इस संज्ञान का मुकाबला कैसे करे कि आप ज़्यादा दिन ज़िंदा नहीं रहने वाले हैं? 28 अक्टूबर 2015

आर्थिक और आपसी संबंधों से जुड़ी समस्याओं पर लिखने के पश्चात् आज मैं एक ऐसी बिल्कुल अलग प्रकार की मुसीबत के विषय में लिखना चाहता हूँ जो आपकी दुनिया को झँझोड़कर रख देती है: जब आपको पता चलता है कि खुद आप या आपका कोई बहुत करीबी व्यक्ति किसी घातक बीमारी से या किसी स्वास्थ्य संबंधी समस्या से ग्रसित है। निश्चय ही मैं सर्दी-खाँसी जैसी सामान्य व्याधिओं की चर्चा नहीं कर रहा हूँ-जी नहीं, मेरा मतलब कैंसर जैसी बीमारियों या जानलेवा अपघातों से है, जहाँ घायल व्यक्ति अपनी हड्डियाँ तुड़वा बैठा है या पक्षाघात-ग्रस्त हो गया है। ऐसी स्थितियों का मुक़ाबला कैसे करें?

स्वाभाविक ही, मैं कोई चिकित्सकीय सलाह देने नहीं जा रहा हूँ। उसके लिए आपको बहुत सारे काबिल डॉक्टर मिल जाएँगे, जो आपकी या आपके प्रियकरों की हर संभव चिकित्सा कर सकेंगे। मैं सिर्फ समस्या के भावनात्मक और मानसिक पहलुओं पर दृष्टि डालूँगा।

बीमारी और मौत दो ऐसी परिस्थितियाँ हैं जहाँ आपके पास सिर्फ एक ही विकल्प होता है: उन्हें स्वीकार करना।

और यह बात कहने में जितनी आसान है उस पर अमल करना उतना ही कठिन है और मैं जानता हूँ कि जो भी इस परिस्थिति से गुज़र रहा होता है, जानता है कि वास्तव में यह कितना कठिन है। अगर आप जानते हैं कि एक या दो साल से अधिक आपका जीना संभव नहीं है। जब आपको पता चलता है कि अब आपको अपने पैरों का एहसास नहीं होगा क्योंकि आप लकवाग्रस्त हो चुके हैं। जब आपको पता चलता है कि आपकी पत्नी के हाथ कट जाने के बाद आपकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल जाने वाली है।

मुद्दे की बात यह है कि ऐसे मामलों में आपके पास इसके सिवा कोई चारा नहीं होता कि आप परिस्थिति को स्वीकार कर लें। इस सच्चाई को स्वीकार करें और यह सुनिश्चित करें कि इस कठिन परिस्थिति में भी आप अच्छे से अच्छा क्या कर सकते हैं।

अगर आप या आपका कोई प्रियकर जानता है कि आपमें से किसी एक के पास बहुत कम जीवन बचा है तो पूरी कोशिश करें कि ये कुछ दिन, सप्ताह या महीने अधिक से अधिक सुखद हों। उनके लिए, जो अभी काफी समय तक करीब रहने वाले हैं, बहुत सारी उल्लासपूर्ण स्मृतियों को सँजोने की कोशिश करें। उन बातों को अंजाम दें, जिन्हें आप करना चाहते थे और हमेशा बाद में करने के लिए टाल देते रहे थे। संसार की खूबसूरती का उन लोगों के साथ आनंद लें, जिन्हें आप प्रेम करते हैं। यदि आपमें थोड़ी-बहुत लिखने की प्रतिभा है तो मैं सलाह दूँगा कि आपके मन में होने वाली हलचलों को लिखकर रख लें, जिससे इन्हीं परिस्थितियों से गुज़रने वाले दूसरे लोग आपके अनुभवों से शक्ति प्राप्त कर सकें!

यदि आप इन परिस्थितियों से बचकर निकल आते हैं तो उनके हर लमहे की कदर करें, उन्हें शिद्दत के साथ याद रखें, भले ही उन परिस्थितियों ने आपका नुकसान किया हो या आपके जीवन में उनके कारण स्पष्ट परिवर्तन आ गया हो! क्योंकि कितनी भी बुरी परिस्थिति से आप गुजरे हों, कोई न कोई होता है जो आपसे भी बुरी परिस्थिति से गुज़र चुका होता है। आपने उस प्रेरणादायक वक्ता का वीडियो देखा होगा, जिसकी बाहें और पैर नहीं हैं! जीने के आनंद के बारे में बात करते हुए उसे देखना अपने आपमें असाधारण और विस्मित करने वाला अनुभव है! न देखा हो तो उस वीडियो को अवश्य देखें।

जिन परिस्थितियों के साथ आपको आगे भी गुज़ारा करना है, उनको सहजता के साथ स्वीकार करते हुए, तदनुसार अपना भविष्य का संसार रचें। एक बार, जब आप उन्हें स्वीकार करने लगेंगे, आप नोटिस करेंगे कि आपकी परवाह करने वाले बहुत से करीबी लोग आपकी सहायता के लिए आगे आते जा रहे हैं और आपकी हर संभव मदद के लिए प्रस्तुत हैं। न सिर्फ अपनी विकट परिस्थितियों को स्वीकार करें बल्कि उस मदद को भी स्वीकार करें, जिनकी आपको सख्त ज़रूरत है।

निश्चित ही यह कठिन है लेकिन एक बार आप उन्हें स्वीकार करने लगें तो वे आसान होती जाएँगी और उनमें आपको जीवन की कई सकारात्मक बातें भी नज़र आने लगेंगी।

आस्था आपको पशुओं का मल-मूत्र भी खिला पिला सकती है – 8 अक्टूबर 2015

कल मैंने भारत की एक गंभीर होती जा रही राजनीतिक समस्या का ज़िक्र किया था। आज जिस विषय पर मैं लिखने जा रहा हूँ, उसे पढ़कर आपको हँसी आए बगैर नहीं रहेगी या घृणा से नाक-भौंह सिकोड़ेंगे या स्तब्ध रह जाएँगे! और कूपमंडूक हिन्दू रूढ़िवादियों की बात तो छोड़िए, खुद वर्तमान हिन्दूवादी भारत सरकार भी ठीक इसी बात का प्रचार-प्रसार कर रही है जबकि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि गोमूत्र और गोबर के सेवन से कोई लाभ होता है!

जी हाँ, भारत में बहुत से लोग विश्वास करते हैं कि गाय का मल-मूत्र उनके लिए लाभप्रद हो सकता है। वे गंभीरता पूर्वक मानते हैं कि वह बहुत सी बीमारियों का इलाज कर सकता है। इसके अलावा वह पवित्र तो है ही! पवित्र इसलिए कि वह पवित्र गाय द्वारा, जिसे धार्मिक हिन्दू 'मानव जाति की माँ' समझते हैं, उत्सर्जित किया गया है!

यह कोई नई बात नहीं है। दरअसल बहुत से पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि गाय से प्राप्त होने वाले पाँच पदार्थों को अर्थात दूध, दही, घी, मूत्र और मल को, एक कर्मकांड के साथ ग्रहण करने से शरीर पवित्र हो जाता है। यहाँ, वृंदावन में, जोकि 'दैवी चरवाहे' कृष्ण की नगरी है, कई वर्षों से गोमूत्र और गोबर से बनी वस्तुएँ लोकप्रिय हैं। और अब, जब कि एक ऐसी पार्टी सत्ता में है, जो हिन्दू धर्म, हिन्दू परंपरा और हिन्दू मूल्यों का प्रचार-प्रसार करने में लगी है, इन वस्तुओं का बाज़ार अचानक और अधिक फल-फूल रहा है!

