ग़ैर-हिन्दुओं के पास ऊंची हिन्दु पदवियां – उस धर्म में जो अपनाने से नहीं जन्म से मिलता है – 30 जनवरी 13

पिछले कुछ समय से मैं कुंभ मेले के ऊपर लिख रहा था, स्पष्ट है कि इस दौरान मैंने हिन्दुओं पर, भारतीयों पर, यहां के तीर्थस्थानों पर और शायद बाहरी देशों में मौजूद तीर्थस्थानों पर भी बहुत लिखा। हालांकि इस दौरान मैंने उन गैर-भारतीय साधुओं और गुरुओं के बारे में नहीं लिखा जो ज़ाहिर है, कुंभ-मेले में तीर्थयात्री या पर्यटक बनकर नहीं आए हैं, बल्कि नुमाइश के इस खेल का हिस्सा हैं।

मैंने पहले भी इसकी व्याख्या की थी कि हिन्दुत्व धर्म-परिवर्तन करके हिन्दु बनने की इजाज़त नहीं देता। आप इस्लाम अपना सकते हैं, ईसाई बन सकते हैं, लेकिन हिन्दुत्व धारण करने का कोई उपाय या विकल्प नहीं है। आप केवल जन्म से ही हिन्दु हो सकते हैं। यही वो कारण है कि बनारस के विश्वनाथ मंदिर, उड़ीसा में पूरी के जगन्नाथ मंदिर और दक्षिण भारत के अधिकतर हिंदु मंदिरों में आज भी गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है। और यह संदेश मंदिर के बाहर लगे साइनबोर्ड पर साफ़-साफ़ लिखा होता है जिसके कारण कोई भी विदेशी मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकता। मैंने एक बार इस तरह के धार्मिक नस्लवाद की व्याख्या की थी, लेकिन यह भी एक प्रकार से धर्म-परिवर्तन करके हिन्दु बनने की अवधारणा को खारिज करता है।

हास्यास्पद बात तो यह है कि हिन्दुत्व के व्यापारी यानी धार्मिक नेताओं और गुरूओं ने नफ़ा-नुक़्सान के चक्कर में अपने धर्म की राह ख़ुद ही छोड़ दी है। अख़बारों में रोज़ इलाहाबाद के कुंभ मेले में अपनी छटा बिखेर रहे अमेरिका, रूस, स्वीडन और अन्य देशों के साधुओं के क़िस्से छप रहे हैं। वो किसी भारतीय गुरू के भक्त नहीं हैं, न कोई सामान्य साधु हैं, वो ख़ुद ही गुरू हैं जिनके बड़े-बड़े पंडाल लगे हैं और वो अपने आस-पास मौजूद भारतीय गुरुओं द्वारा पूरी तरह स्वीकार्य और मान्य हैं, क्योंकि उन्हें उस पद तक लाने में हिन्दुत्व के एक बहुत पुराने धार्मिक संगठन का योगदान है, जिसके पास एक व्यक्ति को महामंडलेश्वर (अनुयायियों के एक समूह का प्रधान) की उपाधि देने का अधिकार है। और उस संगठन ने ऐसी पदवियां विदेशियों को भी दी! हालांकि अब सबको मालूम है कि ऐसी उपाधियां ख़रीदी जा सकती हैं, बस आपके पास पर्याप्त पैसे होने चाहिए।

हिन्दु धर्म तो इस बात तक की अनुमति नहीं देता कि कोई विदेशी मंदिर में प्रवेश करे, तो फिर यह कैसे मुमकिन है कि इसी धर्म का एक प्राचीन संगठन उन्हीं विदेशियों को अपने साथ जोड़ता है और यहां तक कि उन्हें ऊंचे पदों पर बैठाता है? अब वो खुद गुरू हैं और उनके अनेक अनुयायी हैं, कुंभ मेले में उनके तंबू गड़े हैं, बड़े-बड़े पंडाल सजे हैं, उनकी पूजा दुनिया के हर हिस्से में की जाती है- ज़ाहिर है तकनीकी रूप से ग़ैर-हिन्दु गुरुओं के चरणों में आस्थावान भारतीय हिन्दु भी बिछे हैं जो शायद अपने ही धर्म ग्रंथों से अनभिज्ञ हैं।

