क्या करें जब असुरक्षा की भावना से पीड़ित लोग आपको नीचा दिखाने की कोशिश करें? 18 नवंबर 2015

आज मैं एक ऐसे रवैए के बारे में लिखना चाहता हूँ, जिसे एक प्रकार की नकारात्मकता कहा जा सकता है। कुछ लोग होते हैं जो दूसरों को नीचा दिखाकर बहुत खुश होते हैं। वैसे वे नकारात्मक नहीं होते-लेकिन वे आपको नकारात्मक स्थितियों में लाकर बहुत खुश होते हैं, ऐसी स्थिति जिसमें अपने आपको पाकर आप कतई खुश नहीं होते!

मुझे पक्का विश्वास है कि आप भी ऐसे लोगों से अवश्य मिले होंगे! आप कुछ भी कहेंगे या आप कुछ भी कर लें वे आपकी आलोचना करने का कोई न कोई बहाना ढूँढ़ ही लेंगे, आपका व्यवहार कैसा रहा या आपके सोचने का तरीका किस तरह गलत था। जानबूझकर वे आपको उत्तेजित और नाराज़ करने के लिए कोई न कोई ऐसी बात कहेंगे कि आपको लगेगा, आप उस चर्चा के लायक नहीं हैं या चल रहे वार्तालाप में आपका स्वागत नहीं किया जा रहा है या आप पूरी तरह गलत हैं।

मुझे लगता है, यह एक मनोवैज्ञानिक समस्या है और काफी हद तक अहंकार से जुड़ी है। ऐसे व्यक्ति पढ़े-लिखे हो सकते हैं और उनके पास बहुत सी डिग्रियाँ भी हो सकती हैं लेकिन वे खुद अपने बारे में अच्छे विचार नहीं रखते। वे भावनात्मक रूप से सुरक्षित महसूस नहीं करते और दूसरों से अपने आपको बेहतर दिखाकर अपने अहं को संतुष्ट करने की कोशिश करते हैं।

और इस तरह वे दूसरों को नीचा दिखाकर आनंद प्राप्त करते हैं। वे सोचते हैं कि जिस तरह वे किसी काम को अंजाम देते हैं, वही सबसे अच्छा तरीका है। और कोई भी, जो अलग तरह से व्यवहार करता है, वह वास्तव में मूर्ख है और इसलिए उनसे कमतर है-जिससे वे अपने बारे में बेहतर महसूस कर सकें। इसके लिए वे दूसरों को दुखी करने में भी संकोच नहीं करते। यह समझ या संज्ञान कि वे अपने आप से, आसपास की दुनिया और इस जीवन से ही बेहद नाखुश हैं, इन परिस्थितियों में ही उनके व्यवहार का मूल कारण होता है।

जैसे ही पता चले कि ये लोग ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं, आप उनके संबंध में अपनी सीमाएँ तय कर लीजिए। अगर उनके साथ आप भी परेशान नहीं होना चाहते और नहीं चाहते कि कोई आपको खराब मनःस्थिति में घसीट ले जाए-जिसे वास्तव में वे ही आपके लिए निर्मित करना चाहते हैं तो आपके लिए इस कोशिश को विफल करना आवश्यक है। सबसे अच्छी बात यह होगी कि जितनी जल्दी हो, आप उनसे पीछा छुड़ा लें। उनके साथ आपका सामान्य वार्तालाप संभव नहीं है। आप उन्हें नहीं सुधार सकते क्योंकि वैसे भी वे समझते हैं कि हर चीज़ वे सबसे बेहतर जानते हैं! जब तक आप परेशान और दुखी नहीं हो जाते, वे रुक नहीं सकते।

इसलिए याद रखिए कि वास्तव में वे खुद ही भावनात्मक रूप से असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और अपने अहं और आत्मसम्मान को लेकर परेशान हैं। उन्हें आपकी भावनाओं को छूने न दें या अपनी भावनाओं को उनसे बचाकर रखें। उनकी बातों को गंभीरता से न लें और सबसे अच्छी बात, उनके साथ अपनी चर्चा को संक्षिप्त और हल्का-फुल्का बनाए रखें। इस तरह आप अपनी प्रसन्नचित्तता और भावनाओं को उन लोगों द्वारा क्षतिग्रस्त किए जाने से बचा सकेंगे जो सिर्फ दूसरों का मूड खराब करके ही खुश रह सकते हैं!

क्या करें जब आपको नकारात्मक लोगों की संगत में रहना पड़े? 4 नवंबर 2015

दो दिन पहले मैंने आपको उन लोगों के बारे में बताया था जो भीतर से ही बेहद नकारात्मक होते हैं, इतने कि उन्हें किसी हालत में संतुष्ट नहीं किया जा सकता। कल मैंने बताया कि हमारे आश्रम आने के इच्छुक लोगों के बारे में हम पहले से पता करने की भरसक कोशिश करते हैं कि वह अपने निवास के दौरान हमसे क्या अपेक्षा रखते हैं, जिससे ऐसी स्थितियों से बचा जा सके। लेकिन ऐसा हो ही जाता है कि ऐसे लोग हमारे यहाँ प्रवेश पा जाएँ। हम उनसे किस तरह निपटते हैं और जब आप अपने आपको ऐसे अत्यंत नकारात्मक लोगों के बीच पाएँ तो आप क्या कर सकते हैं।

सेवा क्षेत्र के उद्यमी होने के नाते इसे हम अपनी ज़िम्मेदारी मानते हैं कि अपने हर ग्राहक को संतुष्ट करें। यह एक बहुत रूखा वाक्य लगता है लेकिन यही सच है: जब हमारा काम ही है कि हम अपने आश्रम में लोगों के ठहरने की व्यवस्था करें तो चाहते हैं कि आश्रम आने वाला हर ग्राहक हमसे संतुष्ट हो! यह एक खुली दुकान की तरह है, हम उसका विज्ञापन भी करते हैं और सामान्यतया वह सबके लिए खुली है। और इसीलिए हम सभी को पूरी तरह संतुष्ट करने की कोशिश करते हैं।

उन लोगों के साथ भी, जो हमेशा नकारात्मक रवैया रखते हैं, हम संपूर्ण व्यावसायिक कौशल और सत्यनिष्ठा के साथ पेश आते हैं। हम उन्हें भी संतुष्ट करने की पूरी कोशिश करते हैं, उनसे फीडबैक लेते हैं, उनकी हर तरह की मांग पूरी करने का प्रयास करते हैं। लेकिन जो लोग नकारात्मक होते हैं, हर बात में नुख्स निकालना जिनकी आदत होती है, वे हमेशा नकारात्मक ही बने रहना चाहते हैं। जब हमें महसूस होता है कि उन्हें संतुष्ट करना किसी भी हाल में संभव नहीं है, कि खुश होने के लिए उन्हें स्वयं बदलने की ज़रूरत है तो हम अपनी रणनीति बदल देते हैं।

