अपरा का चौथा जन्मदिन समारोह – 10 जनवरी 2016

कल अपरा का चौथा जन्मदिन था! हर साल की तरह स्कूल के बच्चों और बहुत सारे दोस्तों के साथ इस साल भी शानदार पार्टी आयोजित की गई, जिसमें स्वादिष्ट खाने का लुत्फ भी लिया गया!

दिन की शुरुआत हुई आश्रम की सजावट के साथ। हमारा इरादा सिर्फ फुग्गे लगाने का था-लेकिन हजारों की संख्या में! इस इरादे से हमने फुग्गे और फुग्गे फुलाने की मशीन खरीदी, जो बिजली से चलती है और पल भर में फुग्गे फुला देती है। अन्यथा हमें कई दिन पहले से मुँह से फुग्गे फुलाने पड़ते! कुछ अनुभवी लोगों ने तड़के सबेरे से फुग्गे फुलाने शुरू किए और फिर उनसे रंगीन तोरणद्वार बनाए और बड़ी-बड़ी सुंदर मालाएँ भी बनाईं।

हमारी अपेक्षा से कुछ देर से रसोइयों ने अपना काम शुरू किया। मेरे खयाल से गलती उनकी नहीं थी, हमारी थी कि हम कुछ ज्यादा उम्मीद कर गए। रसोइयों ने सफाई पेश की: “इतनी ठंड है, कोई भी इतनी जल्दी सबेरे नहीं उठना चाहता!” खैर, आखिर किसी तरह वे जागे और फिर योजना के अनुसार एक से एक स्वादिष्ट खाने की वस्तुएँ बनाने की तैयारी शुरू कर दी।

दस बजे लगभग सारे खास मेहमान पधार चुके थे: यानी हमारे स्कूल के बच्चे! उनके अलावा हमारे कुछ सबसे प्यारे मित्र भी धीरे-धीरे आने लगे-और उसके बाद नाच-गाने के साथ तुरंत ही हमने पार्टी शुरू कर दी। बच्चे जब झूम-झूमकर नाचने-गाने लगते हैं, तो वह समय सबसे खूबसूरत होता है और बड़ों सहित दूसरे सब भी अपनी झिझक और शर्म भूलकर उसमें शामिल हो जाते हैं!

इसी बीच अपरा को भूख लग गई-आखिर जब से उठी थी उसने कुछ नहीं खाया था, क्योंकि वह भी तो सारी तैयारियों में लगी हुई थी और बाद में उपहार ले रही थी, चॉकलेट खा रही थी! तो जब सब लोग गानों की धुनों पर थिरक रहे थे, रमोना उसे लेकर खाने के स्टाल्स की तरफ चली गई, जहाँ नूडल्स थे, पैनकेक थे और कुछ दूसरे नाश्ते और मिठाइयाँ रखी थी और अब भी तैयार किए जा रहे थे, जिससे मेहमानों को गरमागरम नाश्ता प्राप्त हो सके। वहाँ रमोना ने एक प्लेट में अपरा के लिए सबसे पहले नूडल्स निकाले और उसके जर्मन नाना के लिए आलू की टिकिया। धींगामस्ती और होहल्ले के सबसे पीछे बैठकर दोनों ने पार्टी के पहले स्वादिष्ट कौर का स्वाद लिया!

अपरा को पहले ही खिलाकर रमोना ने अच्छा किया क्योंकि जब औपचारिक रूप से नाश्ते का दौर शुरू हुआ तो स्कूल के बच्चे उन पर टूट पड़े और बहुत देर तक कोई दूसरा खानों तक पहुँच ही नहीं सकता था क्योंकि सामने अपनी बारी का इंतज़ार करता हुआ बच्चों का विशाल हुजूम होता था! काफी समय बाद तक वे लोग अपने मुँह में एक से एक स्वादिष्ट नाश्ते लिए फिरते रहे और पेट भरने तक खाते रहे। उनके लिए यह पार्टी का सबसे शानदार दौर होता है और वे उस अत्यंत सुस्वादु नाश्ते को भोजन की तरह खाते हुए बेहद खुश और रोमांचित थे।

केक काटने से पहले कुछ और नाच-गाना हुआ। अपरा ने पहला कट लगाया और बाद में सबको उस अत्यंत स्वादिष्ट केक का एक-एक टुकड़ा प्राप्त हुआ। जब अपरा ने अपना हिस्सा खा लिया, वह भी डांस फ्लोर पर नाच रहे लोगों में शामिल हो गई और अपना खुद का प्रदर्शन भी प्रस्तुत किया-एक डांस जिसे पिछले हफ्ते ही उसने सीखा था।

अंत में, जब बच्चे और हमारे कुछ मेहमान चले गए, अपरा ने अपने उपहार खोलना शुरू किया: सुंदर वस्त्र, रंगीन पेंसिलें और दूसरे खेल-खिलौने!

अंत में हमने आराम से बैठकर सुस्वादु डिनर के साथ पार्टी का समापन किया और शाम का बाकी का समय उन दोस्तों के साथ बढ़िया गपशप में गुज़ारा, जो रात को रुकने वाले थे।

पार्टी बहुत शानदार रही: अपरा के जन्म का चौथा स्मरण और पुराने मित्रों के साथ दोबारा एकत्र होने का सुअवसर!

जर्मनी के खूबसूरत दौरे से भारत वापसी – 6 दिसंबर 2015

हम अपने घर भारत लौट आए हैं। जर्मनी में बिताया पिछला हफ्ता बड़ा शानदार रहा: हमने वहाँ खूब मस्ती की, हमें बहुत सारे नए अनुभव प्राप्त हुए और वहाँ के बारे में हमें बहुत सी नई जानकारियाँ हासिल हुईं।

सोमवार को हम वापस वीज़बाडेन लौट आए। अपरा की नानी से हम पहले ही, रविवार के दिन बिदा ले चुके थे क्योंकि उन्हें सबेरे जल्दी ही अपने काम पर लगना था। उसके बाद हमने रमोना के पिताजी से एक और भावुक बिदाई ली और अपनी ट्रेन पकड़ी।

हालांकि अपने दूसरे गृहराष्ट्र, जर्मनी के अंतिम दिनों के लिए हमने कोई कार्यक्रम नहीं रखा था, फिर भी सारा वक़्त हम भरपूर व्यस्त रहे: हम इस बार थॉमस के साथ एक अन्य स्वीमिंग पूल में गए, जहाँ फिसल-पट्टियाँ भी थीं, भाप लेने का कमरा भी और मसाज जेट भी। अपरा वहाँ खूब खेलती रही, तैरने की कोशिश की, पानी में उछल-कूद करती रही और बार-बार फिसल-पट्टी पर फिसलती रही।

