जीवन आपका है, निर्णय भी आपके होने चाहिए-आपको क्या करना है, इस पर धर्म के दबाव का प्रतिरोध कीजिए – 17 सितंबर 2015

कल मैंने आपको बताया था कि धर्म विचार रखने और कोई धारणा बनाने की आपकी स्वतंत्रता का हनन करता है। वास्तव में धर्म आपको निर्देशित करना चाहता है कि आपको क्या करना चाहिए और दावा करता है कि ये निर्देश देने का उसे हक़ हासिल है। सारे धर्म दावा करते हैं कि वे जानते हैं कि मनुष्य को कैसा आचरण करना चाहिए। यहाँ तक कि वह अपने अनुयायियों को हत्या करने का निर्देश भी दे सकता है। और यही समस्या की जड़ है!

पहले जब मैं गुरु हुआ करता था तो लोग मुझसे वास्तव में अपेक्षा करते थे कि मैं उन्हें बताऊँ कि वे क्या करें। एक धर्मोपदेशक के रूप में, जिसका लोग अनुगमन करते हैं, यह भी मेरी एक भूमिका हुआ करती थी। लोग अपने प्रश्न या अपनी समस्याएँ लेकर मेरे पास आते थे और मैं भी अपने लिए यह उचित मानता था कि उन्हें बताऊँ कि उस विशेष परिस्थिति में वे ठीक-ठीक क्या करें। मैं भी उनके सामने अपने विचार रख देता था और जानता होता था कि वे वैसा ही करेंगे। अपने निर्णयों की पूरी ज़िम्मेदारी वे मुझे सौंप देते थे, जिनमें से कुछ तो जीवन के बड़े अहम निर्णय होते थे।

फिर मुझमें परिवर्तन आया। गुफा में रहने के बाद मुझे लगा कि मुझे यह सब नहीं चाहिए। मैं दूसरों से बड़ा नहीं बल्कि उनके बराबर होना चाहता था। इसका यह अर्थ भी था कि मैं दूसरों के निर्णयों की ज़िम्मेदारी नहीं लेना चाहता था! सिर्फ मैं अपना जीवन जीना चाहता था। अपने अनुभवों और विचारों से अगर मैं किसी की मदद कर सकता था तो ऐसा करके खुश होता था लेकिन चाहता था कि वे अपने निर्णय स्वयं लें, अपनी भावनाओं पर विश्वास करें और सीखें कि उनके अनुसार किस तरह आगे बढ़ा जाए!

तो इस तरह मैं नास्तिक बन गया और आज यहाँ बैठकर सिर्फ अपने विचार लिखता हूँ। कोई भी पाठक उनके बारे में अपने तई सोचने के लिए और उनके आधार पर अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है। अपने सलाह-सत्रों में मैं यह बात बिल्कुल स्पष्ट कर देता हूँ: मैं आपको सिर्फ अपना नज़रिया बता सकता हूँ लेकिन अपने निर्णय आपको खुद लेने होंगे और परिणामों ज़िम्मेदारी भी आपकी होगी!

लेकिन धर्म है ही इसलिए कि लोगों को बताए कि क्या सोचना है और क्या करना है। धर्म विभिन्न विचारों को सुनने और उन पर विचार करने में भरोसा नहीं करता। धर्म आपको यह स्वतंत्रता नहीं देता कि आप अपने लिए कोई अलग चुनाव कर सकें। धर्म आपको आदेश देता है कि यह करो।

धर्मगुरु विश्वास करते हैं कि उन्हें यह हक हासिल है और जहाँ तक इस्लामी रूढ़िवादियों का सवाल है, वे तो यह भी सिखाते हैं कि जो उनकी बातों का अनुसरण नहीं करते, उनकी हत्या करना जायज़ है! इस्लाम के धार्मिक नेता अपने अनुयायियों से कहते हैं कि अपनी कमर में बम लगाकर सैकड़ों की संख्या में दूसरे लोगों की जान लो और खुद इस्लाम की राह में शहीद हो जाओ।

कुछ लोग होते हैं जो चाहते हैं कि कोई उन्हें बताए कि उन्हें क्या करना चाहिए। वे ज़िम्मेदारी नहीं लेना चाहते और अपने धर्म पर या उपदेशक, गुरु या किसी पर भी, जो उन्हें बता सके कि क्या करना चाहिए, अपने कामों की ज़िम्मेदारी डाल देते हैं।

कोई भी सोचने-समझने वाला व्यक्ति महज धर्म के लिए आतंकवादी, खुदकुश बमबार या हत्यारा नहीं बन सकता। वास्तव में यह धर्म का छल है जो उन्हें इस सीमा तक झाँसा देने में कामयाब होता है। ऐसी मनःस्थिति से, जहाँ वे अपने निर्णय खुद नहीं लेना चाहते से शुरू होकर वे वहाँ पहुँच जाते हैं जहाँ वे हर वह काम करने को तैयार हो जाते हैं, जिन्हें वे कभी नहीं करते अगर अपने निर्णय और उनकी ज़िम्मेदारी खुद ले रहे होते। दूसरों को नुकसान पहुँचाना, उनकी हत्या करना, दुनिया को शोक और संताप में झोंक देना!

मैं आपको सलाह देना चाहता हूँ कि अपने लिए सोचें। अपने जीवन की ज़िम्मेदारी लें और धर्म को इसकी इजाज़त न दें कि वह आपको बहला-फुसला सके, झाँसा दे सके और मजबूर कर सके कि आप वह सब करने के लिए तैयार हो जाएँ जो आप कभी नहीं करते, अगर अपने निर्णय खुद ले रहे होते।

नास्तिकों के लिए निर्णय लेना और ज़िम्मेदारी स्वीकार करना क्यों आसान होता है? 30 जुलाई 2015

स्वाभाविक ही, पिछले सप्ताह इतने सारे नास्तिकों के साथ एक साथ समय गुज़ारने के बाद, उनके साथ हुए कुछ अनुभव विशेष रूप से याद रह जाते हैं। एक बात यह कि सामान्य रूप से वे ज़िम्मेदारियाँ निभाने और निर्णय लेने के मामले में, मेरे मुलाकाती आस्तिकों की तुलना में, अधिक प्रस्तुत नज़र आते हैं। और यह बात मुझे बहुत सहज, स्वाभाविक और तर्कपूर्ण लगती है!

कल का ही उदाहरण लेना हो तो, किसी दुर्घटना के बाद एक नास्तिक तुरंत सहायता के लिए तत्पर दिखाई देता है, जबकि एक आस्तिक डर के मारे इसमें व्यवधान उपस्थित करता है। ऐसे नास्तिक अक्सर मिलते हैं, जो त्वरित निर्णय लेकर अपने कार्यों की ज़िम्मेदारी लेने के किए तैयार हो जाते हैं, जिससे किसी ज़रूरतमंद की मदद की जा सके।

मेरा मानना है कि नास्तिक आसानी से ऐसा कर पाते हैं क्योंकि वे पहले ही कंटीली राहों से गुज़रकर यहाँ तक पहुँचे होते हैं। काफी विचार मंथन के बाद वे इस निर्णय पर पहुँचे होते हैं कि उसी बात पर भरोसा करें, जिसका वे शिद्दत के साथ खुद महसूस करते हैं, उस पर नहीं, जो उन्हें उनका परिवार बताता है या परंपरा से उन्होंने सीखा है। आपके करीबी मित्र और रिश्तेदार या दूसरे लोग जो सोच रहे हैं या कर रहे हैं, उससे अलग कुछ करना आसान नहीं है। आपके पास दृढ़निश्चय, इतनी संकल्प शक्ति और प्रवाह के विपरीत चलने पर आने वाली मुश्किलों का सामना करने की हिम्मत होनी चाहिए। इसलिए एक भारतीय नास्तिक निश्चित ही ऐसा व्यक्ति ही होगा, जिसमें ये सारे गुण मौजूद हों। ऐसा व्यक्ति ही नास्तिक हो सकता है!

