इस संज्ञान का मुकाबला कैसे करे कि आप ज़्यादा दिन ज़िंदा नहीं रहने वाले हैं? 28 अक्टूबर 2015

आर्थिक और आपसी संबंधों से जुड़ी समस्याओं पर लिखने के पश्चात् आज मैं एक ऐसी बिल्कुल अलग प्रकार की मुसीबत के विषय में लिखना चाहता हूँ जो आपकी दुनिया को झँझोड़कर रख देती है: जब आपको पता चलता है कि खुद आप या आपका कोई बहुत करीबी व्यक्ति किसी घातक बीमारी से या किसी स्वास्थ्य संबंधी समस्या से ग्रसित है। निश्चय ही मैं सर्दी-खाँसी जैसी सामान्य व्याधिओं की चर्चा नहीं कर रहा हूँ-जी नहीं, मेरा मतलब कैंसर जैसी बीमारियों या जानलेवा अपघातों से है, जहाँ घायल व्यक्ति अपनी हड्डियाँ तुड़वा बैठा है या पक्षाघात-ग्रस्त हो गया है। ऐसी स्थितियों का मुक़ाबला कैसे करें?

स्वाभाविक ही, मैं कोई चिकित्सकीय सलाह देने नहीं जा रहा हूँ। उसके लिए आपको बहुत सारे काबिल डॉक्टर मिल जाएँगे, जो आपकी या आपके प्रियकरों की हर संभव चिकित्सा कर सकेंगे। मैं सिर्फ समस्या के भावनात्मक और मानसिक पहलुओं पर दृष्टि डालूँगा।

बीमारी और मौत दो ऐसी परिस्थितियाँ हैं जहाँ आपके पास सिर्फ एक ही विकल्प होता है: उन्हें स्वीकार करना।

और यह बात कहने में जितनी आसान है उस पर अमल करना उतना ही कठिन है और मैं जानता हूँ कि जो भी इस परिस्थिति से गुज़र रहा होता है, जानता है कि वास्तव में यह कितना कठिन है। अगर आप जानते हैं कि एक या दो साल से अधिक आपका जीना संभव नहीं है। जब आपको पता चलता है कि अब आपको अपने पैरों का एहसास नहीं होगा क्योंकि आप लकवाग्रस्त हो चुके हैं। जब आपको पता चलता है कि आपकी पत्नी के हाथ कट जाने के बाद आपकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल जाने वाली है।

मुद्दे की बात यह है कि ऐसे मामलों में आपके पास इसके सिवा कोई चारा नहीं होता कि आप परिस्थिति को स्वीकार कर लें। इस सच्चाई को स्वीकार करें और यह सुनिश्चित करें कि इस कठिन परिस्थिति में भी आप अच्छे से अच्छा क्या कर सकते हैं।

अगर आप या आपका कोई प्रियकर जानता है कि आपमें से किसी एक के पास बहुत कम जीवन बचा है तो पूरी कोशिश करें कि ये कुछ दिन, सप्ताह या महीने अधिक से अधिक सुखद हों। उनके लिए, जो अभी काफी समय तक करीब रहने वाले हैं, बहुत सारी उल्लासपूर्ण स्मृतियों को सँजोने की कोशिश करें। उन बातों को अंजाम दें, जिन्हें आप करना चाहते थे और हमेशा बाद में करने के लिए टाल देते रहे थे। संसार की खूबसूरती का उन लोगों के साथ आनंद लें, जिन्हें आप प्रेम करते हैं। यदि आपमें थोड़ी-बहुत लिखने की प्रतिभा है तो मैं सलाह दूँगा कि आपके मन में होने वाली हलचलों को लिखकर रख लें, जिससे इन्हीं परिस्थितियों से गुज़रने वाले दूसरे लोग आपके अनुभवों से शक्ति प्राप्त कर सकें!

यदि आप इन परिस्थितियों से बचकर निकल आते हैं तो उनके हर लमहे की कदर करें, उन्हें शिद्दत के साथ याद रखें, भले ही उन परिस्थितियों ने आपका नुकसान किया हो या आपके जीवन में उनके कारण स्पष्ट परिवर्तन आ गया हो! क्योंकि कितनी भी बुरी परिस्थिति से आप गुजरे हों, कोई न कोई होता है जो आपसे भी बुरी परिस्थिति से गुज़र चुका होता है। आपने उस प्रेरणादायक वक्ता का वीडियो देखा होगा, जिसकी बाहें और पैर नहीं हैं! जीने के आनंद के बारे में बात करते हुए उसे देखना अपने आपमें असाधारण और विस्मित करने वाला अनुभव है! न देखा हो तो उस वीडियो को अवश्य देखें।

जिन परिस्थितियों के साथ आपको आगे भी गुज़ारा करना है, उनको सहजता के साथ स्वीकार करते हुए, तदनुसार अपना भविष्य का संसार रचें। एक बार, जब आप उन्हें स्वीकार करने लगेंगे, आप नोटिस करेंगे कि आपकी परवाह करने वाले बहुत से करीबी लोग आपकी सहायता के लिए आगे आते जा रहे हैं और आपकी हर संभव मदद के लिए प्रस्तुत हैं। न सिर्फ अपनी विकट परिस्थितियों को स्वीकार करें बल्कि उस मदद को भी स्वीकार करें, जिनकी आपको सख्त ज़रूरत है।

