क्या योग सीखने वाले छात्रों की मुद्राएँ ठीक करना आवश्यक है? 29 सितंबर 2015

हाल ही में उच्चतर योग-विश्रांति शिविर में भाग लेने आश्रम आए एक मेहमान द्वारा प्रेरित कुछ पंक्तियों को आज मैं अपने ब्लॉग का विषय बनाना चाहता हूँ। यशेंदु के साथ अपने दो घंटे के दैनिक सत्र में एक ऐसा विषय उभरकर सामने आया जो सदा से योग शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए रोचक रहा है: क्या योग-शिक्षकों को अपने छात्रों की योग-मुद्राओं को सुधारना चाहिए?

स्वाभाविक ही, इस विषय में विभिन्न शिक्षकों के विचार भिन्न-भिन्न होंगे। मैं यहाँ अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहा हूँ और वह एक पंक्ति में यह है: कम से कम करना चाहिए- उतना ही, जितना अनिवार्य रूप से आवश्यक हो।

जब मैं योग सिखाता था तब मैं हमेशा इस सिद्धान्त का पालन करता था और यशेंदु और रमोना भी इसी नियम का पालन करते हैं। सामान्य कार्यशालाओं में आप शायद ही कभी हमें किसी व्यक्ति को ठीक करता सुनते होंगे-कि हमने किसी से कहा हो कि यह मुद्रा ऐसी नहीं, वैसी होनी चाहिए या जिस मुद्रा में वे बैठे या खड़े हैं, वह गलत है।

क्यों? यह प्रश्न, स्वाभाविक ही हर वह योग-शिक्षक या योग-छात्र पूछेगा, जो मुद्राएँ ठीक करने या कराए जाने का आदी है। आप कैसे जानेंगे कि जो आप कर रहे हैं, वह ठीक कर रहे है या गलत?

पहली बात तो यह कि योग किसी तरह की कोई प्रतियोगिता नहीं है जिसमें हार या जीत का प्रावधान हो या यह कि कोई एक सर्वश्रेष्ठ हो। योग में आप अपनी मुद्राओं को सुधारने की कोशिश करते हैं लेकिन किसी जीत के लिए नहीं बल्कि अपने भले के लिए, इसलिए कि वैसा करने से आपको अच्छा लगता है। इतना समझने के बाद, स्वाभाविक ही, किसी मुद्रा में रहते हुए आपको कुछ गतिविधियों से बचना चाहिए। लेकिन अक्सर ऐसी स्थिति पेश नहीं आएगी अगर आप खुद प्रदर्शन करके दिखा दें कि किसी मुद्रा में आने और उससे बाहर निकलने का ठीक तरीका क्या है। प्रदर्शन करते समय ही बोलकर बताएँ और आपके छात्र आपके इस प्रदर्शनात्मक उदाहरण से पूरी तरह समझ जाएँगे। शुरू में ही आपको बता देना चाहिए कि हर एक अपनी शारीरिक क्षमता के अनुपात में ही आगे जा सकता है और किसी भी स्थिति में हमें अपनी सीमा नहीं लांघना है।

एक बार यह ढाँचा तय हो जाने के बाद मुझे लगता है कि कक्षा में बार-बार सुधार के निर्देशों का योग-छात्रों पर नकारात्मक असर पड़ता है। मुझे कई लोगों ने बताया कि कुछ शिक्षकों ने यह कह-कहकर कि वे जो कर रहे हैं, गलत है, उन्हें योग से विमुख कर दिया। इससे इस बात की भी पूरी संभावना बनती है कि आप योग के सिर्फ बाहरी पहलू पर फोकस करने लगें और सिर्फ नकारात्मक बातों पर ज़ोर देने लगें जब कि वे अपनी मुद्राओं, व्यायामों और मांसपेशियों में खिंचाव पैदा करने वाली दूसरी यौगिक गतिविधियों से भीतर से भी अच्छा महसूस कर रहे होते हैं।

इसके अलावा आप दूसरों के शरीरों की क्षमता नहीं जानते। विशेष रूप से कुछ घंटों की योग कार्यशालाओं या तब, जब आपको किसी छात्र के साथ कुछ दिनों तक के लिए अभ्यास का मौका मिलता है, आप, उसका चिकित्सकीय इतिहास जानते हुए भी यह नहीं समझ सकते कि मसलन, वह पूरा पैर क्यों नहीं उठा पा रहा है या अपनी पीठ को अपने बगल वाले छात्र की तरह मोड़ क्यों नहीं पा रहा है! अब अगर आप उसके पास जाकर उसे अपना घुटना फर्श से चिपकाकर रखने के लिए कहेंगे-जब कि शारीरिक रूप से ऐसा करने में वह अक्षम है तो उसके लिए यह बड़ा असुविधाजनक होगा। बल्कि यह उसके लिए यह बेहद निराशाजनक होगा!

अगर आपको वाकई लगता है कि सामने वाला पूरी तरह नहीं समझ पाया है कि अपने किसी अंग को कहाँ रखना है या किन बातों का उन्हें विशेष ध्यान रखना है, तो यह बताने का कोई भिन्न तरीका भी हो सकता है! यह कहने की जगह कि ‘सांड्रा, तुम्हारी पीठ झुकी हुई है, उसे सीधा करो’ या ‘टिम, अपने कूल्हे ज़रा और झुकाओ’, आप कह सकते हैं, ‘इस मुद्रा में मुख्य फोकस रीढ़ की हड्डी को सीधा रखने पर होना चाहिए’ या ‘हर बार साँस छोड़ते हुए कूल्हों को थोड़ा और नीचे झुकाना है’। वे खुद की ओर देखेंगे और अगर उनके लिए संभव हुआ तो स्वयं अपनी मुद्रा ठीक कर लेंगे।

निश्चित ही, अगर आप किसी को लंबे समय तक सिखा रहे हैं, अगर सामने वाला खुद चाहता है कि उसकी मुद्राओं को सुधारा जाए या अगर आप किसी योग-शिक्षक को ही सिखा रहे हैं कि वह खुद भी योग की शिक्षा दे सके तब तो सीधे उसकी मुद्राएँ ठीक करना उचित है-लेकिन सामान्य सत्रों में आम तौर पर ऐसा नहीं होता!

इसके अलावा एक बात आप हमारी कक्षा में कभी नहीं देखेंगे: किसी व्यक्ति को शारीरिक रूप से सही मुद्रा में आने के लिए मजबूर करना या आगे क्षमता से ज़्यादा अपनी मांसपेशियों को खींचने के लिए प्रोत्साहित करना! अगर आप ऐसा करते हैं तो इसका अर्थ यही है कि आप उस व्यक्ति के शरीर को खुद उससे बेहतर जानते हैं। समस्या यह है: आप ऐसा करके उस व्यक्ति को शारीरिक नुकसान पहुँचा सकते हैं, बल्कि गंभीर चोट पहुँचा सकते हैं! भले ही आपने मनुष्य की शरीर रचना का अध्ययन किया हो, भले ही आप सामने वाले के चिकित्सकीय इतिहास से वाकिफ हों और तदनुसार उसे सलाह दे रहे हों, फिर भी अगर आप उसे तेज़ी और सख्ती से या बहुत ज़ोर देकर योगासन कराएँगे तो उसे नुकसान पहुँचा सकते हैं!