थॉमस और आइरिस हमें इस दौरे के तीसरे क्रिसमस मार्केट ले गए, वीज़बाडेन वाला। बिजली के लट्टुओं की खूबसूरत सजावट, महीन संगीत और कुल मिलाकर उन बाज़ारों के ख़ास क्रिसमस वातावरण में हम पुनः एक बार सम्मोहित हुए बगैर नहीं रह सके! और हाँ, हिंडोले भी, जिन पर अपरा ने खूब सवारी की! बटन दबाते ही उसका रॉकेट आसमान की ऊँचाइयाँ छूने लगता और तेज़ी से वापस लौटता और वह रोमांच से भर उठती! लेकिन सबसे बेहतरीन सवारी रही, फेरिस व्हील पर, जो शहर की ऊँची से ऊँची इमारत से भी अधिक ऊँचाई तक पहुँच जाता, जहाँ से सारा शहर दिखाई देता था। उस पर बैठकर अपरा नीचे क्रिसमस मार्केट की रौशनी का अद्भुत नज़ारा देखने में मगन हो गई! ओह! अकल्पनीय!

हम और भी कई दोस्तों से मिले, खूब खाना-वाना बनाया, खाया और बच्चों और आश्रम के लिए कुछ खरीदारी भी की।

ख़ास तौर पर उन अंतिम दिनों में रमोना और मैं चर्चा करते रहे कि यह छोटी सी यात्रा कितनी ज़रूरी थी। हमारे मन में हमेशा से यह इच्छा रही है कि अपरा को हम न सिर्फ जर्मन भाषा दें बल्कि उस संस्कृति का एक हिस्सा भी उसके जीवन का हिस्सा बने, जिससे उसमें यह एहसास पैदा हो कि जितना वह भारत में रहने के कारण भारतीय है, उतना ही जर्मन भी है।

स्वाभाविक ही इन तीन हफ़्तों में उसने बहुत से नए शब्द सीखे और पुनः यात्राओं की आदी होने लगी, हवाई यात्रा की, ट्रेन या कार सवारी की। लेकिन सबसे बढ़कर ख़ुशी हमें यह हुई कि वह इस यात्रा में बहुत सी नई बातें सीख पाई, जिनमें बहुत सी बातों को भारत की तुलना में जर्मनी में अलग तरीके से किया जाता है। जैसे, यहाँ पुरानी वस्तुओं को बेसमेंट में रखा जाता है। या, जैसे स्टीरियो में सारे घर के लिए स्पीकर्स लगाए जा सकते हैं। और भी बहुत सी दूसरी बातें!

हमारी वापसी यात्रा से कुछ दिन पहले अपरा ने मुझसे पूछा कि हम पुनः जर्मनी कब आएँगे। मैंने कहा, होली के बाद। और यह बात वह अपने नाना-नानी से और थॉमस और आइरिस को भी बार-बार बताती रही: मैं जल्दी ही फिर आने वाली हूँ!

जर्मनी में उसे बड़ा अच्छा लगता है। लेकिन वह भारत वापस आने के लिए भी लालायित रहती है। वह आश्रम के अपने भाई-बहनों को बड़ा मिस करती है और उसे अपने चाचाओं की, अपने भारतीय दादा, परनानी की भी बहुत याद आती है और सबसे बढ़कर, अपने घर की। इसलिए जब हम अपनी व्यवधान रहित और सुखद फ्लाइट से भारत वापस पहुँचे, जिसमें लगभग 5 घंटे तो वह सोती ही रही, वह पूर्णेंदु को देखकर, जो हमें दिल्ली विमानतल पर लेने आया था, ख़ुशी से चीख पड़ी।

और आज हम यहाँ हैं, वृंदावन में, फिलहाल समयांतर के कारण होने वाले जेटलैग से उबरने की कोशिश करते हुए। लेकिन जर्मनी में यह संक्षिप्त सा अत्यंत सुखद समय गुज़ारकर वापस लौटना भी बड़ा सुखदाई है!

जर्मनी में हमारी मौज-मस्ती – 29 नवंबर 2015

जर्मनी में हमारा एक और हफ्ता गुज़र गया और इस हफ्ते भी हमें इतनी बड़ी संख्या में एक से एक बढ़कर अनुभव प्राप्त हुए कि उन्हें सिर्फ एक ब्लॉग में समेटना बड़ा मुश्किल है! फिर भी मैं कोशिश करता हूँ:

पिछले रविवार को हैम्बर्ग में अपने बर्फ़बारी के अनुभव के विषय में मैं पहले ही लिख चुका हूँ। उस रोमांचक दिन के बाद सोमवार को हम एक और ट्रिप पर निकल पड़े, इस बार हैम्बर्ग नहीं बल्कि लुनेबर्ग में ही, उसके निचले हिस्से में स्थित थर्मल बाथ की ओर! जबकि पहले हम खुले स्वीमिंग पूल में कई बार गए हैं, इनडोर स्वीमिंग पूल में तैरने का यह अपरा और मेरा भी पहला अवसर था। यह अपने आप में गज़ब का अनुभव रहा! वहाँ कई अलग अलग पूल थे, एक में तेज़ लहरें उठ रही थीं और भँवर भी थे, एक बिल्कुल नन्हे बच्चों के लिए था और एक और, कुछ बड़े बच्चों के लिए। एक पूल नमकीन गर्म पानी वाला पूल था और वहीं एक खुला स्वीमिंग पूल भी उपलब्ध था! जब अपरा घुटनों तक गहरे पूल के पानी में कुछ अभ्यस्त हो गई तो हम उसे अपने साथ भँवर में फिसलने के लिए भी ले गए और उसे वहाँ खूब मज़ा आया। वह मेरी पीठ पर लेटकर खूब तैरी और कुल मिलाकर हमने वहाँ के रोमांच का भरपूर आनंद लिया!

इसके अलावा कई और तरीकों से हमने लुनेबर्ग के अपने निवास को ढेर सारी खुशियों और आनंद से परिपूर्ण कर दिया! आंद्रिया हमें खेल के मैदान ले गई, फिर हम खरीदारी करने बाज़ार गए थे, जो अपरा के लिए सदा एक रोमांचित कर देने वाला अनुभव होता है और फिर बहुत से दोस्त भी हमसे मिलने घर आए थे! हमने घर में ही एक से एक बढ़कर स्वादिष्ट खाने-पीने की वस्तुएँ तैयार कीं और शाम के समय साथ बैठकर शांति और सुकून में बहुत खूबसूरत समय गुज़ारा!

