पश्चिम में बसने जा रहे भारतीयों के लिए कुछ और टिप्स – 9 जुलाई 2015

पश्चिमी महिलाओं और भारतीय पुरुषों के बीच होने वाले संबंधों पर पिछले तीन हफ्ते लिखने के बाद मुझे लगता है, इस श्रृंखला में यह मेरा अंतिम ब्लॉग होगा। जब मैंने इस पर लिखना शुरू किया था तब मुझे पता नहीं था के मेरे पास इतना कुछ लिखने को है हालांकि मन के किसी कोने में पहले से यह एहसास भी था कि इस विषय में लोगों की इतनी दिलचस्पी अवश्य होगी कि वे इस बारे में पढ़ना चाहेंगे। मैं बहुत से लोगों को जानता हूँ जो इन ब्लॉगों में वर्णित स्थितियों से दो-चार हो चुके हैं और स्वाभाविक ही ये ब्लॉग लिखते हुए मैंने अपने निजी अनुभवों का उपयोग भी किया है। आज मैं बचे हुए कुछ विचारों को, जो अब तक वर्णित स्थितियों में कहीं फिट नहीं होते, लिखकर इस श्रृंखला को विराम दूँगा।

समस्या बन सकने वाला एक विषय है, शाकाहार! अगर आप शाकाहारी हैं तो कुछ देशों में रेस्तराँ में जाना मुश्किल पैदा कर सकता है। पिछले कुछ सालों में शाकाहारियों के लिए स्थितियाँ बहुत बेहतर हुई हैं लेकिन अगर किसी जगह बैरा आपसे कहे कि शाकाहार के नाम पर सिर्फ टमाटर सूप या हरा सलाद ही उपलब्ध है तो हैरान न हों क्योंकि यह इस बात पर निर्भर है कि आप किस देश में हैं और उस देश के छोटे-मोटे कस्बे में हैं या किसी बड़े शहर में! सिर्फ सब्ज़ी-चावल की माँग करने पर बैरा बुरा मान सकता है और संभव है आपकी ओर अविश्वास से देखे और कहे, चावल में से मांस के टुकड़े निकाल देता हूँ, खा लीजिए!

और, हालांकि कई जगहों पर भारतीय रेस्तराँ हैं लेकिन उनमें एक भी ऐसा नहीं मिलेगा जो आपको वास्तव में शुद्ध भारतीय खाना खिला सके, घर का आस्वाद दिला सके! ज़रूरी नहीं कि यह उनका दोष हो- आखिर है तो वह भी रेस्तराँ ही, आपकी माँ की रसोई नहीं। वहाँ आयातित सामग्रियाँ मिलाई जाती हैं, जो स्वाभाविक ही, वैसी ताज़ी नहीं हो सकतीं जैसी भारत में आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं। या फिर स्थानीय रूप से उत्पादित होती हैं, जिनका स्वाद स्वाभाविक ही बहुत अलग होगा। सबसे बड़ी बात, ये रेस्तराँ इतने ज़्यादा महंगे होते हैं कि वहाँ आप नियमित रूप से खाना नहीं खा सकते। तो मेरी आपको यही सलाह होगी कि माँ से खाना बनाना सीखकर यहाँ आइए और भारत से थोड़े-बहुत मसाले लेकर अपने नए देश में बसिए- बस आपका काम चल जाएगा!

लेकिन आपको स्थानीय भोजन चखने का मौका भी खूब मिलेगा और शायद उसका स्वाद भी आपकी ज़बान पर चढ़ जाए। कुछ देशों में, आपको आश्चर्य होगा कि लोग कितनी ज़्यादा ब्रेड खाते हैं- उदाहरण के लिए, रोज़ नाश्ते में ब्रेड के अलावा कुछ नहीं! मैंने देखा है कि जर्मन लोगों के यहाँ नाश्ते में तरह-तरह की ब्रेडें देखकर भारतीय लोग किस तरह स्तब्ध रह जाते हैं- ब्रेड और जैम, ब्रेड और चीज़, ब्रेड और ब्रेड-स्प्रेड! लेकिन जब आप जर्मन ब्रेडें खाकर देखेंगे तब आपको समझ में आएगा कि सबका स्वाद काफी अलग होता है और सभी एक से बढ़कर एक स्वादिष्ट होती हैं। और तब हाथ से रोटी बनाना छोड़कर आप शायद खुद भी अपने भोजन में उन्हें शामिल करने का विचार करें!

मुझे आशा है कि मैं आपके सामने कुछ सकारात्मक विचार और टिप्स रख सका। अंतर-सांस्कृतिक संबंधों में बंधे सभी व्यक्तियों को मैं अपनी शुभकामनाएँ अर्पित करना चाहता हूँ-चाहे आपने कोई भी निर्णय लिया हो, किसी भी देश में बसने का इरादा किया हो या चाहे आप किसी भी समस्या से दो-चार हो रहे हों!