अंत में यही कि आप नहीं जानते कि उसके शरीर के साथ आपकी नजदीकी से आपका छात्र किस हद तक सुविधा महसूस करता है! हो सकता है कि आपका उसके बहुत करीब खड़ा होना न भा रहा हो, आपका नीचे झुककर ताकना उसे अच्छा न लग रहा हो और आपका छूना उसे नापसंद हो! आप पूछ भी तो सकते हैं लेकिन दस लोगों के बीच उसे प्रतिवाद करने में भी संकोच होगा-और वह अगली बार कक्षा में न आना ही उचित समझेगा।

मुझे लगता है कि कक्षा में किसी दूसरे को छूने की आपको कोई ज़रूरत नहीं है और सलाह दूँगा कि मौखिक निर्देशों को भी कम से कम रखा जाना चाहिए।

अपने शरीर से प्रेम का अर्थ यह नहीं है कि खा-खाकर मोटे हो जाएँ और यह भी नहीं कि भूखे मर जाएँ! 20 अगस्त 2015

दुनिया में, जहाँ आप क्या महसूस करते हैं के स्थान पर जो आपको क्या दिखाई दे रहा है, वही सब कुछ है, आपका रूपरंग, आपका शरीर, आपका बनाव-शृंगार अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। इसलिए आजकल शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखने के प्रति लोग पागल हो गए हैं और बाज़ार में बहुत बड़ा फ़िटनेस-बूम आया हुआ है। बहुत से लोग अजीबोगरीब खानपान अपना रहे हैं और कड़ा व्यायाम करते हैं, जिससे उनका शरीर सुंदर और चुस्त दिखाई दे। लेकिन आध्यात्मिक रंगमंच पर लोग अपने शिष्यों को इसका विपरीत उपदेश दे रहे हैं: खुद से और अपने शरीर से प्यार करें। आज मैं इन दो विपरीत विचारसरणियों पर पर संक्षेप में लिखना चाहता हूँ, यह बताते हुए कि मैं क्या उचित समझता हूँ।

हम अपनी चर्चा इस बिंदु से शुरू करेंगे कि दरअसल आप अपने शरीर की वर्त्तमान हालत से प्रसन्न नहीं हैं मुख्यतः इसलिए कि वह सुंदरता के आज के उन मानदंडों पर खरा नहीं उतरता जिन्हें जन मीडिया द्वारा लगातार प्रचारित किया जा रहा है। आप इस स्थिति को बदलना चाहते हैं और आपके पास इसके दो संभव तरीके हैं:

पहला यह कि आप अपने शरीर का रंगरूप वैसा बनाने की कोशिश करें जैसा आप दूसरों का देखते हैं और प्रशंसा से भर उठते हैं। उसके लिए आपको अपना खानपान बदलना होगा और शारीरिक व्यायामों पर ज़ोर-शोर के साथ जुट जाना होगा।

अगर आप यह रास्ता चुनते हैं तो मैं आपको स्वस्थ रहने पर फोकस करने की सलाह दूँगा, जैसा कि मैं पहले भी कई बार दे चुका हूँ। इसका अर्थ यह है कि आप अपने खानपान में कमी बिल्कुल न करें कि आपके शरीर को नुकसान पहुँचे! इसी तरह न तो कोई दवा खाएँ न ही कथित रूप से वज़न घटाने वाले तरह-तरह के पेय इत्यादि लें। उनमें अक्सर कोई न कोई रसायन होता है, जिनके इतने बुरे दुष्परिणाम (साइड इफेक्ट्स) होते हैं कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते। व्यायमों की बात करें तो कृपा करके किसी विशेषज्ञ की सलाह लें कि आपके शरीर के लिए कौन से व्यायाम उचित हैं और उन्हें किस तरह करना है, जिससे आपके शरीर को कोई नुकसान न पहुँचे।

और मैं आपको दो बिंदुओं पर आगाह करना चाहता हूँ: पहली बात तो यह कि सार्वजनिक पोस्टरों में प्रदर्शित बिकनी-बालाओं जैसी शरीर-यष्टि (फिगर) प्राप्त करना आपके लिए असंभव होगा क्योंकि उन आकर्षक पोस्टर-छवियों में फोटोशॉप बहुत बड़ी भूमिका अदा करते हैं! दूसरे, इस तरह आपको आत्मसंतुष्टि और ख़ुशी मिल जाएगी, इसकी संभावना बहुत क्षीण है। अपना शरीर आईने में देख-देखकर आपको वास्तविक ख़ुशी कभी नहीं मिल पाएगी और आप बार-बार अपने आहार और व्यायाम-क्रियाओं में बदलाव करती रहेंगी कि आप टीवी में दिखाई जाने वाली कमनीय महिलाओं जैसी लगने लगें लेकिन यह आपके लिए असंभव होगा क्योंकि आपकी शरीर रचना ही भिन्न होगी या इसलिए कि वह आदर्श देहयष्टि पाना यथार्थ से कोसों दूर है!

अब हम दूसरी संभावना पर विचार करें: जैसा भी आपका शरीर है, उसे स्वीकार करने का और उससे प्रेम करने का प्रयास करें। आप सोचेंगे कि शायद मैं इस विकल्प का समर्थन करूँगा, लेकिन नहीं। कम से कम पूर्ण समर्थन नहीं!

हाँ, आपको अपने शरीर से प्रेम करना चाहिए यानी जैसा आपका शरीर है, उसे उसी तरह स्वीकार करना चाहिए। लेकिन साथ ही उसे स्वस्थ भी रखना चाहिए! अगर आपका वज़न ज़्यादा है, आप मोटे हो रहे हैं और आप उसे स्वीकार करते चले जा रहे हैं तो आप इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए हिलना-डुलना भी छोड़ देंगे और अपनी ज़बान के गुलाम बनकर आवश्यकता से अधिक खाना-पीना शुरू कर देंगे! आप बहुत सी अज्ञात बीमारियों को भी स्वीकार करना शुरू कर देंगे जबकि आपका वज़न आसमान छू रहा होगा। आप घुटनों के दर्द को और पीठ के दर्द को भी स्वीकार कर लेंगे क्योंकि आपने अपने मोटापे को स्वीकार कर लिया है। तब आप चीजों को, चाहे वे जैसी भी हों स्वीकार करते चले जाएँगे और इस तरह उनके साथ होने वाले परिवर्तनों की ओर से आँखें मूँद लेंगे।

तो नहीं, मैं इस विचारसरणी का भी समर्थन नहीं करता। मुझे लगता है कि हमें सिर्फ स्वस्थ बने रहने और भीतर से सुकून और संतुष्ट महसूस करने पर ध्यान देना चाहिए। आखिर आप यह तो नहीं कह सकते कि दस मिनट चलते हुए, जब आपका घुटना दुखने लगता है तब आप खुश होते हैं, आपको सुकून मिलता है। मुझे इस बात पर सहमत करने की कोशिश भी न करें कि दिन भर सेब खाते रहने के बाद आपको अब भी सेब खाने की तीव्र इच्छा हो रही है।

इन आम खूबसूरत बालाओं का आदर्श बनावटी, विकृत और झूठा है क्योंकि हम सब अलग हैं और एक-दूसरे के फ्रेम में फिट नहीं हो सकते। अगर आप एक या दो इंच बड़ी कमर वाले पैंट में अच्छा महसूस कर रहे हैं तो एक निश्चित वज़न पाने के लिए अपने आप को भूखा रखने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन जहाँ आप अपने शरीर से प्रेम करें और वर्तमान शरीर को स्वीकार करें वहीं कृपा करके उसे स्वस्थ रखने का प्रयास करें। अच्छा, स्वास्थ्यकर भोजन करें, बेकार का चटपटेदार खाना (जंक फूड) न खाएँ। चुस्त-दुरुस्त रहें, सक्रियता का आनंद लें!

इसे संतुलित रखिए, अपने लिए!