और लूनेबर्ग निवास के अंतिम दिन यानी बुधवार को हमने एक और विशेष काम किया: हम लूनेबर्ग के क्रिसमस मार्केट गए। और वहाँ भी अपरा ने जीवन में पहली बार कुछ देखा और जिसे देखना मेरे लिए हमेशा सुखकर अनुभव होता है। वहाँ लोग बहुत अच्छे मूड में थे, वहाँ बहुतेरी मिठाइयाँ थीं, बच्चे झूला झूल सकते थे और हवा में शानदार संगीत झंकृत हो रहा था। मास्क्ड बाल के बारे में अपरा ने किताबों में पढ़ रखा था और अपरा भी अपना मास्क लगाकर हिंडोले पर भी झूली और ट्रेन की सवारी भी की। फिर उसने दिल के आकार की अदरक की ब्रेड खाई और हमारे साथ गरमागरम चॉकलेट का आस्वाद भी लिया!

गुरुवार को हमने आंद्रिया और माइकल से बिदा ली और आउसबर्ग की ट्रेन पकड़ी, जहाँ अपरा के नाना-नानी रहते हैं! यह ट्रेन यात्रा भी बहुत यादगार रही और इसी सफर में मैंने और रमोना ने अपने जर्मन विवाह की पाँचवी सालगिरह मनाई! पाँच साल पहले ही कुछ कागजों पर दस्तखत बनाने हम अपने दोस्तों के साथ वीजबाडेन आए थे-समय कितनी तेज़ी से गुज़र जाता है!

परसों हम म्यूनिख के लिए रवाना हुए। म्यूनिख के म्यूज़ियम में बच्चों के देखने लायक बहुत सी दर्शनीय वस्तुएँ हैं लेकिन हम वहाँ का शानदार म्यूज़ियम देखने ही नहीं बल्कि रमोना के दूसरे कुछ रिश्तेदारों से मिलने भी गए थे, विशेष रूप से उसके चचेरे भाई का बेटा, जो कुछ दिन बाद ही तीन साल का होगा! हमारे लिए भी और अपरा के लिए भी फिर से एकत्र होने का सुअवसर! वह उपहार लेने और देने के मामले में बड़ी उत्साहित रहती है तो यह भी किया गया! रमोना और उसके चचेरे भाई ने एक लट्टू चलाकर देखा और अपरा उसे देख-देखकर बड़ी खुश और रोमांचित होती रही।

कल घर वापस लौटने के बाद जब हम सोकर उठे तो अपने आपको जर्मन सर्दियों के हिमाच्छादित आश्चर्यलोक में पाया! सुबह लगातार बर्फ़बारी होती रही और हमें बर्फ का स्नोमैन तैयार करने का मौका मिल गया। यह हम पिछले सप्ताह की बर्फ़बारी में नहीं कर पाए थे और रमोना, उसके पिता और अपरा ने मिलकर खेल-खेल में एक सुंदर स्नोमैन बना डाला! और उसमें गाजर की नाक भी लगाई!

दोपहर में अपरा ने आइस स्केटिंग करने की कोशिश की! उनके घर के ठीक सामने एक कृत्रिम आइस फील्ड है, जहाँ किराए पर स्केट्स मिल जाते हैं-और मुझे कहना पड़ेगा कि अगर अपरा रोज़ वहाँ अभ्यास के लिए जाए तो वह जल्द ही बढ़िया स्केटिंग करने लगेगी!

अंत में हम अपरा की जर्मन नानी, नाना और मौसी के साथ आउसबर्ग के क्रिसमस मार्केट गए। सारे शहर में मोमबत्तियाँ लगाई गई हैं, जो देखने में बड़ी भली लगती हैं। शाम छह बजे सब टाउन हाल के सामने इकट्ठा हुए, यह देखने के लिए कि किस तरह नन्हे बच्चे, किशोर और युवा, फरिश्तों की तरह वस्त्र पहनकर और अपने-अपने हार्प, बांसुरियाँ और ऑर्गन लेकर खिड़कियों पर, बालकनियों पर आकर खड़े हो जाते हैं। फिर वे अपने अपने वाद्य यंत्रों को बजाने लगे और कुछ लोग अपने स्वर्गिक स्वरों में गाने भी सुनाने लगे-लेकिन अपरा का एक ही प्रश्न था: वे उड़ क्यों नहीं रहे हैं? 🙂

अब देखते हैं कि आज हम क्या करने वाले हैं-कल हमें वापस वीज़बाडेन भी निकलना है इसलिए हम यह सुनिश्चित करेंगे कि दिन का बचा हुआ समय परिवार के साथ हँसते-खेलते गुज़ारें। हम इस समय बेहद सुंदर अवकाश यात्रा पर हैं और अपनी प्यारी नन्ही परी को जर्मनी की स्वच्छंद सैर करवा रहे हैं!

अपरा जर्मनी में अपने जीवन की प्रथम बर्फ़बारी का भरपूर आनंद ले रही है – 23 नवंबर 2015

कल मैंने आपको बताया था कि हम लोग हैम्बर्ग जाने के लिए तैयार हो चुके थे– और वास्तव में हमने वहाँ बेहद शानदार समय गुज़ारा! कैसे? अपरा ने जीवन में पहली बार बर्फ़बारी देखी और उसके शीतल एहसास का लुत्फ़ उठाया!

जब हम लुनेबर्ग से चलने को हुए तब आकाश से बर्फ के बारीक कतरे गिरना शुरू हो चुके थे हालांकि उन्हें बर्फ कहना भी पर्याप्त नहीं था और क्योंकि मौसम विभाग ने बर्फ़बारी की संभावना की घोषणा नहीं की थी, हमें लग रहा था कि इससे ज़्यादा बर्फ नहीं गिरने वाली है। हमने हॅम्बर्ग के उस इलाके में घूमने का कार्यक्रम तय किया था जहाँ माइकल हमें कुछ बहुत खूबसूरत प्राकृतिक दृश्य और एल्बी नदी के किनारे-किनारे निकलने वाली सड़क, एबखासी की चहल-पहल के कुछ दृश्य दिखाना चाहता था।

लेकिन हाइवे पर आते ही हमें समझ में आने लगा कि अब उन खूबसूरत दृश्यों को ठीक तरह से देख पाना शायद संभव न हो पाए: जैसे-जैसे हम हाइवे पर बढ़ते गए बर्फ के कतरे बड़े से बड़े और घने होते गए और अंत में जब हम हॅम्बर्ग पहुँचे तो वहाँ हर तरफ सफ़ेद, कपसीली बर्फ की चादर बिछी हुई थी!

