झूठ, बहानेबाजी और देरी – बेईमानी पेशेवर रवैया नहीं है – 19 अप्रैल 2015

मैंने आपसे कहा था कि अपने रविवार के ब्लॉगों में मैं अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में, आश्रम के क्रियाकलापों के बारे में और जब मैं कंप्यूटर पर व्यस्त नहीं होता या अपरा के साथ खेल नहीं रहा होता, तब मेरे दिन कैसे गुज़र रहे होते हैं, इस बारे में आपको बताया करूँगा। पिछले कई हफ्तों से, स्वाभाविक ही, उनका विषय अधिकतर हमारा आयुर्वेदिक रेस्तराँ, ‘अम्माजी’ज़’ रहता आया है, जिसे हम जल्द ही शुरू करने जा रहे हैं। रेस्तराँ के अंदरूनी हिस्सों की सजावट और आवश्यक उपकरणों और फर्नीचर से उसे सुसज्जित करने का काम काफी समय से चल रहा है मगर इन दिनों मैं महसूस कर रहा हूँ कि यहाँ काम कर रहे बहुत से लोगों का रवैया पेशेवराना नहीं है, वे अपने वादे के मुताबिक समय पर नहीं आते, जिसके कारण बार-बार काम में व्यवधान उपस्थित होता है, उसमें देर होती रहती है, लिहाजा चिड़चिड़ाहट और क्रोध के वशीभूत मुझे लगातार उनसे हुज्जत करनी पड़ रही है!

सीधी सी बात है, लोग ईमानदार नहीं हैं! वे कहेंगे, ‘मैं कल आऊँगा’ जब कि मन ही मन उन्हें पता होता है कि वे झूठ बोल रहे हैं, वे किसी भी हालत में कल नहीं आयेंगे! बड़ी बेशर्मी से वे आपके मुँह पर सफ़ेद झूठ बोल देते हैं-और इस बात की भी उन्हें परवाह नहीं होती कि आप भी जानते हैं कि वे झूठ बोल रहे हैं!

मैं आपको इसका सबसे बड़ा उदाहरण देता हूँ: हमारा बाँस का ठेकेदार। बार-बार देर करने के बाद, कुछ मजदूरों के साथ बाँस का पहला ट्रक हमारे यहाँ आकर खड़ा हुआ और काम शुरू हुआ। लेकिन, उसके बाद अब तक बाँस की दूसरी खेप भी आ जानी चाहिए थी, जिससे काम लगातार चलता रहे। लेकिन आज तक वह ठेकेदार, जिसे बाँस मुहैया कराना था, नहीं आया है, जबकि उसे एक हफ्ता पहले आ जाना चाहिए था!

जो बात मुझे सबसे ज़्यादा हैरान करती है, वह है इन लोगों का काम के प्रति रवैया! पहली बात तो यह कि वह कभी भी साफ बात नहीं करेगा, ‘मैं 12 को आ जाऊँगा, ज़्यादा से ज़्यादा, 13 को’ लेकिन फिर खुद ही आने का दिन तय करने के बाद भी दोनों दिन उसका अता-पता नहीं होगा! वह उसे आगे किसी दिन के लिए मुल्तवी कर देगा और फिर अपने संभावित आगमन की अगली दो तारीखें हमें बताएगा!

स्वाभाविक ही, उसके पास कोई न कोई बहाना होता ही है: एक बार उसने कहा वह बीमार पड़ गया था, अगली बार उसकी पत्नी बीमार पड़ गई थी, और एक बार बाँस से लदे ट्रक की कमानी टूट गई थी, जिसे बनवाना ज़रूरी था और एक बार यह कि कोई प्रदर्शनी चल रही थी और उसका वहाँ उपस्थित रहना बहुत ज़रूरी था-मज़ेदार बात यह कि जैसे प्रदर्शनी का इतना बड़ा आयोजन अचानक ही तय हो गया हो कि वह पहले से इस विषय में सोच नहीं पाया, तदनुसार आने का दिन तय नहीं कर पाया! एक बार उसने कहा कि वह दोपहर में, ठीक एक बजे हाजिर हो जाएगा, फिर दोपहर दो बजे उसका एसएमएस आया कि वह आ रहा है, रास्ते में है लेकिन झूठ की हद देखिए कि फिर उस दिन वह आया ही नहीं! एक बार उसने लिखा वह चल चुका है, रास्ते में है और उस पर विश्वास करके मैंने अपनी इंटीरियर डेकोरेटर को बुला लिया-लेकिन वह कई घंटे देरी से आया, यहाँ तक कि वह महिला इंटीरियर डेकोरेटर एक बार फिर थक-हारकर वापस चली गई…