क्या आप अपने शरीर से नाखुश हैं, मनपसंद खाना खाने के बाद क्या आप पछताते या ग्लानि महसूस करते हैं? 23 फरवरी 2015

आज मैं एक ऐसे विषय पर लिखना चाहता हूँ, जो सबके, यानी पुरुषों और महिलाओं, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है: आपको अपने शरीर में अच्छा महसूस करना चाहिए। वह स्वस्थ होना चाहिए और उसकी देखभाल करना आपके लिए ज़रूरी है। लेकिन साथ ही आपको सुंदरता संबंधी किसी स्थापित आदर्श के पीछे भागने की ज़रूरत नहीं है और न ही ‘आदर्श वज़न’ की जानकारी देने वाले आंकड़ों को पाने की कोशिश करनी चाहिए। आपको ‘दुखी या नाखुश’ करने के प्रयास में उन्हें सफल मत होने दीजिए!

सबसे पहले तो मैं यह कहना चाहता हूँ कि वास्तव में मैं स्वस्थ भोजन और स्वस्थ वज़न का पक्षधर हूँ। जब मैं कहता हूँ कि आपको अपने शरीर से प्रेम करना चाहिए तो इसका अर्थ यह नहीं है कि आप अपने अतिरिक्त वज़न की अनदेखी करें, जो आपके शरीर में पीठ, कूल्हों और घुटनों की समस्याएँ और मधुमेह जैसी खतरनाक बीमारियाँ स्वास्थ्य संबंधी तकलीफ़ें पैदा कर रहा है। जब मैं कहता हूँ कि आप अपने शरीर में अच्छा महसूस करें तब आपको अस्वास्थ्यकर अतिरिक्त वज़न लेकर चलने के लिए प्रेरित नहीं कर रहा होता। वास्तव में वह तो बड़ा खतरनाक सिद्ध हो सकता है।

लेकिन मोटापे और दुबलेपन के बीच बहुत बड़ा विस्तार है। और यही वह बात है, जिसे अक्सर बहुसंख्य लोग स्वीकार नहीं करते। सुंदरियाँ, जिनका प्रचार अधिकांश मिडिया कर रहा होता है, हमेशा एक ही चीज़ दिखाते हैं: एक जैसी शरीर-यष्टि, एक जैसा वज़न, एक विशेष तरीका, जैसा आपको होना चाहिए। यह बेहद अस्वाभाविक या अप्राकृतिक है बल्कि यह असंभव है कि धरती पर रहने वाले सभी लोग उसे प्राप्त कर सकें और उनके जैसे दिखाई दें।

और इन आदर्शों की नकल करके इतने कम अंतराल में आप अपने शरीर को किस तरह बदल पाएँगे? दस साल से शरीर में मौजूद मांसल गोलाइयों को मिटाकर अगले दशक में आप शरीर को छरहरा किस तरह बना लेंगे? आपको एक ही शरीर प्राप्त हुआ है और आप उसमें में दोनों चीजें एक साथ नहीं पा सकते!

इसलिए मैं कहता हूँ कि अच्छा महसूस करना अत्यंत आवश्यक है! उस आदर्श वज़न सीमा से आपका वज़न ज़्यादा हो या कम, जब तक आप स्वस्थ हैं, आपको अच्छा महसूस करते रहना चाहिए! और इसमें भोजन, खाना-पीना और व्यायाम, सभी सम्मिलित हैं!

वास्तव में मैं तो अच्छे खाने का बहुत शौकीन हूँ और अपना दैनिक योगाभ्यास और व्यायाम भी मुझे बहुत प्रिय है। लेकिन मैंने बहुत सी औरतों से सुना है कि भोजन करते वक़्त वे अपनी एक-एक कैलोरी गिनती हैं और हर त्योहारी खाने के बाद या यूँ ही अपना मनपसंद खाना खाने के बाद अपराधी सा महसूस करती हैं-जब कि वास्तव में अपना मनपसंद खाना खुशी-खुशी ग्रहण करना चाहिए! नतीजा यह होता है कि भोजन करने का समय उनके लिए बड़ा त्रासदायक समय होता है और वह कई तरह के विकारों का कारण भी बन सकता है!

पुरुष भी इन समस्याओं से घिरे पाए जाते हैं, अंतर सिर्फ इतना होता है कि सुडौल मांसपेशियाँ बनाने के चक्कर में और भोजन के साथ ली गई अतिरिक्त कैलोरियों को पसीने के साथ बहाने के लिए उन्हें खेलकूद और व्यायाम की धुन लग जाती है। अच्छे, पसीना बहाने वाले, श्रमसाध्य व्यायामों से कोई गिला नहीं, लेकिन अगर आपको रोज़ जिम जाना पड़ता हो और हर त्योहारी खाने के बाद कैलोरी जलाने के लिए घंटों दंड-बैठक लगाना (वर्क-आउट करना) पड़ता हो, तो फिर यह एक असहज बाध्यता बन जाती है। यह व्यवहार अपने शरीर के प्रति प्रेम प्रकट नहीं करता।

खाने को लेकर कोई अपराधबोध या ग्लानि महसूस न करें, उसका आनंद लें। व्यायाम भी मज़ा लेते हुए करें, मजबूरी में नहीं। और अगर किसी दिन नहीं कर पाते या किसी दिन कम व्यायाम कर पाते हैं तो अफसोस न करें। किसी भी आदर्श के लिए बाहरी दबाव महसूस न करें- और अपने शरीर से प्रेम करें। जीवन का आनंद लें-अगर आप उसके विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर देंगे तो यह संभव नहीं हो सकता!

शिव लिंग – हिन्दू धर्म में लिंग की पूजा कैसे शुरू हुई – 17 फरवरी 2015

आज हिंदुओं का त्योहार शिवरात्रि है, जिसे शिव और उनकी पत्नी पार्वती के विवाह के दिन के रूप में मनाया जाता है। सभी हिन्दू मंदिरों में यह दिन साल की सबसे बड़ी शिव-पूजा का होता है। आप में से अधिकांश यह जानते होंगे कि शिव की पूजा शिवलिंग या शिवलिंगम के रूप में की जाती है, जो लिंग के आकार की एक मूर्ति होती है। आज मैं आपके सामने हिन्दू धर्मग्रंथों में वर्णित इस पूजा की कहानी प्रस्तुत करना चाहता हूँ।

यह कहानी शिव पुराण और कई अलग-अलग ग्रन्थों में वर्णित है और स्वाभाविक ही, सबमें थोड़ा-बहुत अंतर है। आपकी जानकारी के लिए मैं उनमें से दो कहानियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ:

शिव की पहली पत्नी का देहांत हो गया और शिव उसके दुख में बेचैन, पागलों की तरह नंग-धड़ंग जंगल-जंगल भटकते रहे।

जंगल में बहुत से ऋषि-मुनि रहा करते थे-जो बहुत सी सिद्धियाँ प्राप्त महात्मा थे। उनकी पत्नियाँ भी उनके साथ रहा करती थीं और जब शिव इस तरह भटकते हुए वहाँ पहुँचे तो उन पत्नियों ने उन्हें नंग-धड़ंग देखा। सम्पूर्ण दैवी वैभव के साथ दमकता शिव का नग्न शरीर देखकर वे अपना संयम खो बैठीं और आनंदित होकर उनके पीछे भागने लगीं और अंत में उन्हें छूने लगीं, उनसे लिपटने लगीं।

संयोग से उसी समय उनके पति यानी वे ऋषि-मुनि भी वहाँ पहुँच गए और अपनी पत्नियों को शिव के निकट आलिंगन में देखकर क्रोधित हो उठे और अनैतिकता और व्यभिचार का आरोप लगाते हुए शिव को बहुत बुरा-भला कहने लगे। सबने मिलकर अपनी सिद्धियों को एकत्र किया और शिव को, बल्कि उनके लिंग को शाप दिया कि वह कटकर धरती पर गिर जाए!