इस तरह, भारत के नास्तिक इन सब दिक्कतों का सामना पहले ही कर चुके होते हैं और जानते हैं कि उनके चारों ओर मौजूद कठिनाइयों के बावजूद वे मज़बूती के साथ पैर जमाए खड़े हैं। वे अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए हर समस्या से निपटने के लिए तैयार होते हैं।

इसके विपरीत धार्मिक लोगों का रवैया अक्सर बिलकुल दूसरा होता है: सब कुछ वे ईश्वर पर छोड़ देते हैं। अपने इस विश्वास के चलते कि सब कुछ ईश्वर की मर्ज़ी से होता है, जब त्वरित निर्णय लेना आवश्यक होता है, वे अक्सर अनिच्छुक, बल्कि निष्क्रिय बने रहते हैं। ज़्यादातर आस्थावान लोग किसी समस्या का हल निकालने की ओर स्वतः प्रवृत्त नहीं होते क्योंकि उनका विश्वास होता है कि आखिर समस्या भी ईश्वर प्रदत्त है। समस्या तो होगी ही, समस्या बहुत मुश्किल भी होगी- क्योंकि वह ईश्वर की देन है! ईश्वर परीक्षा लेता है! वे अपनी सामान्य दिनचर्या से बाहर नहीं निकलते क्योंकि वे एक काल्पनिक शक्ति पर निर्भर होते हैं।

इसके अलावा वे भयभीत भी होते हैं। धर्म का सारा कारोबार ही लोगों के भय पर आधारित है। डर न हो तो वह भरभराकर गिर जाएगा। अगर नर्क का डर न हो तो कोई स्वर्ग पर भी विश्वास नहीं करेगा! आपके पाप, पापों के लिए नियत दंड, पश्चाताप और उसके चारों ओर निर्मित बाकी सब कुछ भी! ये सब डर पैदा करने के औज़ार हैं। और एक बार आप डर के आदी हुए तो फिर हमेशा हमेशा के लिए वह आपके जीवन का हिस्सा बन जाता है। जब आप कोई दुर्घटना होते हुए देखते हैं तो आप डर जाते हैं। आप घायल व्यक्ति कि मदद करने के बारे में नहीं सोचते बल्कि आपके मन में दुर्घटना के चलते हो सकने वाली दिक्कतों से अपने आपको बचाने का खयाल आता है!

धार्मिक लोग मुश्किल वक़्त में अपने ईश्वर का आह्वान करते हैं कि वह उन्हें सही निर्णय लेने की शक्ति दे, उचित राह दिखाए। उनका विश्वास होता है कि ईश्वर अवश्य ही कोई न कोई राह निकालेगा-लेकिन मैंने देखा है कि ईश्वर के भरोसे बैठे हुए वे लोग अक्सर कोई निर्णय ही नहीं ले पाते, आगे बढ़कर खुद कुछ करने की जगह वे किसी दैवी शक्ति के निर्देश का इंतज़ार करते रहते हैं, जो कभी सामने नहीं आता!

निश्चित ही, हर चीज़ के अपवाद होते हैं लेकिन सामान्य रूप से लोगों के इस रवैये को मैंने अक्सर नोटिस किया है। भविष्य में इस नजरिए से आस्तिकों और नास्तिकों के रवैयों पर नज़र रखें, आपको भी अंतर स्पष्ट नज़र आएगा!

यहाँ आप नास्तिकों के सम्मेलन के चित्र देख सकते हैं

अपने दिमाग के दरवाजे दूसरों के लिए खुले छोड़ देने के खतरे – 18 मार्च 2015

यथार्थ से कोसों दूर, काल्पनिक दुनिया के निर्माण के चलते पेश आने वाले मानसिक और शारीरिक खतरों के विषय में कल मैंने लिखा था। इसके एक और खतरे की चर्चा मैंने अब तक नहीं की थी, जिसके बारे में कुछ और विस्तार से लिखने की आवश्यकता है: किसी को जब आप अपनी कल्पनाओं, आस्थाओं और इस तरह प्रकारांतर से आपकी दुनिया को भी प्रभावित करने की छूट दे देते हैं-और फिर वह उसका अनुचित लाभ उठाने लगता है!

अगर आपने परसों की यानी दिनांक 16 मार्च की मेरी टिप्पणी को ध्यान से पढ़ा होगा, जिसमें मैंने बताया था कि कैसे आप अपनी काल्पनिक निजी दुनिया निर्मित कर लेते हैं, तो आप समझ सकेंगे कि इससे मेरा क्या अभिप्राय है। साधारणतया हम अपने विचारों और कल्पनाओं के अनुसार व्यवहार करते हैं और जब हम कुछ आस्थाओं पर विश्वास करने का मन बना लेते हैं तो वे आपका यथार्थ बन जाती हैं। अब इस बात की कल्पना कीजिए कि कोई आपके विचारों को अपने पक्ष में प्रभावित कर रहा है! वह आपके उस यथार्थ को, आपकी उस दुनिया को भी प्रभावित और परिवर्तित कर रहा होगा जिसे आप अपने लिए निर्मित कर रहे हैं!

इस तरह आपको प्रभावित करने वाले बहुत से अलग-अलग व्यक्ति हो सकते हैं। इसकी शुरुआत अभिभावकों के साथ होती है और इसी कारण उनकी ज़िम्मेदारी भी बहुत बढ़ जाती है: सबसे कोमल और आसानी से प्रभावित हो सकने वाले दिमागों तक उनकी पहुँच होती है और उन्हें गढ़ने और जीवन के लिए तैयार करने की ज़िम्मेदारी उन पर आयद होती है। वे एक संसार का निर्माण करते हैं। आपका परिवार, फिर शिक्षक, दोस्त और उसके बाद बहुत से दूसरे लोग, जिन पर आप भरोसा करते हैं या जिन्हें आप विशेषज्ञ या अधिकारी समझते हैं, जिनके विचारों को आप पसंद करते हैं। इनमें विभिन्न धार्मिक, आध्यात्मिक और यहाँ तक कि राजनैतिक नेता भी शामिल होते हैं।

एक जिम्मेदार व्यक्ति उन लोगों का खयाल रखता है, जिन्हें वह प्रभावित कर सकता है। स्वाभाविक ही, इस शक्ति का दुरुपयोग भी किया जा सकता है-और शायद आप उन हजारों प्रकरणों के बारे में जानते होंगे जहाँ गुरुओं, धार्मिक नेताओं और विभिन्न संप्रदायों के मुखियाओं ने ठीक यही किया: वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल लोगों की भलाई के लिए नहीं बल्कि उन्हें अपनी आज्ञा का शब्दशः पालन करने, उन्हें अपने कहे अनुसार करने हेतु बाध्य करने में किया। उन पर प्रभुत्व स्थापित करके और छल-प्रपंच से इस तरह उनका इस्तेमाल किया कि सिवा उस नेता के किसी और का उससे कोई लाभ नहीं हो सकता था। उनका जबर्दस्ती मत परिवर्तन किया गया, उन्हें असंगत विचारों और कल्पनाओं की घुट्टी पिलाई गई, उनके साथ छल करके उन्हें एक दूसरी दुनिया में ले जाकर स्थापित कर दिया गया जो किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा निर्मित, नियंत्रित और संचालित थी।

