अपने शरीर से प्रेम का अर्थ यह नहीं है कि खा-खाकर मोटे हो जाएँ और यह भी नहीं कि भूखे मर जाएँ! 20 अगस्त 2015

दुनिया में, जहाँ आप क्या महसूस करते हैं के स्थान पर जो आपको क्या दिखाई दे रहा है, वही सब कुछ है, आपका रूपरंग, आपका शरीर, आपका बनाव-शृंगार अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। इसलिए आजकल शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखने के प्रति लोग पागल हो गए हैं और बाज़ार में बहुत बड़ा फ़िटनेस-बूम आया हुआ है। बहुत से लोग अजीबोगरीब खानपान अपना रहे हैं और कड़ा व्यायाम करते हैं, जिससे उनका शरीर सुंदर और चुस्त दिखाई दे। लेकिन आध्यात्मिक रंगमंच पर लोग अपने शिष्यों को इसका विपरीत उपदेश दे रहे हैं: खुद से और अपने शरीर से प्यार करें। आज मैं इन दो विपरीत विचारसरणियों पर पर संक्षेप में लिखना चाहता हूँ, यह बताते हुए कि मैं क्या उचित समझता हूँ।

हम अपनी चर्चा इस बिंदु से शुरू करेंगे कि दरअसल आप अपने शरीर की वर्त्तमान हालत से प्रसन्न नहीं हैं मुख्यतः इसलिए कि वह सुंदरता के आज के उन मानदंडों पर खरा नहीं उतरता जिन्हें जन मीडिया द्वारा लगातार प्रचारित किया जा रहा है। आप इस स्थिति को बदलना चाहते हैं और आपके पास इसके दो संभव तरीके हैं:

पहला यह कि आप अपने शरीर का रंगरूप वैसा बनाने की कोशिश करें जैसा आप दूसरों का देखते हैं और प्रशंसा से भर उठते हैं। उसके लिए आपको अपना खानपान बदलना होगा और शारीरिक व्यायामों पर ज़ोर-शोर के साथ जुट जाना होगा।

अगर आप यह रास्ता चुनते हैं तो मैं आपको स्वस्थ रहने पर फोकस करने की सलाह दूँगा, जैसा कि मैं पहले भी कई बार दे चुका हूँ। इसका अर्थ यह है कि आप अपने खानपान में कमी बिल्कुल न करें कि आपके शरीर को नुकसान पहुँचे! इसी तरह न तो कोई दवा खाएँ न ही कथित रूप से वज़न घटाने वाले तरह-तरह के पेय इत्यादि लें। उनमें अक्सर कोई न कोई रसायन होता है, जिनके इतने बुरे दुष्परिणाम (साइड इफेक्ट्स) होते हैं कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते। व्यायमों की बात करें तो कृपा करके किसी विशेषज्ञ की सलाह लें कि आपके शरीर के लिए कौन से व्यायाम उचित हैं और उन्हें किस तरह करना है, जिससे आपके शरीर को कोई नुकसान न पहुँचे।

और मैं आपको दो बिंदुओं पर आगाह करना चाहता हूँ: पहली बात तो यह कि सार्वजनिक पोस्टरों में प्रदर्शित बिकनी-बालाओं जैसी शरीर-यष्टि (फिगर) प्राप्त करना आपके लिए असंभव होगा क्योंकि उन आकर्षक पोस्टर-छवियों में फोटोशॉप बहुत बड़ी भूमिका अदा करते हैं! दूसरे, इस तरह आपको आत्मसंतुष्टि और ख़ुशी मिल जाएगी, इसकी संभावना बहुत क्षीण है। अपना शरीर आईने में देख-देखकर आपको वास्तविक ख़ुशी कभी नहीं मिल पाएगी और आप बार-बार अपने आहार और व्यायाम-क्रियाओं में बदलाव करती रहेंगी कि आप टीवी में दिखाई जाने वाली कमनीय महिलाओं जैसी लगने लगें लेकिन यह आपके लिए असंभव होगा क्योंकि आपकी शरीर रचना ही भिन्न होगी या इसलिए कि वह आदर्श देहयष्टि पाना यथार्थ से कोसों दूर है!