बात और बदतर तब हो जाती है जब आप इन सबको एकसाथ मिलकर इस त्योहार में अपनी दुकानें चलाते हुए देखते हैं। पश्चिमी गुरुओं और साधुओं की ठाठ भारतीयों से रत्ती भर भी कम नहीं है, वो अपनी रईसी की नुमाइश में और महिला अनुयायियों का आनंद लेने में भारतीयों की तरह ही कोई कसर नहीं छोड़ रहे। हालांकि इन उपाधियों पर विराजमान संन्यासियों के लिए क़ायदे से एक महिला से बात तक करना उचित नहीं है! एक पश्चिमी गुरू एक चुटकी राख 1100 रुपये में बेचने के लिए विख्यात है – लगभग 20 अमेरिकन डॉलर! इस कुंभ के मेले में वो ख़ूब पैसा बना रहे हैं, जबकि इस दौरान क़ायदे की बात करें तो उन्हें भौतिकवाद से खुद को अलग रखना चाहिए था।

यही कारण है कि मैं धर्म को विशुद्ध व्यवसाय मानता हूं। सब धर्म को अपनी सुविधा के हिसाब से संशोधित करते हैं, अपने हिसाब से उसका मतलब निकालते हैं, अपनी ख़ुद की परंपरा का निर्माण कर लेते हैं और फिर धर्म और भगवान को बेचने वाली दुकान खोलकर बैठ जाते हैं।

मुझे मालूम है कि वो विदेशी जो खुद को हिन्दु बताते हैं, मेरी बातों से सहमत नहीं होंगे, बल्कि उनमें से कोई भी गुरू मेरी बातों से सहमत नहीं होगा जिनकी दुकान धर्म से चलती है। आख़िरी बार जब मैंने इस विषय पर लिखा था तो उनलोगों द्वारा बहुत सी रोषपूर्ण प्रतिक्रियाएं मिली जिन्हें लगा कि मैं सच को बाहर ले आया हूं। मैं यह भी जानता हूं कि धार्मिक लोग, अनुयायीगण नियमित तौर पर मुझे मेरी बातों के लिए खरी-खोटी सुनाते रहेंगे, लेकिन वो उन गुरुओं के सामने सिर और पैर एक करके बिछे रहेंगे, भले ही वो उनसे पैसे ऐंठकर रईसी की नुमाइश करे और धर्म के मूल सिद्धांतों की ऐसी-तैसी करता रहे। घूम-फिरकर मैं दुबारा इसी निष्कर्ष पर पहुंचता हूं कि यह या तो दुखद है या हास्यास्पद – मैं तो हंसना पसंद करूंगा।

क्या है नागा साधू की मूल अवधारणा – मोह-माया का त्याग या गांजा पीने और नंग-धडंग रहने की छूट? – 29 जनवरी 13

जब आप कुंभ मेले पर लिखा कुछ भी पढ़ते हैं, तो सबसे पहले संभवतः उन दृश्यों का ख़्याल आपके मन में आता होगा जिन्हें समाचारों में ज़्यादातर दिखाया जाता है: गंगा की ओर दौड़ लगाते हुए हज़ारों नंगे पुरुष। अधिकतर लोगों को इस तथ्य की जानकारी है कि वो केवल पवित्र स्नान के लिए नंगे नहीं हुए हैं बल्कि निःवस्त्र रहना ही उनका वस्त्र है। उन्हें नागा साधू कहा जाता है और वो इतने रोचक तो हैं हीं कि मैं उन पर और उनके दर्शन पर एक लेख लिखूं।

नागा को सरल अर्थों में नंगा कह सकते हैं, तो वो सब नंगे साधू हैं। आप ये भी कह सकते हैं कि वो विरक्ति के चरम तक पहुंच चुके साधू हैं। एक साधू का सिद्धांत बेहद स्पष्ट है: वो मोह-माया से दूर रहते हैं। उन्होंने अपने परिवारों से हर प्रकार का संबंध तोड़ लिया है ताकि वो भावनात्मक बंधन से मुक्त रहें, वो हमेशा घूमते रहते हैं ताकि वो किसी भौगोलिक परिवेश से जुड़ाव न महसूस करने लगें और उनके पास धन-संपदा जैसी चीज़ें नहीं होती हैं। वो कुछ जमा करके या बचक करके नहीं रखते, उतना ही रखते हैं जितना हाथों में आता है और जितने से उस वक़्त का गुज़ारा हो जाएगा।

