संथारा की मूर्खतापूर्ण परंपरा की वजह से आत्महत्या को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता! 26 अगस्त 2015

सोमवार को मैं एक टी वी परिचर्चा के लिए बहुत लघु-सूचना पर दिल्ली गया था। चर्चा का विषय था, संथारा, जो जैन समुदाय की एक धार्मिक प्रथा है। पहले मैं आपको बताता हूँ कि ठीक-ठीक यह प्रथा है क्या और इस विषय पर अभी अचानक टी वी चर्चा क्यों आयोजित की गई और इस पर मेरा रुख क्या रहा, यह भी स्पष्ट करूँगा।

संथारा, जिसे सल्लेखना भी कहते हैं, जैन धर्म में आस्था रखने वालों की एक प्रथा है, जिसके अनुसार 75 साल से अधिक उम्र वाले लोग स्वेच्छा से मृत्यु का वरण करते हैं। जैन धर्म का कोई वृद्ध व्यक्ति यदि यह महसूस करता है कि जीने का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है, अगर वह मुक्ति चाहता है, अगर उसे लगता है कि संसार को उसकी ज़रूरत नहीं है या स्वयं उसे संसार की ज़रूरत नहीं रह गई है तो वह व्यक्ति खाना-पीना छोड़ देता है। अब वह एक कौर भी मुँह में नहीं डालेगा, न ही एक घूँट पानी पीएगा। वह भूख और प्यास सहन करते हुए मौत को गले लगाएगा-और उसके सधर्मी नाते-रिश्तेदार और मित्र उसकी प्रशंसा करेंगे।

अतीत में इसी तरह से उनके संतों ने प्राण त्यागे थे और मरने के इसी तरीके को जैन धर्म गौरवान्वित करता है। लेकिन हाल ही में हाई कोर्ट ने इस प्रथा पर पाबंदी लगा दी है क्योंकि कोर्ट उसे आत्महत्या मानता है।

स्वाभाविक ही, जैन समुदाय इससे नाराज़ है और न्याय पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की शरण लेने का विचार कर रहा है, जिससे इस पाबंदी को हटवाया जा सके। उनका कहना है कि कोर्ट या क़ानून प्राचीन समय से चली आ रही इस प्रथा और परंपरा को वर्जित घोषित नहीं कर सकते।

तो इस विषय पर मैं इन पाँच महानुभावों के साथ टी वी पर बहस कर रहा था। मैंने साफ शब्दों में कहा कि यह आत्महत्या के सिवा और कुछ नहीं है-और इसीलिए कोर्ट ने उस पर पाबंदी लगाई है! भारत में हर साल लगभग 200 लोग इस तरीके से खुद अपनी जान ले लेते हैं! अगर कोई भूख-हड़ताल पर बैठता है तो सरकार उसे मरने नहीं देती- बल्कि वह उसे ज़बरदस्ती खाना खिलाती है! और इधर आप खाना-पीना छोड़ देते हैं कि मर जाएँ-क्या फर्क है, दोनों में?

मेरी बात का ज़बरदस्त विरोध हुआ- यह कहते हुए कि यह आत्महत्या नहीं है बल्कि आत्मा की शुद्धि के लिए किया जाने वाला तप है। आत्मा जानती है कि उसका समय पूरा हो गया है और पुनर्जन्म के लिए यह प्रक्रिया ज़रूरी है।

मैंने उनके इस जवाब का खण्डन करते हुए कहा कि यह महज बकवास है और आत्मा या पुनर्जन्म जैसी कोई चीज़ नहीं होती। अगर आप उन्हें खुद की हत्या की इजाज़त देते हैं तो आपको सभी को आत्महत्या की इजाज़त देनी होगी। फिर ऐसा कानून बनाइए कि सभी अपनी मर्ज़ी से मृत्यु का वरण कर सकें- तब हर कोई, जब उसकी मरने की इच्छा होगी, अपनी हत्या का निर्णय ले सकेगा। लेकिन आप यह अधिकार सिर्फ अपने लिए रखना चाहते हैं क्योंकि दूसरों को इसकी इजाज़त ही नहीं है! और ऐसी मौत को आप गौरवान्वित कर रहे हैं, जिससे लोग उनका अनुसरण करने लगें! आप उन्हें आत्महत्या करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं!

उन्होंने कहा कि उनके पूर्वज भी सदा से इस प्रथा का पालन करते रहे हैं। एक वकील ने, जो इस पाबंदी का विरोध कर रहे हैं, दावा किया कि यह आत्महत्या है ही नहीं क्योंकि आत्मा समय आने पर ही अपने शरीर का त्याग करेगी। इस तरह लोग बिना खाए-पिए महीनों और सालों पड़े रहते हैं। इसके अलावा युवकों को संथारा लेने के लिए नहीं कहा जाता, सिर्फ 75 साल से अधिक उम्र वाले ही संथारा ले सकते हैं।

मेरे विचार से यह कोई तर्क नहीं है कि 'हमारे पूर्वज यही किया करते थे'! इसका अर्थ यह नहीं है कि यह ठीक है और सिर्फ इसलिए कि अतीत में वे कोई गलत बात कर रहे थे इसलिए आपको भी वही करते चले जाना चाहिए! यही तर्क हिंदुओं की सती प्रथा के लिए भी दिया जाता था, जिसमें पति की चिता के साथ पत्नी भी आत्महत्या कर लेती थीं! जब तक उस पर पाबंदी नहीं लगी थी, वास्तव में उन्हें इस परंपरा का अनुपालन करने के लिए मजबूर किया जाता था यहाँ तक कि जबर्दस्ती मृत पति की चिता में झोंक दिया जाता था! तब भी बहुत से लोगों ने इसका विरोध किया था- लेकिन आखिर किसी देश के क़ानून धर्म या परंपरा के अनुसार नहीं बनाए जा सकते!

आपका यह तर्क भी, कि संथारा सिर्फ वृद्ध व्यक्ति ही ले सकते हैं, एक बेहद कमजोर तर्क है! क्योंकि इस बात का निर्णय कौन करेगा कि कौन वृद्ध है और कौन वृद्ध नहीं है? यह दावा कौन कर सकता है कि वृद्ध लोग समाज के लिए उपयोगी नहीं रह गए हैं या उस पर बोझ बन गए हैं? आप उनके मन में यह विचार क्यों डालना चाहते हैं कि आप 75 साल के हो गए हैं इसलिए अब आपको मरना होगा? बहुत से राजनीतिज्ञ और दूसरे क्षेत्रों में काम करने वाले लोग अस्सी-अस्सी साल से ज़्यादा उम्र के हो चुके हैं और अपना काम भलीभाँति अंजाम दे रहे हैं! यह देखते हुए कि मेरी नानी मेरी बेटी के लिए कितनी मूल्यवान है, मैं इस मूर्खतापूर्ण परंपरा की खातिर उसे खोना नहीं चाहूँगा! वह इस समय 95 साल की है, शायद उससे भी अधिक- यानी इस तरह हम उसे 20 साल पहले ही खो चुके होते!

