वह सुंदर महिला मुझे अच्छी लगी फिर भी मैंने सेक्स से इंकार किया! क्यों? 26 जनवरी 2014

अपने 2006 के आस्ट्रेलियाई दौरे पर सोचते हुए मुझे एक और घटना याद आती है, जिसे आज मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। यह घटना अंतरंगता, गोपनीयता और चिकित्सकीय पेशे के कुछ नैतिक मूल्यों से संबंध रखती है।

एक कस्बे में मेरा एक हफ्ते का कार्यक्रम था और हमेशा की तरह कुछ कार्यशालाएँ और शाम को ध्यान-सत्र आयोजित किया गया था। जैसा की अक्सर होता रहा है, कुछ चेहरे बार-बार दिखाई दे जाते थे, सिर्फ किसी एक कार्यक्रम में नहीं और इस तरह कई लोग हमारे व्यक्तिगत सत्रों में भी आए। उनमें से एक थी वह खूबसूरत महिला, जो लगभग मेरी ही उम्र की थी। मैंने उसे अपने कार्यक्रमों में देखा था मगर अधिक बात करने का अवसर नहीं मिल पाया था क्योंकि उन कार्यक्रमों में अक्सर आसपास बहुत से लोग हुआ करते थे। दो चार शब्दों का लेनदेन ही हो पाता था लेकिन फिर एक दिन मैंने उसे अपने सामने बैठा हुआ पाया, वहाँ, जहां मैं अपने व्यक्तिगत सत्र दिया करता था।

वह एक सलाह-सत्र था, जिसमें हमने उसकी मानसिक अवस्था पर गहराई से लंबी चर्चा की क्योंकि वह आई ही थी, अपनी कुछ पारिवारिक समस्याएँ लेकर। हमने विभिन्न तरीकों से उसकी समस्या पर चर्चा की कि कैसे वह उनसे बेहतर ढंग से निपट सकती है और कैसे आज की तुलना में उस पर इन समस्याओं का कम से कम असर पड़े। चर्चा से उसे लाभ हो रहा था।

लेकिन इतनी चर्चा के बाद उसने एक बिलकुल दूसरी ही बात शुरू कर दी। निष्कपट स्वर में उसने साफ-साफ कहा कि वह मुझ पर आसक्त है। मैं उसे आकर्षक और अच्छा व्यक्ति लगा था और वह चाहती थी कि इस आकर्षण की गहराई में उतरा जाए। मेरे व्याख्यान के शब्दों को उद्धृत करते हुए उसने कहा कि इसमें कोई बुरी बात नहीं होगी यदि कोई दो व्यक्ति, बिना किसी संबंध में बंधे, बिना किसी वचनबद्धता के, चाहें तो, आपस में अंतरंग संबंध स्थापित कर लें! वैसे भी लोग जानते थे कि मेरा ब्रह्मचर्य में कोई विश्वास नहीं है इसलिए इसमें कोई अनहोनी बात भी नहीं होने वाली थी! उसने कहा कि वह मुझ लेने आ जाएगी और वे कहीं किसी होटल में, या रिसोर्ट में या फिर उसके घर के एकांत में एक शानदार अंतरंग और आत्मीय समय गुजारेंगे।

वह एक सुंदर और बहुत शालीन महिला थी और जिस तरह उसने यह बात कही वह किसी भी तरह से अश्लील नहीं लग रही थी। बल्कि मुझे उसका इतना खुलापन बहुत अच्छा लगा और मैं उसके इस तर्क से पूरी तरह सहमत भी था हम दोनों ही अविवाहित थे और इसलिए बिना किसी परेशानी के कुछ समय एकांत में मौज-मस्ती कर सकते थे। वास्तव में अगर मेरे मन में एक और विचार ने उसी वक़्त जन्म न ले लिया होता तो शायद मैं उसके साथ जहां वह कहती, चला जाता: जिसका अभी-अभी मैं परामर्शदाता रहा हूँ, जिसका थोड़ी देर पहले मैं चिकित्सक रहा हूँ, उसके साथ मैं शारीरिक संबंध नहीं बना सकता।