निश्चित ही यह कठिन है लेकिन एक बार आप उन्हें स्वीकार करने लगें तो वे आसान होती जाएँगी और उनमें आपको जीवन की कई सकारात्मक बातें भी नज़र आने लगेंगी।

अगर आप खुश रहना चाहते हैं तो आप अति-आदर्शवादी नहीं हो सकते – 27 अगस्त 2015

बहुत से लोग सोचते होंगे कि मैं बहुत आदर्शवादी हूँ। मैं ईमानदारी को प्रोत्साहित करता हूँ, अक्सर दूसरों की मदद करने की बात कहता रहता हूँ, धोखाधड़ी और छल-कपट का पर्दाफाश करने की कोशिश करता रहता हूँ और मानव मात्र की भलाई हो सके, ऐसे विचारों का प्रचार-प्रसार करता हूँ। लेकिन मैं बहुत आदर्शवादी नहीं हूँ। बल्कि मैं अपने आपको बहुत हद तक यथार्थवादी के रूप में देखता हूँ- एक सकारात्मक रवैये के साथ। बल्कि मेरा मानना है कि वास्तव में आदर्शवादी लोगों को प्रसन्न होने में कठिनाई महसूस होती है। ऐसा क्यों है और प्रसन्न रहने के लिए आप क्या कर सकते हैं, आगे वर्णन कर रहा हूँ।

आदर्शवाद आपको क्यों प्रसन्न नहीं होने देता? क्योंकि दुनिया एक आदर्श स्थान नहीं है। यह कतई पूर्णतः निर्दोष जगह नहीं है और हो भी नहीं सकती। क्या उत्तम है, इस बारे में हम सब अलग-अलग विचार रखते है और सभी अपने मुताबिक़ उस आदर्श को प्राप्त करने की दिशा में प्रयत्न करते हैं, भले बहुत से दूसरे लोग उसे ठीक न मानते हों। तो कोई एक आदर्श स्थिति कभी प्राप्त नहीं हो सकती- हालांकि आप अपने आसपास भरसक अपने आदर्शों के मुताबिक़ एक घेरा निर्मित कर सकते हैं।

हालातों के कारण अवसादग्रस्त होने की जगह उन्हें बदलने के लिए आप बहुत कुछ कर सकते हैं। अधिक महत्वपूर्ण बातों की चिंता कीजिए, उन आदर्शों की, जो आपके लिए वास्तव में बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन्हें स्वीकार करना सीखिए। यह जानना और स्वीकार करना बहुत ज़रूरी है कि बहुत सी छोटी-छोटी बातें उपयुक्त नहीं हैं। आपको चाहिए कि यह विचार छोड़ दें कि हमेशा चीज़ें 100% आपके आदर्शों के मुताबिक हों- क्योंकि यह संभव ही नहीं है और वह आपके अंदर निराशा उत्पन्न करेगा, आपको अप्रसन्न कर देगा।

इसीलिए मुझे लगता है कि ज़्यादातर मैं यथार्थवादी हूँ और आदर्शवादी होना भी नहीं चाहता। उच्चतर निमित्त के लिए कई बार ऐसी बहुत सी परिस्थितियाँ निर्मित हो जाती हैं जो मुझे उससे अलग तरह का व्यवहार करने के लिए मजबूर कर देती हैं, जिसे सामान्यतया मैं अपने लिए आदर्श मानता हूँ।

मैं एक उदाहरण देता हूँ: मैं पूरी तरह हिंसा के खिलाफ हूँ। मैं अपने स्कूल में अहिंसक शिक्षा को बढ़ावा देता हूँ और अभिभावकों से भी ज़ोर देकर कहता हूँ कि घर में भी वे यही करें। मैं पशुओं की हिंसा के भी खिलाफ हूँ और बातचीत में भी परस्पर हिंसा के खिलाफ हूँ। लेकिन मैं इसे और आगे बढ़ाते हुए यह नहीं कहूँगा कि मैं कभी भी हिंसक नहीं हो सकता। खतरनाक परिस्थिति में अगर मुझे लगे कि मुझ पर हिंसक हमला हो सकता है या कोई मुझे, मेरी पत्नी या बेटी को नुकसान पहुँचाना चाहता है तो निश्चित ही मैं भी अपने हाथ का इस्तेमाल करूँगा। मैं किसी को मुझे मारने की इजाज़त नहीं दूँगा कि मैं सिर्फ अपनी पिटाई का दर्द सहता रहूँ। एक उदाहरण के रूप में स्वरक्षा हेतु की जाने वाली ऐसी हिंसा को मैं पूरी तरह जायज़ मानता हूँ।

ऐसे और भी बहुत से उदाहरण हो सकते हैं! एक आदर्श के रूप में लोग भ्रष्टाचार के विरोधी होते हैं। किसी काम को करवाने के लिए रिश्वत देकर वे पछताते हैं। लेकिन ऐसे भ्रष्टाचार या ऐसे ही किसी गलत व्यवहार का भांडाफोड़ करने के लिए लोग स्टिंग ऑपरेशन करते हैं और बिना इजाज़त उनका वीडियो तैयार कर लेते हैं। आम तौर पर इसे एक अनैतिक काम माना जाएगा और आप अपने आदर्शों के लिहाज से ऐसा नहीं करना चाहेंगे। किंतु गलत कामों को रोकने और गलत काम करने वालों का पर्दाफ़ाश करने के उच्चतर निमित्त के लिए आपको कभी-कभी ऐसा करना पड़ता है!