स्वाभाविक ही उनके विज्ञापनों में बहुत सारी अनाप-शनाप मूर्खतापूर्ण बातें हैं: सिर्फ इतना ही नहीं कि गाय का मल-मूत्र बहुत सी बीमारियों के इलाज में असरकारक है, यहाँ तक कि कैंसर भी इस चमत्कारी इलाज से ठीक हो जाता है-और यह उनका सबसे जनप्रिय दावा है। इतना ही नहीं, वे झूठी अफवाहें फैलाने में भी नहीं हिचकिचाते-कहते हैं नासा ने भी यह स्वीकार किया है कि गाय के पिछवाड़े से विसर्जित पदार्थ ग्रहण करना आपके शरीर के लिए लाभप्रद होता है! वास्तव में मैं जानना चाहूँगा कि इससे महत्वपूर्ण और कौन सी बात नेशनल ऐरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन को गाय के मूत्र का विश्लेषण करने की प्रेरणा दे सकती है!

चलिए, मज़ाक छोड़कर कुछ गंभीर बात करें। मेरा मानना है कि लोगों को गाय के मल-मूत्र में उलझाकर देश की वास्तविक समस्याओं की ओर से उनका ध्यान बँटाने का यह एक सोचा-समझा मगर कारगर तरीका है। लेकिन गाय को पवित्र, देवता या माता मानने वालों के पाखंड पर मैं एक बार फिर स्तब्ध रह जाता हूँ! वे उसे माँ कहते हैं, खास मौकों पर उसकी पूजा करते हैं और गाय द्वारा उत्सर्जित सभी वस्तुओं को प्रसाद मानकर उनका सेवन करते हैं-लेकिन जब गाय दूध देना छोड़ देती है तो उसकी कोई चिंता नहीं करते कि उसके साथ क्या हो रहा है, इस बात से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि गलियों और कचरे के ढेरों पर वह कूड़ा-करकट और जानलेवा प्लास्टिक खा रही है। उसके चमड़े से बने जूते और बेल्ट इस्तेमाल करने में उन्हें कोई एतराज़ नहीं होता! उस वक्त गाय की दैवी पवित्रता का विचार कहाँ चला जाता है? तब उन्हें नहीं लगता कि अपनी माँ की त्वचा से बने जूते पहनकर वे कोई पाप कर रहे हैं?

किसी पशु के अपशिष्ट को धर्म द्वारा पवित्र बनाकर प्रस्तुत करना वास्तव में विचलित कर देने वाला कृत्य है! इलाज के लिए खुद अपना मूत्र पीना भी कुछ लोगों में लोकप्रिय है। और अब आप गोमूत्र पी रहे हैं-आप गधे या बंदर का मूत्र भी पी सकते हैं! गोमूत्र में पाया जाने वाला कोई उपयोगी एंज़ाइम उसमें भी मौजूद हो सकता है!

मैं पूरी गंभीरता के साथ कहना चाहता हूँ कि मैं इसकी अनुशंसा कभी नहीं करूंगा! गोबर और गोमूत्र वे पदार्थ हैं, जिन्हें शरीर ने बाहर निकाला ही इसलिए है कि वे उपयोगी नहीं हैं, वे अपशिष्ट हैं! शरीर के अंग-प्रत्यंगों से होकर गुजरने के बाद इन पदार्थों का कोई उपयोग नहीं रह गया होता! फिर उन्हें आप क्यों पीएँगे या खाएँगे? बल्कि मैंने सुना है कि इन अपशिष्टों को ग्रहण करने से गाय की आँतों में पाए जाने वाले विषाणुओं के संक्रमण का खतरा भी हो सकता है!

तो धर्म की यही वास्तविक शक्ति है! वह आपको पशुओं का मूत्र पीने और उनका मल खाने के लिए प्रेरित कर सकता है। यह वही धर्म है, जो एक मनुष्य का छुआ पानी पीने से भी मना करता है क्योंकि उस व्यक्ति को धर्मग्रंथों ने ‘अछूत’ घोषित कर रखा है!

क्या आप नहीं समझते कि धर्म के नाम पर यह बहुत गलत हो रहा है?

मोनिका और अस्पताल में उसकी रूममेट – खुशी का अलग-अलग नज़रिया – 27 मई 2015

जब हम मोनिका के साथ अस्पताल में थे तो उसके पड़ोस में एक मलावी की 15 साल की लड़की भी भर्ती थी, जो अपनी माँ के साथ अपने दिल के दो वॉल्व बदलवाने भारत आई थी और कुल मिलाकर दो माह यहाँ रहने वाली थी। जब दोनों लड़कियाँ आपस में बात करतीं तो मैं सोचता कि दोनों लड़कियाँ अलग-अलग कारणों से अस्पताल आई हैं और पता नहीं एक-दूसरे की चिकित्सा संबंधी समस्याओं को जानने के बाद दोनों अपने-अपने बारे में क्या महसूस करती होंगी। और दोनों को इतनी विकट समस्याओं से ग्रसित देखने के बाद हमें, हम जैसे ‘स्वस्थ’ लोगों को अपने बारे में क्या और कैसा महसूस करना चाहिए।

दोनों लड़कियाँ अपनी-अपनी समस्याओं से काफी समय से पीड़ित हैं और उनकी बीमारी के कारण उनके परिवार भी बहुत दुखी हैं। दोनों की शल्यक्रियाएँ एक ही अस्पताल में हुई हैं, एक कई देशों को पार करके बेहतर इलाज और अच्छी सेवाओं की आस में यहाँ आई है और दूसरी पास ही से यहाँ पहुँची है। दोनों की शल्यक्रियाएँ सफल रही हैं लेकिन दोनों को पूरी तरह स्वस्थ होने में अभी काफी वक़्त लगेगा।

कौन ज़्यादा तकलीफ में है और कौन कम पीड़ित है?

मोनिका का चकत्तों से भरा चेहरा और बड़ी-बड़ी सफ़ेद पट्टियों में लिपटा शरीर देखकर उस किशोर अफ़्रीकी लड़की के मन में क्या आता होगा, मैं इसकी कल्पना भर कर पा रहा हूँ। सहानुभूति, शायद दया? शायद वह सोचती होगी: ‘मेरे शरीर पर भी दो बड़े-बड़े निशान हैं मगर कम से कम उन्हें कोई देख नहीं सकता!’ मुझे लगता है, निश्चित ही वह अपनी साफ़, बिना जली त्वचा में बड़ी खुश होगी।

दूसरी तरफ मोनिका उसके साथ वाले बिस्तर के पास खड़ी लड़की की ओर देखती है, जो अचानक अपना हाथ अपनी छाती पर दबा लेती है-दर्द उसके चेहरे पर पल भर के लिए उभरता है और फिर सामान्य हो जाता है। अब सिर्फ शल्यक्रिया का ज़ख्म ही दर्द करता है लेकिन इस दर्द से उपजे डर की आप कल्पना कर सकते हैं क्योंकि वह जानती है कि उसका दिल पूरी तरह उसका अपना असली दिल नहीं है बल्कि उसके दो वॉल्व बदले गए हैं और वह अभी भी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हुआ है! उसकी धड़कन कभी भी रुक सकती है और कृत्रिम अवयव अचानक काम करना बंद कर सकते हैं। ‘कम से कम मेरे ज़ख्म और चकत्ते सिर्फ बाहरी हैं!’ मोनिका महसूस करती होगी। देखने में अच्छे नहीं लगते मगर जान का उसमें कोई जोखिम नहीं है!

