अश्लील फिल्में बलात्कार का कारण नहीं हैं। क्यों? 2 जून 2015

कल मैंने एक परिचित का ज़िक्र किया था, जिसकी निगाह में, अश्लील फिल्मों के कारण भारत में बलात्कार के प्रकरण बढ़े हैं। मैं पहले ही बता चुका हूँ कि मेरे विचार में काम-वासना एक सुंदर एहसास है। आज मैं उन गलत तर्कों के बारे में लिखना चाहता हूँ, जिनके द्वारा यह प्रमाणित करने की कोशिश की जाती है कि अश्लील फिल्मों के कारण बलात्कारों की संख्या में इजाफा हो रहा है क्योंकि वे कामोत्तेजना पैदा करती हैं।

साधारण शब्दों में कहा जाए तो यह निष्कर्ष पूरी तरह गलत है। अश्लील फिल्में बलात्कार का कारण नहीं हैं। यह गलत है कि पुरुष अश्लील फिल्में देखते हैं, कामोत्तेजित होते हैं और किसी तरह संतुष्ट नहीं हो पाते तो बाहर निकलकर स्त्रियॉं के साथ बलात्कार करना शुरू कर देते हैं। अश्लील फिल्में देखने का अर्थ यह नहीं है कि आप लोगों के साथ बलात्कार करने लगते हैं!

बहरहाल, यह बताना आवश्यक है कि महिलाएँ भी अश्लील फिल्में देखती हैं! कुछ लोगों को यह बात थोड़ी आश्चर्यजनक लग सकती है लेकिन यह एक तथ्य है। फिर क्यों नहीं वे भी कामोत्तेजना में पागल होकर बलात्कार करने निकल पड़तीं? इस विचार पर हँसे नहीं-जी हाँ, ऐसा भी होता है, जहाँ महिलाएँ बलात्कार करती हैं और पुरुष पीड़ित की भूमिका में होता है। बस ऐसा कभी-कभी ही होता है और सिर्फ एक मामूली अपराध मानकर उसे दबा दिया जाता है। लेकिन यह सच है कि महिलाएँ भी अश्लील फिल्में देखती हैं। तो फिर उनकी काम-वासना कहाँ निकलती है?

पहले जब अश्लील फिल्में नहीं हुआ करती थीं तब भी बहुत सी दूसरी कलाएँ और साहित्य होता था, जैसा कि मैने कल ज़िक्र भी किया था। यह हजारों सालों से हो रहा है, यह नई बात नहीं है! खजुराहो के मंदिरों में उकेरे गए कामोद्दीपक मूर्तिशिल्पों की कल्पना करें! आपके अनुसार तो यह होना चाहिए कि इन कामोत्तेजक मूर्तियों को देखने वाला हर शख्स, भले ही वे मूर्तियाँ तकनीकी रूप से उतनी विकसित न हों, काम-वासना में इस कदर पागल हो जाना चाहिए कि किसी भी स्त्री को पकड़कर बलात्कार शुरू कर दे। उन पर्यटकों की कल्पना करें, जो इन कामसूत्र मंदिरों को देखने के लिए पैसे खर्च करते हैं और मूर्तियों को देखकर इतने कामोत्तेजित हो जाते हैं कि पास से निकल रही किसी महिला पर्यटक को दबोच लेते हैं! वाकई ये मंदिर बहुत खतरनाक हैं और उन्हें वैश्विक-घरोहर माना गया है! आश्चर्य है!

मज़ाक छोड़िए। मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि न तो अश्लील फिल्में और न ही काम-वासना बलात्कार का कारण होते हैं।

कुछ लोग कहते हैं कि महिलाओं के कपड़े बलात्कार का कारण है। कुछ दूसरे कहते हैं, भारतीय समाज का पश्चिमीकरण इसका कारण है। कुछ ज़्यादा ही मूर्ख लोग कहते हैं कि गलती मोबाइल फोनों की और पश्चिमी खान-पान की है-और बहुत से लोग उनकी बात पर यकीन भी कर लेते हैं! आप अपने विचार अपने पास रखें, मैं आपसे सहमत नहीं हूँ। मेरी नज़र में, कामोत्तेजना का दमन ही इसका मुख्य कारण है और कुछ मामलों में-स्त्रियॉं का दमन करने के इरादे से और उन्हें उनकी औकात बताने तथा दूसरी वस्तुओं की तरह, उपभोग की वस्तु मान लेना बलात्कार कारण है।

आप समझ गए होंगे कि मैं किस ओर इशारा कर रहा हूँ: जो समाज सेक्स को लेकर ज़्यादा खुले हुए हैं और जहाँ लैंगिक समानता काफी हद तक मौजूद है, वहाँ उन मुल्कों के मुकाबले, जहाँ स्त्रियों का दमन किया जाता है और सेक्स अब भी वर्जनामुक्त नहीं है, यौन अपराध कम होते हैं! जहाँ वर्जनाएँ हैं, दमन है और जहाँ सेक्स संबंधी हर बात आप छिपाते हैं या उन्हें छिपाकर करना पड़ता हैं तो परिणामस्वरूप यह दमन और ये वर्जनाएँ विस्फोटक रूप से सामने आती हैं।

उन पुरुषों के लिए, जो महिलाओं के दमन में विश्वास रखते हैं, बलात्कार अपने शक्ति-प्रदर्शन का और महिलाओं को उनका नीचा स्थान दिखाने का ज़रिया बन जाता है। एक ऐसा दुष्कर्म, जिससे वे महिलाओं की इच्छाशक्ति का खात्मा कर देना चाहते हैं और सिद्ध करना चाहते हैं कि वह उससे कमज़ोर है। इसके लिए कामोत्तेजना की ज़रूरत नहीं है, इसमें किसी तरह का यौन-आनंद प्राप्त नहीं होता। मेरा विश्वास है कि बलात्कारी भी इससे कोई संतोष प्राप्त नहीं कर सकता!

और, जैसा कि मैंने पहले भी इशारा किया, महिलाओं की और खुद अपनी नैसर्गिक सहज-प्रवृत्ति और यौन ज़रूरत के इस दमन के मूल में धर्म मौजूद है। धर्म, परंपरा और संस्कृति ने अप्राकृतिक ढंग से यौनेच्छाओं को लोगों के मन में एक मानसिक दैत्य में तब्दील कर दिया है। आपको स्वतंत्र रूप से अपनी सेक्स विषयक इच्छाओं के विषय में निर्णय लेने की अनुमति नहीं है, आपको सेक्स के बारे में सोचने की या उसका आनंद उठाने की अनुमति नहीं है! यह दमन ही एक सीमा के बाद उसे एक विस्फोट के रूप में फटने के लिए मजबूर कर देता है!

अगर आपका सहजीवन (वैवाहिक जीवन) सुखद और प्रेममय है तो स्वाभाविक ही, आपकी काम-वासना को बाहर निकलने का मौका मिल जाता है और आप दमित कामेच्छा से मुक्त होते हैं। जिस व्यक्ति को यौन संतुष्टि प्राप्त है वह भला बलात्कार क्यों करेगा? अगर आपके आसपास कोई नहीं है, जिससे आप यौन संतुष्टि प्राप्त कर सकें तो फिर बात अलग है। लेकिन ऐसी स्थिति में भी बलात्कार कतई तार्किक परिणति नहीं है! सभी जानते हैं कि इसका भी उपाय है: आप खुद अपनी मदद कर सकते हैं! जी हाँ, पुरुष और महिलाएँ, दोनों के पास अपनी यौन क्षुधा शांत करने के उपाय उपलब्ध हैं। दुर्भाग्य से उन पर भी पाबंदी है: धर्म कहता है कि वे उपाय करने से आप अंधे हो जाएँगे, कि आप अपनी ऊर्जा व्यर्थ खो बैठेंगे, कि ऐसा करना पापकर्म है! आगे किसी दिन मैं एक पूरा ब्लॉग हस्तमैथुन पर लिखना चाहूँगा, जिसमें मैं उन समस्याओं पर भी प्रकाश डालूँगा, जिनके चलते लोग हस्तमैथुन करके अपराध बोध से ग्रसित हो जाते हैं।

और अंत में हम इसी नतीजे पर पहुँचते हैं कि अश्लील फिल्में बलात्कार का कारण नहीं हैं। कारण काम-वासना का दमन है-और भारत में बढ़ते यौन अपराधों की भयावह स्थिति भी इसी का नतीजा है!