एकाध बार हो तो बात समझ में आती है और उससे बहुत फर्क भी नहीं पड़ता लेकिन जब यह बार-बार हो, हर मामले में हो तो हर बार जब वह कहता है कि आऊँगा, आप जानते होते हैं कि उसका कोई भरोसा नहीं, किसी न किसी बहाने से वह नहीं आएगा या देर से आएगा और कोई झूठी बात कहकर टाल जाएगा! तब आपको समझ जाना चाहिए कि यह व्यक्ति इतना बेशर्म है कि न तो उसे देर से आने या न आकर वादाखिलाफी करने की कोई शर्म है, न अपराधबोध। उसकी कोताही के चलते आपके काम के लंबित होते चले जाने का उसे कोई अफ़सोस भी नहीं है। उसे इस बात की भी चिंता नहीं है कि उसकी लापरवाही के कारण आपका कितना नुकसान हो रहा है और इसलिए वह किसी बात के लिए क्षमाप्रार्थी भी नहीं है!

इस समस्या के पीछे उन लोगों का रवैया है और यह एक तथ्य है कि ऐसी सोच वाले लोग ईमानदारी या ज़बान की कोई कीमत नहीं समझते!

सही और गलत की पहचान करने और अपनी धारणाओं पर पुनर्विचार करने में यात्राएँ किस तरह मददगार होती हैं? 6 नवंबर 2014

कल मैंने लिखा था कि जीवनशैली या जीवन के अधिकांश निर्णयों के मामले में सही-गलत का कोई एक बंधा-बंधाया मानदंड नहीं होता। जबकि सामान्यतः मैं यही सलाह देता हूँ कि जो भी आप करें आत्मविश्वास के साथ करें, मैं यह भी कहना चाहूँगा कि सिर्फ अपने विचारों पर इतने जड़ न हो जाएँ कि दूसरों की उचित बातों पर ध्यान ही न दे पाएँ। मन को खुला रखें और अपने आपको इतना लचीला बनाकर रखें कि उचित बातों को ग्रहण कर सकें!

सही और गलत का पहला पाठ आप अपने माता-पिता से सीखते हैं फिर आसपास के माहौल से। लेकिन आसपास दूसरे माता-पिता भी होते हैं, जो वास्तव में उन्हें सही या गलत के बारे में दूसरी बातें सिखाते हैं। और यहाँ आपको अपना दिमाग खुला रखना चाहिए। दूसरी जगह, दूसरे घर-परिवार, दूसरे देश और वहाँ की संस्कृतियाँ-हर जगह सही या गलत के बारे अलग-अलग नज़रिया होता है और अगर आप अपने नज़रिए पर बहुत अधिक जड़ नहीं हैं तो आप उनके नज़रिए को अधिकाधिक जान और समझ सकते हैं! हो सकता है कि तब आप उनके नज़रिए के साथ बेहतर तरीके से तालमेल बिठा सकें।

यात्राएँ इस बारे में बहुत अधिक मदद करती हैं। स्वाभाविक ही मैं बीच पर हफ्ते भर की छुट्टियाँ बिताने की बात नहीं कर रहा हूँ, जहाँ आप लोगों से दूर अपने होटल की सुविधाओं के बीच रह रहे होते हैं। इससे आप दूसरी संस्कृतियों के करीब नहीं आ पाएँगे क्योंकि आपको खुश करने की ग़रज़ से होटल के आयोजक होटलों में और बीचों पर आपकी ही संस्कृति का प्रदर्शन करेंगे। जी नहीं, दूसरों की संस्कृतियों और परम्पराओं को और वहाँ की भिन्नता को जानने-समझने और अनुभव करने के लिए आपको वहाँ कुछ अधिक समय गुज़ारना होगा!