लेकिन इस बात पर निराश होकर बैठने की जगह कि हमें अपेक्षित दृश्य देखने को नहीं मिले, हम खुश और उल्लसित ही अधिक हुए और इस बात पर बहुत उत्साहित भी कि अब हमें बाहर की शीतल, सफ़ेद, शफ़्फाक दुनिया देखने को मिलेगी और हम कार से बाहर निकल पड़े! अपरा के लिए तो यह वरदान की तरह था क्योंकि यह उसके जीवन का पहला मौका था जब वह बर्फबारी देख रही थी और जबकि हमने उसे उसके बारे में बताया था और उसके वीडियो भी दिखाए थे, यथार्थ में अपनी आँखों से उसे देखना कुछ दूसरी ही बात थी! उसके लिए यह एक अलग, विस्मयकारी अनुभव था और जब हम कार में थे, वह लगातार खिड़की से देख-देखकर चमत्कृत हो रही थी और जब हम कार से निकलकर बाहर आए तो पहले तो वह काटती हुई ठंडक और नमी के चलते कुछ परेशान हुई-लेकिन जब बर्फ गिरना कुछ कम हुआ तो उसकी खुशी का पारावार नहीं रहा!

हमने एक बवेरियन स्टाइल हट में पहुँचकर विराम लिया। वहाँ रमोना जैसे अपने घर ही पहुँच गई क्योंकि वहाँ बवेरियन संगीत जारी था और बैरे लेदरहोज़न वस्त्रों में नज़र आ रहे थे और खाने को भी खास दक्षिण जर्मनी के खाद्य-पदार्थ उपलब्ध थे। 🙂

जब हम वहाँ से निकले तो हमने एक-दूसरे पर बर्फ के गोलों की बारिश शुरू कर दी-या कम से कम उसकी कोशिश की। अपरा ने बर्फ को हाथ में लेकर महसूस किया, दस्ताने पहनकर और नंगे हाथों पर भी, और उसकी शीतल सनसनी का भरपूर मज़ा लिया लेकिन गोले बनाकर फेंकते हुए वह हिचकिचा रही थी क्योंकि उसे पता था कि वह फेंकेगी तो कोई न कोई उस पर भी फेंकेगा! खैर, अंत में हमें बहुत शानदार दृश्य देखने को मिले और प्राकृतिक सुंदरता भी, क्योंकि सब कुछ सफ़ेद चादर से ढँका हुआ था!

हम बेहद खुश हैं! जब हम इस ट्रिप की बुकिंग कर रहे थे तब भी हमें अंदेशा था कि संभव है बर्फबारी हो, बल्कि हम चाहते थे कि हो, क्योंकि हम अपरा को बर्फबारी का अनुभव भी उपलब्ध कराना चाहते थे। लेकिन जब हम वहाँ पहुँचे, वहाँ का पारा 10 अंश सेन्टीग्रेड, बल्कि उससे कुछ ऊपर ही था और हम सोच रहे थे कि हमें बर्फ देखने के लिए शायद एल्प्स की चढ़ाई करनी होगी! और अब हम उसे यहीं देख चुके हैं, अपरा ने भी उसका भरपूर अनुभव प्राप्त कर लिया है और वह वापस आश्रम पहुँचकर सबको उसके बारे में विस्तार से बता सकेगी!

दोस्तों और अपरा के साथ जर्मन रोमांच! 22 नवंबर 2015

आज रविवार है और उसके साथ ही यह बताने का वक़्त कि इस समय मेरे जीवन में क्या चल रहा है-और निश्चित ही, बताने के लिए बहुत कुछ है! हम अपरा के साथ जर्मनी की यात्रा जारी रखे हुए हैं और अपने इस छोटे से अवकाश को बड़ी मौज मस्ती के साथ गुज़ार रहे हैं!

पिछले सप्ताह हम वीज़बाडेन पहुँचे और एक बहुत उत्तेजक सप्ताहांत के बाद इस सप्ताह की शुरुआत एक साथ कई गतिविधयों के साथ शुरू हुई, जिनकी योजना हम पहले ही, जब भारत में ही थे, बनाकर आए थे! सोमवार को हम पीटर और हाइके से मिलने गए, जो अभी कुछ सप्ताह पहले ही आश्रम आए थे। यह बड़ी शानदार यात्रा रही, हम लोग शहर से हटकर गाँवों की ओर निकल गए थे। हमने साथ मिलकर खाना बनाया-खाया और इस दौरान अपरा उनकी बिल्ली के साथ खेलती रही। यह बिल्ली बिल्कुल शर्मीली नहीं है और अपरा उसे पूरे समय दुलारती रही और थपकियाँ देती रही लेकिन उसने ज़रा भी प्रतिरोध नहीं किया! सिर्फ एक बार वह डरकर भाग गई थी जब अपरा अचानक लड़खड़ाई और जैसे ही उसने बिल्ली की कुर्सी का सहारा लिया, कुर्सी गिर पड़ी और बिल्ली कूदकर कहीं चली गई!

मंगलवार को हम एक किंडरगार्टन में गए जहाँ कभी थॉमस भी काम किया करता था। हमारे लिए उनके काम का जायज़ा लेना अत्यंत रोचक रहा जबकि अपरा वहाँ दौड़-भाग करने और बच्चों के साथ खेलने-कूदने में व्यस्त रही।

फिर बुधवार को हम वीज़बाडेन से निकले और एरकलेंज के लिए ट्रेन पकड़ी। गज़ब! कितना मज़ा आया! हमने साल भर पहले भी जर्मनी में ट्रेन से यात्रा की थी मगर, साल भर बाद, अपरा के लिए जैसे वह पुनः एक नए अनुभव जैसा रहा। टिकिट चेकर ने उसे 'बच्चों का टिकिट' दिया था, जिसके साथ उसे रंगीन पेंसिलें और एक टॉय ट्रेन भी मिली थी। इसके आलावा हमने वहाँ के बहुत से फोटो भी लिए और वीडियो भी बनाए, जिससे आश्रम पहुँचकर अपरा उन्हें अपने भाई-बहनों को दिखा सके।

एरकलेंज में हमने अपने बहुत पुराने मित्रों सोनिया और पीटर के साथ बड़ा शानदार समय गुज़ारा जबकि अपरा उनकी दो शर्मीली बिल्लियों के पीछे लगी सारे घर में दौड़-भाग करती रही! हमें दूसरे दिन ही लुनेबर्ग के लिए निकलना था इसलिए उनके साथ हम बहुत थोड़े समय ही रह पाए।

लुनेबर्ग आना हमेशा की तरह बेहद आनंददायक अनुभव रहा! अपने सबसे पुराने जर्मन मित्र माइकल और निश्चय ही, उसकी पत्नी, आन्द्रिया से मिलना हमेशा बड़ा भावपूर्ण और रोमांचक होता है। हम पुराने दिनों को और उस समय के रोमांच और मौजमस्ती को याद कर-करके आह्लादित होते रहे और नए रोमांच की प्लानिंग करते रहे और नए रोमांच के कार्यक्रम बनाते रहे। इसके अलावा, एक-दूसरे के जीवनों में इस बीच आए बदलाव और विकास की चर्चा करते रहे। यहाँ उत्तरी जर्मनी में हमारे कई और भी मित्र हैं इसलिए शुक्रवार और शनिवार को हम वैसे भी मिलने आने वाले दोस्तों के साथ बहुत व्यस्त रहे! रमोना के स्कूली दिनों की एक मित्र तथा दूसरे कई, जो इसी साल मार्च में ही आश्रम आए थे, हमारे साथ खाना खाने और कुछ समय हमारे साथ गुजारने आए थे!