और हाँ, पश्चिम में बसने जा रहे भारतीय साथियों के लिए एक अंतिम बात और: अगर आप कार चला रहे हों और कोई पुलिस वाला आपको रोकता है तो उसे रिश्वत देने की कोशिश कभी न करें… इसके नतीजे में आपको जीवन की सबसे बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है!

पवित्र गाय के विषय में हिन्दू पाखंड – 26 जनवरी 2015

बहुत समय नहीं हुआ जब आश्रम आए कुछ मेहमानों के साथ एक शाम आग तापते हुए अच्छी-ख़ासी रोचक चर्चा हुई थी। हम भारत में उन्हें हुए अनुभवों के बारे में बात कर रहे थे और तभी एक, जर्मनी से आई एक डॉक्टर ने यह प्रश्न जड़ दिया: मैंने पढ़ा है कि भारत में गायों को पवित्र माना जाता है लेकिन शहर में लोगों को मैं पैदल देखती हूँ तो पाती हूँ कि बहुत से लोग चमड़े के जूते पहने हुए हैं और इसके अलावा वे चमड़े के बेल्ट और चमड़े के बैग भी निःसंकोच इस्तेमाल करते हैं। वे इन दोनों बातों का तालमेल किस तरह बिठा पाते हैं?

इसका उत्तर दरअसल मुझे सिर्फ एक पंक्ति में देना पड़ा: लोग बड़े पाखंडी हैं। यह सच है, इसके अलावा आप इसे क्या कहेंगे? भारत आए किसी पर्यटक को इसे और किस तरह समझाएँगे?

हिन्दू धर्म कहता है कि गाय पवित्र है। यह सही है। लेकिन आपको सिर्फ बाहर निकलकर इधर-उधर नज़रें भर घुमाना है और आपको हर तरफ गायों की दुरवस्था देखने को मिल जाएगी: आवारा, शहर भर में घूमती हुई, हर तरह का, जो मिल जाए, कचरा और कूड़ा-कर्कट खाती हुई, अक्सर प्लास्टिक और दूसरी खतरनाक अखाद्य वस्तुएँ खाती हुई। वे अक्सर मरियल सी और बीमार होती हैं। यह सब एक पवित्र गाय भुगतती है और लोग देखते रहते हैं! क्यों और कैसे?

या क्या गाएँ तभी तक पवित्र हैं जब तक वे दूध देती हैं या आपकी चाकरी करती हैं? क्योंकि देखने में यही आता है: दूध देने वाली गाएँ, जब बच्चे पैदा नहीं कर पातीं और इसलिए दूध देना बंद कर देती हैं तो उन्हें बाहर निकालकर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है और वही गाएँ सड़क पर भटकती दिखाई देती हैं।

सिर्फ केरल और पश्चिम बंगाल को छोड़कर भारत के लगभग सभी राज्यों में गौहत्या गैरकानूनी है लेकिन साथ ही भारतीय चमड़ा व्यवसाय बहुत विशाल है। उसका “कुल व्यापार 5 बिलियन डॉलर्स का है और उससे होने वाली आय भारत की कुल निर्यात आय का लगभग 4% है”। ये दोनों बातें कैसे संभव हैं- गायों का वध भी अवश्य किया जाता होगा तभी चमड़ा व्यवसाय के ये आँकड़े हासिल किए जा सकते हैं! और धार्मिक लोग भी इस चमड़े का इस्तेमाल करते हैं!

आखिर मंदिरों में धड़ल्ले से इस्तेमाल होने वाले तबले पर चढ़ाया जाने वाला और दूसरे वाद्ययंत्रों में इस्तेमाल होने वाला चमड़ा कहाँ से आता है? मैंने इसके बारे में जानकारी हासिल की- बकरी या गाय के चमड़े से। क्या गाने-बजाने वाले यह पूछते हैं कि चमड़ा किस जानवर का है? क्या आप समझते हैं कि मंदिर के पुजारी इस बात की जाँच करते हैं कि उनके मंदिर की पवित्रतम जगहों में प्रवेश पाने वाला वाद्य पूरी तरह पवित्र चमड़े का बना हुआ है?

मुझे इस बात में संदेह है।

मैं आपको यह भी बताना चाहता हूँ कि सभी हिन्दू शाकाहारी नहीं होते। भारत की लगभग 80% आबादी हिन्दू है। और सिर्फ 30% भारतीय ही शाकाहारी हैं। इसका अर्थ है कि बहुत बड़ी संख्या में हिन्दू भी मांसाहारी हैं। मैकडोनल्ड्स भारत में चिकन और बकरे के गोश्त से तैयार बर्गर बेच सकता है लेकिन क्या आप समझते हैं कि जब भी कोई हिन्दू सैंडविच में या किसी और खाने में मौजूद मांस का टुकड़ा खाते हैं तो क्या वे इसे सुनिश्चित करने के लिए कि उसमें गाय का मांस नहीं है, किसी से पूछते हैं?

