यह स्पष्ट करने के लिए कि आप नीरस या असंवेदनशील नहीं हैं, अपनी नास्तिकता को सबके सामने स्वीकार कीजिए – 28 जुलाई 2015

मैंने कल उल्लेख किया था कि मैं खुशी-खुशी लोगों को बताता हूँ कि मैं नास्तिक हूँ। मैं इसका प्रसार करना चाहूँगा और अधिक से अधिक लोगों के मन में धर्म के प्रति शंका पैदा कर उन्हें उससे विलग करने की कोशिश करूँगा। लेकिन हर नास्तिक इस तरह नहीं सोचता! नहीं, ऐसे बहुत से लोग हैं, जो धर्म के प्रति अपने अविश्वास को खुले आम स्वीकार करने में संकोच करते हैं। यहाँ तक कि वे समझते हैं जैसे धर्म पर विश्वास न करके वे कोई अपराध कर रहे हैं। यदि आप भी उनमें से एक हैं तो आपको इसे बदलना चाहिए!

आप यदि इस समस्या की गहराई में जाकर उसकी गंभीरता को समझना चाहते हैं तो सबसे पहले यह जान लीजिए कि भारत में नास्तिक शब्द को, जिसे अंग्रेज़ी में एथीस्ट कहते हैं, बहुत ही नकारात्मक अर्थ में लिया जाता है। अधिकांश लोग धार्मिक हैं और उनका विश्वास होता है कि ईश्वर में आस्था रखने पर ही आप दयालु, परोपकारी, प्रेममय और प्रफुल्ल होते हैं और तभी आप जीवन का आनंद ले सकते हैं! वे सच में यह सोचते हैं कि जो ईश्वर को नहीं मानता वह एक अच्छा और नैतिक व्यक्ति नहीं हो सकता। वह दूसरों का भला नहीं कर सकता और न तो हँस-बोल सकता है और न ही अपने जीवन में किसी प्रकार से भी खुश रह सकता है! उसकी छवि एक बुरे व्यक्ति जैसी बना दी गई है।

वास्तव में इसीलिए लोग अपने आपको अधार्मिक या नास्तिक घोषित करने से कतराते हैं। वे अपने आपको प्रगतिवादी, तर्कशील, संदेहवादी, विवेकपूर्ण और इसी तरह के समानार्थी शब्दों से संबोधित करते हैं, जिनसे सिर्फ इतना पता चलता है कि वे दक़ियानूसी प्रथाओं और परंपराओं को नहीं मानते। पर इनमें से कोई भी शब्द, मेरी नज़र में, पर्याप्त स्पष्ट नहीं है और आपकी वास्तविक मंशा ज़ाहिर नहीं करता कि आप किसी भी धर्म का अनुपालन नहीं करते, कि आप ईश्वर पर विश्वास नहीं रखते, कि आप नास्तिक हैं।

समाज में “नास्तिक” शब्द को नकारात्मक अर्थ में लिया जाता है और आप नहीं चाहते कि लोगों के बीच आप एक नकारात्मक व्यक्ति के रूप में जाने जाएँ। लेकिन वास्तव में बदलाव लाने के लिए आपको शब्द नहीं बदलना है। यदि आप ऐसा करते हैं तो वास्तव में आप इस नकारात्मक सोच का समर्थन ही कर रहे हैं, आप यह साबित कर रहे हैं कि वास्तव में नास्तिक खुश नहीं रह सकते, आनंदित नहीं हो सकते। आप एक सकारात्मक व्यक्ति दिखाई देना चाहते हैं इसलिए मान रहे हैं कि आप नास्तिक नहीं हैं-क्योंकि नास्तिक तो सकारात्मक हो ही नहीं सकते! यह सही तरीका नहीं है।

इसमें खतरा यह है कि बहुत से दूसरे लोग अपने आपको आधुनिक अथवा अलग साबित करने के प्रयास में पाखण्ड पूर्वक ठीक इन्हीं शब्दों का उपयोग करते हैं, जबकि वास्तव में वे पूर्ण रूप से आस्तिक और धार्मिक होते हैं! आप कह सकते हैं कि वे तार्किक नहीं हैं किन्तु उनके अपने विचार से वे हैं! इस तरह गलती से आपको भी एक ऐसा आस्थावान और धार्मिक व्यक्ति समझ लिया जाएगा, जो थोड़ा खुले विचारों वाला है, इतना ही। अगर आप कहते हैं कि आप 'प्रगतिशील' हैं तो उसका अर्थ, अपनी पूजा-अर्चना दिए की जगह बिजली का बल्ब जलाकर करने वाले व्यक्ति से लेकर ईश्वर पर विश्वास न करने वाले किसी नास्तिक व्यक्ति तक, कुछ भी लगाया जा सकता है!

जो बात कहनी है, बिना लाग लपेट के, साफ-साफ कहिए। सिर्फ यही स्पष्टता गलतफहमियाँ और भ्रांतियाँ दूर कर सकती है।

हमें ‘नास्तिक’ शब्द के इस नकारात्मक अर्थ के चलन को तोड़ना है किन्तु यह तभी संभव है जब हम स्वयं को नास्तिक कहें और यह दिखा सकें कि नास्तिक होने के बाद भी हम जीवन का उतना ही, बल्कि सामान्य से ज्यादा ही, आनंद लेते हैं। आप क्या हैं और क्या सोचते हैं, स्पष्ट रखें। अगर वह आपके लिए सहज, स्वाभाविक और उचित है तभी आप दूसरों को भी उसके बारे में बता सकते हैं। समय के साथ यह छवि भी बदलेगी। ईमानदार और सत्यनिष्ठा रहें- बदलाव अवश्य आएगा!

यहाँ आप नास्तिकों के सम्मेलन के चित्र देख सकते हैं

माता-पिता के प्रेम में अपने जीवन से खिलवाड़ – 23 अप्रैल 2015

कल मैंने अपने ब्लॉग में बच्चों के लालन-पालन संबंधी प्रश्नों पर अपने विचार रखे थे, जिसमें बहुत छोटे बच्चों और किशोरों के संदर्भ में ही चर्चा की थी। आज मैं उन बच्चों के विषय में चर्चा करना चाहता हूँ, जो जल्द ही वयस्क होने वाले हैं या हो गए हैं। यह मैंने कई बार खुद देखा है और मेरे सलाह-सत्रों में कई लोगों ने इस समस्या पर मुझसे चर्चा भी की है: जब अभिभावक, खासकर यदि अभिभावक एक ही हो अपने बेटे या बेटी पर इतना अधिक आश्रित हो जाते हैं कि वे उन्हें हाथ से निकलने ही नहीं देना चाहते-और इस तरह बच्चों को अपनी राह खुद चुनने की स्वतंत्रता में बाधक बनते हैं!