माइकल और आंद्रिया को अपरा पहले से जानती है और अपनी प्रारम्भिक झिझक से वह बहुत जल्दी पार पा गई! अब वह सारा समय उनके घर के कोने-कोने में जाकर जाँच-पड़ताल में लगी रहती है और अपनी नई-नई खोजों के बारे में उनसे बड़ी गंभीरता के साथ चर्चा करती है! यहाँ उसके लिए कई चीज़ें बिल्कुल नई हैं: जैसे डिशवाशर, विशालकाय आलमारियों में रखे विभिन्न उपभोक्ता सामान, जहाँ खरीदने के लिए हजारों विकल्प मौजूद हैं, डिनर टेबल पर रखी जाने वाली मोमबत्तियाँ, स्पीकर्स, जिनमें से घर के हर कमरे में आवाज़ आती है, आदि, आदि।

साल के इस समय और नवंबर के महीने में जर्मनी के अत्यंत ठंडे मौसम की आशंका के बावजूद इस दौरे की योजना बनाकर हमने अच्छा किया और हम बेहद खुश हैं! हम बहुत शानदार और रोमांचक समय बिता रहे हैं और निश्चय ही, अपरा भी- जिसके कारण हम इस दौरे को किसी भी कीमत पर टालना नहीं चाहते थे!

अब हमारा अगला पड़ाव होगा, हैम्बर्ग, जहाँ के लिए हम आज ही रवाना होने वाले हैं। आज कुछ घंटे हम वहाँ बिताएँगे। निश्चित ही, आपको उस दौरे का आँखों देखा हाल और हमारे अनुभवों का अहवाल जल्द ही प्राप्त होगा!

अपने दूसरे घर, जर्मनी में अपरा से साथ मस्ती – 15 नवम्बर 2015

आज आपको हमारी जर्मनी यात्रा की पहली रिपोर्ट प्राप्त होगी! हम लोग यहाँ सकुशल पहुँच गए थे और अभी से हमारे दूसरे गृहराष्ट्र, जर्मनी में हमारे रोमांचक अनुभवों की शुरुआत हो चुकी है!

सबसे पहले, हमारी यात्रा के बारे में: एक बार फिर से यह एक कमाल की निर्विघ्न यात्रा का अनुभव था। दिल्ली के यातायात के जाम को ध्यान में रखते हुए, हम लोग थोड़ा जल्दी ही निकल आए थे। लेकिन हम लोग आराम से पहुँच गए और इसलिए हमारे पास हवाई-अड्डे पर बिताने के लिए काफी समय था। हम इस समय का उपयोग न केवल आश्रम से लाया शानदार नाश्ता करते हुए बिता सकते थे बल्कि अपरा को बहुत-सी नयी चीज़ें भी दिखा सकते थे। वह वेंडिंग मशीन (विक्रय मशीन) देखकर मंत्रमुग्ध हो गई थी। काँच की खिड़कियों से बाहर झाँककर हवाई जहाज़ देखने और रोलिंग-फ्लोर पर चलने और आगे-पीछे होकर धमाचौकड़ी मचाने में भी उसे बड़ा मज़ा आ रहा था!

इन सब आकर्षणों के कारण उसे बोर होने का समय ही नहीं मिला और विमान पर चढ़ने का वक़्त हो गया। गज़ब! अपरा ने वहाँ जो मस्ती की है! हर चीज़ को देखकर वह रोमांचित हो उठती, चीज़ें कैसे काम करती हैं, यह देखना, खिड़की से बाहर झाँकना, बार-बार सीट की पेटी को बांधकर और फिर खोलकर देखना, सामने के फोल्डिंग टेबल को खोलना और बंद करना, एंटरटेनमेंट सिस्टम को ऑन और ऑफ करना, आदि, आदि। अपनी इन सब गतिविधियों से वह बहुत उत्साहित थी। आखिर विमान में मिले भोजन को चखने के बाद वह सो गयी और उसके बाद विमान-यात्रा का ज़्यादातर समय उसने सोते हुए ही बिताया!

समय के अंतर यानी जेटलैग की वजह से जब शाम को हम जर्मनी पहुँचे तो हम लोग कुछ थक से गए थे और निस्संदेह वहाँ हमारे हिसाब से मौसम भी काफी ठंडा था। परंतु पुनः जर्मनी आकर हमें बहुत अच्छा महसूस हो रहा था! बाहर की शान्ति, हवा में एक अलग तरह की गंध मुझे अत्यंत प्रिय है और ऊपर से चारों तरफ खुली हरियाली-पूछो मत! यह सुंदरता मन मोह लेती है! और हाँ, हम सभी मित्रों से बहुत प्यार करते हैं, जैसे थॉमस और आइरिस, जर्मनी में जिनका घर हमारा मुख्य आवास होता है और जहाँ ठीक इस वक़्त हम आनंदपूर्वक अपना समय बिता रहे हैं और मैं यह ब्लॉग लिख रहा हूँ!

कल एक लंबे जर्मन नाश्ते के साथ अद्भुत सुबह की शुरुआत हुई। उसके बाद हम सब अपनी एक और खूबसूरत मित्र, मेलनी से मिलने उसके घर गए। वही मेलनी जो पहले हमारे यहाँ भारत आ चुकी है। दो वर्ष पहले, जब अपरा पहली बार जर्मनी आई थी, हम उसके घर गए थे और अपरा ने उसके दो में से एक घोड़े की सवारी की थी! अब अपरा थोड़ी बड़ी हो गई है-घोड़े तो वही हैं परंतु उन्हें वह बिल्कुल अलग तरह से देख रही है, उनके साथ उसे एक अलग तरह का अनुभव हो रहा है, जो देखने में बड़ा खूबसूरत लगता है! आप कल्पना कर सकते हैं कि अपरा के लिए उन घोड़ों को थपथपाना, उनकी साफ़-सफाई में मदद करना और फिर उनकी सवारी करना कितना आनंददायक रहा होगा! और उसे ऐसा करते हुए देखना, हमारे लिए!