दोनों लड़कियाँ जल्द ही ठीक हो जाएँगी, फिर से खेलने-कूदने लगेंगी और जीवन का मज़ा लेंगी-क्योंकि चाहे कुछ भी हो, बच्चे यही करते हैं। दोनों बहुत सुंदर हैं, छोटे, बड़े, दो या कई सारे चकत्तों के बावजूद। दोनों एक-दूसरे की तरफ देखती हैं और अपने-अपने ज़ख़्मों की तुलना दूसरी के ज़ख़्मों से करती हैं। और जब हम उनकी तरफ देखते हैं तो हमें क्या नज़र आता है, हम क्या सोचते हैं और क्या महसूस करते हैं?

सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार अच्छी चीज़ है। यह मोनिका जैसी बच्ची के लिए बहुत लाभकारी हो सकता है, जिसे यह सब कभी न मिल पाता, अगर उसे संवेदनशील लोगों का सान्निध्य नहीं मिलता, उसके आसपास या दुनिया में सहानुभूतिपूर्ण और दयालु लोग नहीं होते!

इस सहानुभूतिपूर्ण रवैये से आपको कुछ वैसा प्राप्त होगा, जिसे सुकून या कृतज्ञता कहा जा सकता है। यह ख़ुशी कि आपके शरीर पर किसी प्रकार के चकत्ते नहीं हैं, यह संज्ञान कि आपकी समस्याएँ, दरअसल, इन किशोरवय लड़कियों की तुलना में कितनी छोटी, कितनी अमहत्वपूर्ण हैं!

मुझे लगता है कि बीच-बीच में हमें इन भावनाओं पर अपना ध्यान केन्द्रित करते रहना चाहिए: इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस परिस्थिति से दो-चार हैं, जिसकी आप शिकायत कर रहे हैं, कोई न कोई है, जो उससे भी अधिक विकट परिस्थिति में फँसा हुआ है लेकिन मजबूती और हिम्मत के साथ हँसते हुए उसका सामना कर रहा है! जी हाँ, वह खुश है क्योंकि उसकी सोच सकारात्मक है, वह जानता है कि कैसे जीवन की कदर की जाए, हर हाल में जीवन का मज़ा लिया जाए! आप परेशान हैं क्योंकि आपकी शक्ल वैसी नहीं है, जैसी आप कल्पना करते रहते हैं, अपनी नज़र में आप बदसूरत हैं क्योंकि आपके बाल झड़ते जा रहे हैं, आपकी छातियाँ बहुत छोटी-छोटी हैं या बहुत बड़ी हैं या आपकी मांसपेशियाँ वैसी सुडौल नहीं हैं, जैसी आप चाहते हैं। आप जीवन की छोटी-मोटी बातों के लिए दुखी हैं। अपनी सोच को विस्तार दीजिए, सामने मौजूद विशाल दृश्य पटल पर नज़र दौड़ाइए और यह समझने की कोशिश कीजिए कि आप जैसे भी हैं, आपके पास जो कुछ भी है, वही आपके लिए पर्याप्त है, उतने भर से आप खुश रह सकते हैं!

पैरों में विकलांगता और लगातार दर्द – पोलियो नहीं सिर्फ विटामिनों की कमी – हमारे स्कूल के बच्चे – 20 मार्च 2015

आज मैं आपका परिचय अपने स्कूल के एक लड़के और एक लड़की से करवाना चाहता हूँ, जिनके नाम क्रमशः अर्जुन और खुशबू हैं। जब आप खुशबू की ओर देखते हैं तो आपको हमारे स्कूल की दूसरी लड़कियों की तरह एक सामान्य लड़की नज़र आती है। लेकिन जब आप एक नज़र अर्जुन पर डालते हैं तो आप तुरंत समझ जाते हैं कि वह अपनी कक्षा के दूसरे लड़कों जैसा नहीं है: 14 साल के अर्जुन के पैर कुछ विकृत नज़र आते हैं, उसका शरीर छोटा है और अपने सहपाठियों से लगभग आधा तथा अपनी 13 वर्षीय बहन से भी बमुश्किल आधा है।

खुशबू उम्र में परिवार की सबसे छोटी संतान है। उसका सबसे बड़ा भाई 22 साल का है, दूसरा 17 साल का, फिर अर्जुन है और अंत में वह। उसका पिता एक मजदूर है और जब भी और जो भी काम उसे मिल पाता है, कर लेता है। काम ढूँढ़ना पड़ता है और जब मिल जाता है तब वह दिन भर में 250 रुपए यानी लगभग 4 डॉलर रोजाना कमा लेता है।

सबसे बड़े लड़के ने छठी कक्षा के बाद स्कूल जाने से मना कर दिया और धार्मिक नाटक-मंडलियों में शामिल हो गया, जहाँ पहले रोजाना 60 रुपए यानी लगभग 1 डॉलर उसे मिला करते थे, जो अब, 10 साल बाद 100 रुपए यानी लगभग डेढ़ डॉलर हो गए हैं। खाना-नाश्ता अलग से वहीं मिल जाता है। इस तरह पिता और पुत्र मिलकर दूसरे लड़के की स्कूल-फीस भरते हैं-लेकिन उसके बाद बाकी दोनों बच्चों के लिए उनके पास ज़्यादा कुछ बचता नहीं है! और यही कारण है कि अब वे दोनों हमारे स्कूल में पढ़ रहे हैं।

जब तीन साल पहले अर्जुन हमारे स्कूल आया था तो हमने उसकी माँ से उसके अंग्रेज़ी के x आकार के पैरों के बारे में पूछा था। उसने तब बताया था कि अर्जुन को पोलियो की बीमारी है। स्वाभाविक ही उसे चलने में बड़ी दिक्कत होती है लेकिन फिर भी वह एक खुशमिजाज़ बच्चा है और दिन भर बच्चों के साथ खेलता रहता है और खूब दौड़-भाग करता है। यहाँ तक कि वह योगासन भी करता है और काफी अच्छी तरह करता है!

जब अर्जुन तीन साल का था तभी से उसे पैरों की यह तकलीफ शुरू हो गई थी। उसके पैर पहले टेढ़े पड़ने लगे और गलत दिशा में मुड़ गए, जिससे उसके पैरों में दर्द रहने लगा। परिवार उसके पैरों की मालिश इत्यादि करते थे और सोचते थे कि उसे लाभ मिल रहा है लेकिन समय बीतने के साथ स्पष्ट होता गया कि पैरों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। किसी ने कहा कि उसे पोलियो है, लिहाजा उन्होंने भी मान लिया और शांत बैठ गए-लेकिन सिवा पैरों की विकृति और उसके साथ उभरने वाले दर्द के बच्चे में पोलियो के और कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ रहे थे। कुछ साल बाद शहर में लगे एक मुफ्त पोलियो कैंप में वे उसे दिखाने ले गए। तब तक उसके पैर x आकार के हो चुके थे, जिन्हें देखते ही डॉक्टरों ने कहा कि इस बीमारी में शल्यक्रिया से लाभ हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता। अब, शल्यक्रिया के डर से कि उसमें भीषण दर्द होगा और यह भी निश्चित नहीं है कि बच्चा ठीक हो ही जाएगा, उन्होंने शल्यक्रिया नहीं करवाई।