यह कुछ अमूर्त और जटिल सा लग रहा है लेकिन मैं एक उदाहरण की विस्तृत चर्चा से यह बात स्पष्ट करने की कोशिश करता हूँ कि मेरे कहने का अर्थ क्या है।

एक दिन बीस साल की एक महिला मेरे पास सलाह लेने आई। उसने बताया कि वह मेरी राय इसलिए चाहती है कि उसके आसपास के लोगों के मुक़ाबले मैं उसकी समस्या को पूरी तरह अलग नजरिए से देख सकूँगा। उसका मानसिक द्वंद्व इस प्रकार था:

वह अपनी माँ के साथ रहती थी। जब वह नौ बरस की थी, उसके माता-पिता ने तलाक ले लिया था और उसके बाद कुछ अप्रिय घटनाओं और आपसी विवादों के चलते उसने और उसकी माँ ने उसके पिता से कोई संपर्क नहीं रखा था। उसकी माँ ने अकेले ही उसका लालन-पालन किया था और पूरे दिलोदिमाग से सारा जीवन इसी काम में न्योछावर कर दिया था। अब वे आपस में बहुत नजदीक आ गए थे और सिर्फ और सिर्फ माँ पर ही बेटी का भरोसा था और उसे ही वह दुनिया में सबसे अधिक प्यार करती थी।

दो साल पहले इस युवा लड़की ने अपनी हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी की और आगे की पढ़ाई हेतु देश भर के कई विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए आवेदन किया। कुछ विश्वविद्यालयों ने उसके आवेदन को स्वीकार करते हुए पत्र लिखे, जिनमें से एक उनके शहर के पास ही था और दूसरा, जिसमें वह दाखिला लेना चाहती थी, अधिक दूर था।

उसकी लालसा बाद वाले विश्वविद्यालय में दाखिला लेने की थी, घर में माँ की छत्रछाया से दूर, बाहर निकलकर दुनिया को अपनी नज़रों से देखने की। अब वह जीवन के आगत रोमांच की कल्पना करने लगी और थोड़े अपराधबोध के साथ उसे लगता कि आज तक वह उससे पूरी तरह महरूम रही है-क्योंकि जिस तरह माँ उसकी देखभाल करती थी, उसी तरह वह भी तो उसकी देखभाल करती रही है! लेकिन फिर उसने तुरंत स्पष्ट किया कि वह अपनी माँ से बहुत प्यार करती है और उनसे बढ़कर उसके लिए कुछ भी नहीं है। यह भी कि, इसी तरह माँ भी उससे उतना ही प्यार करती है। कुल मिलाकर यह कि वह ऐसा कुछ भी नहीं कर सकती थी, जिससे यह लगे कि वह एहसान फरामोश है, कृतघ्न है। माँ ने उसके लिए सब कुछ किया है, प्यार दिया है, श्रम किया है, तकलीफ़ उठाई हैं। अंततः वह घर पर ही रही। उसने उसी विश्वविद्यालय को चुना, जो घर के करीब था।

जब हमारी मुलाक़ात हुई थी, वह इसी परिस्थिति में जी रही थी। और अब माँ के कई व्यवहार उसे नागवार गुजरने लगे थे। जब भी माँ से वह कोई प्रतिवाद करती, तुरंत अपराधबोध से परेशान हो उठती और इस गुस्से को भी मन से निकाल न पाती कि माँ ने उसे वास्तविक जीवन जीने के अधिकार से वंचित कर रखा है। इस उलझन के साथ वह मेरे पास आई थी।

मैंने उससे कहा कि उसका गुस्सा साफ बताता है कि वह अपना जीवन अपने तरीके से जीना चाहती है। मैंने उसे ठीक वही करने के लिए प्रोत्साहित किया और वह भी बिना किसी अपराधबोध के। मैंने कहा, अगर वह ऐसा नहीं करेगी तो क्या हो सकता है, सामने आ चुका है, साफ दिखाई दे रहा है-जीवन भर की कटुता और विद्वेष! ऐसी भावनाएँ, जो आसानी से उसके और माँ के बीच के प्रेम को नष्ट कर देंगी।

उसकी बहुत सी महत्वाकांक्षाएँ थीं, बहुत से लक्ष्य, बहुत से सपने थे, इसलिए विशेष रूप से इस उम्र में उन्हें साकार करने की उसे कोशिश करनी चाहिए थी और जीवन के रोमांच में कूद पड़ना चाहिए था! इसका यह मतलब कतई नहीं था कि वह अपनी माँ को 'त्याग' देती, उनके साथ 'एहसान फरामोशी' करती! वह अब भी उनका ख्याल रख सकती थी-बस, कुछ अधिक दूरी से! और कुछ समय गुज़रने के बाद, जीवन में कुछ और स्थिरता और आज़ादी प्राप्त करने के बाद, आज के मुकाबले जीवन थोड़ा और संवर जाने के बाद हो सकता है कि वे भविष्य में पुनः एक साथ रहने का कोई रास्ता निकाल सकें! ऐसी परिस्थिति भी निर्मित हो सकती है कि वह माँ के और करीब रहकर उसकी सेवा कर सके। और यही सब मैंने उससे कहा।

मेरी नज़र में यही तरीका था जो बेटी को अपना जीवन अपनी मर्ज़ी से जीने की स्वतन्त्रता प्रदान करते हुए उनके आपसी प्रेम की रक्षा कर सकता था-और मुझे विश्वास है, उसकी माँ ने भी इस बात को समझा होगा!

यथार्थ से कोसों दूर अपने निजी यथार्थ का निर्माण – 17 मार्च 2015

कल मैंने आपको कल्पना और विश्वास की शक्ति के बारे में बताया था कि कैसे आप उसके प्रभाव में अपना एक निजी विश्व निर्मित कर लेते हैं और कैसे आपके आसपास के दूसरे लोग भी ऐसा ही कर रहे होते हैं। इसकी पूरी संभावना होती है कि आपकी यह फंतासी आपके लिए कोई निजी यथार्थ निर्मित कर दे लेकिन उसके साथ एक बड़ा खतरा भी होता है: उस यथार्थ के साथ आप एक सीमा तक ही चल सकते हैं अन्यथा, उस सीमा का अतिक्रमण करने के पश्चात आपको नुकसान पहुँच सकता है, आप बीमार पड़ सकते हैं, यहाँ तक कि आप चारों ओर से मानसिक द्वंद्व में घिर सकते हैं।

दुर्भाग्य से अध्यात्मवादी और धार्मिक दोनों तरह के लोगों के साथ ऐसा होते मैंने कई बार देखा है। वे अपनी एक निजी दुनिया बना लेते हैं, लेकिन ऐसी कल्पनाओं की सहायता से, जो भौतिकी के नैसर्गिक नियमों का पालन नहीं करते। वे वायवी दुनिया में रहते हैं और अक्सर यह नहीं जानते कि उनकी आस्था यथार्थ नहीं है, वह गलत या झूठ सिद्ध हो चुकी है। वे अपनी दुनिया में खो जाते हैं, यहाँ तक कि ऐसी-ऐसी बातों का दावा करते हैं, जिन्हें दूसरे जानते हैं कि वास्तव में वे बातें गलत या झूठ सिद्ध हो चुकी हैं।

यहीं आकर यह खतरनाक हो जाता है। यह किसी को नुकसान नहीं पहुँचाता कि आप आत्मा, किसी ऊर्जा, किसी ईश्वरीय शक्ति या फरिश्तों पर विश्वास रखते हैं। यह आपके लिए अच्छा हो सकता है, आपका विश्वास या आस्था आपमें आत्मविश्वास भर सकती है या आपके अंदर संकल्पशक्ति का संचार कर सकती है। यहाँ तक कि वह कुछ शारीरिक समस्याओं से भी आपको निजात दिला सकती है। आपको इतना ही ध्यान रखना है कि उसे अधिक दूर तक न ले जाएँ। जी हाँ, ध्यान, किसी शक्ति की सजीव कल्पना और सकारात्मकता या प्रार्थनाएँ आपको शारीरिक पीड़ा या सिरदर्द जैसी तकलीफ़ों को बेहतर तरीके से झेलने और सहन करने की शक्ति प्रदान कर सकती हैं लेकिन जब आपकी हड्डी टूट जाती है तब आपके पास किसी डॉक्टर को दिखाने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं होता।

