एक प्रतियोगिता, जो मुझे अच्छी नहीं लगी, भले ही मैंने उसे जीत लिया था – 20 जुलाई 2014

आज मैं आपको सन 2006 में कोपेनहेगन में दिए गए अपने व्याख्यान के बारे में बताना चाहता हूँ। हर तरह से वह एक अनोखा व्याख्यान रहा। क्यों? आगे बताता हूँ।

कोपेनहेगन में मेरा एक दोस्त था, जिसके बारे में शायद मैं आपको पहले भी बता चुका हूँ। वह एक लेखक है; दार्शनिक की मानिंद वाकई एक दिलचस्प व्यक्ति। उसने मुझे 2006 में दोबारा अपने यहाँ आने का न्योता दिया और वही उस बार मेरे कार्यक्रम आयोजित करने वाला था। आयोजक के अतिरिक्त वह मेरा मित्र भी था और कार्यक्रमों के बीच मैं उसके साथ एक मित्रतापूर्ण समय गुज़ारने की प्रत्याशा में था।

मैं सबेरे सबेरे कोपेनहेगन आ गया और उसके घर, जहाँ मैं कुछ दिन ठहरने वाला भी था, पहुँचने पर उसने मुझे मेरे कार्यक्रमों की रूपरेखा बयान की। सूची में सबसे पहला स्थान मेरे उसी व्याख्यान का था, जिसका आयोजन उसी दिन होना था और उसने उसके विषय की मूल बातों को स्पष्ट करते हुए कहा: यह व्याख्यान कुछ अनोखा होगा! मैंने पूछा कि ‘अनोखा’ से उसका क्या मतलब है तो उसने विस्तार से समझाना शुरू किया:

उसकी योजना के मुताबिक वहाँ अकेला मैं व्याख्यान नहीं देने वाला था बल्कि वह खुद और हम दोनों का एक और मित्र भी मेरे साथ शामिल रहने वाले थे। हम दोनों के इस साझा मित्र का लोगों के साथ सीधा संपर्क था और वह उनकी शारीरिक समस्याओं पर काम किया करता था। हम तीनों को एक ही विषय पर बोलना था और उसके बाद श्रोताओं को, जोकि इस आयोजन में पैसा खर्च करके हम तीन भिन्न व्यक्तियों को सुनने आने वाले थे, यह निर्णय करना था कि किसका व्याख्यान सबसे अच्छा रहा।

मैं पूरी तरह हतप्रभ रह गया। कार्यक्रम शुरू होने में कुछ घंटे ही बाकी थे और मैंने व्याख्यानों के इस तरह के किसी आयोजन के बारे में सुना तक नहीं था। मैं आज तक ऐसी किसी प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं बना था और मेरे अन्दर किसी भाषण प्रतियोगिता में विजयी होने का न तो कोई जज़्बा था और न ही कोई महत्वाकांक्षा थी! ईमानदारी की बात यह कि यह विचार मुझे कतई पसंद नहीं आ रहा था। अपने दोस्तों के विरुद्ध प्रतियोगिता में शामिल होना मुझे अजीब सा लग रहा था! खैर, सारे इंतज़ाम हो चुके थे और मैंने सोचा, चलो पहली बार इस तरह का अनुभव प्राप्त होगा। एक नया, अलग सा अनुभव-अपनी तरफ से अपन अच्छे से अच्छा कुछ करते हैं!

जैसी योजना थी, सबके भाषण हुए। मेरे मित्र ने श्रोताओं के पास हम तीन वक्ताओं के नामों की पर्ची पहुँचा दी, जिस पर भाषणों की समाप्ति पर उन्हें हर वक्ता को अंक प्रदान करने थे। फिर एक के बाद एक हम तीनों ने एक निर्धारित विषय पर-याद नहीं, विषय क्या था-भाषण दिए और श्रोताओं को सोच-समझकर अंक देने के लिए कुछ वक़्त दिया गया। फिर सारे श्रोताओं से पर्चियां वापस ली गईं और अंकों का हिसाब लगाया गया-और फिर वह क्षण भी आ गया जब नतीजे घोषित किए जाने थे:

प्रतियोगिता में मैं विजयी रहा था, दूसरे क्रम पर हमारा वह साझा मित्र था और आयोजक स्वयं तीसरे और अंतिम स्थान पर रहा।

मुझे कोई अचरज नहीं था-आखिर यह मेरा पेशा था! जहाँ तक बाकी दोनों का सवाल था, मुझे लगता है श्रोताओं ने अपनी निजी पसंद के अनुसार अंक दिए होंगे। हमारा वह साझा मित्र ज्ञान का भण्डार ही था और हालाँकि वह पेशावर वक्ता नहीं था, वह सारा दिन लोगों के साथ संपर्क रखे हुए था। वह भी एक लेखक था और जानता था कि अपने विचारों को शब्दों में कैसे व्यक्त किया जाता है।

