एक छोटी सी करतूत आपका जीवन बदल सकती है- होशोहवास के साथ जिएँ! 11 दिसंबर 2014

मैं अपना एक विचार आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। मूलतः विचार यह है: जीवन बहुत कीमती है-और किस तरह पल भर के हमारे काम उसमें तब्दीली ला सकते हैं या उसे पूरी तरह बरबाद कर सकते हैं। इसे हमेशा याद रखें!

जब आप अपनी आयु के मध्य में होते हैं, जब आप अपनी दिनचर्या में मसरूफ़ हो जाते हैं और सिर्फ घटनाओं, कार्यक्रमों, संयोगों और अपने कामकाज में उलझे होते हैं, कई बार आसपास हो रही घटनाओं का विस्तृत फ़लक आपकी नज़रों से ओझल हो जाता है। आप पाँच-पाँच काम एक साथ कर रहे होते हैं और जब आप उनमें उलझे होते हैं तब आप शुरू में ही एक कदम आगे रख चुके होते हैं। आप परेशान हो जाते हैं, आप उत्तेजित होते हैं और जबकि आप काम करते हुए भीतर ही भीतर अपने आप से जूझ रहे होते हैं। अपने आपसे, आसपास उपस्थित लोगों से लड़ते हैं और यह एक काल्पनिक संघर्ष होता है, जो आपको कहीं का नहीं छोड़ता। वह आपके विचारों को भीतर जकड़ लेता है, आपका मस्तिष्क सुप्त होता है और सिर्फ आपके हाथ मशीन की तरह काम कर रहे होते हैं।

आपका जीवन बीतता रहता है और आप बिना कुछ सोचे-विचारे ज़िंदगी जीते रहते हैं। आपको यह भी पता नहीं होता कि आप कर क्या रहे हैं।

आप भूल जाते हैं कि आपकी एक हरकत आपके जीवन को पूरी तरह बदलकर रख सकती है। घर में दिखाई गई लापरवाही का एक पल। एक जलती मोमबत्ती आपके धक्के से लुढ़क जाए, गॅस ठीक से बंद नहीं हुई। भीड़ भरे यातायात में गफलत। गाड़ी चलाते हुए चूक हो जाए। आगे बढ़ाया गया एक कदम गलत पड़ गया क्योंकि आपका ध्यान नहीं था कि आप किस जगह कदम रख रहे हैं।

ये भूलें आपका जीवन समाप्त कर सकती हैं। ये बातें या ये छोटी-छोटी घटनाएँ आपको सम्पूर्ण रूप से बदलकर रख सकती हैं-शारीरिक रूप से, मानसिक रूप से या भावनात्मक रूप से।

इसे याद रखें और पूरे होशोहवास के साथ ज़िंदगी गुजारें। उस पल पर ध्यान केन्द्रित करें जो अभी बीत रहा है-अपनी आध्यात्मिक यात्रा के अगले कदम के रूप में नहीं। जी नहीं, बल्कि ठीक तरह से, व्यवस्थित रूप से जीने के लिए, जिससे एक लापरवाह पल के लिए बाद में आपको कोई पछतावा न हो।

यह ब्लॉग कल की घटनाओं से प्रेरित है। इस पर मैं अगले सप्ताह विस्तार से लिखूँगा।

ध्यान-योग कोई रहस्य नहीं है लेकिन परेशानी यह है कि आप ऎसी चीज़ नहीं बेच सकते, जो सबको उपलब्ध हो-13 नवंबर 2013

मुझे अंदेशा है कि मेरे कल और परसों के ब्लोगों को पढ़कर मेरे कुछ पाठक संशय में पड़ गए होंगे। वे सोच रहे होंगे कि पहले मैंने अपना गुरु का जीवन त्यागा, फिर धर्म त्यागा और नास्तिक हो गया और अब ध्यान और योग के विरुद्ध भी लिखना शुरू कर दिया है! मैं ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि ऐसी बात बिल्कुल नहीं है! जिस तरह ध्यान का प्रचार किया जाता है, उससे मेरी असहमति है। ऐसा ज़ाहिर किया जाता है कि ध्यान कुछ विशेष, चुने हुए आध्यात्मिक लोगों के लिए ही है, जबकि मैं यह सलाह देता रहता हूँ कि सभी इसे करें। मैं स्वयं इसे पसंद करता हूँ लेकिन मेरे लिए इसकी परिभाषा बिल्कुल भिन्न है! मैंने कुछ ब्लॉग भी ध्यान-योग के संबंध में लिखे हैं, जिसमें मैंने स्पष्ट किया है कि मेरे लिए ध्यान का अर्थ क्या है। आज भी उसी संबंध में यह ब्लॉग लिख रहा हूँ।