अब हम दूसरी संभावना पर विचार करें: जैसा भी आपका शरीर है, उसे स्वीकार करने का और उससे प्रेम करने का प्रयास करें। आप सोचेंगे कि शायद मैं इस विकल्प का समर्थन करूँगा, लेकिन नहीं। कम से कम पूर्ण समर्थन नहीं!

हाँ, आपको अपने शरीर से प्रेम करना चाहिए यानी जैसा आपका शरीर है, उसे उसी तरह स्वीकार करना चाहिए। लेकिन साथ ही उसे स्वस्थ भी रखना चाहिए! अगर आपका वज़न ज़्यादा है, आप मोटे हो रहे हैं और आप उसे स्वीकार करते चले जा रहे हैं तो आप इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए हिलना-डुलना भी छोड़ देंगे और अपनी ज़बान के गुलाम बनकर आवश्यकता से अधिक खाना-पीना शुरू कर देंगे! आप बहुत सी अज्ञात बीमारियों को भी स्वीकार करना शुरू कर देंगे जबकि आपका वज़न आसमान छू रहा होगा। आप घुटनों के दर्द को और पीठ के दर्द को भी स्वीकार कर लेंगे क्योंकि आपने अपने मोटापे को स्वीकार कर लिया है। तब आप चीजों को, चाहे वे जैसी भी हों स्वीकार करते चले जाएँगे और इस तरह उनके साथ होने वाले परिवर्तनों की ओर से आँखें मूँद लेंगे।

तो नहीं, मैं इस विचारसरणी का भी समर्थन नहीं करता। मुझे लगता है कि हमें सिर्फ स्वस्थ बने रहने और भीतर से सुकून और संतुष्ट महसूस करने पर ध्यान देना चाहिए। आखिर आप यह तो नहीं कह सकते कि दस मिनट चलते हुए, जब आपका घुटना दुखने लगता है तब आप खुश होते हैं, आपको सुकून मिलता है। मुझे इस बात पर सहमत करने की कोशिश भी न करें कि दिन भर सेब खाते रहने के बाद आपको अब भी सेब खाने की तीव्र इच्छा हो रही है।

इन आम खूबसूरत बालाओं का आदर्श बनावटी, विकृत और झूठा है क्योंकि हम सब अलग हैं और एक-दूसरे के फ्रेम में फिट नहीं हो सकते। अगर आप एक या दो इंच बड़ी कमर वाले पैंट में अच्छा महसूस कर रहे हैं तो एक निश्चित वज़न पाने के लिए अपने आप को भूखा रखने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन जहाँ आप अपने शरीर से प्रेम करें और वर्तमान शरीर को स्वीकार करें वहीं कृपा करके उसे स्वस्थ रखने का प्रयास करें। अच्छा, स्वास्थ्यकर भोजन करें, बेकार का चटपटेदार खाना (जंक फूड) न खाएँ। चुस्त-दुरुस्त रहें, सक्रियता का आनंद लें!

इसे संतुलित रखिए, अपने लिए!

क्या आप अपने शरीर से नाखुश हैं, मनपसंद खाना खाने के बाद क्या आप पछताते या ग्लानि महसूस करते हैं? 23 फरवरी 2015

आज मैं एक ऐसे विषय पर लिखना चाहता हूँ, जो सबके, यानी पुरुषों और महिलाओं, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है: आपको अपने शरीर में अच्छा महसूस करना चाहिए। वह स्वस्थ होना चाहिए और उसकी देखभाल करना आपके लिए ज़रूरी है। लेकिन साथ ही आपको सुंदरता संबंधी किसी स्थापित आदर्श के पीछे भागने की ज़रूरत नहीं है और न ही ‘आदर्श वज़न’ की जानकारी देने वाले आंकड़ों को पाने की कोशिश करनी चाहिए। आपको ‘दुखी या नाखुश’ करने के प्रयास में उन्हें सफल मत होने दीजिए!