इसी कहानी का एक दूसरा रूप भी है, जिसके अनुसार वे ऋषि-मुनि शिव पर नुकीले पत्थर फेंकते हैं, जिनकी चोटों से उनका लिंग कटकर नीचे गिर जाता है।

बहरहाल, कुछ भी हो, लिंग धरती पर गिर जाता है और जहाँ वह गिरता है, उसी जगह स्थिर खड़ा हो जाता है और दावानल की तरह आग के शोले में तब्दील हो जाता है। जहाँ भी वह जाता-कैसे जाता था, यह न पूछिए, मेरी पत्नी ने भी पूछा और मैं उसका जवाब नहीं दे पाया-सामने आने वाली हर चीज़ स्वाहा हो जाती और हर तरफ हाहाकार मच जाता। दुनिया भर में अपशकुन दिखाई देने लगे और हर तरफ विनाशकारी घटनाएँ होने लगीं जैसे प्रलय आ गया हो। पर्वत गड़गड़ाहट के साथ टूट-फूटकर गिरने लगे, हर तरफ आग फैल गई और लोग आतंकित हो उठे। क्या संसार का अंत होने वाला है?

अब तो सभी देवता और ऋषि-मुनि घबरा गए और संसार के रचयिता, ब्रह्मा के पास गए। जानकारी मिलते ही वे उन सभी को लेकर शिव के पास गए और उनसे दया की याचना करने लगे। उनकी पूजा-अर्चना के पश्चात उन्होंने कहा: "कृपा करके अपना लिंग पुनः धारण कर लीजिए, वह सारे संसार को तहस-नहस कर देगा!"

उनकी आराधना से शिव प्रसन्न हुए और अपना लिंग वापस लेने के लिए राज़ी हो गए। लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी: "मैं अपना लिंग तभी वापस लूँगा जब आप उसकी पूजा-अर्चना शुरू कर देंगे!"

और इस तरह सारे संसार में, मंदिरों में शिव-लिंगों की स्थापना की गई और शिव के लिंग की पूजा-अर्चना की शुरुआत हुई।

आप में से कुछ लोग सोच रहे होंगे कि यह एक मज़ाक है! लेकिन नहीं, मज़ाक नहीं है-यहाँ इसी कहानी का एक और संस्करण प्रस्तुत है, उम्मीद है, आप पसंद करेंगे:

इस कहानी के अनुसार शिव का अपनी दूसरी पत्नी, पार्वती के साथ विवाह हो चुका है। और वे जंगलों में नंग-धडंग जंगलों में घूम रहे हैं किसी दुःख से नहीं बस ऐसे ही क्योंकि उनका मन कर रहा है और इस तरह उनका सामना ऋषियों की पत्नियों से होता है। पत्नियाँ उनके शरीर के मनभावन आकर्षण से अपने आपको बचा नहीं पातीं और उनसे लिपटने लगती हैं। लेकिन उनके पतियों को यह अच्छा नहीं लगता। वे शिव के लिंग को शाप देते हैं और वह वहीं धरती पर गिर जाता है और सारे संसार में हाहाकार और प्रलय की स्थिति पैदा हो जाती है।

इस संकट से निपटने के लिए सब इकट्ठा होते हैं और सोचते हैं कि शिव के लिंग को कौन पकड़ कर लाए! और अगर पकड़ भी लाए तो उसे कहाँ रखा जाए? जी हाँ, यह विचार आते ही इसका स्वाभाविक उत्तर भी उन्हें मिल गया: सिर्फ पार्वती ही शिव के लिंग को अपनी योनि में धारण कर सकती हैं!

वे सभी पार्वती की आराधना करते हैं और इस तरह इस प्रथा की शुरुआत होती है: योनि में स्थापित खड़े शिवलिंग की पूजा!

शिवलिंग के बारे में यानी हिन्दू धर्म के सबसे बड़े पाखंड के बारे में कुछ और कहानियाँ लेकर मैं कल फिर हाजिर होऊँगा। तब तक मेरे ब्लॉग का इंतज़ार करें।

भारतीय नाभियाँ या पश्चिमी पिंडलियाँ – क्या ज़्यादा सेक्सी है? 22 दिसंबर 2014

कुछ समय पहले एक महिला ने मेरे ब्लॉग पर एक टिप्पणी की थी। उस ब्लॉग में मैंने लिखा था कि भारतीय समझते हैं कि पश्चिम के लोग नग्न शरीर को लेकर अधिक सहिष्णु होते हैं। उसने इस बात पर उंगली रखकर पुनः एक बार मुझे यह समझने पर मजबूर किया कि वास्तव में यह सांस्कृतिक मामला है-और आप एकबारगी यह अंतिम फैसला नहीं सुना सकते कि पश्चिम के लोग तो नग्नता को सहजता से लेते हैं लेकिन भारतीय नहीं ले पाते! इस विषय पर थोड़ा विस्तार के साथ चर्चा करना उचित होगा!

यह तो स्पष्ट ही है कि जहाँ पश्चिमी देशों में बीचों पर नग्न विचरण करने के लिए बाकायदा अलग से इलाके नियत हैं, यहाँ, भारत में आप बिकनी उतारकर घूम सकें, इस बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। लेकिन ‘पश्चिम’ शब्द बहुत बड़े इलाके का द्योतक है। मुझे मालूम है कि कुछ समय पहले तक जहाँ जर्मन और फ्रांसीसी पर्यटक कमर से ऊपर नग्न होकर धूप-स्नान किया करते थे, ब्रिटिश लोगों को ऐसा करने में असुविधा होती थी और वे दूसरे देशों के पर्यटकों को कुछ ज़्यादा ही उन्मुक्त या स्वच्छंद मानते थे।

सन् 2010 के अपने अमरीकी दौरे में हम बीच पर गए और मैं एक वस्त्र पहने हुए था, जिसे मैं अक्सर बीचों पर पहना करता था- और उसे हमारे यहाँ लँगोटी कहा जाता है। हमारी आयोजक, एक महिला, जो हमारे साथ आई थी, घबरा गई और कहा कि पुलिस आकर एतराज़ कर सकती है! और देखिए, कि मैं कतई नग्न नहीं था!

कहने का अर्थ यह कि वस्त्र धारण करने के मामले में अलग-अलग देशों में अलग-अलग नियम और परंपराएँ हैं। जहाँ तक भारत का सवाल है, वे बड़े ढँके-छिपे रहना पसन्द करते हैं, बल्कि कहना चाहिए-पाखण्डी हैं, समुद्र में भी नहाते वक़्त पूरे कपड़े पहने रहते हैं। लेकिन, फिर भी यह पूरी तरह सच नहीं है!

भारत में बहुत से हिन्दू और जैन साधू देश भर में पूरी तरह नग्न घूमते रहते हैं! बाज़ारों, मुहल्लों में, आदमी, औरतों और बच्चों के सामने-और कोई एतराज़ नहीं करता। यहाँ तककि उनके बहुत से शिष्य होते हैं-अच्छी खासी भीड़, जो कुछ फुट की दूरी पर बैठे अपने गुरु के शिश्न का नज़ारा करते हैं और न तो उन्हें कोई शर्म आती है और न उनके शिष्यों को, जिनमें बहुत सी महिलाएँ भी होती हैं। वे अपने नग्न गुरु के पैर पखारते हैं। आप किसी भी पश्चिमी शहर में मादरज़ाद नंगे घूमकर देखिए, पुलिस आकर आपको तुरंत अंदर कर देगी! फिर आप समझाते रहिए कि आप संत हैं और उपासना का आपका यही तरीका है, आपको कोई छूट नहीं मिलने वाली!