सबसे पहले मैं एक वाक्य में यह परिभाषा दे रहा हूँ: अंग्रेज़ी में मेडिटेशन, हिन्दी और संस्कृत में ध्यान वह अभ्यास है, जिसमें आप पूरी तरह वर्तमान में होते हैं, 100% जाग्रत होते हैं, हर तरह से वाकिफ कि आप क्या कर रहे हैं।

कभी भी मैं यह नहीं कहता कि ध्यान का लक्ष्य विचारशून्यता है। मैं यहाँ तक मानता हूँ कि ध्यान का अभ्यास करने के लिए आपको किसी खास आसन में बैठने की आवश्यकता नहीं है और न ही किसी विशेष श्वसन तकनीक या किसी और चीज़ की। आप अपना काम करते हुए भी ध्यानस्थ हो सकते हैं या बातचीत, चित्रकारी करते हुए या खेलते हुए और यहाँ तक कि संभोग करते हुए भी! आपको उस वक़्त पूरी तरह वहाँ होना चाहिए, वर्तमान में; भविष्य में नहीं और न अतीत में। उस क्रिया में पूरी तरह उपस्थित, बस यही मेरे लिए ध्यान है।

मुख्य बात यह है कि हर कोई ध्यान कर सकता है! आपको विशिष्ट होने की ज़रूरत नहीं है! यह सभी के लिए सहज सुलभ है और किसी भी वक़्त। ध्यान के लिए वर्षों के अभ्यास की आवश्यकता नहीं है और न ही आपमें किसी कलात्मक प्रतिभा का होना आवश्यक है। यह कोई जटिल क्रिया नहीं है और इसे करने के लिए आपको किसी लॉरी को दांतों से खींचने या लोहे की राड को हाथों से मोड़ने का करिश्मा दिखाने की ज़रूरत नहीं है! आप, जी हाँ आप भी इसे कर सकते हैं!

अब यह बताएं कि क्या यह अच्छा नहीं होगा कि आप जानें और आपका पड़ोसी न जाने? उसमें कुछ रहस्य या पेचीदगी हो तो क्या वह ज़्यादा रोचक नहीं हो जाएगा? यही वह विचार है जिसे गुरु और ध्यान का व्यापार करने वाले पसंद करते हैं और रुपया कमाते हैं! वे चाहते हैं कि आप न सिर्फ कुछ खास बल्कि अपने आसपास के लोगों से बेहतर महसूस करें और इसलिए वे ध्यान को कुछ विशिष्ट और जटिल बनाकर पेश करते हैं!

उनका यह व्यवहार, दरअसल, आपके अहं को बढ़ाने के लिए होता है न कि उसे कम करने के लिए! तो, जब आप पंद्रह मिनट तक ध्यान करते हैं तो आप चेतना की उच्च अवस्था में होते हैं! तो, आपको पहले वहाँ जाना पड़ता है और फिर एक खास मुद्रा में आसन लगाना होता है, आपको एक विशिष्ट वातावरण चाहिए और आप उसे धीरे-धीरे बढ़ाते हुए एक घंटे तक कर सकते हैं! फिर दिन के बचे हुए 23 घंटे आपकी चेतना कहाँ मंडराती रही? नीचे ज़मीन पर, अलसाई हुई, जैसे बाकी सभी लोगों की चेतना पड़ी होती है? इसलिए आप इस एक घंटे तक खुद को विशिष्ट समझने लगते हैं और अपने भीतर शांति का अनुभव करते हैं, व्यापक ब्रह्माण्ड के साथ एकाकार! लेकिन आप सारा दिन आनंद की उसी अवस्था में क्यों नहीं रह सकते?

जी हाँ, आप ध्यानस्थ होकर भी दिन के 24 घंटे अपना काम कर सकते हैं, खेल सकते हैं, किताब पढ़ सकते हैं और जो मर्ज़ी हो, वह कर सकते हें। आपको बिना एक स्थान पर बैठे, बिना विचारशून्यता को प्राप्त किए, लगातार आनंदमग्न रहना चाहिए!

स्वाभाविक ही, कोई गुरु आपको इतना बड़ा रहस्य नहीं बताएगा अन्यथा वे उस आश्चर्य मिश्रित प्रशंसा से वंचित हो जाएंगे, जो आपसे उन्हें प्राप्त होती है। ऐसा करने से उनका धंधा चौपट हो जाएगा! लेकिन सच्चाई यही है कि आप भी ध्यान कर सकते हैं। आपको सिर्फ सजग रहना है, चैतन्य रहना है, विचारशून्य नहीं!