जी नहीं, वे नहीं पूछते।

और इन्हीं सब बातों के चलते मैं कहता हूँ कि वे पाखंडी हैं। आप गायों से प्रेम करने का दिखावा करते हैं, उसकी पूजा करते हैं, यहाँ तक कि उसका पेशाब पीते हैं क्योंकि आप समझते हैं कि उससे आपको कोई अलौकिक दैवी शक्ति प्राप्त हो जाएगी- लेकिन फिर आप उन्हें मरने के लिए सड़कों पर छोड़ देते हैं, उन्हें बूचड़खानों में भेज देते हैं, उनका मांस खाते हैं, उनकी खाल के जूते पहनते हैं और तबलों और वाद्ययंत्रों पर उनका चमड़ा चढ़ाकर अपने पूजाघरों में ले जाते हैं, जिसे वैसे आप अपवित्र मानते हैं!

अंत में मेरे पास हमेशा यह सवाल खड़ा रह जाता है: सिर्फ गाय ही क्यों? गाय की पूजा करो और कुत्ते को लात मारो। गाय की रक्षा करो और सूअर को खा जाओ। क्यों?

हाँ, मैं मांसाहार को लेकर असहिष्णु हूँ- और इस विषय में मुझे कोई अपराधबोध भी नहीं है – 10 दिसम्बर 2014

कल ही मैंने आपको यह बताने का विचार कर लिया था कि विभिन्न रेस्तराँओं में कुछ विशिष्ट खाद्य पदार्थों को लेकर मेरे अनुभव किस तरह के रहे हैं-तो अब इसकी शुरुआत करते हैं!

मैं सारा जीवन शाकाहारी रहा हूँ। वास्तव में मेरे गृहनगर, वृन्दावन में आप एक भी ऐसा रेस्तराँ नहीं पाएँगे, जहाँ मांस (सामिष भोजन) मिलता हो। यह पूरी तरह निरामिष शहर है। बचपन से ही मैं बहुत घूमता-फिरता रहा हूँ मगर भारत में, और विशेष रूप से उन लोगों के बीच, जिनसे मेरा ज़्यादातर साबका पड़ता रहा है, शाकाहारी होना असामान्य बात नहीं है। बल्कि इसके विपरीत मेरे आसपास के लोग सामिष भोजन को घृणास्पद मानते हैं।

बाद में, जब मैं विदेश यात्राओं पर जाने लगा तो पहले से जानता था कि वहाँ मुझे खुद अपने हाथों से अपना खाना पकाना होगा। वैसे यहाँ, भारत में भी, जब मैं अकेले यात्रा करता था तो अपना खाना खुद बनाता था। मुझे पता चला कि विदेशों में निरामिष रेस्तराँ होते ही नहीं हैं। वहाँ मैं सिर्फ भारतीय रेस्तराओं में ही भोजन करता था, जहाँ मैं उन्हें अच्छी तरह समझा सकता था कि मैं मांस नहीं खाता और न ही लहसुन और प्याज ही खाता हूँ। और वे समझ जाते थे।

और बाद में मेरे पश्चिमी मित्र मुझे दूसरे रेस्तराओं में भी ले जाने लगे और मैंने भी मेरे संपर्क में आने वाले सभी लोगों के सामने यह स्पष्ट करना सीख लिया कि मैं क्या खाऊँगा और क्या नहीं और यह भी कि कैसे खाऊँगा।

पश्चिम में अधिकांश शाकाहारी एक शाकाहारी के रूप में अपने समाज में रहने के आदी हैं और आसपास दूसरे सभी मांस खा रहे हों, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं शाकाहारी हूँ और इसका कतई आदी नहीं था- और मुझे मेरे साथ भोजन करने वालों को यह बताना पड़ता था कि टेबल पर मांस रखा हो या परोसा जा रहा हो तो मैं साथ बैठकर भोजन नहीं कर सकता। मेरी भूख मर जाती है, बल्कि जी मितलाने लगता है और लगता है जैसे उल्टियाँ होने लगेंगी। आपकी प्लेट में मौजूद मृत पशु के अवयवों को बर्दाश्त करना मेरे लिए असंभव है!

अगर आप इसे असहिष्णुता कहना चाहते हैं तो मुझे वह भी मंजूर है। जी हाँ, मैं इस मामले में पूरी तरह असहिष्णु हूँ-और इसके लिए मेरे अंदर कोई अपराधबोध भी नहीं जागता। अगर हम बाहर खाना खाने निकलें और आपको लगे कि आप एक दिन के लिए भी शाकाहारी खाना खाकर नहीं गुज़ार सकते तो मुझे आपसे कहना पड़ेगा कि मैं आपके साथ उसी टेबल पर खाना नहीं खा सकता। और अगली बार मैं आपके साथ खाना खाने के लिए बाहर निकलने में भी हिचकिचाऊँगा। ऐसा करके ही मैं खाना खा पाऊँगा।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं चाहता हूँ कि सब लोग हर समय मेरे जैसा शाकाहारी भोजन ही करें। जो आप नहीं हैं, अपने आपको वैसा प्रदर्शित करें, यह मैं नहीं चाहता। स्वाभाविक ही मैं सराहना करूँगा अगर दूसरे भी शाकाहारी बन जाएँ-यह मेरा सामान्य रवैया है क्योंकि मुझे विश्वास है कि शाकाहार सबके लिए अच्छा है-लेकिन सिर्फ इसलिए कि मैं वेटर से प्याज़ और लहसुन रहित सॉस लाने के लिए कहता हूँ, आपको भी वैसा ही करने की ज़रूरत नहीं है। पश्चिमी लोगों का मेरे साथ बैठकर एकाध गिलास वाइन पीना मुझे बर्दाश्त हो जाता है-भले ही मैंने आज तक शराब किसी भी रूप में, कभी भी नहीं चखी है। और ऐसे हजारों शानदार सामूहिक भोजों में मैं शामिल हुआ हूँ।