एक नागा साधू दुनियावी चीज़ों से एक क़दम और आगे बढ़ता है और वस्त्रों से भी अपना जुड़ाव समाप्त कर लेता है। अधिक से अधिक विरक्ति की प्रक्रिया में यह एक तार्किक अगला क़दम माना जाता है। जब आपके साथ आपके शरीर पर वस्त्रों के अलावा और कोई जुड़ाव नहीं रह गया तो वस्त्रों का परित्याग ही विरक्ति की दिशा में आपका अगला क़दम होगा। अगर आपके पास वस्त्र हैं, आपको उन्हें धोना होगा, तो ऐसे में आपके पास कपड़ों का एक दूसरा जोड़ा भी होना चाहिए। अगर आपके पास दो जोड़े पतलून हैं, तो एक आप पहनेंगे और दूसरे को रखने के लिए या तो एक थैला रखेंगे या कोई गठरीनुमा कपड़ा। अगर आपके पास एक थैला है तो आपको इस बात का ध्यान रखना होगा कि सोते हुए आप इसे कहां रखना है और यह ध्यान भी रखना होगा कि आप इसे कहीं भूल न जाएं। अगर कोई इसे चुरा लेता है, तो आप इसे एक तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं कर पाएंगे, आपको दुख होगा: अंततः आप मोह-माया के चक्कर में आ ही गए। तो नागा साधू ने ऐसी किसी भी चीज़ों को रखने से ही इन्कार कर दिया।

नागा साधुओं को क़ायदे से ईश्वर के प्रति आकंठ प्रेम और अध्यात्म की गहराई में कुछ इस तरह रहना चाहिए कि उन्हें इस बात से फ़र्क़ ही न पड़े कि वो कैसे दिखते हैं या मौसम में धूप की रूखी तपिश है या ठंड की गला देने वाली कंपकपाहट। न ही उन्हें अपने शरीर से इतना जुड़ाव है कि वे उसे ताप या ठंड से बचाएं।

नागा साधू की मूल अवधारणा ये है और शायद प्राचीन समय में नागा साधू ऐसे ही होते थे। उनके पास कुछ भी नहीं हुआ करता था, कपड़े भी नहीं। आज आप देखेंगे कि उनके पास केवल वस्त्र नहीं हैं, उसके अलावा सबकुछ है। उनमें से कइयों के पास पैसे हैं, सोना है, ज़ेवर हैं, गाड़ी तक है, वो असल में विलासी साधू हैं! साधारण वस्त्रों वाले साधू ने कुंभ मेले में अपने अस्थायी पंडालों के निर्माण और उनकी सजावट में लाखों रुपये खर्च किए हैं! ठीक उसी तरह इधर-उधर घूमने वाले नागा साधू घूमते तो नंग-धडंग होकर हैं, लेकिन उनकी उंगली पर बेशकीमती अंगूठियां होंगी और अपना यौनांग दिखाने के लिए वो आपसे पैसे मांगेंगे। नागा साधुओं को मालूम है फ़ोटोग्राफ़र को कैसे पोज़ देना है, उन्हें यह भी मालूम है कि पश्चिम से इस मेले को देखने आईं युवा महिलाओं को कैसे अपनी नंगई दिखानी है, चूंकि वो जानते हैं उनकी तस्वीरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छपेंगी, दिखायी जाएंगी। वो नशा करते रहते है, इसलिए सर्दी का उनपर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। क्या इसे विरक्ति कहेंगे?