मुझे अपनी ये भावनाएँ व्यक्त करने में थोड़ा समय लगा। मैंने उससे कहा कि मैं उसके साथ ऐसा नहीं कर सकता और इसकी वजह यह है कि हम जिस तरह से मिले हैं, जिस तरह के हमारे संबंध रहे हैं उसमें मेरे लिए यह संभव नहीं है। अगर यह सब कुछ अलग तरह से होता तो हो सकता है मैं उसका प्रस्ताव मान लेता। लेकिन इस परिस्थिति में मुझे ऐसा करने में बिलकुल रुचि नहीं है, मैं ऐसा कर ही नहीं सकता।

हम मित्रों की तरह बिदा हुए।

मेरे लिए यह देखना खासा मोहक था कि भले ही यह मुलाक़ात कुछ दूसरा ही गुल खिला सकती थी, भले ही इस मुलाक़ात के बाद हम यौन संबंध स्थापित कर चुके होते और भले ही ऐसा नहीं हुआ था, फिर भी हमारे बीच कोई कटुता नहीं पैदा हो पाई। वह बहुत निराश हो सकती थी या अपने आपको ठुकराई गई महसूस कर सकती थी और उसे बुरा लग सकता था, जैसा कि मैं पहले अनुभव कर चुका था, लेकिन जिस तरह उसने खुले मन से यह प्रस्ताव रखा था उसी खुले मन से उसने मेरे इंकार को स्वीकार किया। और ऐसा ही होना चाहिए।

पश्चिम में अकेली माँ (सिंगल मदर) की चुनौतियां – 18 अप्रैल 2013

मैंने कल ज़िक्र किया था कि मैं अकेली माँओं (सिंगल मदर) के बारे में बात नहीं कर रहा हूँ, जो अपने बच्चों की परवरिश करते करते थक जाती हैं। मेरी कुछ सिंगल मदर मित्र मुझसे पूछ रही हैं कि अपने ब्लॉग में मैंने उन्हें क्यों छोड़ दिया। मित्रों, मैं आपको भरोसा दिलाता हूँ कि यह किसी विशेष मकसद से मैंने नहीं किया था और मैं आज एक और डायरी लिखकर आप सभी मेहनती, प्रेमपूर्ण माँओं को समर्पित कर रहा हूँ! और हाँ, अगर कोई अकेला पिता (सिंगल फादर) अपने आपको अछूता महसूस कर रहा है तो यह उनके लिए भी है, बस ज़्यादा बातें इसमें महिलाओं के बारे में होंगी, इतना ही। तो मैं आशा करता हूँ कि अगर मैं सामान्य रूप से सिंगल मदर की बात करते हुए दरअसल अकेले अभिभावक (सिंगल पेरेंट) की बात करूँ तो आप अन्यथा नहीं लेंगे।

इसके कई कारण होते हैं कि किसी महिला को सामान्य, परंपरागत पारिवारिक वातावरण नहीं मिल पाता। कभी कभी बच्चा अच्छी तरह योजना बनाकर पैदा नहीं किया जाता और वह किसी स्वतःप्रेरित क्षण में प्रेम की उत्कटता की उपज होता है जहां प्रेमी अधिक जाना-पहचाना भी नहीं होता या आप उसके साथ स्थायी संबंध नहीं रखना चाहते। कुछ दुर्लभ और असामान्य प्रकरणों में माँ के साथ हुए दुर्भाग्यपूर्ण बलात्कार के नतीजे में बच्चा ठहर जाता है और महिला बच्चे को जन्म देने का निर्णय करती है। कुछ प्रकरणों में बच्चे के पिता का किसी हादसे में या बीमारे के चलते असामयिक निधन हो जाता है। हर प्रकरण में इतना अवश्य होता है कि किसी न किसी कारण से दोनों अभिभावक यह निर्णय लेते हैं कि बच्चे को एक साथ पालना उनके लिए मुमकिन नहीं है क्योंकि, कुछ प्रकरणों में, उनके बीच प्रेम नहीं रह गया है और अब वे अलग-अलग रहेंगे।