और मैं इस बात का जवाब भी देना पसंद नहीं करूँगा कि कोई व्यक्ति एक घूँट पानी पिए बगैर भी एक माह तक ज़िंदा रह सकता है- सालों जीवित रहने की बात तो छोड़ ही दीजिए! यह बकवास के सिवा कुछ नहीं है और मेरी नज़र में पाखंडियों का बहुत बड़ा कपटपूर्ण दावा है- आखिर धार्मिक धोखेबाज़ों का तो काम ही यही है!

मेरा विश्वास है कि यह पाबंदी बनी रहेगी और मेरे खयाल से यह अच्छा ही है कि आखिरकार यह प्रथा भी समाप्त हो जाएगी।

भारत में परंपरागत आयोजित विवाह – सस्ती नौकरानी ढूँढ़ने का एक तरीका? 3 फरवरी 2015

आप जानते हैं कि भारत में परिवार द्वारा आयोजित विवाह एक सामान्य बात है। इन विवाहों के बारे में आपको एक से एक बढ़कर कहानियाँ सुनने को मिल सकती हैं और पश्चिमी देशों के लोग अक्सर आश्चर्य प्रकट करते हैं कि किसी पूर्णतः अपरिचित व्यक्ति के साथ आप विवाह कैसे कर सकते हैं। लेकिन कभी-कभी आपको थोड़ा व्यावहारिक रवैया अपनाना पड़ता है। जैसे आप इस बात को समझें कि आने वाली पत्नी या बहू लड़के के परिवार में किस तरह एक सहायक या नौकरानी की भूमिका निबाह सकती है! अगर आपको घरेलू कामकाज के लिए दो जोड़ी हाथों की दरकार है तो क्या इस प्रकार का विवाह उपयुक्त विचार नहीं है?

सुनने में यह आपको बहुत अच्छा नहीं लग रहा होगा और मुझे भी नहीं लगता लेकिन अगर आप गंभीरता से सोचें तो आपको पता चलेगा की वास्तव में कई बार ऐसा होता है। मैं आपको एक भारतीय युवक का किस्सा बताता हूँ, जिससे अभी हाल ही में मेरी मुलाक़ात हुई थी।

यह व्यक्ति लगभग 30 साल का व्यक्ति है और अपने परिवार का इकलौता बेटा है। उसकी तीन बहनें हैं जिनमें से दो बड़ी बहनों के विवाह हो चुके हैं। वह खुद और उसकी छोटी बहन अविवाहित हैं। उसकी माँ का देहांत पाँच साल पहले हो चुका था और उसके घर में अब उसके पिता और छोटी बहन भर रहते हैं। उसकी बड़ी बहनें अपने पतियों के साथ रहती हैं और यह युवक अपने परिवार से लगभग 600 किलोमीटर दूर किसी शहर में नौकरी करता है।

हाल ही में उसके पिता का स्वास्थ्य खराब रहने लगा। इस कारण छोटी बहन के लिए घर के कामों का बोझ बहुत असहनीय हो गया और वैसे भी विवाह करने की बारी अब इसी व्यक्ति की थी। तो उन्होंने विवाह की प्रक्रिया तेज़ कर दी और उपयुक्त लड़की की तलाश में ज़्यादा से ज़्यादा परिवारों में बात चलाना शुरू किया और अंततः पिता को बेटे के लिए वह ‘उपयुक्त’ लड़की मिल ही गई।

अब शादी की अंतिम तैयारियाँ शुरू हो चुकी हैं, दोनों परिवार खुश हैं और शादी की तैयारी में लगे हुए भविष्य की ओर देख रहे हैं। लड़की को अपने होने वाले पति की नौकरी के बारे में पता है। परिवार की सारी स्थिति उसे पता है।

वह जानती है कि वह अपने पति के साथ उसके काम वाली जगह नहीं रह सकेगी बल्कि उसे उसके पिता यानी अपने होने वाले ससुर के पास रहना होगा। कुछ सालों में छोटी बहन का विवाह भी हो जाएगा। उसे यह भी पता है कि कुछ ही समय बाद एक बूढ़े व्यक्ति की देखभाल की ज़िम्मेदारी उस पर होगी। उस युवक ने मुझे साफ शब्दों में निःसंकोच सब कुछ बताया: मेरे पिता और घर के कामकाज की ज़िम्मेदारी किसी न किसी को तो लेनी ही थी। वह भी जानता है कि अभी-अभी विवाह करके लाई गई अपनी पत्नी को वह ज़्यादा समय नहीं दे पाएगा। लेकिन विवाह भी आखिर वह इस काम के लिए नहीं कर रहा है कि पूरे समय पत्नी के साथ रहे!

अब बताइए कि यह क्या है? है न एक सस्ती नौकरानी प्राप्त करने का तरीका? या शायद उस लड़की के लिए भी एक अच्छा सौदा, क्योंकि उसकी सास या कोई बड़ी, उम्रदराज ननंद घर पर नहीं होगी? घर पर एकछत्र राज! कोई सत्ता की लड़ाई नहीं, मुफ्त श्रम और ससुर की सेवा के एवज में घर के कामों में सम्पूर्ण स्वतन्त्रता!

कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं इसे कुछ ज़्यादा ही गंभीरता से ले रहा हूँ?

जब मैं पारंपरिक विवाह समारोह में शिरकत करता हूँ तो क्या मैं दहेज प्रथा का समर्थन करता हूँ? 25 दिसंबर 2014

कल मैंने कुछ परिस्थितियों का वर्णन किया था, जिसमें मैंने कहा था कि यदि अस्पृश्यता और दहेज प्रथा जैसी हानिकारक और पूरी तरह अन्यायपूर्ण परम्पराओं का पालन न करने की बात हो तो हमें अपने आधुनिक विचारों पर अडिग रहना चाहिए। एक भारतीय ने कुछ दिन पहले मुझसे कहा कि वह भी पेशोपेश में है कि क्या उसकी परिस्थिति भी उसी श्रेणी में आती है। उसका मित्र विवाह कर रहा था और वह जानता था कि मित्र के विवाह में दहेज लिया जाएगा, जिसका वह दृढ़ता पूर्वक विरोध करता था। अब वह पेशोपेश में था कि क्या उसे अपने मित्र के विवाह में शामिल होना चाहिए या नहीं यानी क्या वह वहाँ जाकर दहेज प्रथा का समर्थन कर रहा होगा!

