरह ध्वस्त होने के बाद, धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे लोग अपनी पूर्वावस्था में लौट पाते हैं और अधिकतर लोग यही कहते हैं कि यह बाद की अवस्था उनकी पिछली अवस्था से बहुत बेहतर है! मैं कामना करता हूँ कि उन सभी लोगों को, जो ऐसी स्थिति को प्राप्त हुए हैं, यह शक्ति प्राप्त हो कि वे अपने वास्तविक स्वत्व को प्राप्त कर सकें और उनके लिए, जो अब भी पैसे और सफलता की अंधी दौड़ के चलते शारीरिक दबाव और मानसिक तनाव से ही जूझ रहे हैं, यह कि वे यह समझ सकें कि जो वे कर रहे हैं वह उन्हें बड़ी गहरी पीड़ा पहुंचा सकता है।

और जब कभी भी आप अपने परिवेश और वातावरण से दूर कहीं जाना चाहें, हमारे आश्रम के दरवाजे आपके लिए सदा खुले हैं।

सफलता और शिखर पर पहुँचने की महत्वाकांक्षा कहीं तनाव, अवसाद और पतन की राह पर न ले जाए! 21 अगस्त 2013

कल मैंने कामकाजी जीवन में लोगों के बीच होने वाली प्रतिस्पर्धा के विषय में लिखा था। ये प्रतिस्पर्धाएँ इसलिए आयोजित की जाती हैं कि लोग सफलता के पीछे दौड़ें और थोड़ा बहुत अतिरिक्त आर्थिक लाभ अर्जित कर सकें। इससे लोगों के जीवन में काम का शारीरिक दबाव और मानसिक तनाव बढ़ते जाते हैं और जैसे-जैसे वे ऊपर उठते जाते हैं, यह दबाव और तनाव भी बढ़ता जाता है और अंततः वह आपको क्षीण और जर्जर बना देता है। इसे अंग्रेज़ी में बर्न-आउट कहते हैं। हम इसे शारीरिक और मानसिक क्षय कह सकते हैं, जो आगे चलकर लंबे अवसाद में तब्दील हो जाता है और उसके बाद उससे उबरने के लंबे प्रयास और अंततः व्यक्तिगत लक्ष्य और जीवन का अर्थ खोजने की लंबी प्रक्रिया में उलझकर रह जाता है।

विशेषकर बड़ी कंपनियाँ किसी व्यक्ति की कोई परवाह नहीं करतीं। यह बात हर व्यक्ति जानता है लेकिन एक बार जब आप वहाँ पहुँच जाते हैं, आंकड़ों और पुरस्कारों के उस तंत्र (व्यवस्था) का हिस्सा बन जाते हैं तो यह बात बिल्कुल भूल जाते हैं और अपने सहयोगियों को अपना प्रतिस्पर्धी मानकर व्यवस्था द्वारा प्रायोजित उस दौड़ में शामिल हो जाते हैं। आपकी नज़रें कंपनी के लक्ष्यों पर होती हैं और दाएँ-बाएँ आपको कुछ भी दिखाई नहीं देता। लक्ष्य महज एक आंकड़ा होता है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं। आपको एक दिन में इतने लोगों से मिलना है, मिले गए इतने लोगों में से इतना प्रतिशत बिक्री में तब्दील हो जाना चाहिए, उतने लोगों से इकरारनामे पर दस्तखत करा लें और अंततः, उतना लाभ, रुपए की शक्ल में कंपनी के खाते में जमा हो जाना चाहिए! आप समझते हैं कि आपने कोई महत्वपूर्ण काम अंजाम दिया है और पूरी कंपनी और उसका नेतृत्व आपसे प्रसन्न हैं और आप पर गर्व करते हैं। जब कि वास्तविकता यह होती है कि कंपनी और उसका नेतृत्व अपनी सफलता पर खुश हैं, आंकड़ों पर खुश हैं, अपने खाते में आई हुई रकम से खुश हैं, आप पर गर्वित नहीं हैं! जब कि आप अपने अस्तित्व को कंपनी के साथ, उसके लिए निष्पादित अपने महत्वपूर्ण काम के साथ और उसके लिए प्राप्त अपनी सफलता के साथ जोड़ लेते हैं जब कि वास्तविकता यह होती है कि कंपनी को लक्ष्य तक पहुँचाने की व्यवस्था के काम में आप महज एक छोटे से पुर्जे होते हैं!

इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि जो बड़ी कंपनियों में काम नहीं करते वे इन दबावों और तनावों से बचे रहते हैं। विशेषकर स्वरोजगारी और छोटी कंपनियों के मालिकों को भी उतना ही तनाव झेलना पड़ता है क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी सफलता स्वयं उन पर निर्भर है। पैसा आता रहे, इसके लिए उन्हें अक्सर कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ती है लेकिन वे भी ज़्यादा से ज़्यादा धन कमाने, ज़्यादा से ज़्यादा सफलता अर्जित करने के चक्कर में उसके साथ मुफ्त मिलने वाले तनावों और दबावों के मकड़जाल में उलझकर रह जाते हैं। और आसपास के लोग, समाज, विज्ञापन आदि सभी सफलता के लिए जारी इस अंधी दौड़ को प्रोत्साहित करते हैं।

यह कहना कोई नई बात नहीं होगी कि यह समाज धन-केन्द्रित है। यह भी कोई नई बात नहीं है कि व्यापक जनसमुदाय व्यक्ति की कोई परवाह नहीं करता। लेकिन आप खुद क्या सोचते हैं? आप क्यों इस खेल में लगे हुए हैं? आप क्यों इस तरह की जीवन पद्धति अपनाए हुए हैं, प्रोग्राम्ड कंप्यूटर या किसी मशीन जैसी? आप अपने मनोरंजन के लिए कुछ नहीं करते, अपने कार्य में सफलता के अलावा कोई दूसरी बात आपको प्रसन्न नहीं कर पाती, आप खुद अपना स्वार्थ भूल जाते हैं, आपका सामाजिक जीवन मृतप्राय होता जा रहा है और आप स्वयं अपनी और ध्यान नहीं देते। महत्वपूर्ण सिर्फ एक बात होती है: काम और उसमें ज्यादा से ज्यादा सफलता! किसी दूसरी बात के लिए आपके पास समय ही नहीं है।

यही वह घड़ी होती है, जब लोग शारीरिक और मानसिक रूप से क्षयग्रस्त हो जाते हैं। वे टूट जाते हैं और इसका अर्थ यह होता है कि उनकी शारीरिक और मानसिक शक्तियों का पूरी तरह क्षरण हो चुका होता है। कई लोगों को स्मृतिह्रास या स्मृतिभ्रम हो जाता है-वे सारे अंक और नाम, जो उनके लिए पहले बड़े महत्वपूर्ण थे अब उनकी स्मृति से विलुप्त हो जाते हैं। कई लोगों के लिए, उसके बाद, अवसाद के कठिन समय की शुरुआत हो जाती है। प्रतिपल, क्रमशः उनका पूरा जीवन धराशायी होता चला जाता है, अक्सर आसपास के लोगों ने ऐसी अपेक्षा नहीं की होती। उन्हें पेशेवर सलाहकार की आवश्यकता होती है और जब कि वे हर सप्ताह, नियमित रूप से मनोचिकित्सक के पास जाते हैं, सामान्य हालत में वापस लौटने के लिए उन्हें स्वयं भी इस पर अथक प्रयास करना होगा।

दरअसल, ‘लौटना’ नहीं, वापस, वही जीवन नहीं! नए जीवन की शुरुआत कीजिए, अपने लिए एक अलग जीवन की तलाश कीजिए, एक संतुलित और शांत जीवन!