इसकी शुरुआत छोटी-छोटी बातों से होती है। पश्चिमी देशों में किसी अजनबी का स्वागत हाथ मिलाकर किया जाता है या शायद गालों को चूमकर। वहाँ इसे सही और उचित समझा जाएगा। भारत जैसे दूसरे देशों में शारीरिक संपर्क इतना सामान्य नहीं होता और छोटी-छोटी बातों पर या बार-बार शारीरिक संपर्क को उचित नहीं माना जाता। इतनी निकटता से कुछ लोग अपमानित भी महसूस कर सकते हैं। खाना खाते वक़्त टेबल पर हाथों से खाना, उंगलियाँ चाटना या डकार लेना पश्चिमी देशों में अनुचित माना जाता है। लेकिन भारत में भोजन पकाने वाला इन संकेतों को अपनी प्रशंसा समझेगा कि उसका भोजन आपको पसंद आया और आपने छककर, भरपेट भोजन किया।

लेकिन यह सिर्फ टेबल मैनर्स (भोजन की औपचारिकताओं) या लोगों के स्वागत तक ही महदूद नहीं है! जब आप थोड़ा गहरे उतरते हैं और सामने वाले को, दूसरे नज़रियों और दृष्टिकोणों को कुछ बेहतर जानने-समझने लगते हैं, आपमें खुलापन आता जाता है। दूसरों के जीवनों में हो रही घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में आप अपने जीवन को तौलते हैं और उनके विश्लेषण के बाद आपका दृष्टिकोण, आपका नजरिया, आपके विचार बदल भी सकते हैं।

संभव है आपके पास इतनी दूर, पश्चिमी देशों की यात्राएँ करने लायक पैसा न हो मगर इसके बावजूद आप यात्रा करके अपने नज़रिए को विस्तार दे सकते हैं। हल्की-फुल्की यात्राएँ कीजिए, ट्रेन या बसों में कीजिए, दूसरे किसी शहर घूम आइए, अपने आम गंतव्यों से परे कुछ दूर: दूसरी संस्कृतियाँ, जितना आप समझते हैं, उतनी दूर नहीं हैं!

प्रिय डॉक्टर, एक अनपढ़ कर्मचारी भी मनुष्य है, सबको एक जैसा समझो! 31 अक्तूबर 2013

कल के ब्लॉग में मैंने आपको बताया था कि हमारी एक कम पढ़ी-लिखी कर्मचारी के लिए अपना गर्भपात कराना कितना कठिन हो गया था। रमोना भी उस स्त्री-रोग विशेषज्ञ के यहाँ उसके साथ गई थी। इतने साधारण से काम के लिए उस कर्मचारी को जो परेशानियाँ झेलनी पड़ीं उन्हें देखकर रमोना को बहुत दुख और आश्चर्य हुआ। लेकिन इस पूरे मामले में एक और बात उसने मुझे बताई, जिसने उसे और भी ज़्यादा परेशान कर दिया था: कर्मचारी के साथ उस डॉक्टर का बात करने का ढंग!

बात को और स्पष्ट करने के लिए बता दूँ कि वह कोई गाँव की नातजुर्बेकार डॉक्टर नहीं थी। हम एक ऐसी महिला की बात कर रहे हैं जिसका स्वयं का नर्सिंग होम है और जिसने चिकित्सा की पढ़ाई की है और भारत के कई बड़े शहरों के बड़े-बड़े अस्पतालों में अपने काम का अनुभव प्राप्त किया है। वह रमोना से अंग्रेज़ी में अच्छी तरह बात कर रही थी और उतनी ही वाकपटुता और स्पष्टता के साथ हिन्दी में भी। पर जब तक वह रमोना से बात करती थी तब तक उसका लहजा ठीक होता था लेकिन जैसे ही वह उस कर्मचारी की ओर मुड़ती, जो दरअसल उसकी मरीज भी थी, उसका लहजा बदल जाता था।