मैं जानता हूँ कि आजकल ऐसे लोग भी मिल जाते हैं जो ‘आध्यात्मिक शल्यक्रिया’ करते हैं और दावा करते हैं कि इस शल्यक्रिया से शरीर के किसी अंग को काटे बगैर, चाक़ू चलाए बगैर, यहाँ तक कि त्वचा में किसी तरह का चीरा लगाए बगैर वे शल्यक्रिया करते हैं। ये लोग अपने 'मरीज़' को अपनी चमत्कारिक शक्तियों से ठीक करने का विश्वास दिलाने में कामयाब हो जाते हैं परन्तु वास्तव में वे मुर्गी के रक्त का इस्तेमाल कर रहे होते हैं और ऐसा नाटक करते हैं कि मरीज उसे अपना ही रक्त समझता है। वास्तव में यह खतरनाक है क्योंकि वे इलाज के लिए किसी पढ़े-लिखे, पंजीकृत डॉक्टर के पास नहीं जाते!

बहुत से लोग दूसरों से न सिर्फ धोखा खाते हैं बल्कि उन बहुत सी हवाई बातों पर भरोसा भी करने लगते हैं। इस चमकीली फंतासी के अतिरिक्त वे परियों, जिन्नों, फरिश्तों और ईश्वरीय शक्तियों की दुनिया में खो जाते हैं। उनकी दुनिया हैरी पॉटर या लॉर्ड ऑफ़ द रिंग की फंतासियों, कभी पढ़ी या सुनी गई गुह्य किंवदंतियों और प्रवचनों और स्वाभाविक ही, विभिन्न देशों के धार्मिक मिथकों और आख्यानों का मिला-जुला रूप होती है! अपनी दुनिया में उन्हें चीज़े स्याह-सफ़ेद नज़र आती हैं, कुछ सिर्फ अच्छी या भली शक्तियाँ होती हैं तो कुछ बुरी और शरीर से उन बुरी शक्तियों को निकाल बाहर करना लक्ष्य होता है, जिनके कारण आप बीमार पड़े हुए हैं और जो दुनिया भर में फैली बुराइयों की जड़ है।

कुछ लोगों के लिए यह दिमागी बीमारियों का रास्ता सिद्ध होता है। उनकी वायवीय, दुनिया यथार्थ दुनिया से, जिसकी कुछ मूलभूत वास्तविकताएँ हैं, जिनके कुछ भौतिक नियमों, सिद्धांतों और तथ्यों को हम सब मानते हैं और जिनकी हम उपेक्षा नहीं कर सकते, भटककर बहुत दूर निकल गई है! वे हवा में तैर रहे हैं और जिसे हम सब यथार्थ कहते हैं, उससे उनका रत्ती भर संबंध नहीं रह गया है। वे भ्रमित हैं और उन आवाज़ों को सुनते हैं, जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है, उन खतरों को महसूस करते हैं जो कहीं हैं ही नहीं। वे उन चीजों से भयग्रस्त हो जाते हैं जो उनकी कल्पना में बसती हैं, उनकी हवाई दुनिया में मौजूद हैं।

यह शारीरिक और मानसिक रूप से उनके लिए नुकसानदेह है कि वे यथार्थ से दूर अपनी काल्पनिक दुनिया में खोए रहें, अपनी आस्थाओं और अपनी मनगढ़ंत सृष्टि में विचरते रहें और वस्तुगत तथ्यों की उपेक्षा करें। यथार्थ जिसमें हम सब शरीक हैं, वह नहीं, जिसे आपने अपनी कल्पना में रचा है! जब भी आप यथार्थ से अलग किसी दूसरी बात पर विश्वास करते हैं, जब आप निर्णय करते हैं कि वस्तुगत जगत से अलग किसी दूसरी कल्पना पर आस्था रखने लगें तब कृपया इस बात का खयाल रखें। अपने दोनों पैर ज़मीन में मजबूती के साथ जमाकर रखें, वास्तविक दुनिया में निवास करें!

आपके जीवन में आदर्शों की भूमिका – और वयस्क हो जाने के बाद क्यों उनकी ज़रूरत नहीं है – 5 फरवरी 2015

आज मैं आदर्शों के बारे में लिखना चाहता हूँ। उन व्यक्तियों के बारे में, जिन्हें हम अपने लिए एक उदाहरण के रूप में देखते हैं, कोई ऐसा, जिसके चरित्र की कुछ विशेषताएँ हमें प्रभावित करती हैं और हम सोचते हैं कि ये विशेषताएँ ऐसी हैं, जिनकी नकल की जानी चाहिए या हमें उनके जैसा बनने की कोशिश करनी चाहिए। मैं आपको वह पूरी प्रक्रिया विस्तार से बताता हूँ जिससे पता चलेगा कि क्यों और कैसे उम्र बीतने के साथ इस धारणा में परिवर्तन होना चाहिए।

जब आप बच्चे होते हैं, आपके माता-पिता या आपका लालन-पालन करने वाला कोई भी वयस्क सहज ही आपके लिए अनुकरणीय बन जाते हैं। यह एक ऐसी बात है जिसे आप बदल नहीं सकते और न ही उसे किसी तरह से प्रभावित कर सकते हैं। जन्मते ही सबसे पहले उन्हें देखना और जीवन की मूलभूत क्रियाएँ सीखने ले लिए उनका अनुकरण करना आपकी नियति होती है।

धीरे-धीरे आपके आसपास मौजूद परिवार के दूसरे सदस्य आपके अतिरिक्त आदर्श या extended ideals बनते जाते हैं। बड़े भाई या बहनें, चाचा-चाची, अकसर घर आने वाले मेहमान आदि। आप अपने संसार को विस्तार देने की प्रक्रिया में होते हैं और उसके साथ अपने आदर्शों को भी विस्तार देते चलते हैं। आप स्कूल जाना शुरू करते हैं और आपके शिक्षक आपके आदर्श बन जाते हैं। यार-दोस्त, पड़ोसी और यहाँ तक कि वे लोग भी जिन्हें आप व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते, जैसे गायक, अभिनेता या अभिनेत्रियाँ आदि भी इस सूची में स्थान पाने लगते हैं।

जब आप छोटे थे, ये सभी लोग कुल मिलाकर आम तौर पर आपके लिए महान थे। वे जैसे भी हों, आप उन्हें दोषरहित और उत्तम मानते हैं। एक सामान्य मनुष्य की तरह उनमें भी कोई खामी हो सकती है या वे भी कोई गलती कर सकते हैं, इसे आप देख नहीं पाते, उस समय यह आप सोच भी नहीं सकते। जैसे-जैसे आप बड़े होते हैं और परिदृश्य आपके सामने खुलता जाता है, धीरे-धीरे यह सब आपको सीखना पड़ता है। अचानक आपको पता चलता है कि वे किसी खास क्षेत्र में तो बहुत निपुण हैं लेकिन किसी दूसरे क्षेत्र में अनाड़ी हैं और उस क्षेत्र में आपके लिए उनकी नकल करना ठीक नहीं होगा।