जब इस तरह के मामले सामने आते हैं तो कुछ लोग कहते हैं कि मैं बहुत सख्त हूँ। और वास्तव में मैं अपने शब्दों का शब्दशः पालन करता हूँ और जो लिखता हूँ या कहता हूँ, उस पर पूरा अमल करता हूँ। लेकिन साथ ही मैं इन दो स्थितियों में अंतर कर सकता हूँ कि कब अपने विश्वास या अविश्वास को सबके सामने रखना चाहिए और कब उनसे मुझे एक मित्र की तरह मिलना चाहिए क्योंकि हम एक दूसरे से प्रेम करते हैं।

मेरे विचार में यहाँ भी वही मामला है। अगर वह आपका घनिष्ठ मित्र है तो शायद आपने अपना मंतव्य ज़ाहिर कर दिया है। अगर वह आपका करीबी रिश्तेदार है और आपको इस मामले में उससे कुछ कहना है तो मैं कहूँगा कि आपको दहेज के इंतज़ाम या उसके ‘लेन-देन’ को रोकने के लिए, जो भी आपसे बन पड़े, करना ही चाहिए।

आप कितना भी करीबी रूप से दूल्हा या दुल्हन से जुड़े हों, दहेज के मुद्दे पर आपके विवाह समारोह में न जाने पर विवाह नहीं रुकने वाला। अगर आप रिश्तेदार नहीं हैं, करीबी मित्र भी नहीं हैं तो फिर आपको समारोह में बुलाने वाले इसका बुरा नहीं मानेंगे बल्कि हो सकता है आपके न आने को नोटिस तक न लें और तब आपका विरोध अलक्षित रह जाएगा। अगर आप करीबी रिश्तेदार या मित्र हैं तो आपके न आने पर वे विचलित होंगे और उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचेगी और आप उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचा रहे होंगे।

आपका यह व्यवहार आपके आपसी रिश्तों को तो नुकसान पहुँचाएगा मगर आपके मित्रों या रिश्तेदारों को अपनी दकियानूसी और नुकसानदेह परंपराओं का पालन करने से नहीं रोक पाएगा। जब आप उनके सामने अपने विचार रखकर कुछ नहीं कर पाए तो ऐसा करके भी कुछ हासिल नहीं कर पाएँगे।

और यहाँ मैं आपसे यह सवाल पूछना चाहता हूँ कि अधिक महत्वपूर्ण क्या है: आपका अहं, जोकि उनके द्वारा आपके विचारों का अनुपालन न करने के कारण आहत हुआ है या उनके प्रति आपका स्नेह? आपका विश्वास या आपकी मित्रता?

मेरे विचार से विवाह में आपका सम्मिलित होना उनके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण, उनके लिए सबसे सुखद और आत्मीय अवसर पर आपका उनके साथ रहना है! उनके प्रेम में सहभागी होने के लिए आप एक शाम इस बात को भुलाकर कि उनके विचार आपसे नहीं मिलते या वे दक़ियानूसी और नुकसानदेह हैं, उनके साथ मिलकर सिर्फ अवसर का आनंद उठाएँ!

इसका यह अर्थ भी नहीं है कि आपको पूरे समय वहाँ बैठकर सारे कर्मकांडों में उपस्थित रहना है, अगर आप उस अवसर के धार्मिक अंशों के विरुद्ध हैं तो उनसे दूर रहिए! यह आवश्यक नहीं है और यदि वे आपका नज़रिया जानते हैं तो कोई भी इस बात से परेशान नहीं होगा कि आप विवाह समारोह के उस हिस्से में अनुपस्थित रहे। लेकिन पार्टी में वे आपको अवश्य ही मिस करेंगे-और निश्चय ही आप भी उन्हें मिस करेंगे!

तो ऐसे सवालों से अपने आपको परेशान करने की ज़रूरत नहीं है, जो आपकी दिली इच्छा हो वही कीजिए और अपने परिवार और दोस्तों के साथ खुला व्यवहार कीजिए! जीवन का आनंद लीजिए-उसे बहुत ज़्यादा जटिल मत बनाइए!

और उसी जज़्बे के साथ, भले ही मेरा क्रिसमस से या उसकी परम्पराओं से या उसके महत्व से कोई लेना-देना नहीं है, मैं अपने पाठकों और मित्रों के लिए, जिन्होंने कल या आज क्रिसमस मनाया या कल मनाएँगे, क्रिसमस की शुभकामनाएँ अर्पित करता हूँ कि उनके जीवन में सदा सुख-शांति बनी रहे! अपनी छुट्टियाँ और त्योहार मनाते रहें, परिवार वालों को खूब गले लगाएँ और ज़्यादा खाना न खाएँ भले ही वह कितना भी सुस्वादु क्यों न हो!

जब परिवार वाले अस्पृश्यता पर अमल करें तब उनके प्रति आप सहिष्णु नहीं रह सकते – 24 दिसंबर 2014

कल मैंने एक ऐसी स्थिति का वर्णन किया था, जिससे बहुत से भारतीय नौजवानों को दो-चार होना पड़ता है: वे स्वयं प्रगतिशील हैं और आधुनिक विचार रखते हैं जबकि उनके परिवार वाले अभी भी उन्हीं दकियानूसी परंपराओं और आडम्बरों का पालन करते हैं, जिन्हें वे नौजवान अब बिलकुल पसंद नहीं करते। वे इस परिस्थिति पर शर्मिंदा होते हैं और मित्रों और अपने परिवार वालों के बीच किसी भी संपर्क को टालने की कोशिश करते हैं। कल मैंने यह भी कहा था कि आपको इतना संवेदनशील और सहिष्णु होना चाहिए कि दोनों के बीच शांति और सद्भावपूर्ण मिलाप का कोई रास्ता निकल सके। लेकिन कुछ ऐसी स्थितियाँ हो सकती हैं जहाँ मैं भी समझता हूँ कि यह संभव नहीं है। परिस्थितियाँ, जहाँ मैं कतई सहिष्णु नहीं हो सकता और दूसरों से भी यही कहूँगा कि इन मामलों में अपने विचारों पर ज़रा सा भी डगमगाए बगैर, दृढ़ता के साथ अड़े रहें!

इस तरह की समस्याएँ सिर्फ युवकों तक ही सीमित नहीं है, हर उम्र के लोग इस तरह की मुश्किलों में पड़ सकते हैं। अगर आपका परिवार और आपके प्रियकर बहुत परंपरावादी हैं जबकि आप उन दक़ियानूसी और मूर्खतापूर्ण परम्पराओं के सख्त विरोधी हैं तब किसी भी उम्र में ऐसी समस्याओं का सामना हो सकता है: जैसे जातिप्रथा के अंतर्गत आज भी जारी छूआछूत।

अगर आपके मित्र निचली जातियों से आते हैं और आपका परिवार आज भी उन्हें अछूत मानता है तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि आपस में मिलने पर उनके बीच भारी समस्याएँ पेश आएँगी। परिवार वाले अपने उन दोस्तों को घर लाने का समर्थन नहीं करेगे। वे उन्हें अलग गिलासों में पानी देंगे और जब आपके दोस्त चले जाएँगे तब उन सभी वस्तुओं को अग्नि में पवित्र करेंगे जिन्हें उन्होंने छुआ होगा। उनसे मिलने पर वे उनसे हाथ नहीं मिलाएँगे- वैसे यह ठीक ही होगा क्योंकि यह अभिवादन या स्वागत का भारतीय तरीका नहीं है- लेकिन वे भूल से भी उन्हें छूने से बचेंगे।

इससे आपको कितना बुरा लगेगा! इससे बुरी बात यह कि आपके मित्र को कितना बुरा लगेगा!

या अगर आपके परिवार के लोग सोचते हैं कि जो लड़कियाँ जींस या-उससे बढ़कर, स्कर्ट-पहनती हैं वे अश्लील या चरित्रहीन होती हैं जबकि ऐसी कई लड़कियाँ आपकी मित्र हैं तो आपको अपने परिवार वालों से नैतिकता के पाठ पढ़ने पड़ सकते हैं। हो सकता है कि आपकी माता-पिता आपसे कहें कि ‘ऐसे लोगों’ के साथ मत रहा करो! वे मानते हैं कि ऐसे लोगों का साथ आपके लिए नुकसानदेह है-लेकिन आप क्या सोचते हैं?