सबसे पहले तो मैं यह कहना चाहता हूँ कि वास्तव में मैं स्वस्थ भोजन और स्वस्थ वज़न का पक्षधर हूँ। जब मैं कहता हूँ कि आपको अपने शरीर से प्रेम करना चाहिए तो इसका अर्थ यह नहीं है कि आप अपने अतिरिक्त वज़न की अनदेखी करें, जो आपके शरीर में पीठ, कूल्हों और घुटनों की समस्याएँ और मधुमेह जैसी खतरनाक बीमारियाँ स्वास्थ्य संबंधी तकलीफ़ें पैदा कर रहा है। जब मैं कहता हूँ कि आप अपने शरीर में अच्छा महसूस करें तब आपको अस्वास्थ्यकर अतिरिक्त वज़न लेकर चलने के लिए प्रेरित नहीं कर रहा होता। वास्तव में वह तो बड़ा खतरनाक सिद्ध हो सकता है।

लेकिन मोटापे और दुबलेपन के बीच बहुत बड़ा विस्तार है। और यही वह बात है, जिसे अक्सर बहुसंख्य लोग स्वीकार नहीं करते। सुंदरियाँ, जिनका प्रचार अधिकांश मिडिया कर रहा होता है, हमेशा एक ही चीज़ दिखाते हैं: एक जैसी शरीर-यष्टि, एक जैसा वज़न, एक विशेष तरीका, जैसा आपको होना चाहिए। यह बेहद अस्वाभाविक या अप्राकृतिक है बल्कि यह असंभव है कि धरती पर रहने वाले सभी लोग उसे प्राप्त कर सकें और उनके जैसे दिखाई दें।

और इन आदर्शों की नकल करके इतने कम अंतराल में आप अपने शरीर को किस तरह बदल पाएँगे? दस साल से शरीर में मौजूद मांसल गोलाइयों को मिटाकर अगले दशक में आप शरीर को छरहरा किस तरह बना लेंगे? आपको एक ही शरीर प्राप्त हुआ है और आप उसमें में दोनों चीजें एक साथ नहीं पा सकते!

इसलिए मैं कहता हूँ कि अच्छा महसूस करना अत्यंत आवश्यक है! उस आदर्श वज़न सीमा से आपका वज़न ज़्यादा हो या कम, जब तक आप स्वस्थ हैं, आपको अच्छा महसूस करते रहना चाहिए! और इसमें भोजन, खाना-पीना और व्यायाम, सभी सम्मिलित हैं!

वास्तव में मैं तो अच्छे खाने का बहुत शौकीन हूँ और अपना दैनिक योगाभ्यास और व्यायाम भी मुझे बहुत प्रिय है। लेकिन मैंने बहुत सी औरतों से सुना है कि भोजन करते वक़्त वे अपनी एक-एक कैलोरी गिनती हैं और हर त्योहारी खाने के बाद या यूँ ही अपना मनपसंद खाना खाने के बाद अपराधी सा महसूस करती हैं-जब कि वास्तव में अपना मनपसंद खाना खुशी-खुशी ग्रहण करना चाहिए! नतीजा यह होता है कि भोजन करने का समय उनके लिए बड़ा त्रासदायक समय होता है और वह कई तरह के विकारों का कारण भी बन सकता है!

पुरुष भी इन समस्याओं से घिरे पाए जाते हैं, अंतर सिर्फ इतना होता है कि सुडौल मांसपेशियाँ बनाने के चक्कर में और भोजन के साथ ली गई अतिरिक्त कैलोरियों को पसीने के साथ बहाने के लिए उन्हें खेलकूद और व्यायाम की धुन लग जाती है। अच्छे, पसीना बहाने वाले, श्रमसाध्य व्यायामों से कोई गिला नहीं, लेकिन अगर आपको रोज़ जिम जाना पड़ता हो और हर त्योहारी खाने के बाद कैलोरी जलाने के लिए घंटों दंड-बैठक लगाना (वर्क-आउट करना) पड़ता हो, तो फिर यह एक असहज बाध्यता बन जाती है। यह व्यवहार अपने शरीर के प्रति प्रेम प्रकट नहीं करता।

खाने को लेकर कोई अपराधबोध या ग्लानि महसूस न करें, उसका आनंद लें। व्यायाम भी मज़ा लेते हुए करें, मजबूरी में नहीं। और अगर किसी दिन नहीं कर पाते या किसी दिन कम व्यायाम कर पाते हैं तो अफसोस न करें। किसी भी आदर्श के लिए बाहरी दबाव महसूस न करें- और अपने शरीर से प्रेम करें। जीवन का आनंद लें-अगर आप उसके विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर देंगे तो यह संभव नहीं हो सकता!