न सिर्फ आपको सम्पूर्ण परिदृश्य की जानकारी होती जाती है बल्कि आप स्वयं भी परिपक्व होते जाते हैं और आपको स्वयं यह निर्णय करना होता है कि आप अपने अंदर कौन सी चारित्रिक विशेषताएँ चाहते हैं, जिन्हें पाने की आपको पूरी कोशिश करनी चाहिए और किन विशेषताओं की आपको नकल करनी है और किनकी नहीं। और किसी न किसी बिन्दु पर आकर आपको यह सोचना चाहिए कि आपको किसी दूसरे जैसा होने की ज़रूरत नहीं है। नकल करने के लिए आपको किसी आदर्श की आवश्यकता नहीं है क्योंकि कोई भी दो व्यक्ति एक जैसे नहीं हो सकते और इसलिए आप भी निराले और अद्वितीय हैं।

प्रेरणा के लिए आप हमेशा ही दूसरों की ओर देख सकते हैं। किसी की सफलता या उसकी विशेषता की सराहना करें और देखें कि उसके पास कुछ ऐसा है जिसे आप भी अपने जीवन का हिस्सा बना सकते हैं। किसी भी हालत में हमें यह बचपना नहीं करना चाहिए कि हम उसे एक सम्पूर्ण रूप से दोषरहित आदर्श मानने लगें-इससे हम उनकी गलतियों पर तरह-तरह के बहाने बनाकर और झूठ का सहारा लेते हुए अनावश्यक पर्दा डालने की कोशिश करने लगते हैं।

कोई भी दोषरहित नहीं है लेकिन हम सब अद्वितीय हैं-इसलिए जैसे भी हों, अपने जैसे बने रहें, ज़्यादा से ज़्यादा अपने आपको बेहतर बनाने की कोशिश करते हुए!

समलैंगिकता का विरोध नहीं, बल्कि स्वीकृति योग का काम होना चाहिए – 1 जून 2014

मैंने आपको पिछले हफ्ते बताया था कि सन 2006 में कैसे मेरा एक पुरुष समलैंगिक मित्र हर वक्त अपने आपसे संघर्ष करता रहा था क्योंकि उसका योग गुरु, हर मामले में जिसकी सलाह वह माना करता था, समझता था कि उसकी समलैंगिकता अनुचित है। स्वाभाविक ही उसकी इस समस्या के बारे में सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ था कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी रही होगी कि उसे ऐसा गुरु स्वीकार करना है और यह भी कि क्यों ऐसी धारणा रूढ हो गई है कि योग के अनुसार समलैंगिकता एक समस्या है।

यह बात कि समलैंगिक होना एक ऐसी बीमारी है, जिसे ठीक किया जा सकता है और ठीक किया जाना चाहिए, पूरी तरह धर्म और परम्पराओं पर आधारित है अर्थात इस विश्वास पर कि औरत और मर्द ही साथ रह सकते हैं। पुराने ज़माने में लोग सोचते थे कि वह सब जो प्रचलित मानदंडों के अनुसार नहीं हैं, गलत है और उसका इलाज किया जाना ज़रूरी है। दुर्भाग्य से कुछ कठमुल्ला, पुरातनपंथी योगी, जो समयानुसार नहीं बदलते, आज भी यह विश्वास करते हैं कि अपने समलिंगी की ओर आकर्षण का होना अप्राकृतिक भावना है। और क्योंकि वे हर बीमारी का इलाज योग द्वारा करने चाहते हैं इसलिए सोचते हैं कि किन्हीं काल्पनिक अवरोधों को दूर करके वे समलैंगिकता नामक इस "बीमारी का इलाज" भी कर लेंगे।

समलैंगिकता के बारे में यह मूर्खतापूर्ण खयाल यहीं से आया है। लेकिन अगर आप योग के मूल आशय को समझेंगे तो वह है, स्वानुभव या जो जैसे हैं, वैसे ही बने रहें। योग हमें सिखाता है, अपने भीतरी और बाहरी व्यक्तित्व का स्वीकार, जैसे भीतर हैं वैसे ही बाहर भी दिखाई दें, भीतर बाहर में कोई द्वंद्व न रहे। मैं समझता हूँ कि हर पुरुष और महिला समलैंगिक जानता है कि वह भीतर से समलैंगिक है। किसी व्यक्ति का यौन रुझान उसकी अंदरूनी दुनिया का हिस्सा होता है और इसलिए मैं यह विश्वास करता हूँ कि योग को भी मूल रूप से समलैंगिकता को स्वीकार करना चाहिए न कि उससे संघर्ष करना चाहिए। लेकिन उसे खुले आम, सब के सामने स्वीकार करना अपने आप में बहुत कठिन काम है।

एक पुरुष या महिला समलैंगिक के रूप में संभवतः आपने लोगों के मूर्खतापूर्ण तर्कों को सुना होगा, जिनमें वे आपके समलैंगिक रुझान के विरुद्ध आपको तरह-तरह की बातें समझाने की कोशिश करते हैं। आप योग के पास सिर्फ शारीरिक व्यायाम के लिए ही नहीं बल्कि ध्यान और आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने भी आते हैं। तो फिर, अगर आपको किसी गुरु की ज़रुरत है ही, तो भी आप अपने लिए किसी ऐसे गुरु को कैसे चुन सकते हैं, जो आपकी समलैंगिकता को ही स्वीकार नहीं करता?

ऐसा करके क्या आप अपने लिए मुश्किलें नहीं खड़ी कर रहे हैं? न सिर्फ आप अपने लिए पहचान का संकट खड़ा कर रहे हैं बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वाह भी नहीं कर पा रहे हैं। आपको इस व्यक्ति का पूरी तरह अनुगमन करना होता है और आप उसकी बातों पर कभी कोई प्रतिवाद भी नहीं कर सकते। गुरु से दीक्षा लेने का अर्थ यही है। इसलिए या तो आप अपनी पहचान का परित्याग कर दें या फिर आप गुरु-शिष्य परंपरा को मानना बंद कर दें।

तो फिर गुरु बनाते ही क्यों हैं?

बहुत समय पहले मैंने महसूस किया था कि गुरुवाद एक ऐसी चीज़ है, जो सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए मुफीद है, जो अपनी पहचान खोने के लिए तैयार हैं।

योग गुरु कैसे अपने समलैंगिक शिष्यों के मन में आतंरिक कलह पैदा करते हैं! 25 मई 2014

मैंने आपको पहले बताया था कि सन 2006 में मेरा बहुत से समलैंगिकों से संपर्क हुआ था। उनमें से एक पुरुष समलैंगिक मेरा अच्छा दोस्त बन गया था। योग में उसकी बहुत रुचि थी और उसका एक भारतीय योग-गुरु भी था। लेकिन इसी कारण मैं हमेशा देखता था कि उसके भीतर कोई मानसिक उथल-पुथल मची हुई है: उसका गुरु उसकी समलैंगिकता को स्वीकार नहीं करता था।

तब मेरा मित्र 23 साल का युवक था। सालों से उसकी भारत में रुचि रही थी और हालाँकि वह कभी भारत नहीं आया था, वह उसकी संस्कृति परम्पराओं और धर्मग्रंथों से बड़ा प्रभावित और उन पर मोहित था। उसने भारत के बारे में बहुत सी किताबें पढ़ रखी थीं और स्वाभाविक ही उनका उस पर गहरा असर था। वह बहुत शांत-चित्त, ठन्डे दिमाग वाला और आध्यात्मिकता, योग और ध्यान आदि में रुचि रखने वाला युवक था। इन सब बातों ने उसे इस भारतीय गुरु की ओर, जो कई सालों से पश्चिम में रहकर योग और भारतीय दर्शन की शिक्षा दिया करता था, आकृष्ट किया। वह गुरु लोगों को दीक्षित भी किया करता था, लिहाजा मेरे मित्र ने उस गुरु से दीक्षा प्राप्त कर ली और उसका शिष्य बन गया।