ध्यान रखें, जीवन की घड़ी आपको तनावग्रस्त न कर दे!- 12 अगस्त 2013

कुछ दिन पहले मेरी पत्नी, रमोना और मैं उम्र और अपनी अंदरूनी घड़ी के बारे में बात कर रहे थे। जैसा कि आजकल अक्सर होता है, हमारी बातचीत अपरा को लेकर शुरू हुई कि कैसे महज डेढ़ साल में ही वह इतनी बड़ी लगने लगी है। हमने एक दूसरे से कहा कि उसे पाकर हम दोनों कितने खुश हैं। कुछ पलों के मौन के बाद रमोना ने कहा, "इससे पूर्णता का एहसास होता है, है न?" इसके बाद हमारे बीच और भी बहुत सी बातचीत हुई, जिसके कुछ बिन्दुओं को मैं यहाँ आपके साथ साझा करना चाहता हूँ।

सबके पास, सजग रूप में या अवचेतन में, अपने भावी जीवन की एक बुनियादी रूपरेखा होती है। इस रूपरेखा का विस्तृत स्वरूप हर व्यक्ति के लिए अलग होता है लेकिन मोटे तौर पर रूपरेखा सबके लिए एक जैसी ही होती है: बारहवीं तक स्कूल जाइए, फिर कोई ट्रेनिंग लीजिए या विश्वविद्यालय जाइए और नौकरी ढूँढ़िये। इसके साथ ही या इसके बाद, अपने लिए कोई लड़की देखकर शादी कीजिए, बच्चे पैदा कीजिए, अपने परिवार के साथ सुकून के साथ जीवन बिताइए। एकाध घर या कोई फ्लॅट खरीद लीजिए।

कुछ लोग इन समय सीमाओं की रूपरेखा बड़ी बारीकी से बनाते हैं, जिसमें हर लक्ष्य के लिए वे कुछ छोटी समय सीमाओं का निर्धारण करते हैं, जिससे एक खास काम उन वर्षों के भीतर पूर्ण कर लिया जाए। यह सामान्य सी बात है, आम तौर पर सभी ऐसा करते हैं। इस समय सीमा का निर्धारण करते वक़्त महिलाओं को अपनी शारीरिक सीमाओं का ध्यान भी रखना होता है: 35 साल के बाद, बच्चे पैदा करना मुश्किल या जोखिम भरा होता जाता है, हालांकि, मैंने सुना है, आधुनिक दवाइयों और इलाज की सुविधाओं के चलते यह सीमा 42 साल या 45 तक भी बढ़ाई जा सकती है। अगर उन्होंने इस समय सीमा में यह काम नहीं निपटाया तो फिर इस समय सीमा वाली उनकी योजना फेल हो जाती है। टिक-टैक, टिक-टैक…

बहुत से लोग होते हैं, जो अपनी इस समय सीमा को अच्छी तरह जानते हैं और इसके चलते अपने आपको बहुत तनावग्रस्त कर लेते हैं। कुछ दूसरे ऐसे होते हैं, जो ऐसे दबावों को अपने ऊपर नहीं लेते और उसके बारे में सोचते तक नहीं। लेकिन, इस दूसरे लोगों में भी बहुत से ऐसे होते हैं, जो अवचेतन में वही तनाव महसूस करते हैं! क्योंकि महिलाएँ पुरुषों के मुक़ाबले इस बात को अधिक तीव्रता के साथ महसूस करती हैं, मैं एक महिला का उदाहरण लूँगा, लेकिन याद रखें, पुरुष भी इस समस्या से मुक्त नहीं हैं!

अगर एक महिला बच्चों के बीच दो या तीन साल के अंतर के साथ, दो या तीन बच्चे पैदा करना चाहती है तो उसे कम से कम 30 से 35 साल की उम्र के बीच पहला बच्चा पैदा कर लेना चाहिए। अगर वह अपने जीवन-साथी के साथ कुछ समय बिताना चाहती है तो उसे कम से कम 25 और 30 साल के बीच ‘सही जीवन-साथी’ तलाश लेना चाहिए। इसके अलावा, बहुत से लोग कोई काम या नौकरी करना चाहते हैं और 25 साल की उम्र तक अधिकांश लोग विश्वविद्यालय की पढ़ाई पूरी करते हैं। वे थोड़ा-बहुत काम का अनुभव भी लेना चाहते हैं और इसलिए किसी संबंध में बंधना नहीं चाहते। तो फिर वही, तनाव, क्लेश, टिक-टैक, टिक-टैक…