बहुत समय नहीं हुआ जब मैंने एक नेत्र-चिकित्सक के यहाँ का अपना हाल आपको बताया था। वे मेरे साथ क्या कर रहे हैं या क्या करने वाले हैं, यह बताना उस नेत्र-चिकित्सक ने कतई आवश्यक नहीं समझा था। मैंने यह भी बताया था कि कैसे भारत में डॉक्टर मरीज को उसकी बीमारी, जांच और इलाज के बारे में बताना बिल्कुल ज़रूरी नहीं समझते और अपने इस व्यवहार के लिए यह बहाना बनाते हैं कि उनके पास आने वाले ज़्यादातर मरीज अपढ़ होते हैं, जो न तो अपने शरीर के बारे में कुछ जानते हैं न ही इस बात की कोई परवाह करते हैं। वे सिर्फ जल्द से जल्द ठीक होना चाहते हैं। लेकिन इस बार रमोना ने एक और बात भी नोट की।

डॉक्टर जानती थी कि हमारी कर्मचारी अधिक पढ़ी-लिखी नहीं है और उसे गर्भाधान, गर्भनिरोधक, चिकित्सा और इससे संबन्धित दूसरी बातों की कोई जानकारी नहीं है। वह जानती थी कि डॉक्टरों द्वारा प्रयुक्त बहुत से चिकित्सकीय शब्द और बहुत सी सामान्य चिकित्सकीय बातें भी वह महिला समझ नहीं पाएगी। फिर भी वह महिला उसके सामने बैठी है, पैसा खर्च करके अपना इलाज कराने आई है और सबसे बड़ी बात एक इंसान है, जिसके साथ सम्मान और गरिमा के साथ व्यवहार करना आवश्यक है! कोई मरीज कितना भी अनपढ़ क्यों न हो, वह आपको किसी प्रोफेसर से कम फीस नहीं देता और आपने शपथ ली हुई है कि जो भी आपके पास इलाज के लिए आएगा आप उसकी मदद करेंगे!

आपसे सिर्फ यही अपेक्षा नहीं होती कि आप उनके शरीर का इलाज करेंगे बल्कि बीमारी के चलते पैदा होने वाली मानसिक तकलीफ से भी उन्हें बाहर निकालेंगे! ये औरतें आपके पास ऐसे मामले लेकर आती हैं, जो उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं! बात मामूली बुखार, फ्लू या मोच की नहीं है! जीवन-मरण का प्रश्न है, एक नई जिंदगी का प्रश्न है, संतान का प्रश्न है, जो कुछ लोगों के लिए जीवन का एकमात्र उद्देश्य होता है! उनकी अपनी कुछ धारणाएँ, भावनाएँ और विचार होते हैं और भले ही आपको और आपके सभ्य समाज को वे अजीबोगरीब लगते हैं, उनके पास उनके अपने तर्क और औचित्य होते हैं। आप उन्हें समझा सकते हैं बल्कि आपको संयम के साथ समझाना चाहिए कि आप क्या कह रहे हैं। फिर उन पर अपनी इच्छा आरोपित करने के स्थान पर उन्हें अपना निर्णय स्वयं लेने की आज़ादी देनी चाहिए जो आम तौर पर दूसरे मरीजों को दी जाती है। आपको सलाह देने का पूरा अधिकार है लेकिन आपको उनकी भावनाओं का ख्याल भी रखना चाहिए!

अपने साथ आई महिला के मुक़ाबले अपने साथ डॉक्टर का अच्छा रवैया रमोना को सचमुच बहुत नागवार गुज़रा। उसने मुझे बताया कि कैसे वह बार-बार डॉक्टर का ध्यान मरीज की तरफ खींचने की कोशिश करती थी। पूरे समय बराबरी के स्तर पर रहते हुए वह बहुत संयत स्वर में अपनी कर्मचारी मरीज से बात करती, उसे बताती कि डॉक्टर क्या कह रही हैं, उसकी समस्या का हल क्या हो सकता है, आगे क्या किया जाना है। अतिरिक्त कोशिश करते हुए कि कहीं भी ऐसा न लगे कि वह किसी तरह भी उससे ऊंचे स्तर की महिला है। उसे लगा कि शायद उसके व्यवहार को देखकर ही डॉक्टर उसके साथ बेहतर व्यवहार करे! मगर अफसोस, ऐसा आखिर तक नहीं हो सका।