भारत में विवाह पवित्र बंधन है इसलिए पति के द्वारा किया गया जबरन सम्भोग बलात्कार नहीं – 6 मई 2015

आज मैं एक ऐसे विषय पर लिखना चाहता हूँ जो सामान्यतः हमारे समाज में चर्चा का सबसे सदाबहार विषय होता है और मैं भी इस पर अपने ब्लॉग में अक्सर लिखता रहता हूँ: भारत में महिलाओं की स्थिति। आज पुनः इस विषय पर लिखने का कारण सरकार के एक मंत्री का वह बयान है, जिसमें उसने कहा है कि भारतीय संस्कृति में विवाह के अंतर्गत बलात्कार के विचार का कोई अस्तित्व नहीं है। अगर यह सच है तो क्या इससे अच्छी कोई बात हो सकती है?

इस मूर्खतापूर्ण वक्तव्य तक हम कैसे पहुँचे, मैं बताता हूँ: संयुक्त राष्ट्र के जनगणना कोष के अध्ययन का हवाला देते हुए एक महिला संसद सदस्य ने कहा कि भारत में 75% विवाहित महिलाओं के साथ उनके पतियों द्वारा बलात्कार किया जाता है। सदस्य ने सरकार से पूछा कि इस बारे में वह क्या कार्यवाही करने जा रही है।

सत्ताधारी पार्टी के एक मंत्री का जवाब यह था कि यह विचार पश्चिम से आया है और भारत में इसका कोई अस्तित्व नहीं है। 'यह विचार हमारे देश के लिए अच्छा नहीं है!' क्योंकि भारत में, उनके मुताबिक, विवाह एक पवित्र ईश्वरीय विधान और मांगलिक संबंध माना जाता है और भारतीयों की धार्मिक आस्थाओं और संस्कृति के कारण ऐसे कुकृत्य होते ही नहीं हैं।

निश्चित ही आप इस वक्तव्य पर स्तब्ध रह गए होंगे! मैं आपको बताना चाहता हूँ कि भारत में हम लोग एक धर्म समर्थक सरकार से, जो भारत की प्राचीन संस्कृति को बचाए रखने के एजेंडे पर काम कर रही है, इससे बेहतर वक्तव्य की अपेक्षा ही नहीं करते! फिर भी एक भारतीय के रूप में हमारे नेताओं की विचारशून्यता और कुबुद्धि पर सोच-सोचकर हैरान रह जाता हूँ जो ऐसी घटिया और हास्यास्पद बातें ज़बान पर लाते हैं!

हमारी प्राचीन संस्कृति में तलाक़ की कोई अवधारणा मौजूद ही नहीं है। तलाक़ शुरू ही हुआ, जब भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई और संविधान बना। हिन्दू कोड बिल में तलाक़ का प्रावधान किया गया और महिलाओं के अधिकारों को दर्ज किया गया। उसके बाद ही एक पत्नी के होते हुए दूसरी महिला के साथ विवाह को गैरकानूनी घोषित किया गया। इसका ज़ोरदार विरोध हुआ, तर्क दिए गए कि पति को छोड़ना यानी तलाक़ लेना हिन्दू संस्कृति के विरुद्ध है क्योंकि हिन्दू धर्म के अनुसार दंपत्ति सात जन्मों के लिए विवाहबद्ध होते हैं। विरोध करने वालों का कहना था कि ऐसे क़ानून हमारी पवित्र और दिव्य हिन्दू धार्मिक संस्कृति को नष्ट कर देंगे।

मुझे लगता है, मंत्री महोदय यह भी भूल गए कि अतीत में हमारी इस महान संस्कृति में पति के मरने के बाद उसकी विधवा को पति के साथ ज़िंदा जला देने की परंपरा थी, जिससे वह पुनर्जन्म लेकर पुनः उसी व्यक्ति की पत्नी बन सके। राजा राममोहन रॉय के प्रयत्नों से इस घृणित परंपरा को क़ानून बनाकर समाप्त किया गया-हालाँकि, उसके बाद भी कई सालों तक हिन्दू संस्कृति के झंडाबरदारों ने इस परंपरा का त्याग नहीं किया क्योंकि वे सोचते थे कि यह क़ानून उनकी संस्कृति को नष्ट कर देगा।

उस समय हिन्दू धर्म में पुरुषों को कई पत्नियाँ रखने की आज़ादी थी और मंदिरों में पुरोहितों, पुजारियों और धर्मगुरुओं की यौनेच्छाओं की पूर्ति के लिए धार्मिक वेश्याएँ रखी जाती थीं, जिन्हें देवदासी कहा जाता था!

यह सब एक समय हमारी संस्कृति थी। आप हमारे समाज की हालत समझ सकते हैं, इस देश की परम्पराओं और इतिहास पर उनके विश्वासों को समझ सकते हैं! और भारतीय इतिहास के हर कालखंड में हिन्दू धर्म ने महिलाओं को द्वितीय श्रेणी का नागरिक समझा है। उनकी हैसियत किसी वस्तु से बढ़कर नहीं रही है, वे सिर्फ उपभोग की और बच्चे जनने की मशीने भर रही हैं।

संयुक्त राष्ट्र कह सकता है कि भारत में 75% शादीशुदा महिलाएँ बलात्कार का शिकार होती हैं और इसे अपराध माना जाना चाहिए। लेकिन हमारी राष्ट्रवादी, धार्मिक सरकार इस बात से सहमत नहीं है क्योंकि 'यह भारतीय संस्कृति के विरुद्ध' है! जी हाँ, इस देश में स्त्रियों को उनकी औकात दिखाने के लिए पुरुष उन पर बलात्कार करते हैं, यह दर्शाने के लिए कि देखो, तुम कमज़ोर हो! और महिलाओं को बलात्कार की शिकायत ही नहीं करनी चाहिए क्योंकि अगर किसी महिला के साथ बलात्कार होता है तो दोष उसी का होता है-वे अनुपयुक्त कपड़े पहनकर या अपने अनुचित व्यवहार से पुरुषों को बलात्कार के लिए आमन्त्रित करती हैं! अगर आप महिलाओं के प्रति कुछ अधिक दरियादिल हैं, उनके प्रति दया दिखाना चाहते हैं तो आप उनके कपड़ों या व्यवहार पर भले ही टिप्पणी न करें मगर कहेंगे कि 'कभी कभी लड़कों से युवावस्था के जोश में गलती हो ही जाती है', जैसा कि उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री के पिता मुलायम सिंह ने कुछ समय पहले कहा था।

परंपरागत भारतीय संस्कृति में एक महिला अपने पति की मिल्कियत होती है। अपनी पत्नी पर उसका सम्पूर्ण अधिकार होता है। महिलाओं को यह शुरू से ही पता होता है। पुरुष अपनी लड़कियों को अनजान लड़कों की तरफ देखने या बात तक करने से मना करते हैं। उनका कन्यादान होता है, विवाह के समय उसे अनजान व्यक्ति को दान कर दिया जाता है और एक ऐसे व्यक्ति के साथ सोने के लिए मजबूर कर दिया जाता है, जिसे वह जानती तक नहीं होती। क्या बलपूर्वक किया गया यह आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) किसी बलात्कार से कम है?

लेकिन नहीं, विवाह के पश्चात् पति द्वारा पत्नी के साथ बिना सहमति के सम्भोग करना भारत में बलात्कार नहीं माना जाता। निश्चय ही संयुक्त राष्ट्रसंघ गलत होगा। शिकायत करने वाली हर महिला गलत होगी।

जब भगवान भी बलात्कार करते हैं – हिन्दू मिथकों का भारतीय समाज पर असर – 3 नवंबर 2014

आज भी एक त्यौहार है और वृन्दावन में धार्मिक लोग परिक्रमा लगाकर इसे मनाते हैं। हिन्दू मिथकों के अनुसार इस दिन भगवान चार महीनों की लम्बी नींद से जागते हैं। यह विष्णु और तुलसी के विवाह का दिन भी है और भारत में आज के दिन से पुनः विवाहों के मौसम की शुरुआत होती है। आज के ब्लॉग में मैं इन धार्मिक कथाओं पर नज़दीकी नज़र डालते हुए भारतीय संस्कृति पर हुए उनके असरात का जायज़ा लेना चाहूँगा।

संक्षेप में पौराणिक कथा से मैं इसकी शुरुआत करता हूँ:

धर्मग्रंथों के अनुसार जलंधर नाम का एक दैत्य था। उसके पास अपना रूप बदलने की शक्ति थी, जिसके चलते वह किसी भी व्यक्ति का शरीर धारण कर सकता था। अपनी इस शक्ति का प्रयोग वह औरतों पर करता और उनके पतियों का रूप धरकर धोखे से उनका शीलभंग करने में सफल हो जाता। पता चलने पर जब पति उससे लड़ने आते तो कोई भी उसे मार न पाता। यह अद्भुत शक्ति उसे उसकी पत्नी के पतिव्रता होने के कारण प्राप्त थी। जी हाँ, पत्नी की स्वामिभक्ति के कारण वह दैत्य बलात्कार पीड़िता स्त्रियों के पतियों के हाथों मारा जाने से बच जाता।