सुनने में आया है कि इस बार के कुंभ मेले में महिला नागा साधुओं की भी एक जमात है, उनका शिविर अलग है, लोगों की पहुंच से दूर। अगर यह सत्य है, तो वे लोगों के बीच क्यूं नहीं आतीं जैसे पुरुष नागा कर रहे हैं? खै़र, क्या यह अजीबोगरीब बात नहीं है कि अगर कोई सामान्य आदमी सार्वजनिक रूप से से नंगा होकर घूमे, तो उसे अश्लील और आपराधिक माना जाएगा जबकि यही काम एक धार्मिक व्यक्ति करे, तो कोई समस्या नहीं! अगर आप ऐसा करेंगे तो यक़ीन मानिए आपको हिरासत में ले लिया जाएगा और ज़ुर्माना भी भरना पड़ेगा। अगर वो करते हैं, तो लोग उनकी तस्वीरें लेते हैं, तस्वीरें व्यापक पैमाने पर दुनिया भर में छपती हैं और लोग बाग़-बाग़ हो जाते हैं, न कि आहत होते हैं।

अजीब दुनिया नहीं है ये?

प्रदूषित गंगा से रोगों को आमंत्रण-सिर्फ पापों के धुलने तक सीमित नही है गंगास्नान 28 जनवरी 2013

पिछले सप्ताह मैंने बताना शुरू किया था कि निश्चित रूप से मैं कुम्भ मेलें में नही जा रहा हूं जो कि इलाहाबाद में पूरे जोर-शोर से चल रहा था। इसके कई कारण है एक तो मैं धार्मिक नही हूं और दूसरा वहां जाने में मुझे कोई फायदा नही दिखाई देता क्योकि वहां पर बालशोषण और बड़े-बड़े धन्धें होते हैं। वहां पर न जाने का एक बहुत बड़ा कारण गंगा का प्रदूषण है जो कि सिर्फ मेरे जैसे अविश्वासी या नास्तिक का ही नही बल्कि बहुत बड़े आस्तिक लोगों का भी न जाने का यही कारण हो सकता है।

इलाहाबाद में यमुना नदी पवित्र गंगा नदी में मिल जाती है और इलाहाबाद से फिर गंगा नदी ही अविरल बहती है। धार्मिक लोगों के लिये यह एक पवित्र स्थान है क्योकि पावन यमुना पतित पावन गंगा में ही समाहित हो जाती है जिससे उसकी पावनता दोगुनी हो जाती है। इसके अतिरिक्त इस जगह के पीछे एक कथा है कि यहां पर अमरता का अमृत गिरा था और इसलिये यह संगम स्थल मेले का मुख्य स्थान है। कुम्भ मेले में आने वाले लोगों का मुख्य उद्देश्य यही रहता है कि वह गंगा में डुबकी लगाये। ऐसा माना जाता है कि यह आपके पापों को धोता है। उनके लिये यह एक पवित्र स्नान है और पापों से मुक्त करता है। मुझे तो यह सबसे ज्यादा गंदगी वाली जगहों में से एक जगह लगती है जहां पर लोग अपने आप को धोते हैं। शायद यह जगह दो नदियों के संगम का सबसे ज्यादा प्रदूषित स्थान है। यमुना नदी दिल्ली, आगरा व अन्य शहरों का प्रदूषण और अपशिष्ट जल अपने साथ लाती है और गंगा नदी भी पहाड़ों से निकलकर मैदानों की सारी गंदगी को इसी में मिला देती है। क्या वास्तव में आप इस गंदगी में कूदना चाहते है जिसमें मानवीय और औद्योगिक अपशिष्ट होता है?

हांलांकि मैं जानता हूं कि उन अंधविश्वासियों को उस प्रदूषित जल में नहाने और कुछ घूंट पानी पीने से से रोकने का कोई रास्ता नही है। ऐसा माना जाता है कि यह आपके पापों को धोता है लेकिन यह भी सच है कि यह जल अपने साथ कई तरह की बीमारियां जैसे एलर्जी, त्वचा रोग, पेट सम्बन्धी रोग, पाचन समस्याएं और भी अन्य गंभीर बीमारियों को जन्म दे सकता है क्योकि इस पानी में प्रदूषण होता है जो कि हमारे प्रतिदिन पीने वाले पानी के प्रदूषण स्तर से कहीं अधिक होता है।