सारे आयोजन पर हम हँसते रहे, उस पर हल्की-फुलकी बातें करते रहे और श्रोताओं को भी यह अच्छा लगा कि हम सभी ने प्रतियोगिता को खेल की तरह लिया-कम से कम यह ज़ाहिर करते रहे कि हम उसे खेल की तरह ले रहे हैं। मगर पूरे समय मुझे लगता रहा कि मेरे मित्र का अहं आहत हुआ है! उसके चेहरे पर मुस्कान थी, वह भरसक अपने आप पर हँसने का नाटक कर रहा था लेकिन उससे ज़्यादा कुछ न कुछ उसके भीतर घटित हो रहा था! मैं उसे अच्छी तरह जानता था और मुझे लग रहा था कि उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि प्रतियोगिता में वह तीसरे और अंतिम स्थान पर रहेगा।

वह पूरे कार्यक्रम का पूरा आनंद नहीं ले सका-अन्यथा मैं समझता हूँ कि यह विचार उतना बुरा भी नहीं था और उसका भरपूर मज़ा लिया जा सकता था!

किस सीमा के बाद सेक्स को लत (व्यसन) कहा जा सकता है? 24जून 2014

'सेक्स और स्वतंत्रता' पर दिए गए मेरे व्याख्यान के दौरान मुझसे एक और प्रश्न पूछा गया था, जो मुझे दिलचस्प लगा और इसलिए आज मैं आपको उसके विषय में बताना चाहता हूँ। प्रश्नकर्ता जानना चाहता था कि मेरे विचार में सेक्स कब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो जाता है, किस सीमा के बाद कहा जा सकता है कि उसकी लत पड़ चुकी है।

दरअसल मुझे उसके शब्दों से ही असहमति थी। मेरी परिभाषा के अनुसार सेक्स किसी भी हालत में लत या व्यसन नहीं बन सकता। हम भावनाओं और प्रेम के विषय में चर्चा कर रहे हैं-इसमें लत जैसी बात ही कहाँ उठती है? अगर आप कहें कि मुझे प्रेम की लत लग गई है तो मुझे स्वीकार करना पड़ेगा कि हाँ, मुझे उसकी लत है। अगर आप पूछें कि क्या मुझे सेक्स की लत है तो मैं इसका उचित उत्तर देने में कठिनाई महसूस करूंगा- लत का क्या पैमाना हो सकता है?

वैसे अलग-अलग लोगों के लिए इसके अलग-अलग पैमाने हो सकते हैं-कुछ लोग सप्ताह में एक बार करते हैं, कुछ सप्ताह में सातों दिन और कुछ ऐसे भी हो सकते हैं, जो एक दिन में सात बार करें! इसमें उसके लत बनने का सवाल ही कहाँ उपस्थित होता है? आप ठीक किस जगह वह सीमा-रेखा खींचेंगे?

वास्तव में मैं यह महसूस करता हूँ कि वास्तविक सेक्स कभी भी लत नहीं बन सकता। जब सेक्स की भावना दिमाग में आती है तभी वह लत बनता है। सेक्स दिमाग का मसला नहीं है। यह आपके दिल का और आपके शरीर का मामला है। यह सही है कि एक सीमा तक दिमाग पर भी असर होता है क्योंकि दिमाग आपके शरीर से और आपकी भावनाओं से अलग नहीं है। जब आपके दिमाग में यौन विषयक सोच निरन्तर चलती रहती है और वहाँ उसका अतिरेक हो जाता है तब, मैं समझता हूँ कि आप इसके प्रति आसक्त हो सकते हैं। इस तरह अश्लीलता लत है- परन्तु सेक्स नहीं।

जहाँ तक वेश्यावृत्ति की बात है तो वह तो बिल्कुल अलग मामला है। मैं नहीं समझता कि यदि कोई व्यक्ति सेक्स के लिए किसी वेश्या के पास जाता है तो उसे सेक्स की लत कहा जा सकता है। पुरुष कुछ अलग चाहते हैं और उसे पाने के लिए वेश्या के पास जाते हैं और सेक्स के लिए पैसे खर्च करते हैं। मुझे गलत मत समझिए-मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि कोई व्यक्ति प्रेम पाने के लिए वेश्या के पास जाता है क्योंकि वह यह एहसास करना चाहता है कोई उससे प्रेम कर रहा है। जी नहीं, दरअसल मैं मानता हूँ कि वेश्या के पास जाने वाला व्यक्ति (कामुक) प्रेम देने और साथ में पैसे भी देने उसके पास जाता है। यह एक ज़रुरत है- मगर उसका सेक्स से ज़्यादा सम्बन्ध नहीं है।

निश्चय ही मानसिक बीमारियों के कुछ मामले भी होते हैं, जहां सेक्स को एक लत के रूप में देखा जा सकता है-मगर ऐसी स्थिति में मैं उसे सेक्स नहीं कहूँगा! यह मस्तिष्क संबंधी समस्या (बीमारी) है, इसका शरीर से बहुत कम संबंध है और दिल से तो बिल्कुल ही नहीं है।

आप किसी और की सम्मति भी ले सकते हैं, आप इससे बिल्कुल अलग तरह से सोच सकते हैं लेकिन मुझे लगता है कि एक बात पर हम सभी सहमत होंगे कि एक बार यदि किसी ने सच्चे प्रेम का अनुभव कर लिया, बढ़िया सेक्स की सनसनी और उसका आनंद ले लिया तो फिर इसे वह बार-बार करना चाहेगा!