या हो सकता है, आपके माता-पिता अपनी जाति में आपका विवाह करना चाहते हों और इसके लिए दहेज़ लेना या देना चाहते हों, जिसके आप सख्त खिलाफ हों! क्या आप इसे भी अपने साथ की जा रही ज़्यादती नहीं मानेंगे?

ये ऐसे ही मामले हैं और ऐसे बहुत से दूसरे उदाहरण भी दिए जा सकते हैं। जब आप जानते हैं कि आपका परिवार ऐसी दकियानूसी परंपराओं में यकीन रखता है और उनके संस्कारों में पुरानी घृणित आदतों का बोलबाला है जो आपके जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं तो आपको दृढ़ता के साथ अपने विचारों पर अडिग रहना चाहिए। आप क्या स्वीकार कर सकते हैं इसकी एक सीमा है और उसके भीतर ही आप बिना पाखंड और दोगलेपन के जीवन गुज़ार सकते हैं!

मैं जानता हूँ कि इसके क्या परिणाम हो सकते हैं: या तो वे आपकी बात मान लेंगे या फिर आपके और आपके परिवार के बीच दूरियाँ पैदा हो जाएँगी। इसके अलावा कोई चारा भी नहीं है-क्योंकि हमें संवेदनशील और सहिष्णु तो होना चाहिए मगर साथ ही हमें अपने जीवन की लगाम ऐसे व्यक्तियों के हाथ में नहीं सौंपनी चाहिए, जिनके जीवन मूल्य आपके विचारों से मेल नहीं खाते या जो दक़ियानूसी और हानिकारक परम्पराओं का अनुपालन करते हैं!

नए ज़माने के भारतीय युवाओं: क्या आप अपने परिवार के तथाकथित पिछड़ेपन पर शर्मिंदा हैं? 23 दिसंबर 2014

कुछ अर्सा पहले एक भारतीय युवक ने मुझसे संपर्क किया कि उसके कुछ प्रश्नों का मैं कोई हल सुझाऊँ। कुल मिलाकर वह जानना चाहता था कि अपने परिवार वालों की परंपरागत जीवन-पद्धति और उनके रूढ़िवादी विचारों के साथ एक आधुनिक, खुले विचारों वाले युवा के रूप में वह किस तरह तालमेल बिठाए। मैं जानता हूँ कि यह सिर्फ इस युवक की ही समस्या नहीं है इसलिए आज के ब्लॉग में मैं इन्हीं प्रश्नों की चर्चा कर रहा हूँ।

उस व्यक्ति ने जो बताया वह मैं पहले बहुत से लोगों से भी सुन चुका था। वे लोग अक्सर बड़े विश्वविद्यालयों में पढ़ने जाते हैं, जो अधिकतर बड़े शहरों में स्थित होते हैं, जहाँ उन्हें ‘आधुनिक संसार’ की बहुत सी चीजें देखने को मिलती हैं, वे बहुत पढ़ते-लिखते हैं और वैश्विक मीडिया से भी उनका अच्छा ख़ासा परिचय हो जाता है। यहाँ तककि उनका विदेशियों से भी सम्पर्क हो सकता है, जिसके कारण वे भारत के बाहर के लोगों के विचारों से परिचित हो जाते हैं। जब वे अपने छोटे से गाँव या कस्बे में लौटते हैं तब पहले से बिल्कुल बदल चुके होते हैं। कुछ लोगों के साथ यही बात तब भी होती है जब वे अपने घर पर ही होते हैं! इंटरनेट ने सारी दुनिया को इस तरह खोलकर रख दिया है कि उसके बारे में जानकारी हासिल करने के लिए आपको बाहर तक निकलना नहीं पड़ता!

इस तरह ये युवा ऐसे विचार विकसित कर लेते हैं जिस दिशा में उनके परिवार वालों ने कदम भी नहीं रखा होता। युवा लड़के और लड़कियों के मित्र भी वैसे ही होते हैं, आधुनिक और धर्म के पुराने रीति-रिवाजों, कर्मकांडों और उनकी सीमाओं से मुक्त। जब वे घर पर होते हैं तो अपने परिवार वालों को उन्हीं सब रीति-रिवाजों और कर्मकांडों का अनुपालन करते देखते हैं और उन्हें लगता है कि उनके करीबी रिश्तेदार, जिन्हें वे इतना चाहते हैं, बहुत अंधविश्वासी हैं। कि वे जाति-प्रथा को, जिसे वे बेहद बुरा समझते हैं, उचित मानते हैं। वे महिलाओं के साथ व्यवहार से सम्बंधित सभी बुरी भारतीय परंपराओं का पालन करते हैं!

वे अपने घर में इनके विरुद्ध तर्क-वितर्क करते हैं, बहस करते हैं मगर कोई नतीजा नहीं निकलता। वे वहाँ अल्पमत में होते हैं-और आखिर वे अपने परिवार के सदस्यों से प्रेम भी करते हैं लिहाजा वे उन्हें अपमानित भी नहीं करना चाहते! लेकिन वे ऐसे माहौल में असुविधा महसूस करते हैं, शर्म महसूस करते हैं। परिवार के विषय में वे अपने मित्रों से बात करना भी पसंद नहीं करते। नए ज़माने के अपने दोस्तों को घर बुलाते हुए उन्हें असुविधा होती है, वे उन्हें अपने परिवार से मिलवाना नहीं चाहते। दोस्त उनके परिवार के बारे में क्या सोचेंगे, करीबी रिश्तेदारों का उन पर क्या असर होगा, ये प्रश्न उन्हें हॉन्ट करते हैं।

सबसे पहले तो मैं कहूँगा कि आप अपने परिवार के लिए शर्मिंदा होना छोड़ें। आप उनके विचारों, उनके कामों और उनकी आस्थाओं के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं। सिर्फ उन्हें इतना बता दीजिए कि आप क्या सोचते हैं, क्यों आप उन बातों पर विश्वास नहीं करते, जिन पर वे करते हैं और उन परम्पराओं का अनुपालन भी नहीं करना चाहते, जिन पर चलना उन्हें आवश्यक लगता है। बातचीत अवश्य कीजिए, जिससे भले ही परिवार वाले उन्हें न समझ पाएँ, कम से कम वे उन्हें जान तो लें। हो सकता है, आपको बार-बार अपनी बात समझाना पड़े लेकिन आखिर वह आपका परिवार है। वे आपसे प्रेम करते हैं और आपको उनके साथ तालमेल बिठाने के लिए कोई न कोई समान आधार ढूँढ़ना ही चाहिए। एक-दूसरे के प्रति सहिष्णु बने रहिए-न तो वे आपको विभिन्न समारोहों और कर्मकांडों में, जिन्हें आप पसंद नहीं करते या जिन पर चलना आपके लिए असंभव है, शामिल होने का दबाव डालें और न ही आप यह अपेक्षा करें कि वे आपके कहे अनुसार चलने लगेंगे। एक बार यह स्पष्ट कर देने के बाद कि क्यों आप उन बातों को अनुचित मानते हैं, आप उन्हें उनकी अपनी मर्ज़ी के अनुसार चलने के लिए स्वतंत्र छोड़ दीजिए। अगर वे पूजा-पाठ करते हैं या उपवास करते हैं तो आपको इसमें क्या परेशानी हो सकती है?