अगर आप अपने शरीर के साथ ऐसा करना चाहते है तो मुझे नहीं लगता कि आपको बीमार होने से कोई बचा सकता है। मुझे ऐसे कर्मकाण्डीय स्नान से आपत्ति है क्योंकि परोक्ष रूप से यह मुझे भी नुकसान पहुंचाता है। यह बताता हूं कि कैसे? 14 जनवरी के बहुत बड़े जनसैलाब के स्नान से पहले और बाद के किये गये जल के परीक्षणों से पता चला है कि उस जल में प्रदूषण का स्तर बहुत अधिक है और यह स्तर लोगों के नहाने के बाद दोगुना हो गया था।

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि लगभग आठ करोड़ लोगों ने अपने पापों को धोने के साथ-साथ अपनी शारीरिक गंदगी को भी उसमें धोया था। उम्मीद की जा रही है कि अपने पूर्ण समय में कुम्भ मेले में दस करोड़ लोग स्नान करेंगे और इसके अतिरिक्त स्नान के साथ वह धार्मिक अनुष्ठानों का अपशिष्ट भी नदी में प्रवाहित करेंगे। ऐसा करने से आप हमारे देश की सबसे बड़ी नदी को प्रदूषित कर रहे हैं। यह एक सच है कि यह मेरे साथ-साथ हर दूसरे भारतीय को प्रभावित कर रही है और भारतीय ही क्यों पृथ्वी पर रहने वाले हर प्राणी को प्रभावित कर रही है।

अधिकारियों ने अब इस पानी में और अधिक पानी छोड़ा है क्योकि वह चाहते है कि इससे प्रदूषण का स्तर एक स्थान पर इतना अधिक न होने पाये और शायद वह यह भी नही चाहते कि इतने बड़े जनसैलाब मे बीमारी और रोगों के फैलने का समाचार अन्तर्राष्ट्रीय ख़बर बने।

निष्कर्ष यही है कि इस त्यौहार में अपनी भागीदारी देना उचित नही है जो कि एक आध्यात्मिक बकवास है, जिसमें मानवीय शोषण होता है। इसमें तो सिर्फ धन्धा ही होता है और यह आपके स्वास्थ्य के साथ-साथ हमारे पर्यावरण को भी हानि पहुंचाता है। अब आप खुद ही सोच सकते है कि आप क्या करना चाहेंगे?

प्रदर्शन और धन कमाने का धन्धा – कुम्भ मेले में साधु और गुरु – 24 जनवरी 2013

कल मैंने बताया कि मैं कुम्भ मेले में नही जा रहा हूं क्योकि इस बात को मैं नही मानता कि गंगास्नान से पाप धुलते हैं और सिर्फ इसलिये ही नही बल्कि और भी वजहें है जिसमें मुझे दिलचस्पी नही है और वास्तव में वे चीजे़ मुझे नापसन्द है पर साथ ही खुशी इस बात की है कि इस समय मैं इलाहाबाद के नज़दीक नही हूं। एक अति महत्वपूर्ण बात जो कि मैने देखी वह यह कि इन साधुओं और बाबाओं में धनलोलुपता बहुत होती है। एक बहुत बड़ा धन्धा धर्म के नाम पर चल रहा है।

मैंने ऐसी रिपोर्ट देखी और सुनी हैं जो लोग कुम्भ मेले से वापस आये है उनकी यही प्रतिक्रिया थी कि वहां पर धर्म के नाम पर धन्धा चल रहा है। मैं उन गुरुओं, महात्माओं और साधुओं के बारे में उल्लेख कर चुका हूं जो इस समय कुम्भ मेले में हैं। वो सिर्फ साधु और गुरु ही नहीं हैं बल्कि उन्हें धन कमाने के बहुत तरीके आते है और यही उनका धन्धा है।