मेरे विचार में प्रेम क्या है? 19 जून 2014

ग्रान कनारिया में मेरे पहले व्याख्यान के दौरान लोगों ने सिर्फ इतना ही नहीं पूछा कि सेक्स के बारे में मैं क्या सोचता हूँ बल्कि यह प्रश्न भी किया:

प्रेम क्या है?

कमरे में ख़ामोशी छा गई और मैंने छोटे-छोटे कुछ वाक्यों में उत्तर दिया:

जब आप किसी की परवाह करते हैं तो वह प्रेम है।

जब आप किसी को खुश करके खुद भी खुश होते हैं।

जब आप कुछ देकर खुश होते हैं- क्योंकि कुछ प्राप्त करके तो आप खुश होते ही हैं।

जब आपको ऐसा महसूस हो कि आपका दिल ख़ुशी से छलछला रहा है तो समझिए कि यही प्रेम है!

प्रश्नकर्ता के लिए इतना उत्तर पर्याप्त था मगर फिर एक और व्यक्ति था, जो कुछ अधिक स्पष्टता और विस्तार से जानना चाहता था और उसका प्रश्न था: इसे किस तरह जाँचा-परखा जा सकता है कि आपके बीच मौजूद प्रेम वास्तव में सच्चा प्रेम है?

मैंने जवाब दिया कि आपको इसकी कोशिश भी नहीं करनी चाहिए। प्रेम ऐसी चीज नहीं है, जिसकी आप परीक्षा कर सकते हैं। प्रेम कोई ऐसी चीज़ नहीं है, जिसे आप बारीकी से जांच-परखकर पा सकेंगे। इस विषय पर आपको इस तरह सोचना भी नहीं चाहिए! जी नहीं, प्रेम सच्चा है या नहीं, इस पर ज़्यादा परेशान होने की जगह सिर्फ उसका आनंद उठाना चाहिए!

दरअसल मैं विश्वास करता हूँ कि प्रेम हमेशा सच होता है। सिर्फ हर पल इस एहसास की जांच-पड़ताल करने का इरादा छोड़ दें तो वह लगातार विकसित होता चला जाएगा। अपनी भावनाओं, इच्छाओं और अपेक्षाओं के प्रति लगातार ईमानदार बने रहें!

ईमानदारी के साथ सिर्फ उसका अनुभव लेते हुए ज़िंदगी गुजारें।

आनंदित रहें और प्रेम में मगन रहें!

मेरे विचार में सेक्स क्या है? 18 जून 2014

कल मैंने आपको ग्रान कनारिया में दिये गए अपने पहले व्याख्यान के बारे में बताया था। व्याख्यान के बाद मैंने श्रोताओं द्वारा पूछे गए बहुत से प्रश्नों के उत्तर दिये और मुझे लगता है कि उनमें से कुछ आपको भी दिलचस्प लगेंगे।

एक व्यक्ति ने पूछा कि वास्तव में सेक्स क्या होता है और जानना चाहा कि मैं उसे किस तरह परिभाषित करूंगा। उसने जोड़ा कि उसके विचार में चुंबन लेना भी एक तरह का सेक्स ही है। लेकिन भारत में उसे किस तरह परिभाषित किया जाता है?

मैंने उसे समझाया कि अधिकांश मामलों में-और खासकर सेक्स के मामले में-मेरे विचार आम भारतीय विचारों से भिन्न होते हैं। भारत में सेक्स के साथ बहुत सी वर्जनाएँ जुड़ी होती हैं और मैं कभी भी वहाँ होने वाले उस तरह के दमन का समर्थन नहीं कर सकता। मैं सिर्फ वही बात करता हूँ, जिसे मैं व्यक्तिगत रूप से ठीक समझता हूँ, जिस पर मैं विश्वास करता हूँ।

और मैं यही ठीक समझता हूँ: सेक्स सिर्फ संभोग तक सीमित नहीं है! महज लिंग-प्रवेश ही सेक्स नहीं है! यह सिर्फ शरीर तक महदूद नहीं है, यह दिल का मामला भी है! सेक्स बिना शरीर के भी संभव हो सकता है! कॉफी पीते हुए साथ बिताई गई हसीन शाम भी दो उत्कट प्रेमियों को वही दिव्य सुख प्रदान कर सकती है! एक चुंबन, एक कोमल स्पर्श, साथ बिताए कुछ रोमानी पल भी संभोग जैसे ही हो सकते हैं।

अपने भाषण की शुरुआत में मैंने ब्रह्मचर्य पर भी चर्चा की थी। मैंने कहा था कि यह सबसे अधिक अप्राकृतिक विचार है-और मैंने अपने श्रोताओं से कहा कि अब सेक्स की इस परिभाषा के नज़रिये से ब्रह्मचर्य को देखें। अगर सिर्फ स्पर्श भी सेक्स है तो कोई भी कैसे ब्रह्मचारी बना रह सकता है? अपने प्रेमी के साथ बिताई गई सुहानी शाम भी सेक्स है तो कैसे आप उससे अछूते रह सकते हैं?