प्रिय डॉक्टरों, आपके पास ज्ञान और अनुभव है इसलिए लोग आपके पास आते हैं। उनके दिल में आपके लिए बहुत आदर भाव होता है लेकिन क्या आप उस आदर का ठीक सिला उन्हें दे रहे हैं? उनके आदर का दुरुपयोग मत कीजिए और इस बात को समझिये कि जो भी आपके पास आता है वह एक मनुष्य है और उसकी भी अपनी कुछ इच्छाएँ, भावनाएँ और स्वप्न होते हैं!

चैरिटी और उनका गरीबी का प्रदर्शन – 12 अप्रैल 2013

सेवा संगठन चलाना एक शानदार काम है! आप अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा इसे समर्पित करते हैं, बहुत दौड़धूप करते हैं, पैसा लगाते हैं, और ज़ाहिर है, बहुत मेहनत से उसे खड़ा करते हैं लेकिन अंततः आप महसूस करते हैं कि आपका सारा त्याग और पुण्य हजारोंगुना होकर आपको वापस प्राप्त होता है! जब आप बच्चों की हंसी देखते हैं, जब आप उनके ठहाके सुनते हैं और सोचते हैं कि कितना कुछ उन्होंने आपके प्रयासों से सीखा और अर्जित किया है तो आपका दिल संतोष से भर जाता है! मगर कभी-कभी ऐसे भी मौके आते हैं जब मुझे कहना पड़ता है कि हमारा काम दूसरे सेवा संगठनों से कुछ अलग है और इसलिए संभव है, कुछ लोगों के लिए उतना आकर्षक भी न हो।

शायद आप जानते हों कि जर्मनी मेरे लिए अपने दूसरे घर जैसा है। मैं वहाँ बहुत घूमा-फिरा हूँ, मेरे बहुत से मित्र वहाँ हैं और मेरी पत्नी भी जर्मन है। हमारा एक जर्मन सेवा संगठन भी है जिसे हमने भारत में स्थित हमारी परियोजनाओं को सहारा देने के लिए और विदेशों में हमारे कार्यक्रम आयोजित करने के उद्देश्य से खड़ा किया था। जिससे कि हमारे मित्र और सहयोगी दूसरों को बता सकें कि वो अपना योगदान हमारी जर्मन संस्था को भी दे सकते हैं। इस प्रकार हमारे एक मित्र को उसके मित्र ने संपर्क किया, जिसकी कंपनी गरीब बच्चों के लिए कुछ दान करना चाहती थी। वह एक बड़ी कंपनी है जिसकी सालाना आमदनी का एक बड़ा हिस्सा चैरिटी हेतु प्रयुक्त होता है। वह संस्था जिसे यह रकम प्राप्त होनी है, उसका चयन एक तरह की प्रतियोगिता के माध्यम से तय होता है। कर्मचारी उस परियोजना के चित्र और विवरण पेश करते हैं जिसे सहायता पहुंचाने में उनकी रुचि होती है और प्रबंधन या मैनेजर तय करते हैं कि अंततः धनराशियाँ किसे प्राप्त होंगी।

खैर, हमारे मित्र के पास तो हर वक़्त हमारे आश्रम के चित्र, ब्रोशर्स (प्रचार पुस्तिकाएँ) होते हैं, वैबसाइट होती है, जिसमें उसके और उसकी पत्नी द्वारा प्रायोजित बच्चों को दिये जाने वाले भोजन की चित्रों सहित जानकारी होती है। जब उसने वह सब अपने मित्र को दिखाया तो वह बोला, "अरे, ये बच्चे तो बढ़िया कपड़े पहने हुए हैं और खुश लग रहे हैं। इसे दिखाकर तुम जीत नहीं पाओगे! तुम फटे कपड़े पहने हुए बच्चों को दिखाओ, जो थोड़ा दुखी और दयनीय लगें!"