मैं यह बताना चाहता हूँ कि भले ही दूसरों से आपकी आदतें अलग हों, उनकी कुछ आदतों को आप स्वीकार कर सकते हैं और कुछ को नहीं, इसके बावजूद अपनी आदतों को लेकर आपमें अपराधबोध या एहसासे कमतरी नहीं होना चाहिए। अपनी सीमाएँ समझिए और अपनी शर्तों को नम्रतापूर्वक और मित्रतापूर्वक सबके सामने रख दीजिए। उनके बारे में कोई जान भी ले तो उससे आपको बुरा नहीं लगना चाहिए।

अगर कोई व्यक्ति इस पर कोई मूर्खतापूर्ण टिप्पणी करता है-तो उसे करने दीजिए। भोजन के वक़्त वे आपकी सोहबत का लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं तो यह उनका दोष है, आप इसकी चिंता न करें!

शाकाहारी होने के कारण मांसाहारी मित्रों के साथ भोजन करते हुए संकोच महसूस न करें – 9 दिसंबर 2014

कल मैंने ‘मांसाहारी खाद्यों के स्थानापन्न’, जैसे टोफू सॉसेजेज़ आदि के प्रति अपनी अरुचि प्रकट की थी। मैंने ज़िक्र किया था कि एक बार सोच-समझकर शाकाहार अपनाने का निर्णय ले लेने के बाद आपमें किसी तरह का अफसोस या मांसाहारी खाद्यों के प्रति लालसा नहीं होनी चाहिए। मैं इस बात पर दृढ़ हूँ और इसमें यह भी जोड़ना चाहता हूँ कि मांसाहारी मित्रों के साथ रेस्तराँ में बैठकर खाना खाते हुए, जब मेनू में आपके खाने लायक कोई विकल्प मौजूद नहीं होता, तब भी यही बात लागू होती है! अपने चयन और अपनी जीवन-पद्धति पर न तो अफसोस करें और न ही किसी तरह का अपराधबोध महसूस करें!

बहुत से शाकाहारियों को इस तरह का अनुभव होता है: आप किसी रेस्तराँ में दोस्तों के साथ खाना खाने जाते हैं। आप मेनू कार्ड खोलते हैं और पाते हैं कि टमाटर के सलाद के अलावा आपके खाने लायक वहाँ कुछ भी उपलब्ध नहीं है। अगर आप मेरी तरह प्याज़ नहीं खाते तो वह विकल्प भी आपके सामने नहीं होता। वहाँ मृत पशु के मांस से रहित एक भी व्यंजन मौजूद नहीं है।

आप क्या करेंगे? या तो आप थोड़ा सा टमाटर सलाद लेकर अपनी थोड़ी-बहुत भूख मिटाने की कोशिश करेंगे कि कुछ देर बाद घर चलकर खाना खा लेंगे या फिर वेटर से शाकाहारी खाना लाने के लिए कहेंगे। लंबी बातचीत के बाद भी आपको अपने लायक खाना मिल पाता है या नहीं, यह इस पर निर्भर करेगा कि आप किसके साथ बैठे हैं और इस पर कि रेस्तराँ की रसोई में इतनी क्षमता है भी या नहीं! लोग आपकी तरफ अजीबोगरीब नज़रों से देखेंगे और हो सकता है, आपको मूर्खतापूर्ण ताने भी सुनने को मिलें। इस बीच उस वातावरण में आपकी असुविधा लगातार बढ़ती जा रही है और आप सोच रहे हैं कि कहीं आपके दोस्त यह न सोचें कि आप इस छोटी सी बात का बतंगड़ बना रहे हैं। आप बेचैन हैं कि आप अपने लिए खाना मंगाने जैसा छोटा सा काम नहीं कर पा रहे हैं।

नतीजा: आप बुरा महसूस करते हैं, अपराधबोध से ग्रसित हो जाते हैं। अगर आपका खाना आता भी है और आपको लगता है कि उन्होंने बेकन हटाकर वही व्यंजन फिर भेज दिया है तो और भी मुश्किल पेश आती है। अब आप सोचते हैं कि क्या इस धोखाधड़ी की शिकायत की जाए? लेकिन ऐसा न हो कि आपके मित्र और ज़्यादा परेशान न हो जाएँ! कुल मिलाकर अंत में आपकी शाम उतनी सुखद नहीं हो पाती, जितने की आपने आशा या अपेक्षा की थी।

