हस्तमैथुन से सेक्स के प्रति अरुचि पैदा नहीं होती बल्कि इसका उल्टा होता है! 4 जून 2015

कल मैंने हस्तमैथुन के बारे में लिखते हुए कहा था कि क्यों यह बहुत नैसर्गिक बात है कि अपने कामोन्माद का शमन करने के लिए आप स्वयं अपनी मदद करें। मेरी ऐसी ही एक टिप्पणी पर कुछ दिन पहले मेरे के मित्र ने आपत्ति उठाई और कहा, ‘बहुत ज़्यादा हस्तमैथुन करने से प्रेमी युगल के बीच सेक्स के प्रति अरुचि पैदा हो सकती है’। मुझे लगा कि निश्चय ही यह विचार काबिले गौर है और इस पर कुछ पंक्तियों का ब्लॉग लिखा जाना चाहिए!

तो आप कह रहे हैं कि अगर आप ज़्यादा हस्तमैथुन करते हैं तो आपको अपने साथी के साथ सोने की इच्छा नहीं होती-ठीक? मुझे लगता है कि ऐसा वास्तव में हो ही नहीं सकता क्योंकि अगर मुकम्मल संभोग संभव नहीं हो पाता तो हस्तमैथुन उसका महज एक कमतर विकल्प है। वह दो मनुष्यों के बीच होने वाले वास्तविक संभोग से प्राप्त होने वाले आनंद का स्थानापन्न नहीं हो सकता। अगर आपको लगता है कि ऐसा है तो आपको अपने सेक्स जीवन और आपसी संबंधों के बारे में सोच-विचार करके उसे बेहतर बनाने पर काम करना चाहिए!

सेक्स तब संभव होता है जब उसमें दो लोग शामिल होते हैं। हस्तमैथुन स्वाभाविक है-लेकिन अगर आपका कोई बॉयफ्रेंड या गर्ल फ्रेंड नहीं है या आप शादीशुदा नहीं हैं तो वह सिर्फ एक दूसरे विकल्प का चुनाव भर है। अगर आपका कोई साथी मौजूद है तो उसके साथ अंतरंग होना आपके लिए हमेशा और हर तरह से हस्तमैथुन की तुलना में अधिक सुखद और आनंददायक होगा! अगर आप किसी अंतरंग संबंध में मुब्तिला हैं और फिर भी हस्तमैथुन की आवश्यकता महसूस करते हैं तो आपको गंभीरतापूर्वक सोचना चाहिए कि आखिर आप इस अंतरंग संबंध को क्यों जारी रखे हुए हैं- या फिर यह कि इसके बावजूद हस्तमैथुन करने कि इच्छा क्यों हो रही है। सीधी सी बात है, अगर आप मर्सीडीज़ में सफर कर सकते हैं तो आप आटो रिक्शा क्यों लेंगे?

तो मुझे इसका बिलकुल उल्टा ठीक लगता है: हस्तमैथुन की अधिकता इसका कारण नहीं है कि अपनी पत्नी या पति से संभोग करने में आपकी रुचि कम हो गई है। बल्कि अपने साथी के साथ संभोग में अरुचि का फल है कि आपको आनंद के लिए हस्तमैथुन जैसे दूसरे विकल्प ढूँढ़ने पड़ रहे हैं!

अगर आप ऐसा महसूस करते हैं तो मैं सलाह दूंगा कि ठीक-ठीक क्या हो रहा है, इसका विश्लेषण कीजिए। क्या आप अपने संबंधों में खुश नहीं हैं इसलिए अपने साथी में अब आपकी रुचि समाप्त हो गई है? या क्या आपका यौन जीवन संतोषजनक नहीं है, क्या वह बोरिंग हो चुका है या ऊब पैदा करने लगा है या क्या आपके मन में ऐसी कोई फंतासी है, जिसे आप अपने साथी के साथ साझा नहीं कर पा रहे हैं? बातचीत कीजिए, अपने साथी से इस विषय में खुलकर चर्चा कीजिए! जो भी है, उसे अपने साथी के साथ आवश्यक रूप से साझा कीजिए, जिससे समस्या का समाधान आपस में मिलकर कर सकें और अपना सामान्य यौन जीवन वापस पा सकें!