वे प्रवाचक तो है और प्रवचन देना उनका काम है और भाषणबाज़ी भी अच्छी कर लेते हैं। वे अनुष्ठान करते हैं, गंगा में डुबकी लगाते हैं, और लोगों को भीड़ भी अपने पास इकट्ठा किये रहते हैं। हांलाकि वह अपनी भाषणबाज़ी के लिये धन नही मांगते हैं बल्कि वह व्यक्तिगत रूप से लोगों से अनुष्ठान कराने के लिये अवश्य धन मांगते हैं। वे अपने शिविरों में अनुयायियों के साथ इकट्ठा रहते हैं और उनका प्रयास रहता है कि इस आयोजन पर अधिक से अधिक अनुयायियों की जमात बनाते जायें। उनके अनुयायी उन्हें उनसे मिलने, आर्शीवाद लेने और अनुष्ठान कराने का धन देते हैं।

ये सभी गुरु सेल्समैन है, इनके शिविरों में इनकी खुद की दुकाने हैं जिसमें ये माला, ताबीज़, उनके व देवताओ के चित्र बने हुए पेंडेंण्ड्स आदि सब बेचते हैं। अब आप यह तर्क मत देने लगना कि वह खुद तो दुकान पर नही बैठते और न ही पैसे लेते हैं तो इसके लिये आपको बता दूं जैसे बड़े-बड़े सफल दुकानों के मालिक खुद अपनी दुकानों पर नहीं बैठते बल्कि उनके स्टोर मैनेजर बैठते है ठीक वैसे ही इनकी भी दुकानें चलती हैं।

ये होटलों के मालिक भी होते हैं और ये बात इस साल मुझे पता चली है। ये साधु लोग अपने अनुयायियों के लिये आध्यात्मिक छुट्टियों का एक पैकेज भी रखते है जिससे वे लोग कुम्भ मेले में आये और उनके शिविर से किराये पर टेन्ट आदि ले सकें। हमारे स्थानीय समाचार पत्रों में उन सामग्रियों का किराया भी छपा था जिसका मूल्य भी अकसर दर्शनार्थियों की संख्या के अनुसार घटता बढ़ता रहता है, अगर ज्यादा भीड़ हुयी तो अधिक मूल्य और कम हुयी तो कम मूल्य होता है। मूल्यों का विभाजन तीन श्रेणियों नियमित दर्शनार्थी, विशिष्ट दर्शनार्थी और अति विशिष्ट दर्शनार्थी में किया जाता है।

जब मैंने कुम्भ मेले में लोगों के अनुभवो को पढ़ा,तो उनका कहना था कि उन्होंने कुम्भ मेले में ज़रा भी आध्यात्मिकता और दिव्यता का अनुभव नही किया। वहां पर जो भी चींजे़ थी चाहे वो दुकाने हो, खाने का सामान हो और जो लोग टेन्ट लगाये हुये थे उनका बस एक ही उद्देश्य था कि लोग उनकी दुकानों में आये या फिर ये कह लीजिये कि यह सब मज़े लेने के लिये आयोजित किया गया एक मेला हो।

इन सब के साथ सभी गुरू और साधू अपना धन कमाने में लगे हुए थे। कुम्भ मेले में ये बड़ी-बड़ी लग्ज़री कारों से आते हैं और वातानुकूलित टेन्ट में रहते हैं। ये सोने और चांदी के सिंहासन पर बैठते हैं, इनकी मेज पर चांदी के बर्तन रहते हैं और रत्नजडि़त सोने के हार पहनते हैं। ये यह दिखाते हैं कि वह कितने धनी है, अब बताइए कि ये किस प्रकार किसी पैसे वाले सेठ से भिन्न हैं! आप इन्हें धार्मिक व्यापारी कह सकते हो

हास्यास्पद बात यह है कि वह अपने आप को साधु और सन्यासी कहते है मतलब उन्होंने वैराग्य ले लिया है। साधु और सन्यासी ऐसा शब्द है जिसका मतलब है कि जिसका इस भौतिक दुनिया से कोई मतलब न हो और जिसका धन से कोई लेना देना नहीं है। उनका भौतिकवाद और धन का प्रदर्शन साधु शब्द के वास्तविक अर्थ को ही बदल देता है, और ये सब ही आप उस मेले में देखते हैं। इसलिये निश्चित रूप से मैं वहां नहीं जाऊंगा।

साधु – एक अनासक्त जीवन – 18 फरवरी 2008

कल हमें वापस भारत के लिए रवाना होना है और आज हम उस यात्रा की तैयारी में व्यस्त हैं। हम अब वापसी के लिए उतावले हो रहे हैं और हमारा बोरिया-बिस्तर तैयार है!