सारे पति मिलकर विष्णु के पास, जिन्हें सबसे बड़ा परमेश्वर माना जाता है, गए और उससे मदद मांगी। विष्णु ने जलंधर को हराने के लिए उसी के तरीके को आजमाने का निश्चय किया: उन्होंने जलंधर का रूप धरा और दैत्य की पत्नी से सम्भोग करने में सफल रहे। वृंदा पतिव्रता नहीं रही और इस तरह उसके दैत्य पति की शक्ति जाती रही। अंततः विष्णु जलंधर को मारने में सफल रहे।

इस तरह धोखा देने के कारण वृंदा विष्णु पर बहुत क्रोधित हुई और उन्हें पत्थर हो जाने का श्राप दिया। फिर वह मृत जलंधर के साथ सती हो गई।

फिर वही वृंदा पुनर्जन्म लेकर पवित्र तुलसी का पौधा बनी और आखिर तुलसी और शालिग्राम, यानी पत्थर के रूप में विष्णु, का विवाह सम्पन्न हुआ।

इस पौराणिक कथा को हर कोई जानता है। अब मैं वर्तमान काल में भारतीय सांस्कृतिक परम्पराओं पर इस कथा के परिणामों पर नज़र डालते हुए चार बिन्दुओं में अपनी बात रखना चाहता हूँ। स्वाभाविक ही इन्हें समाज पर धर्म के बड़े दुष्परिणामों के रूप में देखा जा सकता है:

1) अगर कोई किसी महिला पर बलात्कार करता है तो आप उसकी पत्नी के साथ बलात्कार कर सकते हैं क्योंकि आपके भगवान ने भी तो यही किया था।

आज इसके कई उदाहरण मिल जाएँगे, जहाँ लोग बलात्कारी के परिवार की स्त्रियों पर बलात्कार करके बदला लेते हैं।

2) अपने धोखेबाज़, बलात्कारी पति की रक्षा के लिए स्त्रियों को वफादार और पवित्र होना चाहिए।

आज के भारतीय समाज में यह आम बात है कि स्त्रियों से अपेक्षा की जाती है कि वह तो पवित्रता की मूर्ति बनी रहे भले ही उसका पति बाहर जाकर कहीं भी मुँह मारता रहे, नजर आने वाली हर लड़की के साथ छेड़छाड़ करता रहे।

3) पति की मृत्यु के बाद पत्नी को आत्महत्या कर लेनी चाहिए।

दो सौ साल पहले तक यह एक सामान्य बात थी। इस प्रथा को सती प्रथा कहा जाता है और इस तरह आत्महत्या करना बड़े गर्व की बात होती थी क्योंकि यह काम उसकी स्वामिभक्ति का सबूत माना जाता था। राजा राममोहन रॉय ने एक कानून बनवाकर इस प्रथा को समाप्त करवाया लेकिन मेरी किशोरावस्था तक भी हम समाचार-पत्रों में ऐसे प्रकरणों के समाचार पढ़ते रहते थे। आज भी राजस्थान में ऐसे मंदिर हैं, जहाँ सती हुई स्त्रियॉं की पूजा की जाती है।

4) बलात्कार पीड़िता को अपने बलात्कारी उत्पीड़क के साथ विवाह रचाना चाहिए।

भारत में गाँवों की पंचायतों में कई बार ऐसे निर्णय आज भी सुनाए जाते हैं। दोनों परिवार अकसर इस बात पर राज़ी होते हैं कि बलात्कार की यही तार्किक परिणति हो सकती है।

इस चर्चा से आप भारतीय संस्कृति में महिलाओं की स्थिति का स्पष्ट अनुमान लगा सकते हैं। उसे बलात्कार के कारण बलात्कार झेलना पड़ता है, अपने पति के दीर्घ जीवन और संरक्षण के लिए प्रयास करने पड़ते हैं, उसे अपने पति के लिए खुद भी जीवन से हाथ धोना पड़ता है और अंत में, उसे खुद पर बलात्कार करने वाले अत्याचारी अपराधी के साथ विवाह करना पड़ता है और जीवन भर पत्नी बनकर उसकी सेवा भी करनी पड़ती है।

और इस देश के इस पाखंडी धर्म में कहा जाता है कि यहाँ स्त्रियॉं का इतना आदर किया जाता है कि उन्हें देवी का दर्जा हासिल है। ऐसे धर्म और ऐसी संस्कृति का आदर करने की आप मुझसे अपेक्षा भी कैसे कर सकते हैं?

पुनश्च: इन शब्दों के लिए मुझे गाली देने की जिनकी तीव्र इच्छा हो रही हो, वे पहले अपने धर्मग्रंथों को पढ़ें और सबसे पहले उन्हें गाली दें, जिन्होंने इन ग्रन्थों को लिखा है। मैं सिर्फ उनका हवाला देकर उसके दुष्परिणामों की ओर इशारा भर कर रहा हूँ….

जो पुरुष जो अपनी लड़कियों को ढँककर रखना चाहते हैं वही दूसरों की लड़कियों को नग्न देखने के सबसे ज़्यादा उत्सुक होते हैं! 5 अगस्त 2014

मैंने कल जिस विषय की तरफ इशारा किया था, उस पर आज ज़रा विस्तार से चर्चा करना चाहता हूँ: भारतीय पुरुषों का बहुत बड़ा पाखंड-और दूसरे देशों के पुरुषों का भी, जहाँ यही स्थिति पाई जाती है-कि वे चाहते हैं कि उनकी पत्नियाँ और लड़कियाँ ढँकी-छिपी रहें। वास्तव में मैं तो यह समझता हूँ कि वे भावनाओं के जंजाल में फँसे हुए होते हैं इसलिए बहुत पाखंडी रवैया अख़्तियार कर लेते हैं। और उनके इस रवैये का संचालन एक बार फिर उसी शक्ति के, यानी धर्म के, हाथों में होता है!

अगर आप ऐसे लोगों की पत्नियों और लड़कियों के साथ उनकी बातचीत सुनें तो आपको हमेशा उनके आदेश, बल्कि चेतावनियाँ सुनाई देंगी, जो वे अपनी स्त्रियॉं को देते रहते हैं, जिनमें उन्हें शालीन, मर्यादित और सादे वस्त्र पहनने के लिए कहा जाता है। अपनी कम से कम त्वचा दूसरे पुरुषों को दिखाई दे, इसका विशेष ख्याल रखने की हिदायत दी जाती हैं। ये शिक्षाएँ प्रकारांतर से स्त्रियॉं को यह बताती हैं कि अगर उनके साथ बलात्कार या कोई यौन दुराचार होता है तो उन्हीं का दोष माना जाएगा! उन्हें अपने घुटने, कंधे और सिर ढँककर रखने होंगे, जिससे कोई भी पुरुष उनकी ओर यौन आकर्षण न महसूस करे। यही सब बातें उनके पिता और उनके पति उन्हें सिखाते हैं।

अब अगर आप इन लड़कियों के पिताओं के ऑनलाइन व्यवहार पर नज़र डालें या यह जानने की कोशिश करें कि वे व्हाट्सऐप या फेसबुक पर किस तरह की तस्वीरें अपने मित्रों के साथ साझा करते हैं तो आप आश्चर्यचकित रह जाएँगे: वे अपने दिन का बहुत बड़ा हिस्सा अर्धनग्न महिलाओं की तस्वीरों को ताकते हुए बिताते हैं! वे "हॉट इंडियन गर्ल्स" शीर्षक वाले पेज फॉलो करते हैं, ऐसी समाचार एजेंसियों की सदस्यता ग्रहण करते हैं, जो उनकी ईमेल पर हर हफ्ते "हॉटेस्ट पिक्चर्स ऑन द वेब" जैसी तस्वीरें भेजती रहती हैं और जब आप उनकी पसंदीदा हस्तियों की जानकारी लेंगे तो उनमें प्रसिद्ध सुपर मॉडेल्स को अंगवस्त्रों और बिकनियों में पाएँगे। अधिकतर लोग शायद असली पॉर्न ढूँढ़ने और देखने से कतराते हैं-लेकिन अगर उन्हें यह विश्वास हो जाए कि यह पूरी तरह गोपनीय, सुरक्षित और व्यक्तिगत रहा आएगा तो वे उन्हें भी अवश्य देखेंगे।

कोई इससे अधिक पाखंडी क्या हो सकता है? आप सोचते हैं कि महिलाओं का अपनी त्वचा की नुमाइश करना गलत है, यहाँ तक कि आप अपनी पत्नी को भी नंगा देखने से कतराते हैं मगर दूसरी औरतों को, जो दूसरे पुरुषों की पत्नियाँ और बेटियाँ हैं, नंगा या अधनंगा देखने के लिए लालायित रहते हैं!