इस तरह समय गुज़रता रहा और सभी यही समझते रहे कि अर्जुन को बचपन से ही पोलियो है। यह तो जब हम उसके घर गए और हमें पता चला कि उसे न तो किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाया गया है और न ही आधिकारिक तौर पर किसी डॉक्टर ने आज तक बीमारी की पोलियो के रूप में पहचान की है, हम उसे डॉक्टर के पास ले गए। रक्त की जाँच और एक्स रे की जाँच के बाद पता चला कि शायद अर्जुन बचपन से आज तक विटामिनों और खनिजों की कमी के कारण यह कष्ट भुगतता रहा है। इस कारण उसकी हड्डियाँ ठीक तरह से विकसित नहीं हो पाईं और कमजोर होती गईं। उनमें अंदरूनी दरारें पड़ती गईं और दर्द रहने लगा। समय पर उनका इलाज नहीं हो पाया और इस तरह आज, बेहतर पोषक आहार ग्रहण करने के बावजूद उसके पैरों की विकृति में और लंबी दूरी तक चलने पर होने वाले घुटनों के दर्द में कोई कमी नहीं आ पा रही है। उसका ऊपरी हिस्सा तो भारी होता जा रहा है मगर पैर अब भी कमजोर हैं और उसके शरीर का वज़न संभालने में अक्षम हैं।

स्थानीय डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिये हैं: उनका कहना है कि इस अवस्था में उसका इलाज यहाँ संभव नहीं है। हमारा इरादा उसे किसी बड़े अस्पताल ले जाकर, वहाँ के डॉक्टरों से सलाह लेने का है, जिससे उसके बेहतर भविष्य के लिए भरसक कुछ किया जा सके।

जब कि उसकी बहन और उसके सहपाठी बहुत पहले से अपने लंबे, स्वस्थ पैरों सहित अच्छे-खासे विकसित हो चुके हैं, उसे कीचड़ पार करके अपने एक कमरे वाले घर में प्रवेश करना मुश्किल होता है। लेकिन यह पुनः कहना होगा कि वह खूब सक्रिय और खुशमिजाज़ बालक है और अपने साथियों के साथ खेल-खेल में कुश्ती आदि लड़ने में भी उसे गुरेज़ नहीं होता।

भविष्य में उसका क्या होगा, कहा नहीं जा सकता लेकिन हम उसकी मदद के लिए हमेशा तैयार हैं! अगर आप भी हमारे काम में मदद करना चाहते हैं तो कोई भी सहयोग राशि प्रदान करके हमारी मदद कर सकते हैं-हर तरह की सहायता बहुमूल्य होती है!

3 तरह के लोग, जो हमारे आश्रम में रहना पसंद करते हैं – 12 फरवरी 2015

कल मैंने आपको बताया था कि हमारे पास धार्मिक रुचियों वाले कई लोगों के ईमेल आते हैं, जो हमारे आश्रम आना चाहते हैं लेकिन स्वाभाविक ही उनकी धार्मिक अपेक्षाओं को पूरा करना हमारे लिए संभव नहीं होता। मैंने यह भी बताया था कि कैसे उनके ईमेल या चिट्ठियों की पंक्तियों से या उनकी भाषा से ही आप उनके सोच की दिशा और उनके इरादे भाँप सकते हैं। यह सही है कि आश्रम आने की इच्छा व्यक्त करते हुए कभी-कभी हमें ऐसे सन्देश प्राप्त होते हैं लेकिन अधिकतर संदेश ऐसे लोगों के होते हैं, जो इनसे ठीक विपरीत विचार और भावनाएँ रखते हैं।

वास्तव में दूसरी तरह के ईमेल हमारे पास ज़्यादा आते हैं। खुले तौर पर धार्मिक लोगों के अलावा, जिनके बारे में मैंने कल लिखा था, तीन तरह के लोगों से आज आपको मिलवाना चाहता हूँ, जो हमसे आश्रम के बारे में पूछताछ करते हैं।

1) सामान्य स्त्री पुरुष जो तनाव मुक्ति की खोज में यहाँ आते हैं

पहले 'वर्ग' में वही 'मुख्यधारा' के लोग होते हैं, जो कॉर्पोरेट दुनिया की तनाव और भागदौड़ वाली ज़िन्दगी से ऊबकर और अपने काम की, घर की और आम जीवन की गुमनामी से आजिज़ आकर सुकून की खोज में यहाँ आते हैं। ये लोग जीवन में अकेलापन और अवसाद महसूस करते हैं और शान्ति, तनाव मुक्ति, यहाँ तक कि अपनी शारीरिक तकलीफों के इलाज के लिए यहाँ आते हैं। वे ऐसे उपाय चाहते हैं, जिनकी सहायता से उनके विभिन्न व्यसनों, शारीरिक व्याधियों का इलाज हो सके, कुछ ऐसे व्यायाम सीख सकें, जो उन्हें उनके मौजूदा दर्द से राहत प्रदान कर सकें और भविष्य में भी उन्हें होने से रोक सके।

निश्चय ही हर तरह के लोगों के लिए हमारे दरवाज़े खुले हैं क्योंकि हम जानते हैं कि योग और आयुर्वेद विज्ञान के अंग हैं, जो न सिर्फ शारीरिक व्याधियों में बल्कि मानसिक शान्ति के लिए भी बहुत उपयोगी हैं। हमारे आश्रम में कुछ दिन ठहरकर ही उन्हें बहुत लाभ हो सकता है-और हम जीवन के हर पड़ाव पर स्थित, हर स्तर के, हर क्षेत्र में काम करने वाले और हर जगह के लोगों को मित्र बनाकर और उनके बारे में जानकर खुश होते हैं!

2) स्वास्थ्य-सचेत लोग जिन्हें अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करने की लालसा होती है

हमसे पूछताछ करने वाले दूसरे प्रकार के लोग वे होते हैं, जो अपने शरीर और इस धरती के लिए निरापद वैकल्पिक जीवन-चर्या में रुचि रखते हैं। वे निरामिष, शाकाहारी, कच्चा खाने वाले, चिकित्सक, मालिश इत्यादि और वैकल्पिक चिकित्सा में दिलचस्पी रखने वाले और ऐसे ही कई तरह के लोग होते हैं। कोई भी, जो यह जानता है कि योग और आयुर्वेद उसे एक और दृष्टिकोण, अतिरिक्त ज्ञान और बहुत सी नई टिप्स और जीवन-शैली से परिचित कराएगा, उन्हें जानने-समझने में मदद करेगा, जीवन में नए परिवर्तन लाने में सहायक होगा।

हम इन लोगों का खुले मन से, बाहें फैलाकर स्वागत करते हैं और हमारे पास जो कुछ भी है, उनके साथ साझा करके खुश होते हैं और हम खुद भी उनके ज्ञान और अनुभवों से बहुत कुछ सीखते हैं। ज्ञान का आदान-प्रदान और एक दूसरे की सहायता-शानदार!