आप खास हैं क्योंकि आप, आप हैं- इसलिए नहीं कि आप क्या करते हैं!-14 अगस्त 2013

उन अल्पसंख्यकों के लिए, जिन पर समाज द्वारा दबाव डाला जाता है, अपने कल के ब्लॉग के बाद आज मैं उन बहुसंख्यकों के बारे में कुछ शब्द कहूँगा, जो अल्पसंख्यकों जैसा बिल्कुल अनुभव नहीं करते बल्कि सोचते हैं कि वे वैसा ही महसूस करते हैं, जैसा समाज के दूसरे लोग महसूस करते हैं, वे जो वास्तव में ‘बहुसंख्यक समाज’ का ही हिस्सा हैं। क्यों? क्योंकि ‘बहुसंख्यक-ताड़ना’ जारी है, खासकर आध्यात्मिक क्षेत्र में, लेकिन कई लोग ऐसे भी हैं जो ईमानदारी के साथ वही चाहते हैं, जो वे कर रहे होते हैं और इस आचरण का उन्हें अधिकार भी प्राप्त है-भले ही इसका अर्थ यह निकाला जाए कि वे ‘बहुसंख्यक’ हैं, यानी उनका आचरण समाज के आम, सामान्य लोगों जैसा ही है। अगर आप उनमें से एक हैं तो आपको इस बात के लिए आत्मग्लानि नहीं होनी चाहिए!

आपको यह मज़ाक लगेगा कि मैं सोचता हूँ कि यह कहना ज़रूरी है लेकिन मुझे समझाने दीजिए कि क्यों मेरा विश्वास है कि बहुत से लोग ऐसे हैं, जो ऐसी धारणा रखते हैं। बहुत साल से लोग इस बारे में ‘जागृत’ हो रहे हैं और समझ रहे हैं कि वे समाज की परम्पराओं के अनुसार नहीं चलना चाहते और वही करना चाहते हैं जो उनका दिल कहता है। ऐसे कई आंदोलन भी चले हैं, जिन्हें आप ‘आध्यात्मिक आंदोलन’ कह सकते हैं, अगर आप एक शब्द में इसका आशय जानना चाहते हैं। वे सभी इस बात पर ज़ोर देते हैं कि वही कार्य करें जो आपको प्रसन्न करता है और मैं इस विचार की मूल भावना का पूरी तरह समर्थन करता हूँ। उनके अलग-अलग आग्रह (रास्ते) हो सकते हैं मगर ज़्यादातर लोग अपने अनुयायियों से यही एक बात कहते हैं कि आप विशिष्ट हैं!

जब कि मैं इस विचार की मूल भावना से सहमत हूँ कि हम सभी खास हैं, इस संदेश का एक और निहितार्थ है जिससे मैं पूरी तरह सहमत नहीं हूँ: वह यह कि आप खास हैं क्योंकि आप कुछ अलग कर रहे हैं। आप खास हैं क्योंकि आपके आसपास के वे सब लोग, वे ‘बहुसंख्यक’, वह ‘विशाल जनसमूह’ उतने जागृत (सचेतन) नहीं हैं, जितना कि आप हैं। आप खास हैं क्योंकि वे उन्हीं पुरानी बातों से चिपके हुए हैं, समाज की मान्यताओं के अनुसार काम कर रहे हैं, जिन्हें अब आप पसंद नहीं करते। आप खास हैं क्योंकि आप वह सब पसंद नहीं करते, जो वे पसंद करते हैं। आपको ऐसे लोग भी मिलेंगे, जो लगभग वही बातें पसंद करते हैं, जो आप पसंद करते हैं लेकिन अंत में आप अकेले ही अपने ज्ञान (जागृति) के रास्ते पर चलेंगे क्योंकि आप इतने खास हैं।

खैर, मैं इस विचार का समर्थन नहीं करता कि वे सारे लोग ‘चुनिन्दा लोग’ हैं। मैं नहीं समझता कि यह कोई ठीक विचार है कि लोगों को बताया जाए कि आपको दूसरों से इतना अलग होना चाहिए कि आप उनके जैसे न लगें, उनके साथ आपकी संगति बिल्कुल न बैठे। हाँ, मैं स्वयं लोगों से यह कहता हूँ कि यह ज़रूरी नहीं है कि आपकी संगति उनके साथ बैठे ही, लेकिन यह उस बात से बिल्कुल भिन्न बात है कि आप उनसे कहें कि उन्हें संगति बिठानी ही नहीं चाहिए। वे खास नहीं माने जाएंगे अगर वे सामान्य लोगों के साथ सहज महसूस करते हैं। कि उन्हें अपने सामान्य परिवेश में अजनबी महसूस करना चाहिए, या उसमें उन्हें बुरा लगना चाहिए। कि उन्हें नए दोस्त या अल्पसंख्यक लोगों के समूह को खोजना चाहिए और उसमें शामिल हो जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में, उन्हें भेड़िये की तरह समाज के बाहर भटकते रहना चाहिए।