इस चर्चा का सारांश इस प्रकार है: हस्तमैथुन करके अपराधी महसूस न करें। हस्तमैथुन आपको कोई हानि नहीं पहुँचाता। समाचार पत्रों में प्रकाशित विज्ञापनों में बताई गई संदेहास्पद दवाइयाँ आपकी तथाकथित ‘बचपन की गलतियों’ के कारण पैदा हुई स्वप्नदोष या शीघ्रपतन जैसी कथित बीमारियों का कोई इलाज नहीं कर सकतीं और न तो हस्तमैथुन करने से शिश्न छोटा होता है और न ही इन दवाइयों से वह बड़ा हो सकता है! भले ही पूरी किशोरावस्था में आप हस्तमैथुन करते रहे हों, इन समस्याओं का परस्पर कोई संबंध ही नहीं है। इसलिए अगर यौनानन्द के लिए आपको किसी का साथ उपलब्ध नहीं है तो अपनी मदद खुद कीजिए!

अगर सेक्स के लिए आपको कोई साथी उपलब्ध है लेकिन उसके साथ सेक्स संबंध आपको आनंदित नहीं करता तो यह दूसरा मामला है और हस्तमैथुन करने के स्थान पर उसे आपको आपस में मिलकर सुलझाना चाहिए, जिससे आप अपने यौन जीवन में पुनः आनंद का संचार कर सकें। क्योंकि भले ही यह सही है कि आपके संबंध सिर्फ सेक्स पर आधारित नहीं होने चाहिए लेकिन सेक्स इन अंतरंग संबंधों का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ तो है ही।

अपने हाथ की मदद लें – आपको हस्तमैथुन करते हुए अपराधी क्यों महसूस नहीं करना चाहिए! 3 जून 2015

परसों मैंने आपको काम-वासना की अपनी परिभाषा संक्षेप में बताई थी और यह भी बताया था कि क्यों मैं समझता हूँ कि वह एक सुखद और अच्छी चीज है। उसके बाद कल मैंने बताया कि बढ़ती हुई बलात्कार की घटनाओं का कारण अश्लील फ़िल्में क्यों नहीं हैं-शायद आपमें से कुछ लोगों को इससे आश्चर्य हुआ होगा। वह सब सिर्फ काम-वासना और सेक्स के बारे में मैंने लिखा था-लेकिन आज मैं यौन तुष्टि प्राप्त करने के एक और तरीके के बारे में लिखना चाहता हूँ-हस्तमैथुन।

वास्तव में मेरे विचारों पर मुझे एक प्रतिक्रिया प्राप्त हुई है। मैंने ज़िक्र किया था कि अपनी काम-वासना के शमन के लिए सबके पास विकल्प मौजूद होते हैं। एक व्यक्ति ने प्रतिक्रिया व्यक्त की: 'मैं नहीं मानता कि काम भावना बुरी चीज़ है। मैं सहमत हूँ कि यह एक नैसर्गिक अनुभूति है-लेकिन हस्तमैथुन नैसर्गिक नहीं है! वह पूरी तरह अप्राकृतिक है!'

दुर्भाग्य से यह गलत धारणा सर्वत्र व्याप्त है और सिर्फ भारत में ही नहीं कुछ अन्य देशों में भी। जब किशोर-किशोरियों को यौनेच्छा होने लगती है और वे उसे खुद अपने शरीर के ज़रिए जाँचना-परखना चाहते हैं, तभी से उन्हें ये झूठी बातें बता दी जाती हैं।

लड़कों को डराया जाता है कि जब भी उनका वीर्य स्खलित होता है, वे अपने जीवन की ऊर्जा (जीवनी शक्ति) का एक अंश खो बैठते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि हर बार जब आप हस्तमैथुन करते हैं, अपने जीवनकाल का कुछ समय कम कर लेते हैं। अर्थात, ज़्यादा हस्तमैथुन करने पर आप लम्बी उम्र तक जी नहीं सकते। कुछ दूसरे अभिभावक अपने लड़कों को बताते हैं कि हस्तमैथुन से अंधत्व आता है। ये बच्चे जब किसी अंधे व्यक्ति को देखते होंगे तो पता नहीं क्या सोचते होंगे! 🙂

