बच्चों के प्रति मौखिक हिंसा: एक-एक शब्द के साथ टूटती हुई बच्चों की दुनिया- 25 फरवरी 2014

कल मैंने बच्चों पर आजमाई जाने वाली दो तरह की शारीरिक हिंसा के बारे में लिखा था। आज मैं एक ऐसी हिंसा के बारे में लिखना चाहता हूँ, जो पहली नज़र में कुछ कम अमानवीय लग सकती है लेकिन इसका भी बच्चों पर उतना ही विध्वंसक असर होता है: शब्दों के माध्यम से की जाने वाली हिंसा।

अब तक अधिकांश पाठक समझ चुके होंगे कि मैं बच्चों से सलीके के साथ, मधुर स्वर में बात करने की हिदायत दे रहा हूँ, जिसके द्वारा बच्चे को आपके स्वर में निहित हिंसा का अनुभव भी हो जाता है। दरअसल मैं जो बात कह रहा हूँ वह बिल्कुल स्पष्ट है। आप सामान्य भारतीय परिवारों में इस तरह के हिंसक संवाद रोज़, हर घड़ी सुन सकते हैं: ‘मार लगेगी’, ‘पिटाई होगी’।

जिस तरह तमाचे मारना ज़्यादातर भारतीय अभिभावकों की आदत बन चुका है उसी तरह वे यह भी नोटिस नहीं कर पाते कि कितनी बार वे अपने बच्चों को हिंसक धमकियों के जरिये धमकाते रहते हैं। कुछ लोग धमकियों को रचनात्मक ऊंचाइयों तक पहुंचा देते हैं और इस बात को विस्तार से बताते हैं कि किस-किस तरीके से आप उन्हें पीटेंगे या ऐसी पिटाई करेंगे कि वह चलने-फिरने के काबिल नहीं रहेगा या वे उसकी हड्डी-पसली एक कर देंगे। जी हाँ, खुद अपने बच्चे की हड्डी-पसली एक कर देंगे।

और फिर आपको आश्चर्य होता है कि आपका बच्चा अपने से छोटे सहोदरों के प्रति इतना आक्रामक क्यों है! जानवरों के प्रति उसका व्यवहार इतना क्रूर क्यों है? वह सिर्फ मार-पीट, हत्याओं के खेल क्यों खेलता है? आप यह समझ ही नहीं पाते कि आपकी बातों से ही वह यह सब सीख रहा है।

जब आप बच्चों से ऐसी हिंसक बातें कहने वाले किसी व्यक्ति से पूछते हैं कि वे ऐसा क्यों करते हैं तो आपको अक्सर यह जवाब मिलता है: ‘मैं वास्तव में ऐसा नहीं करता!’ तो फिर कहते क्यों हैं? क्या आप नहीं समझते कि इस बात को जब आप पचासों बार कहेंगे तो आपका बच्चा समझ जाएगा कि आप दरअसल ऐसा करेंगे नहीं? कुछ माह पहले मैंने आपको एक घटना के बारे में बताया था, जिसमें आश्रम की एक महिला अपने बेटे को धमकाती है कि अगर वह ठीक से खाना नहीं खाएगा तो रमोना उसकी पिटाई करेगी। वह महिला ‘मैं तुम्हारी पिटाई करूंगी’ इतनी बार कह चुकी थी कि उसके दो साल के बच्चे पर इसका कोई असर नहीं होता था। अब उसे कहना पड़ रहा था कि कोई अनजान व्यक्ति उसकी पिटाई करेगा-जिस पर रमोना स्तब्ध रह गई थी और बाद में उस महिला को अच्छा-खासा भाषण पिलाना पड़ा था कि आश्रम में बच्चों से क्या-क्या कहना पूरी तरह वर्जित है।

जो कुछ भी आप कहते हैं, आपका बच्चा उसे ग्रहण करता रहता है, इस जानकारी को अपने मस्तिष्क में सुरक्षित करता जाता है और फिर दूसरों के साथ अपने व्यवहार में उन जानकारियों का उपयोग करता है। भले ही आप अपने बच्चे की पिटाई न करें, परन्तु पिटाई करने की धमकी देने का भी कोई कम बुरा असर नहीं होता। यह बातें आपके बच्चे के मन-मस्तिष्क में धीरे-धीरे हिंसा का संचार कर रही होती हैं और उसे ऐसा व्यवहार करने के लिए प्रेरित करती हैं, जिन्हें आप कभी भी प्रोत्साहित करना नहीं चाहेंगे!

