आइए, लिंग की पूजा करें – उसमें क्या बुराई है? 18 फ़रवरी 2015

कल मैंने आपको शिव की एक कहानी सुनाते हुए बताया था कि किस तरह हिंदुओं ने शिवलिंग के रूप में उनके लिंग की पूजा शुरू की। लेकिन बहुत से हिन्दू यह स्वीकार नहीं करना चाहते कि वे लिंग की पूजा करते हैं।

कल के ब्लॉग में मैंने जो कहानी लिखी थी वह जस की तस धर्मग्रंथों में लिखी हुई है। शिव का लिंग धरती पर गिरा और लोगों ने उनके शरीर के ठीक उसी हिस्से की पूजा करने का वचन दिया। अब अगर आप कहें कि यह लिंग की मूर्ति है और आप उसे ब्रह्मांड का प्रतीक मानना चाहते हैं तो मानते रहें। कोई समस्या नहीं है। लेकिन आप यह नहीं कह सकते कि वह लिंग नहीं है। जी हाँ, धर्मग्रंथों में यह जननांग हैं और आप रोज़ उनकी पूजा करते हैं और अगर आप धार्मिक हैं तो आपको यह बात स्वीकार करनी चाहिए।

शिव और उनके शरीर के सबसे गुप्त हिस्से के विषय में एक और कहानी है, जो आप पसंद करेंगे:

एक बार शिव ने एक बेहद सुंदर स्वर्ग की एक अप्सरा जैसी मोहिनी स्त्री को देखा। वे तुरंत उत्तेजित हो उठे और उसके पीछे दौड़ पड़े। उस सुन्दर स्त्री ने जब देखा कि शिव उनके पीछे भागे चले आ रहे हैं तो वह भी घबराकर भागने लगी मगर शिव से भला कौन मुक़ाबला कर सकता था लिहाजा उन्होंने उसे पकड़ लिया और आलिंगनबद्ध करने की कोशिश करने लगे। वह पूरी शक्ति से उनके चंगुल से निकलने की कोशिश करने लगी कि किसी तरह उनसे बच सके। और आश्चर्य! अनहोनी हो गई और वह किसी तरह उनके बाहुपाश से मुक्त हुई और भागने में कामयाब हो गई!

इस संक्षिप्त मगर उत्तेजक संघर्ष के चलते शिव का लिंग स्खलित हो गया। जी हाँ, और जहाँ-जहाँ यह वीर्य गिरा वहाँ-वहाँ उसने सोने और चांदी की खदानें निर्मित कर दीं।

मैंने जानता हूँ कि कुछ लोग मुझसे इस बात के प्रमाण पूछने के लिए बेताब हो रहे होंगे; तो उनके लिए निवेदन है कि श्रीमद भागवत महापुराण के स्कन्ध 8, अध्याय 12 के 24 से 34 तक के श्लोक पढ़ लें।

जब मैंने ये कहानियाँ अपनी पत्नी को सुनाईं तो उसने मुसकुराते हुए कहा कि ये कहानियाँ तो किसी खराब, अरुचिकर पॉर्न की तरह लग रही हैं या अधिक से अधिक किसी मज़ाकिया कॉमिक की विषयवस्तु जैसा कुछ-धार्मिक ग्रन्थों जैसा तो इसमें कुछ भी नहीं है। सच बात है-और स्पष्ट ही, अतीत में, जब उन्हें लिखा गया होगा तब लोगों का दिमाग जैसा रहा होगा, उसी के अनुसार कल्पना करते हुए उन्हें लिखा गया होगा! यही सब चीज़ें उस समय लोग सुनना चाहते रहे होंगे और इसलिए अपनी कहानियों में ईश्वर और धर्म का घालमेल करते हुए इन ग्रन्थों की रचना की गई होगी!