3) भारत यात्रा का सपना देखने वाले गूढ़ और रहस्यमय हिप्पी

गूढ़ और रहस्यमय बातों में रुचि रखने वाले लोग अगले वर्ग में आते हैं। ये लोग अपने आपको आध्यात्मिक या रूहानी कहते हैं लेकिन धार्मिक कहलाना पसंद नहीं करते। जो पुरुष और महिलाएँ दर्शन-शास्त्र और एक अलग तरह की जीवन-शैली में रुचि रखते हैं, जो दूसरों से, अपने समाज से अपने आपको ‘कुछ खास और अलग’ पाते हैं और उनके साथ तालमेल नहीं बिठा पाते। अपने आपकी खोज में वे अक्सर लंबी यात्राएँ करने के लिए तैयार होते है। इस बात को समझने के लिए कि आखिर वे क्या चाहते हैं, वे कौन हैं और उन्हें कौन सी बात खुश कर सकती है। वे अपने जीवन का गहरा अर्थ खोजना चाहते हैं और उसे योग और आयुर्वेद के माध्यम से समझने की कोशिश करने के लिए तत्पर हैं।

मैं हिप्पी शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ लेकिन बहुत से लोग, भले ही इस वर्ग में आते हों, अपने आपको इस नाम से जोड़ना नहीं चाहेंगे और इस ओर ध्यान नहीं देंगे। मैं जानता हूँ कि इन लोगों के लिए भी हमारे दिल खुले हुए हैं और हमें इस बात की खुशी है कि अक्सर हम इन लोगों के लिए स्वर्ग साबित हो सकते हैं, ऐसी शीर्ष जगह, भारत में आने के बाद जिनके यहाँ वे निःसंकोच भ्रमण कर सकते हैं-क्योंकि अक्सर देखा यह गया है कि यह देश उनकी उम्मीदों से बिल्कुल अलग सिद्ध होता है। जैसा कि मैंने कल बताया, निश्चय ही हमारे आश्रम में उन्हें एक ऐसी जगह मिल जाती हैं, जहाँ धार्मिक कट्टरता और कूपमंडूकता का कोई स्थान नहीं है। इस दीवाने मुल्क से हम धीरे-धीरे उनका परिचय करवाते हैं और अपने जीवन में उन्हें शामिल करके, अपने प्यार और जीवंतता से उन्हें अपना बनाकर, हम आशा करते हैं कि उनकी तलाश में, उनकी खोज में उनकी मदद कर सकेंगे।

जब आप एक दो साल की बच्ची को भी फुसला नहीं पाते – 26 अगस्त 2014

अगर आप नियमित रूप से मेरे ब्लॉग पढ़ते हैं तो आपने मेरी बेटी अपरा के बारे में अवश्य पढ़ा होगा। जबकि अक्सर मैं उसके जिंदादिल और खुशमिजाज़ स्वभाव के बारे में लिखता रहता हूँ, संभव है आपकी नज़र उन ब्लोगों पर न पड़ी हो, जो बच्चों की अस्वस्थता और परिणामस्वरूप उनके अभिभावकों को होने वाली दिक्कतों के बारे में मैं कभी-कभार लिखता रहा हूँ। आज आप वैसा ही कुछ पढ़ने वाले हैं और इसका कारण है, अपरा का अस्वस्थ होना। तीन दिन से वह बुखार से पीड़ित है और अढ़ाई साल के जीवन में सिर्फ तीसरी बार उसे बुखार आया है।

जी हाँ, हमारी बिटिया वाकई बहुत स्वस्थ है और अभी तीन दिन पहले तक वह सिर्फ दो बार बीमार पड़ी थी। हाँ, कभी-कभार सर्दी-खाँसी तो होती रही मगर बुखार का हमें ज़्यादा अनुभव नहीं है-और यह हमारे लिए ख़ुशी की बात ही है! हम न सिर्फ यह देखकर खुश हैं कि अपरा की रोग-प्रतिरोधक क्षमता काफी अच्छी है, जो लगभग हर तरह की बीमारियों को उससे दूर रखती है बल्कि इसलिए भी कि वह कुछ दूसरी बीमारियों का महज़ तेज़ बुखार की मदद से खात्मा कर देती है, वह भी रात की गहरी नींद में। एक बार उसे चेचक भी निकल चुकी है मगर उसे भी उसने बिना किसी विशेष परेशानी के आसानी के साथ झेल लिया था।

लेकिन अभी तीन दिन पहले अचानक उसे दो-चार छींकें आईं और हाथ लगाकर देखा तो उसका बदन गर्म था। समझ गया कि वह इस तरह चिड़चिड़ा क्यों रही है, स्वाभाविक ही वह स्वस्थ नहीं थी, बाहर खेलना भी उसे मंज़ूर नहीं था जबकि जब से हम जर्मनी से वापस आए हैं, वह रोज़ दिन भर बाहर बच्चों के साथ खेलती रही है।

खैर, शुरू में हम सोचते रहे कि उसके शरीर को बीमारी से खुद जूझने का मौका दिया जाए। आखिर थोड़ा-बहुत बुखार आना बीमारी के विरुद्ध शरीर की नैसर्गिक प्रतिक्रिया ही मानी जाती है, जो अपनी ऊष्मा से बाहरी घुसपैठियों का खात्मा करती है। कुछ किताबें, एकाध विडिओ और बहुत सारा ध्यानाकर्षण- कुछ देर अपरा अपनी बीमारी का पूरा मज़ा लेती रही। हालाँकि बहती नाक और लगातार छींकें उसे बेचैन कर रहे थे। जब भी उसे छींक आती या नाक से पानी निकलकर बाहर आने लगता वह झुंझलाकर चीख उठती! पिंडलियों पर पानी की ठंडी पट्टियों ने बुखार को कुछ देर अवश्य काबू में रखा हुआ था।

लेकिन जब बुखार बढ़ने लगा, हमने उसे बुखार की सामान्य दवाएँ देने का निर्णय किया-बच्चों के लिए विशेष रूप से तैयार मीठा, संतरे का खुशबूदार सिरप। स्वादिष्ट, मज़ेदार, बिलकुल फलों के मीठे रस जैसा! लेकिन सिर्फ कहने के लिए, अपरा के लिए नहीं! उसने शीशी देखते ही नाक-भौं सिकोड़ी और सीधे, साफ़ शब्दों में पीने से इन्कार कर दिया। उसे मनाने की हमारी सारी कोशिशें नाकाम रहीं। जब हमने कहा कि इसे पीने से वह जल्दी ठीक हो जाएगी तो उसका जवाब था 'मैं तो पहले से ठीक हूँ! देखो, बुखार चला गया!' सुनने में अच्छा लग रहा था मगर तापमापी कुछ और ही बयाँ कर रही थी!

फिर दिमाग की ट्यूब लाइट जल उठी: सिरप की जगह गोली पीस के खिला देते हैं! पीस के दाल में, रोटी में, शहद में, किसी भी खाने की चीज़ में मिलाकर खिला देते हैं! जी हाँ, यह कोशिश भी की मगर फिर बुरी तरह असफल रहे। या तो हमारी बिटिया दवाई को लेकर बेहद शक्की है या फिर इतनी शातिर कि हमारे लिए उसे मूर्ख बनाना असंभव है-किसी में भी मिलाकर दो, वह उसमें दवाई के बारीक से बारीक गुलाबी कतरे भी ढूँढ़ निकालती थी। इस प्रक्रिया में कई गोलियाँ बरबाद करने के बाद हमने हार मान ली।

अंत में हम लोग पूर्णेंदु के बिस्तर पर बैठे आपस में चर्चा कर रहे थे कि अगर बुखार और तेज़ होता है तो क्या किया जाए। खैर, फिर तो हमें डॉक्टर के पास ही जाना पड़ेगा। हम इस विचार के पक्ष में बिल्कुल नहीं थे कि मामूली बुखार के लिए डॉक्टर के पास जाएँ क्योंकि फिलहाल बुखार ज़्यादा गंभीर नहीं हुआ था!