मैं इस समस्या का एक हल बताता हूँ: आपको कुछ निर्णय लेने होंगे। जब आप मित्रों के साथ कहीं खाना खाने जाते हैं तो शुरू में ही स्पष्ट कर दें कि आप उसी रेस्तराँ में जाएँगे, जहाँ शाकाहारी विकल्प उपलब्ध हों अन्यथा आप खाना खाने साथ नहीं जाएँगे। इसमें उन्हें बुरा लगने की कोई बात नहीं है और न ही आपके लिए है। अगर आप मिलकर कोई काम करना चाहते हैं-और आपकी मित्रता को रेस्तराँ के चुनाव से अधिक महत्व मिलना ही चाहिए-तो आपके मित्रों को ऐसे किसी रेस्तराँ में भोजन करने में कोई एतराज़ नही होना चाहिए, जहाँ आपके लिए भी भोजन के विकल्प मौजूद हों! वैसे भी आजकल शाकाहार भी उतनी अजीबोगरीब और असामान्य बात नहीं रह गई है! रेस्तराओं को भी चाहिए कि ऐसे लोगो की आवश्यकताओं का भी ध्यान रखे। और अगर वे ऐसा नहीं करते तो वे आप जैसे ग्राहकों से वंचित होंगे, आपको अपने निर्णय पर अपराध बोध क्यों हो!

दूसरा विकल्प है, अपने मित्रों को अपने घर आमन्त्रित करना! सब मिलकर कुछ पकाएँ या पहले से कुछ अपने मनपसंद व्यंजन पकाकर उन्हें बुलाइए। उन्हें एहसास दिलाइए कि शाकाहारी व्यंजन बहुत स्वादिष्ट होते हैं-सम्भव है, तब वे इस बात के कायल हो जाएँ कि अगली बार जब साथ खाने बाहर जाएँ तो ऐसा रेस्तराँ खोजें, जहाँ शाकाहारी भोजन भी उपलब्ध हो।

सौभाग्य से मैं ऐसे देश में रहता हूँ, जहाँ सामिष भोजन का सेवन सबसे कम होता है- अर्थात, यहाँ आसपास कोई न कोई रेस्तराँ हमेशा मौजूद होता है, जहाँ शाकाहारी भोजन उपलब्ध हो। लेकिन मुझे अक्सर एक और समस्या का सामना करना पड़ता है: मैं लहसुन और प्याज़ भी नहीं खाता। लेकिन भोजन के मामले में मुझे और भी बहुत से अनुभव प्राप्त हुए हैं-और शायद अपने व्यक्तिगत अनुभवों के विषय में मैं कल इसी ब्लॉग में लिखूँगा।

भोजन में मांस के स्थानापन्न को शामिल करने की कोशिश करना शाकाहार की ओर बढ़ाया गया गलत कदम है – 8 दिसंबर 2014

हाल ही में एक ऑनलाइन आलेख अचानक मेरी नज़रों से गुज़रा, जिसका शीर्षक लगभग इस तरह था : 'मांस के 10 बढ़िया स्थानापन्न'!' जैसी कि आप आशा कर रहे होंगे, आलेख में लेखक ने दस खाद्यों का वर्णन किया था, जिन्हें आप मांस के स्थान पर ग्रहण कर सकते हैं। इस तरह के आलेख मुझे कतई नापसंद हैं। लेकिन रुकिए, '10 बढ़िया…' वाली थीम से मुझे कोई शिकायत नहीं है। वास्तव में इस आलेख का विषय ही मुझे नापसंद है। यह विचार कि क्योंकि आप मांसाहार छोड़ रहे हैं तो आपको उसके स्थान पर कोई और समतुल्य या मांस जैसी लगने वाली खाद्य सामग्री ग्रहण करनी होगी!

मेरे विचार में शाकाहार के प्रति यह एक गलत नज़रिया है। मांस छोड़कर आप शाकाहारी क्यों होना चाहते हैं? इसके कई कारण हो सकते हैं: हो सकता है, आप पशु-प्रेमी हों और उनके विरुद्ध होने वाली क्रूरता समाप्त करना चाहते हों। हो सकता है कि आप इतने संवेदनशील हों कि मुर्गियाँ या बत्तख पालना और फिर भोजन के लिए उनकी हत्या करना आपको कतई जँच न रहा हो। और यह भी हो सकता है कि आपने कहीं पढ़ा हो और आप भी मानते हों कि आपके शरीर के लिए मांसाहार ठीक नहीं है…

इन सभी कारणों का अर्थ यह है कि आपने सोच-समझकर यह निर्णय लिया है कि भविष्य में भोजन में आप मांस ग्रहण नहीं करेंगे। तो फिर आप यह क्यों ज़ाहिर कर रहे हैं कि जैसे आप उसे मिस कर रहे हैं और उसकी जगह कोई समतुल्य या समरूप खाद्य सामग्री ग्रहण करना चाहते हैं?