जब एक बार इतना काम पूर्ण हो जाता है, जब आप अपना जीवन-साथी चुन लेते हैं और जब आप दो या तीन बच्चे भी पैदा कर लेते हैं तो काम खत्म हो जाता है! आप आराम से, शांति पूर्वक ज़िंदगी बसर कर सकते हैं, आपने अपनी योजना को कार्यान्वित कर दिया, हो गया।

मैं अच्छी तरह से समझ सकता हूँ कि, क्योंकि आपने अपने जीवन में प्रेम प्राप्त कर लिया और साथ ही देखभाल करने के लिए छोटे-छोटे बच्चे पैदा कर लिए हैं, आप अपने जीवन से संतुष्ट हैं। मगर इसी कारण मैं आपकी परेशानी, क्लेश और तनाव को, जिसे आप स्वयं अपने ऊपर ओढ़ लेते हैं और जिसे समाज की भी शह मिली होती है, किसी तरह भी उचित नहीं समझता।

आप प्रेम को जबर्दस्ती पैदा नहीं कर सकते और यह बात ही बहुत से ऐसे लोगों की सबसे बड़ी समस्या बन जाती है, जो बंधे बंधाए घेरे में, योजनाबद्ध तरीके से जीवन बिताना चाहते हैं। अपने जीवन के विषय में आप कितनी भी योजना बना लें, आप दूसरों के लिए योजना नहीं बना सकते! यही बात है, जो इस मामले को इतना परेशानकुन, क्लेशमय और तनावग्रस्त बना देती है। आपको यह प्रयास छोड़ देना चाहिए। अपनी कार्य-योजना के पीछे मत पड़िए, अपने आपको उस योजना के बारे में बार-बार याद मत दिलाइए। भरोसा रखिए कि ऐसा मौका आएगा और सहजता के साथ अपना जीवन बिताइए। कोशिश कीजिये कि अपने लिए जी सकें, जैसा चाहें, जी सकें। अपने आसपास के लोगों के लिए प्रेम से लबालब, ईमानदार, अपने लिए और दूसरों के लिए खुशी का बायस (कारण!)! बाकी चीज़ें अपने समय पर, आपके पास खुद-ब-खुद खिंची चली आएंगी। ऐसे लोगों की परवाह मत करिए जो कहते हैं कि "देर हो रही है, कुछ कीजिए!" अपनी रफ्तार और मर्ज़ी से अपना जीवन व्यतीत कीजिए!

क्यों आप खुद कठपुतली बनकर अपने जीवन को किसी गुरु के हवाले करना चाहते हैं?- 22 जुलाई 2013

आज गुरु-पूर्णिमा है, जिसे आचार्य दिवस भी कहा जा सकता है। इस दिन हर शिष्य अपने गुरु का सम्मान करता है। सारा साल भले ही वह उसे भूला हुआ हो, आज के दिन वह गुरु के पास अवश्य आएगा, गुरु के पाँव पखारेगा, उसके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करेगा और उसे दक्षिणा के रूप में कुछ धन अर्पित करेगा। अगर वह बहुत दूर रह रहा है तो वह उससे फोन पर बात करेगा और उनसे आशीर्वाद लेगा। मैं खुद भी बहुत समय तक गुरु की भूमिका में रहा हूँ और इस स्थिति से वाकिफ हूँ। मैं अब बदल चुका हूँ, इतना बदल चुका हूँ कि जिस बात की मैं सालों पहले खुद अनुशंसा किया करता था उसी का आज मैं कड़ाई के साथ विरोध करता हूँ। इसके साथ ही गुरुवाद के इस चलन का भी।

मैं धर्म-ग्रन्थों में लिखी बातों पर भरोसा किया करता था और उसी का उपदेश देते हुए उसका प्रचार-प्रसार करता था। वह यह कि: "गुरु के बिना आपकी मुक्ति नहीं है। मुक्ति ही मनुष्यमात्र का लक्ष्य होना चाहिए और मुक्ति प्राप्त करने के लिए उसे जीवन भर प्रयास करते रहना चाहिए-इसलिए हर एक को चाहिए कि पहले वह एक ऐसे गुरु की तलाश करे जो उसे मुक्ति दे सकता है।"

आज मैं महसूस करता हूँ कि लोगों की यही हालत इस क्षेत्र में होने वाले भ्रष्टाचार की जड़ है। भोले भाले, मासूम लोग उनके पास आते हैं और उन्हें तीन बातें सिखाई जाती हैं:

1) आपको मुक्ति तभी मिलेगी जब आप किसी को गुरु बना लें।

2) जैसे आपके एक ही पिता हो सकते हैं उसी तरह आप जीवन में सिर्फ एक ही व्यक्ति को गुरु बना सकते हैं।

3) आपको अपना सर्वस्व गुरु को समर्पित करना होगा। वह आपकी सारी ज़िम्मेदारी वहन करेगा और बदले में आपको वही करना होगा जो उसका आदेश हो।

जिस पल आप अपने गुरु से दीक्षा ग्रहण करते हैं, आप अपने सारे कर्मकांड उसे अर्पित कर देते हैं। आप उसकी सलाह पर चलते हैं और अपनी प्रार्थनाएँ, मन ही मन, उसके साथ ही करते हैं। उसके इस दावे पर

कि वह आपको इस मृग-माया से निकालकर मुक्ति दिलाएगा, आप अपनी सहमति से और खुशी-खुशी उसकी कठपुतली बनने के लिए तैयार हो जाते हैं। स्वाभाविक ही गुरु इसे और इसके साथ आने वाली हर चीज को पसंद करते हैं। इसीलिए वे कहते हैं कि गुरु से दीक्षा लेना अनिवार्य है। अपने शिष्यों को अपने साथ बनाए रखने के लिए वे इस नियम का प्रचार करते हैं कि किसी भी शिष्य का एक ही गुरु हो सकता है।

यह पूरी व्यवस्था ही मेरे विचार में, दुरुपयोग तथा शोषण करने के इरादे से ही बनाई गई है और यही कई दशकों से, बल्कि सदियों से हो रहा है। ये गुरु अपने शिष्यों के मस्तिष्क पर पूरा अधिकार रखते हैं और वे जान-बूझकर दौलत पाने और न सिर्फ अपने शारीरिक सुख बल्कि अपनी स्वैर, अप्राकृतिक यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए भी उनका दुरुपयोग करते हैं। वहाँ होने वाले कृत्य बेहद अनैतिक और समाजविरोधी होते है।

मेरे विचार में गुरु महज एक शिक्षक होता है, जो कि उसका शाब्दिक अर्थ भी है। अगर आप कुछ सीखना चाहते हैं तो आपको गुरु की आवश्यकता पड़ती है। जब मैं स्कूल जाता था तो कक्षा के सारे बच्चे शिक्षकों को आदर के साथ ‘गुरुजी’ कहा करते थे। इस बात से कोई मतलब नहीं होता था कि वह व्यक्ति कौन है। कोई भी, जिससे आप कुछ सीखते हैं, आपका गुरु हो सकता है, भले ही वह आपसे उम्र में छोटा ही क्यों न हो। और इस तरह आपके कई गुरु हो सकते हैं, जो भी आपको शिक्षा प्रदान करता है।

किसी की कठपुतली मत बनिए। जिससे भी आप कुछ सीखते हैं उसे आप आदरपूर्वक शिक्षक का दर्जा दे सकते हैं। लेकिन किसी एक व्यक्ति पर पूरी तरह निर्भर न रहिए। अपने संबंध को सिर्फ शिक्षक और विद्यार्थी का संबंध ही बना रहने दें और उसमें किसी दैवत्व के पहलू को जगह न दें।

लोग यह तर्क कर सकते हैं कि अगर आप धर्मग्रंथों और धार्मिक दर्शन का अध्ययन करना चाहते हैं तो आपको एक आध्यात्मिक और धार्मिक गुरु की आवश्यकता हो सकती है। मैंने अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा इसी काम में खर्च किया है। आज मैं आपसे पूछना चाहता हूँ: आखिर आप क्यों इस धार्मिक दर्शन का अध्ययन करना चाहते हैं? मेरे विचार में यह बिलकुल व्यर्थ है। आप एक ईमानदार और सुखपूर्ण जीवन जीना चाहते हैं। इसके लिए वेदों, कुरान या बाइबल की आपको कहाँ आवश्यकता है? उन्हें पढ़कर आप अपने ज्ञान के क्षितिज को सीमित कर लेंगे, अपने रास्ते को संकरा कर लेंगे और संदेहग्रस्त हो जाएंगे। तो अगर आपको ऐसे दर्शन की आवश्यकता ही नहीं है तो फिर धार्मिक गुरु की आवश्यकता क्यों होगी?