सन 2006 की गर्मियों में हमने बहुत सा समय साथ बिताया। वह सिर्फ मुझे देखने मेरे कार्यक्रमों में आता रहता था और एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर यात्रा करते हुए हम लोग कई विषयों पर लम्बी चर्चाएँ किया करते थे। ऐसी ही एक यात्रा के दौरान उसने मुझे बताया कि एक किशोर के रूप में वह कभी भी स्त्रियों की ओर आकृष्ट नहीं होता था। इसके विपरीत पुरुषों की ओर आकृष्ट होना उसे अधिक स्वाभाविक लगता था। किसी स्त्री को देखकर ऐसी भावनाएँ उसके मन में कभी भी नहीं उमड़ती थीं। मैंने महसूस किया कि उसकी समलैंगिकता उसके लिए कितनी सहज और स्वाभाविक थी और यही उसने कहा भी: 'यही मैं हूँ, यही मेरा स्वभाव, मेरी प्रकृति है!'

लेकिन जब भी वह जर्मनी में या गुरु के अमरीका स्थित आश्रम में अपने गुरु से मिलता था, उसे हमेशा एक समस्या का सामना करना पड़ता था: उसका गुरु उससे कहता कि समलैंगिकता एक समस्या है, जिससे वह निजात पा सकता है और उसे ऐसा करना चाहिए। हिन्दू धर्म में और योग की कठिन परंपरा में इसकी मान्यता नहीं है। वह अपने गुरु को चाहता था लेकिन इस समस्या के चलते भ्रमित था और जब भी वह अपने गुरु से सुनता कि यह एक प्रकार की बीमारी है, मस्तिष्क में एक तरह का अवरोध या कुछ अनुचित सी बात है, जिसे ठीक करना ज़रूरी है और जिस पर उसे 'कुछ करना' चाहिए तो वह सहम जाता था और अपने व्यक्तित्व को लेकर उसके मन में द्वंद्व पैदा हो जाता था!

मुझे एहसास है कि गुरु की यह बात उसके भीतर कितना द्वंद्व पैदा करती रही होगी। जिस रास्ते पर वह चल पड़ा था, उस पर चलते हुए वह भीतर ही भीतर बहुत असुरक्षित महसूस करता रहा होगा क्योंकि वह ऐसा रास्ता था जो उसके एक अंश को स्वीकार ही नहीं करता था! उसे अपने गुरु की सहानुभूति और सहायता की ज़रुरत थी, उसके मार्गदर्शन की ज़रुरत थी-आखिर इसीलिए तो उसने उस गुरु का चुनाव किया था-लेकिन साथ ही वह आँख मूंदकर गुरु के हर आदेश का पालन भी नहीं करना चाहता था!

अगर वह कोशिश करता कि गुरु का आदेश मानकर अपने आकर्षण को पुरुषों की ओर से हटाकर महिलाओं की तरफ मोड़ दे तो फिर वह अपने आप के प्रति ईमानदार नहीं रह सकता था! वह संघर्ष करता रहा और मैं यह देखकर खुश हुआ था कि अंततः उसका व्यक्तित्व इस संघर्ष में विजयी होकर निकला! वह अपने सहज-स्वाभाविक प्राकृतिक सत्य को लेकर कोई समझौता नहीं कर सकता था।

लेकिन दुर्भाग्य से उस पूरे समय यह मामला उसके मस्तिष्क में उथल-पुथल मचाए रहा करता था।

और यह उसका एकमात्र संघर्ष या द्वंद्व नहीं था-मगर उसके बारे में बाद में फिर कभी।

महिलाओं के मुकाबले पुरुषों के लिए अपनी समलैंगिकता को स्वीकार करना ज़्यादा कठिन क्यों होता है! 18 मई 2014

पिछले सप्ताह मैंने आपको बताया था कि सन 2006 में मुझे बहुत सी ऐसी महिलाओं से मिलने का मौका मिला था जो लम्बे समय तक और कई पुरुषों के साथ सम्बन्ध रखने के बाद अचानक महिलाओं के साथ हमबिस्तर होने लगीं। दूसरी तरफ वे समलैंगिक पुरुष, जिन्हें जानने का मुझे मौका मिला था, मुझे बताते थे कि वे जीवन में कभी भी महिलाओं की ओर आकृष्ट ही नहीं हुए। जबकि पिछले हफ्ते मैंने अपनी बात को महिला समलैंगिकों के नज़रिए पर केन्द्रित किया था, आज मैं पुरुष समलैंगिकों के रवैये और इस संबंध में उनके दृष्टिकोण से इस विषय पर चर्चा करूंगा।

सर्वप्रथम, मैं पुनः यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि हज़ारों लोगों से मिलकर बात करने के बाद मेरा यह व्यक्तिगत कार्यानुभव है। यह किसी वैज्ञानिक शोध पर आधारित नहीं है लेकिन जितने पुरुष समलैंगिकों से मैं मिला हूँ, उनमें से अधिकतर ने यही कहा कि: 'मैं शुरू से ही समलैंगिक रहा हूँ!'

वे मुझे बताते थे कि उन्होंने जीवन में कभी भी महिलाओं के प्रति आकर्षण महसूस नहीं किया और बचपन से ही वे अपने पुरुष मित्रों, सहपाठियों या आसपास के दूसरे पुरुषों की ओर आकृष्ट होते थे। बहुत पहले ही, अधिकतर किशोर होते-होते ही उन्हें इसका आभास हो गया था कि टीवी पर सुंदरियों और युवा फिल्म अभिनेत्रियों को देखकर वे अपने दूसरे हमउम्र मित्रों की तरह आकर्षित नहीं होते। स्वाभाविक ही, कुछ ऐसे प्रकरण भी सामने आए, जिनमें पुरुषों ने 'महिलाओं के साथ भी कोशिश की' मगर वह उन्हें 'अप्राकृतिक और अनुचित' लगता था। कुल मिलाकर, पुरुष समलैंगिकों ने महिलाओं के साथ हमबिस्तर होने का कोई अनुभव प्राप्त नहीं किया था। तब यह सवाल उठता है कि समलैंगिक पुरुषों से सुनी बातें महिला समलैंगिकों की बातों से इतनी भिन्न क्यों हैं।

यह भी संभव है कि वास्तव में पुरुष समलैंगिकों की संख्या हमारी जानकारी से काफी अधिक हो-क्योंकि बहुत से ऐसे पुरुष मजबूरन उभयलैंगिक संबंधों के साथ जीते होंगे! मुझे लगता है कि समलैंगिक और उभयलिंगी महिलाएँ अधिक बड़ी संख्या में अपने परम्परागत संबंधों से बाहर निकलकर खुले आम अपनी इच्छाओं और वरीयताओं का स्वीकार करती हैं।