इसी नज़रिए से मैं यथार्थवादी हूँ और मुझे यह स्वीकार करने में कोई परेशानी नहीं है कि उच्च निमित्त मौजूद होते ही हैं और उनके लिए कभी-कभी अति-आदर्शवादिता को तिलांजलि देनी ही पड़ती है। अपने आदर्शो को बहुत मत खींचिए, उन्हें पकड़कर बैठ मत जाइए, उन्हें लेकर अतिवादी मत बनिए क्योंकि वह आपको दुखी करेगा। उच्चतर प्रयोजनों के लिए किया गया वह कार्य जो अति-आदर्शवाद की दृष्टि से "अनैतिक" दिखाई देता है, उसे करने पर आपको सिर्फ कुछ देर अफ़सोस होगा। लेकिन इस मामले में अतिवादी रवैया अपनाने पर आप लंबे समय तक दुखी रहेंगे और आपको शांति नहीं मिलेगी।

अपने विचारों के प्रति और जो आप महसूस करते हैं, उसके प्रति ईमानदार बने रहिए। अपने आदर्शों के प्रति सत्यनिष्ठा रखिए लेकिन यथार्थ को भी मौका दीजिए- यही आपको प्रसन्नता और अंततः संतोष और मानसिक शांति प्रदान करेगा।

आश्रम में धूम्रपान पर पाबंदी है लेकिन धूम्रपान करने वालों पर न तो पाबंदी है, न ही उनकी निंदा की जाती है! 26 अप्रैल 2015

मैंने आदत बना ली है कि रविवार के दिन अपने जीवन की ताज़ा घटनाओं के बारे में आपको बताता हूँ। आज बारी है, अपने मेहमानों के साथ कल हुई बातचीत से उद्भूत कुछ विचारों की। आश्रम की एक मेहमान सकारात्मक रूप से अचंभित रह गई, जब हमने कहा कि अगर वह धूम्रपान करती है या कॉफी पीती है, तो हमें कोई एतराज़ नहीं होगा!

हमारा आश्रम पूरी तरह अपारंपरिक, अपरंपरागत काफी हद तक स्वच्छंद और अधार्मिक आश्रम है। हमारे यहाँ आपके आम व्यवहार को लेकर कोई खास नियम नहीं है और न ही इस बात का कोई नियम है कि आप किस समय क्या करते हैं। हमारे यहाँ सिर्फ शराब और ड्रग्स पर पाबंदी है और कमरों में या बगीचे में धूम्रपान करने की मनाही है। अगर आप धूम्रपान करते हैं तो उससे हमें कोई दिक्कत नहीं हैं, बस, आश्रम से बाहर निकलिए और चाहें तो गेट के सामने ही खड़े होकर सिगरेट पीजिए। वास्तव में बहुत से मेहमान ऐसा करते भी हैं और हमें उससे कोई परेशानी नहीं होती!

कई बार लोग इस तनाव के साथ यहाँ आते हैं कि भारत आने का और हमारे आश्रम में रुकने का निर्णय तो कर लिया लेकिन अब यहाँ आकर धूम्रपान कहाँ करेंगे-क्योंकि इन लोगों को निकोटीन की लत होती है! जब उन्हें इस बारे में हमारे रवैये का पता चलता है तो आप कल्पना कर सकते हैं कि उन्हें कितनी राहत मिलती होगी-और अक्सर वे आश्चर्यचकित रह जाते हैं।

इसका कारण यह है कि बहुत से आश्रम हैं, जहाँ आपको क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इस बारे में बहुत सख्त नियम और बहुत संकीर्ण नजरिया होता है। स्वाभाविक ही, इसकी जड़ में उनकी आस्था, अक्सर उनके गुरुओं के नज़रिए और उनकी शिक्षाओं से प्रभावित हिन्दू धर्म होता है! अगर उनके संगठन का उपदेश या आदेश है कि चॉकलेट नुकसानदेह है तो उस आश्रम में किसी को भी चॉकलेट खाने की इजाज़त नहीं होती!

यही बात कॉफी पर भी लागू होती है और हमारे आश्रम में यह एक आश्चर्य का विषय होता है, जब हम पूछते हैं, "कॉफी लेंगे या चाय"! वास्तव में हम अक्सर कुछ आयुर्वेदिक मसालों के साथ उबालकर चाय बनाते हैं और वही पेश करते हैं।

मैं आपका आकलन इन छोटी-छोटी सी सामान्य बातों से क्यों करूँगा? मैं धूम्रपान न करने की सिफारिश ज़रूर करूँगा क्योंकि वह आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकर है, जब आप धूम्रपान कर रहे होंगे, मैं आपके पास खड़ा रहना पसन्द नहीं करूँगा क्योंकि मैं अपने लिए कोई नुकसान नहीं चाहता और वैसे भी तम्बाकू का धुआँ मैं बर्दाश्त नहीं कर पाता। लेकिन इसके बावजूद, सिर्फ धूम्रपान करने के कारण आपको बुरा व्यक्ति नहीं समझूँगा!