बिलकुल नहीं, सेक्स की इस परिभाषा के साथ-और मैं पूरी गंभीरता के साथ यह मानता हूँ कि सेक्स लिंग-प्रवेश के अतिरिक्त भी बहुत कुछ है- ब्रह्मचर्य का प्रश्न ही नहीं उठता! और अगर आप इस विचार को मानते हैं कि ब्रह्मचर्य ऊर्जा बढ़ाता है, कि संभोग न करके आप ऊर्जा बचाते हैं या यह कि ब्रह्मचर्य आपको आध्यात्मिक ज्ञान की ऊंचाइयों पर पहुंचा सकता है तो आपको सेक्स संबंधी ऊपर वर्णित सभी गतिविधियां बंद कर देनी चाहिए और देखना चाहिए कि ऐसा करने पर आपके साथ क्या हो सकता है: यह आपको बीमार कर देगा!

आप इस विषय पर सोचना क्यों नहीं छोड़ देते? प्रेम करें, अपने करीबी लोगों के साथ बिताए जाने वाले समय का पूरा पूरा आनंद उठाएँ, जिस तरह से चाहें संभोग का मज़ा लें-चाहे किसी के साथ हमबिस्तर होकर, चुंबन लेकर, गले लगाकर या सिर्फ एक-दूसरे के साथ बैठकर समय बिताते हुए!

क्या सम्भोग के दौरान सम्पूर्ण संतुष्टि प्राप्त हो जाने पर पुरुषों की ऊर्जा क्षरित होती है? इस प्रश्न पर मेरा जवाब: 17 जून 2014

हमें ग्रान कनारिया में रहते हुए अब एक हफ्ता हो चुका है और हम इस बीच कुछ बहुत ही अच्छे कार्यक्रम प्रस्तुत कर चुके हैं! इनमें से सबसे पहला एक व्याख्यान था, जो एक बहुत लोकप्रिय विषय से सम्बंधित था: सेक्स और स्वतंत्रता। मैं इसे लोकप्रिय विषय कह रहा हूँ क्योंकि, जैसा इस विषय के साथ हमेशा होता रहा है, हॉल श्रोताओं से पूरा भरा हुआ था और हर कोई यह जानने के लिए उत्सुक था कि इस विषय पर मैं क्या कहने जा रहा हूँ। व्याख्यान के पश्चात् इतना समय था कि श्रोताओं के कुछ प्रतिप्रश्नों का समाधान किया जा सके और अगले कुछ दिनों तक मैं इस व्याख्यान और श्रोताओं के उन सवालों और उन पर दिए गए मेरे जवाबों पर चर्चा करता रहूँगा।

स्वाभाविक ही, इस व्याख्यान में मेरे द्वारा उठाया गया एक मसला ब्रह्मचर्य की अवधारणा के बारे में था। यह स्वतंत्रता विरोधी अवधारणा है, यह यौन की नैसर्गिक इच्छा के दमन का विचार है और इसका पालन करने पर होने वाले दुष्परिणामों की आप कल्पना भी नहीं कर सकते। हजारों साल से धर्म और समाज द्वारा सेक्स को एक प्रकार की वर्जना में बना दिया गया और उन्होंने ब्रह्मचर्य और परहेज को इस तरह से चित्रित किया जैसे वह कोई पवित्र जीवन-पद्धति हो। उन्होंने ब्रह्मचारी संतों और पुरोहितों को पवित्र और बेहतर इन्सानों की तरह प्रचारित किया-लेकिन इसका नतीजा इन्हीं तथाकथित ‘पवित्र’ व्यक्तियों द्वारा किए जाने वाले अनगिनत यौन दुराचारों, बलात्कारों और दूसरी बर्बरताओं के रूप में सामने आया! अक्सर यह अत्याचार भी उन पर किया जाता था, जो उन पर विश्वास किया करते थे, जो उन पर आश्रित थे। क्योंकि नैसर्गिक इच्छाओं का दमन किया जाता था तो उसे कहीं न कहीं बाहर निकलना ही था।

यह सब मैंने अपने व्याख्यान में कहा और उसके बाद प्रश्नोत्तर शुरू हुए: क्या पुरुष अपनी ऊर्जा खो नहीं देते जब वे कामोन्मत्त हो जाते हैं?