आप अपने बच्चे के लिए सबसे प्रमुख उदाहरण हैं, उसके जीवन में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति। इसलिए अपने बच्चों को, चाहे वह लड़का हो या लड़की, यह सिखाएँ कि अपने दैनिक व्यवहार में हिंसक और धमकाने के अंदाज़ में काम करने की तुलना में प्रेम और सद्भावना के साथ काम करना अधिक आनंददायक और लाभकारी होता है। अपने बच्चों को लड़ाई-झगड़ों और मार-पीट के खेलों के प्रति निरुत्साहित करें और उनकी जगह खेलों, नृत्य और संगीत आदि की तरफ उनका ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश करें।

आप देखेंगे कि कैसे आपके व्यवहार में परिवर्तन के साथ उनका व्यवहार भी परिवर्तित होता जाएगा।

घिसी पिटी औपचारिकताओं से छुटकारा – 1 अगस्त 2013

अपनी जन्मभूमि, भारत और अपनाए हुए देश, जर्मनी के निवासियों में पाई जाने वाली आदतों के बारे में लिखते हुए मैं हमेशा सोचता रहा हूँ कि क्या मैं इन घिसी पिटी आदतों में कहीं फिट होता हूँ या नहीं। मैं नहीं चाहता कि अपने बारे में आपके दिल में कोई गलतफहमी रहे और इसलिए इस बारे में अपने विचार लिखने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ।

मैं हमेशा से बहुत अनौपचारिक व्यक्ति रहा हूँ और आज भी हूँ लेकिन फिर भी कुछ सांस्कृतिक परम्पराएँ ऐसी होती हैं जो आपके रक्त में रच-बस जाती हैं। इसलिए मेरे अंदर भी कुछ ऐसी आदतें थीं जैसे पहले मैं किसी बात पर 'नहीं नहीं' कहता था और बाद में जब सामने वाला बहुत ज़िद करता था तो उसे स्वीकार कर लेता था। यह नम्र और सभ्य दिखाई देने का एक तरीका है। लेकिन मेरे साथ एक ऐसी घटना हुई जिसने मेरी इस आदत का सदा-सदा के लिए अंत कर दिया। मैं अपनी पहली जर्मन यात्रा के दौरान एक बार अपने सबसे पहले जर्मन मित्र डाक्टर माइकल कोसक के यहाँ गया। वह जानता था कि मैं जर्मनी में नया हूँ इसलिए यह कहते हुए कि "रख लो, तुम्हें कभी भी अचानक ज़रूरत पड़ सकती है" वह मुझे कुछ पैसे देने लगा। अब, वह मुझे पैसे दे रहा है और मैं अपनी भारतीय आदत के मुताबिक 'नहीं, नहीं' कहते हुए मना कर रहा हूँ। यह अच्छा हुआ कि वह मेरे और करीब आया और मेरी हथेली हाथ में लेकर यह कहते हुए पैसे रख ही दिये कि "पैसे लेने से कभी भी इंकार नहीं करना चाहिए, इससे धन की बेईज्ज़ती होती है!" उस दिन से मैंने उसकी बात गांठ बांध ली और फिर कभी न तो मैंने पैसे की बेइज्जती करी और न ही पैसे ने मेरी. 🙂

अब मैं आम तौर पर ऐसे सामाजिक रूप से लोकप्रिय खेलों की (जी हाँ, मैं इसे खेल ही कहूँगा) उपेक्षा ही करता हूँ। मैं जब कोई चीज़ देने का प्रस्ताव रखता हूँ तो सामने वाले के लिए यह विकल्प खुला रखता हूँ कि पहली बार में ले लो या फिर आगे के लिए इस बात को ठीक तरह से समझ लो। मैं बार-बार आग्रह नहीं करता; हाँ, कभी-कभी इतना ज़रूर कह देता हूँ कि मैं बहुत औपचारिकता निभाने वाला व्यक्ति नहीं हूँ।