महिला वस्त्रों को लेकर भी यही बात है-जब लोग दूसरी संस्कृतियों की, खासकर पश्चिमी संस्कृतियों की, अशालीनता या अभद्रता की बात करते हैं तब अक्सर बड़ी समस्या पेश आती है। लेकिन हमारे आश्रम में आने वाले विदेशी मेहमान इसका ठीक उल्टा सोचते हैं! वे जानते हैं कि भारत में पिंडलियों का प्रदर्शन यौनोत्तेजक माना जाता है और उन्होंने पढ़ रखा होता है कि इसी कारण भारतीय महिलाएँ हमेशा टखने तक की साड़ियाँ, घाघरे या पैंट पहनती हैं! लेकिन उनके लिए पिंडलियों का दिखाई देना उतना उत्तेजक नहीं होता, जितना पूरी पीठ और पेट का खुला होना, जैसा कि साड़ियों में या चोली-घाघरे में भारतीय महिलाओं का होता है!

जी हाँ, अधिकांश पश्चिमी लोगों को साड़ी बहुत सेक्सी वस्त्र लगता है क्योंकि उसमें महिलाओं की पूरी पीठ और पूरा पेट साफ़ दिखाई देते हैं! जर्मन महिलाओं के लिए पेट उनके शरीर का वह हिस्सा है, जिसे वे सिर्फ बीचों पर ही खुला छोड़ती हैं क्योंकि बीचों पर वे बिकनी पहनती हैं-बल्कि वहाँ भी वे अक्सर नहाने के वस्त्र पहनकर पेट को ढँके रखना उचित समझती हैं! लेकिन वे स्कर्ट पहनकर मज़े में दफ्तर जा सकती हैं, भारतीय महिलाएँ जिसे पहनने की कल्पना भी नहीं कर सकतीं।

चर्चा का निष्कर्ष स्पष्ट है: बिना उनके देशों की परिस्थितियों को भली प्रकार से जाने-समझे किसी के बारे में कोई गलत धारणा न बनाएँ, यह भी सोचें कि दूसरे भी किसी न किसी कारण से आपके बारे में वैसा ही सोच सकते हैं!

आयुर्वेद संबंधी हमारी कार्यशालाओं में अदृश्य शक्तियों से सम्बंधित कोई काम नहीं होता – 29 सितंबर 2014

हमने हाल ही में अपना आयुर्वेदिक मालिश प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया था। वह काफी सफल रहा, सहभागियों ने बहुत कुछ सीखा और हम अपने ज्ञान को और सबसे बढ़कर, आयुर्वेदिक मालिश और उपचार के अपने सालों के अनुभव को दूसरों के साथ साझा करके बहुत खुश हुए। लेकिन एक बिंदु था, जिसमें हमें असुविधा महसूस हुई: जब सहभागियों ने हमसे इन मालिशों के अलौकिक शक्तियों से सम्बंधित पहलुओं को जानना चाहा।

आयुर्वेद का शब्दशः अर्थ है जीवन का विज्ञान। आयुर्वेद विश्रांति सत्रों में हम आपकी शारीरिक और मानसिक समस्याओं पर ध्यान केन्द्रित करते हैं और उन्हें आराम पहुँचाने की या संभव हो तो उनका उपचार करने की कोशिश करते हैं। मालिश शरीर को आराम पहुँचाती है और उससे आपके मस्तिष्क को भी आराम मिलता है। पीठ, कंधे, घुटने और शरीर के दूसरे अंगों में होने वाले दर्द के लिए उपचार उपलब्ध हैं। तनाव, अवसाद और अनिद्रा रोग का इलाज भी संभव है।

लेकिन हम मायावी ताकतों जैसा कोई काम नहीं करते।

वास्तव में हम इस प्रकार की किन्हीं अदृश्य शक्तियों जैसी किसी चीज़ पर विश्वास ही नहीं करते! हम जानते हैं कि कुछ लोग इस विज्ञान को, जिसका शरीर पर एक परिमेय, वास्तविक असर होता है, अदृश्य शक्ति जैसी चीज़ से, जिसे छुआ नहीं जा सकता, जिसे नापा नहीं जा सकता और न ही जिसकी कोई व्याख्या की जा सकती है, जोड़ने की कोशिश करते हैं। जिसके बारे में यह भी कहा जा सकता है कि उसका अस्तित्व ही नहीं है। मैं यह भी जानता हूँ कि मालिश से इलाज करने वाले (massage therapists), अपने धार्मिक विश्वासों के चलते इस तरह मालिश करते हैं, जो पूरी तरह अंधविश्वास से भरी हुई प्रतीत होती है: जैसे वे पूजा की वेदी पर मोमबत्ती जलाते हैं, वे उस टेबल को हाथों और अपने सिर से छूकर प्रार्थना करते हैं- शायद मदद हेतु या मरीज के इलाज हेतु या पता नहीं किसलिए। हम इस तरह का कोई कर्मकांड नहीं करते।

धार्मिक उपचारकों के इन कामों से और बहुत हद तक धार्मिक आयुर्वेद शिक्षकों के व्याख्यानों के कारण भी ऐसे व्यक्ति को, जो आयुर्वेद से जुड़ा हुआ नहीं है, यह गलतफहमी हो सकती है कि यह सब भी आयुर्वेद के हिस्से हैं, कि आयुर्वेद का संबंध ऊर्जा से भी है। लेकिन यह मूलतः ऐसा विज्ञान है, जिसका असर प्रमाणित किया जा सकता है।

एक्यूप्रेशर पॉइंट्स आप स्वयं दबाते हें, खिंची हुई मांसपेशियों पर आप स्वयं अपने हाथ फेरते हैं और आप खुद ही जानते हैं कि तकलीफदेह जोड़ों पर किस तरह हाथ चलाया जाए! स्वाभाविक ही आप सामने वाले की मदद कर रहे होते हैं, स्वाभाविक ही वहाँ एक शांत वातावरण होता है और एक भीतरी नीरवता का एहसास होता है, जो आपको अपना काम बेहतर तरीके से अंजाम देने में मदद करता है। हमारा विचार है कि यह सब आपसे संबन्धित है, आपकी भीतरी स्थिति और आपके काम से संबन्धित है न कि किसी बाहरी शक्ति से। इसके मनोवैज्ञानिक असर के अलावा हम नहीं मानते कि वे सब धार्मिक और अंधविश्वास से पूर्ण कर्मकांड आपके लिए या आपके सामने पड़े व्यक्ति के लिए किसी भी तरह उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।

यह स्पष्ट है कि अगर आप यह अपेक्षा करते हैं कि हमारी प्रशिक्षण कार्यशालाओं में ये सब चीज़ें सिखाई जाएँगी तो आपको निराशा ही हाथ लगेगी। हम आपको किसी भी तरह का अनुष्ठान, कर्मकांड या पूजा करने का तरीका नहीं बता सकते और न ही किसी बाहरी उपचारक शक्ति से प्रार्थना ही कर सकते हैं कि वह आकर आपके सामने पड़े व्यक्ति का इलाज कर दे। आप खुद यह सब करने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन हम यह सब आपको सिखाने में असमर्थ हैं। सिर्फ इसलिए कि हमारा इन चीजों में विश्वास ही नहीं है।