लेकिन अपरा ने हमारी बात सुन ली और जोर से बोली-नहीं! और अब भी पूर्णेंदु के सामने पड़ी गोली की तरफ लपकी। चकित होकर पूर्णेंदु ने उसे गोली दिखाई, अपरा ने मुँह खोला और पानी के एक घूँट के साथ उसे गटक लिया!

इससे मैंने क्या सीखा? तर्कबुद्धि का इस्तेमाल करो। थोड़ा तरकीब लगाओ! थोड़ा-बहुत ब्लैकमेलिंग भी चलेगी! अढ़ाई साली की बच्ची से ज़्यादा शातिर बनने की कोशिश करो!

अब अपरा की खाँसी तो बनी हुई है मगर बुखार जाता रहा है। कल वह बाहर निकलकर बच्चों के साथ खेलती भी रही है-पूरी तरह अपनी रौ में, प्रसन्न और मस्त!

जब एक डॉक्टर कहे कि आप अपने बच्चे के साथ ज़्यादा समय गुज़ारें! 8 जुलाई 2014

ग्रान कनारिया में जिनसे भी हम मिले, स्वाभाविक ही सबके बीच अपरा बहुत लोकप्रिय हो गई थी। बातें करने में वह बहुत तेज़ है और वहाँ अधिकतर लोग हिन्दी या जर्मन नहीं जानते थे फिर भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ा। थोड़े बहुत अंग्रेज़ी के शब्दों के बल पर, जिन्हें वह जानती थी, और वहाँ के कुछ नए स्पैनिश शब्द लेकर, जिन्हें उसने बहुत शीघ्र सीख लिया था, वह सबसे बातचीत करने की कोशिश करती थी। उसकी इस करामात से जो लोग मंत्रमुग्ध रह गए थे उनमें एक महिला भी थी, जिसका एक दो साल का भतीजा भी था। वह बिल्कुल बोल नहीं पाता था। इसका जो कारण उसने बताया वह बड़ा दिलचस्प था!

यह बच्चा सिर्फ कुछ आवाज़ें ही निकाल पाता था और अभी हाल ही में माँ और पिता के लिए उपयोग में आने वाले शब्द और ‘हाँ’ और ‘ना’ बोलना सीख पाया था। और इतना भी तब, जब उसके अभिभावक उसे एक डॉक्टर को दिखाने ले गए और फिर उस डॉक्टर की सलाह पर चले! स्वाभाविक ही, अगर किसी का बच्चा दो साल की उम्र तक एक शब्द न बोल पाए तो माँ तो चिंतित होगी ही। उसने डॉक्टर से हर तरह की जाँच कारवाई। परिणाम: बच्चे में कोई खराबी नहीं पाई गई, न तो उसके कानों में, न उसकी अक्ल में और न ही उसके वोकल कोर्ड्स (वाकतंतुओं) में। उससे जो कुछ भी कहा जाता था, वह अच्छी तरह समझ रहा था। प्रतीत होता था कि बोलने के लिए जो कुछ भी आवश्यक था, उसके पास मौजूद था। तो फिर डॉक्टर ने उन्हें क्या सलाह दी?

उसने उस महिला से सिर्फ इतना कहा कि वह बच्चे के साथ ज़्यादा से ज़्यादा समय व्यतीत करे।

जी हाँ, उसका कहना था कि यही कारण है कि उसका बच्चा बोलने में बहुत धीमी प्रगति कर पा रहा है। दोनों अभिभावक रोज़ काम पर चले जाते थे, बच्चा एक क्रेच में चला जाता था और उसकी दादी या उसकी चाची उसे वहाँ से ले आती थी और उसके साथ बाकी का दिन समय बिताती थी। सिर्फ शाम को और सप्ताहांत में सारा परिवार इकट्ठा हो पाता था। धंधे की यात्राओं के कारण अक्सर यह अवसर भी नहीं मिल पाता था, कोई एक होता था और कुछ रिश्तेदार।

डॉक्टर ने कहा कि दादी या चाची दोनों से और क्रेच में दूसरे लड़कों से बात करना और बोलने के लिए वहाँ के शिक्षकों से मिलने वाला प्रोत्साहन भी बच्चे के विकास के लिए विशेष मानी नहीं रखता। बच्चे के लिए अपने माता-पिता के साथ समय बिताना बेहद आवश्यक है! उनसे बेहतर शिक्षक कोई नहीं हो सकता, उसके विकास में माता-पिता की भूमिका का कोई विकल्प या पर्याय नहीं है! अपने बच्चे के लिए समय निकालिए, उसके साथ अधिक से अधिक सक्रिय रहिए, उसे नई नई चीज़ें दिखाइए और प्रोत्साहित कीजिए कि वह उनके बारे में कुछ कहे, बात करे और ढाढ़स बंधाइए कि आप सिखाने के लिए उसके पास मौजूद हैं!

उस महिला पर मुझे दया आ रही है कि एक डॉक्टर को यह सब बताना पड़ा! शायद उसे बहुत बुरा लगा होगा, अपराध बोध भी हुआ होगा-कोई बच्चे के लालन-पालन के बारे में आपकी आलोचना करे यह अच्छा नहीं लगता लेकिन यह सुनना कि आप अपने बच्चे के प्रति लापरवाह हैं, उसकी उपेक्षा कर रही हैं, जबकि आप समझ रही हैं कि आप उसके लिए हर संभव अच्छा से अच्छा कर रही हैं, आपके लिए निश्चय ही बहुत असुविधाजनक और दुखद होगा! लेकिन आखिर उसका डॉक्टर के पास जाना ठीक ही रहा और यह भी कि डॉक्टर ने भी उससे सब कुछ साफ-साफ समझाकर कह दिया। यही उस बच्चे के लिए बहुत अच्छी बात थी!

अब यह महिला अपने काम पर कम समय बिताती है और बच्चे की हालत में सुधार दिखाई दे रहा है। दूसरे सभी अभिभावकों को इस कहानी से यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि उनके लिए बच्चों के साथ ज़्यादा और उपयोगी, सकारात्मक, सार्थक, अच्छा समय बिताना कितना आवश्यक है! अधिक से अधिक, जितना संभव हो उनके साथ रहें! दूसरी कोई भी बात इससे अधिक महत्वपूर्ण नहीं है!

एक मानसिक रूप से विक्षिप्त पिता के छह बच्चे – हमारे स्कूल के बच्चे – 23 मई 2014

मैं पहले ही आपका परिचय बबीता और सीमा से करवा चुका हूँ, जो अपने परिवार के साथ खेतों में रहने के लिए मजबूर हैं। बबीता का चाचा हमारे स्कूल की तीन अन्य लड़कियों का पिता है: गायत्री, त्रिवेणी और भूदेवी। जल्द ही उनकी चौथी बहन सपना भी उनमें शामिल हो जाएगी और हमारे स्कूल के लोअर के-जी में पढ़ने लगेगी।