कल मैंने एक साधु का उदाहरण देते हुए समझाया कि अनासक्ति का क्या अर्थ होता है। आज मैं एक साधु के जीवन के बारे में कुछ विस्तार से बताना चाहता हूँ कि उससे भारतीय संस्कृति के बारे में क्या पता चलता है और हम कितने कम साधनों में जीवन गुज़ार सकते हैं। आज भी लाखों लोग हैं जो इस प्रकार का जीवन जीते हैं। जैसा कि मैंने कल बताया उनकी किसी चीज़ में कोई आसक्ति नहीं होती। लोगों से नहीं, किसी स्थान से नहीं या किन्ही भौतिक चीजों से भी नहीं। अगर आप किसी साधु से पूछें कि आप कहाँ के रहने वाले हैं या आपके माता-पिता कौन हैं तो वे नाराज़ हो जाएंगे, बल्कि अपमानित महसूस करेंगे। सभी जानते हैं कि वे ऐसी बातों के बारे में बात करना पसंद नहीं करते और इन सब बातों से अनासक्त हो चुके हैं।

एक कहावत है: वे पेड़ के नीचे रहते हैं और हाथ में खाते हैं। खासकर वृंदावन में यह एक पवित्र परंपरा है और जब कोई साधु आपके द्वार पर आता है तो उसे अच्छी से अच्छी चीज़ें खाने को दी जाती हैं। बचपन में एक साधु अक्सर हमारे घर आया करता था। साधु आपके घर आता है और दरवाजा खटखटाता है लेकिन वह अंदर नहीं आता। अगर आ जाए तो घर का मालिक इतना कृतकृत्य हो जाता है जैसे ईश्वर ही चलकर उसके यहाँ आ गए हों। फिर उसके हाथ में अधिक से अधिक वस्तुएं रख दी जाती हैं क्योंकि वह थाली में कोई चीज़ नहीं लेता। मेरी माँ हमेशा उसके हाथ पर सबसे पहले रोटी रखती थीं फिर उस पर चाँवल फिर सब्जी और दाल परोसती थीं। वह अधिक से अधिक जितना उसके हाथ में आ सकता था रखती जाती थीं और वह अपने हाथ से सीधे खा लेता था। और मेहरबानी करके याद रखें, इसे भीख मांगना नहीं माना जाता! उसे खिलाकर सभी को खुशी होती है। वे ऐसा जीवन जीते हैं कि उन्हें भोजन से भी कोई आसक्ति नहीं होती। उनका सिर्फ एक काम होता है, ईश्वर को अपना जीवन समर्पित कर देना और आध्यात्मिक रूप से ध्यानमग्न होकर ईश्वर के साथ एकात्म हो जाना। उनके पास कोई सामान नहीं होता; वह ऐसे ही रहते हैं, किसी तालाब या नदी में नहा लेते हैं। साधु अपनी आवश्यकताओं को एक एक करके कम करते जाते हैं और गाँव-गाँव घूमते रहते हैं जिससे किसी एक स्थान से उन्हें लगाव या मोह न हो जाए। और कोई भी इस जीवन का चुनाव कर सकता है। मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूँ जो एक सफल वकील थे, काफी अमीर थे कि जो चाहते प्राप्त कर सकते थे; मगर एक दिन अचानक वे साधु हो गए। वे अपना घर-बार छोडकर और ईश्वर में ध्यान लगाते हुए जीवन बिताने के अपने निर्णय से बहुत खुश थे। मैंने स्वयं भी अपने जीवन का काफी समय साधु बनकर इसी तरह गाँव-गाँव घूमते हुए गुज़ारा है। मैं समझता हूँ कि अपना सर्वस्व अपने ईश्वर, यानी प्रेम को समर्पित करते हुए आज भी मैं वही साधु का जीवन जी रहा हूँ। हमने आखिरी दिन एक अनुष्ठान का आयोजन किया और यूरोप की अपनी यात्रा सम्पन्न की।