जहाँ तक आपके मित्रों का सवाल है, मैं वही सलाह दुंगा: बातचीत करते रहिए। अपने परिवार के बारे में उन्हें खुलकर बताइए और इस मामले में आप क्या सोचते हैं, यह भी। मुझे पक्का विश्वास है आप ऐसे अकेले व्यक्ति नहीं होंगे! बस, बात कीजिए और उन्हें अपने और अपने परिवार के बारे में अच्छी तरह जानने दीजिए। अगर वे आपके सच्चे मित्र हैं तो आपके परिवार की आस्थाओं और उनके विचारों के आधार पर आपके प्रति उनके व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आएगा। इसके विपरीत वे आपको बेहतर समझ पाएँगे, समझ सकेंगे कि आप किस पृष्ठभूमि से आते हैं।

लेकिन कुछ आस्थाओं के साथ बहुत गंभीर समस्याएँ भी हैं, जिन्हें न तो अनदेखा किया जा सकता है और न ही बर्दाश्त। कभी-कभी ये आस्थाएँ या परंपराएँ सीमा के बाहर हो जाती हैं, जहाँ हम कह सकते हैं कि वास्तव में वे आपके मित्रो को दुःख (नुकसान) पहुँचा रही हैं या उन्हें अपमानित कर रही हैं। यह एक अलग विषय है, जिस पर कल मैं विस्तार से लिखूँगा।

पुरानी परम्पराओं और धार्मिक रूढ़ियों की जकड़न से अपने मस्तिष्क को आज़ाद कीजिए! 9 अक्टूबर 2014

कल जब मैंने आपसे कहा कि आपके लिए अपने दिमागी कचरे को भी साफ़ करना आवश्यक है तब मैं आपकी स्मृतियों और आपके व्यक्तिगत इतिहास के बारे में बात कर रहा था। लेकिन मेरे मन में एक और ख़याल आया है: बासी, दकियानूसी खयालात, पुराने मूल्य और पुराने रवैयों का क्या किया जाए?

दरअसल मेरा पक्का विचार है कि आपके लिए बीच-बीच में अपनी नैतिक मान्यताओं को भी साफ करते रहना ज़रूरी है। उन चीजों को, जिन पर पहले आपने काफी सोच-समझकर गहरा विश्वास किया था! जिनकी आप पूजा करते हैं या जिनके सामने प्रार्थना करते हैं, क्या आप आज भी उन शक्तियों पर विश्वास करते हैं? क्या आप उन्हीं परम्पराओं से चिपके हुए हैं, जो अब आपको ऊब से भर देती हैं और जो उन बातों के विरुद्ध हैं, जो आप अब करना चाहते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि क्योंकि वे पुरातन काल से चली आ रही हैं या क्योंकि उन्हें अपने पूर्वजों से सीखा था, आप उन्हें आँख मूंदकर जारी रखे हुए हैं?

परम्पराओं और धर्मों का स्वभाव ही होता है कि वे एक मूल्य, एक नियम और व्यवहार का एक तरीका निर्धारित कर देते हैं और लोग भी यह विश्वास करने लगते हैं कि यही उचित है, इन्हें अगले हजारों साल तक ऐसा ही बना रहना है, तयशुदा, पत्थर की लकीर की मानिंद। किसी पवित्र धार्मिक पुस्तक में लिखा होने से ही उसे शाश्वत सत्य के रूप में मान्यता प्राप्त हो जाती है। मगर यह हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण है।

समय बदलता है, लोग बदल जाते हैं, एक-दूसरे के साथ व्यवहार बदल जाता है, यहाँ तक कि भाषा बदल जाती है। फिर हमारे मूल्यों को क्यों नहीं बदलना चाहिए? समय के साथ विज्ञान ने इतनी सारी खोजें की हैं कि 200 साल पहले स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली बहुत सी बातों पर आज विश्वास करना मूर्खतापूर्ण ही कहा जाएगा! स्कूलों में पहले पढ़ाई जाने वाली बातों में हमने परिवर्तन किया है तो फिर घर में सिखाई जाने वाली बातों को हम क्यों नहीं बदलते? हमें स्वयं अपने विश्वासों में, अपने व्यवहार में परिवर्तन क्यों नहीं करना चाहिए?

पुरानी धार्मिक परम्पराओं या कई सांस्कृतिक रूढ़ियों के बोझ को उतार फेंकने में कई लोगों को बड़ा संकोच होता है! यह स्पष्ट है कि कई बार वे ऐसा करना भी चाहते हैं, वे लोग उनके प्रति ईर्ष्या का अनुभव करते हैं जो आसानी के साथ ऐसा करते हुए स्वतंत्रता पूर्वक, अपनी मर्ज़ी से अपने चुने हुए आधुनिक मूल्यों पर चलना शुरू कर चुके होते हैं। लेकिन, साथ ही वे यह भी समझते हैं और महसूस करते हैं कि वे ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। वे भी ऐसा करना चाहते हैं मगर उनमें यह विश्वास नहीं होता कि ऐसा करना उचित होगा। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वे डरते हैं और ऐसा करने की हिम्मत नहीं कर पाते। वे इसलिए डरते हैं क्योंकि वे समझते हैं कि अपने अभिभावकों या दादा-दादियों के विश्वासों पर नहीं चलने या उनके अनुसार व्यवहार न करने पर उन्हें नुकसान पहुँच सकता है। और इसलिए भी डरते हैं कि न जाने उनके पड़ोसी, रिश्तेदार या उनका समाज उनके बारे में क्या सोचेंगे!

सिर्फ एक पग आगे बढ़ाने की हिम्मत दिखाइए। यह अपने आप पर आपका एहसान होगा! आप उन लोगों के पदचिह्नों पर चल रहे हैं, जो आपसे एक या दो पीढ़ी पहले पैदा हुए थे। तो अगली बार जब आप दीवाली पर या बसंत ऋतु में घर की सफाई करें तो बैठकर सोचें कि क्या आपको अपने दिमाग की सफाई भी नहीं करनी चाहिए। क्या अपने व्यक्तिगत इतिहास, अपने विश्वासों और मूल्यों पर पुनर्विचार करते हुए उन्हें त्यागने के बारे में नहीं सोचना चाहिए?

यह कदम आगे बढ़ाते ही आप देखेंगे कि आप कितना हल्का और स्वतंत्र महसूस कर रहे हैं!