आज सुबह रमोना के स्कूल की एक पुरानी मित्र अपने पुरुषमित्र के साथ आई और एक बार पुनः शानदार नाश्ता लिया गया और उसके बाद हम लोग एक पार्क में स्थित खेल के मैदान में टहलने चले गए।

वहीं हमने नोटिस किया कि अपरा भी विमान-यात्रा के कारण होने वाले समयांतर यानी जेटलैग से प्रभावित हुई है और शायद थोड़ी थकावट महसूस कर रही है! सबेरे हम सब जल्दी उठ गए थे और दोपहर में भी वह बहुत थक गयी थी इसलिए सो गई थी, जबकि पिछले कई महीनों से दोपहर में वह झपकी तक नहीं ले रही है!

दोपहर की नींद से उसे शक्ति मिली होगी और जब कुछ और दोस्त मिलने आए तब वह पूरी तरह फिट थी! पवन नामक एक भारतीय, जो वीज़्बाडेन में एक भारतीय रेस्तराँ चलाता है, अपनी जर्मन पत्नी और बच्चों के साथ हमसे मिलने आया था। उस समय अपरा पूरी तरह चैतन्य थी और उसने एक डांस भी करके दिखाया!

मुझे लगता है कि आप अच्छी तरह देख पा रहे होंगे कि हम यहाँ कितने खुश हैं और कितना अच्छा समय गुज़ार रहे हैं!

चिल्लाएँ नहीं – बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार करें! 10 नवम्बर 2015

कल ही मैंने आपको बताया कि अपरा अपनी नृत्य प्रस्तुति से कितनी खुश है, और जब उसने पुरस्कार के रूप में मिला अपना कप और मैडल हमें दिखाए तो हमने भी उतना ही गौरवांवित महसूस किया। लेकिन जब वह हमें कार्यक्रम के बारे में विस्तार से बताने लगी तो हमने महसूस किया कि उसके दिमाग में दर्शक और सराहना या खुद अपने प्रदर्शन से अधिक कोई और बात घुस गयी है, जिसने उसकी उपलब्धि और उसके गौरव को दागदार कर दिया है: एक व्यक्ति उस पर और आश्रम के उसके प्रिय भाई पर बेवजह चिल्लाया।

शुरू में तो वह बड़े उत्साह से अपने प्रदर्शन के बारे में बताती रही लेकिन जल्द ही विचारमग्न हो गई और कहा: "वहाँ एक आदमी था, जिसने मुझे और गुड्डू से कहा, 'क्या कर रहे हो तुम लोग यहाँ? चलो भागो, यहाँ से!' हमने कुछ नहीं किया था, सिर्फ बैठना चाहते थे!"

रमोना उत्तर देने से पहले थोड़ा झिझकी क्योंकि उसे अच्छे से पता था कि बच्चों ने कुछ नहीं किया होगा और वह आदमी बस उन बच्चों को वहाँ से भगाना चाहता रहा होगा। शुरू करते हुए उसने कहा “अरे, शायद उस आदमी का मूड खराब होगा", किन्तु उसने तुरंत आगे कहा, "लेकिन उसे तुम्हारे साथ ऐसा दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिए था, यह अच्छा नहीं है।‘ क्योंकि महज खराब मनोदशा होने के कारण अशिष्ट आचरण और दुर्व्यवहार करना ठीक नहीं।

अपरा का मन इस घटना को भूल नहीं पा रहा था। कुछ ही देर बाद उसने उस घटना का सारा ब्यौरा ज्यों का त्यों मेरे सामने रख दिया। रमोना की तरह मैं उतना सौम्य नहीं रह पाया और मैंने सीधे कहा: “क्योंकि वह अच्छा व्यक्ति नहीं था!”

बात यह है कि बच्चों के प्रति इस तरह के व्यवहार को भारत में हम अक्सर देखते रहते हैं। लोग बच्चों को सुधारने के लिए अधिकतर नरमी का व्यवहार नहीं करते बल्कि सीधा उन पर चिल्लाने लगते हैं, ज़ोर-ज़ोर से डांटते-डपटते हैं और उन्हें अपनी बात समझाने का अवसर नहीं देते, न ही यह बताते हैं कि जो भी वे कर रहे हैं, वह उन्हें क्यों नहीं करना चाहिए।

स्वाभाविक ही यह बच्चों के प्रति आम भारतीयों के गलत रवैये की झलक दिखाता है। इसमें एक तरह का सकारात्मक भाव भी नज़र आता है कि कोई भी संसार के बच्चों को उचित व्यवहार सिखा सकता है और बता सकता है कि क्या उनके लिए सही है और क्या गलत। यह बहुत अच्छा है, क्योंकि इससे भारतीय समाज के इस नज़रिए का पता चलता है कि बच्चों की ज़िम्मेदारी केवल अभिभावकों की ही नहीं है। लेकिन साथ ही इसका दोष यह है कि लोग अक्सर बच्चों से ऐसे बात करने लगते हैं जैसे वे मूर्ख हों। अधिकतर उन्हें इस बात का एहसास नहीं होता कि हम सबकी तरह बच्चों की भी कुछ भावनाएँ होती हैं, बल्कि हमसे कहीं अधिक तीव्र और गहन भावनाएँ होती हैं।

और इस तरह अपने आठ साल के भाई के साथ मेले में आई हमारी चार-साला नृत्य-सितारा बेटी की कोमल भावनाओं की परवाह किए बगैर यह व्यक्ति उसके साथ मनचाहा दुर्व्यवहार करता है जबकि वे दोनों सिर्फ इस व्यक्ति के साथ वाली सीट पर बैठना चाहते हैं। वह सरल भाषा में कह सकता था कि वहाँ न बैठे, वह उसकी पत्नी की सीट है और वह कभी भी आ सकती है। वह उन्हें प्यार से बता सकता था कि देखो, सारे बच्चे वहाँ कतार में इंतज़ार कर रहे हैं और वहाँ जाकर इंतज़ार करो। चाहता तो वह उन्हें वहीं बैठा रहने दे सकता था क्योंकि वे उसे परेशान नहीं करने वाले थे और जब पत्नी आ जाती तो उठ भी जाते!

पिता होने के नाते मुझे गुस्सा आया कि उसने मेरी बच्ची की बहुत सुखद शाम पर एक काला धब्बा लगा दिया। एक पिता के रूप में मैं पूछता हूँ कि आप लोग अपने आस-पास के बच्चों के साथ विनम्र व्यवहार क्यों नहीं कर सकते! और एक इंसान होने के नाते मैं सोचता हूँ कि अपने से दुर्बल व्यक्तियों के साथ चीखने-चल्लाने जैसा ऐसा बेहूदा व्यवहार अक्सर लोग सहन कैसे कर लेते हैं।

भला व्यवहार कीजिए। बच्चों के साथ और अपने आसपास के सभी लोगों के साथ!