नतीजा: जितनी बड़ी संख्या में लोग उनके प्रभाव में आते जाते हैं, उतना ही ये गुरु, संप्रदाय और संगठन अमीर होते जाते हैं। ये अनुयायी, अंधी भेड़ों की तरह उसी दुनिया में रहने लगते हैं, उनके आदेशों का पालन करते हैं और यहाँ तक कि खुद अपने सालों के संबंधों को तोड़ लेते हैं, मित्रता छोड़ देते हैं, यहाँ तक कि परिवार का परित्याग कर देते हैं। बहुत से लोग सालों उन धूर्तों के जाल में फँसे रहते हैं। कभी-कभी जीवन भर के लिए।

कुछ लोगों को एक सीमा के बाद अचानक शक होने लगता है। जैसे-जैसे शक बढ़ता जाता है, वे खुद अपने दिमाग से सोचने की ओर अग्रसर होते हैं। यह उन्हें बहुत कठिन और खतरनाक लगता है, एक तरह से वे एक लंबे अर्से बाद खुद अपने पैरों पर खड़े हो रहे होते हैं, धीरे-धीरे खुद चलना सीख रहे होते हैं! निश्चित ही यह परिवर्तन उनकी उस दुनिया को तहस-नहस कर देता है, जिसे उन्होंने खुद गढ़ा होता है और इतने सालों में जिसके वे आदी हो चुके होते हैं। जिस गुरु का वे इतना सम्मान करते थे, जिससे इतना प्यार करते थे, वह अचानक उनका दुश्मन हो जाता है और उसके साथ उनके वे सारे मित्र भी, जो उस गुरु के कारण इतने सालों से उनके मित्र बने हुए थे।

तो, अगर कोई व्यक्ति आपकी रचना-प्रक्रिया को समझ ले या उसमें प्रवेश पा ले तो वह आपके मस्तिष्क को नियंत्रित भी कर सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब आप उसे प्रवेश करने दें! इसलिए अगर किसी को अपने इतना नजदीक आने दे रहे हैं तो बहुत सतर्क रहें-और जब आपको लगे कि वह आपके द्वारा प्रदत्त इस सुविधा का गलत लाभ उठा रहा है या उसका इस्तेमाल ज़िम्मेदारी के साथ नहीं कर रहा है तो उसका प्रवेश वर्जित कर दें!

सतर्क रहें और अपना ध्यान रखें!

आप अपने लिए और अपनी ख़ुशी के लिए खुद ज़िम्मेदार हैं – 20 नवम्बर 2014

कल मैंने बताया था कि क्यों मेरा मानना है कि अपनी गलतियों और त्रुटियों के लिए अपने अभिभावकों को दोषी नहीं ठहराना चाहिए बल्कि अपने निर्णयों और अपनी ख़ुशी-नाखुशी की ज़िम्मेदारी खुद वहन करनी चाहिए। अंग्रेजी में एक कहावत है: ‘Every man is the architect of his own fortune’ जिसका सीधा सा अर्थ यह है कि हर व्यक्ति अपने भाग्य का निर्माता स्वयं होता है-और चाहे वह कितनी भी पुरानी क्यों न हो, कितना भी आप क्यों न कहें कि यह तो पुराने ज़माने की एक कहावत है, मैं मानता हूँ कि वह आज भी उतनी ही सच है। आप ही हैं, जो अपनी ख़ुशी के लिए ज़िम्मेदार हैं।

यह सही है कि जब आप अपने दुःख पर नज़र डालते हैं तो आपको लगता है कि आपने खुद ऐसा कुछ भी नहीं किया है जो आपको यह दुःख उठाना पड़ रहा है। दूसरों ने आपके साथ बुरा बर्ताव किया या फिर यही नियति थी कि आपके साथ बुरा हो, भले ही उसका कारण आप न हों। आप इच्छित सफलता अर्जित नहीं कर पाए, जिसके साथ आप डेटिंग कर रहे हैं, वह लड़की या लड़का ठीक नहीं हैं, आपके परिवार वाले आपकी उपेक्षा करते हैं और आपके सहकर्मी या अधिकारी आपके काम से हमेशा नाखुश रहते हैं। अब बताइए, इसमें आपका क्या दोष?

अब मेरी आपसे गुज़ारिश है कि मन में चल रहे इन तर्क-वितर्कों को कुछ देर के लिए विश्राम दें। उन्हें भूलकर एक दिन के लिए सुबह की शुरुआत इस तरह करें कि आज कुछ भी आपके साथ होता रहे, आप हर बात से खुश ही होंगे, हर हाल में खुश रहेंगे।

एक सामान्य दिन गुज़ारते हुए आप अपने आपसे विलग होने की कोशिश कीजिए। ऐसी स्थितियों को, जब आम तौर पर आप गमगीन हो जाते हैं, नोट कर लीजिए कि ऐसा क्यों हुआ। ऐसा क्या हुआ था? किस बात ने आपकी ख़ुशी छीन ली? लिख लीजिए और फिर भूल जाइए और फिर उसी तरह खुश रहने की कोशिश करते हुए दिन बिताइए।

शाम को उस सूची पर नज़र दौड़ाइए और देखिए कि एक सामान्य निष्पक्ष व्यक्ति इस बारे में क्या सोचेगा। जिस बात ने आपको दुखी किया है उसे ऊँची आवाज़ में कहना भी उपयोगी हो सकता है- और फिर जानने की कोशिश कीजिए कि क्या बाहरी स्थितियाँ आपकी नाखुशी का कारण थीं?

क्या आप किसी दूसरे तरीके से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर सकते थे? क्या आप कुछ कम चिड़चिड़ापन नहीं दिखा सकते थे, उसकी जगह थोड़ा संयम नहीं रख सकते थे? क्या वास्तव में आप अपने ही भीतर की किसी बात के चलते नाराज़ नहीं हुए थे, किसी दूसरे के कारण नहीं?

इसे स्पष्ट करने के लिए मैं एक उदाहरण दूँगा। एक सहकर्मी आपसे बार-बार अपने छोटे-छोटे काम करने के लिए कहता रहता है। कभी कहता है, यह काम कर दो तो कभी कहेगा बस, इतनी मदद कर दो! ये काम इतने छोटे हैं कि उन्हें न करना, उसके अनुरोध को ठुकराना या उसकी अनदेखी करना बदतमीज़ी होगी-लेकिन यह आपको नाराज़ करता है क्योंकि इससे आपका समय बरबाद होता है। उसके प्रति आपको कोफ़्त होती है कि यह व्यक्ति न तो आपका सम्मान करता है और न ही आपके समय की ही इसे कद्र है। इससे आप यह नतीजा निकालते हैं कि आपकी नाखुशी या दुःख का कारण वह व्यक्ति है। ठीक?

लेकिन, नहीं। वास्तव में ऐसा नहीं है। वह आपके समय की कद्र नहीं करता क्योंकि आप खुद अपने समय की कद्र नहीं करते, वह व्यक्ति भी नहीं करता। वास्तविकता यह है कि आप खुद अपनी इच्छाशक्ति की कमी पर, ऐसी स्थिति में उसे नकारने की अपनी अक्षमता पर नाराज़ हो रहे हैं। जब एक बार आपको यह बात समझ में आ जाए तो उसे बदलने की कोशिश कीजिए। उसे समझाइए कि इस वक़्त आप काफी व्यस्त हैं और फिर भी अगर वह व्यक्ति वह काम नहीं कर पा रहा है तो उसे दिखाइए और उसे बताइए कि इस बार मैं यह काम इसलिए किए दे रहा हूँ कि अगली बार तुम खुद उसे कर सको! आप देख रहे होंगे कि उस पहली स्थिति में अपनी नाखुशी के लिए आप खुद ही ज़िम्मेदार थे!