हमारे सहभागी आश्रम से आयुर्वेदिक मालिश के ज्ञान और अभ्यास का प्रशिक्षण लेकर प्रसन्नचित्त और संतुष्ट होकर ही वापस लौटे। संभव है वे ऊर्जा संबंधी बिन्दुओं को न समझ पाए हों मगर हम इस संबंध में अपना दृष्टिकोण उनके सामने रखने में सफल हुए। लेकिन इस घटना से हमें एक बात समझ में आई और वह यह कि हमें अपनी वेबसाइट पर यह नोट लगाना चाहिए कि हमारे कार्यक्रमों और कार्यशालाओं में अदृश्य शक्तियों संबंधी कोई बात शामिल नहीं होती। बिल्कुल भी नहीं। इससे हमें प्रशिक्षण हेतु उपयुक्त व्यक्तियों का चुनाव करने में मदद मिलेगी और उन्हें भी यहाँ आकार निराशा का सामना नहीं करना पड़ेगा।

नग्नता से अधिक नैसर्गिक और क्या हो सकता है? 7 सितम्बर 2014

मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ कि सन 2006 में अपने स्वीडन प्रवास के दौरान आयोजित आध्यात्मिक उत्सव में मुझे कई लाजवाब दोस्तों से मुलाकात का मौका मिला। उनमें एक स्वीडिश दम्पति भी थे, जिन्होंने अपनी एक कार्यशाला आयोजित की थी और जो मेरी कई कार्यशालाओं में सहभागी हुआ करते थे। उस उत्सव के दर्मियान और बाद में भी उन्हें बेहतर ढंग से जानने का मुझे काफी मौका मिला। उस शानदार गर्मियों के बारे में आपको कुछ और विस्तार से बताना चाहता हूँ।

यह दम्पति मेरी तरह कार्यशालाएँ आयोजित करते थे मगर तरह-तरह के बहुत से विषयों पर। मैं उन्हें कभी बच्चों के साथ चित्रकारी करते देखता, कभी सहभागियों को नग्न शरीरों पर चित्रकारी करना सिखाते हुए और मुझे यह भी पता चला कि वे यौनिकता पर व्याख्यान भी दिया करते थे। मेरी कुछ कार्यशालाओं में आकर वे उनमें सक्रिय हिस्सा लेते और उनका पूरा लुत्फ़ उठाते।

कार्यक्रमों से अवकाश मिलने पर कभी-कभी हमें बात करने का मौका भी मिल जाता और कुछ समय बाद ही हम एक-दूसरे को बेहतर जानने लगे। वह फोटोग्राफर भी था और उसने मुझे बताया कि पिछले बीस सालों में एक भी दिन ऐसा नहीं गुज़रा जब उसने किसी न किसी चीज़ का कोई फोटो न लिया हो। अपनी कला के प्रति उसके समर्पण से मैं बहुत प्रभावित हुआ! उत्सव में भी वह फोटो लेता रहा था और बाद में मेरे भी कुछ फोटो लिए।

जब उन्होंने मुझसे पूछा कि उत्सव के समापन के बाद मेरा क्या कार्यक्रम है तो मैंने उन्हें बताया कि कुछ दिन मैं अवकाश पर हूँ और अगले हफ्ते तक यहीं रहूँगा और उसके बाद ही जर्मनी लौटूँगा। उन्होंने तुरंत मुझे अपने यहाँ, स्टॉकहोम आमंत्रित कर लिया, वह भी मेरे साथी संगीतज्ञ के साथ।

स्वाभाविक ही मैंने उनका आमंत्रण स्वीकार कर लिया और उत्सव समाप्त होते ही हम उनकी कार में बैठकर सीधे उनके घर, स्टॉकहोम की ओर रवाना हो गए।

उन्होंने मुझे घुमाया-फिराया, अपने कुछ दोस्तों से मिलवाया और इस देश को और करीब से जानने का मौका पाकर मैं बड़ा खुश हुआ! उत्सव के नैसर्गिक वातावरण के बाद मुझे अपेक्षा थी कि मैं फ्रैंकफर्ट जैसे किसी बड़े शहर जा रहा हूँ क्योंकि स्टॉकहोम स्वीडन की राजधानी है। लेकिन अपेक्षा के विपरीत मैं एक शांत मगर बहुत ही खूबसूरत जगह पर पहुँच गया था।

और सबसे बड़ी बात, यहाँ भी प्रकृति के इतना करीब! गर्मी के उस मौसम में मेरे मित्रों ने तैराकी का मज़ा लेने का कार्यक्रम तय किया। दस मिनट के भीतर हम सब बीच शहर से जंगल के प्राकृतिक वातावरण में पहुँच गए, जहाँ मेरे संगीतकार, मेरे मित्र दम्पति और उनके एक मित्र के सिवा कोई भी दिखाई नहीं देता था। हम जंगल के बीचोंबीच स्थित एक झील के किनारे पहुँच गए। हर तरफ चारों ओर हरियाली थी और सन्नाटा पसरा था।

मेरे मित्र तुरंत झील के बिल्कुल किनारे पहुँचे, अपने कपड़े उतारे और पानी में कूद पड़े। वहाँ पूरी तरह नंगे होकर तैरना उनके लिए इतनी सामान्य बात थी कि उसके बारे में उन्होंने दूसरी बार नहीं सोचा। बड़ी सहजता से सभी कपड़े उतारे और पानी में कूद पड़े! और उन्हें इतनी स्वाभाविकता से यह करते देख मुझे लगा कि यहाँ ज़्यादा संकोच करना या शर्म दिखाना हास्यास्पद होगा! तो मैंने भी जो कुछ भी मेरे शरीर पर था उतार फेंका और कूद पड़ा झील के साफ, शीतल जल में और बहुत देर तक उनके साथ नहाता रहा।

मेरा भारतीय संगीतज्ञ संकोच करता रहा और चड्डी पहने ही पानी में उतरा और ज़्यादा गहराई तक हमारे साथ नहीं आया क्योंकि वह तैरना नहीं जानता था।

पानी में तैरने का मेरे जीवन का वह सबसे अद्भुत अनुभव था! चारों तरफ निस्तब्धता व्याप्त थी और हम प्रकृति के साथ अठखेलियाँ कर रहे थे। दूसरा देखने-सुनने वाला लोई न था!

साधारणतया मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो न्यूडिस्ट बीचों पर सैर करना पसंद करते हैं। हालाँकि मैंने ऐसे बीच बहुत देखे हैं मगर वहाँ जाकर निःसंकोच अपने कपड़े उतारना मुझे रास नहीं आता। लेकिन यहाँ मामला कुछ दूसरा ही था! यहाँ ‘न्यूड बीच’ का कोई संकेतक नहीं लगा था और न ऐसी कोई हिदायत थी की आपको इस सीमा तक नंगा होना है या इस तरह नहाना या तैरना है और अगर कुछ पहनना ही है तो क्या पहनना है। सब कुछ प्राकृतिक था, पूरी तरह खुला और मुक्त!

डेनमार्क की इस यात्रा में मैंने जाना कि साधारणतया स्केण्डीनेवियन देशों के निवासी अधिक प्राकृतिक हैं और अपनी नग्नता को लेकर अधिक खुले और आज़ाद। मेरे लिए यह अनुभव चिर अविस्मरणीय रहेगा!