यह आपका निर्णय है और अपने शरीर के साथ आप जो भी करते हैं, अपनी ज़िम्मेदारी पर करते हैं। जब तक आप दूसरों को नुकसान नहीं पहुँचाते और अपने आसपास के लोगों के साथ आपका व्यवहार प्यार भरा और शालीन है, आपका आश्रम में हार्दिक स्वागत है। आप जो हैं, वैसे ही बने रहिए और जीवन के मज़े लीजिए-मेरा वादा है, इन आदतों के आधार पर मैं आपका आकलन नहीं करूँगा!

"मैं ईश्वर की इच्छा से गरीब हूँ और इस बारे में कुछ नहीं किया जा सकता" – धर्म का बुरा प्रभाव – 26 मार्च 2015

मैंने परसों के अपने ब्लॉग में बताया था कि भारतीयों के लिए अपने जीवन में और सामान्य रूप से जीवन के नैसर्गिक बदलावों को स्वीकार करना पश्चिमी लोगों के मुक़ाबले आसान होता है। दुर्भाग्य से इसके असरात सिर्फ सकारात्मक ही नहीं होते और आज के अपने ब्लॉग में मैं इसी विषय पर अपने विचार लिखना चाहता हूँ।

क्या हो अगर आप जीवन को जस का तस स्वीकार तो करें मगर उसमें मौजूद बुरी बातों को लेकर परेशान भी न हों? क्या आप कल्पना नहीं कर सकते कि अगर ऐसा हो जाए तो वह आपके जीवन में कितनी नकारात्मकता पैदा कर सकता है? सामान्य रूप से मैं मानने के लिए तैयार हूँ कि यह सकारात्मक नज़र आता है-बशर्ते वह आपके अंदर निष्क्रियता न पैदा करे और इतना असमर्थ न बना दे कि आप जीवन में कोई बदलाव न ला सकें। हमारे स्कूल के बच्चों के अभिभावकों के साथ दैनिक जीवन में हुए अनुभव यहाँ प्रस्तुत हैं: जब गरीब लोग अपनी बुरी हालत को जस का तस स्वीकार कर लेते हैं और उनसे बाहर निकलने की कोशिश तक नहीं करते।

जी हाँ, हमने बहुत से गरीब परिवारों के साथ बातचीत की है, बहुत से पुरुष और महिलाएँ, जो बहुत गरीबी में किसी तरह ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं। बहुत से लोग काम तो करते हैं लेकिन उन्हें इतनी कम मज़दूरी मिल पाती है कि बड़ी मुश्किल से अपना और अपने बच्चों के पेट भर पाते हैं। फिर भी जब आप उनके घर जाते हैं और उनके पास काम नहीं होता तो वे सिर्फ यूँ ही घर में पड़े-पड़े समय गुज़ार देते हैं। वे बताते हैं कि वे पुजारी हैं या रिक्शा चलाते हैं और कभी काम मिल जाता है तो कभी-कभी काम नहीं भी मिल पाता। कहीं-कहीं उनका कोई बड़ा लड़का या लड़की कोई काम करके पैसे कमा लेते हैं और इस तरह परिवार का गुज़र-बसर हो ही जाता है। फिर और अतिरिक्त प्रयास करने की ज़रूरत क्या है?

वे कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करते। अपनी वर्तमान परिस्थिति से निकलने और ऊपर उठने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास करने का, थोड़ी अधिक मेहनत करने का उनके अंदर कोई उत्साह ही नज़र नहीं आता!

यही वास्तविकता है- अगर हमारे लिए ईश्वर यही चाहता है, अगर यही उस सर्वशक्तिमान की इच्छा है…हम उनके मुख से ऐसे वाक्य अक्सर सुनते हैं और एक नास्तिक के रूप में यह बात मुझे उद्वेलित करती है, मैं अविश्वास से भर उठता हूँ! वास्तव में मैं समझ नहीं पाता कि आप कैसे नहीं देख पाते कि आप भी खुशहाल हो सकते हैं, आपके पास भी पर्याप्त खाने-पीने के लिए हो सकता है और कैसे आप सोच सकते हैं कि कोई कंजूस, सर्वशक्तिमान अधम यह निर्णय करे कि आप जीवन में सफल नहीं हो सकते! और यह धर्म के कारण पैदा हुई मानसिकता है!

हिन्दू धर्म ऐसी शिक्षाओं से भरा पड़ा है, जो लोगों से अपनी नियति स्वीकार करने के लिए कहती हैं, कि वे संघर्ष न करें, कि वैसे भी होनी-अनहोनी पहले से ही लिख दी गई है। यही कारण है कि अपने शराबी पतियों से रोज़ मार खाने वाली महिलाएँ भी तलाक के बारे में सोच भी नहीं पातीं: कि मेरे जीवन में यही लिखा है, ईश्वर यही चाहता है, यही मेरी नियति है।

इसलिए स्वाभाविक ही, परिवर्तन को स्वीकार करने का माद्दा रखना एक अच्छी बात है और यह खुशी की बात है कि भारतीय संस्कृति में यह बड़े पैमाने पर मौजूद है क्योंकि इसकी भारतीयों को आवश्यकता भी है। लेकिन उन्हें चाहिए कि वे पश्चिमी लोगों से परिश्रम और अनुशासन सीखें और अपनी दुखदाई परिस्थितियों से बाहर निकलने और जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश करें!