मैं जानता हूँ कि यौन क्रियाओं पर प्रतिबन्ध लगाने के पक्ष में धार्मिक लोग यही तर्क देते हैं, जिससे उन लोगों को बस में रखा जा सके भले ही इसके लिए मनुष्य की मूल भावनाओं पर कुठाराघात ही क्यों न होता हो। लेकिन आपको इन बातों को बस इतना ही महत्व देना चाहिए, जितना आप किसी परी-कथा को सुनकर देते, जो आपको इसलिए सुनाई जा रही होती है कि उसे सुनकर आप उनकी इच्छानुसार व्यवहार करने के लिए प्रेरित हों। आपको डराने के लिए एक तरह की धमकी कि अगर आपने ऐसा न किया तो कुछ बुरा हो जाएगा, जिसका वास्तव में कोई आधार नहीं होता। डॉक्टरों ने वैज्ञानिक रूप से इसे पूर्णतः गलत सिद्ध किया है-और इस बात को आप स्वयं अनुभव कर सकते हैं!

क्या आपने कभी यौन-सुख लिया है? उस वक़्त आपके मन में किस तरह की भावनाएँ पैदा हो रही होती हैं? प्रेम, संतोष, शांति और सम्पूर्ण आनंद! ये इस तरह की भावनाएं नहीं हैं, जो किसी ऊर्जा के क्षरण के पश्चात् कोई व्यक्ति महसूस करता है! यह इस तरह की भावनाएं नहीं हैं, जिसमें महसूस हो कि उसने अपनी जीवनी शक्ति या अपने सबसे बहुमूल्य सार-तत्व को खोया है और इसलिए कमजोरी महसूस कर रहा हो! इसके विपरीत, यह सुख आपको नई ऊर्जा से भर देता है!

स्वाभाविक ही सम्भोग के दौरान आप कुछ स्वास्थ्यवर्धक व्यायाम करते हैं तो मामूली थकान तो होगी ही, संभव है आप कुछ सुस्ती भी महसूस करें और सोना चाहें-लेकिन सोकर उठने के बाद आप पहले से ज़्यादा शक्तिशाली, मज़बूत और ऊर्जावान महसूस करेंगे! लेकिन तभी, जब आप सेक्स सम्बन्धी उन मूर्खतापूर्ण विचारों को अपने अन्दर किसी प्रकार का अपराधबोध पैदा करने की इजाज़त नहीं देंगे!

ब्रह्मचर्य दुनिया का सबसे अप्राकृतिक विचार है! इसलिए डरें नहीं, अपने यौन जीवन का मज़ा लें और खुश रहें!

मछली बेचना और भाषण देना दो बिल्कुल अलग बातें हैं – 12 जनवरी 2014

सन 2006 की शुरुआत में, जब मैं अभी आस्ट्रेलिया में ही था, मेरे साथ एक ऐसा वाकया हुआ, जिसने मुझ पर ज़ाहिर किया कि आध्यात्मिक माहौल बहुत व्यावसायिक हो गया है। मैं एक अध्यात्मिक बाज़ार में उपस्थित था-और उसके लिए काम न करने के मेरे निर्णय ने मेरे आयोजकों को आश्चर्यचकित और निराश कर दिया।

पूरी कथा बयान करनी हो तो बता दूँ कि मेरे आयोजक भी वहाँ अपना स्टाल लगाने वाले थे और जब हम वहाँ पहुंचे, उन्होंने बताया कि सप्ताहांत के लिए उन्होंने कोई कार्यशाला नहीं रखी है और उसकी जगह इस अपेक्षा में मुझे यहाँ ले आए हैं कि मैं दूसरों की मदद करने का अपना काम वहाँ करूं। पहले भी मैं ऐसे आयोजनों में शिरकत कर चुका था और उनके विषय में मेरे मन में कोई पुख्ता विचार नहीं बन पाए थे। मैं पहले सिर्फ एक दर्शक के रूप में ही इन कार्यक्रमों में शामिल हुआ था, वक्ता के रूप में नहीं, लेकिन मैं जानता था कि वहाँ बहुत से कार्यक्रम एक साथ व्यवस्थित रूप से आयोजित होते रहते हैं, जैसे अक्सर बड़े मॉल में ख़रीदारी का अनुभव होता है, कुछ-कुछ उस तरह। इसलिए इस बार भी मैं यूं ही चला गया था कि देखते हैं, क्या नज़ारा देखने-समझने को मिलता है।

हम एक बहुत विशाल इमारत तक आए, जहां यह आयोजन हो रहा था और मेरे आयोजक मुझे सीधे अपने स्टाल में ले गए, जिसे उन्होंने एक दिन पहले ही तैयार कर रखा था। उस हाल से गुजरते हुए मैंने दूसरे प्रदर्शकों के स्टालों पर नज़र दौड़ाई। लोग क्रिस्टल्स (स्फटिक), एंजेल-कार्ड, आध्यात्मिक पुस्तकें, सिंगिंग बौल्स (बजाने वाले बर्तन) और बहुत सी उपहार में देने योग्य वस्तुएँ बेच रहे थे। वहाँ अपने अपने स्टाल लगाए टेरो कार्ड से भविष्य बताने वाले लोग थे, अतीन्द्रियदर्शी और ज्योतिषी बैठे हुए थे। आप अपने प्रभामंडल का फोटो प्राप्त कर सकते थे, कई विभिन्न तरीकों से अपना भविष्य जान सकते थे और पर्दों से पृथक्कृत छोटे-छोटे केबिनों में अपनी मालिश करवा सकते थे। बगल में स्थित कुछ बड़े हालों में कई कार्यक्रम भी वहाँ चल रहे थे, जहां गुरुओं आदि के व्याख्यानों के टाइम-टेबलों की घोषणाएँ हो रही थी और उनके पर्चे बांटे जा रहे थे। वह एक तरह का आध्यात्मिक सुपरमार्केट ही था, एक मेला, जहां ऊर्जा को खरीदना-बेचना सहज रूप से चल रहा था।