हमेशा लड़कियों से कहा जाता है कि अपने शरीर को न छुओ। खुद अपने शरीर के साथ कैसे सम्बन्ध हों, इस बारे में उन्हें अजीबोगरीब बातें सिखाई जाती हैं। जबकि लड़कों के लिए अधिक यौनेच्छा होना पुरुषत्व की निशानी माना जाता है, लड़कियों में उसे शर्मनाक और पाप माना जाता है। अपनी जननेन्द्रियों के बारे में कोई भी बात करना उनके लिए शर्म की बात होती है और ऐसा करना अपराध माना जाता है, यहाँ तक कि अपने मासिक धर्म के बारे में भी-अब आप ही बताइए, ऐसे माहौल में हस्तमैथुन कहाँ से स्वीकार्य होगा? जब माताएँ अपनी बच्चियों को सेक्स के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं बतातीं, सिवा इसके कि 'जो कुछ करना होगा, पति कर लेगा'? जब लड़कियाँ टैंपोन्स का प्रयोग नहीं करतीं या योनि में डालकर ग्रहण की जाने वाली दवाओं का प्रयोग नहीं करतीं क्योंकि वे अपने गुप्तांगों को छूना नहीं चाहतीं कि कहीं उनकी कौमार्य भंग न हो जाए?

तो मैं जानता हूँ कि मेरे लिखने से ज़्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला लेकिन हो सकता है, कुछ लोगों को इसमें सोचने-समझने के लिए थोड़ी-बहुत वैचारिक खुराक मिल जाए: हस्तमैथुन संसार का सबसे अधिक नैसर्गिक काम है! आप खुद आसपास के जानवरों को ध्यान से देखिए-वे हर समय यह सब करते रहते हैं! हमारे बगीचे में कुछ बंदर हैं, जो आपस में हर समय सेक्स करते रहते हैं और आसपास कोई न भी मिले तो भी, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता- वे अपने लिए राहत का उपाय ढूँढ़ ही लेते हैं!

मैं मानता हूँ कि हम बंदरों से कुछ अलग हैं-हालाँकि, जितना दिखाई देते हैं, उतना अलग भी नहीं हैं-लेकिन हस्तमैथुन मनुष्यों के लिए भी पूरी तरह प्राकृतिक है! यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि अगर कभी-कभी आप अपने कामोन्माद की तुष्टि स्वयं कर लेते हैं तो उससे कोई शारीरिक या स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ पैदा नहीं होतीं। इससे आप जल्दी नहीं मरने वाले और न ही आप अंधे होंगे। इसके विपरीत, यौनेत्तजना और उसका नैसर्गिक शमन आपके शरीर में बहुत से लाभप्रद हार्मोन्स, एंड्रोर्फ़िन्स आदि, भी पैदा करते हैं और उससे आपको सिर्फ विश्राम ही नहीं मिलता या तनाव ही दूर नहीं होता। उसके बाद आप अपने काम में अधिक एकाग्र हो सकते हैं, आपकी कार्यक्षमता बढ़ जाती है और आप अधिक प्रसन्न महसूस करते हैं, क्योंकि आपने अपनी एक मूलभूत इच्छा और शारीरिक ज़रूरत पूरी की है!

आपकी जानकारी के लिए एक बात और बता दूँ कि आप मुझसे कितना भी कहें कि आप न तो हस्तमैथुन करते हैं और न ही कभी किया है, हम सब असलियत जानते हैं-यह काम सब करते हैं और सबने कभी न कभी यह किया होता है! हाँ, उसके लिए सबको अपराध-बोध अलग-अलग मात्रा में होता है!

स्वाभाविक ही, अगर आप ऐसे ईश्वर पर विश्वास करते हैं, जो आपको इस बात की सजा देता है कि आप अपने आपको अपने प्रयासों से खुश रख पा रहे हैं, तो यह आपकी मर्ज़ी है। ठीक है, अपने आपको पापी समझिए-लेकिन मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि अगर आप उस पर विश्वास न करने का निर्णय कर लें तो आपका जीवन अधिक सुखद हो जाएगा!

ऐसा जीवन, जिसकी डोर पूरी तरह आपके हाथों में होगी – अक्षरशः!