क्या आपने अपने सम्बन्धों में नाखुश रहना स्वीकार कर लिया है? 11 जून 2014

ग्रान कनारिया की अपनी यात्रा के दौरान रमोना और मुझे बहुत सी आपसी बातें करने का मौका मिला। स्वाभाविक ही हमारी बहुत सी बातें अपरा या आने वाले कार्यक्रमों के बारे होती रहीं मगर हम लोग अपने सुखद संबंधों के बारे में भी चर्चा करते रहे। इसी चर्चा के दौरान हम उन लोगों के बारे में भी विचार करते रहे, जो आपस में अपने सम्बन्धों में पूरी तरह नाखुश होते हुए भी साथ रहने के लिए मजबूर होते हैं।

हो सकता है पूरी तरह नाखुश न भी हों। साधारणतया सभी पहलू बुरे ही हों, यह ज़रूरी नहीं है और अंततः इन्हीं बातों की बदौलत लोग अपने सम्बन्धों में बंधे रहते हैं, भले ही उनसे उन्हें पूरी खुशी न मिल रही हो। अक्सर ऐसे साथी के साथ भी, जिसे वे वास्तव में प्यार नहीं करते। ऐसी स्थिति में, जहां उन्हें कोई न कोई शिकायत बनी ही रहती है मगर वे इस परिस्थिति से समझौता करने में ही भलाई समझते हैं। वे इस तरह साथ रहते हैं जैसे किसी इकरारनामे के पाबंद होना उनकी मजबूरी हो। कई लोगों को समझौते से बंधा वह जीवन ही तात्कालिक रूप से सबसे सुविधाजनक लगता है।

कुछ लोग ऐसे सम्बन्धों में इसलिए भी बने रहते हैं क्योंकि उनके बच्चे होते हैं और उन्हें लगता है कि बच्चों के लिए अपने माँ-बाप दोनों के साथ रहना ही बेहतर होगा। लेकिन मैं समझता हूँ कि यह हमेशा अच्छा सिद्ध नहीं होता, विशेषकर तब जब अभिभावकों के बीच हमेशा तनाव और तकरार बने रहते हों। बच्चों के लिए यह कैसे बेहतर हो सकता है कि वे हर वक़्त अपने माँ-बाप को आपस में लड़ता-झगड़ता देखें?

कुछ दूसरे दम्पति किसी वास्तविक तनाव में नहीं रहते। वे शायद इस बात को स्वीकार कर चुके होते हैं कि उनका साथी वास्तव में ‘उनका’ है ही नहीं और वे उसके साथ एक छत के नीचे रहते भर हैं। घर तो साझा करते हैं मगर बिस्तर नहीं। बच्चे तो पैदा हो जाते हैं मगर प्रेम नहीं। बच्चों को दोनों उपलब्ध हो जाते हैं और किसी तरह निर्वाह कर लिया जाता है मगर क्या यह सम्बन्ध बच्चों को अच्छा माहौल दे पाता होगा? पुरुष और स्त्री के इस सम्बन्ध से बच्चे क्या सीखते होंगे?

और सभी पति-पत्नियों से मेरा यह प्रश्न है: बच्चों के लिए एक कामचलाऊ पारिवारिक जीवन का भ्रम उपस्थित करके आप दोनों कितने साल इसी तरह दुखद ज़िन्दगी जीते रहेंगे? दूसरों के सामने उन बातों का नाटक करते हुए, जिन्हें आप भीतर से महसूस नहीं करते? आखिर क्यों?

यह उनके लिए भी एक बहुत बड़ा प्रश्न है, जिनके बच्चे नहीं हैं और इसलिए बच्चों को सही रास्ता दिखाने की या उनकी परवरिश की कोई ज़िम्मेदारी भी उनके सर पर नहीं है। आप अपना समय क्यों बरबाद कर रहे हैं? महीनों, अक्सर सालों बिना प्रेम के, एक दूसरे पर शक करते हुए और यह जानते हुए भी कि वे अपने साथ ठीक नहीं कर रहे हैं। यह एक तरह का भय है। आप परिवर्तन से घबरा रहे हैं, डर रहे हैं कि पता नहीं आपको कोई दूसरा साथी मिल पाएगा या नहीं, कि जब 70% ख़ुशी मिल ही रही है तो क्यों किसी दूसरे की तलाश की कोशिश की जाए। और फिर कुछ दिन बाद आपको पता चलता है कि आपको जीवन में बस इतना ही मिलना था कि जीवन में किसी को भी 100% सुख नहीं मिलता।

एक बात कहूं: आपको सिर्फ एक ज़िन्दगी मिली है। आप पुनर्जन्म पर भी भरोसा कर लें, तब भी कम से कम इस जीवन को बरबाद न करें! आप अभी जिंदा हैं, अपने समय का पूरा उपयोग करें! आप ख़ुशी की तरफ कदम बढ़ाने की हिम्मत क्यों नहीं करते? क्यों नहीं उसे खोजने का प्रयास करते?