आपकी यह प्राकृतिक और उत्तेजक इच्छा होती है इसलिए आप उसे पसंद करते हैं! आप जिज्ञासु होते हैं, आप अपने अंदर मौजूद सभी इंद्रिय-संवेदनाओं और उत्तेजनाओं को जानना और महसूस करना चाहते हैं। यह बहुत प्राकृतिक है! लेकिन फिर जब आप सोचते हैं कि आप वहाँ, उन वेबसाइटों पर क्या कर रहे थे तो अपराधबोध से भर जाते हैं! फिर आप उन महिलाओं के बारे में अनुमान लगाने लगते हैं, उनका मूल्यांकन करने लगते हैं! फिर आप उन्हें गालियाँ बकना शुरू कर देते हैं, ऐसी-ऐसी बातें उनके बारे में कहते हैं, जिन्हें अपनी लड़कियों और पत्नियों के बारे में आप सुनना पसंद नहीं करेंगे! सुन लेंगे तो क्रोध से भर उठेंगे! लेकिन इसमें क्या शक कि आप उन अजनबी औरतों को देखना पसंद करते हैं।

यह सब बहुत विकृत और घृणित है, यह गलत है और यह भयंकरतम है कि इसका नतीजा बलात्कार में परिणत होता है। ऐसे लोगों द्वारा ही, जिन्होंने अपनी नैसर्गिक इच्छाओं का दमन किया होता है, बलात्कार और यौन दुराचार किया जाता है क्योंकि वे अपनी दमित इच्छाओं को इससे आगे काबू में नहीं रख पाते। ऐसे लोग सबसे बड़े पाखंडी होते हैं। और उन्हें धर्म ने ही पाखंडी बनाया है। धर्म ने सेक्स को वर्जित किया। धर्म ने सेक्स का मज़ा लेने वालों और कामोत्तेजना महसूस करने वालों के दिलों में अपराधबोध भर दिया। धर्म ने आदेश दिया कि महिलाओं को ढँका-छिपा जीवन बिताना चाहिए। धर्म कहता है कि स्त्रियाँ ही पुरुषों को बलात्कार करने के लिए उद्यत करती हैं।

पाखंड, धर्म, अपराधबोध और बलात्कार! भयानक रूप से एक दूसरे से नाभिनालबद्ध हैं! .

बिटिया, अपने आपको ढँककर रखो, नहीं तो अंकल अपना संयम खो बैठेंगे! 4 अगस्त 2014

नेट पर एक तस्वीर देखने के बाद मैं विचलित हो उठा हूँ। चित्र में एक छह साल की भारतीय बच्ची को कागज का बना एक बैनर लिए दिखाया गया था, जिस पर लिखा हुआ था: "अंकल, अपनी बेटी को सर से पाँव तक कपड़े पहनने के लिए कहें। कपड़े बदन ढँकने के लिए बनाए गए हैं, उसे उघाड़ने के लिए नहीं।"

मेरी फ्रेंड लिस्ट में से एक भारतीय मित्र ने इस तस्वीर को साझा किया और मैंने देखा कि उस तस्वीर को हजारों लोगों ने साझा किया है। मैं यह देखकर विचलित हो उठा कि इस मूर्खतापूर्ण संदेश को इतने लोगों ने साझा किया है! मुझे आशा थी कि उन लोगों ने भी यह बात समझी होगी कि तस्वीर में हाथ की सफाई की गई है, कि इबारत को फॉटोशॉप करके बच्ची के बैनर पर लगाया गया है। नेट पर थोड़ी सी खोजबीन के बाद मुझे मूल तस्वीर प्राप्त हो गई, जिस पर यह संदेश लिखा था: "मेरी मान-मर्यादा की सुरक्षा कीजिए। मैं आपकी बेटी हूँ!"

सबसे पहली बात, जिस पर मुझे एतराज़ है, वह यह कि आप किसी और की खींची हुई तस्वीर उठाते हैं और इस छोटी सी बच्ची की तस्वीर का उपयोग करते हुए, उसके बैनर पर अपना संदेश चस्पा कर देते हैं, जो आपके लिए तो सत्य हो सकता है लेकिन उस बच्ची या उसके माता-पिता के लिए नहीं! आप एक गलत उद्देश्य के लिए उस बच्ची का उपयोग कर रहे हैं!

और ऊपर से आप तस्वीर देखने वालों को ऐसा भद्दा संदेश देते हैं! मैं विचार करने लगा कि न सिर्फ तस्वीर को फॉटोशॉप करने वाला बल्कि तस्वीर साझा करने वाले सभी लोग मानसिक रूप से कितने बीमार होंगे! अवश्य ही यह किसी न किसी धर्मांध व्यक्ति का काम है, जो यह दावा करता है कि वह भारतीय या हिन्दू संस्कृति की रक्षा कर रहा है।

प्रकारांतर से यह तस्वीर यही दर्शाती है कि वह बच्ची चाहती है कि सभी पुरुष-यहाँ अंकल शब्द उन सभी पुरुषों के लिए इंगित है-अपनी बेटियों को बलात्कार से बचाकर रखने के लिए उन्हें ज़बरदस्ती सर से पाँव तक ढँककर रखें!

इसके अलावा यही लोग नेट पर, सोशल मीडिया पृष्ठों पर, जो इसीलिए बनाए गए होते हैं कि अंतःवस्त्रों में या उनके बगैर भी महिलाओं की तस्वीरें दिखाई जाएँ, जिससे पुरुष उन्हें देखकर काल्पनिक यौन सुख प्राप्त कर सकें, महिलाओं की नंगी-अधनंगी तस्वीरें देखते हुए आनंद-मग्न रहते हैं। आखिर ये लडकियाँ और महिलाएँ भी किसी की बेटियाँ हैं-आप उन्हें बिना कपड़ों के क्यों देखना चाहते हैं, जबकि दूसरा कोई आपकी बेटी या बहन के थोड़े से खुले कंधे या घुटने भी देख ले तो आपको एतराज़ हो जाता है?

मैं सिर्फ एक छोटी सी टिप्पणी लिखकर इसका उत्तर देता हूँ:

"क्योंकि, अन्यथा प्रिय अंकल, अगर आप एक छह साला बच्ची को बिना कपड़ों के देख लें तो आपकी कामेच्छा जाग्रत हो जाएगी और आप बलात्कार करने हेतु उद्यत हो जाएँगे। हमारे धर्म में और हमारे समाज में यह पूरी तरह जायज़ और सामान्य बात है और हज़ारों साल से यह प्रथा चली आ रही है: पिताओं और चाचाओं द्वारा अपनी बेटियों का बलात्कार! वास्तव में छोटी-छोटी बच्चियों को खुद अपने कपड़े पहनते समय अपनी सुरक्षा का ख्याल रखते हुए शरीर को पूरी तरह ढँकने वाले कपड़े ही पहनना चाहिए क्योंकि उनके चाचा खुद पर और अपनी कामेच्छा पर काबू नहीं रख पाते! वे अपने पैन्टों का ध्यान नहीं रख पाते- किसी भी स्त्री का शरीर देखने पर वस्त्र खुलकर नीचे गिर जाते हैं, चाहे स्त्री की उम्र 6 साल हो या 60 साल!"

और यह सच है। मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि उन लोगों की बेटियाँ और भतीजियाँ यौन प्रताड़ना और बलात्कारों से बची नहीं रह सकतीं, जो इन वाक्यों से सहमत हैं! विभिन्न सर्वेक्षणों में यह बात सामने आई है कि लगभग 93% बलात्कार उन्हीं लोगों द्वारा अंजाम दिए जाते हैं, जो पीड़िताओं के करीबी और यहाँ तक कि करीबी रिश्तेदार तक होते हैं-जैसे पिता, चाचा या परिवार के दूसरे नजदीकी सदस्य या घनिष्ठ मित्र!