खूबसूरती अलग-अलग रूपों में सामने आती है! खूबसूरती के गलत मानदंडों से हानि- 28 अगस्त 2013

कल मैंने समझाया था कि कैसे कुछ लोग, खासकर औरतें, अपने आप की तुलना दूसरों से करते हैं, अपनी संदेहास्पद विजय के लिए अपने स्वाभिमान को ताक पर रख देते हैं और जब तुलना में वे हार जाते हैं तो उन्हें बुरा लगता है। यह तो होता ही है कि अकेले में इस विषय में सोचकर आपको दुख होता है, लेकिन आप यह भी समझें कि खूबसूरती के जिस आदर्श के पीछे आप भाग रहे हैं वह आपके लिए और भी बहुत सी समस्याएँ लेकर आता है।

मुझे लगता है कि इस बारे में चर्चा करके वक़्त बरबाद करने की कोई ज़रूरत नहीं है कि खूबसूरती के जिन आदर्शों से अधिकांश महिलाएं अपने शरीर की तुलना करती हैं वह वास्तविकता पर आधारित है या नहीं। मीडिया जिस छवि को दर्शा रहा है उन्हें कम्प्युटर द्वारा सुधारा गया है, जिन्हें दिखाया जा रहा है उन्होंने उस वक़्त काफी मेकअप किया हुआ होता है, प्रकाश-व्यवस्था उनके पक्ष में होती है, परन्तु वे वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में अभिनय नहीं कर रही होतीं और सबसे बढ़कर, वैसा दिखाई देना उनका व्यवसाय होता है। इस तरह, जो छवि आप आम तौर पर पोस्टर्स पर, पत्र-पत्रिकाओं में, टीवी पर देखती हैं वह आपके दिमाग में ज़बरदस्ती प्रवेश कर जाता है और आप भूल जाती हैं कि यह आपको इसलिए दिखाया गया है कि आप उस विज्ञापित वस्तु को खरीदें। और आप इसे सुन्दरता का मानदंड मान लेते हैं कि आपको और सभी महिलाओं को खूबसूरत कहलाने के लिए उसके जैसा दिखाई देना चाहिए!

मुख्यधारा का मीडिया इस बात की परवाह नहीं करता कि कई तरह के शरीर वाले लोग होते है! आखिर जिन्हें आप देखते हैं, पुरुष और महिलाएं, वे बहुत थोड़े से चुनिन्दा लोग होते हैं, कड़े मानकीकरण और कसौटियों से, जिन पर अधिकांश लोग पूरा नहीं उतर सकते, गुज़रकर आए हुए लोग।

इसका नतीजा स्पष्ट है: सभी लोग सोचते हैं कि यह साधारण और सामान्य-सी बात है और उनकी तरह दिखना चाहते हैं। अगर वे इसमें असफल होते हैं तो वे सोचते हैं कि वे उतने खूबसूरत नहीं हैं-जब कि यह वास्तव में बिल्कुल असंभव है! और यह सत्य बहुत सी महिलाओं को निराश कर देता है, जो बड़ी ईमानदारी से अपना वज़न कम करने की कोशिश कर रही थीं, या टीवी में दिखाई जा रही महिला की तरह की देहयष्टि बनाने की कोशिश कर रही थी! वे इसमें सफल नहीं हो सकतीं और इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे, हो सकता है कि उनकी शारीरिक बनावट ही बिल्कुल अलग हो!

यह देखते हुए, कई इस प्रयास से ही अपने आपको मुक्त कर लेती हैं। वे देखती हैं कि ‘खूबसूरत’ माने जाने का एकमात्र तारीका यही है कि उनके जैसा दिखाई दिया जाए-लेकिन वे कभी भी उसमें सफल नहीं हो पाएँगी, इसलिए कोशिश करने से क्या लाभ? उनमें कसरत करने का उत्साह नहीं रह जाता, घूमने-फिरने और अपने शरीर के लिए कुछ करने की इच्छा ही नहीं रह जाती। सिर्फ एक ही कारण वे देखती हैं और वह है प्रतिस्पर्धा या एक लक्ष्य, जिसे पाना है, मगर जब यह संभव ही नहीं है तो कोशिश ही क्यों करें? वे जानती हैं कि वे कभी भी जीत नहीं पाएँगी।

समाज जिस तरह से चल रहा है और खूबसूरती के अस्वाभाविक, और अवास्तविक मानदंडों को बढ़ावा दे रहा है, उसे बदलने के अलावा इस समस्या का एक समाधान यह है कि कसरत, स्वास्थ्यप्रद खान-पान और अपने शरीर के प्रति अपने नज़रिये को बदला जाए। आपको समझना चाहिए कि आप स्वास्थ्यवर्धक भोजन इसलिए नहीं करते कि आपका वज़न कम हो और आप किसी और की तरह दिखें। आप सबेरे सैर करने इसलिए नहीं जातीं या दौड़ इसलिए नहीं लगातीं या तैरने इसलिए नहीं जातीं कि आपका शरीर किसी दूसरे जैसा हो जाए। आपको यह सब किसी दूसरे के लिए नहीं बल्कि अपने लिए करना चाहिए!

यह सब अपने लिए कीजिए! अच्छा, स्वास्थ्यवर्धक भोजन कीजिए क्योंकि आप अच्छा महसूस करें! व्यायाम कीजिए क्योंकि आपका मन प्रसन्न रहे और आपका शरीर पुनः तरोताजा हो जाए, आप स्फूर्ति महसूस करें! वज़न सीमा में रहेगा तो आपको लाभ होगा किसी और को नहीं! स्वस्थ रहने के लिए यह सब कीजिए क्योंकि आप अपने शरीर से प्रेम करती हैं, क्योंकि आप खुद से प्रेम करती हैं!

अगर पर्याप्त लोग इस तरह व्यवहार करें तो हो सकता है कि विज्ञापन कंपनियाँ, फिल्म इंडस्ट्री और समाज भी धीरे-धीरे यह समझ जाएंगे कि हर व्यक्ति के अंदर सुंदरता है, अलग-अलग अनंत आकारों और रूपों में!

दूसरों से तुलना करने पर न तो आपकी सुन्दरता बढ़ती है न ही घटती है- 27 अगस्त 2013

कल मैंने बताया था कि लोग लगातार हर बात में दूसरों से अपनी तुलना करके बहुत अवसादग्रस्त हो जाते हैं। जिस बात पर, खासकर महिलाएं, अपनी तुलना दूसरों से करती हैं, वह है सुंदरता। लेकिन मेरी नज़र में, इस तरह की तुलना ही महिलाओं में स्वाभिमान की कमी और अपने शरीर के बारे में कुंठा और अवहेलना का कारण है।

मुख्य समस्या फिर वही है: बाहरी बातों से अपनी तुलना करना। यह बिल्कुल असामान्य दृश्य नहीं है कि एक महिला किसी और के कमरे में प्रवेश करती हैं और पूरे कमरे का बारीक मुआयना करना शुरू कर देती हैं। यह पिश्टोक्ति होगी लेकिन अधिकांश महिलाएं यह बात मानेंगी-कम से कम दिल ही दिल में-कि वे दूसरी महिलाओं के शरीर और चेहरे को बड़ी उत्सुकता से देखती हैं और उनके वस्त्रों, उनकी देहयष्टि, उनकी तंदरुस्ती, केशसज्जा और यहाँ तक कि मेकअप आदि की तुलना खुद की इन्हीं चीजों से करती हैं। इस जांच के आधार पर उनका स्वाभिमान या तो बढ़ जाता है या कम हो जाता है। अगर सामने वाली महिला थोड़ी मोटी है या उसके चेहरे पर मुहासे हैं या बाल खराब हैं तो उसी अनुपात में वे खुद को ज़्यादा सुंदर अनुभव करने लगती हैं। इसके विपरीत अगर वह महिला उन्हें अपने आप से ज़्यादा सुंदर लगती हैं तो वे अपने वज़न या जिस बात को भी वे अपनी कमजोर नब्ज़ समझती हैं, उसके प्रति अचानक चैतन्य और सतर्क हो जाती हैं।

वैसे मैं यहाँ महिलाओं की बात कर रहा हूँ लेकिन यह सिर्फ महिलाओं की ही समस्या नहीं है! जब पुरुष यही बात करते हैं तो, हो सकता है, सुंदरता के विषय में न सोचें लेकिन कुल मिलाकर मतलब अलग नहीं होता! पुरुष, दूसरे पुरुषों (के पेट की, बाँहों की) की मांसपेशियाँ, उनकी दौलत और स्वाभाविक ही उनका बेफिक्र व्यवहार और विश्वस्त मुस्कुराहट देखते हैं और वैसा ही अनुभव करते हैं जैसा महिलाएं करती हैं!