कभी-कभी अपने आपसे पर्याप्त दूरी बनाकर यह देख पाना काफी कठिन होता है कि वास्तव में गलती कहाँ हो रही है। आपको समय निकालकर अपनी ख़ुशी के लिए काम करना चाहिए। यह टीवी के सामने बैठकर नहीं हो पाएगा। घर के बाहर निकलिए, प्रकृति के पास जाइए, थोडा अवकाश लीजिए, कहीं घूमने निकल जाइए, जिससे दूरी बना सकें और उस गलती को जान सके।

आप खुद ज़िम्मेदार हैं और किसी दूसरे पर आप यह ज़िम्मेदारी नहीं थोप सकते। आप खुद अपनी ख़ुशी के निर्माता हैं। तो अगली बार किसी दूसरे की शिकायत करते वक़्त इस बात का विशेष ध्यान रखिएगा।

अपने माता-पिता को दोष देना बंद कीजिए – अपने जीवन की ज़िम्मेदारी खुद वहन कीजिए! 19 नवंबर 2014

मैंने अपने जीवन में अनेकानेक लोगों के साथ अपने व्यक्तिगत सत्र किए हैं। उनमें हम जीवन की समस्याओं, आपसी विवादों और जीवन के दूसरे महत्वपूर्ण प्रश्नों पर बातचीत करते हैं। एक बात मैंने अक्सर देखी है कि अधिकांश लोगों को अपने अभिभावकों से बहुत शिकायत होती है और वे उनके प्रति विद्वेष से भरे होते हैं। मैंने उन्हें हमेशा समझाया है कि यह एक व्यर्थ का बोझ है, जिसे अपने कन्धों पर से उतार फेंकना चाहिए!

अक्सर मैंने लोगों को कहते सुना है कि जैसा व्यवहार हमारे अभिभावकों ने हमारे साथ किया था वैसा हम अपने बच्चों के साथ कभी नहीं करेंगे। अगर आप उनसे पूछें तो वे आपको अपने अभिभावकों के दुर्व्यवहार के कई उदाहरण दे देंगे और कहेंगे कि वे अपने बच्चों के साथ ऐसा नहीं करेंगे। वे दिल से मानते हैं कि अभिभावकों का ऐसा व्यवहार गलत है और इसका उन पर बुरा असर हुआ है या इससे उन्हें स्थाई क्षति पहुँची है।

कुछ लोग इतना स्पष्ट नहीं कहते और कुछ लोग कह देते हैं मगर अधिकतर लोग बताते हैं कि आज की उनकी कुंठाएँ, डर और असुरक्षा की भावना दरअसल कई साल पहले किए गए उनके अभिभावकों के दुर्व्यवहार का नतीजा हैं। कि वास्तव में यह उनके अभिभावकों का दोष है कि आज वे अपने काम में या जीवन में सफल नहीं हैं बल्कि भावनात्मक रूप से अस्थिर और असंतुष्ट हैं; खुद तो किसी से प्रेम नहीं कर पा रहे हैं और कोई दूसरा उनसे प्रेम करे तो भी उन्हें घबराहट और शंका होती है।

यह सही है कि आपका बचपन जिस तरह बीता और उन्होंने आपको जो सिखाया-समझाया, शिक्षा प्रदान की उसी के चलते आज आप जो भी हैं, वैसे है-मगर उन सालों में आपने क्या किया जब आप अपने अभिभावकों का घर छोड़कर बाहर निकल चुके थे? या उन सालों में, जब आप वयस्क हो चुके थे, अपनी खुद की ज़िम्मेदारी संभाल चुके थे, अपने निर्णय खुद लेने लगे थे?

आप एक वयस्क हैं! अपने जीवन के अच्छे-बुरे के लिए आप खुद ज़िम्मेदार हैं!

बचपन में लगातार कोई बात सीखने पर उसी तरह ढल जाना स्वाभाविक है लेकिन उसमें परिवर्तन लाया जा सकता है! स्पष्ट है कि अब आप समस्या की तह तक पहुँच गए हैं-अब आप यह बदलाव कर सकते हैं! आखिर आज अपने जीवन के निर्णय तो आप खुद ही लेते हैं!

अगर आप ऐसे किसी क्षेत्र में नौकरी कर रहे हैं जो आपको पसंद नहीं है तो उसमें परिवर्तन कर लें। आपके बचपन में माता-पिता ने आपकी भलाई के लिए ही सोचा था कि यह क्षेत्र भविष्य में आपके लिए आर्थिक रूप से उचित और सुरक्षित होगा लेकिन अगर आपको उस पेशे से घृणा है तो उसे छोड़कर किसी दूसरे मनपसंद विकल्प की तलाश करें। दूसरे क्षेत्रों में उपलब्ध शाम की कक्षाओं में पढ़ाई करें, समय बचाकर कोई दूसरी ट्रेनिंग ले लें, किसी दूसरे क्षेत्र में पार्ट-टाइम काम करें,…ऐसी बहुत सी संभावनाएँ हमेशा मौजूद रहती हैं जो आपको अपने जीवन में परिवर्तन लाने में मदद कर सकती हैं और आप अपना पसंदीदा क्षेत्र चुनकर खुशी-खुशी जीवन गुज़ार सकते हैं!

केवल आप स्वयं ही अपने आपको खुश रख सकते हैं! आप जो भी हैं, उसके लिए अपने माता-पिता को जीवन भर दोष देते नहीं रह सकते! किशोरावस्था में किसी समय आपने अपनी जिम्मेदारियाँ अपने हाथ में लेना शुरू कर दिया था और यह प्रक्रिया आगे आपके वयस्क होने तक जारी रही होगी। उसके बाद तो आपने अपनी सारी ज़िम्मेदारी संभाल ही ली थी! आप अभी भी यही रोना रो रहे हैं कि माता-पिता के निर्णयों के कारण आप दुखी हैं तो इसका अर्थ यही है कि आप आज भी अपने जीवन की कुछ जिम्मेदारियाँ उन्हीं पर छोड़े हुए हैं! क्या आप समझते हैं कि यह उचित विचार है?

बदलाव लाइए और जब आप अपनी ज़िम्मेदारी अपने हाथों में लेंगे तभी खुशी भी आपके हाथों में होगी!

अपनी स्वाधीनता और ज़िम्मेदारी: परिवार का समर्थन और प्रोत्साहन- 1 दिसंबर 2013

मैं आपको पहले बता चुका हूँ कि सन 2005 में, जब मैंने अपने पिताजी से यह कहा कि मैं अब गुरु का काम नहीं करना चाहता और यह कि जिन धर्मग्रंथों का अनुसरण और अनुपालन मैं अतीत में किया करता था, अब नहीं करना चाहता तो उनकी क्या प्रतिक्रिया थी। उन्होंने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा था कि अगर ऐसा करके मैं खुश हूँ तो सारा परिवार खुशी-खुशी मेरे साथ है। मुझे उनकी इस प्रतिक्रिया से कोई आश्चर्य नहीं हुआ था।

दरअसल मैं पहले से जानता था कि वे यही कहेंगे। मुझे थोड़ी सी भी आशंका नहीं थी कि वे कोई दूसरी बात कह सकते हैं और जब मैंने उनके शब्द सुने तो मैं याद कर रहा था कि कैसे पहले भी अपने निर्णयों में मुझे उनका समर्थन और प्रोत्साहन मिलता रहा था।

जब मैं सिर्फ 13 साल का था, मैंने अपना काम शुरू कर दिया था और क्रमशः अधिकाधिक व्यस्त होता जा रहा था। कभी-कभी मैं अपने पिताजी के साथ उनके कार्यक्रमों में भी चला जाता था मगर अब मैं स्वतंत्र रूप से अकेले ही देश भर में घूम-घूमकर अपने कार्यक्रम भी करने लगा था। स्वाभाविक ही ऐसे कार्यक्रम सिर्फ स्कूल की छुट्टियों में ही नहीं होते थे इसलिए मुझे अक्सर स्कूल में अनुपस्थित रहना पड़ता था।