जब आप अपने शरीर, खान-पान, मस्तिष्क और अपने तनाव या विश्रांति की तीव्रता और कुल मिलाकर अपनी कार्यपद्धति और व्यवहार के बारे में ज़्यादा सोचने लगते हैं या उसके बारे में अधिक चेतन होते हैं, आप महसूस कर सकते हैं कि आप कुछ अलग हैं। आप महसूस करेंगे कि आप कुछ गतिविधियों को पसंद नहीं करते हैं, जैसे शाम को किसी शराबखाने में धुत्त पड़े रहना या कहीं सामिष भोजन करना क्योंकि अब आपने शराब पीना छोड़ दिया है या शाकाहार अपना लिया है। हो सकता है कि अब आप कई ऐसे मामलों पर कोई राय देना पसंद नहीं करते, जिन पर पहले आप खुलकर बातचीत किया करते थे। लेकिन भले ही आप फिल्म देखना पसंद करते हैं, डिस्को में जाकर नृत्य करना पसंद करते हैं, या दोस्तों के साथ फुटबाल मैच देखना पसंद करते हैं तो आप अब भी खास और अनूठे हैं! आप अब भी एक अलग अस्तित्व के मालिक हैं और कोई भी आप जैसा नहीं है!

इसका संदेश यह है: जैसे आप हैं उसी रूप में आप अनूठे हैं। इसलिए कि आप, आप हैं, इसलिए नहीं कि आप ऐसा या वैसा करते हैं या नहीं करते। भले ही आप बहुसंख्यक समाज का हिस्सा हों, हैं आप विशिष्ट ही!

आप ‘ध्यान’ लगा रहे हैं या सिर्फ उसका दिखावा कर रहे हैं? – 5 अप्रैल 2013

वाह! कल की डायरी लिखते हुए मुझे अंदाज़ नहीं था कि मैं 'ध्यान' पर प्रश्नोत्तर प्रतियोगिता शुरू कर रहा हूँ! जहां एक ओर मेरे लिए खुशी की बात है कि अधिकतर लोग मुझसे सहमत हुए कि अपरा के साथ खेलते हुए समय बिताना समय बिताने का एक अच्छा तरीका है; वहीं कुछ लोगों ने प्रश्न उठाया कि क्या समय व्यतीत करने के इस तरीके को 'ध्यान' कहा जा सकता है। मैं 'अवस्थित' या 'ध्यानस्थ' कैसे रह सकता हूँ जबकि मुझे हर वक़्त इस बात का भी ध्यान रखना होता होगा कि वह गिर न पड़े, उसे चोट न लग जाए। यह भी कि स्वाभाविक रूप से अपरा के पीछे भागते हुए आप बहुत क्रियाशील होते हैं न कि बैठ कर अपने शरीर को विश्राम और मन को शांति पहुंचा रहे होते हैं, जैसा कि एक ध्यानस्थ व्यक्ति को करना चाहिए। मैं समझता हूँ, समय आ गया है कि मैं 'ध्यान' के बारे में पुनः अपने विचारों को विस्तार से प्रस्तुत करूँ।

पहले हम 'ध्यानस्थ' व्यक्ति की पारंपरिक और शास्त्रीय कल्पना को लें। ऐसा व्यक्ति पद्मासन लगाकर बैठता है, उसकी पीठ सीधी होती है, हाथ घुटनों पर ज्ञान मुद्रा में रखे होते हैं और अंगूठे और तर्जनी के पोर आपस में मिले होते हैं। 'ध्यान' के बारे में किंचित जानकारी रखने वाले किसी बच्चे को भी आप कहें तो वह इस 'ध्यान' मुद्रा का बड़ा आकर्षक प्रदर्शन आसानी के साथ कर देगा, बाकायदा ऊंचे स्वर में 'ॐ' शब्द का उच्चारण करते हुए। 'ध्यान' की यह एक मान्य कल्पना है।

ध्यानस्थ अवस्था में हमें क्या करना चाहिए इसकी भी एक बंधी-बंधाई रूढ़िबद्ध धारणा है। वह यह कि अपने सारे विचारों को स्थगित कर दो, मस्तिष्क को रिक्त करो, कुछ भी मत सोचो। यही वह आधारभूत धारणा है जिसके वशीभूत अधिकतर लोग यह सोचते हैं कि उनके लिए ऐसा कर पाना असंभव है। 'कुछ मत सोचो' ही वह आदेश है जो कुछ लोगों को डराता है और कुछ दूसरे लोगों के लिए एक चुनौती पेश करता है।