लड़के की आस में पांच लडकियां पैदा हो गईं – हमारे स्कूल के बच्चे- 8 नवंबर 2013

आज मैं आपको हमारे स्कूल में पढ़ने वाले एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं बल्कि चार बच्चों का परिचय करवाने जा रहा हूँ! वे सभी बहने हैं, एक ही परिवार की चार लड़कियां और हमें कुछ साल और इंतज़ार करना होगा जब सबसे छोटी यानी उनकी पाँचवी बहन भी हमारे स्कूल में पढ़ने आया करेगी। ये चार बच्चियाँ हैं: तेरह साल की ज्योति, बारह की संध्या, दस की काजल और सात साल की राखी, जो हमारे स्कूल में अभी पढ़ रही हैं। और पाँचवी है डेढ़ साल की राधिका, जो अभी अपनी माँ की गोद में पल रही है।

अगर आप ध्यान से देखें तो पाएंगे कि यह कई मानों में एक परंपरागत भारतीय परिवार का उदाहरण है। उनके अभिभावकों का विवाह 1998 में हुआ था-जब उनके पिता उन्नीस के और माँ तेरह बरस की थी। अब सबसे बड़ी बहन ही तेरह साल की है, जिसका अर्थ यह है कि जब वह पैदा हुई थी तब उसकी माँ सिर्फ पंद्रह बरस की थी! एक साल बाद ही दूसरी भी पैदा हो गई।

भारत में यह एक तरह का अलिखित नियम-सा है कि परिवार में कम से कम एक लड़का ज़रूर होना चाहिए। वे अपनी लड़कियों से भी प्रेम करते हैं लेकिन अगर उनकी पहली दो सन्तानें लड़कियां हैं तो मानकर चलिए कि वे लड़के की आस में तीसरी संतान अवश्य उत्पन्न करेंगे। यही बात इस दंपति के साथ भी हुई है। उन्होंने लड़के के लिए पाँच बार कोशिश की और सभी सन्तानें लड़कियों के रूप में ही पैदा हुईं। स्वस्थ, प्रसन्न और थोड़ी नटखट लड़कियां!

इस परिवार को हम काफी समय से जानते हैं क्योंकि लड़कियों का पिता मिस्त्री है और हमारे आश्रम और स्कूल के निर्माण के दौरान हमारे यहाँ काम कर चुका है। इसी स्कूल में आज उसकी बेटियाँ पढ़ रही हैं। शुरू से हमारी इच्छा थी कि इस गरीब व्यक्ति और उसके परिवार की हम मदद करेंगे। जब उसके पास काम होता है तभी परिवार का भरण-पोषण हो पाता है और जब कोई काम नहीं होता, निर्माण कार्य ठंडे पड़ जाते हैं तब उस विशाल परिवार के लिए भूखे रहने की नौबत आ जाती है।

सारी कमाई परिवार का मुखिया यानी लड़कियों का पिता ही रख लेता है, वह एक रुपया भी अपनी पत्नी को नहीं देता। वह सब्जी, चावल और मसाले आदि घर लेकर आता है। वह उनके लिए कपड़े खरीदकर लाता है और दूसरे ज़रूरी सामान परिवार को मुहैया कराता है। उसकी पत्नी कहती है: "मेरा काम घर की देखभाल करना, खाना पकाना और बच्चों का लालन-पालन करना भर है!"

दो साल पहले वह मिस्त्री कुछ रुपयों की बचत करने में कामयाब हो गया और एक प्लाट खरीदकर उस पर छोटा सा घर बनवा लिया। घर बनवा तो लिया मगर उसमें सिर्फ एक रसोई, एक बैठक और एक अतिरिक्त कमरा भर है, जिसमें पूरा परिवार सोता है। लड़कियां पड़ोसी बच्चों के साथ छत पर खेलती थीं। ज्योति अभी से रोटी, चावल और नूडल्स बनाना भी सीख चुकी है!

हर सुबह चारों बच्चे तैयार होकर स्कूल आते हैं। कई बार हम सोचते हैं कि अगर उनकी पढ़ाई मुफ्त नहीं होती तो क्या वे पढ़ पाते। क्या उनका पिता पाँच लड़कियों की पढ़ाई का खर्च उठा सकता था? शायद वह उस पैसे को बचाता और उनकी शादियों पर खर्च करता!

हम आशा करते हैं कि वे लड़कियां मेहनत के साथ पढ़ाई करेंगी और इतनी प्रतिभाशाली साबित होंगी कि स्वयं भी पैसा कमा सकें और अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। हमें यह भी आशा है कि विवाह के बाद भी वे अपने पतियों पर आश्रित नहीं होंगी और आधुनिक मानसिकता के साथ अपने निर्णय स्वयं ले सकेंगी, जिसमें सबसे प्रमुख निर्णय होगा खुद के बच्चों की संख्या का निर्धारण।

धार्मिक परम्पराएँ शिष्यों को गुरुओं के अपराधों पर पर्दा डालने पर मजबूर करती हैं-12 सितंबर 2013

आसाराम प्रकरण में सबसे बड़ी समस्या उनके शिष्यों की धार्मिक पृष्ठभूमि है। हिन्दू धर्म मनुष्य-पूजा (व्यक्ति पूजा) को प्रोत्साहित करता है! यह धार्मिक पृष्ठभूमि और संस्कार ही वे कारक हैं जो लोगों को अपने गुरु के विरुद्ध कुछ भी बोलने से रोकते हैं, भले ही उन्होंने गुरु को अपराध करते हुए देख लिया हो। यही कारण है कि गुरु द्वारा प्रताड़ित होने पर भी उनके शिष्य उसका प्रतिवाद नहीं करते और उसके अपराधों को किसी से कहते हुए सकुचाते हैं। ऐसे अपराध हो रहे हैं तो इनके पीछे सबसे मुख्य कारण यही है!

जिन धर्म-ग्रन्थों पर गुरु बनाने की परंपरा आधारित है, वे बताते हैं कि गुरु ईश्वर के समान या उससे भी बड़ा है। अर्थात, यह कि किसी दूसरे के मुंह से गुरु की आलोचना सुनना भी पाप है। जो भी गुरु करता है, ठीक करता है, इसलिए या तो आप उस व्यक्ति का मुंह बंद कर दें या अपने कान बंद कर लें, जिससे गुरु के विरुद्ध उच्चारे गए ऐसे कटु शब्द आपके दिमाग तक न पहुँचें।

हिन्दू धर्म कहता है कि गुरु के माध्यम से ही आपको मुक्ति प्राप्त हो सकती है-इसलिए हर मनुष्य के पास एक ऐसा व्यक्ति होना ही चाहिए जिसके बारे में वे कोई भी बुरी बात न सुनें। जैसे वे भगवान की मूर्ति के पाँव धोते हैं वैसे ही वे उसके भी पाँव पखारेंगे। भगवान के सामने नतमस्तक होते हैं उसी तरह गुरु के सामने भी होंगे। अपने गुरु के लिए उनका सम्पूर्ण समर्पण होगा।

हिन्दू धर्म की कुछ परम्पराओं में शिष्यों से अपने तन, मन और धन को गुरु के चरणों में समर्पित करने का आदेश है। कुछ गुरु जानबूझकर इसका शब्दशः अर्थ ग्रहण करते हैं और अपने शिष्यों से यथार्थ में अपने शरीर का समर्पण करने की अपेक्षा करते हैं। आसाराम के कुछ पूर्व शिष्य अब यह बता रहे हैं कि कैसे वह अश्लील बातें किया करता था और चाहता था कि वे धर्म-ग्रन्थों में लिखे आदेशानुसार अपने शरीर को उसे समर्पित करें!