वे अकेले के दम पर बच्चे का लालन-पालन करेंगी, यह उनका सोचा-समझा निर्णय हो या न हो, सिंगल मदर के लिए यह ज़िम्मेदारी अकेले वहन करना बेहद मुश्किल होता है। यह वाकई आश्चर्यजनक है कि कैसे ये अकेली महिलाएं एक बच्चे को बड़ा कर पाती हैं और साथ ही अपने आपको मजबूती के साथ भावनात्मक और मानसिक रूप से सामान्य बनाए रख पाती हैं। जब वे टाइलेट जाती हैं तब बच्चे को प्लेपेन में रखकर जाती हैं कि बच्चा उन्हें देखता रह सके और सुरक्षित खेलता भी रहे। इसी तरह नहाते वक़्त भी वह उन्हें किसी कमरे में अकेला नहीं छोड़ सकतीं। यहाँ तककि जब बच्चा सो रहा हो तब भी उन्हें पास में बेबी-मॉनिटर रखकर बहुत जल्दी नहाकर वापस आना पड़ता है कि पता नहीं कब बच्चा जाग जाए!

स्वाभाविक ही उन्हें कम नींद मिल पाती है क्योंकि उन्हें रात में पति का सहयोग नहीं मिल पाता। कई बच्चे सोने में बहुत वक़्त लेते हैं और जब उनकी मर्ज़ी होती है सोते हैं, जब मर्ज़ी होती है उठ बैठते हैं। और रात में कई कई बार वे सोते-जागते रहते हैं। इन महिलाओं के पास बच्चे की मर्ज़ी के अनुसार सोने और जागने के अलावा कोई चारा नहीं होता और यह उन्हें अकेले ही करना होता है! जी हाँ, मैं कहना चाहूँगा कि ऐसी महिलाओं का काम वाकई बहुत प्रशंसनीय है और बेहद सम्मानजनक भी!

इसके साथ ही मुझे कहना होगा कि मैं उनके लिए दया से भर जाता हूँ कि कोई भी उनकी मदद के लिए उनके पास क्यों नहीं है, क्योंकि मैं अपने अनुभव से जानता हूँ कि किसी की ज़िम्मेदारी साझा करना कितना सुकून और शांति प्रदान करता है। स्वाभाविक ही, जब वे काम पर बाहर जाएंगी तब उन्हें बेबीसिटर, क्रैश या किंडेरगरटेन की ज़रूरत होगी जिससे बच्चे की देखभाल हो सके। अपने दूसरे कामों के दौरान भी, जहां वे बच्चे को अपने साथ नहीं ले जा सकतीं, उन्हें बेबीसीटर या नैनी की ज़रूरत होगी क्योंकि वे एक साथ दो स्थानों पर नहीं हो सकतीं। लेकिन ज़िम्मेदारी को परिवार द्वारा स्वेच्छा से वहन करना और पैसे देकर सहायता खरीदने में बहुत अंतर होता है। बेबीसिटर ने बच्चे को देखा तक नहीं होता, या सिर्फ एक या दो बार देखा होता है। जिसने भी ऐसे परिस्थिति को जीवन में भुगता है वही इस भावनात्मक अंतर को समझ सकता है!

यह सब जानकार मुझे महसूस होता है कि अपने परिवार के साथ रहना कितना अधिक अच्छा है; जब आपके नाते-रिश्तेदार आपके सहयोग के लिए, मदद के लिए आपके पास होते हैं, आपके साथ होते हैं! वे भी बच्चे के साथ रहना पसंद करते हैं, इसलिए यह हर हाल में सबके लिए बेहतर होता है, बच्चे के लिए भी! भले ही आप सदा एकमत न हों, मगर जब भी ज़रूरत हो सभी एक दूसरे के करीब हों, क्या यह बात अनमोल नहीं है? आपके परिवार के गृह-नक्षत्र कहीं भी हों, कैसा भी उनका ढांचा हो अगर साथ रहने की ज़रा सी भी संभावना है तो उसे अवश्य टटोलें, साथ रहने की कोशिश करके देखें क्योंकि यह आपके लिए अच्छा है, खुद उन सबके लिए और बच्चे के लिए भी!