मुझे लगता है कि समाज में महिलाओं के लिए समलैंगिक होना पुरुषों के समलैंगिक होने के मुकाबले अधिक आसान है। पुरुषों के लिए समलैंगिक होना उनके पौरुष पर कलंक जैसा है, कि वह मज़बूत, फौलादी जिस्म का मालिक नहीं है बल्कि एक नर्मो-नाज़ुक इंसान है। वह महिलाओं के दिलों पर छा जाने वाला इश्कबाज़ नहीं है बल्कि उनसे डरकर दूर भागता है। उन्हें लोगों के मज़ाक का केंद्र बनना पड़ता है और न सिर्फ समाज का बहिष्कार झेलना पड़ता है बल्कि कई बार कैरियर में आगे बढ़ने में रुकावटें आती हैं और नौकरी तक से हाथ धोने की नौबत पेश आती है और इस तरह वे आर्थिक रूप से कम सुरक्षित हो जाते हैं। इसके विपरीत, महिलाओं की बात अलग होती है। इस पुरुष-वर्चस्व वाले (पुरुष-सत्तात्मक) समाज में-और दुर्भाग्य से पश्चिमी समाजों में भी आज भी यह स्थिति बनी हुई है-एक महिला का किसी दूसरी महिला का चुम्बन लेना बहुत उत्तेजक और सेक्सी माना जाएगा जबकि किसी पुरुष का किसी दूसरे पुरुष का चुम्बन लेना बहुत बहुत फूहड़ माना जाता है। जहाँ उनका बॉस पुरुष है और जहाँ सारे पुरुष मित्र समलैंगिकों से घृणा करते हैं, वहां एक समलैंगिक पुरुष अपनी यौनेच्छाओं और यौन प्राथमिकताओं की ओर कदम भी रखना नहीं चाहेगा।

इसके अलावा, जैसा कि पिछले हफ्ते मैंने इशारा किया था, मैं मानता हूँ कि पुरुषों के मुकाबले महिलाएँ आपस में एक-दूसरे के साथ ज़्यादा खुली होती हैं। वैसे भी वे अपनी सबसे विश्वस्त सहेलियों के साथ अपने सारे रहस्य साझा करती हैं और उनकी आपसी मित्रता पुरुषों के मुकाबले अक्सर बहुत ज़्यादा गहरी होती है। पुरुष अपने मन की बातें दूसरे पुरुषों के सामने उतनी आसानी से उजागर नहीं करते जितनी सहजता से महिलाएँ खोलकर रख देती हैं। शारीरिक खुलेपन की बात करें तो भी महिलाएँ एक-दूसरे के साथ ज़्यादा खुलकर सामने आती हैं! जिमों में (व्यायामशालाओं में), खेल के मैदानों, तरणतालों या ऐसी ही दूसरी जगहों में अक्सर महिलाओं को बिना किसी विशेष हिचक या शर्मो-हया के नहाते या कपड़े बदलते देखा जा सकता है। मेरे खयाल से, समाज में घुलने-मिलने की सहजता महिलाओं में पुरुषों के मुक़ाबले अधिक मात्रा में पाई जाती है। और इसलिए दो या तीन दशकों तक बिल्कुल अलग तरीके से रहने के बावजूद अपनी आतंरिक इच्छाओं को व्यक्त करना और अपनी वरीयताओं के अनुसार आगे बढ़ना उनके लिए अधिक आसान होता है!

लेकिन कुछ भी हो, मेरे संपर्क में आए लगभग सभी समलैंगिकों ने मुझे बताया कि उन्होंने अब अपने आप को पहचान लिया है। और मैं मानता हूँ कि यही बात महत्वपूर्ण और ज़रूरी है।

पुरुषों के साथ अनुभव लेने के बाद बहुत सी महिलाएँ समलैंगिक क्यों हो जाती हैं! 11 मई 2014

पिछले हफ्ते मैंने आपको सन 2006 में समलैंगिकों के लिए आयोजित कार्यशाला के बारे में बताया था। जिस महिला ने वह कार्यशाला आयोजित की थी, वह समलैंगिक थी। उसने मुझे बताया कि पहले वह शादीशुदा थी मगर अपने पति से तलाक हो जाने के बाद अब वह सिर्फ महिला साथियों के साथ हमबिस्तर होती है। वह अकेली महिला नहीं थी, जिसने मुझे ऐसी कहानी सुनाई थी या जिसने मुझपर यह तथ्य उजागर किया था। लेकिन तुलनात्मक रूप से बहुत कम समलैंगिक पुरुषों ने अपने इस तरह के अनुभवों का ज़िक्र किया। आज मैं इस विषय पर महिलाओं के सन्दर्भ में बात करूंगा- पुरुषों के साथ सम्बन्ध कायम हो जाने के बाद भी क्यों महिलाएँ दूसरी महिलाओं के प्रति आकर्षित होती हैं जबकि पुरुषों के मामले में यह बहुत कम सुनाई पड़ता है?

जैसा कि मैं पहले ज़िक्र कर चुका हूँ, उस समय तक बड़ी संख्या में समलैंगिकों के साथ मेरी मुलाकातें हो चुकी थीं। मैं हजारों की तादात में व्यक्तिगत-सत्र ले चुका था और मैं मानता हूँ कि अधिकांश समलैंगिक आध्यात्मिक विषयों में काफी रूचि रखते हैं-शायद इसलिए कि सिर्फ समलैंगिक होने के कारण पहले ही वे वैचारिक रूप से मुख्यधारा के लोगों से 'अलग' होते हैं। तो, मेरे बहुत से व्यक्तिगत-सत्रों में से कई इन समलैंगिक पुरुषों और महिलाओं के साथ हुआ करते थे। और इन महिला समलैंगिकों में से बहुतों ने मुझसे कहा कि पहले उनके सम्बन्ध पुरुषों के साथ भी रह चुके हैं।

इस तरह मुझे बहुत सी समलैंगिक महिलाओं से मिलने का मौका मिला, खासकर उम्र की चौथी दहाई में प्रवेश कर चुकी महिलाओं से, जिनके वयस्क बच्चे भी थे। जर्मनी, आयरलैंड, आस्ट्रेलिया और बहुत से दूसरे देशों में। उनमें से कुछ उभयलिंगी (बायसेक्सुअल) थे और कहते थे कि इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था कि उनका साबका किसी पुरुष से है या महिला से! चाहे एक रात का सम्बन्ध हो या दीर्घकालीन, वह पुरुष या महिला किसी से भी हो सकता था।

क्या महिलाओं का यह व्यवहार पूरी तरह समझ में आने वाला है क्योंकि एक खास उम्र के बाद उन्हें सिर्फ प्रेम और स्नेह की आवश्यकता होती है, जो उन्हें पुरुषों से प्राप्त नहीं हो पाता और वे समलैंगिक महिलाओं की ओर रुख कर लेती हैं? क्या वे जानती हैं कि पुरुषों के साथ हुए कटु अनुभव के बाद कोई महिला ही यह ज़्यादा अच्छी तरह समझ सकती हैं कि इस दौरान उन्हें क्या-क्या भुगतना पड़ा है और किसी पुरुष के मुकाबले एक महिला ही उनके प्रति ज़्यादा संवेदनशील हो सकती है? या क्या महिलाओं में बड़ी संख्या में समलैंगिकता का रुझान उनका जन्मजात गुण है?