लेकिन क्या सुंदरता तभी साबित होगी, जब आप तुलना में जीत जाएंगे? क्या आप वास्तव में तभी अपने आपको सुंदर समझ पाती हैं जब उस फिल्म-स्टार या सुपर-मोडेल स्त्री से, तुलना में, आपसे भी कम सुंदर महिला खड़ी हो? क्या आप वाकई यह सोचती हैं कि आप तभी सुंदर होंगी जब आप उस पोस्टर वाली या टीवी विज्ञापन वाली महिला जैसी दिखने लगेंगी?

मैं समझ सकता हूँ कि जब आप किसी तुलना में बेहतर सिद्ध होते हैं तो अच्छा लगता ही है (फील-गुड फैक्टर जैसी कोई चीज़ होती ही है), भले ही वह आपके मस्तिष्क में होता हो और आपकी विजय को देखने के लिए कोई दर्शक मौजूद नहीं है। लेकिन आपको समझना चाहिए कि वास्तव में आप वहाँ कर क्या रही हैं और इस बात पर पुनर्विचार करना चाहिए कि आपका खूबसूरती का मानदंड क्या है!

सच्चाई यह है कि सुंदरता का यह आदर्श, यह मानदंड किसी भी तरह से वास्तविक नहीं है क्योंकि हर मीडिया चैनल, हर मोडेल और अभिनेत्री के चेहरे को बेहतर दिखाने के लिए कंप्यूटर प्रोग्रामिंग करते हैं। और ऐसे अवास्तविक चित्र को आप अपना आदर्श मान लेती हैं, उसे अपने लिए एक लक्ष्य बना लेती हैं, जिसे पाने के लिए आप कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाती हैं और इसके अलावा, इसी मानदंड पर आप दूसरी औरतों को भी तौलने लगती हैं।

फिर प्रश्न वही है कि अपने आपको समझने (परिभाषित करने) और अपनी पहचान के लिए कि आप कौन हैं, आपको बाहर कितना देखना चाहिए? क्या आपको यह सोचना चाहिए कि "मैं हीथर से दुबली हूँ, मेरी त्वचा का रंग मेरी से बेहतर है, मेरे बाल लूसी से घने हैं?" क्या यह सोचना पर्याप्त नहीं होगा कि "मैं सुंदर हूँ?"

मैं यह कितनी बार कहूँ कि सुंदरता सिर्फ बाहर नहीं है और यह कि सुंदरता की समझ सबके पास अलग-अलग होती है! जब आप कमरे में अकेली होती हैं और तुलना करने के लिए कोई आदर्श या कोई प्रतिस्पर्धी आपके सामने नहीं होता, तब भी आपको खुद को सुंदर ही समझना (महसूस करना) चाहिए! और सुपरस्टार्स की भीड़ के बीच भी आपको अपनी सुंदरता का एहसास होना चाहिए। आप अनूठे हैं, आप जैसा कोई नहीं है और आप सुंदर हैं।

क्या आपके पति के पॅार्न देखने से आपका यौन जीवन प्रभावित हो रहा है? – 17 अगस्त 12

कुछ दिन पहले एक महिला ने हमें ईमेल किया। उसने लिखा कि उसका पति पॅार्न देखता है। वो ये जानना चाहती थी कि अब उसे क्या करना चाहिए। यह उसके लिए चिंता का विषय था, पर मुझे नहीं लगता कि उसके पति के लिए भी ये उतना गंभीर विषय था। मैंने इससे पहले भी इस तरह के कई प्रश्न सुने हैं इसीलिए इस विषय पर लिखने का मन बनाया।

एक बार काउंसलिंग के दौरान एक महिला ने बताया कि उसे अपने पति के पास से पॅार्न बरामद हुई। उसके लिए ये घटना ऐसी थी जिसके बाद से वो अपने पति को किसी और ही रूप में देखने लगी थी। इसको बताते समय वो न सिर्फ हैरान थी बल्कि सदमें में आ गई थी। मैंने महिला को सहज भाव से समझाते हुए कहा कि आप इसे बहुत बड़ा विषय मान रही हैं। फिर मैंने उससे पूछा कि आपके पति के पॅार्न देखने में बुराई क्या है? क्या आपकी सेक्स लाइफ वैसी नहीं है जैसी होनी चाहिए? उसने कहा कि वो अपनी शादीशुदा जिन्दगी से संतुष्ट है। मैंने फिर पूछा कि इस बात को जानने के बाद क्या वाकई कुछ बदला है? उसका जवाब था नहीं, सब कुछ वैसा ही है। मगर वो पॅार्न है! मैंने उसे समझाना शुरू किया कि वर्तमान समय में युवाओं के पास इंटरनेट के साधन आसानी से उपलब्ध हैं। ऐसी स्थिति में शायद ही कोई होगा जिसने पॅार्न न देखा हो। लेकिन इसका ये अर्थ कतई नहीं है कि ये लोग बुरे हैं।

एक अन्य मामले में महिला का कहना था कि उसके पति द्वारा पॅार्न देखने की वजह से वो अपनी देह के प्रति असहज हो जाती है। उसको ऐसा महसूस होता है कि जिन महिलाओं को उसका पति देखता है उनकी तरह मैं नहीं दिखती। ऐसा सोच-सोच कर वो पति के साथ बिताए पलों का आनन्द नहीं ले पाती। मैंने उस महिला से दो बातें पूछी, पहली ये कि वो स्वयं अपनी देह के बारे में क्या महसूस करती है? दूसरी, कि उसका पति क्या सोचता है? यहां मेरा मानना है कि कोई भी पुरुष पॅार्न फिल्म की हिरोइन को अपनी गर्लफ्रेंड नहीं बनाना चाहेगा। ज्यादातर पुरुषों को पॅार्न और वास्तविक संबंधों के अंतर का एहसास रहता है।

इस पूरे मामले पर मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि आपको अपने पति से बात करनी चाहिए। आप मात्र पॅार्न देखने की वजह से उन्हें बुरा नहीं कह सकती। वह जैसा है वैसा ही रहेगा। जब तक वो इसका आदी नहीं है तब तक सब ठीक है। अगर वो इसका आदी हो गया है तो किसी मनोचिकित्सक को दिखाकर समस्या का समाधान कराना चाहिए। अगर मैं पॅार्न की बात कर रहा हूं तो इसका मतलब ऐसी किसी सामग्री से नहीं है जिसमें कुछ भी गैर-कानूनी दिखाया जाता हो। पॅार्न समस्या का विषय तब तक नहीं है जब तक आपके वैवाहिक जीवन या प्रेम में इसके कारण कोई समस्या नहीं आती।

मैंने पहले भी पॅार्न पर लिखा है और बताया है कि जब मन में सैक्स की बात आती है तभी पॅार्न की भी बात आती है। सेक्स मन का नहीं शरीर और आत्मा विषय है। अगर आपको लगता हे कि आपके संबंधों में कुछ कमी है, आपको निश्चित तौर पर अपने पति से बात करनी चाहिए। आपको ये बात सुनिश्चित करनी होगी कि आप दोनों के संबंध आत्मा की गहराई रखते हैं या नहीं। केवल इस प्रश्न का उत्तर मिल जाने के बाद आपके मन में अन्य कोई प्रश्न नहीं आएगा।