स्वाभाविक ही, यह इस बात पर निर्भर करता है कि सामने वाले के साथ आपके संबंध कैसे हैं-कि उसे संतुष्ट और प्रसन्न करने के लिए आपको इतनी ज़हमत उठाने की ज़रूरत है भी या नहीं। अगर ऐसे लोगों के साथ रहने की मजबूरी पेश आ ही गई है तो भरसक उनसे वाद-विवाद से बचने की कोशिश करें। ऐसी स्थिति पैदा न होने दें जहाँ सामने वाला बहुत परेशान हो जाए। वे क्या कह रहे हैं, सुनें और जहाँ सहमत होने की संभवना हो, अपनी सम्मति दें। अगर सहमत न हों तो प्रखर रूप से अपना विरोध प्रकट करने की ज़रूरत नहीं है। सिर्फ सुनें-जब बहुत ज़रूरी हो तभी अपना मत प्रकट करें। आप पहले से ही जानते हैं कि हर बात में नकारात्मक होने की उनकी आदत है इसलिए शांत और संयत बने रहें और उन्हें जो कहना है, कहने दें।

निश्चित ही, आप कह सकते हैं कि इससे, स्वाभाविक ही, बातचीत में कमी आ जाती है। आप जानते हैं कि कुछ भी पूछने से कुछ निकलकर नहीं आने वाला है इसलिए सामने वाले से आप पूछने में भी घबराते हैं कि उसके क्या हालचाल हैं। आप प्रश्न पूछना कम कर देते हैं लेकिन जो थोड़ी बहुत प्रसन्नता और संतुष्टि या आपसी समझ बची रह गई है, उसे बचाए रखने के लिए आप गुड मॉर्निंग, गुड ईवनिंग जैसा सामान्य औपचारिक वार्तालाप जारी रखते हैं।

इसके बावजूद सामने वाला असंतुष्ट या नाखुश होने के लिए कोई न कोई बात ढूँढ़ ही सकता है। ऐसे लोग सिर्फ इस बात पर दुखी हो सकते हैं कि दूसरे इतने खुश क्यों हैं। वास्तव में यह उनके लिए खुश होने का एक मौका सिद्ध हो सकता है-लेकिन मौके का लाभ उठाने के स्थान पर वे पछताने का मौका ढूँढ़ते हैं कि दूसरे खुश क्यों हैं।

जैसा कि मैंने कहा, खुश रहने में आप उनकी मदद कर ही नहीं सकते। जैसी भी परिस्थिति हो, आपको सिर्फ उसे स्वीकार करने की ज़रूरत है और संयत रहने की। पहले भी आप ऐसे लोगों से मिल चुके होंगे और मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि यह आगे भी होता रहेगा। कुछ समय के लिए आपके रास्ते मिलेंगे लेकिन एक दिन आएगा जब आप अपने-अपने अलग रास्तों पर चल पड़ेंगे।

आपके लिए भी यह एक मौका है कि चीज़ें या परिस्थितियाँ जैसी भी हों, उन्हें आप स्वीकार करना सीखें-बिना उन पर अधिक परेशान हुए!

जहाँ तक हो सके, नकारात्मक लोगों से दूर रहें – 3 नवंबर 2015

कल मैंने उन लोगों की चर्चा की थी, जिन्हें संतुष्ट करना वास्तव में असंभव कार्य है क्योंकि वे अंदरूनी तौर पर भयंकर रूप से नकारात्मक होते हैं। इस प्रकार वे न सिर्फ खुद हर वक़्त दुखी रहते हैं बल्कि अपने आसपास के लोगों को भी दुखी कर देते हैं। जैसा कि मैंने बताया, हालांकि कभी-कभार ही हुआ है, लेकिन आश्रम में हमारा पाला भी ऐसे नकारात्मक लोगों से पड़ता रहा है। कभी-कभार ही क्यों? क्योंकि हमारे यहाँ आने के इच्छुक लोगों के साथ अपनी ईमेल चर्चाओं में ही हम यह जान लेने की कोशिश करते हैं कि हम उन्हें संतुष्ट कर पाएँगे या नहीं।

सामान्यतया हमारे यहाँ आने के इच्छुक लोग ईमेल द्वारा हमसे संपर्क करते हैं। जो लोग हमारे साथ आश्रम में रहना चाहते हैं, हमसे तरह-तरह के प्रश्न पूछते हैं और हम अपने प्रस्तावित विश्रांति कार्यक्रमों की और पर्यटन व्यवस्था संबंधी जानकारियाँ देते हुए उन्हें प्रत्युत्तर भेजते हैं। अपने ईमेल संदेशों में ही ज़्यादातर लोग यह साफ बताते हैं कि वे क्या चाहते हैं और हमसे उन्हें क्या अपेक्षाएँ हैं-अगर वे नहीं बताते तो हम ही उनसे साफ़-साफ़ पूछ लेते हैं। हम उन्हें स्पष्ट कर देते हैं कि हम कौन हैं और कैसे लोग हैं, कि हम ईश्वर या धर्म पर विश्वास नहीं रखते, कि हमारे आश्रम में कोई गुरु नहीं है और अधिकतर हम लोग समय की पाबंदी को लेकर पूरी तरह स्वतंत्र हैं, जैसे रात को कब सोना है या सुबह कब जागना है।

इतने से ही भगवद्भक्ति हेतु वृंदावन आने वाले, तीर्थयात्री टाइप के और गुरुओं की खोज में निकले लोग हमारी सूची से बाहर हो जाते हैं, जो या तो श्रद्धावश, ईश्वर की आराधना हेतु या फिर गुरुओं से आदेश प्राप्त करने वृंदावन आते हैं। ये ऐसे लोग होते हैं, जिनकी कोई न कोई अपेक्षा होती है लेकिन उनका क्या किया जाए, जो सिर्फ नकारात्मक होते हैं और किसी ऐसी चीज़ की तलाश में होते हैं जो उन्हें सुखी और संतुष्ट कर सके?