यही कारण है कि मैं इन सब स्थानापन्न उत्पादों को, जो मोहक आवरणों में, मांस की शक्ल में पेश किए जाते हैं, पसंद नहीं करता-जैसे टोफू-सॉसेजेज़ (tofu-sausages), सीटन-बेकन (seitan-bacon) और वेजिटेरियन चिकन या वीगन टर्की (vegan turkey) आदि! क्या आप मन ही मन टर्की खाने की कल्पना करते हुए शाकाहारी भोजन करना चाहते हैं? नाश्ता मँगवाते समय जब भी आप ‘बिना बेकन के’ (‘without bacon’) कहते हैं तब क्या हर बार आप एक मृत पशु के आहार को मिस कर रहे होते हैं और शाकाहार अपनाने के अपने निर्णय पर बार-बार अफसोस कर रहे होते हैं?

मैं फिर कहूँगा: आपने सोच-समझकर निर्णय लिया है!

बात यह नहीं है कि आपमें मांस भक्षण के प्रति अरुचि है, जो आपको किसी पशु की हत्या करने और उसे पकाकर उसके नर्म गोश्त का लुकमा बनाने से रोकती है! अगर आपमें दूध के प्रति अरुचि होती और दही छोडकर उसके स्थानपन्न के रूप में सोया से तैयार दही से काम चलाना पड़ता तब मैं समझ सकता था कि क्यों आप कभी-कभी दूध से तैयार दही की तरफ देखकर सोचते हैं कि काश! मैं भी दूसरों की तरह यह दही खा सकता।

अगर आपमें शाकाहार के प्रति यह एहसास अब भी बना हुआ है तो फिर आप गलत रास्ते पर हैं। शाकाहारी भोजन करते हुए अगर आपमें कोई अपराधबोध या असंतोष है और आप कुछ और खाना चाहते हैं तो आप शाकाहार अपनाने के प्रयास में सफल नहीं होंगे!

आपको किसी स्थानापन्न की ज़रूरत नहीं है। सामान्य, प्रचलित शाकाहारी व्यंजन तैयार करें। टोफू (tofu) खाएँ, सीटन (seitan) खाएँ या जो मर्ज़ी हो, खाएँ-मगर उसे पशु-चित्रों के आवरण में, पशु-आहार के स्थानापन्न के रूप में नहीं बल्कि सामान्य आवरण में टोफू (tofu) या सीटन (seitan) के रूप में खरीदें! संतुलित आहार लेने पर ध्यान दें और यह न सोचें कि मांस न खाने के कारण आपके आहार में किसी चीज़ का अभाव पैदा हो रहा है-यथोचित शाकाहार मांस भक्षण से कहीं अधिक स्वास्थ्यकर होता है!

शाकाहार अपनाने के अपने निर्णय पर आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें और उसका स्थानापन्न खोजने में समय बरबाद ना करें!

शामनिज्म (ओझागिरी) और योग के बीच संघर्ष – 8 जून 2014

मैंने आपको बताया था कि मेरे एक समलैंगिक पुरुष मित्र की अपने गुरु के साथ अनबन हो गई थी क्योंकि उसका गुरु उसकी यौन प्रवृत्तियों को स्वीकार नहीं करता था। यह उसका एकमात्र आतंरिक संघर्ष नहीं था- एक और कारण से उसके भीतर उथल-पुथल मची हुई थी, जिसे उसने मेरे अलावा मेरे और भी कई मित्रों के साथ साझा किया था: जिस तरह वह योग की तरफ आकृष्ट था उसी तरह वह शामनवाद की तरफ भी आकृष्ट था। लेकिन योगी शाकाहारी होते हैं जबकि शामन मांसाहारी होते हैं! यह एक रोचक द्वंद्व है, जिस पर 2006 में मैंने बहुत विचार किया था।

इस द्वंद्व में पड़े मेरे एक दोस्त ने मुझे सारी स्थिति से अवगत कराया क्योंकि मैं नहीं जानता था कि आखिर इस शामनवाद में क्या-क्या सन्निहित होता है। हाँ, इतना सुना था कि वे लोग मांस बहुत खाते हैं। मैंने यह अफवाह भी सुनी थी कि वे पशुओं की बलि चढ़ाते हैं-और मेरी नज़र में यह एक बहुत क्रूर और अमानवीय प्रथा है, विशेषकर उनके संदर्भ में जो अपने आपको आध्यात्मिक कहते हैं!

मेरे एक मित्र ने बताया कि यह सच है कि जो लोग शामनवाद में रुचि रखते हैं वे साधारणतया बल्कि अक्सर ही शाकाहारी नहीं होते, भले ही वे ईश्वर की पूजा-अर्चना के लिए अपने खरगोश या अपने गिनी पिग की हत्या न करते हों। इस तरह वे उस क्रूर हत्या से अवश्य दूर रहते हैं मगर मांसाहारी होने के कारण इन हत्याओं में परोक्ष रूप से थोड़े से शामिल तो होते ही हैं!