आज की महिलाओं की सुरक्षा पर धर्म और संस्कृति के भयावह असर के बारे में मैंने बहुत कुछ लिखा है। इन्हीं के चलते समाज में यौन अपराध बढ़ते चले जा रहे हैं और कई बार मैं सोच में पड़ जाता हूँ कि आखिर छोटी-छोटी बच्चियाँ अपने ही घर में अपनी सुरक्षा किस तरह सुनिश्चित कर सकती हैं। यह असंभव है। अगर कोई बलात्कारों के लिए महिलाओं के कपड़ों को ज़िम्मेदार ठहराता है और इसलिए बुरका, ढँकी हुई बाँहें और पैर और संभव हो तो, सिर और चेहरा ढँककर रखने की सलाह देता है, तो यकीन मानिए वह व्यक्ति नंगे शरीर को देखकर कभी भी अपने आप पर काबू नहीं रख सकता। धर्मग्रंथों में ऐसी कहानियाँ बड़ी संख्या में मौजूद हैं और ये धर्मग्रन्थ उन्हीं बलात्कारियों की पूजा-अर्चना करने का उपदेश देते हैं।

दुनिया भर में हर जगह सामान्य अपराधी ही बलात्कार में लिप्त होते हैं। भारत ही ऐसा देश है जहाँ यह साफ़-साफ़ यहाँ की संस्कृति और विचारधारा से उद्भूत है, उसके कारण सामान्य व्यक्ति भी जो बलात्कार में लिप्त होता है स्वयं को अपराधी भी नहीं समझता।

सोशल मीडिया में उस तस्वीर को साझा करने वालों की बड़ी संख्या मेरे सामने इस बात का स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत करती है।

और मुझे आश्चर्य होता है कि वाकई यह समाज कितना बीमार समाज है!

क्या बुर्का न पहनकर महिलाएं पुरुषों को बलात्कार करने का आमंत्रण देती हैं? 5 फरवरी 2014

पिछले तीन सप्ताह से मैं यौन उत्पीड़न और बलात्कार के संबंध में ब्लॉग लिख रहा हूँ। इनमें मेरा फोकस मुख्य रूप से भारत पर रहा है मगर कुछ सामान्य बातें भी इनमें आ गई हैं। हालांकि वस्त्र कभी भी बलात्कार का कारण नहीं रहे हैं, इस बारे में मैं पहले भी एक ब्लॉग में लिख चुका हूँ फिर भी आश्चर्य होता है कि बहुत से लोग अब भी लिख रहे हैं कि महिलाओं के अंगप्रदर्शक पहनावे के कारण पुरुषों के लिए अपने आपको काबू में रखना मुश्किल हो जाता है। इसी तर्क को आधार बनाकर मैं आपके सामने आज एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करने जा रहा हूँ, जिससे पता चलता है कि प्रचलित धारणा के विपरीत बुर्के में पूरी तरह ढँकी-छिपी महिलाएँ भी बलात्कार से बच नहीं पातीं!

जी हाँ, यह एक तथ्य है। इस्लाम ने इस मूर्खतापूर्ण विचार का अनुगमन किया कि बलात्कार होने पर वह पीड़िता का दोष माना जाएगा और उन्होंने औरतों के लिए बुर्का पहनने का यह भयंकर नियम लागू कर दिया। मुस्लिम महिलाओं को, उनके परिवार की धार्मिक कट्टरता के अनुपात में, अपने शरीर के अधिकांश या किसी भी अंग को खुला रखने की इजाज़त नहीं है। उनके विचार में महिलाओं के बाल, उनके सामान्य कपड़े, उनके हाथ, यहाँ तक कि उनका चेहरा और आँखें भी किसी पुरुष को इतना उत्तेजित करने के लिए काफी हैं कि वह उन पर बलात्कार करने के लिए उद्यत हो जाए। यह पर्दा-नुमा, आकृतिहीन परिधान उनकी सुरक्षा की गारंटी की तरह पेश किया जाता है।

जब हम पिछले दिनों लखनऊ, जहां मुसलमानों की तादाद तुलनात्मक रूप से कुछ ज़्यादा है, गए थे तब वहाँ मैंने लगभग दस साल की एक लड़की को बुर्का पहने देखा। मुझे वह बड़ा अमानवीय लगा, जैसे उस मासूम बच्ची को जेल में डाल दिया गया हो। मेरी नज़र में यह एक बीमार समाज द्वारा की जाने वाली कार्यवाही है। बुर्के के पीछे का मूल विचार यह है कि पुरुष किसी महिला को देखकर अपनी यौनेच्छाओं पर काबू नहीं रख सकते, भले ही वह महिला एक दस साल की अबोध बच्ची ही क्यों न हो। क्या पुरुष वास्तव में अपने आपको काबू में रखने में इतने असमर्थ होते हैं? मुझे यह सोचकर बड़ा दुख होता है हालांकि वह बच्ची ऐसा महसूस नहीं करती होगी और न ही उसकी माँ या बहन। मैं जानता हूँ कि उसका समाज अपने दैनिक जीवन में इतनी गहराई से नहीं सोचेगा लेकिन मेरे लिए यह बहुत कठोर बात है और यह मुझे आम तौर पर सभी धर्मों पर और विशेषकर इस मज़हब पर सवाल उठाने के लिए मजबूर करता है।

मेरी नज़र में यह पूरी तरह तर्क-हीन बात है कि पहले तो महिला से बुर्का पहनने के लिए कहा जाए कि यह उन्हें पुरुषों से सुरक्षित रखेगा और अगर बलात्कार हो ही जाए तो दोष भी उन्हीं पर मढ़ा जाएगा। कुछ लोग तर्क करेंगे कि मुस्लिम समाज में और मुस्लिम देशों में बलात्कार की घटनाएं बहुत कम देखने में आती हैं। ऐसे देशों में, जहां इस्लाम के शरिया कानून लागू हैं, बलात्कार से पीड़ित महिला को आज भी चार पुरुषों कि गवाही का इंतज़ाम करना पड़ता है, जो पुष्टि करते हैं कि उसके साथ बलात्कार होता हुआ उन्होंने अपनी आँखों से देखा है, जैसे कि खुद पर हुए बलात्कार की दोषी वही हो! इसलिए आखिर अपने ऊपर हुए बलात्कार की रिपोर्ट वह करे ही क्यों? परिवार के पुरुष और महिलाएं सभी बलात्कार को छिपाना चाहते हैं-शर्म, कलंक और यहाँ तक कि बलात्कार के परिणामस्वरूप दी जाने वाली संभावित सज़ा का डर उन्हें सताता है। जी हाँ, इतनी बुरी तरह प्रताड़ित महिला अगर चार पुरुष गवाहों को हाजिर करने में असमर्थ रहती है तो प्रकरण खारिज हो जाता है और फिर दोष उसी पर मढ़ दिया जाता है।

जी नहीं, आपके कपड़े आप पर होने वाले बलात्कार का कारण नहीं हो सकते और किसी महिला को सर से पाँव तक एक काले लबादे में ढँक देना भी उसे बलात्कार से सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकता, बल्कि उसकी संभावना बढ़ जाती है।

जी हाँ, मैं जानता हूँ कि बहुत सी मुस्लिम महिलाएं कहती हैं कि बुर्के में वे अपने आपको सुरक्षित महसूस करती हैं। प्रश्न यह है कि बुर्के के बगैर वे असुरक्षित क्यों महसूस करती हैं। कारण स्पष्ट है: क्योंकि यह आपका दोष है, उन बीमार-दिमाग धार्मिक लोगों का दोष जो खुले आम कहते हैं कि एक नाबालिग, छह साल की बच्ची को देखकर भी वे अपनी यौनेच्छा पर काबू नहीं रख पाते!

अगर आप चाहें तो मुझे धार्मिक रूढ़ियों के प्रति असहिष्णु कह लें लेकिन जब तक ऐसी स्थिति है मैं अपनी इस बात पर अडिग रहूँगा: अगर कोई धर्म औरतों से कहता है कि यौन दुराचार और बलात्कार से बचने के लिए वह अपने आपको ढँककर रखे तो यह गलत बात है और हमेशा गलत ही रहेगी और ऐसा धर्म भी मेरी नज़र में हमेशा गलत ही रहेगा।

यदि भारतीय पुरुष चाहते हैं कि उन्हें एक संभावित बलात्कारी न समझा जाए तो उन्हें क्या परिवर्तन लाने होंगे! 28 जनवरी 2014

मैं पिछले सप्ताह पश्चिमी महिलाओं के विरुद्ध होने वाले यौन उत्पीड़न के विषय में लिखता रहा हूँ। इस दौरान मैंने बताया कि भारतीय महिलाओं को भी अपने दैनिक जीवन में, रोज़ ही ऐसे उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, मैंने तर्क और उदाहरण देकर यह भी स्पष्ट किया कि कैसे महिलाओं के वस्त्र उनके विरुद्ध होने वाले उत्पीड़न या बलात्कार के कारण नहीं हैं और अंत में इस समस्या के मूल कारणों की पड़ताल करते हुए स्पष्ट किया कि भारतीय समाज में व्याप्त सेक्स वर्जनाएँ ही इस समस्या के जड़-मूल में स्थित हैं। मैं आज भारतीय पुरुषों को संबोधित करते हुए एक अपील लिखना चाहता हूँ क्योंकि समाज में बदलाव आवश्यक है!