लेकिन इमेल्स आपको ध्यान से पढ़ने होंगे। बल्कि, इमेल्स से अधिक आपको ईमेल पढ़ते हुए उनके बारे में होने वाली अनुभूति पर ध्यान देना होगा। कभी-कभी यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं होता लेकिन अक्सर आपसे बहुत से शंकालु प्रश्न किए जाते हैं, जिनसे आपको एहसास हो जाता है कि वह व्यक्ति दरअसल अभी से, आपको बिना जाने-पहचाने, बिना रूबरू मुलाक़ात किए, बिना पता किए कि आप क्या करते हैं, आपकी आलोचना कर रहा है।

अगर आपको शुरू में ही यह एहसास हो जाए कि कोई आपके साथ व्यर्थ ही नकारात्मक हो रहा है, जबकि वह व्यक्ति अभी हज़ारों मील दूर है, यदि आपको लगे कि आपको किसी बात पर अपनी सफाई देनी पड़ रही है और लगे कि इस व्यक्ति के साथ किसी वाद-विवाद में पड़ने से अच्छा होगा कि अपनी सामान्य, शांतिपूर्ण, कामकाजी दिनचर्या में व्यस्त हो जाएँ और यह एहसास हो कि यह व्यक्ति समय गुज़ारने के लिए ठीक नहीं है। अपने घर पर लगातार कुछ हफ्ते रहने के लिए तो बिल्कुल नहीं, जब उसके साथ आपको सशरीर भी साथ रहना होगा!

ऐसे किसी भी मामले में उन्हें मना करने की हम पूरी कोशिश करते हैं। उनके साथ ईमेल पर हुई बातचीत के दौरान होने वाले अपने एहसासात पर गौर करते हुए और इस बात पर विचार करते हुए कि उस व्यक्ति को अपने आश्रम में आमंत्रित किया जाना आसान होगा या कठिन, हम बारीकी से परीक्षा करते हैं। हम जानते हैं कि हम हर व्यक्ति को खुश और संतुष्ट नहीं कर सकते। यह जीवन का एक सामान्य सच है और हम उसे स्वीकार करते हैं। लेकिन हम कोशिश करते हैं कि जिसे कोई भी खुश और संतुष्ट नहीं कर सकता, उसे आमंत्रित करके अपने लिए कठिनाई मोल न लें!

इन सभी भरसक कोशिशों के बाद भी कभी-कभी यह संभव नहीं हो पाता कि सिर्फ ईमेल के ज़रिए आप लोगों के मन की सारी बातें पढ़ सकें। अनुभव के साथ इस बात में महारत हासिल होती जाती है और अब क्वचित ही होता है कि कोई ऐसा व्यक्ति आश्रम का मेहमान बन सके लेकिन यह सामाजिक व्यवहार की सामान्य दैनिक उलझनें हैं और अब भी यह कभी-कभी हो ही जाता है।

तो क्या किया जाए अगर ऐसे किसी व्यक्ति के साथ आपका पाला पड़ ही जाए? कल के ब्लॉग में मैं इसी विषय पर लिखना चाहता हूँ।

जब कभी भी कुछ भी ठीक होता नज़र नहीं आता क्योंकि संतुष्टि भीतर से आती है – 2 नवंबर 2015

कल मैंने सकारात्मक या नकारात्मक नज़रिए के बारे में संक्षेप में लिखते हुए बताया था कि कैसे वह आपके जीवन को प्रभावित कर सकता है या नहीं कर सकता। क्या कभी किसी ऐसे व्यक्ति से आपका सामना हुआ है जो इतना अधिक नकारात्मक है कि किसी भी स्थिति में संतुष्ट नहीं रह सकता? जहाँ तक मेरा सवाल है, मुझे कई बार ऐसे लोग मिले और मेरा दावा है कि उनके लिए आप कुछ भी कर लें, वे कभी संतुष्ट नहीं हो सकते-क्योंकि सकारात्मकता भीतर से आती है!

इसलिए स्वभाव से ही ऐसे लोग जीवन में किसी ऐसी वस्तु की तलाश में होते हैं जो उन्हें संतोष प्रदान कर सके। अपने व्यक्तिगत सलाह-सत्रों में मैं ऐसे कई लोगों से मिला हूँ और समय-समय पर हमारे आश्रम के कई अतिथियों से भी। जो व्यक्ति किसी भी सेवा क्षेत्र के उद्यम से जुड़ा है, जानता होगा कि ऐसे लोग सबसे अक्खड़ और तकलीफदेह ग्राहक साबित होते हैं!

अब यह कोई ज़रूरी नहीं है कि ऐसे लोग भले व्यक्ति नहीं हो सकते, कि वे अक्सर बहुत कुत्सित या बुरे इंसान ही होते हों या आपका बुरा चाहने वाले हों या आपको ही बुरा व्यक्ति समझते हों! स्वाभाविक ही, ऐसे लोग भी हो सकते हैं लेकिन मैंने अक्सर देखा है कि यह कोई नियम नहीं है कि ऐसा ही हो! वास्तव में वे अपने स्वभाव से मजबूर होते हैं, वे भीतर से ही ऐसे होते हैं कि हर वक़्त शिकायत करते रहें, हर बात में नकारात्मकता की तलाश में रहें और किसी भी स्थिति में सुखी और संतुष्ट न हों!

उदाहरण के लिए, एक बार हमारे आश्रम में एक आस्ट्रेलियाई महिला आई, जो अपने पूरे मुकाम के दौरान कोई न कोई नकारात्मक बात ढूँढ़ती ही रहती थी। उसके यहाँ पहुँचते ही हमने उसकी यह आदत भाँप ली। क्योंकि मैं इत्तफाकन बाहर ही था, जैसे ही उसकी कार आश्रम पहुँची, मैंने ही उसका स्वागत किया। अधिकतर लोग लंबी यात्रा के बाद किसी ठिकाने लगने पर प्रसन्न ही होते हैं और सोचते हैं कि देखें, आगे क्या-क्या नया देखने को मिलता है लेकिन उसके साथ तत्क्षण मुझे प्रतीत हुआ कि यह महिला वैसी प्रसन्नचित्त महिला नहीं है-उसी पल मुझे उसके चेहरे पर यह लिखा दिखाई दे रहा था।

उसे खुश करने के लिए हमने वह सब किया, जो कर सकते थे-लेकिन उसे खुश करने में सफल नहीं हो सके। जब बाज़ार में वह साफ़-सफाई के सामान की दुकान खोज नहीं पाई तो उसे उसकी मर्ज़ी का सारा सामान उपलब्ध कराने से लेकर उसके संपूर्ण विश्रांति कार्यक्रम में परिवर्तन करने तक, हमने सब कुछ आजमाया मगर अफसोस…