हाल की तरफ निकलने वाले मुख्य रास्ते पर स्थित मेरे आयोजक का स्टाल भी काफी बड़ा था। आखिर, वहाँ पहुँचकर उन्होंने अपनी सारी योजना के बारे में मुझे बताया। उसने मुझसे कहा, "हम अपने स्टाल का एक छोटा सा हिस्सा पर्दों की सहायता से ढँक देते हैं और आप अपना व्यक्तिगत सत्र यहीं लगा सकते हैं। और बाद में हम आपके प्रवचन के स्थान और समय की घोषणा कर देंगे। उस वक़्त यहाँ बहुत से लोग मौजूद होंगे और आसपास घूम रहे लोगों में जिनकी इस विषय में रुचि होगी, वे आपका प्रवचन सुनने वहाँ आ जाएंगे!"

मेरा मुंह खुला का खुला रह गया, उन्हें क्या कहूं कि मैं क्या सोच रहा हूँ। आखिर मैंने कहा "यहाँ बहुत हल्ला-गुल्ला है", जो ज़ाहिरा तौर पर दिखाई भी दे रहा था, और फिर उन्हें समझाना शुरू कर दिया कि सलाह-सत्र (counseling session) हेतु सिर्फ पर्दे लगाकर इस शोर-शराबे और दूसरे व्यवधानों को दूर नहीं किया जा सकता। इस कार्यक्रम में विश्रांति के लिए कोलाहल रहित सम्पूर्ण एकांत चाहिए! इसके अलावा मैं इस तरह व्याख्यान नहीं दे सकता, जैसे कोई मछली-बाज़ार लगा हो और हर मछली बेचने वाला अपनी मछली की प्रशंसा करता हुआ चीख रहा हो: मछली ले लो, सस्ती स्वादिष्ट मछली! व्याख्यान देते समय मुझे व्याख्यान पर ध्यान केन्द्रित करना पड़ता है, अपने श्रोताओं की आँखों में आंखे डालकर देखना होता है, जिससे मैं उनकी प्रतिक्रिया का अंदाज़ा ले सकूँ और फिर मैं अपने व्याख्यान पर उनसे भी एकाग्रता की अपेक्षा करता हूँ! बार-बार लोग ताक-झांक करें या आकर बैठें और जब उन्हें लगे कि उनकी इसमें रुचि नहीं है तो वापस चले जाएँ, यह सब मुझे मंजूर नहीं है। मैं किसी चीज़ का विज्ञापन नहीं करना चाहता और न ही कुछ बेचने की कोशिश कर रहा हूँ!

किसी ने, शायद मज़ाक में कहा कि "मुझे लगा यह व्यक्ति ध्यान का बहुत बड़ा विशेषज्ञ है और कहीं भी, कभी भी ध्यान लगा सकता है"। मैंने उससे कहा कि वह इस कला का उस्ताद होगा मगर मैं जानता था कि मैं ऐसा नहीं कर सकूँगा। मैं खुद भीड़-भाड़ में भी अपना ध्यान तो लगा सकता हूँ मगर जब मुझे दूसरों के साथ चर्चा भी करनी है तो मुझे बाहर भी एकाग्र होने की आवश्यकता होगी, अपने श्रोताओं पर मेरे व्याख्यान का असर भी मुझे जानना-समझना होगा और इसलिए मुझे उस भीड़ भरे बाज़ार जैसी जगह में अतिरिक्त शांति की आवश्यकता होगी!

मुझे लगता है कि मैं ऐसे मेलों के लिए उपयुक्त व्यक्ति नहीं हूँ।

कर्म के तीन प्रकार-संचित,प्रारब्ध एवं क्रियमाण – 14 May 08

मैं आप को अगले सू त्र के बारे में भी बताना चाहूँगा जिसकी मैंने कल के व्याख्यान में व्याख्या कि थी| तीसरे अध्याय के सूत्र की सहायता से मैं यह स्पष्ट करूँगा कि पूर्व का दर्शन कैसा है और पतंजलि का लेखन किस प्रकार का है| कितने अद्भुत रूप से इस व्यक्ति ने सब कुछ इन सूत्रों से स्पष्ट किया है| यदि आप इसका शब्दशः अनुवाद करेंगे तो यह आप को हास्यप्रद लगेगा और संभवतः आप भ्रमित हो जायेंगे| सूत्र है कि-
“यदि आप अपने कर्मों को जान लें तो आप अपनी मृत्यु का समय जान सकते हैं|”