और क्या परिवर्तन की शुरुआत खुद अपने आपसे करना व्यावहारिक नहीं होगा?

जब मैं भारत में होने वाले बलात्कारों के बारे में लिखता हूँ तो अक्सर इस तरह की प्रतिक्रियाएँ प्राप्त होती हैं: लेकिन सिर्फ अपराधी ही तो बलात्कारी होते हैं, सामान्य लोग इन अपराधों में लिप्त नहीं होते! मैं मानता हूँ कि अपराधी प्रवृत्ति वाला कोई व्यक्ति ही ऐसा घृणित अपराध कर सकता है मगर दूसरी तरफ आप किसी भी भारतीय महिला से पूछें तो वह यही बताएगी कि जीवन में कम से कम एक बार उसके साथ यौन उत्पीड़न हुआ है। यह बात क्या प्रदर्शित करती है? या तो देश के अधिकांश पुरुष अपराधी हैं या फिर महिलाओं के प्रति ऐसे अशिष्ट व्यवहार को अधिकांश पुरुष बहुत सामान्य मानते हैं, महिलाओं के प्रति असभ्यता और निरादर उनकी मूल प्रवृत्तियों में शामिल हो गया है। स्त्रियॉं के प्रति यौन प्रताड़ना हमारी संस्कृति में रूढ़ है और उसी तरह हम दैनिक जीवन में उनके साथ व्यवहार करते हैं।

एक बात स्पष्ट है: जब तक भारत की सड़कों पर स्त्रियॉं का यौन उत्पीड़न जारी है तब तक एक सामान्य भारतीय पुरुष के रूप में आप इस बात के लिए अभिशप्त हैं कि आपको महिलाओं द्वारा एक संभावित खतरे के रूप में देखा जाए, चाहे वे महिलाएं विदेशी हों या भारतीय।

आशा करता हूँ कि मेरे ब्लॉग पढ़ने के बाद आप किसी महिला के साथ बलात्कार नहीं करेंगे। मैं यह भी आशा करता हूँ कि आप उनमें से नहीं हैं जो महिलाओं को छूने का कोई मौका नहीं गँवाते, जो सरे-राह उन पर फब्तियाँ कसते हैं छीटाकशी करते हैं या वे असहज हो जाएँ इतना घूर-घूरकर उनकी तरफ देखते हैं। लेकिन सवाल यह है कि इस विषय में आप क्या विचार रखते हैं? मित्रों के साथ चर्चाओं में आप महिलाओं के विषय में किस तरह बात करते हैं? अपने परिवार और आस-पड़ोस की महिलाओं के प्रति आपका रवैया क्या है? महिलाओं के विषय में सामान्य रूप से आप क्या महसूस करते हैं? पत्नी के साथ आपका बर्ताव कैसा है? अपने बच्चों को आप इस विषय में क्या सिखाते हैं? कहीं अपनी बेटी और अपने बेटे के साथ आपके व्यवहार में अंतर तो नहीं है?

सामान्य रूप से भारतीय संस्कृति, पूर्वाग्रह और मनोवृत्तियां भारतीय पुरुषों में महिलाओं के प्रति सम्मान की कमी के लिए उत्तरदायी हैं। स्त्रियों को देवियों के रूप में मंदिरों में पूजा जाता है लेकिन घर में सबसे निचली पायदान पर उनकी उपस्थिति होती है, उनका दमन किया जाता है और उन्हें पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता, घर के महत्वपूर्ण निर्णयों में उनका दखल वर्जित होता है: यानी कुल मिलाकर उन्हें सम्मानजनक रूप से बराबरी के अधिकार प्राप्त नहीं हैं। आपको अपने जीवन में परिवर्तन लाकर इस परिस्थिति के खिलाफ हरसंभव कार्यवाही करनी चाहिए।

मेहरबानी करके अपने लड़कों को महिलाओं का आदर करना सिखाएँ, कि वे उन्हें अपने समान मानें और उनके साथ बराबरी का व्यवहार करें। अपने व्यवहार से यह बात साबित करें और अपने मित्रों के लिए भी उदाहरण बनें। अपनी पत्नी, बेटियों, बहनों और महिला मित्रों को ठीक वही सम्मान दें, जो आप अपने पुरुष संबंधियों को देते हैं। सबसे मुख्य बात यह कि उन्हें खुद से प्रेम और खुद का आदर करना सिखाएँ। उन्हें यह न सिखाएँ कि वे क्या पहनें और क्या नहीं। अगर वे पढ़ना या नौकरी करना चाहें तो अपने स्वप्न पूरे करने की न सिर्फ उन्हें छूट दें बल्कि उनकी मदद करें कि वे उन्हें पूरा कर सकें। अपनी बेटियों को अपना जीवनसाथी चुनने की पूरी छूट दें, एक ऐसा व्यक्ति चुनने की, जो उसे प्रेम करता हो। उन्हें शक्ति और समर्थन प्रदान करें।

अपने यौन जीवन का पूरा लुत्फ उठाएँ। अपनी यौनिकता का दमन न करें बल्कि अपनी पत्नी के साथ अपनी और उसकी कामनाओं और स्वैर कल्पनाओं (fantasies) पर चर्चा करें। उन्हें अधिक से अधिक पूरा करने का प्रयास करें। एक दूसरे के लिए पर्याप्त समय निकालें, अपने प्यार का प्रदर्शन करें और प्यार की अति करके उसे अचंभित कर दें। अपने सम्मान युक्त प्रेम-सम्बन्ध को ऐसा बनाए कि आपके बच्चों और दोस्तों के सामने वह एक दृष्टांत के रूप में प्रस्तुत हो सके, उन्हें पता चले कि एक महिला का सम्मान किस तरह किया जाना चाहिए।

देश की सड़कों पर महिलाओं के विरुद्ध होने वाले यौन दुराचार को आप महज अपराधियों का काम कह कर अनदेखा नहीं कर सकते। इसका नतीजा आपके लिए ही बुरा होगा। जी हाँ, सिर्फ देश की प्रतिष्ठा के लिए ही नहीं, न ही सिर्फ पर्यटन उद्योग के लिए क्योंकि फिर विदेशी महिलाएं पर्यटन के लिए किसी दूसरे देश को वरीयता देंगी, बल्कि आपके लिए भी। जी हाँ, यह आपके लिए बुरी बात होगी क्योंकि इन महिलाओं द्वारा आपको एक संभावित बलात्कारी के रूप में देखा जाएगा, भले ही आप वैसे न हों। क्या आप चाहते हैं कि आपको एक बलात्कारी के रूप में देखा जाए?

जब तक आप अपने समाज को पूरी तरह बदलते नहीं तब तक आप भी महिलाओं की नज़र में एक संभावित खतरा हैं।

इसलिए इस सामाजिक परिवर्तन के लिए पूरी शक्ति के साथ काम करें।

बलात्कारी पंच – पंचायतें जहां बलात्कार अपराध नहीं बल्कि प्रेम की सज़ा है – 27 जनवरी 2014

पिछले सप्ताह से मैं भारत में महिलाओं के विरुद्ध होने वाली यौन प्रताड़नाओं और बलात्कारों के विषय में लगातार लिखता रहा हूँ और देखिये, इसी बीच बंगाल में एक और वीभत्स हादसा पेश आ गया। कलकत्ता से सिर्फ 180 किलोमीटर दूर एक गाँव में एक महिला पर सामूहिक बलात्कार किया गया। और इस बार यह बिना सोचे-समझे या दुर्भाग्यवश चंगुल में फंसी किसी महिला के साथ नहीं हुआ है बल्कि यह काफी सोच-विचार करने के बाद, महिला पर आरोप मढ़कर, पंचायत द्वारा सज़ा दिलवाकर किया गया सामूहिक बलात्कार है। वाकई यह एक सामान्य बलात्कार नहीं है। बलात्कारियों में सज़ा मुकर्रर करने वाले जज, पंच-सरपंच आदि सभी शामिल थे।

20 वर्षीय एक लड़की का एक पुरुष के साथ प्रेम हो जाता है। उनकी नज़र में पड़ोस के गाँव का वह पुरुष बुरा व्यक्ति था और उसके साथ गाँव की लड़की का प्रेम समाज को स्वीकार नहीं था। एक बार गाँव वालों को वे दोनों एक साथ दिखाई दे गए और वे उन दोनों को घसीटते हुए गाँव ले आए और तुरत-फुरत पंचायत (ग्राम अदालत) बिठा दी गई।

लड़की के परिवार को आदेश दिया गया कि वे 50000 रुपए अदा करें जो इतनी बड़ी रकम थी कि वे अदा नहीं कर सकते थे और यह बात पंचायत भी जानती थी। जब परिवार वालों ने कहा कि उनके पास इतनी रकम नहीं है तो पंचायत ने लड़की के विरुद्ध यह भयंकर फैसला सुनाया, जिसमें गाँव के कुछ पुरुषों से कहा गया कि वे उस लड़की पर बलात्कार करके उसे उपयुक्त सज़ा दें।