मैं घटनाओं के विस्तार में नहीं जाना चाहता किंतु आप कल्पना कर सकते हैं-वे कोई महत्वपूर्ण मामले नहीं थे याकि ज़रूरी चीजें नहीं थीं, पहले किसी अतिथि को उनसे कोई दिक्कत नहीं हुई थी और कुछ वस्तुएँ उसके देश में उपलब्ध उन्हीं वस्तुओं से सिर्फ देखने में अलग थीं और सिर्फ इसीलिए वे उसके काम नहीं आ सकती थीं।

मज़ेदार बात यह कि सिर्फ भारत में मौजूद परिस्थितियाँ ही उसकी परेशानी का सबब नहीं थीं या सिर्फ भारतीयों से ही उसे परेशानी नहीं थी! वास्तव में प्रकृति से ही उसे किसी भी बात से खुश न होने की आदत थी यानी यह उसकी स्वभावगत विशेषता ही बन गई थी। और इस स्वभाव में बाहर से कोई सुधार संभव नहीं था। आप कितनी ही खूबसूरत जगह चले जाएँ, आपको अगर उसमें नुस्ख ही देखना है तो वही आपको नज़र आएगा! आप अच्छे से अच्छा खाना सामने रख दें, अच्छे से अच्छे कपड़े या ज़रूरी सामान ले आएँ या चर्चा करने के लिए एक से एक जानकार लोगों को बिठा दें-उन्हें संतुष्टि न मिलनी है, न मिलेगी।

अगर उपरोक्त वर्णन में आपको अपनी थोड़ी भी झलक दिखाई देती है तो जान लीजिए कि खुश रहने के लिए खुद आपको ही अपने आप में बदलाव लाना होगा! मैं कल्पना कर सकता हूँ कि कभी-कभी आप कितना अधिक दुखी महसूस कर सकते हैं कि न जाने क्यों कोई बात ठीक हो ही नहीं रही है। आप अच्छे व्यक्ति हैं, आसपास के लोग अच्छे हैं और कोई घटना भी ऐसी नहीं हुई है जिसे दुखद कहा जा सके। तो इन बातों पर गौर करें और समझें कि आपको भीतर से बदलने की ज़रूरत है! यह लंबा काम हो सकता है और कभी-कभी कठिन भी, लेकिन आप ऐसा कर सकते हैं!

मैं अपने जीवन में सदा खुश रहा हूँ और मुझे चीजों को सकारात्मक रोशनी में देखना पसंद है। कृपया मेरे इस नज़रिये के साझीदार बनें। अगले कुछ दिन मैं आपको बताऊँगा कि यदि आप भी ऐसे लोगों के बीच रहते हैं तो आप क्या कर सकते हैं-और हम ऐसी परिस्थितियों से पल्ला झाड़ने के लिए क्या करते हैं।

हम इतने नकारात्मक हैं कि हमें हर जगह लिंगभेद और दूसरी बुराइयाँ दिखाई देती हैं – 25 अक्टूबर 2015

आज मैं लैंगिक समानता, नारीवाद और हर चीज़ में कोई न कोई नुस्ख निकालने वाले लोगों के रवैये पर अपने विचार लिखने जा रहा हूँ। इसके अलावा मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि इन सब बातों का हमारे आश्रम की रसोई से क्या ताल्लुक है।

आज आश्रम के कुछ मेहमान हमारी आयुर्वेदिक पाक-कार्यशाला में सम्मिलित हुए। सुबह उन्होंने पनीर बनाना सीखने से शुरुआत की और दोपहर में सारे लोग प्रवेश हाल में इकट्ठे बैठकर पालक की पत्तियाँ चुन रहे थे। खुशनुमा माहौल था और तीन महिला कर्मचारियों के अलावा मेरी नानी और हमारे महिला मेहमान साथ बैठे थे। मुझे लगा, यह बड़ा सुंदर दृश्य है और मैंने एक फोटो ले लिया।

जब मैंने उसे फेसबुक पर पोस्ट किया तो बहुत सारे सकारात्मक टिप्पणियाँ प्राप्त हुईं मगर दो एक जैसी थीं:

"क्या आपके आश्रम में सिर्फ महिलाओं से ही रसोई का काम कराया जाता है?" और "आपकी पिछली पोस्ट्स देखकर मैं आशा कर रही थी कि आपके आश्रम में पुरुष भी खाना बनाने के काम में हिस्सा लेते होंगे!"

निश्चित ही इन दोनों टिप्पणीकारों ने आश्रम संबंधी एक चित्र को, फोटो में कैद एक पल को देखकर यह मान लिया था कि जो महिलाएँ पालक चुन रही हैं, वही सारा भोजन भी तैयार करती होंगी। कि खाना पकाने की सारी ज़िम्मेदारी सिर्फ महिलाओं के सिर पर डाल दी गई है।

मैंने आश्रम की रसोई का एक दूसरा चित्र, जिसमें बहुत से पुरुष कर्मचारी रोटियाँ बेल और सेंक रहे थे, पोस्ट करके बताने का प्रयत्न किया कि पुरुष भी रसोई में काम करते हैं। मैंने चुटकी लेते हुए कहा कि अब यह चित्र यह विवाद न खड़ा कर दे कि रसोई में महिलाओं का प्रवेश क्यों वर्जित है!

निश्चित ही ये टिप्पणीकार हमारे यहाँ कभी नहीं आए और न तो मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ और न ही उन्हें हमारे आश्रम की कार्यप्रणाली की, हमारे कर्मचारियों और मेरे परिवार की रत्ती भर जानकारी है।

जो भी ये फोटो देख रहे हैं, खातिर जमा रखें कि हर क्षेत्र में पुरुष और महिलाएँ दोनों मिल-जुलकर अपने-अपने हिस्से का काम करते हैं! इस समय हमारी रसोई का मुख्य रसोइया पुरुष है। उसके सहायक पुरुष और महिलाएँ, दोनों हैं। सभी सब्जियाँ काटते हैं, बरतनों में सब्जियाँ चलाते हैं और टेबल पर खाना परोसते हैं! हमें इस बात से कोई परेशानी नहीं होगी अगर कल को कोई महिला रसोई की मुखिया बन जाती है! जब मेरी माँ ज़िंदा थीं, वही रसोई का इंतज़ाम देखती थीं और उनके जाने के बाद मेरे भाइयों और मैंने वह ज़िम्मेदारी वहन कर ली है-इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारे यहाँ काम करने वाला कोई कर्मचारी महिला है या पुरुष, इतना काफी है कि उसे पता हो कि उसे क्या काम दिया गया है और वह उस काम को अच्छी तरह अंजाम दे!