अश्लील फिल्में बलात्कार का कारण नहीं हैं। क्यों? 2 जून 2015

कल मैंने एक परिचित का ज़िक्र किया था, जिसकी निगाह में, अश्लील फिल्मों के कारण भारत में बलात्कार के प्रकरण बढ़े हैं। मैं पहले ही बता चुका हूँ कि मेरे विचार में काम-वासना एक सुंदर एहसास है। आज मैं उन गलत तर्कों के बारे में लिखना चाहता हूँ, जिनके द्वारा यह प्रमाणित करने की कोशिश की जाती है कि अश्लील फिल्मों के कारण बलात्कारों की संख्या में इजाफा हो रहा है क्योंकि वे कामोत्तेजना पैदा करती हैं।

साधारण शब्दों में कहा जाए तो यह निष्कर्ष पूरी तरह गलत है। अश्लील फिल्में बलात्कार का कारण नहीं हैं। यह गलत है कि पुरुष अश्लील फिल्में देखते हैं, कामोत्तेजित होते हैं और किसी तरह संतुष्ट नहीं हो पाते तो बाहर निकलकर स्त्रियॉं के साथ बलात्कार करना शुरू कर देते हैं। अश्लील फिल्में देखने का अर्थ यह नहीं है कि आप लोगों के साथ बलात्कार करने लगते हैं!

बहरहाल, यह बताना आवश्यक है कि महिलाएँ भी अश्लील फिल्में देखती हैं! कुछ लोगों को यह बात थोड़ी आश्चर्यजनक लग सकती है लेकिन यह एक तथ्य है। फिर क्यों नहीं वे भी कामोत्तेजना में पागल होकर बलात्कार करने निकल पड़तीं? इस विचार पर हँसे नहीं-जी हाँ, ऐसा भी होता है, जहाँ महिलाएँ बलात्कार करती हैं और पुरुष पीड़ित की भूमिका में होता है। बस ऐसा कभी-कभी ही होता है और सिर्फ एक मामूली अपराध मानकर उसे दबा दिया जाता है। लेकिन यह सच है कि महिलाएँ भी अश्लील फिल्में देखती हैं। तो फिर उनकी काम-वासना कहाँ निकलती है?

पहले जब अश्लील फिल्में नहीं हुआ करती थीं तब भी बहुत सी दूसरी कलाएँ और साहित्य होता था, जैसा कि मैने कल ज़िक्र भी किया था। यह हजारों सालों से हो रहा है, यह नई बात नहीं है! खजुराहो के मंदिरों में उकेरे गए कामोद्दीपक मूर्तिशिल्पों की कल्पना करें! आपके अनुसार तो यह होना चाहिए कि इन कामोत्तेजक मूर्तियों को देखने वाला हर शख्स, भले ही वे मूर्तियाँ तकनीकी रूप से उतनी विकसित न हों, काम-वासना में इस कदर पागल हो जाना चाहिए कि किसी भी स्त्री को पकड़कर बलात्कार शुरू कर दे। उन पर्यटकों की कल्पना करें, जो इन कामसूत्र मंदिरों को देखने के लिए पैसे खर्च करते हैं और मूर्तियों को देखकर इतने कामोत्तेजित हो जाते हैं कि पास से निकल रही किसी महिला पर्यटक को दबोच लेते हैं! वाकई ये मंदिर बहुत खतरनाक हैं और उन्हें वैश्विक-घरोहर माना गया है! आश्चर्य है!

मज़ाक छोड़िए। मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि न तो अश्लील फिल्में और न ही काम-वासना बलात्कार का कारण होते हैं।

कुछ लोग कहते हैं कि महिलाओं के कपड़े बलात्कार का कारण है। कुछ दूसरे कहते हैं, भारतीय समाज का पश्चिमीकरण इसका कारण है। कुछ ज़्यादा ही मूर्ख लोग कहते हैं कि गलती मोबाइल फोनों की और पश्चिमी खान-पान की है-और बहुत से लोग उनकी बात पर यकीन भी कर लेते हैं! आप अपने विचार अपने पास रखें, मैं आपसे सहमत नहीं हूँ। मेरी नज़र में, कामोत्तेजना का दमन ही इसका मुख्य कारण है और कुछ मामलों में-स्त्रियॉं का दमन करने के इरादे से और उन्हें उनकी औकात बताने तथा दूसरी वस्तुओं की तरह, उपभोग की वस्तु मान लेना बलात्कार कारण है।

