मोनिका और अस्पताल में उसकी रूममेट – खुशी का अलग-अलग नज़रिया – 27 मई 2015

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

जब हम मोनिका के साथ अस्पताल में थे तो उसके पड़ोस में एक मलावी की 15 साल की लड़की भी भर्ती थी, जो अपनी माँ के साथ अपने दिल के दो वॉल्व बदलवाने भारत आई थी और कुल मिलाकर दो माह यहाँ रहने वाली थी। जब दोनों लड़कियाँ आपस में बात करतीं तो मैं सोचता कि दोनों लड़कियाँ अलग-अलग कारणों से अस्पताल आई हैं और पता नहीं एक-दूसरे की चिकित्सा संबंधी समस्याओं को जानने के बाद दोनों अपने-अपने बारे में क्या महसूस करती होंगी। और दोनों को इतनी विकट समस्याओं से ग्रसित देखने के बाद हमें, हम जैसे ‘स्वस्थ’ लोगों को अपने बारे में क्या और कैसा महसूस करना चाहिए।

दोनों लड़कियाँ अपनी-अपनी समस्याओं से काफी समय से पीड़ित हैं और उनकी बीमारी के कारण उनके परिवार भी बहुत दुखी हैं। दोनों की शल्यक्रियाएँ एक ही अस्पताल में हुई हैं, एक कई देशों को पार करके बेहतर इलाज और अच्छी सेवाओं की आस में यहाँ आई है और दूसरी पास ही से यहाँ पहुँची है। दोनों की शल्यक्रियाएँ सफल रही हैं लेकिन दोनों को पूरी तरह स्वस्थ होने में अभी काफी वक़्त लगेगा।

कौन ज़्यादा तकलीफ में है और कौन कम पीड़ित है?

मोनिका का चकत्तों से भरा चेहरा और बड़ी-बड़ी सफ़ेद पट्टियों में लिपटा शरीर देखकर उस किशोर अफ़्रीकी लड़की के मन में क्या आता होगा, मैं इसकी कल्पना भर कर पा रहा हूँ। सहानुभूति, शायद दया? शायद वह सोचती होगी: ‘मेरे शरीर पर भी दो बड़े-बड़े निशान हैं मगर कम से कम उन्हें कोई देख नहीं सकता!’ मुझे लगता है, निश्चित ही वह अपनी साफ़, बिना जली त्वचा में बड़ी खुश होगी।

दूसरी तरफ मोनिका उसके साथ वाले बिस्तर के पास खड़ी लड़की की ओर देखती है, जो अचानक अपना हाथ अपनी छाती पर दबा लेती है-दर्द उसके चेहरे पर पल भर के लिए उभरता है और फिर सामान्य हो जाता है। अब सिर्फ शल्यक्रिया का ज़ख्म ही दर्द करता है लेकिन इस दर्द से उपजे डर की आप कल्पना कर सकते हैं क्योंकि वह जानती है कि उसका दिल पूरी तरह उसका अपना असली दिल नहीं है बल्कि उसके दो वॉल्व बदले गए हैं और वह अभी भी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हुआ है! उसकी धड़कन कभी भी रुक सकती है और कृत्रिम अवयव अचानक काम करना बंद कर सकते हैं। ‘कम से कम मेरे ज़ख्म और चकत्ते सिर्फ बाहरी हैं!’ मोनिका महसूस करती होगी। देखने में अच्छे नहीं लगते मगर जान का उसमें कोई जोखिम नहीं है!

दोनों लड़कियाँ जल्द ही ठीक हो जाएँगी, फिर से खेलने-कूदने लगेंगी और जीवन का मज़ा लेंगी-क्योंकि चाहे कुछ भी हो, बच्चे यही करते हैं। दोनों बहुत सुंदर हैं, छोटे, बड़े, दो या कई सारे चकत्तों के बावजूद। दोनों एक-दूसरे की तरफ देखती हैं और अपने-अपने ज़ख़्मों की तुलना दूसरी के ज़ख़्मों से करती हैं। और जब हम उनकी तरफ देखते हैं तो हमें क्या नज़र आता है, हम क्या सोचते हैं और क्या महसूस करते हैं?

सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार अच्छी चीज़ है। यह मोनिका जैसी बच्ची के लिए बहुत लाभकारी हो सकता है, जिसे यह सब कभी न मिल पाता, अगर उसे संवेदनशील लोगों का सान्निध्य नहीं मिलता, उसके आसपास या दुनिया में सहानुभूतिपूर्ण और दयालु लोग नहीं होते!

इस सहानुभूतिपूर्ण रवैये से आपको कुछ वैसा प्राप्त होगा, जिसे सुकून या कृतज्ञता कहा जा सकता है। यह ख़ुशी कि आपके शरीर पर किसी प्रकार के चकत्ते नहीं हैं, यह संज्ञान कि आपकी समस्याएँ, दरअसल, इन किशोरवय लड़कियों की तुलना में कितनी छोटी, कितनी अमहत्वपूर्ण हैं!

मुझे लगता है कि बीच-बीच में हमें इन भावनाओं पर अपना ध्यान केन्द्रित करते रहना चाहिए: इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस परिस्थिति से दो-चार हैं, जिसकी आप शिकायत कर रहे हैं, कोई न कोई है, जो उससे भी अधिक विकट परिस्थिति में फँसा हुआ है लेकिन मजबूती और हिम्मत के साथ हँसते हुए उसका सामना कर रहा है! जी हाँ, वह खुश है क्योंकि उसकी सोच सकारात्मक है, वह जानता है कि कैसे जीवन की कदर की जाए, हर हाल में जीवन का मज़ा लिया जाए! आप परेशान हैं क्योंकि आपकी शक्ल वैसी नहीं है, जैसी आप कल्पना करते रहते हैं, अपनी नज़र में आप बदसूरत हैं क्योंकि आपके बाल झड़ते जा रहे हैं, आपकी छातियाँ बहुत छोटी-छोटी हैं या बहुत बड़ी हैं या आपकी मांसपेशियाँ वैसी सुडौल नहीं हैं, जैसी आप चाहते हैं। आप जीवन की छोटी-मोटी बातों के लिए दुखी हैं। अपनी सोच को विस्तार दीजिए, सामने मौजूद विशाल दृश्य पटल पर नज़र दौड़ाइए और यह समझने की कोशिश कीजिए कि आप जैसे भी हैं, आपके पास जो कुछ भी है, वही आपके लिए पर्याप्त है, उतने भर से आप खुश रह सकते हैं!