इसी तरह भोजन करते समय भी बार-बार आग्रह और इंकार का नाटक मुझे पसंद नहीं है। मैं इस मामले में ईमानदार और स्पष्ट रहना चाहता हूँ-अगर मैं और खाना नहीं चाहता तो मैं परोसने वाले को साफ मना कर देता हूँ। एक बार मैं खा रहा था और जो महिला परोस रही थी बार बार मुझसे और लेने का आग्रह करती जा रही थी। कम से कम पाँच बार मना करने के बाद भी उसने भोजन मेरी थाली में रख दिया और फिर मैंने उसे छूट दे दी। वह महिला फिर आई और फिर से मेरी थाली में और खाना रख दिया। आखिर जब पूरी प्लेट भर गई तो मैं खाना छोडकर सीधे उठ खड़ा हुआ! मैं उससे कई बार कह चुका था कि मैं और नहीं खा सकता। बताइये मैं क्या करूं, भोजन भले ही आपका हो परन्तु पेट और शरीर तो मेरा अपना है, और मैं उसके साथ अत्याचार नहीं कर सकता।

मैं पहले ही भारतीय मानक समय के बारे में लिख चुका हूँ और समय की पाबंदी की भारतीय समझ के बारे में भी जो जर्मन्स की समय विषयक धारणा से कोसों दूर है। जर्मनी में अपने काम के दौरान मैंने इसे बहुत अच्छी तरह से समझा और हालांकि मैं खुद कभी भी लेटलतीफ़ नहीं था मगर यहाँ मैंने समय की पाबंदी की अपनी आदत को और तराशा और अब कहीं भी मेरे देर से पहुँचने का सवाल ही उत्पन्न नहीं होता।

विदेश में काफी समय व्यतीत करने के बाद मेरा मन-मस्तिष्क और मेरी आदतें काफी बदल गई हैं और हालांकि पहले भी मैं बहुत औपचारिक नहीं था, अब मैंने अपनी बची-खुची आदतों से भी तौबा कर ली है। अब अक्सर लोगों को यह बताना पड़ता है कि मैं औपचारिकताएँ बरतने का आदी नहीं हूँ।

जब कोई मुझे निमंत्रित करता है तो, जैसा कि मैंने कल के ब्लॉग में भी लिखा था, मैं ईमानदारी के साथ उन्हें उत्तर दे देता हूँ कि मैं वृन्दावन के बाहर बहुत कम निकलता हूँ और इसलिए मैं नहीं आ पाऊँगा। लेकिन अगर वे बार-बार आग्रह करते हैं, जैसे अगर वे पाँच बार कहें कि आपको आना ही पड़ेगा तो फिर मैं थक जाता हूँ अपने अनौपचारिक स्वभाव के विषय में बताते हुए और नम्रतावश परंपरागत आदतों के उस औपचारिक खेल में शामिल होकर उनकी हाँ में हाँ मिला देता हूँ।

अगर आप इसे एक खेल के रूप में लें, जैसा कि मैं अक्सर करता हूँ, तो अपने व्यवहार और उस पर दूसरों की प्रतिक्रिया को बारीकी से देखने में आपको मज़ा भी आएगा। लेकिन सबसे ज़्यादा मज़ा मुझे तब आता है जब सामने वाला भी अपनी सारी औपचारिकताओं को ताक पर रख देता है और मुझसे दिल खोलकर खरी-खरी बात करता है। सौभाग्य से यह भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि एक बार आप उन औपचारिकताओं से बाहर निकले कि लोग अपना दिल खोल देने के लिए तत्पर हो जाते हैं और खुलकर बात करते हैं। जी हाँ, हर संस्कृति की अपनी कुछ न कुछ विशेषताएँ होती हैं और मैं हर संस्कृति की उन बारीकियों का ध्यान से निरीक्षण और परीक्षण करना पसंद करता हूँ; विशेषकर दो संस्कृतियों की इन विशेषताओं की तुलना करने में मुझे बहुत आनन्द प्राप्त होता है!

भारतीय आदतें: भ्रम पैदा करने की हद तक औपचारिक और शालीन- 24 जुलाई 2013

पिछले हफ्ते मैंने जर्मन और अमरीकनों की कुछ खास चारित्रिक विशेषताओं का ज़िक्र किया था। जी हाँ, हम यहाँ उनके बीच रूढ़ और घिसी पिटी आदतों का ही ज़िक्र कर रहे हैं लेकिन वे भी उनके बीच सामान्य रूप से मौजूद आदतों और संस्कृति से ही उद्भूत होते हैं। उनके साथ कुछ समय रहकर और उनके साथ उन देशों की यात्राएँ करके आप उन्हें समझ सकते हैं। भारत में भी, उन लोगों को, जो यहाँ के निवासी नहीं हैं, भारतीयों की कुछ आदतें और रवैये बड़े भ्रामक, अजीबोगरीब और हास्यास्पद लग सकते हैं। क्योंकि मेरी पत्नी जर्मन है और भारत में रहती है, वह ऐसी कुछ बातों के बारे में आपको बता सकती है।