आप समझ गए होंगे कि मैं किस ओर इशारा कर रहा हूँ: जो समाज सेक्स को लेकर ज़्यादा खुले हुए हैं और जहाँ लैंगिक समानता काफी हद तक मौजूद है, वहाँ उन मुल्कों के मुकाबले, जहाँ स्त्रियों का दमन किया जाता है और सेक्स अब भी वर्जनामुक्त नहीं है, यौन अपराध कम होते हैं! जहाँ वर्जनाएँ हैं, दमन है और जहाँ सेक्स संबंधी हर बात आप छिपाते हैं या उन्हें छिपाकर करना पड़ता हैं तो परिणामस्वरूप यह दमन और ये वर्जनाएँ विस्फोटक रूप से सामने आती हैं।

उन पुरुषों के लिए, जो महिलाओं के दमन में विश्वास रखते हैं, बलात्कार अपने शक्ति-प्रदर्शन का और महिलाओं को उनका नीचा स्थान दिखाने का ज़रिया बन जाता है। एक ऐसा दुष्कर्म, जिससे वे महिलाओं की इच्छाशक्ति का खात्मा कर देना चाहते हैं और सिद्ध करना चाहते हैं कि वह उससे कमज़ोर है। इसके लिए कामोत्तेजना की ज़रूरत नहीं है, इसमें किसी तरह का यौन-आनंद प्राप्त नहीं होता। मेरा विश्वास है कि बलात्कारी भी इससे कोई संतोष प्राप्त नहीं कर सकता!

और, जैसा कि मैंने पहले भी इशारा किया, महिलाओं की और खुद अपनी नैसर्गिक सहज-प्रवृत्ति और यौन ज़रूरत के इस दमन के मूल में धर्म मौजूद है। धर्म, परंपरा और संस्कृति ने अप्राकृतिक ढंग से यौनेच्छाओं को लोगों के मन में एक मानसिक दैत्य में तब्दील कर दिया है। आपको स्वतंत्र रूप से अपनी सेक्स विषयक इच्छाओं के विषय में निर्णय लेने की अनुमति नहीं है, आपको सेक्स के बारे में सोचने की या उसका आनंद उठाने की अनुमति नहीं है! यह दमन ही एक सीमा के बाद उसे एक विस्फोट के रूप में फटने के लिए मजबूर कर देता है!

अगर आपका सहजीवन (वैवाहिक जीवन) सुखद और प्रेममय है तो स्वाभाविक ही, आपकी काम-वासना को बाहर निकलने का मौका मिल जाता है और आप दमित कामेच्छा से मुक्त होते हैं। जिस व्यक्ति को यौन संतुष्टि प्राप्त है वह भला बलात्कार क्यों करेगा? अगर आपके आसपास कोई नहीं है, जिससे आप यौन संतुष्टि प्राप्त कर सकें तो फिर बात अलग है। लेकिन ऐसी स्थिति में भी बलात्कार कतई तार्किक परिणति नहीं है! सभी जानते हैं कि इसका भी उपाय है: आप खुद अपनी मदद कर सकते हैं! जी हाँ, पुरुष और महिलाएँ, दोनों के पास अपनी यौन क्षुधा शांत करने के उपाय उपलब्ध हैं। दुर्भाग्य से उन पर भी पाबंदी है: धर्म कहता है कि वे उपाय करने से आप अंधे हो जाएँगे, कि आप अपनी ऊर्जा व्यर्थ खो बैठेंगे, कि ऐसा करना पापकर्म है! आगे किसी दिन मैं एक पूरा ब्लॉग हस्तमैथुन पर लिखना चाहूँगा, जिसमें मैं उन समस्याओं पर भी प्रकाश डालूँगा, जिनके चलते लोग हस्तमैथुन करके अपराध बोध से ग्रसित हो जाते हैं।

और अंत में हम इसी नतीजे पर पहुँचते हैं कि अश्लील फिल्में बलात्कार का कारण नहीं हैं। कारण काम-वासना का दमन है-और भारत में बढ़ते यौन अपराधों की भयावह स्थिति भी इसी का नतीजा है!