छोटी सी डांसर अपरा ने दिया स्वतः प्रवर्तित नृत्य प्रदर्शन – 9 नवम्बर 2015

साल में एक बार, हमारे शहर में एक मेला लगता है, जिसे शहर के लोग मेरी किशोरावस्था के समय से ही मनाते चले आ रहे हैं। यह मेला ‘बाल मेला’ कहलाता है और पूरे शहर के सभी स्कूल इसमें होने वाली कला प्रतियोगिताओं, नृत्य और नाट्य प्रदर्शन इत्यादि और कई तरह के दूसरे कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर इस कार्यक्रम को आकर्षक बनाते हैं।

जब मैं स्कूल में था, तब हम भी हिस्सा लिया करते थे और मुझे याद है कि मैंने कई बार मंच पर प्रस्तुति दी थी। बच्चों को मैदान के एक कोने में स्टाल्स लगाने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता था। एक वर्ष मैंने चाय और नाश्ते की दुकान लगाई थी-हालांकि नाश्ता मेरी माँ ने घर पर तैयार किया था। बाद में मेरे पास कैमरा भी आ गया था और उस साल मैंने लोगों की बहुत फोटो खींचीं। बाद में मैं उन्हें डिवैलप करवाके उनके घर पहुँचाता था, जिसकी मुझे संतोषजनक कीमत मिल जाती थी।

जैसा कि मैंने बताया, हमारी फ़्रांसीसी मित्र मेलनी भी लंबे समय के लिए आश्रम आई हुई है। शाम को वह स्वयं भी फायर-डांस (अग्नि नृत्य) प्रस्तुत करके हमारा और हमारे अतिथियों का मनोरंजन करती है, जिसमें वह जलते हुए गेंद को अपने चारों तरफ घुमाते हुए नृत्य करती है। वह सचमुच दर्शनीय होता है, और यह पता चलने पर कि ‘बाल-मेला’ शुरू होने वाला है, पूर्णेंदु ने अपने मित्र से बात की, जोकि इस कार्यक्रम का आयोजक भी था। निश्चित ही समारोह की यह शुरुआत बहुत शानदार रही!

फिर, हमारे मेहमानों का काफी बड़ा समूह हमारे साथ था और हम उन्हें अपने शहर की कुछ रौनक भी दिखाना चाहते थे! इसलिए पूर्णेंदु उन सभी को, यानी मेलनी, हमारे अन्य अतिथि और स्वाभाविक ही, अपरा सहित आश्रम के सभी बच्चों को उस समारोह में ले गया।

वहाँ, सभी ने बहुत अच्छा समय बिताया। आम तौर पर जैसा कि भारत में होता है, नृत्य का कार्यक्रम पूर्व-घोषित समय से काफ़ी देर बाद शुरू हुआ, किन्तु दर्शकों को उनके सब्र का बड़ा अच्छा फल मिला-उस विशाल मंच पर मेलनी के शानदार फायर डांस के रूप में। अपरा ने जब नृत्य देखा तो वह भी मंच पर जाकर डांस करने के लिए मचलने लगी।

तब पूर्णेन्दु ने एक बार फिर अपने मित्र से बात की और जल्द ही उद्घोषक ने हमारे बाल-सितारा का नाम घोषित किया! वह मंच पर आई और अपने एक प्रिय गाने पर अपना नृत्य प्रस्तुत किया, जिसे उसने पहले-पहल इन्हीं गर्मियों में सीखा था। उसके नृत्य को बहुत सराहा गया और कार्यक्रम में भागीदारी करने के ईनाम के तौर पर उसे एक मैडल और कप मिला, जिसे लेकर वह खुशी-खुशी और सगर्व घर लौटी!

जब वे सब वापस लौटने को थे, आयोजकों ने हमारे सभी अतिथियों को भी मंच पर आमंत्रित किया। हम आज सबेरे नाश्ते के समय भी वहाँ के अनुभवों का ज़िक्र करते हुए आपस में हँसी-मज़ाक करते रहे कि किस तरह आयोजकों ने उन्हें समारोह का विशिष्ट अतिथि बनाया और कैसे वे बड़ी शान से चलते हुए स्टेज पर पहुँचे और स्वागत समारोह में गंभीर भागीदारी की!

ओह, और अब हम दोनो, अपरा के माता-पिता, गर्व से अभिभूत हैं कि हमारी बच्ची सैकड़ों अपरिचित लोगों के बीच बिना किसी पूर्व-तैयारी के, उन्हीं कपड़ों में, जिन्हें उसकी माँ ने जल्दबाज़ी में पहना दिया था, पूरे आत्मविश्वास के साथ स्टेज पर जाकर अपना नृत्य प्रस्तुत कर सकती है! अपरा को भी बहुत मज़ा आया और आज मैं गर्व से कह सकता हूँ कि वह मेरी बेटी है, एक ऐसे बाप की बेटी, जो स्वयं अपनी किशोरावस्था और युवावस्था में विशाल जनसमूह के बीच, सैकड़ों मंचीय कार्यक्रम प्रस्तुत कर चुका है।

साल गिनना भूल कर, जीवन से प्यार करते हुए जन्मदिन मनाना! 14 अक्टूबर 2015

आज फिर वह दिन आ गया है जब मैं अपनी उम्र के सालों की गिनती बदलता हूँ। आज मेरा जन्मदिन है-14 अक्टूबर। और आपके पूछने से पहले ही बता दूँ कि मैं कल से एक दिन भी अधिक बड़ा महसूस नहीं कर रहा हूँ!

मैं जानता हूँ कि मैं पहले भी इस बात का ज़िक्र कर चुका हूँ, और शायद किसी जन्मदिन के दिन ही, कि यह संख्या, जो आप किसी को अपनी उम्र की जानकारी देते हुए बताते हैं, मेरे लिए विशेष महत्व की नहीं है। कुछ दिन पहले रमोना ने हमारे किसी मेहमान को हँसते हुए बताया, ‘आप उनसे उनकी उम्र पूछेंगे तो वे कम से कम 2 मिनट सोचेंगे कि वे वास्तव में कितने साल के हैं!’