मुझे विश्वास है कि जिन्होंने गंभीरता से ध्यान लगाने का प्रयत्न किया है उन्होंने गौर किया होगा कि ध्यानस्थ होने का यह कोई जादुई नुस्खा नहीं है। अगर आपका रियाज़ नहीं है तो कुछ देर बाद ही इस मुद्रा में आपके पैरों और पीठ में दर्द शुरू हो जाता है और आपका मस्तिष्क अपने आपको विचारशून्य बनाने के स्थान पर अपनी मर्ज़ी के मुताबिक अपना काम करता रहता है। आप कसमसाने लगते हैं और अगर आप लोगों के बीच बैठे हैं तो आप कितना भी शांत बने रहना चाहें और सोचें कि अब आपको कुछ आराम मिल रहा है, खिंचाव के कारण अनजाने में कुछ गॅस अवश्य विसर्जित हो जाती है, जो लोगों को सुनाई देकर आपको हास्यास्पद स्थिति में पहुंचा सकती है।

मुझे लगता है हम सहमत होंगे कि यह ध्यान लगाने का कोई आदर्श तरीका नहीं है। मेरा विश्वास है कि जबकि ध्यान की यह छवि उसके प्रचार का एक लोकप्रिय विज्ञापन हो सकता है, है वह एक ढोंगी प्रदर्शन मात्र ही। ऐसे लोग भी हैं जिनके पास इस तरह ध्यान लगा सकने की शारीरिक और मानसिक शक्ति होती है और वे ऐसा बहुत समय तक भी कर सकते हैं मगर आम लोग, अगर उनमें ध्यान लगाने और उससे आत्मिक शांति प्राप्त करने की वाकई इच्छा है, तो कोई आसान तरीका ही पसंद करेंगे, अगर उन्हें पता हो कि ऐसा आसान तरीका भी हो सकता है।

जहां तक ध्यान लगाने की दूसरी विधियों का प्रश्न है इसकी कई विधियाँ हैं। एक है, नाद-ध्यान, जिसे हमारे मित्र थॉमस बहुत बढ़िया तरीके से करते हैं और जो संगीत के माध्यम से विश्रांति पहुंचता है और मस्तिष्क को एकाग्र करके उसे व्यर्थ विचारों से मुक्त करने में आपकी मदद करता है। दूसरा है, प्रकृति-भ्रमण, जिसके बारे में हमारे हिमालय भ्रमण पर निकले सहभागी मित्र आज रात आश्रम में वापस आकार हमें अवश्य बताएंगे ऐसा मुझे पूरा विश्वास है। तारों की छांव में या घने जंगल के सुनसान में पैदल चलना ध्यान का एक अनूठा तरीका हो सकता है, अगर आप वर्तमान में अवस्थित हो सकें। व्यायाम एक तरह का ध्यान हो सकता है और कला, पेंटिंग बनाना, जिसमें एक चित्र की रचना करते हुए आप अपनी कला में गुम हो सकते हैं। खाने का कोई पकवान बनाते समय, मसालों को अवचेतन में महसूस करते हुए आप उस पूरी प्रक्रिया में ध्यानस्थ हो सकते हैं। पौधा रोपते हुए, किताब पढ़ते हुए, यहाँ तक कि अपना कोई काम पूरी तल्लीनता के साथ करते समय भी आप ध्यानस्थ हो सकते हैं। जी हाँ, कंप्यूटर के सामने भी, शर्त यह है कि आपको उस खास क्षण में इस बात का इल्म होना चाहिए कि आप क्या कर रहे हैं।

जैसा कि मैंने बताया, जब आपको यह ठीक-ठीक पता होता है कि किसी एक क्षण में आप यथार्थ में क्या कर रहे हैं, तब मैं उसे ध्यानस्थ होना कहता हूँ। और जब मैं अपनी नन्ही बच्ची के साथ खेल रहा होता हूँ, जब वह इधर-उधर दौड़ती है और मैं उसके पीछे होता हूँ या वह कुछ भी कर रही होती है और मैं उसे ध्यान से देखता रहता हूँ तब मैं उस क्षण में होता हूँ, यह जानता हुआ कि मैं ठीक-ठीक क्या कर रहा हूँ। आपको अपरा जैसे किसी बच्चे के साथ होना चाहिए-जैसे ही आपका 'ध्यान' उससे हटा, उसने कुछ गलत हरकत की! और यही है सबसे बढ़िया 'ध्यान'।

क्या आप ध्यान साधना की अवधि से किसी की चेतना के स्तर को नाप सकते हैं? – 4 अप्रैल 2013