कामुकता – एक आनंदित करने वाली नैसर्गिक अनुभूति – उसे बीमारी समझने वाले स्वयं बीमार हैं – 1 जून 2015

कुछ समय पहले मेरे एक परिचित ने अश्लील फिल्मों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी नज़र में ये फिल्में लोगों के मन में काम-वासना या कामोत्तेजना पैदा करती हैं और उसी का परिणाम है कि भारत में बलात्कार की घटनाएँ बढ़ती चली जा रही हैं। संक्षेप में, वे सोचते हैं कि जितना ज़्यादा अश्लील फिल्में लोग देखेंगे, उतनी ही अधिक संख्या में महिलाओं पर बलात्कार होगा।

इससे पहले कि मैं और विस्तार में जाऊँ, मैं एक बात स्पष्ट करना चाहता हूँ: कामुकता या कामोत्तेजना बुरी चीज़ कतई नहीं है। यह इंद्रियों में होने वाली एक नैसर्गिक संवेदना, अनुराग और एहसास है और वह सभी में पाई जाती है। पुरुष और स्त्रियाँ, शारीरिक रूप से सक्षम या अक्षम, बच्चों से लेकर बूढ़ों तक, यह हर एक व्यक्ति में मौजूद होती है। काम-वासना सब में है-सच यह है कि अगर आपमें नहीं है तो आपके शरीर में कोई न कोई विकृति है! हर एक में अलग-अलग परिमाण में काम-वासना पाई जाती है, जो उनके शरीर में मौजूद हार्मोन्स और निश्चित ही, मानसिक अवस्थाओं से उपजी भौतिक परिस्थितियों पर निर्भर होती है।

सामान्य परिस्थितियों में भी वह आसानी से उत्पन्न हो जाती है। वास्तव में, एक मामूली विचार भी काम-वासना पैदा करने के लिए पर्याप्त है। इसके लिए फिल्म या किसी कामोत्तेजक फोटो या तस्वीर की ज़रूरत नहीं है! इसके अलावा, सामान्य बॉलीवुड या हॉलीवुड मूवी भी आपमें कामोत्तेजना या काम-वासना पैदा कर सकती है-या अपने कार्यालय में अपनी कुर्सी पर बैठे, कोई बिल्कुल अलग काम करते हुए भी महज एक विचार आपमें कामोत्तेजना पैदा कर सकता है! इसके विपरीत, अगर किसी व्यक्ति में कोई शारीरिक या मानसिक गड़बड़ी है और वह कामोत्तेजना महसूस नहीं कर पाता तो घंटो अश्लील फिल्में देखता रहे, उसे कभी, कोई कामोत्तेजना नहीं होगी!

न सिर्फ कामवासना नैसर्गिक है, वह वास्तव में बहुत खूबसूरत चीज़ भी है! काम-वासना की भावना से और खासकर जब आप उसे संतुष्ट कर देते हैं तो आप भीतर तक स्वतः ही खुशी और आनंद में डूबने-उतराने लगते हैं, परितुष्ट महसूस करते हैं, प्रेम की गहरी अनुभूति में सराबोर हो उठते हैं। काम-वासना आपको असीम प्रसन्नता और मुक्ति प्रदान करती है और मेरी नज़र में, वह बलात्कार जैसे घृणित अपराध का कारण हो ही नहीं सकती! इस उत्कट आनंद के साथ बलात्कार की कोई संगति नहीं बैठती। लेकिन इसके बारे में और अधिक विस्तार से कल लिखूँगा।

काम-वासना हमेशा से इस संसार का हिस्सा रही है। यह सर्वव्यापी है-साहित्य से लेकर कलाओं तक, घरों में मौजूद मूर्तियों से लेकर पूजास्थलों में उकेरी गई चित्रकारी तक। तकनीक के विकास के साथ इनकी प्रतिकृतियाँ सर्वसुलभ हो गई हैं, माउस के एक क्लिक के साथ आपके कंप्यूटर स्क्रीन पर तुरंत हाजिर! लेकिन दुर्भाग्य से कामवासना या कामोत्तेजना के बारे में वही पुरानी समझ अब भी बरकरार है, उसमें रत्ती भर भी परिवर्तन नहीं हुआ है।