जब मेरा मित्र मुझे यह बताने आया तो वह अजीब भ्रांति से ग्रसित था और मुझे विश्वास है, मैंने उसे एक स्पष्ट वाक्य से समझा दिया कि ऐसी स्थिति में उसे क्या कहना चाहिए, ‘उन्हें कह दो कि अगर वे ऐसे ही चित्र देखना चाहते हैं तो अपना पैसा कहीं और दान कर दें! मैं अपने बच्चों के ऐसे चित्र न खुद खींचूँगा न किसी को खींचने दूँगा।’

मैं इस बारे बहुत गंभीर हूँ! मैं आपका पैसा नहीं चाहता! और मैं जानता हूँ यह विचार कहाँ से आता है-सारी बड़ी चैरिटी संस्थाएं भूखे बच्चों की, गंदगी में लिपटे हुए, लगभग नंगे, हड़ियल, चेहरे पर मक्खियाँ भिनभिनाती हुईं और रोते हुए, दयनीय बच्चों की तस्वीरें अपनी वैबसाइट पर लगाते हैं। वे अपने विज्ञापनों और ब्रोशर्स पर ऐसे चित्र लगाते हैं जिससे लोगों के दिल पिघल जाएँ। वे बुरे से बुरा दिखाते हैं, भयावह नज़ारा दिखाना ठीक समझते हैं।

मैं मानता हूँ कि वास्तव में ऐसे डरावने नज़ारे दुनिया में मौजूद हैं पर जिसने भी ऐसी किसी संस्था में काम किया है वह मेरी तरह जानता है कि ये अतिशय गरीबी और दयनीयता का चित्रण है। वे और भी बहुत सा काम करते हैं जिन्हें वे दिखा सकते हैं मगर उनके वे चित्र लोगों को रोने के लिए मजबूर नहीं करते।

मैं बहुत गंभीरता के साथ कहता हूँ कि मैं अपने बच्चों के ऐसे चित्र नहीं ले सकता। नहीं, मैं उन्हें ऐसी हालत में नहीं देखना चाहता और किसी भी हालत में उनके ऐसे चित्रों का प्रदर्शन करना नहीं चाहूँगा। ये मेरे बच्चे हैं और मैं उनका वैसा ही ध्यान रखता हूँ जैसा मैं खुद अपने आपका रखता हूँ। मैं उन्हें अच्छे कपड़े पहनने के लिए देता हूँ, अच्छा खाना देता हूँ और मैं उन्हें वातानुकूलित कमरों में पढ़ने की सुविधा उपलब्ध कराता हूँ! दान प्राप्त करने की गरज से मैं झूठ का सहारा नहीं ले सकता। ये मेरे बच्चे हैं जो बिल्कुल मेरी ही तरह हैं-खुश, खेलते-कूदते और हँसते-गाते!