ऐसी अपेक्षा रखने वाला अकेला आसाराम ही नहीं है। मैंने कई सम्प्रदायों के बारे में सुना है कि उनमें विवाह के तुरंत बाद घर की नई नवेली दुल्हिन को पहले परिवार के गुरु के पास जाना पड़ता है और उसके बाद ही वह अपने पति के साथ हमबिस्तर हो सकती है। उसे गुरु को प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है जैसे देवताओं को चढ़ाया जाता है! जब गुरु उसके साथ सो लेगा, उसे आशीर्वाद देगा तभी उसका पति और परिवार वाले उसका स्वागत करेंगे! भारत में आज भी यह सब चल रहा है, मगर क्यों? क्योंकि उनके लिए गुरु ईश्वर जैसा ही है!

काफी समय पहले, मेरा एक दोस्त था जो मेरी तरह ही प्रवचन इत्यादि किया करता था और उसने गुरु का चोला भी पहन लिया था। वह शादीशुदा था और लगभग 40 वर्ष का था लेकिन जब वह एक गाँव में गया तो उसके आयोजक ने अपनी 17 वर्षीय लड़की उसे दान कर दी! उसने क्या किया? उसने अपनी पत्नी को छोड़ दिया और उस लड़की से विवाह कर लिया और अब उनके कई बच्चे हैं!

विश्वास ने ऐसे रीति-रिवाजों को जन्म दिया है। धर्म ही गुरुओं द्वारा किए जा रहे सारे अपराधों की जड़ है। बचपन से ही लोगों को सिखाया जाता है कि गुरु ही ईश्वर है। वह कोई गलत काम कर ही नहीं सकता और तुमसे अपेक्षा की जाती है कि गुरु की हर आज्ञा का पालन करोगे। अगर कोई कहता है कि यह गलत है तो उसका मुंह बंद कर दो या उसकी बात सुनो ही मत। उसके कथन की उपेक्षा करो या आलोचना से बचो, मन में आ रहे अपने विचारों का त्याग करो।

आसाराम का प्रकरण एक युवा लड़की की बहादुरी के चलते सामने आया। भारत भर में ऐसी बहुत सी दुखद कहानियाँ पीड़ितों के दिलोदिमाग में वाबस्ता हैं। डर, अपराध और दमन-धर्म और उसके ग्रंथ हमें सिर्फ और सिर्फ यही दे सकते हैं।

आश्रम में जरूरतमंदों की सहायता करने की परंपरा है – 30 जून 2013

जिन मित्रों ने 2005 के आसपास हमारे आश्रम का दौरा किया था वे पीले लंबे कुर्तों में कुछ किशोर बच्चों को आश्रम में तेज़ी से इधर से उधर आते-जाते हुए अवश्य नोटिस करते थे और पूछते थे, ‘ये कौन हैं?’

वे बच्चे आश्रम के ही ‘आवासी बच्चे’ थे। जब मैं गुफा में था तब वे आ चुके थे। हमेशा वही बच्चे नहीं होते थे, वे बदलते रहते थे और जब भी कोई मित्र दोबारा आश्रम आता तो वह कुछ दूसरे लोगों को वहाँ पाता था। आश्रम में अब भी यही होता है। भारतीयों के लिए यह सामान्य बात है मगर विदेशियों के लिए नहीं।

इसलिए इस परंपरा के बारे में हमने उन्हें थोड़ा विस्तार से बताया: आश्रम एक साझा करने की जगह होती है जहां आपको हमेशा भिन्न-भिन्न तरह के लोग मिलते हैं। आध्यात्म में, हिन्दू धर्म में और उसके धर्मग्रंथों में रुचि रखने वाले युवा जानते हैं कि अध्ययन के दौरान आश्रम में वे सम्मान के साथ रह सकेंगे। धर्मग्रंथों का अध्ययन करने के लिए संस्कृत जानना आवश्यक है। हालांकि बहुत से संस्कृत विध्यालय कोई फीस नहीं लेते या परीक्षा आदि के खर्च के लिए बहुत कम फीस लेते हैं, फिर भी आखिर आवास की जगह तो आवश्यक ही है। विद्यालयों के समीप स्थित आश्रम उन्हें यह जगह मुहैया कराते हैं। वहाँ निवास और भोजन प्राप्त करने के एवज में वे आश्रम के दैनंदिन के कामों में हाथ बँटाते हैं।

आश्रम में हम सभी को, उनका हमारे यहाँ रहना बहुत अच्छा लगता है क्योंकि वे युवा और खुशमिजाज़ होते हैं और अगर घर में और भी युवा हैं तो माहौल बहुत जीवंत और खुशनुमा हो जाता है! फिर उनकी तरक्की में, किसी खास विषय की उनकी पढ़ाई-लिखाई में अपना कुछ योगदान देने का सुख प्राप्त होता है, वह अलग! पढ़ाई के बाद वे कोई रोजगार प्राप्त कर सकते हैं, अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं और अपने परिवार की मदद कर सकते हैं, यह विचार ही बहुत सुखद होता है। उनकी मदद करने की गरज से हम कई बार उनकी परीक्षा फीस भी अदा कर देते हैं।

2003 में हमने अपने आश्रम में ही संस्कृत की शिक्षा देने की व्यवस्था की। हमने अपने इलाके के सबसे योग्य शिक्षक की नियुक्ति की जो रोज़ सबेरे आश्रम आकर संस्कृत पढ़ाते थे। इस कक्षा को सिर्फ आश्रम वासियों के लिए आरक्षित नहीं किया गया था और आश्रम के बाहर रहने वाले भी बड़ी संख्या में ज्ञान प्राप्त करने आते थे। तो इस तरह आगे आने वाले सालों में लगभग सौ लोग रोज़ सबेरे संस्कृत सीखने के लिए आश्रम का रुख कर रहे थे।

स्वाभाविक ही जो विद्यार्थी आश्रम में रहते हैं वे लाभ की स्थिति में होते हैं। जब आप किसी के साथ रहते हैं तो उन्हें जानने का आपको बेहतर अवसर प्राप्त होता है और भावनात्मक संबंध मजबूत होते चले जाते हैं, भले ही सामने वाला आपके साथ थोड़े समय के लिए ही रहने वाला है और पढ़ाई समाप्त होते ही वापस चला जाएगा या कोई दूसरी जगह ढूंढ लेगा। हम हमेशा बच्चों की सहायता की जुगत में रहते थे और मेरी बहन, जो अँग्रेजी में एम ए थी, उन्हें अँग्रेजी पढ़ाना चाहती थी।

जो लोग हमारे यहाँ 2005 में आए थे उन्होंने देखा कि वे किशोर बच्चे अँग्रेजी और संस्कृत में प्रवीण हो गए और दैनिक व्यवहार में आने वाली बहुत सी बातें भी सीखीं। वह बहुत अच्छा समय था, अपनी हर चीज़ साझा करते हुए जीना और लोगों को अपने जीवन में आगे बढ़ते हुए, स्थापित होते हुए देखना।

कई प्राचीन परंपराएँ आपके सम्मान की हकदार नहीं हैं! – 13 मई 2013

अपेक्षानुसार, आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) से संबंधित अपनी डायरियों पर मुझे बहुत सी प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुई हैं। इस विषय पर और ऐसे ही दूसरे विषयों पर यह एक टिप्पणी अवश्य होती है: 'आपको अपनी प्राचीन परंपराओं का आदर करना चाहिए न कि उनका अपमान!' मेरा छोटा सा जवाब होता है कि नहीं, मैं ऐसा नहीं करूंगा! विस्तृत जवाब चाहिए तो ठीक है; लीजिये, हाजिर है!