खूबसूरती अलग-अलग रूपों में सामने आती है! खूबसूरती के गलत मानदंडों से हानि- 28 अगस्त 2013

कल मैंने समझाया था कि कैसे कुछ लोग, खासकर औरतें, अपने आप की तुलना दूसरों से करते हैं, अपनी संदेहास्पद विजय के लिए अपने स्वाभिमान को ताक पर रख देते हैं और जब तुलना में वे हार जाते हैं तो उन्हें बुरा लगता है। यह तो होता ही है कि अकेले में इस विषय में सोचकर आपको दुख होता है, लेकिन आप यह भी समझें कि खूबसूरती के जिस आदर्श के पीछे आप भाग रहे हैं वह आपके लिए और भी बहुत सी समस्याएँ लेकर आता है।

मुझे लगता है कि इस बारे में चर्चा करके वक़्त बरबाद करने की कोई ज़रूरत नहीं है कि खूबसूरती के जिन आदर्शों से अधिकांश महिलाएं अपने शरीर की तुलना करती हैं वह वास्तविकता पर आधारित है या नहीं। मीडिया जिस छवि को दर्शा रहा है उन्हें कम्प्युटर द्वारा सुधारा गया है, जिन्हें दिखाया जा रहा है उन्होंने उस वक़्त काफी मेकअप किया हुआ होता है, प्रकाश-व्यवस्था उनके पक्ष में होती है, परन्तु वे वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में अभिनय नहीं कर रही होतीं और सबसे बढ़कर, वैसा दिखाई देना उनका व्यवसाय होता है। इस तरह, जो छवि आप आम तौर पर पोस्टर्स पर, पत्र-पत्रिकाओं में, टीवी पर देखती हैं वह आपके दिमाग में ज़बरदस्ती प्रवेश कर जाता है और आप भूल जाती हैं कि यह आपको इसलिए दिखाया गया है कि आप उस विज्ञापित वस्तु को खरीदें। और आप इसे सुन्दरता का मानदंड मान लेते हैं कि आपको और सभी महिलाओं को खूबसूरत कहलाने के लिए उसके जैसा दिखाई देना चाहिए!

मुख्यधारा का मीडिया इस बात की परवाह नहीं करता कि कई तरह के शरीर वाले लोग होते है! आखिर जिन्हें आप देखते हैं, पुरुष और महिलाएं, वे बहुत थोड़े से चुनिन्दा लोग होते हैं, कड़े मानकीकरण और कसौटियों से, जिन पर अधिकांश लोग पूरा नहीं उतर सकते, गुज़रकर आए हुए लोग।

इसका नतीजा स्पष्ट है: सभी लोग सोचते हैं कि यह साधारण और सामान्य-सी बात है और उनकी तरह दिखना चाहते हैं। अगर वे इसमें असफल होते हैं तो वे सोचते हैं कि वे उतने खूबसूरत नहीं हैं-जब कि यह वास्तव में बिल्कुल असंभव है! और यह सत्य बहुत सी महिलाओं को निराश कर देता है, जो बड़ी ईमानदारी से अपना वज़न कम करने की कोशिश कर रही थीं, या टीवी में दिखाई जा रही महिला की तरह की देहयष्टि बनाने की कोशिश कर रही थी! वे इसमें सफल नहीं हो सकतीं और इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे, हो सकता है कि उनकी शारीरिक बनावट ही बिल्कुल अलग हो!

