जब अपरा डॉक्टर, नर्स और मरीज़ बनी! 6 मई 2014

अपरा

तो कल हमने एक छोटा सा चक्कर अस्पताल का लगाया और डॉक्टर से अपने घुटने के जख्म टांके कटवाकर वापस आए। उसने अगले कुछ दिनों या हफ्तों के लिए कुछ और हिदायतें दीं हैं। फिजियोथेरपिस्ट के साथ लगातार गहन और बहुत थकाऊ सत्रों के बाद मुझे पक्का विश्वास है कि जर्मनी के लिए उड़ान भरते वक़्त तक मैं पूरी तरह स्वस्थ हो जाऊंगा। और हाँ, अपरा भी तब तक एक प्रशिक्षित फिजियोथेरपिस्ट और डॉक्टर बन चुकी होगी!

यह देखकर आश्चर्य होता है कि अपने आसपास का जायजा लेते हुए, हर चीज़ का बारीकी से अवलोकन करते हुए भी बच्चे कितना आनंद प्राप्त कर लेते हैं! अस्पताल में डॉक्टर से मेरी पहली मुलाक़ात से ही अपरा मेरे पूरे इलाज को बारीकी के साथ देखती रही है और स्वाभाविक है कि डॉक्टरों, नर्सों के अलावा बहुत से मरीजों की नकल करना भी सीख गई है।

अस्पताल की पहली रात या उससे कुछ पहले, जब घुटने का दर्द कुछ ज़्यादा ही था, वह मेरी दर्दभरी आहों, कराहों की नकल करती रहती थी। रमोना मुझे टॉयलेट ले जाती है और जब हम बाहर निकलते हैं तो अपरा को मेरे बिस्तर पर लेटे हुए 'आह', 'ऊँह' करता पाते हैं, जैसे उसे भी दर्द हो रहा हो। रमोना उसकी ओर देखती है तो पाती है कि वह अपने बाएँ घुटने को दोनों हाथों से जकड़े हुए है और दर्द से दोहरी हुई जा रही है। जब वह अपनी माँ को अपनी तरफ मुसकुराते हुए देखती है तो खुद भी हँसे बगैर नहीं रह पाती।

पिछले दस दिन से उसकी गुड़िया बेचारी को पीठ में बहुत दर्द है, पेट में भी और सारे शरीर में कहीं भी दर्द होता रहता है और कभी मच्छर काट लेते हैं तो कभी वह गिर जाती है और टांग तुड़वा बैठती है और उसकी टांग में फ्रेक्चर हो जाता है तो कभी ज़्यादा मिठाई खाने के कारण पेट गड़बड़ हो जाता है। उसे ये तकलीफ़ें सहनी पड़ती हैं, जिससे अपरा उसका इलाज कर सके: उसके ज़ख़्मों पर मरहम लगा सके, सुई लगा सके, पेट में चीरा लगाकर टॉफियाँ बाहर निकाल सके, टांके लगाकर पेट सी सके, उसका तापमान ले सके, बहुत सारी तरह-तरह की दवाइयाँ खिला सके, पट्टियाँ बांध सके और उसकी मालिश भी कर सके।

जब मैंने अपनी पट्टियाँ निकालीं, वह बहुत कुतूहल के साथ देखती रही कि उसके नीचे क्या है और उसके नीचे बड़ा सा बैंड-एड चिपका हुआ देखकर बुरी तरह निराश हुई क्योंकि पट्टियों के नीचे जख्म को ढंकने के लिए बैंड-एड भी लगाया गया था। जब उसे पता चला कि पट्टियाँ लपेटकर रखने की अब ज़रूरत नहीं है तो उसकी निराशा कुछ दूर हुई! पहले गुड़िया को भी पूरा बैंडेज लपेटा जाता था और वह अपनी माँ से उसके पैरों को ढंकने के लिए कहती थी क्योंकि उसके घुटने में चोट लगी है।

हाँ, इस तरह जब मैं पहली बार आश्रम के दरवाजे तक चलकर गया, अपरा भी मेरे पीछे आई, मेरी तरह लंगड़ाते हुए, अपनी माँ का हाथ पकड़े क्योंकि तब तक मैं बैसाखी के सहारे चलने लगा था। इस अभिनय में उसे काफी मशक्कत करनी पड़ रही थी-आखिर स्वस्थ पैरों से लंगड़ाना हंसी-खेल नहीं था! मैंने उससे पूछा कि क्या हुआ तो उसने कहा कि उसके पैर में चोट लग गई है। 'कैसे?' मैंने पूछा तो उसने कहा, 'ऐसे!', और उसने हवा में उछलकर दिखाया कि 'ऐसे'! उछलकर दिखाते समय वो बिलकुल भूल गई थी कि उसके पैर में तो चोट लगी है और उसे तो लंगड़ाना है परन्तु इस प्रदर्शन के बाद वह पुनः लंगड़ाकर चलने लगी। फिर जब हम रास्ते के छोर तक पहुंचे तो मैं एक बिस्तर पर बैठ गया और वह भी मेरे करीब आकर बैठ गई, जैसे उसका पैर भी अब थक गया हो।

उसने सबसे प्यारा अभिनय तब पेश किया जब एक दिन अधिक व्यायाम के चलते मेरी मांसपेशियाँ कुछ ज़्यादा ही दर्द कर रही थी: वह बहुत सतर्कता बरतते हुए कि अनजाने में मुझे चोट न पहुंचा बैठे, मेरे पैरों के पास बैठ गई और धीरे से मेरे पंजे अपने हाथों में लेकर उन्हें पीछे और आगे सरकाने लगी, जैसा कि फिजियोथेरपी के दौरान उसने अपनी माँ को करते हुए देखा था। इस अभिनय के साथ वह एक गीत भी गुनगुनाती जाती: जल्दी ठीक हो जाओ, मैं तुम्हें ठीक कर रही हूँ, अब बिलकुल दर्द नहीं होगा!

उसकी ये सब हरकतें और विशेष रूप से जिसका मैंने आखिर में ज़िक्र किया है, उसे देखकर मेरा दिल मेरी इस बच्ची के लिए एक बार फिर पसीज उठता है। और फिर चाहे मेरी मांसपेशियों में कितना भी दर्द हो, जब वह सिर उठाकर पूछती है, "दर्द ठीक हुआ?" तो मैं सिर्फ यही कहता हूँ: "हाँ, बिल्कुल! तुमने इतनी मदद की, अब मेरा दर्द बिल्कुल ठीक हो गया है!"

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