उस वर्ष अपने किसी कार्यक्रम के बाद जब मैं स्कूल आया तो मेरे एक शिक्षक ने पूछा कि मैं कहाँ था और मैं स्कूल क्यों नहीं आता। मैंने उन्हें बताया कि मैं दूसरे प्रांत, मध्य प्रदेश प्रवचन करने गया हुआ था। उन्हें पहले से पता था कि मैं क्यों स्कूल में अनुपस्थित रहता हूँ इसलिए उन्होंने पूछा: "जब तुम अक्सर स्कूल नहीं आते तो स्कूल आना पूरी तरह क्यों नहीं छोड़ देते?" उनकी बात का अर्थ यह था कि मैंने जब अपने पेशे का चुनाव कर लिया है तो स्कूल की चिंता छोड़कर पूरा ध्यान उस पर लगाना चाहिए।

मुझे कुछ समझ में नहीं आया। दरअसल यात्राओं में मैं हमेशा अपने साथ अपनी कोर्स की किताबें भी साथ रखता था और स्कूल की पढ़ाई भी करने की पूरी कोशिश करता था। नतीजतन, स्कूल से दूर रहने के बावजूद मैं पढ़ाई में कभी खराब विद्यार्थी नहीं रहा! अब मेरे शिक्षक कह रहे थे कि मैं स्कूल ही न आऊँ। समझ में नहीं आ रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए।

उस दिन जब मैं घर आया तो मेरे मन में यह बात घूम रही थी और मैंने अपने अभिभावकों से इस विषय में क्या करना चाहिए, पूछा। मेरे पिताजी ने जवाब दिया: वही करो, जो तुम्हें उचित लगता है।

आप कह सकते हैं कि एक 13 साल के बच्चे के लिए इस बात का निर्णय करना बड़ा मुश्किल था। लेकिन मुझे ऐसा कुछ नहीं लगा। बल्कि मैं उत्साह से भर गया कि मेरे पिताजी मुझ पर इतना विश्वास करते हैं, उन्हें लगता है कि मैं अपने बारे में सही निर्णय लेने में सक्षम हूँ और अपने दिल का कहा मानकर अपने बारे में कोई भी निर्णय लेने की मुझे स्वतन्त्रता है। और मैंने वही किया। मैंने अपना पेशा चुना, स्कूल नहीं।

इस बात ने मुझे एक साथ स्वतन्त्रता और ज़िम्मेदारी प्रदान की, अपनी प्रसन्नता और अपने हितों की रक्षा करने की मुझमें शक्ति और आत्मविश्वास पैदा किया। उस समय सीखे हुए इस सबक के लिए मैं अपने अभिभावकों का सदा-सदा के लिए ऋणी रहूँगा। लगभग बीस साल बाद मेरे पिता ने फिर वही किया। जिन्होंने अपना जीवन ही धर्म की नीव पर खड़ा किया था और स्वयं एक धर्मगुरु थे और तब भी थे, जब उन्होंने मुझसे कहा कि मैं अपने दिल का कहा मानूँ, भले ही उससे मेरी राह उस राह से अलग हो जाती थी, जिस राह पर वे स्वयं चलते रहे थे और मुझे भी चलने के लिए प्रेरित किया था।

इस तरह मैं जो भी हूँ, जो भी करूँ, अपने परिवार के लगातार समर्थन और प्रोत्साहन के लिए उन सभी का सदा के लिए ऋणी रहूँगा। हमने एक साथ अपनी जीवन-यात्रा शुरू की और मैंने कभी भी एक क्षण के लिए भी उन्हें मेरा साथ छोड़ते हुए नहीं पाया। वे हमेशा मेरे साथ खड़े रहे और उसी तरह मैं भी हमेशा उनकी इच्छाओं और निर्णयों के समर्थन में खड़ा रहूँगा। मैं समझता हूँ कि सिर्फ इसी तरह हम सब प्रसन्न रह सकेंगे!

किसी दुसरे की ज़िम्मेदारी ओढ़ने की कोशिश भी मत कीजिए- 24 अक्तूबर 2013

कल मैंने बताया था कि कैसे एक मित्र ने अपने गृहप्रवेश के समारोह में मेरे परिवार को आमंत्रित नहीं किया और उससे मैं काफी हद तक उदासीन बना रहा, हालांकि शुरू में मुझे हल्का सा दुख ज़रूर हुआ था। लेकिन कहानी वहीं समाप्त नहीं हुई-आज मैं आपको उस घटना के चलते पैदा हुए क्रोध, भ्रम और दूसरी भावनाओं के विषय में बताता हूँ।

सभी जानते हैं कि मैं बहुत स्पष्टवादी व्यक्ति हूँ और ज़्यादा देर तक किसी बात को दिल में नहीं रखता। दो दिन बाद जब हमारी भावनाएँ और सारा मामला थोड़ा ठंडा पड़ गया, मैंने संक्षेप में यह कहानी और अपनी भावनाएँ फेसबुक पर शेयर कर दीं। मेरी आदत है कि मैं कभी किसी की पहचान फेसबुक पर ज़ाहिर नहीं करता और इस मामले में भी अपने नियम का पालन करते हुए सिर्फ अपनी भावनाओं का निष्कर्ष ही फेसबुक पर व्यक्त किया।

लेकिन हमारा एक मित्र, जो उस मेजबान का रिश्तेदार था, उस फेसबुक पोस्ट पर बहुत नाराज़ हुआ। फेसबुक पर अपनी नाराजगी ज़ाहिर करते हुए और मेरी नास्तिकता पर, साथ ही फेसबुक पर भी हज़ारों लानतें भेजते हुए उसने उस मेजबान की पहचान ज़ाहिर कर दी, जो मैं बिलकुल नहीं चाहता था। इसलिए मैंने फेसबुक पर उसके कमेन्ट को हटाकर उसे फोन किया और सारे मामले को स्पष्ट करने का आग्रह किया।

संक्षेप में यह कि हमारे उस मित्र ने, जो मेजबान के रूप में उस आयोजन में शामिल हुआ था, मुझसे कहा कि मैंने न्योता न मिलने की बात को गलत ढंग से लिया है और मेजबान का घर इतना छोटा है कि सारे मेहमानों का स्वागत करने में दिक्कत हो सकती थी, और वैसे भी मैं वहाँ आयोजित धार्मिक कार्यक्रम और मिर्च-मसालेदार खाना पसंद नहीं करने वाला था और सबसे ऊपर यह कि कुछ दिन बाद वह मेजबान मुझे अलग से, कुछ ज़्यादा पारिवारिक भोजन के लिए आमंत्रित करने वाला था।

एक हफ्ते बाद मुझे जन्मदिन की मुबारकबाद देते हुए उस मेजबान का फोन आ गया। मगर उस मामले पर अपना स्पष्टीकरण देते हुए उसने बिल्कुल अलग बात बताई। उसने कहा कि उसने किसी को भी बुलाया नहीं था लेकिन सबको आयोजन की तारीख बताई थी। यह बड़ा अजीबोगरीब बयान था- उसके मेहमान यह कैसे जान पाए कि किस समय आना है? क्या यह महज संयोग था कि सभी मेहमान एक समय पर आयोजन में पहुँच गए? अंततः उसे भी अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने माफी मांगी। हैरान करने वाली बात यह थी कि उसने इस बात से इंकार किया कि उसने बाद में हमें, अलग से खाने पर बुलाने की बात कही थी और दूसरे स्पष्टीकरणों से भी, जो उस मित्र द्वारा मुझे उसकी तरफ से दिये गए थे।

अब यह स्पष्ट था कि हमारा मित्र उस गलती पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा था जो उसने नहीं, उसके रिश्तेदार मेजबान ने की थी। अगर कोई हमें कुछ दिन बाद खाने पर बुलाना चाहता था तो वह हमें उसी दिन फोन करके बता सकता था। फोन करने में कितना वक़्त लगता है! बाद में उस मित्र से कई बार बात हुई और मैंने उससे कहा कि कोई भी अपने सारे परिवार की और सारे रिश्तेदारों की ज़िम्मेदारी नहीं ले सकता। ऐसा कर पाना संभव ही नहीं है क्योंकि उनके अपने अलग व्यक्तित्व हैं और वे अपने निर्णय खुद लेते हैं, जो, हो सकता है उससे बिल्कुल भिन्न हों, जो उसी परिस्थिति में आप लेते! मैंने उसे यह भी बताया कि मेरे सब भाई और पत्नी तक अपने कामों की ज़िम्मेदारी खुद उठाते हैं!