वास्तव में, जितना व्यस्त मैं रहता हूँ, उतना व्यस्त रहने लायक युवा मैं आज भी महसूस करता हूँ और अपने अनुभवों के अनुरूप पर्याप्त उम्रदराज भी महसूस करता हूँ। मैं उम्र की इस संख्या को मुझे निर्देश देने की आज़ादी क्यों दूँ कि मुझे कैसा महसूस करना चाहिए या कैसा व्यवहार करना चाहिए? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उम्र के हिसाब से मैं दूसरों से अपनी तुलना भी नहीं करता। अगर मैं यह करने लगूँ तो यह बड़ा पेचीदा मामला हो जाएगा: मेरे कुछ पुराने सहपाठी आज दादा-दादी या नाना-नानी बन चुके हैं जब कि मेरे कुछ मित्र हैं जो अभी भी पढ़ाई कर रहे हैं, अभी किसी संबंध में मुब्तिला ही हो रहे हैं या समय के ऐसे ही किसी पड़ाव पर हैं जिसे मैं पहले ही पार कर चुका हूँ! इसलिए तुलना करना ही बेमानी हो जाता है?

नहीं, जीवन के इस पड़ाव पर मैं बहुत खुश हूँ। मैं अक्सर रहता ही हूँ। मेरे पास मेरा परिवार है, शानदार दोस्त हैं, मैं अपने काम में पर्याप्त व्यस्त भी रहता हूँ, मेरा काम भी अच्छी तरह तरक्की कर रहा है और मैं अपने अच्छे स्वास्थ्य का पूरा आनंद भी ले रहा हूँ। फिलहाल, जब कि रमोना और मैं यह लिख रहे हैं, मुझे हँसी आ रही है क्योंकि मेरी बच्ची मेरे पीछे खड़ी अपने चाचा के साथ ठिठोली करते हुए हँस रही है। अब जीवन की इस सुनहरी धूप में मैं अपने आपको बूढ़ा महसूस करने की सोच भी नहीं सकता!

आज सबेरे वह बड़ी खुश और उल्लसित थी, उसने मुझे जगाकर कहा कि आज मेरा जन्मदिन है। उसने रमोना को बताया कि वह बहुत सारा केक खाएगी-लेकिन फिर रमोना से उसने सुना कि पार्टी का आयोजन थॉमस और आइरिस के आने के बाद, सप्ताहांत में किया जाएगा! बाप रे! यह सुनकर अपरा बहुत गुस्सा हो गई और शिकायती स्वर में तुरंत उसने कहा कि नहीं, पार्टी आज ही होनी चाहिए, शनिवार को नहीं। रमोना ने समझाने की बहुत कोशिश की कि पार्टी का मज़ा लेने हमारे दोस्त भी आ रहे हैं लेकिन अपरा का तर्क था कि वे उसकी बर्थडे-पार्टी में आ सकते हैं!

रमोना ने हाथ डाल दिए: ‘ओके ओके, हम आज भी एक छोटी सी पार्टी रख लेते हैं और…शनिवार को बड़ी वाली रख लेंगे!’ यह गलत रणनीति सिद्ध हुई! इसका बड़ा तगड़ा विरोध हुआ: ‘नहीं! बड़ी पार्टी आज ही होगी, बड़ा केक भी आज ही आएगा क्योंकि बर्थ डे भी आज है!’ खैर, तो हम आज भी एक पार्टी रख रहे हैं और एक शनिवार को भी रख लेंगे!

पार्टी के लिए हम वैसे भी कभी मना नहीं करते! और मैं अभी से बहुत सारी पार्टियों का इंतज़ार करने लगा हूँ!

जब अपरा ने शेर को नहलाया – 28 सितंबर 2015

कुछ दिन पहले दोपहर के समय अपरा ने धड़धड़ाते हुए हमारे ऑफिस में प्रवेश किया। रमोना कंप्यूटर पर काम कर रही थी और अपरा की आहट सुनकर उसने पलटकर देखा। अपरा ने अपने कपड़ों से हाथ बचाते हुए हाथ आगे कर दिए और कहा, 'माँ, मुझे हाथ धोना है!'

रमोना ने उसके हाथों की ओर देखा- वे तो साफ़ थे। फिर भी वह उसके साथ बाथरूम की ओर जाने लगी और रास्ते में पूछा, 'तुमने अपने हाथ कहाँ गंदे कर लिए?’

‘मैं अपने शेर को धो रही थी,’ उसने जवाब दिया। उसका इशारा उसके कमरे में भूसा भरकर रखे बड़े से स्टफ़्ड शेर की तरफ था।

‘काहे से?’ रमोना ने पूछा, जैसे वास्तव में जानना चाहती हो। ‘पानी से?’

‘अरे नहीं। ऐसे ही,’ दरवाजे से बाथरूम में प्रवेश करते हुए अपरा ने कहा।

‘लेकिन काहे से? कपड़े से, ब्रश से या किसी और चीज़ से? काहे से?’ रमोना ने ज़ोर देकर कहा कि बच्ची कुछ विस्तार से बताए।

‘हाँ, कपड़े से,’ पुनः संक्षिप्त सा जवाब आया और अब अपरा एक कुर्सी खींचकर बेसिन के सामने कुर्सी पर चढ़कर खड़ी हो गई थी।

‘गीले कपड़े से?’ रमोना ने आगे पूछा। हालांकि उसके जवाब का अनुमान वह लगा चुकी थी, जवाब उसके अनुमान से अधिक विस्तृत था:

‘हाँ, गीले कपड़े से और साबुन लगाकर! अब उसे छूना मत नहीं तो तुम्हारे हाथ भी गंदे हो जाएँगे!’ बेटी ने आगाह करते हुए कहा।

इस बिन्दु पर मैं भी वहाँ पहुँच गया था और रमोना ने, जो अपने काम के बीचोंबीच उठकर आई थी, मुझसे कहा, ‘क्या तुम इस शेर वाली समस्या को देख सकते हो?’ 🙂

खैर, एक समर्पित पति और पिता को क्या-क्या नहीं करना पड़ता? स्वाभाविक ही, शेर की सफाई करना उसके काम का ही हिस्सा है!

तब अपरा, प्रांशु और गुड्डू की संयुक्त कमान लेकर हम उस विशाल शेर को बाथरूम तक लेकर आए और साबुन में सनी उसकी पूँछ को तब तक धोते रहे जब तक कि पूँछ से साबुन का फोम निकलना बंद नहीं हो गया। उसके बाद अपरा ने एक टॉवल लेकर उसकी पूँछ को सुखाया और लड़कों ने कमरे को सुखाया। अब वह किसी स्वीमिंग पूल के शावर रूम जैसा नहीं लग रहा था!

अपने लिए निर्धारित लक्ष्य प्राप्त कर लेने के बाद अपरा बहुत संतुष्ट है: शेर अब बहुत साफ-सुथरा नज़र आ रहा है और अपरा भी इतना मज़ेदार और रोमांचक समय बिताकर बहुत खुश है!