भारत में मृत्यु: परलोक गमन के अवसर पर पारिवारिक बिदाई समारोह-23 जुलाई 2009

भारतीय संस्कृति

कल मुझसे पूछा गया था कि क्या भारत में कोई ऐसी व्यवस्था है जिसमें मरते हुए व्यक्ति की सहायता के लिए कोई उपलब्ध हो सके। मैंने उन्हें बताया था कि इस मामले में भी भारत में स्थिति कुछ भिन्न होती है क्योंकि अभी भी लोग परिवार के साथ ही रहते हैं और जब वे वृद्ध हो जाते हैं तो उनके पास उनके बेटे, बहुएँ और लड़कियां उनकी देखभाल के लिए साथ ही होती हैं। इसके अलावा कई संस्थाएं होती हैं जो ऐसे मौकों पर उनकी सहायता के लिए आगे आती हैं जिनका कोई नहीं होता। ये संस्थाएं मृत्यु के बाद उनके क्रियाकर्म और दूसरी धार्मिक आवश्यकताओं और कर्मकांडों का खर्च भी उठाती हैं।

मैंने यह भी बताया कि मरणासन्न व्यक्ति के पास बैठकर लोग धार्मिक मंत्रों का पाठ और भजन इत्यादि करते हैं। यह काफी पहले से ही शुरू हो जाता है और कई बार हफ्तों, महीनों चलता है क्योंकि यह आत्मा के शरीर से मुक्त होने पर निर्भर करता है! लेकिन लोग दिन-रात निरंतर मंत्रों का पाठ करते रहते हैं जिससे वह व्यक्ति चेतन या अचेतन अवस्था में उन्हें सुनता रह सके। जब मृत्यु हो जाती है तो लोग उसके मृत शरीर को श्मशान घाट ले जाते हैं जिसमें दूर-दूर से नाते-रिश्तेदार, दोस्त और पड़ोसी शरीक होते हैं और मंत्रों के उच्चारण के साथ अर्थी को जुलूस की शक्ल में क्रियाकर्म हेतु ले जाया जाता है। इस मंत्र का अर्थ है, ‘ईश्वर का नाम ही सत्य है’।

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