जब आप एक दो साल की बच्ची को भी फुसला नहीं पाते – 26 अगस्त 2014

अगर आप नियमित रूप से मेरे ब्लॉग पढ़ते हैं तो आपने मेरी बेटी अपरा के बारे में अवश्य पढ़ा होगा। जबकि अक्सर मैं उसके जिंदादिल और खुशमिजाज़ स्वभाव के बारे में लिखता रहता हूँ, संभव है आपकी नज़र उन ब्लोगों पर न पड़ी हो, जो बच्चों की अस्वस्थता और परिणामस्वरूप उनके अभिभावकों को होने वाली दिक्कतों के बारे में मैं कभी-कभार लिखता रहा हूँ। आज आप वैसा ही कुछ पढ़ने वाले हैं और इसका कारण है, अपरा का अस्वस्थ होना। तीन दिन से वह बुखार से पीड़ित है और अढ़ाई साल के जीवन में सिर्फ तीसरी बार उसे बुखार आया है।

जी हाँ, हमारी बिटिया वाकई बहुत स्वस्थ है और अभी तीन दिन पहले तक वह सिर्फ दो बार बीमार पड़ी थी। हाँ, कभी-कभार सर्दी-खाँसी तो होती रही मगर बुखार का हमें ज़्यादा अनुभव नहीं है-और यह हमारे लिए ख़ुशी की बात ही है! हम न सिर्फ यह देखकर खुश हैं कि अपरा की रोग-प्रतिरोधक क्षमता काफी अच्छी है, जो लगभग हर तरह की बीमारियों को उससे दूर रखती है बल्कि इसलिए भी कि वह कुछ दूसरी बीमारियों का महज़ तेज़ बुखार की मदद से खात्मा कर देती है, वह भी रात की गहरी नींद में। एक बार उसे चेचक भी निकल चुकी है मगर उसे भी उसने बिना किसी विशेष परेशानी के आसानी के साथ झेल लिया था।

लेकिन अभी तीन दिन पहले अचानक उसे दो-चार छींकें आईं और हाथ लगाकर देखा तो उसका बदन गर्म था। समझ गया कि वह इस तरह चिड़चिड़ा क्यों रही है, स्वाभाविक ही वह स्वस्थ नहीं थी, बाहर खेलना भी उसे मंज़ूर नहीं था जबकि जब से हम जर्मनी से वापस आए हैं, वह रोज़ दिन भर बाहर बच्चों के साथ खेलती रही है।

खैर, शुरू में हम सोचते रहे कि उसके शरीर को बीमारी से खुद जूझने का मौका दिया जाए। आखिर थोड़ा-बहुत बुखार आना बीमारी के विरुद्ध शरीर की नैसर्गिक प्रतिक्रिया ही मानी जाती है, जो अपनी ऊष्मा से बाहरी घुसपैठियों का खात्मा करती है। कुछ किताबें, एकाध विडिओ और बहुत सारा ध्यानाकर्षण- कुछ देर अपरा अपनी बीमारी का पूरा मज़ा लेती रही। हालाँकि बहती नाक और लगातार छींकें उसे बेचैन कर रहे थे। जब भी उसे छींक आती या नाक से पानी निकलकर बाहर आने लगता वह झुंझलाकर चीख उठती! पिंडलियों पर पानी की ठंडी पट्टियों ने बुखार को कुछ देर अवश्य काबू में रखा हुआ था।

लेकिन जब बुखार बढ़ने लगा, हमने उसे बुखार की सामान्य दवाएँ देने का निर्णय किया-बच्चों के लिए विशेष रूप से तैयार मीठा, संतरे का खुशबूदार सिरप। स्वादिष्ट, मज़ेदार, बिलकुल फलों के मीठे रस जैसा! लेकिन सिर्फ कहने के लिए, अपरा के लिए नहीं! उसने शीशी देखते ही नाक-भौं सिकोड़ी और सीधे, साफ़ शब्दों में पीने से इन्कार कर दिया। उसे मनाने की हमारी सारी कोशिशें नाकाम रहीं। जब हमने कहा कि इसे पीने से वह जल्दी ठीक हो जाएगी तो उसका जवाब था 'मैं तो पहले से ठीक हूँ! देखो, बुखार चला गया!' सुनने में अच्छा लग रहा था मगर तापमापी कुछ और ही बयाँ कर रही थी!

फिर दिमाग की ट्यूब लाइट जल उठी: सिरप की जगह गोली पीस के खिला देते हैं! पीस के दाल में, रोटी में, शहद में, किसी भी खाने की चीज़ में मिलाकर खिला देते हैं! जी हाँ, यह कोशिश भी की मगर फिर बुरी तरह असफल रहे। या तो हमारी बिटिया दवाई को लेकर बेहद शक्की है या फिर इतनी शातिर कि हमारे लिए उसे मूर्ख बनाना असंभव है-किसी में भी मिलाकर दो, वह उसमें दवाई के बारीक से बारीक गुलाबी कतरे भी ढूँढ़ निकालती थी। इस प्रक्रिया में कई गोलियाँ बरबाद करने के बाद हमने हार मान ली।

अंत में हम लोग पूर्णेंदु के बिस्तर पर बैठे आपस में चर्चा कर रहे थे कि अगर बुखार और तेज़ होता है तो क्या किया जाए। खैर, फिर तो हमें डॉक्टर के पास ही जाना पड़ेगा। हम इस विचार के पक्ष में बिल्कुल नहीं थे कि मामूली बुखार के लिए डॉक्टर के पास जाएँ क्योंकि फिलहाल बुखार ज़्यादा गंभीर नहीं हुआ था!

लेकिन अपरा ने हमारी बात सुन ली और जोर से बोली-नहीं! और अब भी पूर्णेंदु के सामने पड़ी गोली की तरफ लपकी। चकित होकर पूर्णेंदु ने उसे गोली दिखाई, अपरा ने मुँह खोला और पानी के एक घूँट के साथ उसे गटक लिया!

इससे मैंने क्या सीखा? तर्कबुद्धि का इस्तेमाल करो। थोड़ा तरकीब लगाओ! थोड़ा-बहुत ब्लैकमेलिंग भी चलेगी! अढ़ाई साली की बच्ची से ज़्यादा शातिर बनने की कोशिश करो!

अब अपरा की खाँसी तो बनी हुई है मगर बुखार जाता रहा है। कल वह बाहर निकलकर बच्चों के साथ खेलती भी रही है-पूरी तरह अपनी रौ में, प्रसन्न और मस्त!

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