यह स्पष्ट करने के लिए कि आप नीरस या असंवेदनशील नहीं हैं, अपनी नास्तिकता को सबके सामने स्वीकार कीजिए – 28 जुलाई 2015

स्वामी बालेंदु नास्तिकों से आह्वान कर रहे हैं कि वे दूसरों को अपना दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से बताएँ और खुलकर कहें कि वे नास्तिक हैं। इस तरह, नास्तिकता को लेकर व्याप्त नकारात्मक छवि को बदला जा सकता है!

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माता-पिता के प्रेम में अपने जीवन से खिलवाड़ – 23 अप्रैल 2015

स्वामी बालेंदु एक वयस्क युवती का किस्सा बयान कर रहे हैं, जो इस डर से कि उसके माता-पिता को बुरा लग सकता है, अपने सपनों को साकार करने या अपने जीवन के लक्ष्यों को पाने का प्रयास छोड़ देती है।

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यथार्थ से कोसों दूर अपने निजी यथार्थ का निर्माण – 17 मार्च 2015

स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि वास्तविक संसार के नैसर्गिक नियमों की अनदेखी करते हुए अपनी आस्थाओं और कल्पनाओं के आधार पर अपना एक अलग संसार रच लेना, शारीरिक और मानसिक रूप से आपके लिए कितना घातक हो सकता है।

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आपके जीवन में आदर्शों की भूमिका – और वयस्क हो जाने के बाद क्यों उनकी ज़रूरत नहीं है – 5 फरवरी 2015

मनुष्य के जीवन में बचपन से लेकर वयस्क होने तक आदर्शों का विकास किस तरह होता है, स्वामी बालेंदु इस विषय पर रोशनी डाल रहे हैं।

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समलैंगिकता का विरोध नहीं, बल्कि स्वीकृति योग का काम होना चाहिए – 1 जून 2014

स्वामी बालेन्दु बता रहे हैं कि कैसे उनके एक मित्र का गुरु इस बात को पसंद नहीं करता था कि वह एक समलैंगिक है। वे पूछते हैं कि आखिर कोई ऐसे गुरु का अनुयायी कैसे हो सकता है।

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योग गुरु कैसे अपने समलैंगिक शिष्यों के मन में आतंरिक कलह पैदा करते हैं! 25 मई 2014

स्वामी बालेन्दु अपने एक समलैंगिक मित्र के बारे में बता रहे हैं, जो पहले एक हिन्दू योग गुरु का शिष्य था। उसके गुरु द्वारा उसकी समलैंगिकता का विरोध करने के कारण उसके मन में मचे आतंरिक संघर्ष के बारे में यहाँ पढ़ें।

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महिलाओं के मुकाबले पुरुषों के लिए अपनी समलैंगिकता को स्वीकार करना ज़्यादा कठिन क्यों होता है! 18 मई 2014

सन 2006 में स्वामी बालेन्दु ने बहुत से महिला और पुरुष समलैंगिकों के साथ काम किया था, जो उन्हें अपनी कहानियाँ सुनाते थे। इस ब्लॉग में वे उन्हीं अनुभवों के बारे में और विस्तार से लिख रहे हैं।

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पुरुषों के साथ अनुभव लेने के बाद बहुत सी महिलाएँ समलैंगिक क्यों हो जाती हैं! 11 मई 2014

स्वामी बालेन्दु उन कारणों की विवेचना कर रहे हैं, जिनके चलते बहुत सी चालीस-पार महिलाएँ अपने पति और बॉयफ्रेंड से अलग होकर किसी महिला के साथ सम्बन्ध बनाने को उद्यत होती हैं।

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धन-केन्द्रित समाज में अपने बच्चों को सभ्य इंसान बनाना – 1 अप्रैल 2014

स्वामी बालेंदु समझा रहे हैं कि कैसे स्वतन्त्रता-विहीन, सारिणीबद्ध पढ़ाई बच्चों को वही काम करने की ओर प्रवृत्त करती है, जो उन्हें बाहर से सिखाया जाता है।

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प्रेम आपके जींस से ज्यादा महत्वपूर्ण है – 23 फरवरी 2014

जब 18 साल की एक लड़की को पता चला कि उसका पिता उसका जैविक पिता नहीं है तो वह मानसिक रूप से टूट गई। स्वामी बालेंदु ने इस समस्या के समाधान हेतु क्या सलाह दी, यहाँ पढ़िये।

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