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि इसमें कुछ भी गलत है! मेरा अर्थ यह नहीं है कि धर्मग्रंथों में यौन विषय नहीं होने चाहिए! लेकिन दिक्कत यह है कि धार्मिक लोग तथाकथित ‘पवित्रता’ का दिखावा करते हुए कहते हैं धर्म का सेक्स से कोई संबंध नहीं है। उन्हें मानना चाहिए कि यह उनके धर्म का हिस्सा है, उनके धर्मग्रंथों का हिस्सा है! जब आपकी पूजा का एक प्रमुख पात्र लिंग है तो फिर आपको जननेन्द्रियों को वर्जना के साथ नहीं संयुक्त नहीं करना चाहिए!

एक समय जब मैं धार्मिक हुआ करता था, इन सभी धर्मग्रंथों को जानता था और उनका अध्ययन किया करता था। मैं जानता था कि यह लिंग ही है-और उसमें मुझे कुछ भी अजीब नहीं लगता था। मैं इन सब कि बीच बड़ा हुआ हूँ और आज, जब कि दूसरे गैर हिंदुओं को यह बताते हुए मुझे इन पर हँसी आती है, पहले भी मैं इन कहानियों के बारे में पूरी तरह स्पष्ट था।

मैंने सुना है और फोटो भी देखे हैं, जिनके अनुसार स्पष्ट है कि जापान और नेपाल में भी ऐसे लोग मौजूद हैं जो लिंग की पूजा करते हैं। गजब! और भी ऐसे लोग होने चाहिए! जीवन को गले लगाने वाले और जीवन के-और शरीर के भी-महत्वपूर्ण हिस्सों पर अपना ध्यान केन्द्रित करने वाले!

शर्त यह है कि आप यह दावा न करें कि ऐसा करते हुए आप लिंग की पूजा नहीं कर रहे हैं! क्योंकि यह सरासर पाखंड होगा!

एक मित्र, जो धर्म पढ़ाता है मगर उस पर विश्वास नहीं करता – 17 जुलाई 2014

जर्मनी में मेरा एक दोस्त है, जिससे मैं, जब भी जर्मनी आता हूँ, अवश्य मिलता हूँ। वह एक स्कूल में धर्म विषय पढ़ाता है। जर्मनी के स्कूलों में धर्म को एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है और विद्यार्थियों के पास तीन विकल्प होते हैं-या तो वे कैथोलिक या प्रोटेस्टंट ईसाई धर्म पढ़ें या अगर आप अपने बच्चे को किसी भी धर्म की शिक्षा नहीं देना चाहते तो फिर धर्म के स्थान पर आप उन्हें नीति-शास्त्र भी पढ़ा सकते हैं। मैं शुरू से जानता था कि मेरा मित्र किसी भी धर्म में विश्वास नहीं करता इसलिए इस बार मैंने उससे पूछ ही लिया: "तुम धर्म पढ़ाते ही हो या उस पर विश्वास भी करते हो?"

उत्तर: अरे नहीं! सिर्फ पढ़ाता हूँ, विश्वास नहीं करता!

इस तथ्य की स्वीकारोक्ति का उसका स्पष्टीकरण मुझे बड़ा मज़ेदार लगा और मैं सोचता हूँ आपको भी लगेगा। उसने कहा, मुख्य बात यह कि मैं बायबल को पवित्र पुस्तक नहीं मानता बल्कि प्राचीन धार्मिक उक्तियों और कथाओं का संग्रह मानता हूँ। उसके अनुसार बायबल ईश्वरीय वाणी का लिखित पाठ नही है, जैसा कि कुछ लोग विश्वास करते हैं, बल्कि अलग-अलग समय पर बहुत से लोगों द्वारा कही और लिखी गई कहानियों का संग्रह है, जिन्हें उदाहरणों और प्रतीकों की सहायता से लोगों तक संदेश पहुँचाने के उद्देश्य से लिखा गया था।