अपने गुरु आप खुद बनिए। आपका प्रेम, आपकी सहज विनम्रता और नैतिकता आपकी गुरु है। यही चीज़ें आपको सही रास्ता दिखाएंगी। बस, उन्हें वैसा करने आज़ादी दे दीजिए।

प्रेम के साथ जीवन गुजारें या भोग-विलास में – 16 जुलाई 2013

मैंने पहले ही इस समस्या की ओर अपने पाठकों का ध्यान खींचा था और आज उस पर विस्तार से प्रकाश डालने का इरादा कर रहा हूँ। सभी को और विशेषकर अभिभावकों को यह निर्णय लेना ही पड़ता है कि उनके जीवन में ज़्यादा महत्वपूर्ण क्या है: प्रेम या ऐश-ओ-आराम? आप क्या चुनेंगे?

स्वाभाविक ही, रोमांटिक लोग यही कहेंगे कि प्रेम ही चुनो। प्रेम का चुनाव करना वैसे भी एक आदर्श बात होगी क्योंकि ऐश-ओ-आराम कौन चाहता है? सभी प्रेम चाहते हैं! इसलिए सारे आराम और भोग-विलास भूलकर प्रेम कीजिए!

चलिये, अब इसके व्यावहारिक पहलू पर आते हैं-और यहाँ यह प्रश्न थोड़ा कठिन हो जाता है। आप आसानी से कह देते हैं कि आप प्रेम को आराम से ज़्यादा महत्व देते हैं मगर आखिर आराम शुरू किस बिन्दु से होता है? यह स्पष्ट रूप से एक आराम या सुविधा मानी जाएगी कि कोई साल में पाँच दिन किसी शानदार जगह में छुट्टी बिताने चला जाए, वह भी चार्टर्ड प्लेन में। दूसरी तरफ अधिकांश लोगों के लिए यह तय करना ही बड़ा मुश्किल है कि दिन भर में कितना समय वे काम करें। उनके लिए साल में एक या दो दिन की भी छुट्टी मिल जाए तो बहुत है। सीधा सा प्रश्न यह है कि क्या आपको सिर्फ कुछ ज़्यादा कपड़े खरीदने के लिए या अधिक हाई-टेक उपकरण खरीदने के लिए या बेहतर तकनीकी समाग्री खरीदने के लिए या ज़्यादा आरामदेह यात्रा करने के लिए ज़्यादा काम करना चाहिए? या फिर, क्या आपको कुछ कम काम करके ज़्यादा समय अपने परिवार के साथ बिताना चाहिए?

अगर आप किसी विशेष स्तर का रहन-सहन चाहते हैं तो उसे पाने के लिए आपको एक नियत समय तक काम करना होगा। अगर यह स्तर कुछ ऊंचा है तो कुछ ज़्यादा काम करना होगा। अगर आप ज़्यादा काम करेंगे तो आप अपने बच्चों और परिवार को कम वक्त दे पाएंगे। आप अपने जीवन साथी और बच्चों के साथ प्रेम करते हुए, खेलते हुए, हँसते-गाते और जीवन का आनंद लेते हुए उसी अनुपात में कम समय गुज़ार पाएंगे।

कई संबंध सिर्फ इस कारण से टूट चुके हैं कि दो में से एक साथी समझता है कि उसका साथी काम में इतना व्यस्त रहता है कि प्रेम के लिए उसके पास न तो समय होता है न ही ताकत। इससे भी बड़े विवाद बच्चों और अभिभावकों के बीच खड़े होते हैं। परिवार का मुखिया, जिस पर परिवार के भरण पोषण की ज़िम्मेदारी भी होती है, काम के बोझ तले इतना दब जाता है कि अपने बच्चों को जान पाने का अवसर ही उसे नहीं मिल पाता। उनके बीच कोई खास संपर्क नहीं रह जाता-भले ही इसके बदले उनके पास सुविधा और ऐश-ओ-आराम की हर वस्तु उपलब्ध हो जाती है।