आज भी बहुत से लोग काम-वासना को बुरी चीज़ समझते हैं। जितना अधिक वे कट्टर होते जाते हैं, काम-वासना, सेक्स और उसके आसपास मौजूद हर चीज़ को वे उतना ही अधिक बुरा समझते जाते हैं। कामुक होना बीमार मस्तिष्क होने का प्रमाण माना जाता है। एक स्वस्थ मस्तिष्क में ऐसे कामोत्तेजक विचार नहीं आ सकते और पाक-साफ़ शरीर में ऐसे एहसासात, ऐसी इच्छाएँ और वासनाएँ पैदा भी नहीं होनी चाहिए। अगर आप सेक्स का आनंद लेते हैं या उसके बारे में सोचते भी हैं तो अपने आपको अपराधी महसूस करना चाहिए। शारीरिक वासनाओं की अनुभूति का दमन किया जाना चाहिए। अतिधार्मिक लोग ब्रह्मचर्य की इसी धारणा पर विश्वास करते हैं। सन्यास के ज़रिए वे पवित्रता प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।

मैं समझता हूँ कि यही वास्तव में रुग्ण सोच है। धर्म ने लोगों के मन में यह बात बिठा दी है कि कामुकता बुरी चीज़ है। यह पूर्वाग्रह ही लोगों को शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार बनाता है! ब्रह्मचर्य पूरी तरह अप्राकृतिक विचार है। संभोग का दमन करके शुद्धि प्राप्त करने का दावा करना पूरी तरह अवैज्ञानिक है लेकिन धर्म इसकी परवाह नहीं करता!

यौनेच्छाओं का यही दमन पुरुषों और महिलाओं को उसकी खोज की ओर, उसकी अधिकाधिक जाँच-परख की ओर उद्यत करता है, भले ही यह वे ढँके-छुपे तरीके से करते हों। और उसके बाद वह कई रुग्ण तरीकों से फूट पड़ता है-यौन अपराध की शक्ल में, जिन्हें होता हुआ हम रोज़ देखते हैं, क्योंकि अपनी नैसर्गिक उत्तेजनाओं को बाहर निकालने का कोई रास्ता उनके पास नहीं होता!

कामुकता: सैकड़ों सालों से उसकी शोहरत एक मनोविकार के रूप, एक गर्हित अनुभूति के रूप में रही है और मेरे विचार में, इस धारणा को बदलने का वक़्त आ गया है!

महिलाएं प्रेम करती हैं मगर पुरुष सिर्फ कामुक होते हैं! नारीवादी किस तरह लिंगभेद के खिलाफ काम करती हैं-13 फरवरी 2014

हिन्दू धर्मग्रंथों में कहा गया है कि पुरुषों के मुक़ाबले महिलाएं आठ गुना ज़्यादा कामुक होती है। स्वाभाविक ही मैं इस कथन को धर्म द्वारा महिलाओं को काबू में रखने और पुरुषों को उनसे पवित्र साबित करने और सेक्स को एक बुरी चीज़ के रूप में पेश करने की अनुचित चेष्टा करार देते हुए निरस्त कर दुंगा। इसके विपरीत हाल ही में मैंने नारीवादियों के बीच लोकप्रिय एक जुमला पढ़ा: पुरुष सिर्फ सेक्स के लिए महिलाओं से प्रेम करते हैं जबकि महिलाएं प्रेम के चलते पुरुष के साथ सेक्स के लिए तैयार होती हैं। मुझे लगता है कि यह कथन भी उपरोक्त धार्मिक कथन जितना ही अनुचित है! क्यों? यही बताने के लिए मैं आज यह ब्लॉग लिख रहा हूँ।

आखिर नारीवादी क्या चाहते हैं? जहाँ तक मैंने समझा है वे न सिर्फ पितृसत्ता से और इस तरह पुरुषसत्ता से और पुरुषों द्वारा महिलाओं के दमन से मुक्ति चाहती हैं बल्कि वे अंततः “लैंगिक समानता” चाहती हैं। लक्ष्य मातृसत्ता की स्थापना नहीं है और न ही महिलाओं द्वारा पुरुषों का दमन ही लक्ष्य है। लक्ष्य है दोनों की, यानी पुरुषों और महिलाओं की बराबरी। अगर आप यह लक्ष्य पाना चाहती हैं तो आपको पुरुषों को नीचा दिखाने की ज़रूरत नहीं है, जैसा कि उक्त कथन से ज़ाहिर हो रहा है।