मेरे मित्र ने मुझसे झूठ बोला था। यह एक अजीब-सा, अनोखा एहसास था, खासकर इसलिए कि झूठ बोलने की उसे कतई आवश्यकता नहीं थी। पहले मुझे न बुलाए जाने का दुख था फिर फेसबुक पर अपनी भावनाओं को व्यक्त करने पर प्रताड़ित होने का और अब यह, कि मुझसे व्यर्थ झूठ बोला जा रहा है।

फिर भी, मेरे अंदर उस मित्र के प्रति कोई दुर्भावना नहीं है और इस पूरे वाकये के बावजूद हमारी मित्रता पर कोई आंच नहीं आएगी। क्यों? क्योंकि मैं समझ रहा हूँ कि उसने ऐसा क्यों किया। वह मेरे दुख को कुछ हल्का करना चाहता था और चाहता था कि मेरे और उसके रिश्तेदार मेजबान के बीच कोई कटुता न रहे। यह प्रेम और मित्रता से लबालब कोमल हृदय से की गई मासूम कोशिश थी। मैं जानता हूँ, यह उसका स्वभाव है-दूसरों की गलतियों की अथवा उनके कामों की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेना। लेकिन अगर कोई दूसरा भोजन करता है तो उसका पेट नहीं भरने वाला। अगर कोई दूसरा कोई गलती करता है तो उसकी जिम्मेदारी आप नहीं ले सकते! दूसरों की गलतियों का बोझ आप क्यों ढोना चाहते हैं? मुझे अच्छा लगता अगर दूसरे की ज़िम्मेदारी लेने की कोशिश करने की जगह वह सिर्फ इतना कहता: "मुझे पता नहीं, उसने तुझे क्यों नहीं बुलाया"। आखिर, मित्रता इस बात की मोहताज नहीं होनी चाहिए कि आप मुझे अपने हर आयोजन में बुलाएँ ही।

अंत भला तो सब भला! यह कहकर कि यह इतनी बड़ी बात नहीं है, मैंने सारे मामले को रफा-दफा किया। अपनी भावनाएँ और विचार दर्ज करने की गरज से मैंने सोशल मीडिया में इस विषय पर लिखा और अब यहाँ लिख रहा हूँ। इन विषयों पर हमारे विचार और धारणाएँ अलग हो सकते हैं मगर मैं जानता हूँ कि उसके दिल में प्रेम, मित्रता और नेकनीयती हैं- और मैं उससे अभी भी उसी तरह प्रेम करता हूँ।

क्यों आप खुद कठपुतली बनकर अपने जीवन को किसी गुरु के हवाले करना चाहते हैं?- 22 जुलाई 2013

आज गुरु-पूर्णिमा है, जिसे आचार्य दिवस भी कहा जा सकता है। इस दिन हर शिष्य अपने गुरु का सम्मान करता है। सारा साल भले ही वह उसे भूला हुआ हो, आज के दिन वह गुरु के पास अवश्य आएगा, गुरु के पाँव पखारेगा, उसके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करेगा और उसे दक्षिणा के रूप में कुछ धन अर्पित करेगा। अगर वह बहुत दूर रह रहा है तो वह उससे फोन पर बात करेगा और उनसे आशीर्वाद लेगा। मैं खुद भी बहुत समय तक गुरु की भूमिका में रहा हूँ और इस स्थिति से वाकिफ हूँ। मैं अब बदल चुका हूँ, इतना बदल चुका हूँ कि जिस बात की मैं सालों पहले खुद अनुशंसा किया करता था उसी का आज मैं कड़ाई के साथ विरोध करता हूँ। इसके साथ ही गुरुवाद के इस चलन का भी।

मैं धर्म-ग्रन्थों में लिखी बातों पर भरोसा किया करता था और उसी का उपदेश देते हुए उसका प्रचार-प्रसार करता था। वह यह कि: "गुरु के बिना आपकी मुक्ति नहीं है। मुक्ति ही मनुष्यमात्र का लक्ष्य होना चाहिए और मुक्ति प्राप्त करने के लिए उसे जीवन भर प्रयास करते रहना चाहिए-इसलिए हर एक को चाहिए कि पहले वह एक ऐसे गुरु की तलाश करे जो उसे मुक्ति दे सकता है।"

आज मैं महसूस करता हूँ कि लोगों की यही हालत इस क्षेत्र में होने वाले भ्रष्टाचार की जड़ है। भोले भाले, मासूम लोग उनके पास आते हैं और उन्हें तीन बातें सिखाई जाती हैं:

1) आपको मुक्ति तभी मिलेगी जब आप किसी को गुरु बना लें।

2) जैसे आपके एक ही पिता हो सकते हैं उसी तरह आप जीवन में सिर्फ एक ही व्यक्ति को गुरु बना सकते हैं।

3) आपको अपना सर्वस्व गुरु को समर्पित करना होगा। वह आपकी सारी ज़िम्मेदारी वहन करेगा और बदले में आपको वही करना होगा जो उसका आदेश हो।

जिस पल आप अपने गुरु से दीक्षा ग्रहण करते हैं, आप अपने सारे कर्मकांड उसे अर्पित कर देते हैं। आप उसकी सलाह पर चलते हैं और अपनी प्रार्थनाएँ, मन ही मन, उसके साथ ही करते हैं। उसके इस दावे पर

कि वह आपको इस मृग-माया से निकालकर मुक्ति दिलाएगा, आप अपनी सहमति से और खुशी-खुशी उसकी कठपुतली बनने के लिए तैयार हो जाते हैं। स्वाभाविक ही गुरु इसे और इसके साथ आने वाली हर चीज को पसंद करते हैं। इसीलिए वे कहते हैं कि गुरु से दीक्षा लेना अनिवार्य है। अपने शिष्यों को अपने साथ बनाए रखने के लिए वे इस नियम का प्रचार करते हैं कि किसी भी शिष्य का एक ही गुरु हो सकता है।

यह पूरी व्यवस्था ही मेरे विचार में, दुरुपयोग तथा शोषण करने के इरादे से ही बनाई गई है और यही कई दशकों से, बल्कि सदियों से हो रहा है। ये गुरु अपने शिष्यों के मस्तिष्क पर पूरा अधिकार रखते हैं और वे जान-बूझकर दौलत पाने और न सिर्फ अपने शारीरिक सुख बल्कि अपनी स्वैर, अप्राकृतिक यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए भी उनका दुरुपयोग करते हैं। वहाँ होने वाले कृत्य बेहद अनैतिक और समाजविरोधी होते है।

मेरे विचार में गुरु महज एक शिक्षक होता है, जो कि उसका शाब्दिक अर्थ भी है। अगर आप कुछ सीखना चाहते हैं तो आपको गुरु की आवश्यकता पड़ती है। जब मैं स्कूल जाता था तो कक्षा के सारे बच्चे शिक्षकों को आदर के साथ ‘गुरुजी’ कहा करते थे। इस बात से कोई मतलब नहीं होता था कि वह व्यक्ति कौन है। कोई भी, जिससे आप कुछ सीखते हैं, आपका गुरु हो सकता है, भले ही वह आपसे उम्र में छोटा ही क्यों न हो। और इस तरह आपके कई गुरु हो सकते हैं, जो भी आपको शिक्षा प्रदान करता है।