हमारे आश्रम में कुछ दिन पहले एक मेहमान आए थे। उनके साथ मेरी जो बातचीत हुई मैं उसे आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। हम ध्यान के बारे में बात कर रहे थे, ध्यान साधना के बारे में मेरे विचार और उसके बारे में आम तौर पर प्रचलित या प्रचारित विचार और दोनों के बीच भेद।

मैं अपने मेहमान के पास बैठा और कुछ इधर-उधर की बातचीत के बाद उन्होंने पूछा, 'अच्छा बताइए, आप दिन भर में कितना समय ध्यान में व्यतीत करते हैं?' वे मेरी तरफ जिज्ञासु आँखों से देख रहे थे और लगता था कि वे एक प्रभावशाली उत्तर की अपेक्षा कर रहे हैं। वे अनुमान लगा रहे थे कि मैं कम से कम एक घंटा तो अवश्य ही ध्यान और चिंतन-मनन में व्यतीत करता हूंगा, क्योंकि वे स्वयं काम पर जाने से पहले ऐसा करते हैं।

मैं उनकी तरफ देखकर मुस्कुराया और बताया कि क्योंकि हमारी नन्ही बच्ची अपरा हमारे साथ है, मैं उसके साथ खेलते हुए ध्यान में मग्न हो जाता करता हूँ। मेरा सारा ध्यान और चिंतन-मनन उसके साथ होना, उसके साथ समय बिताना है । उसे हँसाना, उसके साथ खेलना, किस तरह वह गेंद या दीवार पर चढ़ते छिपकली के पीछे भाग रही है यह सब देखते हुए ही मेरी ध्यान साधना हो जाती है।

मैं देख रहा था कि उनका मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया। कोशिश तो की, मगर मेरे इस ईमानदार उत्तर पर अपनी निराशा को वे छिपा नहीं पाए। मैं जानता हूँ कि उनके मन में यह विचार आ रहा है कि मैंने अपना आत्मनियंत्रण खो दिया है, कि मैं अपनी पहले अर्जित आध्यात्मिकता से बहुत नीचे आ गया हूँ। अपनी मानसिक स्थिति के बारे में मैं लापरवाह हो गया हूँ और यह भी कि उपयुक्त और धर्मसम्मत मार्ग से मैं भटक गया हूँ। अपने बारे में ऐसी बातें मैं पहले भी कई लोगों से सुन चुका था, इसलिए मुझे आश्चर्य नहीं हुआ।

ज़ाहिर है कुछ लोग मेरे विवाह या मेरी पत्नी जो एक पश्चिमी महिला हैं, को इसका दोष देने लगते हैं कि उसने इस आध्यात्मिक या धार्मिक व्यक्ति को बिगाड़ दिया और उसे उसकी आध्यात्मिक साधना से दूर कर दिया। जो ऐसा करते हैं वे नहीं जानते कि ध्यान साधना के बारे में हमेशा से मेरे विचार आम पारंपरिक विचारों से ज़रा हटकर रहे हैं। आम तौर पर यह धारणा है कि एक आध्यात्मिक व्यक्ति को विवाह नहीं करना चाहिए या बच्चे पैदा नहीं करने चाहिए।

लेकिन यह तो तब ठीक माना जाएगा जब आप ध्यान को किसी प्रतियोगिता ही तरह समझें। जो ध्यान लगाकर सबसे ज्यादा समय तक बैठ सकता है वह जीता! ऐसा व्यक्ति इस प्रतियोगिता में दूसरों से पहले ज्ञान प्राप्त कर लेगा या उसे ज्ञान प्राप्त हो चुका है! जो आधा घंटा भी एक मुद्रा में नहीं बैठ सकते वे तो अभी शुरुआत कर रहे हैं, हार चुके हैं, भौतिकवादी हैं और आध्यात्मिक व्यक्ति हैं ही नहीं!

मैं ध्यान साधना को बिल्कुल अलग दृष्टि से देखता हूँ। मैं नहीं समझता कि इसके लिए आपको पद्मासन लगाकर ही बैठना होगा, आँखें बंद करनी होंगी और गहरी सांसें ही लेनी होंगी। ध्यान का अर्थ है कि आपकी चेतना सदा वर्तमान में उपस्थित रहे, अतीत या भविष्य के बारे विचार स्थगित रखते हुए आपको बोध होना चाहिए कि आप उस क्षण क्या कर रहे हैं, कर भले ही कुछ भी रहे हों!