तो आप को क्या लगता है? हाँ यह आश्चर्यजनक है और इसकी सैकड़ो व्याख्याएं हैं| आइये इसके पीछे छुपे दर्शन को समझते हैं| पूर्व का समस्त दर्शन कर्म पर आधारित है किन्तु पश्चिम में यह अपने सही रूप में नहीं आया| यहाँ बहुत से भ्रम हैं क्यों कि दर्शन के मूल सिद्धांत के स्थान पर किसी व्याख्या को अपना लिया गया|

वास्तव में ऐसा कहा जाता है कि कर्म तीन प्रकार के होते हैं-संचित,प्रारब्ध और क्रियमाण| संचित का अर्थ है-संपूर्ण,कुलयोग| अर्थात मात्र इस जीवन के ही नहीं अपितु पूर्वजन्मों के सभी कर्म जो आपने उन जन्मों में किये हैं| आपने इन कर्मों को एकत्र करके अपने खाते में डाल लिया है|

‘प्रारब्ध’,‘संचित’ का एक भाग है,इस जीवन के कर्म| आप सभी संचित कर्म इस जन्म में नहीं भोग सकते क्यूंकि यह बहुत से पूर्वजन्मों का बहुत बड़ा संग्रह है| इसलिए इस जीवन में आप जो कर्म करते हैं, प्रारब्ध, वो आप के संचित कर्म में से घटा दिया जायेगा| इस प्रकार इस जीवन में आप केवल प्रारब्ध भोगेंगे,जो आप के कुल कर्मों का एक भाग है|
तीसरा कर्म क्रियमाण है,वो कर्म जो आप इस जीवन में प्रतिदिन करते हैं| और क्रियामान कर्म से ही संचित कर्मों का निर्माण होता है| तो यह जोड़ घटाना कैसे चलता है?
हमने पहले ही कर्म के प्रति आसक्ति और अनासक्ति के बारे में बता चुके हैं|
और जो भी कर्म हम पूर्ण चैतन्यता से नहीं करते वो क्रिया नहीं प्रतिक्रिया है|
जिसके प्रति आप चैतन्य नहीं हैं वो क्रिया नहीं हो सकती| और जब हम बिना चैतन्यता के कर्म करते हैं,जैसा प्रायः दैनिक जीवन में होता है तो हमारे संचित कर्म बढ़ जाते हैं| यदि कोई आप का अपमान करे और आप क्रोधित हो जाएँ तो आपके संचित कर्म बढ़ जाते हैं| परन्तु,यदि कोई अपमान करे और आप क्रोध ना करें तो आप के संचित कर्म कम होते हैं|
इसे मैं एक योगी के उदाहरण से और अधिक स्पष्ट करता हूँ| वो एक वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न थे कि तभी एक व्यक्ति वह आया और उनका बहुत अपमान किया| वो शांत रहे| कोई प्रतिक्रिया नहीं हुयी,ना वाह्य रूप से ना अंतर्मन में,उन्हें क्रोध भी नहीं आया| बाद में उनके शिष्यों ने,जो सब कुछ देख सुन रहे थे,पूछा कि आप को क्रोध नहीं आया? तो उन्होंने उत्तर दिया कि संभवतः पूर्वजन्म में मैंने उसका अपमान किया था, वास्तव में मैं प्रतीक्षा में था कि वो आकर मेरा अपमान करे| अब मेरा हिसाब बराबर हो गया| अगर मैं क्रोध करता तो फिर कर्म संचित हो जाते|

यही कर्म का सम्पूर्ण दर्शन है| यदि आप चैतन्य रहें, प्रतिक्रिया ना करें तो अपने संचित को नष्ट कर सकते हैं| और इसके लिए आप के अंतर्मन में शांति होनी चाहिए| क्रोध का शमन नहीं करना है अपितु क्रोध उत्पन्न ही नहीं होना चाहिए| और इस प्रकार चैतन्य रहते हुए जब आप अपने संचित को नष्ट करते रहेंगे तो एक दिन वो शून्य हो जायेगा| जब वो समाप्त हो जायेगा तब आप को इस जीवन मरण के चक्र में फिर पड़ने कि आवश्यकता नहीं होगी| हम जन्म क्यों लेते हैं? हम बार बार शरीर धारण क्यों करते हैं? अपने संचित कर्मों को भोगने के लिए| जब तक हमारा हिसाब पूरा नहीं होता तब तक हमें जन्म लेकर अपने कर्मों को भोगना पड़ता है| और जब इस सब का अंत होता है तब सारी इच्छायें और तृष्णायें मिट जाती हैं और पुनः जन्म लेने कि आवश्यकता नहीं रह जाती| यही वास्तविक अंत है, अन्यथा हम यूँ ही जन्म मरण के चक्र में फंसे रहेंगे|