एक स्वयं सेवक का अस्वीकृत आवेदन – गलत प्रवृत्ति का एक उदाहरण – 11 अप्रैल 2013

यहाँ आश्रम में हम हर आने वाले और मेहमानों का खुले मन से स्वागत करते हैं। कभी कभी हमारा विश्रांति का काल भी होता है, जैसे आयुर्वेद योग अवकाश, जब हमारा आश्रम सहभागियों से लगभग भरा रहता है। लेकिन ऐसे अवसरों के अलावा यहाँ तरह तरह की रुचियों वाले लोग आते ही रहते हैं जैसे कुछ लोग चाहते हैं कि हम उनके लिए एक निजी यात्रा का प्रबंध कर दें, यूं ही हमसे मिलकर प्रसन्न होने वाले मित्र गण, सामान्य प्रवासी जो वृंदावन दर्शन के लिए या हमारा आश्रम देखने और वहाँ चैरिटी कार्य में सहयोग करने आते हैं और स्वयं सेवक, मेहमान जो हमारी पार्ट-टाइम सहायता करने की इच्छा से यहाँ कुछ दिनों के लिए निवास करते हैं। आज मैं आपको पार्ट-टाइम काम करने की इच्छुक एक ऐसी ही जिज्ञासु महिला के बारे में बताना चाहता हूँ जिसके पत्र की प्रतिक्रिया स्वरूप रमोना को, अपने स्वभाव के विपरीत, एक तीखा उत्तर लिखना पड़ा। जब कोई स्वयं सेवक हमसे पार्ट-टाइम कार्य हेतु पूछताछ करता है तो हम अपेक्षा करते हैं कि उन्होंने हमारे 'स्वयं सेवकों के लिए मेरे पिछले ब्लॉग्स', जिनमें मैं बीच बीच में बताता रहता हूँ कि हमारे यहाँ कंप्यूटर के काम में सहायता करने वालों का हम स्वागत करते हैं, के अलावा उससे संबंधित 'वालन्टियर पेज' पढ़ लिए होंगे। चार घंटे इस काम में हमारी सहायता करके वे यहाँ रहने के अपने खर्च में छूट पा सकते हैं, लेकिन इसके बावजूद हम उनसे एक मामूली रकम के भुगतान की अपेक्षा करते हैं जो उनके यहाँ निवास और अन्य मदों पर होने वाले खर्चो का कुछ हिस्सा ही होता है। ऐसा करने के बाद वृंदावन देखने के लिए, आश्रम के बच्चों के साथ खेलने के लिए, बगीचों में घूमने के लिए, योग करने के लिए, मालिश करवाने के लिए या अपनी रुचि का काम करने के लिए उनके पास पर्याप्त समय होता है।

पूछताछ करने वालों को इसकी जानकारी देना रमोना का काम है और इसकी उसे आदत पड़ चुकी है और जो लोग कंप्यूटर का काम जानते हैं, ज्यादातर इस व्यवस्था से बड़े खुश होते हैं क्योंकि जिस प्रयोजन से वे भारत आए हैं वह कार्य अपनी मनमर्जी से करने के लिए उनके पास काफी समय बच जाता है। लेकिन जिसे रमोना ने यह तीखा उत्तर लिखा वह महिला इस व्यवस्था से खुश नहीं थीं। यह उस महिला के पत्र का वह हिस्सा है जिस पर रमोना को बैठकर सोचना पड़ा और लंबा उत्तर लिखना पड़ा:

"आपका प्रस्ताव बहुत आकर्षक तो नहीं है। मैं समझ रही हूँ कि आप कोई नुकसान नहीं उठाना चाहते लेकिन इस ग्रह पर अब ऐसे इंसान नहीं बसते जो बिना रकम वसूले एक दूसरे की सहायता करें। यह कारुणिक तो है मगर है तो ऐसा ही और मुझे भी इसका आदी हो जाना चाहिए।"

मैं रमोना के पत्र को सिर्फ कॉपी-पेस्ट कर रहा हूँ क्योंकि उसका उत्तर मेरे ही विचारों को प्रतिध्वनित कर रहा है:

प्रिय जूली (महिला की पहचान गुप्त रखने की गरज से उनका नाम बदल दिया है),

मैं आपके लिए सारी बातें स्पष्ट करना चाहती हूँ: यहाँ हम बिना रकम वसूले लोगों की मदद करते हैं-150 बच्चे रोज़ हमारे स्कूल में पढ़ने आते हैं, मुफ्त शिक्षा पाते हैं, मुफ्त भोजन प्राप्त करते हैं, हम उनकी किताब-कापियों का, वर्दियों का और शिक्षकों आदि का खर्च उठाते हैं। अन्यथा इन बच्चों के माता-पिता उनकी पढ़ाई का खर्च उठाने में असमर्थ थे और हमारे स्कूल के दरवाजे उनके लिए नहीं खुले होते तो वे बच्चे निश्चय ही अनपढ़ ही रह जाते।

इन बच्चों के खर्च का कुछ हिस्सा दान से आता है और बाकी हमारे व्यवसाय से। अपनी कमाई हम इन मज़लूम बच्चों पर खर्च करते हैं, अपने लिए बचाकर नहीं रखते।