गायत्री पंद्रह साल की है और त्रिवेणी, भूदेवी और सपना क्रमशः ग्यारह, नौ और सात साल की हैं। गायत्री पाँचवी कक्षा में और त्रिवेणी और भूदेवी, दोनों, दूसरी कक्षा में पढ़ती हैं। उनके सहोदर एक बहन और एक भाई और हैं, जो क्रमशः पाँच और तीन साल के हैं। पहली नज़र में ही यह लड़के की ख़्वाहिश और उसे पैदा करने के प्रयास में पाँच लड़कियां पैदा करने का सटीक उदाहरण लगता है। ज़्यादातर लोगों के लिए यह बिल्कुल समझ में आने वाली बात नहीं है, विशेष रूप से इसलिए कि वे इतने गरीब हैं कि अपने बच्चों को एक सामान्य स्कूल में भेज पाना भी उनके लिए संभव नहीं हो पा रहा है। लेकिन जब आप उनके परिवार को ज़्यादा करीब से देखते हैं तो एक और पहलू नज़र आता है, जिसके बाद इस मामले को समझना और भी मुश्किल हो जाता है: इन बच्चों का पिता मानसिक रूप से विक्षिप्त है।

गायत्री की माँ ने बताया कि उनका विवाह 21 साल पहले हुआ था। लगभग 18 साल पहले, यानी उनकी बड़ी बेटी, गायत्री के जन्म से दो साल पहले, उसके पति को मिर्गी के दौरे पड़ना शुरू हो गए और सामान्य होने से पहले वह लगभग पागलपन का व्यवहार करने लगता था। पागलपन के दो दौरों के बीच का अंतराल धीरे-धीरे कम से कमतर होने लगा और फिर वह पूरे समय के लिए अजीबोगरीब और सनकी व्यवहार करने लगा। वे लोग उसे डॉक्टर के पास ले गए, आगरा और दिल्ली में इलाज कराया, बहुत सी दवाइयाँ उसे लेनी पड़ीं मगर कोई लाभ नहीं हुआ है-ऐसा लगता था कि वह किसी दूसरी दुनिया में रह रहा है, दिन भर पागलों की तरह इधर-उधर भटकता रहता था और साफ पता चलता था कि उसका विक्षित मस्तिष्क ही उससे ऐसा असामान्य व्यवहार करवाता है।

जो आदमी अब अपनी बैलगाड़ी भी चला नहीं पाता, जो कोई काम नहीं करता, जो कुछ कमाता नहीं है, उस आदमी से उसकी पत्नी के छह बच्चे हैं! अगर पहला बच्चा लड़का होता तो शायद वह एक ही बच्चा पैदा करती।

अब उनकी परवरिश की ज़िम्मेदारी गायत्री के पिता के सात भाइयों पर आ गई है और उनका परिवार अपने खेतों में रहने के लिए मजबूर हैं और अपनी भैंस का दूध बेचकर किसी तरह अपना खर्च चला रहे हैं। कभी-कभी, जब पैदावार अच्छी होती है तो वे थोड़ा-बहुत अनाज और सब्जियाँ बेचकर भी कुछ रुपये कमा लेते हैं। लेकिन क्योंकि खेत उस परिवार की साझा संपत्ति है, इस बात पर सहमति बनना आसान नहीं होता कि किसे कितना रुपया प्राप्त होगा। कुल मिलाकर, उस परिवार की मासिक आमदनी 35 डालर यानी लगभग 2000 रुपए है और इस आमदनी पर आठ लोगों का परिवार गुज़ारा करता है।

फिर भी, ये लड़कियां हमारे स्कूल की सबसे ज़्यादा खुशमिजाज़ विद्यार्थी हैं। वे अपने खेत वाले घर के प्राकृतिक वातावरण में रहती हैं, जहां हर तरफ हरियाली फैली होती है, हालांकि कभी-कभी वहाँ खतरनाक सांप भी निकल आते हैं, जो उनके सुकून में खलल पैदा करते रहते हैं! स्कूल में दोनों छोटी लड़कियां हमेशा अपनी चचेरी बहनों, सीमा और बबीता के साथ साथ दिखाई देती हैं, जबकि गायत्री की कुछ अच्छी सहेलियाँ भी बन गई हैं, जो उसके साथ उसकी कक्षा में पढ़ती हैं।

अगर आप इन बच्चों जैसे दूसरे बच्चों की मदद करना चाहते हैं तो आप उन बच्चों का भविष्य सँवारने के हमारे काम में हाथ बंटाकर ऐसा कर सकते हैं: किसी एक बच्चे को प्रायोजित कीजिए या बच्चों के एक दिन के भोजन का खर्च वहन कीजिए! हर तरह की मदद अंततः उनके लिए उपयोगी सिद्ध होती है!

सेक्स और वज़न कम होने के बीच संबंध! 22 मई 2014

आज मैं एक रोचक नज़रिये की चर्चा करते हुए एक ऐसा काम करूंगा, जिसे करने से मैं सामान्यतः कतराता हूँ: आपको एक सलाह दूंगा। जी हाँ, अपना वज़न कैसे कम करें, इस पर सलाह!

यह अमूल्य ज्ञान प्राप्त किए अब काफी समय व्यतीत हो चुका है: वज़न कम करने के इस रामबाण उपाय का गूढ़ रहस्य, इस बात की असलियत कि क्यों कुछ लोग थोड़ा सा खाकर भी मोटे होते चले जाते हैं जबकि कुछ लोग खाते चले जाते हैं, खाते चले जाते हैं मगर उनकी सुडौल देहयष्टि पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

जिस महिला ने इतनी दया और उदारतापूर्वक अपना ज्ञान मुझसे साझा किया वह स्वयं भी काफी मोटी थी। जब हमारी चर्चा का रुख इस तथ्य की ओर मुड़ा तो उसके पास इसका बहुत स्पष्ट कारण मौजूद था: मुझे सेक्स उपलब्ध नहीं है! मेरी सभी सहेलियाँ दुबली-पतली हैं और मैं इसका कारण जानती हूँ: उनका यौन जीवन बहुत अच्छा है! मैं सेक्स से दूर रहती हूँ-इसलिए मोटी हूँ!

अब आप कल्पना कर सकते हैं कि मैं आज उन लोगों से, जो मोटापे की समस्या से परेशान हैं, क्या कहना चाहता हूँ: खूब सेक्स करें! जी हाँ, मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि, भले ही आप किसी व्यायामशाला में नहीं जाना चाहते, सबेरे उठकर खुली हवा में दौड़ना नहीं चाहते, आपके पास साइकिल चलाने का समय नहीं है तो इस व्यायाम की तरफ मुड़ें और आप इसके असर को पसंद करेंगे!

यह वज़न कम करने का सबसे अच्छा तरीका है: यह आपकी खुराक पर असर नहीं डालता, आप इसे बिस्तर पर लेटे-लेटे कर सकते हैं, ऑफिस में कर सकते हैं, रसोई में या और कहीं भी कर सकते हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात, अगर आप इसे ठीक से और प्रेम से करें तो इससे ज़्यादा आनंददायक काम कोई दूसरा नहीं हो सकता!

निश्चय ही, अगर आप उसका पूरा-पूरा लाभ उठाना चाहते हैं तो कुछ नियमों का आपको पालन करना होगा: कभी भी इसे बेमन से न करें, अपनी पूरी शक्ति और पूरा ध्यान उस पर लगाएँ, आलस्य न दिखाएँ और यह सुनिश्चित करें कि आप दोनों ही इस यौन-व्यायाम का पूरा-पूरा मज़ा ले रहे हैं!