पुरुष सिर्फ सेक्स के लिए ही महिलाओं से प्रेम करते हैं, यह मान लेने पर स्पष्ट ही आप यह भी मान लेती हैं कि पुरुषों में सिर्फ यौन लिप्सा पाई जाती है, प्रेम नहीं, जब कि महिलाएं प्रेमपूर्ण होती हैं और सिर्फ प्रेम के नैसर्गिक इज़हार के लिए सेक्स के लिए तैयार होती हैं। अगर पुरुषों के साथ हुए अपने नकारात्मक अनुभवों के चलते आप सभी पुरुषों को इस तरह वर्गीकृत कर देंगी तो आप सभी पुरुषों को पूरी तरह नकार देंगी। इससे यह होगा कि सारे पुरुषों पर से आपका विश्वास उठ जाएगा क्योंकि कौन होगा जो ऐसे पुरुष को पसंद करे जिसमें सिर्फ लिप्सा हो, प्रेम न हो। आप किसी पुरुष को चुन तो लेंगी मगर उस पर विश्वास नहीं कर पाएँगी क्योंकि आप उपरोक्त कथन से पूर्णतः प्रभावित हैं।

पुरुषों के पास सिर्फ शरीर ही नहीं, भावनाएँ भी होती हैं! आप पुरुषों के साथ वैसा ही व्यवहार कर रही हैं, जिसका आरोप आप उन पर लगा रही हैं यानी अपने से विपरीत-लिंगी व्यक्ति को सिर्फ शरीर की हद तक सीमित कर देना। लेकिन ऐसा पक्षपात क्यों?

मैंने ऐसी महिलाएं भी देखी हैं जिन्हें सिर्फ सेक्स में रुचि होती है। उसी तरह मैंने ऐसे पुरुष भी देखे हैं जो उससे उकता गए हैं और सिर्फ प्रेम के भूखे हैं। पुरुष और महिलाएं, दोनों ही मनुष्य हैं, उनमें लिंगभेद हो सकता है लेकिन हर एक का व्यक्तित्व अलग है, हर एक मनुष्य के चरित्र, विचार और व्यवहार में बहुत अंतर पाया जाता है!

पुरुष और महिलाओं के बीच जैविक भेद बहुत ही कम है और उनके डीएनए में बहुत, बहुत ही कम अंतर पाया जाता है। उस मामूली अंतर की तुलना में समाज द्वारा लादे गए नियमों के चलते उनके बीच कई गुना भेद पैदा हो गया है। ऐसे कथनों और नियम-कायदों के कारण ही पुरुष और महिलाओं के मन में एक दूसरे के खिलाफ ऐसी धारणाएँ घर कर लेती हैं। पुरुषों को सख्त होना चाहिए, महिलाओं को सौम्य और मृदुल; पुरुष कहीं भी आ-जा सकते हैं लेकिन महिलाएं नहीं जा सकतीं-महिलाओं को पुरुषों से अलग मानते हुए समाज ने ही ऐसी सीमाएं खड़ी कर दी हैं और उनके अलग-अलग स्तर नियत कर दिये हैं।

लेकिन मैं ऐसी कई महिलाओं से मिला हूँ जो इस ढांचे को तोड़ती नज़र आती हैं और अपनी संवेदनाओं, विचारों और अपने तौर-तरीकों में पूरी तरह अलग हैं। यही बात पुरुषों पर भी लागू होती है। जब तक आप इस तरह सोचेंगे आप कभी भी लैंगिक समानता का लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते। पुरुष मानव समाज का आधा हिस्सा हैं और उन्हें नीचा दिखाकर, उनके विषय में अनर्गल प्रचार करके आप उनसे अपने प्रति सम्मानजनक रवैये की उम्मीद नहीं कर सकते। आपको हर एक व्यक्ति का अलग-अलग मूल्यांकन करना होगा और लिंग संबंधी घिसी-पिटी धारणाओं से बचना होगा। आपको यह समझना होगा कि हर व्यक्ति की एक अलग इयत्ता है, चाहे वह पुरुष हो या महिला, और हर एक अपनी अपूर्वता में महत्वपूर्ण और सुंदर है और इसलिए आपके आसपास के सभी लोग एक समान और एक जैसे महत्वपूर्ण हैं।