मेरा विश्वास है- और कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों के परिणामों के बारे में मैंने पढ़ा है, जो मेरे इस विश्वास को सत्य सिद्ध करती हैं- कि समलैंगिकता मनुष्य के जींस में ही मौजूद होती है। मैं वैज्ञानिक नहीं हूँ और इसका विस्तृत विवरण प्रस्तुत नहीं कर पाऊँगा मगर उस अध्ययन का निष्कर्ष यह था कि यह किसी महिला की व्यक्तिगत इच्छा पर निर्भर नहीं है कि वह एक महिला को पुरुष से ज़्यादा आकर्षक पाती है। या इसके विपरीत, कोई पुरुष किसी दूसरे पुरुष को महिला से ज़्यादा आकर्षक पाता है तो वह भी उस पुरुष की व्यक्तिगत इच्छा का प्रश्न नहीं है।

मुझे लगता है कि इसका कारण महिलाओं की सामान्य अनुभूतियों और उनकी प्रतिक्रियाओं और उनके प्रति समाज के आम व्यवहार और उसकी कार्यप्रणाली में निहित है। महिलाएँ अपने वातावरण, माहौल और परिस्थितियों के चलते विवाह करके स्थापित होने और बच्चे पैदा करने का दबाव महसूस करती हैं। और अनजाने ही वे इस दबाव के सामने समर्पण कर देती हैं। इस तरह वे अपनी भावनाओं का दमन करते हुए वही करती हैं, जिसकी समाज को उनसे अपेक्षा होती है।

और यह भी नहीं है कि अचानक एक विशेष दिन कोई किशोर लड़की सोकर उठे और अनुभव करे कि वह समलैंगिक है। यह संभव है कि वह अपनी सहेलियों की तरफ आकृष्ट हो मगर यह न समझ पाए कि यह पूरी तरह सामान्य बात है। यह संभव है कि वह यह न समझ पाए कि क्यों नहीं वह दूसरी महिलाओं की तरह अपने पति की ओर आकृष्ट नहीं है। लेकिन जब वे समाज के दबावों से मुक्त होती हैं तब वे वाकई बंधन-मुक्त हो जाती हैं। और तभी अपनी वास्तविक यौन संबंधी प्राथमिकताओं (orientation) के अनुसार वे अपना निर्णय ले पाती हैं।

कितनी समलैंगिक महिलाओं के पुरुषों के साथ वर्षों यौन सम्बन्ध रहे, इसे जानने के बाद 2006 में मैं इस नतीजे पर पहुंचा था। अगले सप्ताह मैं पुरुष समलैंगिकों और उनके द्वारा अपनी यौन प्राथमिकताओं या पसंद-नापसंद को कार्यरूप में परिणत करने के तरीकों पर अपने विचार रखूँगा।

धन-केन्द्रित समाज में अपने बच्चों को सभ्य इंसान बनाना – 1 अप्रैल 2014

कल मैंने संक्षेप में बताया था कि छोटे बच्चों को स्कूल जैसी कक्षाओं में बैठकर समय बरबाद करने की जगह सिर्फ अपने मन-मुआफिक खेलने के लिए ज़्यादा समय मिलना चाहिए। मेरे विचार में अगर हम अपने लड़के-लड़कियों को छोटी उम्र में स्कूल भेजते हैं तो वास्तव में हम उनके बचपन के एक हिस्से को उनसे छीन लेते हैं। यही हम तब कर रहे होते हैं, जब उनके दिन को व्यस्त समय-सारिणी में जकड़ देते है और उन्हें स्वतन्त्रता पूर्वक खेलने का मौका ही नहीं देते। दुर्भाग्य से यह ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण चलन है, जो कम होने की जगह आजकल बढ़ता ही जा रहा है।

भारत में मैं इसे जर्मनी के मुक़ाबले कुछ ज़्यादा महसूस करता हूँ लेकिन सबसे ज़्यादा यह चलन अमरीका में देखा जाता है। जब हम वहाँ थे हम ऐसी माँओं और बच्चों से मिले जिन्होंने बताया कि बच्चों को पूरे सप्ताह में पल भर का भी मुक्त समय प्राप्त नहीं हुआ। सारा दिन स्कूल होता है, जो सुबह जल्दी शुरू हो जाता है और देर शाम तक चलता रहता है, जब उनके अभिभावक भी काम से लौट रहे होते हैं।

बच्चे अपना नाश्ता और दोपहर का भोजन स्कूल में ही करते हैं, वहीं होमवर्क भी करते हैं और स्वाभाविक ही सारे स्कूल की पढ़ाई भी इसी दौरान होती रहती है। उसके बाद ‘फुर्सत’ की गतिविधियां, जिनमें बच्चों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कि जाती है, भी होती रहती हैं। शिक्षकों और पेशेवर प्रशिक्षकों की निगरानी में बच्चों को खेलों का प्रशिक्षण लेना होता है।

एक या दो दिन, जब स्कूल जल्दी छूट जाता है, अभिभावक सुनिश्चित करते हैं कि बच्चों को बोर होने का मौका ही न मिले: स्पोर्ट्स क्लब, कोई वाद्य-यंत्र सिखाने वाला स्कूल और कुछ नहीं तो अभिभावकों द्वारा आयोजित डेट्स का खेल-वे उन्हें किसी न किसी खेल या अध्यवसाय में लगाए रखते हैं। बच्चे बोर तो नहीं होते मगर उन्हें अपना उन्मुक्त समय भी नहीं मिल पाता। यहाँ तक कि रविवार के दिन भी चर्च स्कूल होता है-एक और सक्रियता से भरा दिन।

उनके पास ऐसा कोई समय नहीं होता जब वे अपने मन की करने की सोच भी सकें। यहाँ तक कि सामाजिक कार्यक्रम भी किसी न किसी के निरीक्षण और निर्देशन में ही होते हैं और बच्चों के पास अपने मन से कुछ करने का बहुत सीमित समय और अवसर होता है। मेरा मानना है कि इस माहौल में दरअसल उनकी स्वतन्त्रता, कल्पनालोक में विचरण करने की उनकी शक्ति और अपना समय अपनी मर्ज़ी के अनुसार व्यतीत करने की क्षमता बाधित होती है।

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि इन गतिविधियों को बच्चे पसंद नहीं करते। वे बांसुरी बजाना या बास्केट-बाल खेलना और यहाँ तक कि होमवर्क करना या दूसरी गतिविधियां भी पसंद कर सकते हैं। नाटक शिविर और पुस्तकालयों में समय बिताना भी। लेकिन इन सभी गतिविधियों का आनंद लेने का निर्देश बाहर से, दूसरों द्वारा दिया जा रहा है।

हम बच्चों को इतना अवसर, इतनी आज़ादी क्यों नहीं देते कि वे खुद निर्णय करें कि वे क्या करना चाहते हैं? उनके सामने कोई वाद्य या कोई किताब तभी रखें जब वह खुद चाहे। हम इस बात की ज़िद क्यों करें कि उन्हें खेल भी समय-सारिणी के अनुसार ही खेलना है, जब कि वे उस वक़्त घर में अपने बिस्तर पर लेटे रहना चाहते हैं? क्या हम अपने बच्चों को खेलों और अपनी मर्ज़ी के अनुसार किसी भी दिशा में दुनिया की पड़ताल करने के बारे में जानकारी और उनसे उपजने वाली संभावनाओं से अवगत नहीं करा सकते?

मैं जानता हूँ कि कुछ लोगों को यह मज़ाक लग रहा होगा लेकिन मैं समझता हूँ कि हम अपने बच्चों से उनका बचपन छीन रहे हैं। जिम्मेदारियों से मुक्त वह समय, जिसे वे अपनी मर्ज़ी से मनचाहा काम करने में व्यतीत कर सकते थे, उस पर डाका डाल रहे हैं। अगर आप उन्हें इस उन्मुक्त समय के एहसास का आनंद उठाने का मौका नहीं देंगे तो फिर वे अपने जीवन में सुकून के साथ लेटकर यह विचार कैसे कर पाएंगे कि वे आगे भविष्य में क्या करना चाहते हैं?