इसलिए,पतंजलि को समझने का प्रयास करें| वह सामान्य मृत्यु के बारे में बात नहीं कर रहे हैं| यह चक्र चलता जायेगा और आप क्रियमाण के द्वारा संचित कर्म का निर्माण करते रहेंगे| परन्तु जब आप अपने संचित को भोग लेंगे और आपका हिसाब पूरा हो जायेगा, तब वह वास्तविक मृत्यु होगी, वास्तविक अंत| और इस तरह यदि आप को अपने कर्मों का ज्ञान है तो आप अपनी मृत्यु का समय बता सकते हैं|

आज हम मुंस्टर शहर में थे,खिली धूप और सुहाने मौसम का आनंद हमने बाज़ार में खरीदारी और उद्यान में टहल कर उठाया| यह एक सुंदर शहर है और काफी हरियाली है| कल की दैनन्दिनी मैं वुपरटाल में लिखूंगा,जहाँ हम कल सुबह जा रहे हैं|

चार प्रकार के प्रश्नकर्ता – जिज्ञासु, बुद्धिमान, परीक्षक और आलोचक – 10 मई 2008

कल मैंने एक प्रश्न और उसका जवाब लिखा और प्रत्येक व्याख्यान के बाद यह सामान्य है कि लोगों के पास कुछ समय होता है मुझसे किसी चीज के बारे में पूछने के लिये, व्याख्यान का विषय या अन्य कुछ भी। जब मैं नौ साल का था तब भी व्याख्यान देता था। मुझे इसके ढेर सारे अनुभव हैं और मैं प्रश्न कर्ताओं को चार अलग अलग प्रकार में वर्गीकृत कर सकता हूं:

  1. प्रथम प्रकार में वे व्यक्ति आते हैं जो वास्तव में अपने प्रश्न के उतर जानने के जिज्ञासु हेतु होते हैं वे उत्साहित होते हैं और आप देख सकते हैं कि इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिये वे कितने आतुर होते हैं। वे आपकी बात को बहुत ध्यानपूर्वक सुनते हैं और प्रत्येक शब्द को आत्मसात कर लेते हैं|
  2. दूसरे प्रकार के व्यक्ति वे होते हैं जिनका मुख्य उद्देश्य जवाब प्राप्त करना नहीं होता बल्कि यह प्रदर्शित करना होता है कि वे कितने बुद्धिमान है और वे कितना ज्यादा वे जानते हैं। वे बहुत लंबे और एक जटिल तरीके से अपनी बात को व्यक्त करते हैं और अकसर अंत में आपको यह पता ही नहीं चलता कि वास्तव में उनका प्रश्न क्या था। ये सवाल केवल अहंकार से संचालित होते हैं और वे अपने ज्ञान से आपको प्रभावित करना चाहते हैं|
  3. तीसरे प्रकार के व्यक्ति आपको और आपकी जानकारी/ ज्ञान को परखना चाहते हैं। वे कुछ ऐसा पुछते है, जिसके बारे में उन्हें पता रहता है, मात्र यह परखने के लिये कि क्या आपको भी यह ज्ञान है । यह एक परीक्षा की तरह है। असल में वे छात्र बनकर कुछ सीखना नहीं चाहते बल्कि शिक्षण करना चाहते हैं।
  4. अंतिम प्रकार के व्यक्ति किसी प्रकार का उत्साह नहीं प्रदर्शित करते हैं और सिर्फ आपकी और आपके कथन की आलोचना करने के लिये ही प्रश्न करते हैं। वे तार्किक बहस नहीं करते बल्कि जो भी जबाव आप देंगे उसमें से कोई मुद्दा निकाल कर दूसरे बहस की शुरुआत कर देंगे। वे एक तय योजना के साथ आते हैं और वे लड़ना चाहते हैं|

अंतिम तीन प्रकार वालों को वास्तव में किसी जवाब की आवश्यकता नहीं होती। दूसरे प्रकार वाले प्रश्न कर्ता सिर्फ अपने ज्ञान को प्रस्तुत करना चाहते है और आपमें उनकी रुची नहीं होती। वे जिन्हें पहले से जवाब पता होता है परन्तु आपकी परीक्षा लेना चाहते हैं और उन लोगों के जवाब देने का कोई मायने नहीं है जो केवल लड़ रहे हैं क्योंकि कि वे प्रत्येक चीज की आलोचना ही करेंगे।

हालांकि प्रथम प्रकार के व्यक्ति का जवाब देना सुखद होता है। उनका प्रश्न उनके ह्रदय से, समर्पण से उत्पन्न होता है। सिर्फ वही वास्तविक जवाब प्राप्त करते है और सिर्फ उन्हीं के लिये यह किसी उपयोग का होता है।

आज हम मायकल और एन्ड्रीया के साथ हैमबर्ग गये और अपने मित्र गैरी बीर्च से मिले जो प्रोफ़ेशनल गोल्फ़ प्लेयर हैं । वह जल्द ही अमेरिका के लिये उड़ान भरेंगे और हमने गुड बाय कहने के लिये एकसाथ सुखद मध्याह्न काल बिताया।