इस व्यायाम के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि यह किसी साथी या सहभागी के साथ ही पूरी तरह असरकारक हो सकता है। लेकिन दोनों में से किसी को भी इसके पूर्वज्ञान की आवश्यकता नहीं होती, इसका पता सहज ही दोनों को हो जाता है। सच्चाई यह है कि यह व्यायाम किसी कम अनुभवी सहभागियों के साथ करना ज़्यादा आनंददायक होता है। वास्तव में यह वज़न कम करने के आपके प्रयास में ज़्यादा असरकारक सिद्ध होगा।

आप अपने अभ्यास को और सुधार सकते हैं; अपने प्रशिक्षण की और गहराई में जाएँ और यहाँ तक कि एक-एक कर अपने शरीर के हर हिस्से पर ध्यान केन्द्रित करें। और जितना ज़्यादा आप यह व्यायाम करेंगे, उतना ही आपकी जांघें, नितंब और पेट सुगठित आकार ग्रहण करेंगे!

तो, मुझे उम्मीद है कि मैं आपको अपनी अनावश्यक चर्बी को कम करने के इस तरीके पर राज़ी करने में सफल हुआ हूँ। मैं इस तरीके का कायल भी हूँ और उसका उत्साही समर्थक भी-और, यह देखते हुए कि मेरी पत्नी ने मुझसे मिलने के बाद कम से कम दस किलोग्राम वज़न कम किया है, निश्चय ही मैं एक बहुत प्रसन्न व्यक्ति भी हूँ। 🙂

जब अपरा डॉक्टर, नर्स और मरीज़ बनी! 6 मई 2014

तो कल हमने एक छोटा सा चक्कर अस्पताल का लगाया और डॉक्टर से अपने घुटने के जख्म टांके कटवाकर वापस आए। उसने अगले कुछ दिनों या हफ्तों के लिए कुछ और हिदायतें दीं हैं। फिजियोथेरपिस्ट के साथ लगातार गहन और बहुत थकाऊ सत्रों के बाद मुझे पक्का विश्वास है कि जर्मनी के लिए उड़ान भरते वक़्त तक मैं पूरी तरह स्वस्थ हो जाऊंगा। और हाँ, अपरा भी तब तक एक प्रशिक्षित फिजियोथेरपिस्ट और डॉक्टर बन चुकी होगी!

यह देखकर आश्चर्य होता है कि अपने आसपास का जायजा लेते हुए, हर चीज़ का बारीकी से अवलोकन करते हुए भी बच्चे कितना आनंद प्राप्त कर लेते हैं! अस्पताल में डॉक्टर से मेरी पहली मुलाक़ात से ही अपरा मेरे पूरे इलाज को बारीकी के साथ देखती रही है और स्वाभाविक है कि डॉक्टरों, नर्सों के अलावा बहुत से मरीजों की नकल करना भी सीख गई है।

अस्पताल की पहली रात या उससे कुछ पहले, जब घुटने का दर्द कुछ ज़्यादा ही था, वह मेरी दर्दभरी आहों, कराहों की नकल करती रहती थी। रमोना मुझे टॉयलेट ले जाती है और जब हम बाहर निकलते हैं तो अपरा को मेरे बिस्तर पर लेटे हुए 'आह', 'ऊँह' करता पाते हैं, जैसे उसे भी दर्द हो रहा हो। रमोना उसकी ओर देखती है तो पाती है कि वह अपने बाएँ घुटने को दोनों हाथों से जकड़े हुए है और दर्द से दोहरी हुई जा रही है। जब वह अपनी माँ को अपनी तरफ मुसकुराते हुए देखती है तो खुद भी हँसे बगैर नहीं रह पाती।

पिछले दस दिन से उसकी गुड़िया बेचारी को पीठ में बहुत दर्द है, पेट में भी और सारे शरीर में कहीं भी दर्द होता रहता है और कभी मच्छर काट लेते हैं तो कभी वह गिर जाती है और टांग तुड़वा बैठती है और उसकी टांग में फ्रेक्चर हो जाता है तो कभी ज़्यादा मिठाई खाने के कारण पेट गड़बड़ हो जाता है। उसे ये तकलीफ़ें सहनी पड़ती हैं, जिससे अपरा उसका इलाज कर सके: उसके ज़ख़्मों पर मरहम लगा सके, सुई लगा सके, पेट में चीरा लगाकर टॉफियाँ बाहर निकाल सके, टांके लगाकर पेट सी सके, उसका तापमान ले सके, बहुत सारी तरह-तरह की दवाइयाँ खिला सके, पट्टियाँ बांध सके और उसकी मालिश भी कर सके।

जब मैंने अपनी पट्टियाँ निकालीं, वह बहुत कुतूहल के साथ देखती रही कि उसके नीचे क्या है और उसके नीचे बड़ा सा बैंड-एड चिपका हुआ देखकर बुरी तरह निराश हुई क्योंकि पट्टियों के नीचे जख्म को ढंकने के लिए बैंड-एड भी लगाया गया था। जब उसे पता चला कि पट्टियाँ लपेटकर रखने की अब ज़रूरत नहीं है तो उसकी निराशा कुछ दूर हुई! पहले गुड़िया को भी पूरा बैंडेज लपेटा जाता था और वह अपनी माँ से उसके पैरों को ढंकने के लिए कहती थी क्योंकि उसके घुटने में चोट लगी है।

हाँ, इस तरह जब मैं पहली बार आश्रम के दरवाजे तक चलकर गया, अपरा भी मेरे पीछे आई, मेरी तरह लंगड़ाते हुए, अपनी माँ का हाथ पकड़े क्योंकि तब तक मैं बैसाखी के सहारे चलने लगा था। इस अभिनय में उसे काफी मशक्कत करनी पड़ रही थी-आखिर स्वस्थ पैरों से लंगड़ाना हंसी-खेल नहीं था! मैंने उससे पूछा कि क्या हुआ तो उसने कहा कि उसके पैर में चोट लग गई है। 'कैसे?' मैंने पूछा तो उसने कहा, 'ऐसे!', और उसने हवा में उछलकर दिखाया कि 'ऐसे'! उछलकर दिखाते समय वो बिलकुल भूल गई थी कि उसके पैर में तो चोट लगी है और उसे तो लंगड़ाना है परन्तु इस प्रदर्शन के बाद वह पुनः लंगड़ाकर चलने लगी। फिर जब हम रास्ते के छोर तक पहुंचे तो मैं एक बिस्तर पर बैठ गया और वह भी मेरे करीब आकर बैठ गई, जैसे उसका पैर भी अब थक गया हो।

उसने सबसे प्यारा अभिनय तब पेश किया जब एक दिन अधिक व्यायाम के चलते मेरी मांसपेशियाँ कुछ ज़्यादा ही दर्द कर रही थी: वह बहुत सतर्कता बरतते हुए कि अनजाने में मुझे चोट न पहुंचा बैठे, मेरे पैरों के पास बैठ गई और धीरे से मेरे पंजे अपने हाथों में लेकर उन्हें पीछे और आगे सरकाने लगी, जैसा कि फिजियोथेरपी के दौरान उसने अपनी माँ को करते हुए देखा था। इस अभिनय के साथ वह एक गीत भी गुनगुनाती जाती: जल्दी ठीक हो जाओ, मैं तुम्हें ठीक कर रही हूँ, अब बिलकुल दर्द नहीं होगा!

उसकी ये सब हरकतें और विशेष रूप से जिसका मैंने आखिर में ज़िक्र किया है, उसे देखकर मेरा दिल मेरी इस बच्ची के लिए एक बार फिर पसीज उठता है। और फिर चाहे मेरी मांसपेशियों में कितना भी दर्द हो, जब वह सिर उठाकर पूछती है, "दर्द ठीक हुआ?" तो मैं सिर्फ यही कहता हूँ: "हाँ, बिल्कुल! तुमने इतनी मदद की, अब मेरा दर्द बिल्कुल ठीक हो गया है!"