किसी की कठपुतली मत बनिए। जिससे भी आप कुछ सीखते हैं उसे आप आदरपूर्वक शिक्षक का दर्जा दे सकते हैं। लेकिन किसी एक व्यक्ति पर पूरी तरह निर्भर न रहिए। अपने संबंध को सिर्फ शिक्षक और विद्यार्थी का संबंध ही बना रहने दें और उसमें किसी दैवत्व के पहलू को जगह न दें।

लोग यह तर्क कर सकते हैं कि अगर आप धर्मग्रंथों और धार्मिक दर्शन का अध्ययन करना चाहते हैं तो आपको एक आध्यात्मिक और धार्मिक गुरु की आवश्यकता हो सकती है। मैंने अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा इसी काम में खर्च किया है। आज मैं आपसे पूछना चाहता हूँ: आखिर आप क्यों इस धार्मिक दर्शन का अध्ययन करना चाहते हैं? मेरे विचार में यह बिलकुल व्यर्थ है। आप एक ईमानदार और सुखपूर्ण जीवन जीना चाहते हैं। इसके लिए वेदों, कुरान या बाइबल की आपको कहाँ आवश्यकता है? उन्हें पढ़कर आप अपने ज्ञान के क्षितिज को सीमित कर लेंगे, अपने रास्ते को संकरा कर लेंगे और संदेहग्रस्त हो जाएंगे। तो अगर आपको ऐसे दर्शन की आवश्यकता ही नहीं है तो फिर धार्मिक गुरु की आवश्यकता क्यों होगी?

अपने गुरु आप खुद बनिए। आपका प्रेम, आपकी सहज विनम्रता और नैतिकता आपकी गुरु है। यही चीज़ें आपको सही रास्ता दिखाएंगी। बस, उन्हें वैसा करने आज़ादी दे दीजिए।

अपनी जिम्मेदारियों से बचने का गुरु प्रदत्त सम्मोहक प्रस्ताव – 3 अप्रैल 2013

कल मैंने उन जिम्मेदारियों के बारे में लिखा था जो एक लेखक और पाठक, दोनों पर, आयद होती हैं और यह भी कि अपने जीवन और अपने कर्मों की सम्पूर्ण ज़िम्मेदारी उन्हें उठानी ही चाहिए। हर व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिए और उन्हें अपने कंधों पर उठाने का साहस होना चाहिए। इस बात पर सभी सहमत होंगे कि ऐसा ही होना चाहिए मगर हिन्दू धर्म और प्रचलित गुरुवाद, दुर्भाग्य से, कुछ दूसरी ही बात सिखाते हैं: आप अपनी सारी जिम्मेदारियों का बोझ अपने गुरु पर डाल सकते हैं और आपको ऐसा करना भी चाहिए।

जी हाँ, यही सब बड़े से बड़े धर्मग्रंथों में लिखा हुआ है और यही सब कुछ सैकड़ों सालों से गुरुओं का उपदेश रहा है जिसे उनके शिष्य निष्पादित करने की कोशिश में लगे रहते हैं। इसके पीछे का विचार यह है कि आप अपने आपको पूरी तरह गुरु के चरणों में निछावर कर दें। अपने साथ आप अपने बुरे कर्मों को और अपने अच्छे कर्मों को भी गुरु को समर्पित कर दें और अपने लिए बिना किसी अपेक्षा के जैसा गुरु कहता है वैसा करते चले जाएँ। फिर आप उस स्थिति को प्राप्त हो जाएंगे जहां आपके सारे कर्म आपके नहीं रह जाएंगे और इस तरह मृत्यु के बाद आपको स्वर्ग प्राप्त हो जाएगा।

यही वह आधार है जिस पर सारे गुरुवाद की इमारत खड़ी है। गुरु लोगों का आह्वान करते हैं: आओ, अपने सारे कर्म मुझे सौंप दो, वही करो जिसके लिए मैं तुम्हें प्रेरित कर रहा हूँ और फिर तुम्हें इस जीवन की, यहाँ तक कि उसके बाद की भी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। अपने आप को समर्पित कर दो, निछावर कर दो, तुम्हारे इस जन्म की और अगले जन्मों की भी चिंता मैं करूंगा।

कितना आकर्षक विचार है! किसी भोले-भाले, साधारण धर्मभीरु व्यक्ति के लिए यह एक ललचाने वाला प्रस्ताव है! हर हिन्दू जो ऐसे धार्मिक वातावरण में बड़ा हुआ है यह विश्वास कर सकता है कि यही एकमात्र उचित राह है। कोई भी इसके मोहक स्वरों को समझ सकता है: मेरी नौका में सवार हो जाओ, मैं तुम्हें उस पार पहुंचा दूँगा! तुम्हें सोचने की, चिंता करने की ज़रूरत नहीं, तुम वहाँ सुरक्षित पहुँच जाओगे। तुम नौका को हिला नहीं सकते, लहरों के तेज़ थपेड़े तुम्हें डिगा नहीं सकेंगे, डूबने की तो कोई संभावना ही नहीं- यहाँ तक कि तुम गीले तक नहीं होगे!

वे समर्पण कर देते हैं। यह बहुत आसान है और यह समाज में अच्छा भी माना जाता है! यह घोषणा करते हुए वे गर्व से भर उठते हैं: "मैंने सर्वस्व परित्याग किया है, मैं उपासना में लीन हो गया हूँ, मैं भक्त हूँ और सिर्फ वही करता हूँ जो मेरे गुरु की वाणी मुझसे करवाती है। मैं कुछ भी नहीं हूँ।" यह विनम्रता ही उनसे अपेक्षित है। उनसे कहा गया है कि ‘अपने अहं को खत्म करो’ अन्यथा गुरु आपकी ज़िम्मेदारी नहीं ले सकता। आपके कर्मों कि ज़िम्मेदारी वह तभी लेगा जब आपके कर्मों पर उसका अधिकार होगा।

लेकिन गुरु की इस सेवा के बदले आपको एक निश्चित फीस भी अदा करनी होगी। कुछ गुरु सीधे यह फीस वसूल नहीं करते। कुछ बैंक की तरह होते हैं जहां कुछ विशिष्ट सेवाओं के लिए आपका एक तरह का बीमा किया जाता है। लेकिन आपको भुगतान करना अवश्य पड़ता है, सीधे सीधे या फिर किसी और माध्यम से।

ये गुरु आपकी इस मनोवृत्ति का लाभ सिर्फ मोटी रकम वसूल करके ही नहीं उठाते। उनके कई शिष्य इतने समर्पित होते हैं कि वे उनकी ज़बान खुलते ही उनके लिए कुछ भी कर सकते हैं। उनके शिष्यों द्वारा प्रदत्त यह शक्ति उनके लिए यौन शोषण की राह भी खोल देती है। पहले शिष्य रहीं कुछ महिलाओं ने मुझे बताया कि वे तो अपने गुरु को भगवान ही समझती थीं। उन्होंने अपने आपको पूरी तरह समर्पित कर दिया था, इस विश्वास के साथ कि गुरु के आदेश का पालन करने पर वे उनके माध्यम से पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी। जब उनसे कहा गया कि गुरु की सेवा हेतु उनके बेडरूम में जाओ, उनके जननांगों का मर्दन करो और यहाँ तक कि उनके साथ संभोग करो तो उनमें से बहुत सी इंकार नहीं कर सकीं। ऐसे कई प्रकरण हैं जहां गुरुओं ने अपनी शिष्याओं का इस तरह शोषण किया क्योंकि वे अपने भोलेपन में यह सोचती थीं कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