यह देखते हुए, कई इस प्रयास से ही अपने आपको मुक्त कर लेती हैं। वे देखती हैं कि ‘खूबसूरत’ माने जाने का एकमात्र तारीका यही है कि उनके जैसा दिखाई दिया जाए-लेकिन वे कभी भी उसमें सफल नहीं हो पाएँगी, इसलिए कोशिश करने से क्या लाभ? उनमें कसरत करने का उत्साह नहीं रह जाता, घूमने-फिरने और अपने शरीर के लिए कुछ करने की इच्छा ही नहीं रह जाती। सिर्फ एक ही कारण वे देखती हैं और वह है प्रतिस्पर्धा या एक लक्ष्य, जिसे पाना है, मगर जब यह संभव ही नहीं है तो कोशिश ही क्यों करें? वे जानती हैं कि वे कभी भी जीत नहीं पाएँगी।

समाज जिस तरह से चल रहा है और खूबसूरती के अस्वाभाविक, और अवास्तविक मानदंडों को बढ़ावा दे रहा है, उसे बदलने के अलावा इस समस्या का एक समाधान यह है कि कसरत, स्वास्थ्यप्रद खान-पान और अपने शरीर के प्रति अपने नज़रिये को बदला जाए। आपको समझना चाहिए कि आप स्वास्थ्यवर्धक भोजन इसलिए नहीं करते कि आपका वज़न कम हो और आप किसी और की तरह दिखें। आप सबेरे सैर करने इसलिए नहीं जातीं या दौड़ इसलिए नहीं लगातीं या तैरने इसलिए नहीं जातीं कि आपका शरीर किसी दूसरे जैसा हो जाए। आपको यह सब किसी दूसरे के लिए नहीं बल्कि अपने लिए करना चाहिए!

यह सब अपने लिए कीजिए! अच्छा, स्वास्थ्यवर्धक भोजन कीजिए क्योंकि आप अच्छा महसूस करें! व्यायाम कीजिए क्योंकि आपका मन प्रसन्न रहे और आपका शरीर पुनः तरोताजा हो जाए, आप स्फूर्ति महसूस करें! वज़न सीमा में रहेगा तो आपको लाभ होगा किसी और को नहीं! स्वस्थ रहने के लिए यह सब कीजिए क्योंकि आप अपने शरीर से प्रेम करती हैं, क्योंकि आप खुद से प्रेम करती हैं!

अगर पर्याप्त लोग इस तरह व्यवहार करें तो हो सकता है कि विज्ञापन कंपनियाँ, फिल्म इंडस्ट्री और समाज भी धीरे-धीरे यह समझ जाएंगे कि हर व्यक्ति के अंदर सुंदरता है, अलग-अलग अनंत आकारों और रूपों में!

दूसरों से तुलना करने पर न तो आपकी सुन्दरता बढ़ती है न ही घटती है- 27 अगस्त 2013

कल मैंने बताया था कि लोग लगातार हर बात में दूसरों से अपनी तुलना करके बहुत अवसादग्रस्त हो जाते हैं। जिस बात पर, खासकर महिलाएं, अपनी तुलना दूसरों से करती हैं, वह है सुंदरता। लेकिन मेरी नज़र में, इस तरह की तुलना ही महिलाओं में स्वाभिमान की कमी और अपने शरीर के बारे में कुंठा और अवहेलना का कारण है।

मुख्य समस्या फिर वही है: बाहरी बातों से अपनी तुलना करना। यह बिल्कुल असामान्य दृश्य नहीं है कि एक महिला किसी और के कमरे में प्रवेश करती हैं और पूरे कमरे का बारीक मुआयना करना शुरू कर देती हैं। यह पिश्टोक्ति होगी लेकिन अधिकांश महिलाएं यह बात मानेंगी-कम से कम दिल ही दिल में-कि वे दूसरी महिलाओं के शरीर और चेहरे को बड़ी उत्सुकता से देखती हैं और उनके वस्त्रों, उनकी देहयष्टि, उनकी तंदरुस्ती, केशसज्जा और यहाँ तक कि मेकअप आदि की तुलना खुद की इन्हीं चीजों से करती हैं। इस जांच के आधार पर उनका स्वाभिमान या तो बढ़ जाता है या कम हो जाता है। अगर सामने वाली महिला थोड़ी मोटी है या उसके चेहरे पर मुहासे हैं या बाल खराब हैं तो उसी अनुपात में वे खुद को ज़्यादा सुंदर अनुभव करने लगती हैं। इसके विपरीत अगर वह महिला उन्हें अपने आप से ज़्यादा सुंदर लगती हैं तो वे अपने वज़न या जिस बात को भी वे अपनी कमजोर नब्ज़ समझती हैं, उसके प्रति अचानक चैतन्य और सतर्क हो जाती हैं।