मेरे दोस्त ने कहा कि ठीक यही उसकी समस्या थी! वह इस विचार के प्रति आकृष्ट था, जिसमें बहुत से कर्मकांड होते हैं, हर जीव में, हर चीज़ में, यहाँ तक कि पत्थरों में, पेड़-पौधों में और आंधी-तूफान में भी आत्मा होने का दर्शन होता है। लेकिन इसके बावजूद वह न सिर्फ योगिक दर्शन का अनुसरण करता था बल्कि योगिक खान-पान में भी विश्वास रखता था! वह पक्का शाकाहारी था और हाल ही में उसने पूरी तरह शाक-सब्जियों पर गुज़ारा करना शुरू कर दिया था- और यह शाकाहार का फैशन शुरू होने से बहुत पहले की बात है!

एक तरफ तो आप कहें कि हर जीव में आत्मा होती है और फिर उन जीवों का मांस खाएं? मृत पशुओं का? उसने मुझसे उस उत्तर का ज़िक्र किया जो उसका हर शामनवादी मित्र दिया करता था: खाने से पहले हम उस पशु का धन्यवाद करते हैं कि उसने हमारा भोजन बनने के लिए अपने जीवन की कुर्बानी दी।

जी नहीं! सिर्फ इतने से ही उसका मांस खाना उचित नहीं हो गया। वह नहीं समझता कि सिर्फ ‘धन्यवाद’ कह देने भर से उस पशु की तकलीफ कम हो जाती है और न ही उसकी कुर्बानी की कीमत अदा होती है।

मैंने उसके द्वंद्व को समझा और उससे कहा कि उसे शाकाहारी ही बने रहना चाहिए और अपने शाकाहार के व्रत पर ही चलना चाहिए। ऐसे रास्तों पर जाना ही क्यों, जो आपको ठीक नहीं लगते? यह ठीक है कि आप अपने लिए कुछ कर्मकांड तय कर लें और अपने जीवन में उनका पालन करें। आप हवाओं और बारिश, सूरज और चाँद के साथ बात करना चाहते हैं तो अवश्य कीजिए। अपने तरीके से कीजिए, अपने शब्दों में कीजिए।

अपना स्वत्व न छोड़ें मतलब आप जो हैं, वही बने रहें। अपनी संवेदनाओं को स्वीकार करें, उनका आदर करें और वही सुनें जो आपका शरीर और मन-मस्तिष्क कहता है। तब किसी तरह का द्वंद्व नहीं रह जाएगा!

स्वामी बालेन्दु का उपयोग करने के लिए यूजर गाइड, दूसरा अध्याय- 27 अक्तूबर 2013

पिछले सप्ताह मैंने बताया था कि कैसे एक मित्र ने मज़ाक में कहा कि मुझे एक यूजर गाइड लिखकर रखना चाहिए ताकि लोग जान सकें कि मेरे साथ कैसे पेश आया जाए। मेरी और सामान्य पश्चिमी व्यक्ति की जीवन-चर्या के बीच अंतर को लेकर हम बहुत देर तक हंसी-मज़ाक करते रहे लेकिन जब मैंने उन बातों पर गंभीरता पूर्वक सोचा तो मुझे लगा कि निश्चय ही मेरे अंदर ऐसी कुछ बातें मौजूद हैं, जिन्हें मुझसे मिले बगैर और उन बातों पर मेरे रवैयों, विचारों और मेरी जीवन पद्धति के बारे में जाने बगैर लोग भ्रम की स्थिति में रहते होंगे।

भले ही मैंने जीवन का बड़ा हिस्सा पश्चिम में रहकर गुज़ारा है मगर पश्चिमी रहन-सहन के प्रभाव में मेरे मन में कभी सामिष होने का खयाल नहीं आया और बहुत सोच-समझकर आज भी मैं निरामिष (शाकाहारी) ही बना हुआ हूँ। शुरू से मेरा विचार रहा है और आज भी है कि शाकाहार आपके शरीर के लिए अच्छा है और आज भी मेरी धारणा है कि मनुष्य के लिए नैसर्गिक रूप से यही सबसे उचित आहार है। अगर हम इन नकारात्मक बातों को फिलहाल नज़रअंदाज़ भी कर दें कि मीट के लिए पाले जाने वाले पशुओं को बहुत बुरी हालत में रखा जाता है, पशु-हत्या का पर्यावरण पर बहुत विपरीत प्रभाव पड़ता है और पशुओं को दिये जाने वाले अन्न का उपयोग भूखे मनुष्यों को भोजन कराने में किया जा सकता है, तो भी ज़िंदा रहने के लिए हमें पशुओं की हत्या करने की आवश्यकता नहीं है और भोजन (मीट) के लिए हर तरह के पशुओं की हत्या करना मैं एक क्रूर कर्म मानता हूँ।