अब उसे याद नहीं है कि कितने लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया लेकिन उनकी संख्या कम से कम तेरह थी। इनमें से कई तो ऐसे थे, जिन्हें वह चाचा और भाई कहा करती थी और जिनके साथ उसके संबंध परिवार के सदस्यों जैसे आत्मीय थे। बलात्कार के बाद लड़की के बुरी तरह ज़ख्मी होने और रक्तरंजित होने के बावजूद परिवार वालों को घंटों उसे अस्पताल ले जाने से रोका गया। आखिर जब वे उसे अस्पताल ले जा सके तभी पुलिस में रपट भी लिखाई जा सकी।

पुलिस ने तेरह लोगों को इस आपराधिक मामले में गिरफ्तार किया है, जिनमें वह पंच भी शामिल हैं जिन्होंने यह ‘सज़ा’ सुनाई थी। फिर भी वे गिरफ्तारी से बचने की कोशिश करते रहे और पुलिस को अतिरिक्त पुलिस बुलवानी पड़ी तब जाकर संदिग्ध अपराधियों को गिरफ्तार किया जा सका।

हाल में पढ़ने में आया, इस तरह स्तब्ध कर देने वाला यह सबसे भयानक अपराध है। इसलिए नहीं कि दूसरे ऐसे अपराध कम गंभीर हैं बल्कि इसलिए कि यह आपराधिक प्रवृत्ति के व्यक्ति द्वारा शारीरिक और मानसिक उत्तेजना में तत्क्षण किया जाने वाला अपराध नहीं था। इस मामले में अपराध करने वाले समझ रहे थे कि वे न्याय कर रहे हैं, वे सोच रहे थे कि उस लड़की के साथ बलात्कार किया जाना आवश्यक है!

महिलाओं के विरुद्ध भारत में होने वाले कुल अपराधों में पश्चिम बंगाल का हिस्सा सबसे बड़ा है। सुदूर गावों में बुज़ुर्गों द्वारा अपने कानून बना लिए जाते हैं और उनके आधार पर अपराधों की सजाएँ सुनाई जाती हैं। इन्हें ग्राम पंचायत कहा जाता है और ऐसी घटनाओं से आप समझ सकते हैं कि वे महिलाओं के बारे में क्या विचार रखते हैं, उस समाज में महिलाओं की स्थिति क्या है और उनकी तुलना में ज़ुल्म करने वाले पुरुष कितने शक्तिशाली हैं।

ऐसी घटनाएँ आपके मन में क्षोभ, जुगुप्सा ही पैदा करती हैं और आप सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि आज भी ऐसे लोग मौजूद हैं, ऐसे समाज मौजूद हैं, जहां बलात्कार को पीड़िता की ही गलती के कारण होने वाला अपराध माना जाता है, जैसे मानसिक रूप से बीमार पुरुष का कोई अपराध ही न हो!

गोपनीय, दमित और फटाफट सेक्स: सेक्स को लेकर यही वर्जनाएँ यौन अपराधों के मूल में हैं – 23 जनवरी 2014

सोमवार को मैंने एक संवेदनशील मुद्दे पर लिखना शुरू किया था: भारत में विदेशी महिला पर्यटकों पर होने वाले यौन अपराधों और बलात्कारों की रिपोर्टों के परिप्रेक्ष्य में उनकी सुरक्षा का सवाल! उसके बाद मैंने इसी मुद्दे से जुड़ी भारतीय महिलाओं की समस्याओं का ज़िक्र किया था और कल उस टिप्पणी का उत्तर देने की कोशिश की थी, जिसका आशय यह था कि महिलाओं के वस्त्रों के चलते ही उनके विरुद्ध यौन अपराध होते हैं। यह एक संवेदनशील मुद्दा है लेकिन साथ बहुत ही महत्वपूर्ण भी है और इसीलिए आज मैं इस समस्या के मूल कारणों पर ईमानदारी के साथ और खुलकर प्रकाश डालना चाहता हूँ, जिससे लोग अपने गलत विचारों को इन झूठे तर्कों के पीछे छिपा न सकें!

जी हाँ, छिपाते हैं, उसका दमन करते हैं और और उसके साथ दो-चार नहीं होना चाहते और उसका सामना नहीं करना चाहते। सेक्स एक ऐसा विषय है जो खुद ही समस्या बन गया है। कुछ सप्ताह पहले मैंने बातों बातों में अपने एक दोस्त से कहा कि मैं "क्या हम सेक्स संबंध स्थापित कर सकते हैं?" इस शीर्षक से एक ब्लॉग लिख रहा हूँ और मैं यह लिखना चाहता हूँ कि "हम अपनी सेक्स जरूरतों के लिए एक दूसरे की मदद क्यों नहीं ले सकते अथवा सेक्स करने के लिए आमंत्रण क्यों नहीं दे सकते?" उसकी प्रतिक्रिया एक टिपिकल भारतीय के सोच को दर्शाने वाली थी: आप सेक्स पर लिखना ही क्यों चाहते हैं? यह चर्चा का विषय नहीं है! जी हाँ, करते सब हैं मगर छिपकर, खुले आम नहीं! फिर उस पर बात क्यों की जाए?

मैं जानता हूँ कि पश्चिमी देशों में भी आप किसी से यूंही यौन संबंध बनाने का अनुरोध नहीं कर सकते, भले ही वह नाइट क्लबों में घुमा-फिराकर चलता ही रहता है, लेकिन यहाँ, भारत में सेक्स पर बात भी करना एक तरह से वर्जित माना जाता है! आप इस शब्द का उच्चारण आपसी बातचीत में भी नहीं करते, अक्सर दोस्तों के साथ भी नहीं। और पत्नी से बात करते हुए सतर्क रहें, उससे ऐसी कोई बात न करें जिससे यह आभास हो कि आपने किसी और से सेक्स संबंधी बात की है। यहाँ तक कि अंतरंग मित्रों के साथ मज़ाक-मज़ाक में अपनी सेक्स फंतासियों की चर्चा करते हुए भी अक्सर आपकी पत्नी शामिल नहीं होती! पत्नी या पति के साथ सेक्स बिलकुल दूसरी बात है।

लाईट बंद करो, सिर्फ वे कपड़े उतारो, जिन्हें उतारे बगैर इस काम को अंजाम नहीं दिया जा सकता और तुरत-फुरत करके फुरसत पाओ। आवाज़ मत करो, बात करने की ज़रूरत नहीं है, सिसकियाँ मत निकालो, सीत्कार मत करो, और देखो भी नहीं। कोई नई क्रीड़ा, कोई नया प्रयोग आजमाने की कोशिश मत करो, रस मिले न मिले, उपभोग की संतुष्टि मिले न मिले! जब उत्तेजना काबू से बाहर हो जाए उसे शांत भर कर लो या तब करो जब बच्चे चाहते हों। बाकी दिन भर, या पूरे सप्ताह या महीना भर सेक्स का खयाल भी मन में न लाओ, सेक्स संबंधी बात मत करो, और हाँ, यौन-स्पर्श पूरी तरह वर्जित है!

मैं कहता हूँ, इससे समस्याएँ तो पैदा होंगी ही? यह वाकई अद्भुत बात है कि विवाह के बाद भी पुरुष अपनी फंतासियों को पूरा न कर पाएँ! यानी, वे अनजान महिलाओं की तरफ देखें और उनके साथ वह सब करने की कल्पना करें, जो उन्हें अपनी पत्नी के साथ करना चाहिए। ये 25 साल से ज़्यादा आयु के अविवाहित पुरुष स्त्रीविषयक दिवास्वप्न देखते हुए अपने माता-पिता से उनका विवाह करवाने की अपेक्षा में इंतज़ार करते रहते हैं कि कब वे वह अनुभव प्राप्त कर सकेंगे, जिसे वे कचरा फिल्मों में और मोबाइल फोन पर देख-देखकर उत्तेजित होते रहे हैं!

किसी को भी सेक्स पर बात करने की इजाज़त नहीं है, युवा पुरुष और महिलाएं इस विषय पर अपने ख़यालों का इज़हार नहीं कर सकते, कोई नहीं है, जिनसे बात करके वे अपनी शंकाओं का निवारण कर सकें और विवाह के दिन तक वे उसके बारे में ज़्यादा कुछ नहीं जानते! और यह तब है जब आजकल विवाह 25 से 30 वर्ष की उम्र में हो रहे हैं! इस उम्र तक आते आते ये युवा हर तरह की यौनेत्तजनाओं से गुज़र चुके होते हैं लेकिन उसका अनुभव लेने की बात छोड़िए, उन्हें शब्दों में व्यक्त करने का मौका भी उनके पास नहीं होता! विवाह के बाद भी इनमें से ज़्यादातर उत्तेजनाओं का उत्सर्जन नहीं हो पाता!