वैसे मैं यहाँ महिलाओं की बात कर रहा हूँ लेकिन यह सिर्फ महिलाओं की ही समस्या नहीं है! जब पुरुष यही बात करते हैं तो, हो सकता है, सुंदरता के विषय में न सोचें लेकिन कुल मिलाकर मतलब अलग नहीं होता! पुरुष, दूसरे पुरुषों (के पेट की, बाँहों की) की मांसपेशियाँ, उनकी दौलत और स्वाभाविक ही उनका बेफिक्र व्यवहार और विश्वस्त मुस्कुराहट देखते हैं और वैसा ही अनुभव करते हैं जैसा महिलाएं करती हैं!

लेकिन क्या सुंदरता तभी साबित होगी, जब आप तुलना में जीत जाएंगे? क्या आप वास्तव में तभी अपने आपको सुंदर समझ पाती हैं जब उस फिल्म-स्टार या सुपर-मोडेल स्त्री से, तुलना में, आपसे भी कम सुंदर महिला खड़ी हो? क्या आप वाकई यह सोचती हैं कि आप तभी सुंदर होंगी जब आप उस पोस्टर वाली या टीवी विज्ञापन वाली महिला जैसी दिखने लगेंगी?

मैं समझ सकता हूँ कि जब आप किसी तुलना में बेहतर सिद्ध होते हैं तो अच्छा लगता ही है (फील-गुड फैक्टर जैसी कोई चीज़ होती ही है), भले ही वह आपके मस्तिष्क में होता हो और आपकी विजय को देखने के लिए कोई दर्शक मौजूद नहीं है। लेकिन आपको समझना चाहिए कि वास्तव में आप वहाँ कर क्या रही हैं और इस बात पर पुनर्विचार करना चाहिए कि आपका खूबसूरती का मानदंड क्या है!

सच्चाई यह है कि सुंदरता का यह आदर्श, यह मानदंड किसी भी तरह से वास्तविक नहीं है क्योंकि हर मीडिया चैनल, हर मोडेल और अभिनेत्री के चेहरे को बेहतर दिखाने के लिए कंप्यूटर प्रोग्रामिंग करते हैं। और ऐसे अवास्तविक चित्र को आप अपना आदर्श मान लेती हैं, उसे अपने लिए एक लक्ष्य बना लेती हैं, जिसे पाने के लिए आप कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाती हैं और इसके अलावा, इसी मानदंड पर आप दूसरी औरतों को भी तौलने लगती हैं।

फिर प्रश्न वही है कि अपने आपको समझने (परिभाषित करने) और अपनी पहचान के लिए कि आप कौन हैं, आपको बाहर कितना देखना चाहिए? क्या आपको यह सोचना चाहिए कि "मैं हीथर से दुबली हूँ, मेरी त्वचा का रंग मेरी से बेहतर है, मेरे बाल लूसी से घने हैं?" क्या यह सोचना पर्याप्त नहीं होगा कि "मैं सुंदर हूँ?"

मैं यह कितनी बार कहूँ कि सुंदरता सिर्फ बाहर नहीं है और यह कि सुंदरता की समझ सबके पास अलग-अलग होती है! जब आप कमरे में अकेली होती हैं और तुलना करने के लिए कोई आदर्श या कोई प्रतिस्पर्धी आपके सामने नहीं होता, तब भी आपको खुद को सुंदर ही समझना (महसूस करना) चाहिए! और सुपरस्टार्स की भीड़ के बीच भी आपको अपनी सुंदरता का एहसास होना चाहिए। आप अनूठे हैं, आप जैसा कोई नहीं है और आप सुंदर हैं।

आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) में स्वीकृति और अस्वीकृति का अनैतिक खेल-8 मार्च, 2013