इसलिए लिंग भेद का प्रश्न मेरे दिमाग से बहुत जल्दी निकल गया क्योंकि मैं जानता हूँ कि हम यहाँ किसी के साथ किसी प्रकार का भेद नहीं करते-लेकिन मेरे मन में उन टिप्पणीकारों की मानसिकता के बारे में कई तरह के खयाल आते-जाते रहे। मैं सोचता हूँ कि जब आप हर बात में किसी नकारात्मकता की तलाश करते हैं तो वह आपके मन को प्रतिबिम्बित करता है। बिना अधिक जानकारी प्राप्त किए आप किसी चीज़ का गलत अर्थ लगा लेते हैं।

कुछ बातों को आप सामान्य रूप से क्यों नहीं ले सकते? क्यों नहीं आप एक रोचक चित्र का आनंद लेकर, उसमें नुस्ख निकालने कि जहमत उठाए बिना उसे जस का तस ग्रहण करते?

आपका आसपास आपका आईना नहीं बल्कि परस्पर प्रभाव के साथ दोनों का अनुकूलन है – 12 अक्टूबर 2015

अगर आप आध्यात्मिक परिदृश्य के मध्य रहते हैं या आत्मसुधार की पुस्तकों आदि में रुचि रखते हैं तो आपने उस सिद्धांत के बारे में पहले ही पढ़ रखा होगा या उसके बारे में किसी से सुना होगा जिसके अनुसार दूसरे आपको आपका ही आईना दिखा रहे होते हैं। अक्सर इस सिद्धांत को खींच-खाँच कर काफी दूर तक ले जाया जाता है-मेरे हिसाब से, कभी-कभी कुछ ज़्यादा ही-लेकिन इस बात में काफी हद तक सत्यता भी है। सिर्फ एक दृष्टिकोण से: जब हम किसी समूह में या कुछ लोगों के साथ होते हैं तो हम आसानी के साथ खुद अपना व्यवहार बदलकर दूसरों के साथ सामंजस्य बिठा लेते हैं और दूसरों जैसे दिखाई देने की कोशिश करते हैं। स्वाभाविक ही, हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हम किस प्रकार के रवैये को स्वीकार कर सकते हैं और किसे नहीं!

संभव है आपने खुद इसे नोटिस किया हो या न भी किया हो। आप अपने दिन का एक हिस्सा अपने काम में खर्च करते हैं, एक हिस्सा अपने परिवार के साथ और शायद एक और हिस्सा अपने दोस्तों के साथ। इस तरह आपके आसपास अलग-अलग समय पर शायद दो या तीन तरह के लोगों का समूह होता है-और उनके साथ भिन्न तरह का व्यवहार करते हैं, न सिर्फ इसलिए कि हर बार समय की प्रकृति भिन्न होती है बल्कि इसलिए भी कि हर बार वे भी भिन्न-भिन्न तरह से व्यवहार कर रहे होते हैं और आप उनके व्यवहार के साथ अपने व्यवहार का सामजस्य बिठाते हैं।

उदाहरण के लिए अगर आपके कार्यालय का रवैया नकारात्मक है तो आप पाएँगे कि आपके सहकर्मी बहुत अधिक शिकायत करते हैं। जब आप यह बात नोटिस करते हैं, तत्क्षण आपको याद आता है कि आप भी यही करते हैं! क्यों? क्योंकि यह आपके कार्यालय का सामूहिक रवैया है! एक समूह में हम दूसरे सभी लोगों की स्वीकृति चाहते हैं और इसलिए, जान-बूझकर भले न करते हों मगर, हम दूसरों की नकल कर रहे होते हैं। वे कुढ़ते हैं? हम भी कुढ़ते हैं। और नकारात्मकता के मामले में यह नीचे, और नीचे खींचने वाला भँवर बन जाता है! जब आप इसे नोटिस कर लेते हैं तब कह सकते हैं कि वे आपको आईना दिखा रहे हैं या आप यह भी कह सकते हैं कि आपने माहौल के साथ तालमेल बिठा लिया। लेकिन कुछ भी हो, आपको अधिकाधिक सकारात्मक बने रहने की कोशिश करनी चाहिए।

यही बात सकारात्मक तरीके से भी होती है। अगर आप सकारात्मक लोगों के बीच रहते हैं तब भी आप उनसे प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकते। अगर आपके आसपास के लोग सकारात्मक हैं तो आपके लिए भी सकारात्मक होना बहुत आसान हो जाता है! हँसते-बोलते, चुटकुलेबाज़ी करते हुए, मौज-मस्ती करते हुए-जो लोग ऐसा करते हैं, उनके साथ यह सबसे बढ़िया होता है!

इसका अर्थ सिर्फ यह नहीं है कि दूसरे आप पर कोई प्रभाव डाल रहे हैं और इसका यह अर्थ भी नहीं है कि अगर आप किसी नकारात्मक व्यक्ति से मुलाक़ात करते हैं तो आप बहुत ज़्यादा नकारात्मक हो जाते हैं। इसका सिर्फ इतना अर्थ है कि आपके आसपास उपस्थित लोगों पर आपका भी काफी तगड़ा असर हुआ है, विशेष रूप से उन पर, जिनके साथ आप दिन का अधिकाधिक समय गुज़ारते हैं!

इसलिए चाहे आप काम कर रहे हों, चाहे घर पर हों या दोस्तों के साथ समय बिता रहे हों- सकारात्मक बने रहने पर ध्यान दें और तब आप उनकी नकारात्मकता के साथ तालमेल बिठाने से बचते हुए अपनी सकारात्मकता से उन्हें प्रभावित कर पाएँगे!