और ठीक यही मैं करता हूँ जब अपरा के साथ होता हूँ। आपके पास ध्यान लगाने के अलावा कोई मौका ही नहीं होता जब आप अपरा के साथ होते हैं क्योंकि वह उस क्षण आपका सारा ध्यान अपनी ओर खींचे रहती है। आपको उसे देखते रहना पड़ता है और आप वही अनुभव करते हैं जो वह अनुभव कर रही होती है। आप उसके चेहरे की ओर देखें तो आपको पता चल जाता है कि वह क्या सोच रही है। उसके साथ खेलना, बात करना, अपने विचारों की तरफ उसे आकृष्ट करना और अपनी दुनिया दिखाना; इन सब बातों का मुझ पर अद्भुत असर होता है जो ध्यान साधना ही है। इससे मुझे परम आनंद और असीम शांति का अनुभव होता है।

बहुत बड़ा साधक होने का दिखावा करने के लिए अगर मुझे दिन के कई घंटे किसी बंद कमरे के एकांत में रहना पड़े तो वह मेरी कमी महसूस करेगी और मैं भी उसे मिस करूंगा। अपनी बेटी के साथ होना ही मेरा ध्यान है और मैं प्रसन्न हूँ कि मैं उसके साथ इस तरह समय व्यतीत कर सकता हूँ और उसे और अपने आपको खुश कर पाता हूँ।

क्या भारत आंतरिक शांति के लिये सही जगह है? – 20 नवम्बर 2012

कुछ समय पूर्व एक महिला के साथ मैंने परामर्श सत्र किया था जो किसी तलाश में भारत
आई थी। यहां उनके इस प्रश्न का दिया गया जवाब है कि कैसे उनके मन में यहां की यात्रा का
विचार आया। वह किस चीज की तलाश कर रही थी? स्वयं की, आंतरिक शांति, अध्यात्म और वह
सब कुछ जो इनके साथ साथ हो। और कहां है वह स्थान जहां अधिकतर लोग इनकी तलाश करेंगे?
भारत, आध्यात्मिकता का देश, योगियों का, दार्शनिकों का, संत और साधुओं का। उन्होंने मुझसे
पूछा क्या मैं यह समझता हूँ कि उन्हें वह सब कुछ प्राप्त हो जायेगा जिसकी उन्हें तलाश है।

निश्चय ही यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उतर आसानी से नहीं दिया जा सकता। अंशतः इसलिये कि यह सब कुछ बहुत हद तक व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर करता है। हालांकि इसके कुछ पहलू सबके लिये सार्थक हैं|

सर्वप्रथम कि भारत जाने के पहले उसके बारे में संपूर्ण जानकारी प्राप्त कर ले। इस भ्रम को लेकर यहां न आयें कि भारत एक आदर्श (परफ़ेक्ट) देश है जहां हर व्यक्ति प्रतिदिन योग करता है, जहां प्रेम के अतिरिक्त दूसरे किसी तरह का व्यवहार लोग नहीं करते और जहां प्रत्येक व्यक्ति स्वयं और दुनिया के साथ शांति में हैं। अगर आप यह विश्वास करते है- और मुझे पता है कि यह एक सामान्य भ्रम है विशेषतः उन लोगों का जो गहरे रुप में अध्यात्मिक दृश्य में संलिप्त है- आपको निराशा होगी। जी हां भारत एक अत्यंत धार्मिक देश है, और अधिकांश लोग, अमीर और गरीब, प्रेमपूर्ण व्यवहार करते हैं इसके बावजूद भी यह एक सामान्य देश है सातवाँ स्वर्ग नहीं। पुस्तकों का अध्ययन करें या समाचार पत्रों का लेख पढ़ें, एक-दो डाक्यूमेंट्री (वृत्तचित्र) देखें, यहां के समाज में भी बहुत सारी समस्यायें है जो आपके शांतिपूर्ण समय के कुछ पलो को बाधित कर सकती हैं।

अगला प्रश्न जैसा मैं समझता हूं, कि आपको आवश्यकता है स्वयं से पूछने की कि वस्तुतः आप अपनी आंतरिक शांति की तलाश कहां कर रहे हैं। कहां आप आध्यात्मिकता की तलाश कर रहे है और आपकी समझ से कहां आपको आंतरिक शांति की प्राप्ति होगी? आप किसी गुरु, किसी धर्म के आचार्य के पास जाकर यह जानना चाहते है कि वह व्यक्ति आपको बताये कि कौन हैं आप? अगर ऐसा मामला है तो मैं आपको कहता हूं आप बहुत सफ़ल नहीं होंगे। इसके विपरीत इस बात का खतरा ज्यादा है कि आपकी तलाश दिग्भ्रमित करने वाले संप्रदाय या ब्रेन वाश करने वाले किसी धर्म तक जाकर समाप्त हो जायेगी।