अगर आप अपने बच्चों के साथ ज़्यादा वक़्त गुजारना चाहते हैं तो आपको कुछ सुविधाओं और आराम की कुछ वस्तुओं के बगैर काम चलाना होगा। हमने ऐसा करने का निर्णय लिया है। अगर हम चाहते कि हम ज़्यादा रुपया कमाएं तो मुझे ज़्यादा सफर करना पड़ता, विदेश जाकर महीनों रहना पड़ता, वहाँ बहुत सी कार्यशालाएँ और सेमिनार आयोजित करने पड़ते। हम अभी जितना कमाते हैं, विदेशों में यह सब करके उससे कई गुना ज़्यादा कमा सकते थे, लेकिन हमने निर्णय किया कि अतिरिक्त रुपया कमाने की जगह हम अपनी बेटी के साथ ज़्यादा समय गुजारेंगे। हम अब भी काम करते हैं, और काफी मेहनत के साथ अपना काम करते हैं लेकिन हम स्वतंत्र हैं कि जब चाहें काम से अवकाश ले लें और अपनी बेटी अपरा के साथ खेलना शुरू कर दें। हमने एक बीच का रास्ता अपना लिया है।

इस चर्चा से यह निष्कर्ष निकलता है कि हर एक को अपने लिए ऐश-ओ-आराम की एक सीमा निर्धारित करनी पड़ती है और उसी के अनुपात में उस समय सीमा का भी निर्धारण करना पड़ता है जिसे वह अपने परिवार और बच्चों के साथ बिताना चाहता है। आप इसे किसी भी तरह से साधें, एक बात कभी न भूलें: अपने और परिवार के भोग-विलास को इतना ज़्यादा महत्व न दें कि प्रेम की अनदेखी हो जाए, उसका तिरस्कार हो जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि बच्चों की अवहेलना या उनका तिरस्कार न हो। बच्चे आपका प्यार चाहते हैं, भले ही उनके पास एकाध खिलौना कम हो, भले ही छुट्टियाँ बिताने किसी हिल स्टेशन पर न जा पाएँ या महंगे कपड़े न खरीद पाएँ। उन्हें आपकी ज़रूरत है, न कि इन अतिरिक्त वस्तुओं या सुविधाओं की।

सपनों और आशाओं को मरने मत दीजिये – मग़र निराशाओं से सबक सीखिए! 25 फरवरी 13

हम सब खुश रहना चाहते है। परंतु दुर्भाग्य से कई लोग अपने दैनिक जीवन में इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाते हैं। जब प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों, तो स्पष्टतया प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत स्थिति पर इसका उत्तर निर्भर करता है। लेकिन एक जवाब जो हम अकसर सुनते हैं और जो लगभग सभी पर एक समान लागू होता है, वह यह है कि वे सभी लोग बहुत सारी और बहुत ही ऊंची अपेक्षाएं रखते हैं। मैंने भी आशा और निराशा पर बहुत कुछ लिखा और कहा है। लेकिन आपके जीवन में इसका वास्तविक अर्थ क्या है, यह जानना आव्श्यक है ।

कई लोग सोचते हैं कि उनकी अपेक्षाएं बहुत ऊंची हैं लेकिन जब वे निराशा से बचने के लिए इस समस्या का हल खोजने लगते हैं तो वे विपरीत की पराकाष्ठा पर पहुंच जाते हैं और यह सोच लेते हैं कि उन्हें अपेक्षाएं रखनी ही नहीं चाहिएं। वे किसी भी चीज़ की उम्मीद करना छोड़ देते हैं, ऊंचे लक्ष्य निर्धारित करना छोड़ देते हैं। जब कभी भी उन्हें यह महसूस होता है कि वे कुछ चाहते हैं तो वे तुरंत ही खुद समझाने लगते हैं सपने देखना व्यर्थ है। वे अपना दिमाग़ वहां से हटा लेते हैं और वापिस अपने दैनिक कामों में लग जाते हैं।

नतीज़ाः वे पहले की तुलना में अधिक व्याकुल और मायूस हो जाते हैं! अपेक्षाएं ना रखने पर भी जब खुशी नहीं मिलती तब वे स्वयं से सवाल करते हैं कि उनके जीने का आखिर अर्थ ही क्या है। अगर कुछ पाने के इच्छा ही नहीं है तो मेरी ज़िंदगी के मायने ही क्या हैं? जीवन का कोई उद्देश्य ही न हो तो मैं क्या करूं?