सकारात्मक रवैया बनाए रखें – कठिनाइयाँ आपको और मजबूत बनाएँगी! 10 सितंबर 2015

कल मैंने आपको बताया था कि भले ही आपके अनुसार, परिस्थितियाँ अत्यंत खराब हों, उनसे पार पाने में आप खुद अपनी मदद कर सकते हैं! मैं पूरी गंभीरता से कह रहा हूँ कि बाद में जब आप पीछे मुड़कर देखेंगे तो आपको लगेगा कि जो हुआ, अच्छा हुआ, उससे आपको लाभ ही हुआ है। और यही बात आपको उस परिस्थिति से पूरी तरह बाहर निकाल सकती है।

कुछ लोगों के लिए यह समझ उम्र के साथ पैदा होती है। पहले-पहल जब आपके जीवन में उथल-पुथल मचती है या कोई हादसा बरपा होता है तो आप बुरी तरह टूट जाते हैं और आपको लगता है कि यह क्लेश अब जीवन भर कभी समाप्त नहीं होगा। जब आप जीवन में दो-चार बार ऐसे अनुभवों से गुज़र लेते हैं तो दिल में भीतर ही भीतर आप जान रहे होते हैं कि ये हालात भी गुज़र जाएँगे। स्वाभाविक ही सभी को उन कठिन परिस्थितियों से गुज़रना ही पड़े, यह ज़रूरी नहीं है!

मैं जानता हूँ कि इस बात में कोई खास दम नहीं है कि 'जो भी होता है, अच्छे के लिए होता है' और यह बात बहुत अव्यावहारिक भी है लेकिन वास्तव में नज़र यही आता है- यह बात अलग है कि आप अभी देख नहीं पा रहे हैं। अगर आप पूरे समय उन्हीं कष्टदायक और निराशाजनक अनुभूतियों में लिप्त रहेंगे, सोचते रहेंगे कि आप बरबाद हो गए, आप पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है, तो आपको इस तथ्य पर विश्वास नहीं होगा।

लेकिन आपको इस विचार से छुटकारा पाना ही होगा। अपने मित्रों से चर्चा करें, उनकी आपबीती सुनें और आप क्या महसूस करते हैं, बताएँ। कोई अच्छा संगीत सुनें, प्रकृति के नजदीक जाएँ, खुली धूप में बैठें, कुछ व्यायाम आदि करें, तैरने चले जाएँ, दौड़ें, गरम पानी से नहाएँ, मालिश करवाएँ और कुछ पसंदीदा नाश्ता-पानी करें। कोई ऐसा काम करें, जिससे तुरंत आपका मन हल्का हो जाए, आपको अच्छा लगे- और फिर अपनी परिस्थिति पर दोबारा विचार करें।

जो भी आप करें, मायूसी के साथ न करें और न ही किसी भय से या क्रोधवश या कोई चिंता दिल में लिए हुए करें- यह न सोचें कि आपका संसार टूटकर बिखर जाने वाला है। जो भी अच्छा बन पड़े, करें और जो भी करें भविष्य पर नज़र रखकर करें, यह जानते हुए कि आगे आने वाला समय अच्छा ही होगा।

धीरज रखें- सब कुछ ठीक हो जाएगा और आप जब पीछे मुड़कर देखेंगे तो पाएँगे कि इस विकट समय ने आपको मजबूत ही किया है!

क्या आपके ‘जीवन का सबसे खराब समय’ चल रहा है? उससे बाहर निकलिए! 9 सितंबर 2015

कल मैंने आपको एक आस्ट्रियन मित्र के बारे बताया था, जिसने मुझे फोन पर अपनी एक समस्या के बारे में बताया, जिस पर वह अपने करीबी मित्रों के साथ चर्चा नहीं कर सकता था। चर्चा के दौरान किसी बिन्दु पर उसने कहा कि जिन परिस्थितियों से वह अभी गुज़र रहा है, वह उसके जीवन का सबसे अशुभ समय है। अपने जीवन में न जाने कितनी बार मैं ये शब्द सुन चुका हूँ। मेरे सलाह-सत्रों में अक्सर लोग इस ‘अशुभ समय’ की चर्चा करते हैं और इसलिए मैंने सोचा, आज के ब्लॉग में कुछ पंक्तियाँ इसी विषय पर लिखी जाएँ- इन परिस्थितियों पर और उनसे उपजी अनुभूतियों पर।

जब भी आपको लगे कि आप ऐसी किसी परिस्थिति से गुज़र रहे हैं तो सबसे पहले उसे ठीक-ठीक जान-समझ लें। जब आपको पूरी तरह विश्वास हो जाए कि आप ‘जीवन के सबसे खराब समय’ से गुज़र रहे हैं, तभी आप शांतिपूर्वक चीजों को तब्दील करने का उपाय कर सकते हैं।

ऐसी परिस्थिति तब उत्पन्न होती है, जब जीवन में अचानक, अनपेक्षित और अप्रत्याशित परिवर्तन आते हैं; जब ऐसी बातें होती हैं, जिनसे निपटने की तैयारी आपने नहीं की होती, आपके पास सोचने का इतना समय ही नहीं होता कि इस परिस्थिति का मुक़ाबला कैसे किया जाए। कोई अपघात, बीमारी, प्राकृतिक आपदाएँ, अपने किसी प्रियकर की मृत्यु, नौकरी छूटना, जीवनसाथी, रिश्तेदारों या मित्रों से संबंध-विच्छेद या परस्पर संबंधों में छल-कपट का अंदेशा। स्वाभाविक ही, इनमें और भी बहुत सी बातें जोड़ी जा सकती हैं लेकिन मूल बात यह है कि ये बातें आपको निराश करती हैं, आप दुखी और इतने अवसाद-ग्रस्त हो जाते हैं कि आपका मस्तिष्क कोई सकारात्मक बात सोच ही नहीं पाता। अक्सर ऐसा इसलिए होता है कि कई चीज़ें, एक के बाद एक, बहुत तेज़ी से घटित होती हैं और वास्तव में सोचने का समय ही नहीं मिल पाता।

जिस किसी भी घटना के कारण आप उन परिस्थितियों से दो-चार हो रहे हों, उस पर ठहरकर समग्र विचार करें। समझने की कोशिश करें कि इस परिवर्तन का या इस परिस्थिति का ठीक-ठीक कारण क्या है और अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करें। थोड़ा सा समय इस दुख को दें क्योंकि जिसके खोने का दुख आपको हो रहा है या जो तकलीफ आपको पहुँची है, उसका बाहर निकलना आवश्यक है। यह पूरी तरह सामान्य बात है और आपको इस भावनात्मक दौर से गुज़रना ही होगा। और उसके बाद आप उससे बाहर निकल आएँ।