मैं एक शाकाहारी कस्बे में पला-बढ़ा व्यक्ति हूँ और बाद में भी अपने काम के सिलसिले में ज़्यादातर शाकाहारी लोगों के सानिध्य में ही रहा। ऐसी परिस्थिति में युवावस्था में मांस खाने वालों को लेकर मेरी राय अच्छी नहीं थी। मैं उन्हें क्रूर समझता था और सोचता था कि कोई भी भला आदमी मांस भक्षण नहीं कर सकता। लेकिन मेरा यह विचार पश्चिम के संपर्क में आने के बाद परिवर्तित होता गया।

थोड़े समय में ही मुझे एहसास हुआ कि मतभेद सिर्फ दोनों की संस्कृति में अंतर और बचपन के माहौल के चलते है और यह कि मांस खाने वाले बहुत से लोग बहुत भले भी होते हैं! किसी की धारणाएँ पूरी तरह कभी भी नहीं बदल पातीं: मैं आज भी मांस खाने वालों के साथ एक ही टेबल पर बैठकर भोजन नहीं कर सकता। जब मेरे सामने कोई मांस खा रहा होता है तो मैं शारीरिक रूप से अस्वस्थ महसूस करता हूँ। मैं सामान्य रूप से भोजन नहीं कर पाता-मेरी भूख ही मर जाती है, जब मेरे सामने किसी मरे हुए जानवर का मांस रखा होता है! उसकी गंध भी मुझे सख्त नापसंद है, वह मुझे अस्वस्थ कर देती है! मेरे साथ ऐसा हो चुका है कि शांति पूर्वक खाना खाने की नीयत से या तो मैं किसी दूसरे टेबल पर भोजन करने चला गया या मांस खाने वाले का भोजन हो जाने के उपरांत मैंने भोजन किया। अधिकतर होता यह है कि सामने वाला मेरी इस कमजोरी का खयाल रखते हुए और साथ भोजन कर सकें इसलिए शाकाहारी खाना खाने के लिए राज़ी हो जाता है-वैसे भी मैं खुद बहुत अच्छा और पौष्टिक भारतीय शाकाहारी खाना बना लेता हूँ और वे अपना मांसाहारी खाना भूल जाते हैं!

जब कोई मुझे भोजन के लिए निमंत्रित करता है या मैं किसी नई जगह में होता हूँ, जहां लोग मुझे अच्छी तरह नहीं जानते, तो मैं उन्हें अपनी खाने की आदतों के बारे में साफ-साफ बता देता हूँ। यह सुनकर कई लोग समझते हैं कि जब वे शराब पी रहे होंगे, मैं उनके साथ बैठ नहीं पाऊँगा। लेकिन वह एकदम अलग बात होती है! स्वाभाविक ही मैं नशे में चूर किसी मदहोश शराबी को देखना पसंद नहीं करूंगा-और मैंने आज तक किसी परिचित को शराब के नशे में मतवाला होते हुए नहीं देखा है। साथ बैठे मित्रों में से कोई खाने के पहले या बाद में एकाध गिलास वाइन या बीयर पी लेता है तो मुझे कोई दिक्कत नहीं होती। मैंने जीवन में कभी मद्यपान नहीं किया है और मेरा ऐसा करने का कोई इरादा भी नहीं है मगर मुझे मालूम है कि एकाध गिलास शराब पीने से विशेष नशा नहीं होता और इतनी शराब से उसके नशेड़ी होने का भी कोई इमकान नहीं होता! इतनी सी बात से मैं आपको शराबी नहीं समझता और जब कि मैं आपके साथ शराब नहीं पी सकता और न ही अपने घर में आपको शराब पेश कर पाऊँगा, लेकिन अगर आप शेम्पेन की बोतल खोलने का इरादा रखते हैं तब भी मैं आपके घर में आपके साथ शाम की मस्ती में शामिल होना पसंद करूंगा।

इस विषय का समापन करने के लिए एक और पहलू पर बात करना ज़रूरी है: और वह है धूम्रपान! यह कि उस कमरे में मैं बैठ ही नहीं सकता, जहां सिगरेट का धुआँ भरा हुआ हो और जहां से बाहर निकलने पर उस भयंकर दुर्गंध से आपके कपड़े तक गँधाते रहें। मैं चाहूँगा कि उस व्यक्ति के बगल में खड़ा न रहूँ जो सिगरेट पी रहा है क्योंकि जब वह अपनी सिगरेट का धुआँ उड़ाएगा, तो मेरे नथुनों में खुजली शुरू हो जाएगी। लेकिन नहीं, भले ही सिगरेट पीना आपके लिए हानिकारक है और आपको नहीं पीना चाहिए, मैं नहीं समझता कि सिर्फ सिगरेट पीने के कारण आप बुरे व्यक्ति हैं। आप उसके आदी हो चुके हैं, बस इतना ही।

तो ये मुख्य बातें हैं-लेकिन इसके अलावा मैं पहले भी एक मिलनसार व्यक्ति था और अब भी हूँ!