मैं जानता हूं कि एकमात्र रास्ता है, जिस पर चल कर आप कुछ प्राप्त कर सकते है जो आपकी जरूरत को पूरा कर सकता है, आपकी इच्छा और आपके खालीपन को भर सकता है, वह है कि आप इन्हें बाहर न तलाशे। आपको अपने अंदर पैठना होगा अपनी आंतरिक शांति की प्राप्ति के लिये, मात्र भारत आ जाने से आप स्वयं को नहीं प्राप्त कर सकते आप स्वयं को अपने अंदर ही पायेंगे।

इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं सबको भारत यात्रा करने से हतोत्साहित कर रहा हूं और मैं यह विश्वास नहीं करता कि यहां आकर कोई व्यक्ति स्वयं को नहीं पा सकता और सबको अपने घर में ही रहना चाहिये। बल्कि इसके विपरीत मेरा मानना है कि यह बहुत लाभप्रद होगा कि आप अपने दैनिक दिनचर्या से समय निकालें और तनाव मुक्त होकर स्वयं पर ध्यान केंद्रित करें, अपने अंतर वाणी को सुनें और पता लगाये आखिर आप स्वयं क्या है। थोड़ा योग करें, एकान्तवास करें । आयुर्वेद की सहायता से शरीर को स्वच्छ करना और दूषित तत्वों को शरीर से बाहर निकालना पहले शारीरिक रुप से स्वच्छता प्रदान करता है और तनाव मुक्त करके मानसिक एवं भावनात्मक रुप से भी स्वच्छ करता है। यह सब आपको स्वयं की तलाश में मदद प्रदान करता है। आप कुछ दूरी रखकर दूसरे नजरिये से चीजों को देखते है।

इसलिये कृपया भारत आयें, यात्रा करें, तनाव मुक्त बने और आनंद को प्राप्त करें। लेकिन स्वयं के लिये समय लेकर आयें और अपने अंतर में ध्यान केन्द्रित करे। मेरे विचार से यह सर्वोतम और शायद एकमात्र रास्ता है उन सभी चीजों को पाने का जिनकी आपको तलाश है।

नशा करना है तो प्रेम का कीजिए – 22 मई 08

मैं ऐसे कई लोगों से मिला हूँ जो अपने आपको आध्यात्मिक और अपने जीवन को आध्यात्मिक जीवन कहते हैं। इस विषय पर सभी के विचार मेरे जैसे नहीं हो सकते। कई लोग कहते हैं कि उनमें वो सूक्ष्म दृष्टि तो है जो होनी चाहिए पर वो परिवर्तित हो जाती है। इसलिए वो ड्रग्स लेते हैं और इससे उबर पाते हैं। यदि आप कुछ ऐसा सेवन कर रहे हैं जिससे आपकी सचेतनता प्रभावित होती है, वो ड्रग्स ही है।

पूरे विश्व के साथ ये भारत में भी ये हो रहा है। पश्चिमी दुनिया में तो ऐसे कई युवाओं से मैं मिला हूँ जो कहते हैं कि जब वो ड्रग्स लेते हैं और उन्हें आध्यात्मिकता का अनुभव होता है। दरअसल गलत मार्गदर्शन के कारण वो ऐसा कर रहे हैं। उन पलों में वो अपने नियंत्रण में नहीं होते। चूंकि ड्रग्स उन्हें नियंत्रित करती है और ऐसे में आमतौर पर ये लोग अपनी उर्जा से आकर्षित होते हैं। उनमें आध्यात्मिक रुचि तो है पर उन्होंने सही रास्ता नहीं अपनाया है।

कई बार मैं ऐसे लोगों की कोई सहायता नहीं कर पाता। मैं चाहता तो हूँ पर वो लत छोड़ने का निर्णय नहीं कर पाते। कुछ में इच्छाशक्ति की कमी है तो कुछ सोचते हैं कि ड्रग्स लेने के बाद उनकी उर्जा बढ़ जाती है। जब उन्हें लगता है कि मैं उनकी बात को सराह नहीं रहा हूँ तो वो मुझसे दूर हो जाते हैं। मैंने युवाओं को शराब, सिगरेट या ड्रग्स के इतर एक उपाय बताया जो न तो उनके मस्तिष्क को नुकसान पहुँचाता है न ही उर्जा को, उसका नाम है प्रेम। प्रेम आपको परमानन्द देगा और किसी ड्रग्स की तुलना में इससे आप खुश भी रहेंगे। मुझे लगता है अगर आपके पास प्रेम है तो आपको किसी ड्रग्स की आवश्यकता नहीं। आपको अपनी सचेतनता को बदलने की आवश्यकता नहीं है। प्रेम अपने आप में परिपूर्ण है।