जब आप बायबल पर गौर करें तो इस बात का ध्यान अवश्य रखें। वह प्रतीकों और उपमा-अलंकारों से भरी पड़ी है क्योंकि अतीत में लोग बातों को इसी तरह बेहतर समझ पाते थे और उसमें निहित संदेशों को अच्छी तरह ग्रहण कर पाते थे। उन कहानियों को शब्दशः स्वीकार नहीं किया जा सकता, उनके निहितार्थों की खोज करना आवश्यक है कि क्या कहा जा रहा है। और यह भी खोजना पड़ता है कि क्या वे सन्देश आज के युग में भी कारगर हैं या नहीं।

लेकिन उसके अनुसार, मज़ेदार बात अधिक समझ में आने वाली है, तर्कपूर्ण है: आज के समाज में और लोगों के जीवन में आप धर्म का प्रभाव लक्षित कर सकते हैं, उन पाठों और उन मूल्यों का प्रभाव, जिन्हें हज़ारों साल पहले बताया गया था। ये ऐतिहासिक दस्तावेज़ हैं, जो हमें हमारे समाज के विकास के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं! यूरोपीयन्स के मूल्यों, उनके व्यवहार, रहन-सहन और उनकी भाषाओं पर ईसाइयत का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा है!

उसने बताया: मेरे स्कूल में ही धर्म पढ़ाने वाले और भी शिक्षक हैं, जो बायबल को शब्दशः सही मानते हैं! वे उसके एक-एक शब्द पर विश्वास रखते हैं और उसके पाठों को उसी भावना से पढ़ाते हैं! स्वाभाविक ही यह बात बड़ी हास्यास्पद है और विद्यार्थी भी यह बात समझते हैं-लेकिन यह भी सही है कि दुनिया में हर तरह के लोग पाए जाते हैं और इसीलिए, मेरे विचार में स्कूलों में धर्म की कक्षाएँ नहीं होनी चाहिए: पता नहीं कब कोई मूर्ख अतिवादी ईसाई-पंथी आपके बच्चे को बरगलाना शुरू कर दे! इसकी संभावना कम करके नहीं आँकी जा सकती। यह क्षेत्र ऐसे दावों से भरा पड़ा है, जिन्हें सिद्ध नहीं किया जा सकता इसलिए यहाँ हर वक़्त अतिवाद पनपने की पूरी संभावना होती है। इसलिए सिर्फ वैज्ञानिक सोच अपनाना ही मेरी समझ से उचित तरीका हो सकता है।

इसलिए जब मेरे मित्र ने कहा कि वह तो एक वैज्ञानिक है, पुरोहित नहीं तो मैं उसका मंतव्य अच्छी तरह समझ गया। हम दोनों ने ही धर्म-विज्ञान का अध्ययन किया है मगर पूरी तरह अलग-अलग तरीके से!

मुक्ति की आकांक्षा में मृत्यु कि प्रतीक्षा करने के स्थान पर जीवित रहते हुए अपने आपको धर्म के बंधन से मुक्त कीजिए और खुश रहिए! 16 जुलाई 2014

क्या आप ऐसे लोगों को जानते हैं, जो अपने जीवन को लेकर नकारात्मकता और अफसोस (दीनता) से भरे होते हैं? मुझे हाल ही में इसका एक धार्मिक कारण याद आ गया है, जो कम से कम हिंदुओं के मामले में साफ मौजूद दिखाई देता है। दीनता का औचित्य अथवा जीवन का अफसोस क्यों?: हिन्दू धर्म के मुताबिक आप जीवन की शुरुआत ही पाप से करते हैं।

शायद आप जानते होंगे कि हिन्दू धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता पाई जाती है। हिन्दू धर्मग्रंथों के इस विचार के अनुसार वे यह भी मानते हैं कि मनुष्य का जन्म होता ही उसकी आत्मा के अधःपतन के चलते है।