भारतीय पुरुष और महिलाओं का गर्व और उनकी पवित्रता उनके यौनांगों तक सीमित है। लेकिन इन्हीं पुरुषों की दमित कामुकता जब मौका पाती है और उस पर उनका काबू नहीं रह पाता तो वे बलात्कारी बन जाते हैं। और हाँ, जब वे अनियंत्रित हो जाते हैं तो वे हिंसा और अपराधों की ओर भी प्रवृत्त हो सकते हैं। महिलाओं के प्रति उनकी संकुचित धारणाएँ धर्म द्वारा परिचालित होती हैं, जिसमें महिलाओं के प्रति अक्सर अवमानना का भाव परिलक्षित होता है। और जब वे ऐसा मौका पाते हैं तो फिर महिलाओं को न सिर्फ तुच्छ मानकर उनका अपमान करते हैं बल्कि उन पर बलात्कार (अत्याचार) करने में भी नहीं हिचकिचाते।

यह बड़ी निराशाजनक स्थिति है-और इसे जड़मूल से उखाड़ फेंकना आवश्यक है। भारत को सेक्स के मामले में एक खुली नीति अपनानी चाहिए। और यह काम समस्या के मूल पर प्रहार होगा!

महिलाओं के कपड़े बलात्कार या यौन उत्पीडन का कारण नहीं हैं! 22 जनवरी 2014

परसों के ब्लॉग में यह लिखने पर कि जब भारतीय पुरुष मेरी पश्चिमी पत्नी और पश्चिमी महिला मित्रों की तरफ राह चलते आंखे फाड़-फाड़कर देखते हैं तो वे लोग असहज हो उठते हैं, मुझे एक अप्रत्याशित टिप्पणी प्राप्त हुई है:किसी ने यह कहा है कि ऐसा उनके कपड़ों के चलते होता है! अब इस बात को एक बार और स्पष्ट कर दूँ कि यौन उत्पीड़न और बलात्कार में महिलाओं के कपड़ों का कोई योगदान नहीं होता!

उसने लिखा, और स्वाभाविक ही वह पुरुष ही होगा, कि भारत में रहते हुए विदेशी महिलाओं को भारतीय वस्त्र पहनने चाहिए, साड़ी जैसे वस्त्रों से ‘महिलाओं की तरह अपने आपको ढँककर रखना चाहिए’; तब आपकी तरफ कोई ध्यान नहीं देगा लेकिन ‘अगर आप पश्चिमी महिला की तरह वस्त्र पहनेंगे तो लोगों की निगाहों से बच नहीं सकते!’

जहां तक मेरी पत्नी का और उसे घूरती निगाहों का प्रश्न है तो बता दूँ कि वह कभी भी ऐसे (अंगप्रदर्शक) वस्त्र नहीं पहनती लेकिन वह पंजाबी सूट (शलवार-कमीज़), साड़ी या जींस-टीशर्ट में भी बाहर निकले तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता: उसका रंग सफ़ेद है, वह महिला है, घूरने के लिए इतना ही भारतीय पुरुषों के लिए काफी होता है। और फिर वह कुछ भी पहने, किसी के इस तरह घूरने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। एक और बात, और यह बात मैं उसके विशेष अनुरोध पर लिख रहा हूँ: वह यह कि साड़ी उस तरह पूरे शरीर को नहीं ढँकती जिस तरह जींस और टीशर्ट जैसे पश्चिमी वस्त्र ढँकते हैं! साड़ी में तो पेट और पीठ का बड़ा हिस्सा खुला ही रह जाता है यानी अगर वह साड़ी पहने तो उसके बदन का ज़्यादा हिस्सा दिखाई देता है!

दरअसल मैं तो समझता था कि हम इस विवाद से आगे निकल आए हैं कि महिलाओं को उनके वस्त्रों के कारण प्रताड़ित होना पड़ता है! लेकिन नहीं। स्पष्ट ही आज भी ऐसे लोग मौजूद हैं, जो यह समझते हैं कि महिलाओं पर बलात्कार इसलिए होता है कि वह स्कर्ट पहनती है, क्योंकि वह अपने कंधे ढँककर नहीं रखती, क्योंकि वह ऊंचा पैंट पहनती है। संक्षेप में कहें तो यह विचार बेहद मूर्खतापूर्ण है।

महिलाएं कुछ भी पहनें उन्हें प्रताड़ित होना पड़ता है, चाहे वह कहीं की भी हो। अगर पहनावा ही इसके मूल में होता तो फिर साड़ी पहनकर घूमने वाली महिलाओं को भी वैसी ही गलत निगाहों और फब्तियों का सामना क्योंकर करना पड़ता है? कल ही मैंने कहा था कि भारतीय महिलाओं को इस तरह की प्रताड़ना ज़्यादा झेलनी पड़ती है। इसके अलावा उन्हें समाज की मदद भी कम मिल पाती है और उन घटनाओं पर कार्यवाही भी कम ही हो पाती है!

जो लोग आज भी सोशल मीडिया में ऐसी बकवास बातें लिख रहे हैं उनसे मैं पूछना चाहता हूँ कि क्या आप लोगों ने ‘यह आपका दोष है (It’s your fault)’ शीर्षक वीडियो देखा है जो इस समय नेट पर बहुत ज़्यादा देखा जा रहा है और जो यौन उत्पीड़न की शिकार महिला को ही दोषी ठहराने के इस रवैये का मज़ाक बनाता है? क्या आपने उन चित्रों को कभी नहीं देखा, जिनमें बलात्कार पीडिताओं को उनके द्वारा पहने हुए कपड़ों में दिखाया जाता है? क्या वे वही कपड़े नहीं पहने होतीं जिनकी आप अनुशंसा कर रहे हैं। बलात्कार का कारण परिधान नहीं हैं, इसका कारण यह नहीं है कि वे क्या पहनती हैं!

वह कहाँ जाती है, कौन से कपड़े पहनी है, वह कैसी दिखती है और उसके हावभाव कैसे हैं, इनमें से किसी भी तर्क के आधार पर आप उसे दोषी नहीं ठहरा सकते। आप यह कभी नहीं कह सकते कि वह ‘यही चाहती थी’! ऐसे अपराधों का कोई तार्किक औचित्य सिद्ध नहीं किया जा सकता और इनमें घूर-घूरकर देखना और छूने की कोशिश करना भी शामिल हैं!

वाकई, बलात्कार से बचने के लिए किसी महिला के लिए अपने शरीर को पूरी तरह ढँककर रखना क्यों ज़रूरी हो? क्या बुर्के वाली महिलाओं पर बलात्कार नहीं होता? शरीर ढँक लिया, फिर प्रताड़ित क्यों हुईं? भारत में अधिकतर बलात्कार गावों में होते हैं, जहाँ कोई महिला पेंट या टीशर्ट नहीं पहनतीं बल्कि परम्परागत भारतीय वस्त्र पहनती हैं, जिसमें उनका सिर, केश और पूरा बदन ‘उचित रूप से ढँका’ होता है! और बच्चों पर, यहाँ तक कि दूध पीते बच्चों पर बलात्कार क्यों होता है? वे किस तरह का अंगप्रदर्शन करते हैं और किस तरह ‘यही चाहते हैं’?

किसी महिला को सिर्फ अपने परिधानों के कारण यौन सुरक्षा के लिए चिंतित क्यों होना पड़े? सिर्फ इसलिए कि पुरुष अपनी यौन पिपासा को काबू में नहीं रख पाते? क्योंकि दरअसल वही अपने उच्छृंखल मस्तिष्क द्वारा परिचालित कमजोर कमजोर लिंगी मनुष्य है!

अगर आप ऊपर दिए गए तर्क पर अडिग हैं तो अंगप्रदर्शक वस्त्रों में किसी महिला को अपने करीब से गुजरते देखकर आपके मन में क्या चल रहा होता होगा, इसे आप स्पष्ट रूप से ज़ाहिर कर रहे हैं। अब मैं आपसे एक प्रश्न करता हूँ: बताइये कि उसे यौन रूप से प्रताड़ित करने से आप कितनी दूर हैं? अखबारों में समाचार बनने वाला बलात्कार करने में आपको और कितना समय लगने वाला है?

स्वाभाविक ही, ज़्यादा दूर नहीं हैं आप! या आपमें इतनी शर्म बाकी है कि ऐसे बेहूदा तर्कों से अपने आपको अलग कर लें?