उनमें से एक यह है कि भारतीय अक्सर नम्र और शालीन दिखाई देना चाहते हैं लेकिन वे चाहते कुछ और हैं और कहते कुछ और। इस वजह से यह पता करना बहुत मुश्किल हो जाता है कि वाकई वे वही चाहते हैं जो कह रहे हैं या उसका बिल्कुल विपरीत। वे ठीक-ठीक बताएँगे बशर्ते आप अधिक आग्रह पूर्वक कहें। मैं एक उदाहरण देता हूँ:

मेरी पत्नी एक मित्र के साथ डॉक्टर के पास जाने के लिए सहमत हो गई। बारिश का मौसम था और उस दिन बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। तय समय पर उसकी मित्र का फोन आया, "तेज़ बारिश हो रही है; चलना है या स्थगित कर दें?" रमोना ने कहा, "बिल्कुल जाएंगे! क्या तुम्हें लेने ले लिए कार भेजूँ?" उसकी मित्र ने जवाब दिया, "नहीं, नहीं। उसकी कोई ज़रूरत नहीं है, मैं रिक्शे से आ जाऊँगी!" "आ जाओगी न?" "जी, बिल्कुल!" और मेरी पत्नी ने फोन रख दिया।

मैं और यशेंदु, दोनों, वहीं पास ही बैठे थे और यशेंदु ने पर्दा खोलकर बाहर इशारा करते हुए कहा कि मूसलाधार बारिश हो रही है। रमोना ने सोचा कि उसका मतलब यह है कि उसे अपनी मित्र के लिए कार भेज देना चाहिए था और विरोध करते हुए कहा, "मैंने तो उससे दो बार पूछा था मगर उसने हर बार यही कहा कि वह रिक्शा से आना चाहती है! मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि वह बारिश में तरबतर डॉक्टर के पास क्यों जाना चाहती है!"

मुझे हंसी आ गई और मैंने समझाया कि उसकी मित्र का पानी में डॉक्टर के पास जाने का कोई इरादा नहीं है-इसीलिए सबसे पहले उसने यही पूछा था कि जाना चाहिए या नहीं! वह चाहती थी कि कोई उसे ले चले-सही जवाब होता: "तुम रुको, मैं आकर तुम्हें ले लेती हूँ!" "पूछो मत, उसे व्यर्थ शालीन दिखाई देने का मौका मत दो!"

यही बात रमोना ने तुरंत फोन करके उससे कही और उसकी मित्र खुश हो गई। लेकिन, वापसी में फिर वही बात पेश आई और रमोना ने उससे मुसकुराते हुए कहा, "एक बात कहूँ, पता नहीं मैं कैसे कहूँ? कितनी बार मुझे यह कहना पड़ता है, वह भी सख्ती के साथ!… कार खड़ी है, पंकज (हमारा ड्राईवर) तुम्हें घर छोड़ आएगा लेकिन अगर तुम चाहो तो बारिश में नहाते हुए घर जा सकती हो! तुम्हारी मर्ज़ी, खुशी से भीगते हुए जा सकती हो!"

झूठी नम्रता के, दिखावटी इंकार के, ऐसे कितने ही वाकये होते रहते हैं, जिनके कारण आप उलझन में पड़ जाते हैं। यह भोजन के वक़्त भी होता है, जब खाने वाला अतिरिक्त कुछ लेने से मना करता रहता है जब कि वह अभी कुछ और भी खाना चाहता है और परोसने वाला बार-बार पूछता है कि कुछ और रख दूँ, कुछ चाहिए? ऐसी दोतरफा औपचारिकता में ज़्यादा खाने का बहुत इमकान होता है! क्योंकि अगर आप अपने मेहमान से अतिरिक्त लेने का आग्रह नहीं करेंगे तो हो सकता है कि वह शालीन दिखाई देने के चक्कर में भूखा ही रह जाए!

समय बीतने के साथ और शायद सालों विभिन्न संस्कृतियों के बीच रहने के अपने अनुभव की वजह से मैं बहुत सी भारतीय औपचारिकताओं से मुक्त हो चुका हूँ। लेकिन वह अलग किस्सा है, जिसे मैं अगले कुछ दिनों में बयान करूंगा।