और आप हैं कि मुझे लिख रही हैं कि अब दुनिया ही परोपकारियों से खाली हो गई है, मुफ्त में कोई सेवा और दूसरों की मदद करना ही नहीं चाहता। हम यहाँ गरीब बच्चों की मदद कर रहे हैं और उनके माता-पिता खुश हैं कि उन्हें कम से कम अपने बच्चों के भोजन, जो उन्हें आश्रम में मुफ्त मिलता है, की चिंता नहीं करनी पड़ती। इसलिए अगर हम अपने उन मेहमानों से, जो 700 यूरो (50000 रुपये) सिर्फ हवाई यात्रा पर खर्च देते है और जो इतना वक़्त अवकाश में, अर्थात बिना काम किए, बिना उपार्जन किए, गुज़ार सकते हैं, यह अपेक्षा करें कि वे अपने निवास के दौरान खर्च होने वाली बिजली (एसी, प्रकाश-व्यवस्था, लैपटाप, मोबाइल आदि) पानी और भोजन का खर्च वहन करें तो हम पर आरोप लगाया जाएगा कि हम सेवाभावी नहीं हैं बल्कि लाभ कमाने के लिए आश्रम खोलकर बैठे हैं। हाँ! भोजन और रहने का प्रबंध अवश्य यूरोपियन स्तर का होना चाहिए!

हाँ! जी हाँ, ऐसा ही है और मैं जानती हूँ कि हमारा आश्रम आपके लिए ठीक स्थान नहीं है।

मुझे उम्मीद है कि आप किसी दूसरे सेवा संस्थान को पत्र लिखने से पहले मेरे इन शब्दों पर अवश्य विचार करेंगी क्योंकि वहाँ भी लोग रोज़ ऐसी ही मेहनत से गरीबों की सहायता कर रहे होंगे कि वे सिर्फ जिंदा रह सकें और अपने लिए बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकें।

मैं आशा करती हूँ कि आपको मनचाहा स्थान अवश्य मिल जाएगा जहां आप अपना समय सुख पूर्वक गुज़ार सकेंगी।

प्यार सहित,

रमोना

लड़ाके लड़ाई जारी रखना पसंद करते हैं – 5 जुलाई 2009

जीवन में आने वाली समस्याओं का सामना लोग अलग अलग तरीकों से करते हैं। निश्चय ही इस बात का संबंध जीवन के प्रति उनके मूल दृष्टिकोण से और आस पास के लोगों के साथ होता है। आप देखते हैं कि अधिक मुश्किल परिस्थितियों में कुछ लोग बेहद आक्रामक हो जाते हैं। वे समस्या को और उससे उपजे संघर्ष को बनाए रखना चाहते हैं और ऐसे लोग अधिकतर क्रोध के वशीभूत परिस्थिति का ठीक तरह से जायज़ा नहीं ले पाते, उसे समझ नहीं पाते। ऐसे लोग आसानी से आक्रांत हो जाते हैं जबकि कोई उन्हें नुकसान नहीं पहुंचना चाहता। वे महसूस करते हैं जैसे उनकी तरह सारी दुनिया ही आक्रामक है और उन पर हमले कर रही है। वार्तालाप का एक साधारण वाक्य उन्हें असुरक्षित बना देने के लिए काफी होता है और वे इतने त्रस्त हो उठते हैं कि प्रतिरक्षा में वे स्वयं आक्रामक हो जाते हैं। और इस तरह एक संघर्ष की, एक युद्ध की स्थिति बन जाती है।

मैं इस तरह का व्यक्ति नहीं हूँ। वास्तव में मैं इसका उलट व्यवहार करता हूँ। यदि कुछ अच्छा और आसानी के साथ हो रहा है तो मैं प्रसन्न होता हूँ। और अगर कुछ बातें कोई परेशानी खड़ी कर रही हैं, और परिस्थिति बिगड़ती ही जा रही है तो मैं सिर्फ उससे दूरी बना लेता हूँ। मैं संघर्ष करना और लड़ाई नहीं चाहता, मैं शांति, आनंद और प्रेम के साथ जीना चाहता हूँ। लड़ाके हमेशा अगले आक्रमण से भयभीत रहते हैं और वे कभी अपने अस्त्र-शस्त्रों को अपने से अलग नहीं कर पाते।