सुनने में आसान लगता है न? लेकिन अमल में लाना मुश्किल है! क्योंकि उसके प्रति आपका रवैया गलत है! असल में लोग उसकी छोटी-मोटी बातों के विस्तार को पीछे छोड़ना नहीं चाहते। वे उसके मामूली 'अगर-मगर' में उलझे रह जाते हैं- अगर यह होता तो क्या होता, वैसा होता तो अच्छा होता, आदि आदि- जबकि ये बातें उन्हें कहीं नहीं ले जातीं। वे घटनाओं के मुख्य हिस्सों को मन में दोहराते रहते हैं या किसी तरह उन्हीं पिछली बातों पर आने की कोशिश करते हैं और इस तरह वहीं गोल-गोल घूमते रहते हैं।

और जब अंततः समझ में आ जाता है कि यह संभव ही नहीं है, कितना भी संघर्ष या कोशिश कर लें, पीछे नहीं लौटा जा सकता तो अत्यंत निराश हो जाते हैं, अवसादग्रस्त हो जाते हैं। आप समय को वापस नहीं ला सकते, घटित हो चुकी बातों को अघटित नहीं किया जा सकता और अतीत के अपने कर्मों को आप बदलकर ठीक नहीं कर सकते। लेकिन जो हो चुका है, आपके सामने घटित हो रहा है, उस पर अपना सोचने का तरीका आप बदल सकते हैं, उस पर अपना नजरिया बदल सकते हैं-और इस तरह उस परिस्थिति से और उस पर अपने नकारात्मक सोच से पार पा सकते हैं।

जो हो चुका है, उसका विश्लेषण करने और उसे समझने के लिए आपको समय चाहिए। लेकिन एक समयांतराल के बाद आपको अतीत के बारे में सोचना छोड़ना ही होगा और यह समझना होगा कि आपके सामने, आगे एक नया सबेरा है। ये भावनाएँ और ये एहसासात ताउम्र नहीं रहने वाले हैं! अच्छा समय फिर आएगा और हमेशा से हम रोज़ सबेरे उठकर इसी दिशा में प्रयत्न करते हैं!

जब एक टिप्पणी आपको आश्चर्यचकित कर देती है क्योंकि वह घृणा से लबरेज है – 15 जनवरी 2015

कुछ समय पहले मुझे अपने एक पाठक की टिप्पणी प्राप्त हुई। उसने मुझ पर एक आरोप लगाया था: मैं यूरोप को जर्मनी जैसा प्रदर्शित करता हूँ। जबकि मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि यह सत्य नहीं है, मैं उसकी अत्यंत अत्यंत कटु भाषा से थोड़ा हतप्रभ रह गया: वह यह दर्शाने की कोशिश कर रहा था कि मेरे ब्लॉग से वह अपमानित महसूस कर रहा है और इसलिए उसने जर्मन जनता, वहाँ की संस्कृति और उस देश को बुरा-भला कहते हुए कई अपमानजनक बातें कहीं।

मैं उस पाठक की टिप्पणी को ज्यों का त्यों यहाँ रख रहा हूँ, जिससे आप मेरे कहने का अर्थ बेहतर समझ सकें।

"मैं एक पूर्व-यूरोपियन व्यक्ति हूँ और कई पश्चिमी यूरोपियन देशों में भी रह चुका हूँ। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जितने लोगों से मैं मिला हूँ उनमें जर्मन लोग ही एकमात्र बीमार लोग हैं। मेरे मुताबिक जर्मनी में रहना हर तरह से अत्यंत घृणास्पद और जीवन को बरबाद करने जैसा है। जर्मनी में रहने वाले जिन विदेशियों से मैं मिल पाया हूँ, उनका भी यही मत है। थोड़ा कष्ट करके ज़रा पूर्वी और दक्षिण यूरोपीय देशों, यहाँ तककि ब्रिटेन को भी निष्पक्ष दृष्टिकोण से परखने की कोशिश करें तो आप आश्चर्यचकित रह जाएँगे। कृपा करके सभी यूरोपियन्स को ‘जर्मन’ कहकर सारे यूरोपियन्स का अपमान न करें। वहाँ एकमात्र यह फासिस्ट विचार प्रचलित है कि सभी लोग उनकी तरह क्रूर, भयंकर और डरावने हो जाएँ। लेकिन हम आशा करते हैं कि वे कभी भी इस उद्देश्य में सफल नहीं होंगे।"

पहली बात तो यह कि भले ही मुझे जर्मनी सबसे ज़्यादा अच्छा देश लगता हो और मैंने वहाँ अधिक से अधिक समय बिताने का फैसला किया हो लेकिन यह अकेला देश नहीं है जहाँ मैंने इतना समय अधिक बिताया है! यूरोप की अपनी विदेश यात्राओं के पहले कुछ वर्ष मैं अधिकांश समय यू के (ब्रिटेन) में गुज़ारा करता था। मैं कई-कई हफ्ते स्पेन में रहा हूँ और कम से कम एक सप्ताह के कई दौरे वहाँ के कर चुका हूँ। मैं स्विट्ज़रलैंड, ऑस्ट्रिया, लक्सेम्बर्ग, आयरलैंड, बेल्जियम, फ़्रांस, लुथिआनिया, लातविया, डेनमार्क, स्वीडन, नीदरलैंड आदि देशों में भी कई बार आ-जा चुका हूँ। सम्भव है, कुछ देशों के नाम, जहाँ मैं रह चुका हूँ, भूल भी रहा होऊँ, जिसके लिए मैं आपसे माफ़ी चाहता हूँ। तो यह तो रहा इस बात का जवाब कि जर्मनी के अलावा मैंने कहीं कुछ नहीं देखा है।

लेकिन जर्मन्स के बारे में जैसे विचार आपके हैं वैसे विचार मैंने किसी अन्य देशवासियों में नहीं पाए! आप उन्हें क्रूर, खौफ़नाक, फासिस्ट और न जाने क्या-क्या कह रहे हैं। आपके मुताबिक जर्मनी में जीवन बहुत मनहूस है, वहाँ आपका जीवन बरबाद हो सकता है! और आप यह दावा करते हैं कि सभी विदेशी आपकी तरह सोचते हैं। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि मैं आज तक किसी गैर-जर्मन से नहीं मिला हूँ जो उनके बारे में इतने बुरे और नकारात्मक विचार रखता हो! और मैंने आज तक जर्मन्स के बारे में जो भी सुना है आपकी राय उनमें सबसे अधिक फासीवादी राय है! आप ही बताइए आपके शब्दों के प्रकाश में कौन यहाँ अधिक क्रूर नज़र आता है?