या फिर क्यों नहीं, जो आपको उपलब्ध है, उसी में पूरी तरह खुश रहते? क्योंकि आखिर ख़ुशी तो भीतर से आती है, बाहर से नहीं!

अरेंज्ड मैरेज यानी शादी मैंने आपसे करी है या पूरे परिवार से!-29 अप्रैल 2013

पिछले हफ्ते मैंने बताया था कि मेरे विचार में भारतीय दंपतियों में इतनी ज़्यादा वैवाहिक समस्याएं इसलिए हैं क्योंकि अधिकतर विवाह आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) होते हैं। युवा लोगों के अपने स्वप्न होते हैं और जब उन्हें अपने जीवन साथी के बारे में पता चलता है कि वह बिल्कुल वैसा नहीं है जैसा उन्होंने अपने सपनों में देखा था तब कई समस्याएं पैदा होने लगती हैं। आम तौर पर वे अपने जीवन साथी के साथ तालमेल बनाए रखने की कोशिश करते हैं और उसमें कामयाब भी होते हैं, लेकिन मुख्य झगड़े तो परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ होते हैं। क्योंकि आम रिवाज यही है कि लड़की अपने पति और उसके परिवार के साथ रहने उनके घर आती है, उसे ही इन सब समस्याओं का सामना करना पड़ता है, खासकर अपनी सास को लेकर।

इस सच्चाई के पीछे कारण है कि पति के साथ होने वाले झगड़ों के मुकाबले परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ होने वाले झगड़े ज़्यादा कटु होते हैं। भारत में तलाक अभी भी आम नहीं हैं। अधिकतर मामलों में पति और पत्नी दोनों जीवन में कभी भी अलग होने के बारे में सोच भी नहीं सकते। वे यही सोचते हैं कि वे शादीशुदा हैं और उन्हें सदा साथ ही रहना है। आयोजित विवाहों के इस बाज़ार में जो मिल गया है उसी के साथ तादात्म्य स्थापित करने के अलावा अधिकांश लोगों के पास कोई विकल्प भी नहीं होता।

इसका अर्थ यह होता है कि पत्नी के आचार-व्यवहार को पति स्वीकार करेगा और पति की राय और विचारों को पत्नी स्वीकार करेगी। इसके अलावा अपने पति के कार्यकलापों में भी उसकी सहमति होगी। अगर वह कोई ऐसी बात करती है जो पति को अच्छी नहीं लगती तो वह उसे ऐसा करने से मना कर सकता है। और अगर वह अपनी बात पर अड़ी रहती है, पति का कहना नहीं मानती तब झगड़े की शुरुआत होती है। कुछ भी हो, अंततः दोनों को यह बात स्वीकार करनी पड़ती है कि इस मामले में दोनों के अलग-अलग विचार हैं। अगर वह घुमा-फिराकर फिर वही बात करती है तो अबकी बार वह कुछ नहीं कहेगा, सोचेगा, ‘छोड़ो, आखिर हमें साथ रहना है’। इसी तरह अगर पति की कोई बात उसे अच्छी नहीं लगती तो वह भी पहले तो प्रतिवाद करेगी, लड़ाई भी होगी मगर अंततः, चाहे पति वही बात बार-बार दोहराता ही क्यों न रहे, उसे स्वीकार करना ही होता है कि ‘क्या किया जाए? आखिर है तो मेरा पति!’

अब परिवार की चर्चा करें। उनके लिए मामला अलग है और फिर ताली दोनों हाथों से बजती है। एक औरत अपने पति की अजीबोगरीब हरकतें और विचार बर्दाश्त कर लेती है मगर हो सकता है कि वह अपने सास-ससुर या देवर की वही बातें बर्दाश्त न करे। अगर उसका पति कोई गलत बात कहता है तो वह कंधे उचकाकर, अपनी नियति को कोसती हुई उसे माफ कर सकती है। मगर यदि देवर या सास वैसी ही कोई बात कहे तो वह इतनी आसानी से उनकी बात नहीं मानेगी। आखिर माने भी क्यों? पति से उसका विवाह हुआ है, सारे परिवार से नहीं! भले ही वह बड़े विवादों से बचने की कोशिश करती रहे, उनसे पैदा हुए छोटे-छोटे कटु अनुभव उसके भीतर दुख और गुस्सा पैदा करते रहते हैं जो धीरे-धीरे इकट्ठा होते रहते हैं और एक न एक दिन फूट पड़ते हैं।

मैंने कहा कि ताली दोनों हाथों से बजती है और यह सच है। कुछ मामलों में पत्नी के मूर्खतापूर्ण रवैये को पति स्वीकार कर सकता है मगर हो सकता है कि परिवार न करे! अगर वह पति को कोई दिल पर लगने वाली बात कहे तो वह तुरंत उसे माफ कर सकता है, भूल सकता है मगर परिवार के दूसरे सदस्यों को वही बात इतनी नागवार गुज़र सकती है कि वे उसे जीवन भर न भूलें। वे ऐसी बातों को याद रखते हैं और गांठ बांध लेते हैं। आगे वे उसकी इन बातों को बर्दाश्त नहीं कर सकेंगे!