इस तरह आप देखते हैं कि अपनी ज़िम्मेदारी स्वयं न उठाकर उन्हें किसी और को सौंपने का आसान रास्ता अख्तियार करके आप कहाँ पहुँच सकते हैं। यह किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। अपनी ज़िम्मेदारी स्वयं उठाओ, अपने कर्मों और उनसे उपजे परिणामों की पूरी ज़िम्मेदारी आपकी है। समझिए कि जीवन का आनंद उठाने के लिए किसी गुरु की आपको कोई आवश्यकता नहीं है।

अपने कथ्य के प्रति लेखक की और अपने जीवन के प्रति पाठक की ज़िम्मेदारी – 2 अप्रैल 2013

कल मैंने लिखा था कि मैं अपने आपको एक साधारण इंसान मानता हूँ। जब एक पाठक ने यह पढ़ा तो आपत्ति उठाते हुए कहा कि आप ऐसा कहकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकते; आपके ब्लॉग बहुत से लोग पढ़ते हैं और इसलिए अपने कहे या लिखे की आप पर पूरी ज़िम्मेदारी आयद होती है। मैंने सोचा लेखक और पाठक की जिम्मेदारियों के बारे में चर्चा रुचिकर हो सकती है और मुझे कुछ पंक्तियाँ इस पर लिखनी चाहिए।

सबसे पहले तो इस बात का शुक्रिया कि मुझे अपनी जिम्मेदारियों से अवगत कराया गया, हालांकि इसकी बहुत आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि मैं हमेशा इस बारे में सतर्क रहता हूँ। अपनी ज़िम्मेदारी समझता हूँ इसीलिए तो लिखता हूँ। मैं ब्लॉग लिखकर पैसा अर्जित नहीं करता, मैं अखबारों के लिए नहीं लिखता न ही मैं अपने आलेख (बाकायदा शब्दों के हिसाब से) पत्रिकाओं में छपने के लिए भेजता हूँ कि मैं उससे कुछ कमा सकूँ। नहीं, इस ब्लॉग के माध्यम से मैं अपने व्यक्तिगत विचार लोगों के साथ साझा करना चाहता हूँ, अपने जीवन में आए परिवर्तनों और उनसे प्राप्त अपने अनुभव लोगों को बताना चाहता हूँ जिससे अगर कोई ऐसे ही किसी मानसिक परिवर्तन के दहाने पर खड़ा है तो मेरे लेखन से उसे कोई अंतर्दृष्टि प्राप्त हो सके। शायद मेरे शब्द ऐसे व्यक्तियों को यह बताने के लिए हैं कि वे इन भावनाओं या इन विचारों के साथ अकेले नहीं हैं। हो सकता है यह लेखन किसी वैकल्पिक सोच, एक वैकल्पिक विचार या वैकल्पिक दृष्टिकोण की तरफ उनका ध्यान खींच सके। या वह सिर्फ लोगों का मनोरंजन ही कर सके-जी हाँ, इतना भी मेरे लिए बहुत है!

जब मैं कहता हूँ कि मैं एक साधारण, आम इंसान हूँ तब मेरे मन में ऐसे किसी इरादे का खयाल नहीं होता जिनका मैंने ऊपर ज़िक्र किया है, जिनमें ऐसा लगता है जैसे मैं किसी की मदद कर रहा हूँ, जैसे ये व्यासपीठ पर विराजमान किसी गुरु, शिक्षक या नेता के वचनामृत हों। जब मैं कहता हूँ कि मैं लिखता हूँ और अपने अनुभव साझा करने की अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास भी करता हूँ, तब मैं एक और बात भी स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि यह किसी अहंकारी का बयान नहीं है जो अपने आपको बहुत बड़ा जानकार समझता है या यह समझता है कि ऐसे 'दिव्य' अनुभव उसकी बपौती हैं। इसके विपरीत, मैं इस बात का कायल हूँ कि ऐसे अनगिनत लोग होंगे जो उन्हीं विचार-प्रक्रियाओं से गुजरे होंगे जिनसे यह सब लिखते हुए मैं गुज़रा हूँ। मैं समझता हूँ कि यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम एक दूसरे की मदद करें और अपने अनुभवों को साझा करके हम ऐसा कर सकते हैं।

स्वाभाविक ही हर लेखक अपने लेखन के लिए ज़िम्मेदार होता है। अगर आप घृणा फैलाने वाली बातें लिखते हैं या लोगों को अपराध और हिंसा की ओर प्रवृत्त करने वाले लेख लिखते हैं तो आप काफी हद तक अपने शब्दों के परिणामों के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। मैं तो ऐसी घृणा फैलाने वाली बातें नहीं लिखता। जब भी मैं किसी विषय पर अपनी राय देता हूँ, मैं साफ-साफ उन तर्कों को भी प्रस्तुत करता हूँ जिन पर वह राय आधारित होती है, अपने अनुभवों का विवरण लिखता हूँ और सतर्क रहता हूँ कि मेरी भाषा शालीन और सभ्य हो। उसके बाद पाठकों की ज़िम्मेदारी हो जाती है कि वे मेरे शब्दों का क्या उपयोग करते हैं।

और अंततः यह सबसे महत्वपूर्ण बात होती है: अपने जीवन के प्रति पाठक की ज़िम्मेदारी। मैं सिर्फ अपना अनुभव बता सकता हूँ और उससे उपजी अपनी संवेदनाओं को स्पष्ट कर सकता हूँ लेकिन हो सकता है कि उसी अनुभव का आप पर बिल्कुल विपरीत या अलग असर हो। मैं यह बता सकता हूँ कि ऐसी स्थिति में मैंने क्या किया लेकिन आप सोचने के लिए स्वतंत्र हैं कि आपके लिए वैसा करना उचित नहीं है। मैं कभी भी आपसे यह नहीं कहता कि जैसा मैंने किया आप भी करें, न ही मैं ऐसी अपेक्षा रखता हूँ कि मेरे लिखे को पढ़कर आप वही करने लगें। गेंद आपके पाले में है और आप खुद सोचें कि आप उसका क्या करना चाहते हैं!

मैं यह कहना चाहता हूँ कि हर एक की परिस्थिति बिल्कुल अलग, उसकी व्यक्तिगत होती है और जबकि मैं एक लेखक की हैसियत से, एक व्यापक रूप से लागू हो सकने वाली बात कहता हूँ, जैसे ईमानदार होना एक अच्छी बात है, यह आप की ज़िम्मेदारी है कि आप उस सलाह का किस तरह उपयोग करते हैं। अगर आप मेरी सलाह पर ईमानदार होने का निर्णय करते हुए अपने अधिकारी से कहते हैं कि आप उसे पसंद नहीं करते और परिणामस्वरूप कोई सज़ा पाते हैं, तो मैं नहीं समझता कि मैं इसके लिए ज़िम्मेदार हूँ!

एक लेखक की कुछ ज़िम्मेदारियाँ होती हैं मगर कुछ पाठक की भी होती हैं। एक पाठक के रूप में आपको शब्दों के अर्थ को अपने अनुसार, अपने लिए समझना चाहिए, फिर देखना चाहिए कि वे किसके शब्द हैं और किसको संबोधित हैं और आखिर में अपने दिल से पूछना चाहिए कि वे आपके लिए कितने सही हैं। फिर आप अपनी ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर उठाने के लिए तैयार होंगे और अंततः उसके अनुसार, कई दूसरे लेखकों की टिप्पणियों के असर को भी जोड़ते हुए, लेकिन स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकेंगे और तदनुसार व्यवहार करेंगे। लेकिन आपके कृत्य सिर्फ आपके होंगे और उनके परिणाम भी।