मैं आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) के बारे में हाल में बहुत कुछ लिखता रहा हूँ। इन बातों को बार-बार रेखांकित करते हुए कि ऐसे विवाह बहुत सी समस्याओं का कारण होते हैं, दहेज प्रथा के बारे में, टूटते सपनों और दिलों के बारे में, पति-पत्नी के बीच लड़ाई-झगड़ों के बारे में और परिवारों के बीच इसी कारण से पैदा होती कटुता और वैमनस्य के बारे में। यह सब पढ़ने के बाद आपके मन में यह खयाल तो अवश्य आता होगा कि क्या बात है कि इतनी बुराइयों के बाद भी आज अधिकांश विवाह आयोजित (अरेंज) ही किए जाते हैं। क्यों लोग आज भी अपने बच्चों के विवाह एक अनजाने व्यक्ति से करना इतना महत्वपूर्ण समझते हैं? उत्तर है, सिर्फ इसलिए कि समाज ही इस तरह चल रहा है, इसी को सुविधाजनक मानता है।

मैं इस बात को एक उदाहरण की सहायता से समझाने की कोशिश करता हूँ। माना कि एक भारतीय परिवार है जिसका 30 साल का लड़का अभी भी अविवाहित है। वह भारतीय तरीके से विवाह नहीं करना चाहता और अपने अभिभावकों से कहता है कि उसकी महिलाओं में कोई रुचि नहीं है और वह कभी विवाह नहीं करेगा। उसके अभिभावक जानते हैं कि वह बिना किसी मकसद के यह बात यूं ही कह रहा है और दूसरे लड़कों की तरह उसके भीतर भी विवाह की अभिलाषा होगी। ऐसा सोचकर वे लड़की खोजने के काम में लग जाते हैं और जब वे एक लड़की तय कर लेते हैं तो उसे कहना पड़ता है, ‘ओके, जब इतना ज़ोर डाल रहे हैं तो…’

लेकिन स्वाभाविक ही उन्होंने लड़की अपनी जाति और उपजाति में ही ढूँढी होगी और यह बात उनके चुनाव के लिए लड़कियों की संख्या सीमित कर देती है। दरअसल यह बहुत मुश्किल होता है कि इतनी सीमित संख्या में से किसी लड़की को पूरे मन से पसंद किया जा सके। कोई लड़की बहुत काली होती है, दूसरी मोटी, तीसरी उनके लड़के से कुछ ऊंची हो सकती है और कोई और थोड़ा तुतलाती है। कुछ लड़कियों के अभिभावक भी उस लड़के को अपनी लड़की के लायक नहीं समझते होंगे, उनकी अपेक्षा से कम वेतन के कारण या सिर्फ इसलिए कि वह दिखने में उतना स्मार्ट नहीं है या कुछ मोटा है या कि वह थोड़ा लंगड़ाकर चलता है।

फिर भी आम तौर पर अस्वीकृति अधिकतर लड़कियों के खाते में ही आती है। दोनों परिवारों के बुजुर्ग आए हुए रिश्तों को अस्वीकार करते चले जाते हैं और कुछ दिन बाद ‘विवाह बाज़ार की मंदी’ को देखते हुए सोचते है कि बिल्कुल पूरी तरह योग्य वर या वधू मिलना मुश्किल है, और अपनी अपेक्षाओं को क्रमशः कम करते चले जाते हैं। चलिए, अब लड़की बहुत गोरी न भी हो तो चलेगा और लड़का अगर कुछ ज़्यादा ही ‘स्वस्थ’ (यानी मोटा) है तो भी चलेगा। लड़कियों के परिवार अपनी अपेक्षाओं को कम करने के मामले में भी कुछ अधिक ही नीचे आ जाते हैं। क्योंकि लड़की का विवाह होना अधिक महत्वपूर्ण है-विवाह न हुआ तो जीवन में उसका क्या बनेगा?