अपने दिमाग से सोचकर निर्णय लेने की जगह वे आँख मूंदकर समाज के बताए रास्ते पर चलेंगे क्योंकि वे दूसरों द्वारा संचालित और नियंत्रित गतिविधियों के अभ्यस्त होंगे! ऐसे समाज के सुसभ्य सदस्य, जो चाहता है कि लोग कमाएं, खाएं और वही सोचें और करें, जो दूसरे सभी सोचते और करते हैं। वे उन चीजों को खरीदेंगे, जो विज्ञापन उन्हें बताएँगे क्योंकि बचपन से उन्होंने वही किया है, जो दूसरों ने उनसे कहा था। वे अच्छे कर्मचारी बन सकेंगे, जो समय पर दफ्तर आएँगे और समय सारिणी से बंधे घड़ी की सुई के साथ आखिरी मिनट तक काम करते रहेंगे बल्कि उनसे अपेक्षित काम से ज़्यादा ही करने का प्रयास करेंगे। क्योंकि उन्हें इसकी आदत पड़ चुकी है। क्योंकि वे हमेशा से ऐसा ही करते रहे हैं।

तब तक, जब वे पूरी तरह निष्क्रिय न हो जाएँ; थककर, टूटकर बिखर न जाएँ!

जी हाँ, मैं मानता हूँ कि हम स्वयं ही अपने नन्हे बच्चों में अवसाद और अक्रियाशीलता के बीज बोते हैं। इस विषय पर कल मैं और विस्तार से लिखूंगा।

प्रेम आपके जींस से ज्यादा महत्वपूर्ण है – 23 फरवरी 2014

पिछले सप्ताह मैंने एक माँ के बारे में आपको बताया था, जो अपनी 18 वर्षीय बेटी को लेकर मेरे व्यक्तिगत सत्र में आई थी। उसने अपनी बेटी के 18वें जन्मदिन पर उसे बताया कि जिस व्यक्ति ने उसका लालन पालन किया था और जिसे वह अपना पिता मानती है वह दरअसल उसका जैविक पिता नहीं है। लड़की का जैविक पिता एक और व्यक्ति था, जिसके साथ अतीत में उस महिला का कुछ दिनों का विवाहेतर संबंध रहा था मगर अब उसके बारे में वह कुछ भी नहीं जानती थी। अब यह ज़िम्मेदारी मुझ पर आ पड़ी थी कि उस लड़की से बात करूँ जो, स्वाभाविक ही, मानसिक रूप से बुरी तरह हिल गई थी।

माँ व्यथित थी और अपराधबोध से ग्रसित नज़र आ रही थी क्योंकि उसने अपनी बेटी को इस मानसिक हड़कंप में डाल दिया था। उसने विस्तार के साथ मुझे बताया कि क्यों उसने इतने लंबे अंतराल के बाद अपनी बेटी पर यह रहस्य उजागर किया। दरअसल बेटी को इतने साल झूठ और धोखे में रखना उसे अनैतिक लग रहा था और यह अपराधबोध उसे भीतर से खा रहा था। इस झूठ को उसने अपने दिल में छिपाकर रखा था और उसे लगता था कि उसके बढ़ते बोझ से एक दिन वह फट पड़ेगा।

और मैं सोच रहा था कि इतने लंबे अंतराल के बाद इस सत्य को उजागर करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। लड़की अब बालिग हो चुकी थी और इस भयावह सच से दूर, जिस स्थिति में थी, उसी में खुश थी। यह सत्य उसे कोई लाभ नहीं पहुँचाने वाला था। उसकी चिंता करने कोई और व्यक्ति नहीं आने वाला था क्योंकि उस व्यक्ति का कोई संपर्क-सूत्र उनके पास नहीं था। इसके विपरीत इस रहस्योद्घाटन से उसने उस पिता को भी खो दिया था, जिसे वह पिता मानती आई थी और जो हमेशा-हमेशा के लिए उसका पिता रहा आता! लेकिन अब ये विचार व्यर्थ थे क्योंकि उसने पहले मुझसे कोई सलाह नहीं ली थी। तब मैंने लड़की से बात की।

लड़की के दिमाग में वह पुरुष, जिसके जींस वह लिए हुए थी, पूरी तरह मौजूद था। मैं उससे किस तरह मिल सकती हूँ? अगर मैं उसकी खोज करूँ और पा जाऊँ तो वह मेरे साथ कैसा व्यवहार करेगा? और मेरे माँ के पूर्व-पति का क्या, जिसे मैं अपना पिता मानती हूँ? समझ में नहीं आता क्या सोचूँ, क्या करूँ। मैं सिर्फ बैठकर रो सकती हूँ क्योंकि मेरा सारा जीवन ही झूठ का पुलिंदा बन गया है! मैं आज तक एक झूठी ज़िंदगी जी रही थी! मुझे महसूस होता है जैसे मेरे शरीर का कोई महत्वपूर्ण हिस्सा मुझसे टूटकर अलग हो गया है!

मैंने उससे कहा कि वह अब एक वयस्क है और चीजों को देखने-समझने का उसके पास एक परिपक्व नज़रिया होना चाहिए। एक मजबूत महिला की तरह उसे अपने भीतर इस झटके को, जो महज एक जानकारी है, झेलने की हिम्मत पैदा करनी चाहिए और उसे देखना चाहिए, जो पीछे छूट रहा है: तब वह पाएगी कि वास्तव में कुछ भी नहीं बदला है।

मेरी नज़र में यह बिल्कुल महत्वपूर्ण नहीं था कि कौन उसका जैविक पिता है। आप उसका नाम नहीं जानते, उसके बारे में अब तक कभी सोचा भी नहीं और उसके बगैर आपने किसी बात की कमी भी महसूस नहीं की-अब उसकी कमी क्यों महसूस हो? अब वह अचानक इतना महत्वपूर्ण क्यों हो जाए कि उसके विचार मात्र से आप अपनी ज़िंदगी तहस नहस कर बैठें?

अगर आप मजबूत नहीं हैं तो यह बात आपको भ्रमित करती रहेगी। इसके विपरीत अगर आप उसे सही परिप्रेक्ष्य में देखने की हिम्मत जुटा लें तो पाएंगे कि आप अब भी उसी ठोस ज़मीन पर खड़े हुए हैं, दुनिया में आपकी जगह ज़रा भी नहीं बदली है। जिस पुरुष ने आपका लालन-पालन किया और जो आपसे प्रेम करता है और जिससे आप भी बहुत प्रेम करती हैं वही हमेशा आपका पिता था और हमेशा-हमेशा के लिए आपका पिता बना रहेगा! आपका जींस उस प्रेम के सामने कोई मानी नहीं रखता, जो उस व्यक्ति से आपको अब तक प्राप्त होता रहा है और आगे भी जीवन भर प्राप्त होता रहेगा!

आप जैसी भी हैं, एक परिपूर्ण व्यक्ति हैं और सबसे पहले आपको अपने जीवन में स्थिरता प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए। बाद में अगर आपका दिल चाहे तो उस व्यक्ति की खोज भी कर सकती हैं मगर इस खोज से कोई बड़ी आशा न रखें। यह खोज तभी शुरू करें जब आपको लगे कि उस खोज के परिणाम आपकी मौजूदा ज़िंदगी पर कोई असर नहीं डाल पाएंगे।

वही बने रहें जो आप अब तक थीं। प्रेम आपके जींस से ज़्यादा महत्वपूर्ण है!