मेरा मानना है कि इन दोनों के बीच का भी एक रास्ता है। आप उम्मीदों के बिना एक सामान्य जीवन नहीं जी सकते। आप सामान्य जीवन की गतिविधियों से पूरी तरह विमुख होकर एकांतवास में जा सकते हैं। यदि आप स्वयं को मित्रों, परिवार और सामाजिक जीवन से अलग कर सकते हैं, यदि आप सारे काम छोड़कर केवल ध्यान में मग्न हो सकते हैं तो संभव है कि आप उस अवस्था के नज़दीक पहुंच सकते हैं। परंतु दोस्तों, परिवार और दैनिक कामकाज के बीच यह कर पाना संभव नहीं है। यदि आप ध्यान करने में समय व्यतीत करते हैं तो भी यह संभव है कि आप पूर्ण समाधि में उतरने की अपेक्षा करने लगें। हो सकता है कि ऐसा ना हो पाए। तब पुनः आप निराश और नाखुश होंगें। जहां अपेक्षाएं होती हैं, वहां निराशाओं की गुंजाइश अवश्य रहती है।

निराशा के भय को अपने ऊपर हावी न होने दें। इस भय की वजह से अपने लिए उच्चतम लक्ष्य निर्धारित करने से पीछे न हटें। यदि आप ऐसा करते हैं तो आप स्वयं अपने विकास का रास्ता अवरुद्ध कर रहे हैं। आपका विकास नहीं होगा तो ज़िंदगी में कोई मुकाम हासिल करने की आशा ही समाप्त हो जाएगी।

अपनी अपेक्षाओं को घटाकर शून्य पर लाने की ग़लती कदापि न करें। बल्कि इसके बजाए उनसे उचित तरीके से निपटना सीखें। बेशक़ आप समय – समय पर यह जांच कर सकते हैं कि आपकी अपेक्षाएं जायज़ हैं या नहीं। और यदि वे जायज़ हैं और उन्हें पूरा कर पाने की ज़रा सी भी संभावना आप देखते हैं, तो ज़रूर आगे बढ़ें। जी-जान लगाकर कोशिश करें। यदि फिर भी निराशा हाथ लगती है तो भी छोटी-छोटी निराशाओं से घबराएं नहीं, ये तो आपको और अधिक मज़बूत बनाती हैं और आपके विकास में मदद करती हैं।

एक बार प्रयास करने पर यदि असफलता हाथ लगती है तो आप दोबारा प्रयास कर सकते हैं। इस बार आपका यह प्रयास अधिक विश्वास से भरपूर और सटीक होगा क्योंकि अब आपके पास एक प्रयास का अनुभव जो है। केवल इसी रास्ते पर चलकर आप अपने लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। यदि आप किसी भी दिशा में पूरी शिद्दत से प्रयास करते हैं तो कुछ न कुछ नतीजा अवश्य निकलेगा। चाहे मंज़िल तक न पहुंच पाएं हों लेकिन फिर भी एक कदम तो आपने आगे बढ़ाया है। जितना आगे बढ़ते जाएंगें, उतना ही आपके अनुभवों में वृद्धि होती जाएगी।

यदि आशाएं, सपने और उम्मीदें नहीं होंगी तो ज़िंदगी थम सी जाएगी। जीवन नीरस हो जाएगा, आप कहीं के भी नहीं रहेंगें और सबसे बड़ी बात, आप खुश नहीं रह पाएंगें। नहीं, आप अपने जीवन के साथ ऐसा नहीं कर सकते। सपने देखें, अपेक्षाएं रखें, कल्पना की उड़ान भरें और साथ ही अपने सपनों को साकार करने के लिए दिमाग और हाथ-पैरों का इस्तेमाल करें।