बात एकदम स्पष्ट है: अधिकांश औरतें आज भी कोई पैसा कमाने वाला काम नहीं करतीं। अगर करती भी हैं तो उन्हें पुरुषों से कम वेतन प्राप्त होता है। इसके अलावा उनके लिए उपयुक्त और पर्याप्त वेतन वाली कोई नौकरी ढूंढ पाना भी मुश्किल होता है। याद रखें, मैं मेट्रो शहरों की बात नहीं कर रहा हूँ, छोटे शहरों, कस्बों और गावों की बात कर रहा हूँ। लड़की के अभिभावक विवाह होने तक ही लड़की का भरण पोषण करने की ज़िम्मेदारी समझते हैं। अगर वह विवाह नहीं करती और इस बीच उसके माँ-बाप का देहांत हो जाता है तो वह किस तरह इतना बड़ा जीवन अकेले गुज़ार सकेगी? अपने भाई के परिवार पर बोझ बनेगी? अभिभावक स्वाभाविक ही ऐसा नहीं चाहते इसलिए वे बड़ी शिद्दत के साथ उसके पति की तलाश में लग जाते हैं-जिससे उसकी आगे भी देखभाल होती रहे, भले ही लड़का उनकी अपेक्षा के अनुरूप न भी मिल पाए।

पुरुषों के सामने फिर भी कुछ विकल्प होते हैं। अगर उसे उसकी या उसके परिवार की अपेक्षाओं के अनुरूप लड़की नहीं मिलती दिखाई देती तो वह किसी भी लड़की से विवाह करने के लिए मजबूर नहीं होता-वह विवाह नहीं भी करता तो उसके पास नौकरी होती है और वह उसके बल पर जीवन गुज़ार सकता है। उसको लेकर सिर्फ एक ही समस्या पेश आ सकती है:बिना बच्चों के वंश नहीं चल सकेगा! अब लड़के के लिए भी समय गुज़रता जा रहा है और विवाह में देर हो रही है इसलिए काफी समय गुज़र जाने के बाद और कई कोशिशों के बाद लड़के के अभिभावक उपलब्ध लड़कियों में से सबसे उपयुक्त लड़की का चुनाव कर लेते हैं:हो सकता है कि वे एक काली या साँवली लड़की चुन लें, थोड़ी मोटी भी चल सकती है, हो सकता है वह लड़के से कम पढ़ी-लिखी हो या उनकी आशानुरूप बहुत प्रतिष्ठित परिवार से न आती हो।

यह कोरी कल्पना की उड़ान नहीं है! मैं ऐसी माँओं से मिल चुका हूँ जिन्होंने कई उम्मीदवारों को जांचा परखा और हालांकि उन्हें कोई पसंद नहीं आया, उन्होंने सोचा कि यह लड़की बहुत सुंदर तो नहीं है; चलो, कुछ और लड़कियां देख लेते हैं, अगर कोई बेहतर रिश्ता नहीं मिल पाता तो इसे ही स्वीकार कर लेंगे। तो शुरू से ही आप उसे पसंद नहीं कर रहे हैं। अब ऐसी लड़की आप ले आएंगे तो बाद में आपके परिवार में उसकी क्या स्थिति होगी आप कल्पना कर सकते हैं! अगर उसमें एक छोटा सा भी अवगुण हुआ तो परिवार में हर कोई यही कहेगा कि देखा, मैं जानता था, हमें इसे नहीं चुनना था।

अगर स्पष्ट कहा जाए तो इसका अर्थ यह होता है कि सभी अपनी हताशा में इस बात की चिंता नहीं करते कि किसके साथ विवाह हो रहा है, इतना ही काफी है कि वह एक पुरुष हो जो एक महिला की देखभाल कर सके या एक महिला हो जो वंश चलाने के लिए बच्चे पैदा कर सके और उन्हें ठीक से पाल सके। आखिर इसके अलावा महिला का उपयोग ही क्या है? खाना बनाओ, सफाई करो और बच्चे पैदा करो। क्या यहाँ समाज अपना दर्शनीय चेहरा नहीं दिखा रहा है?

एक ऐसी महिला की परिवार में क्या औकात हो सकती है, जिसे बार-बार अस्वीकार किया गया हो और बेहतर विकल्प न मिल पाने के कारण जिसके साथ मजबूरी में विवाह किया गया हो और वह भी सिर्फ इसलिए कि वह आपके वंश को बढ़ाने के लिए बच्चे पैदा करे! कितनी शानदार और महान व्यवस्था है यह आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) की परंपरा! आप क्या सोचते हैं?