इसका परिणाम बड़ी लड़ाइयों के रूप में सामने आता है जो परिवार के टूटने की सीमा तक भी जा सकता है। कटुता और तनाव इतना बढ़ जाता है कि पति निर्णय करता है कि रोज़-रोज़ की चिकचिक और लड़ाई झगड़ों से बेहतर है घर से अलग हो लिया जाए।

दुर्भाग्य से सम्मिलित परिवारों में आजकल ऐसा बहुतायत से हो रहा है। और आयोजित विवाह ही इसके ज़िम्मेदार हैं। अगर कोई लड़की किसी से प्रेम करती हैं और उसी से उसका विवाह हो जाता है तो वह अपने पति की भावनाओं की बेहतर कद्र करती है और जानती है कि वह भी उसके पति के परिवार से जुड़ गई है। आयोजित विवाह के जरिये उस नए घर में ‘स्थापित’ बहू के मुकाबले उसका पति के परिवार के प्रति व्यवहार बहुत भिन्न होता है। परिवार के सदस्यों के लिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता-उनका पुत्र या भाई किसी से प्रेम करता है और उसे बहू बनाकर ले आया है तो वे उसके साथ सामंजस्य बनाकर रखने में प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। मगर यह तभी संभव हो पाता है जब पति के परिवार वालों की मानसिकता आयोजित विवाह की न हो और सद्भाव और प्रेम का वातावरण निर्मित करने की परिवार के सभी सदस्यों की व्यक्तिगत तत्परता और सम्मति हो।

क्या स्वर्ग की कोरी कल्पना में स्वाहा हो जाती है किसी के गुज़र जाने की पीड़ा? – 1 जनवरी 13

2013 में आपका स्वागत है। मुझे उम्मीद है बीते वर्ष का अंत आपके लिए अच्छा रहा होगा और आपने हर्ष और उल्लास के साथ नये वर्ष का स्वागत किया होग। हमने यहां आश्रम में कोई बड़ा उत्सव नहीं मनाया। जैसा कि मैंने पहले भी क्रिसमस के दौरान कहा था कि उत्सव मनाने के लिए आपका सही मिज़ाज में होना बहुत ज़रूरी है और यह भी कि हम बस ऐसे ही इतना खुश नहीं हो सकते कि नाचने-गाने लगें। इन सब के बावजूद हमने साथ मिलकर अच्छा वक़्त बिताया। अपरा, रमोना और मैं जल्दी सोने चले गए लेकिन पूर्णेंदु, थॉमस, आइरिस और हमारे दूसरे अतिथियों को साथ लेकर बेघरों को कंबल बांटने गए – जब आप पार्टी के मूड में न हों तो उत्सव मनाने का इससे बेहतर विकल्प क्या हो सकता है।

जब लोगों को अम्मा जी के निधन का समाचार मिला तो कई लोगों ने शोक प्रकट किया और कई लोगों ने कुछ इस तरह की पंक्तियां भेजीं: ‘मुझे मालूम नहीं कि क्या लिखूं क्योंकि ऐसी कोई चीज़ नहीं है जिसे कह देने से आपकी पीड़ा समाप्त हो पाएगी!’ कई अन्य लोगों ने संकेत के तौर पर सीधा अपना दुःख ज़ाहिर किया कि वे इस शोक में हमारे साथ हैं। हालांकि कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें लगा कि ऐसे मौक़े पर सलाह देना सबसे उचित है, उनकी सलाह कुछ ऐसी थी: ‘आप एक बुद्धिमान व्यक्ति हैं और आपको शोक-संतप्त होने की जगह दूसरी दुनिया में उनके प्रवेश का उत्सव मनाना चाहिए!’ नये वर्ष की शुरुआत मैं ऐसी सलाह देने वाले सभी लोगों को एक स्पष्ट संदेश देकर करना चाहूंगा ताकि इसे लेकर वर्ष 2013 में कोई भ्रांति न रहे: मैं धार्मिक नहीं हूं और मैं गुरू नहीं हूं, मैं एक साधारण व्यक्ति हूं। जब कोई प्रियजन हमेशा के लिए छोड़ जाते हैं, मैं दुखी होता हूं और मैं अपनी इन संवेदनाओं को स्वर्ग या दूसरी दुनिया की कल्पना और भ्रम में जीकर दबाऊंगा नहीं।

इससे पहले कि मेरे पाठकों में से कोई तबका मुझे इस बात के लिए सुनाना शुरू करे कि मैं अपने धार्मिक मित्रों द्वारा प्रकट किए गए शोक का सम्मान नहीं करता, मैं यह साफ़ करना चाहता हूं कि मुझे उन संदेशों और ई-मेल से कोई समस्या नहीं है जो दिल से महसूस कर लिखे गए हैं, जिनमें प्रेम है, सहानुभूति है। मुझे उन संदेशों से आपत्ति है जिसमें यह बताया जा रहा है कि मुझे कैसा महसूस करना चाहिए और कैसा नहीं। मेरी माँ की मृत्यु हुई है। मैं दुखी हूं और मैं रोता हूं। यह एक सत्य है और मैं इसे स्वीकार करने की क्षमता रखता हूं, आपको इससे कोई समस्या क्यूं है?