जबकि मुझे इसमें कोई शक नहीं है कि मैं जर्मन्स की बात करते हुए यूरोपियन्स की बात नहीं लिख रहा होता हूँ, मैं अक्सर जर्मन्स, उनकी प्रवृत्तियों और उनकी संस्कृति के बारे में पर्याप्त बातें लिखता ही रहता हूँ लेकिन मैं किसी भी देश के बारे में कभी भी वैसी बात नहीं लिखूँगा जैसी आपने जर्मन्स के बारे में लिखी है। हो सकता है आप कुछ गलत लोगों से मिले हों, लेकिन दुनिया का कोई भी जन-समूह इस तरह सामान्य रूप से बुरा नहीं कहा जा सकता।

स्वाभाविक ही लिखते समय कोई भी लेखक अपनी बात को थोड़ा-बहुत व्यापक बनाता ही है और हमेशा किसी भी जन-समूह में ऐसे लोग मौजूद होते हैं जो किसी भी घिसे-पिटे सामान्यीकरण में फिट नहीं होते लेकिन सचमुच बड़ी ईमानदारी से यह कहना चाहता हूँ कि जहाँ भी मैं गया हूँ, सभी सामान्यीकरणों (generalization) के बावजूद मैंने हमेशा कुछ बड़े शानदार और खूबसूरत लोग भी पाए हैं।

शायद मुझसे अधिक आपको और अधिक घूमने-फिरने की ज़रूरत है, जिससे आप भी कुछ सकारात्मक लोगों से मिल पाएँ!

मुख्य-धारा के मीडिया से अलग कुछ करें – अच्छी खबर प्रसारित करें – 8 जनवरी 2015

कल मैंने आपको बताया था कि किसी ने मुझसे इस बात का कारण जानना चाहा कि क्यों मैं अपने चैरिटी कार्यों का विवरण सार्वजनिक कर देता हूँ। मैंने इसका विस्तृत जवाब दिया था कि हम क्यों मोनिका, उसके अपघात, उसके इलाज और उसके स्वास्थ्य-लाभ की प्रगति संबंधी बातें आपको बताते रहते हैं। आज मैं इस सम्बन्ध में सामान्य रूप से कुछ बातें बताते हुए यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि क्यों अपने अच्छे कामों को सबको बताने का मकसद अपनी डींग हाँकना या दिखावा करना ही हो, यह ज़रूरी नहीं है बल्कि यह एक बहुत महत्वपूर्ण और जरूरी काम है!

मैं गंभीरता के साथ यह विश्वास करता हूँ कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को खुद अपने द्वारा किए गए अच्छे कामों को लोगों के साथ साझा करना चाहिए! यह संसार कभी कभी इतना नकारात्मक, निराशाजनक और अंधकारमय लगता है कि जब आपको यह जानकारी मिलती है कि कुछ ऐसे भी व्यक्ति हैं जो कुछ अच्छा कर रहे हैं तो वह एक आशा की किरण सिद्ध होती है!

मैं इस बारे में बहुत गंभीर हूँ! जब आप टीवी चलाते हैं तो आप आपको बुरी से बुरी खबरें देखने को मिलती हैं: हत्याएँ, बलात्कार, आतंकवाद और युद्ध! जब आप अखबार उठाते हैं तो आप वही काली खबरें सफ़ेद पृष्ठ पर लिखी पाते हैं। उन्हें सुनना, देखना और जानना भी ज़रूरी है-लेकिन कभी-कभी मैं वाकई उन्हीं खबरों के समानान्तर कुछ सकारात्मक खबरों की अनुपस्थिति को बहुत मिस करता हूँ। कभी-कभी सुखद, कभी उल्लसित कर देने वाली, कभी-कभी आपके चेहरे पर मुस्कान ले आने वाली खबरें! अखबारों की सूचनाओं में सकारात्मक तत्व दिनोंदिन कम होते जा रहे हैं और मुझे विश्वास है कि व्यक्तिगत स्तर पर भी इस स्थिति में बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है और इस कार्य में इंटरनेट हमारा बहुत बड़ा सहायक हो सकता है!

इसी कारण हम बच्चों के लिए शुरू की गई हमारी चैरिटी परियोजनाओं की, उनमें निहित अच्छी कहानियों की, दूसरों के सहयोग से हमारे द्वारा की जा रही मदद की चर्चा करते रहते हैं। अगर आप फेसबुक या ट्विटर पर या किसी ब्लॉग पर पढ़ें कि कैसे कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति की मदद कर रहा है तो क्या आप उससे प्रसन्न नहीं होंगे? अगर आपने उस व्यक्ति के चैरिटी कार्य में या उसकी चैरिटी संस्था के साथ कोई सहयोग किया हो तो क्या यह सोचकर आपकी खुशी द्विगुणित नहीं हो जाएगी कि आप भी प्रकारांतर से किसी दूसरे की खुशी के लिए अपना योगदान दे रहे हैं?

कुछ न कुछ अच्छा हर वक़्त हो रहा है, ऐसे लोग आज भी मौजूद हैं, जो दूसरों की चिंता करते हैं! मैं यह संदेश देना चाहूँगा- लेकिन हम आखिर कर क्या सकते हैं? हम बहुत छोटे पैमाने पर यह काम कर रहे हैं। बहुत से आश्रम, मंदिर, संगठन और व्यक्ति हैं कि बिना किसी बड़े प्रयास के इससे कई गुना अधिक किया जा सकता है! वे क्यों नहीं आगे आकर दूसरों की सहायता करते, उन गरीब बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा उठाते और क्यों नहीं लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराने में मददगार होते या नशे की लत छुड़वाने के या आपातकालीन समस्याओं पर काबू पाने में उन्हें अपना सहयोग देते?

बहुत से ऐसे लोग मौजूद हैं, जो यह काम करते हैं। और जो नहीं कर रहे हैं, उन्हें हम यह बताते हैं। हो सकता है कि हम उन्हें प्रेरित कर पाएँ, हो सकता है हम दूसरों को कोई रास्ता दिखा सकें।

कुछ भी हो, मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग चुपचाप, बिना किसी शोर-शराबे के अपना काम कर रहे हैं। मैं उन्हें भी उकसाना चाहता हूँ कि वे अपना मौन तोड़ें। अपने अच्छे कामों के बारे में सबसे बात करें, दूसरों को जानकारी दें कि आप क्या कर रहे हैं, अपने अच्छे कामों की खुशबू दुनिया भर में हर तरफ फैलने दें और लोगों को दिखाएँ कि दुनिया में सकारात्मकता, परोपकार, चैरिटी और सहायता करने वाले हाथ आज भी उपलब्ध हैं!