आयोजित विवाहों के एक बड़े समर्थक ने यह तर्क पेश किया: 'प्रेम क्या है? अगर आपने कोई कुत्ता पाल रखा है तो साथ रहते रहते उससे भी आप प्रेम करने लगते हैं।' उनका मतलब यह है कि विवाह से पहले प्रेम भी हो, यह आवश्यक नहीं है। आप किसी के साथ भी लंबे समय तक रहें तो परस्पर प्रेम करने लगेंगे। माफ करें, मैं उस परंपरा का कोई सम्मान नहीं कर सकता जो एक पालतू कुत्ते और पत्नी में कोई भेद नहीं करता। यह हमारी भारतीय संस्कृति है, हमारे पूर्वजों द्वारा निर्मित परंपराएँ हैं जो जानवरों की तरह महिलाओं, बेटियों और पत्नियों का सौदा करती हैं। प्रेम महत्वपूर्ण नहीं है, वह साथ रहते-रहते हो ही जाएगा! हो सकता है।

अगर ऐसा ही है तो फिर आजकल संभावित दूल्हे और दुल्हिन को विवाह से पहले आपस में मिलने ही क्यों दिया जाता है? अगर प्रेम हो ही जाना है तो फिर सशरीर किसी को देखने की आवश्यकता ही क्या है? क्या आप वाकई मानते हैं कि प्राचीन परंपरा यही थी? आपके परदादाओं के जमाने में तो विवाह से पहले दूल्हा और दुल्हन एक दूसरे को देखते तक नहीं थे। ऐसे खयाल को तुरंत नामंजूर कर दिया जाता था क्योंकि उसे संस्कृति और परंपरा का अपमान माना जाता था।

अधकचरे आधुनिक लोग मुझसे कहते हैं कि वे मॉडर्न हैं लेकिन फिर भी परंपराओं का सम्मान करते हैं। मैं ऐसा नहीं मानता। आप अपने बच्चों को सलाह देते हैं कि वे प्रेम तो कर सकते हैं मगर अपनी जाति या उपजाति में ही! क्या आप ऐसे आयोजनों में इतने दक्ष हैं कि अपने बच्चों को ठीक-ठीक निर्देश दे सकें कि किससे प्रेम किया जाए? क्या आप वाकई ऐसा मानते हैं कि यह संभव है? आपको मालूम होना चाहिए कि यह आपका भ्रम है अन्यथा आपका दूसरा वाक्य धमकी और अस्वीकार से भरा नहीं हो सकता: 'मैं किसी दूसरी जाति, धर्म या देश की लड़की या लड़के को स्वीकार नहीं कर सकता!'

अगर आप ऐसा करते हैं तो क्या आप वाकई अपनी 'प्राचीन परंपराओं' का निर्वाह कर रहे हैं? प्रकट रूप में आपकी महान संस्कृति बच्चों का अपनी मर्ज़ी से प्रेम करना बर्दाश्त नहीं करती मगर आप यह भी जानते हैं कि आप परिवर्तन को रोक नहीं सकते और इसलिए आप परंपरा की बेड़ियों को थोड़ा ढीला भर कर देते हैं। एक कदम आगे जाकर मैं कहूँगा कि वास्तविकता यह है कि आप स्वयं ही जस का तस अपनी परंपराओं का सम्मान नहीं कर रहे हैं। आप उसमें ढील ही तो दे रहे हैं!

आपकी महान संस्कृति कहती है कि प्रेम करना अपराध है। आप अपनी बेटियों को सीख देते हैं कि अपने साथ पढ़ने वाले लड़कों से बात तक मत करो लेकिन अपेक्षा करते हैं कि वह एक अजनबी के साथ विवाह कर ले और उसके साथ हमबिस्तर होने के लिए मजबूर हो जाए। क्या यह गलत नहीं है?

अगर आप अपने बच्चों के विवाह आयोजित करते हैं तो आप सिर्फ शरीरों का सौदा कर रहे हैं। आप अगर अपने बच्चों को अपनी जाति के लड़के या लड़की से प्रेम करने की इजाज़त दे भी देते हैं तब भी आप अपने बच्चों को एक दकियानूसी और पूरी तरह गलत जाति प्रथा में बांधकर ही रखना चाहते हैं। अगर आप दहेज लेते हैं या देते हैं तो आप महिलाओं का अपमान करते हैं। अगर आप किसी लड़की या लड़के के शरीर को देखकर उसका चुनाव करते हैं तो आप मनुष्यता का अपमान करते है। आखिर एकाध घंटे की मुलाकात में आप इतना ही तो देख पाते हैं। आप इतने समय में किसी भी व्यक्ति की आत्मा, उसके विचार या उसकी भावनाएं नहीं जान सकते। और इस तरह यह महज शरीर का लेन-देन भर बनकर रह जाता है। किसी अनजान परिवार में अपनी लड़की या लड़के को बेचना। एक विवाह, जोकि सामान्य रूप से एक सुखकर अवसर होना चाहिए, प्रेम से लबालब होना चाहिए, एक व्यापार और दौलत का दिखावा भर बनकर रह जाता है।

पुरुष-सत्तात्मक भारतीय समाज इन परंपराओं से चिपका हुआ है क्योंकि वे पुरुषों की ताकत को बरकरार रखती हैं, वे जाति प्रथा की समाप्ति में अवरोध का काम करती हैं और क्योंकि वे पुरुषों को इस बात की इजाज़त देती हैं कि वे महिलाओं से घोड़ों जैसा व्यवहार करें, उन पर दांव लगाएँ और उनकी लगाम अपने हाथों में रख सकें जिससे महिलाएं अपनी ऊर्जा का उपयोग अपनी बेहतरी के लिए न कर सकें। अगर आप परंपराओं की बात करते हैं तो हमारे देश में और हमारी संस्कृति में बहुत सी ऐसी परंपराएँ हैं जो पहले भी गलत थीं और आज भी गलत हैं। कई परंपराएँ पहले ही खत्म हो चुकी हैं मगर कई आज भी मौजूद हैं, जैसे दहेज की परंपरा, प्रिय व्यक्ति के देहावसान पर भोज का आयोजन, महिला भ्रूणहत्या और जाति प्रथा। हाँ, मैं मानता हूँ कि मैं ऐसी किसी परंपरा का सम्मान नहीं कर सकता और उनका निरादर भी करता रहूँगा जो मनुष्य को मनुष्य नहीं मानती और उसका हर तरह से अपमान करती हैं। और यह मैं जीवन भर करता रहूँगा। अगर आपको यह ठीक नहीं लगता तो मेरा कहना है कि मैं इसकी बिल्कुल परवाह नहीं करता!