वास्तव में, वे सभी लोग जो ऐसी सलाह देते हैं, अपने किसी प्रियजन के गुज़रने पर उतना ही रोते हैं जितना मैं। तब उनकी बुद्धिमत्ता भी चली जाती है और उन्हें भी अपनी भावनाओं, संवेदनाओं को स्वीकार करना पड़ता है क्योंकि ऐसी स्थितियों में अपनी भावनाओं को भूलकर दिमाग़ का इस्तेमाल करना आसान नहीं होता। मेरे विचार में, ऐसा करना असल में ग़लत है. बल्कि आपको रोकर अपनी भावनाओं को बाहर आने देना चाहिए – केवल वही एक स्वस्थ प्रतिक्रिया है!

हां, मैंने आंसू बहाए हैं, मेरा पूरा परिवार रोया है और मैं मानता हूं कि यह ठीक है। हो सकता है रोना फ़ैशन में न हो, लेकिन यह अच्छा है। मुझे उस व्यक्ति से सहानुभूति है जो अपने दुख-दर्द को इस तरह ज़ाहिर कर पाने में असमर्थ है। हो सकता है आप एक ड्रामेबाज़ व्यक्ति न हों, बहुत से लोगों के सामने आपको रोने की आवश्यकता भी नहीं है। अपने परिवार के साथ रोएं, अपने साथी के साथ रोएं या अकेले में रो लें। यह मायने नहीं रखता कि आपकी आस्था किसमें है, पर अपनी भावनाओं को दबाएं नहीं।

मैं मृत्यु के बाद की ज़िंदगी में या स्वर्ग में या मोक्ष में यक़ीन नहीं करता लेकिन अगर आपको यह भरोसा है भी कि आपके प्रियजन मृत्यु के बाद किसी ऐसी जगह पर जाएंगे, तो भी आप दुखी होंगे. कोई और रास्ता नहीं है। आपको यह स्वीकार करना होगा, आपकी बुद्धिमत्ता काम नहीं आएगी। इसे बाहर आने दीजिए, रोइए और अगर आप उत्सव मनाने जैसा महसूस नहीं करते तो मत मनाइए। साथ बैठिए, बात कीजिए, जितना हो सके ज़िंदगी का आनंद लीजिए। जितना बेहतर बनाया जा सके, बनाइए। वक़्त गुज़रने के साथ-साथ चीज़ें आसान हो जाएंगी। जो आपको छोड़ गए हैं वो आपके दिल में, आपकी यादों में रहेंगे। लेकिन जब भी आंसू बाहर आना चाहे, उन्हें बहने दीजिए।

बदलाव चाहते हैं तो पहले स्वयं को बदलिए – 7 नवम्बर 08

किसी भी रिश्ते में स्वीकारभाव का होना बहुत जरूरी है। यदि हम दूसरों को जस का तस स्वीकार नहीं कर सकते तो हम किसी के साथ भी एक सफल रिश्ता नहीं बना सकते। अगर हम हर वक़्त किसी को बदलने की ज़द्दोज़हद में लगे रहते हैं और चाहते हैं कि वह हमारे मनमुताबिक बदल जाए, तो यह निश्चित है कि इस कोशिश में हमें ही सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचेगा। आखिर हम दूसरे को बदलना क्यों चाहते हैं? हम खुद को क्यों नहीं बदल सकते? और अग़र यदि आप स्वयं को ही नहीं बदल सकते तो दूसरे में बदलाव की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? यदि आप वास्तव में परिवर्तन चाहते हैं तो सबसे पहले अपने भीतर झांककर देखें और यह जानने की कोशिश करें जो आप साथी से चाहते हैं क्या वह सब आप स्वयं कर पाए हैं। यदि नहीं, तो सबसे पहले स्वयं को बदलें। असल में होता यह है कि लोग दूसरों को बदलना चाहते हैं और शायद इसके ज़रिए समाज को और यहां तक कि सारी व्यवस्था को बदलने का मंसूबा रखते हैं। परंतु भरसक कोशिश करने के बावजूद वे इसमें सफल नहीं हो पाते। वे सफल हो भी नहीं सकते क्योंकि दूसरों को जो शिक्षा वे देते हैं उसका स्वयं पालन नहीं करते। लेकिन यदि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को बदलने की कोशिश करे तो चीज़ें अवश्य बदल सकती हैं।

रिश्ता सफल होता है समर्पण से, अहम या उम्मीदों से नहीं। उम्मीदों को पीछे छोड़ना होगा और साथी को स्वीकार करना होगा, उसका आदर करना होगा। मैं एक बार फिर कहना चाहूंगा कि यदि प्रेमसंबंध में आप स्वीकारभाव, आदर और प्यार चाहते हैं तो निश्चय ही पहले स्वयं को स्वीकार, आदर और प्यार करना होगा।

आज अक्षय नवमी है। इस दिन लोग यहाँ आंवला के वॄक्ष की पूजा करते हैं। कई आयुर्वेदिक औषधियों में आंवले का प्रयोग किया जाता है। इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है। यह पाचन के लिए अच्छा होता है और आपको युवा बनाए रखता है। एंटी – एजिंग लोशनों में इसका इस्तेमाल किया जाता है। आयुर्वेद कहता है आंवला ‘अमृत‘ है। कभी भी और किसी भी रूप में इसका सेवन करना फायदेमंद होता है। यह सदैव आपके लिए गुणकारी है। मैं इस तरह की परंपराओं को पसंद करता हूं जो हमें प्रकृति के नज़दीक ले जाती हैं।