जब एक भले व्यक्ति की मृत्यु होती है तो हिन्दू समझते हैं कि उसने अच्छे कर्म किए हैं इस कारण वह व्यक्ति स्वर्ग में प्रवेश का और वहाँ अस्थाई रूप से रहने का हकदार हो गया है। जब वह स्वर्ग में रहकर अपने पुण्य कर्मों को खर्च कर देता है तो उसे वापस पृथ्वी पर लौटना पड़ता है क्योंकि स्वर्ग में कर्मों के अनुसार उसका निर्धारित समय पूरा हो चुका है । वह अभी मुक्त नहीं हुआ है अन्यथा उसे स्वर्ग जाना ही नहीं पड़ता-उसकी आत्मा मुक्त हो जाती और सीधे इस संसार के रचयिता परमपिता परमेश्वर में मिल जाती। इस तरह धार्मिक रूप से एक हिन्दू का जीवन में एकमात्र मक़सद मुक्ति पाना होता है, जिससे उसे दोबारा जन्म लेकर धरती पर वापस न आना पड़े!

कुल मिलाकर यह कि आपका पुनर्जन्म लेना एक बुरी बात है। आपकी एकमात्र इच्छा होती है कि काश पुनः जन्म लेकर धरती पर आने की आवश्यकता न पड़ती, काश मैं इस संसार में नहीं होता, कि काश मुझे मुक्ति मिल गई होती! अर्थात आप कह रहे होते हैं कि काश मेरा जन्म नहीं होता! तो आप पूरा ज़ोर इस बात पर लगा देते हैं कि इस पुनर्जन्म के चक्कर से पीछा छुड़ा सकें। आप दिन में कई बार प्रार्थना करते हैं, देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं, गंगा के पवित्र जल में डुबकी लगाने के लिए लम्बी यात्राएँ करते हैं और हर साल तीर्थाटन करते हैं।

आप जन्म से ही पापी हैं। आप खुश रहने की अपेक्षा भी कैसे कर सकते हैं?

मैंने सुना है कि ईसाइयत में भी यह विचार मौजूद है! विस्तार से इस विषय में मैं नहीं जानता मगर इतना जानता हूँ कि वे उस मिथकीय कहानी पर विश्वास करते हैं, जिसके अनुसार मनुष्य स्वर्ग की जगह इस धरती पर सिर्फ इसलिए है कि मनुष्य जाति की आदि-माता ईव ने ईश्वर के आदेश के विरुद्ध जाकर भले-बुरे के ज्ञान-वृक्ष का सेव्-फल खा लिया था। अब सारा जीवन आपको भला व्यक्ति बनने की कोशिश करनी चाहिए, ईश्वर से प्रेम करना चाहिए और सारी मनुष्य जाति के पापों का प्रायश्चित्त करने वाले जीसस से प्रार्थना करनी चाहिए कि वे आपकी रक्षा करें।

धर्म चाहता है कि आप अपने अपराधबोध से कभी मुक्त न हों। उस अपराध या पाप के लिए जिसे आप जानते तक नहीं, जिसे आपने अंजाम नहीं दिया है! आप पैदा ही इसलिए हुए कि आपके किसी पूर्वज ने यह अपराध किया था और अब उसका प्रायश्चित्त आपको करना है और इस कहानी में परिवर्तन की कोई गुंजाइश नहीं है!

तो आपको इस एहसास के साथ सारा जीवन गुज़ारना है, सिर्फ ऐसे काम करने हैं जिनसे आप पर उस काल्पनिक ईश्वर की कृपा बनी रहे। जब आप इन बातों पर विश्वास करते हैं तो फिर कभी भी खुश कैसे रह सकते हैं?

धर्म आपको बताता है कि मृत्यु के बाद आपको किस तरह मुक्ति मिल सकती है-लेकिन अगर आप वास्तव में खुश रहना चाहते हैं तो आपको जीवित रहते हुए ही मुक्ति प्राप्त करनी चाहिए!

सन 2005 में अपने पिछले पांच सालों की समीक्षा: वह 2013 के अंत में कैसी लग रही है! 29 दिसंबर 2013

जिस तरह यह साल समाप्ति की ओर है और हम सब अपने पिछले अतीत पर दृष्टिपात कर रहे हैं उसी तरह 2005 के अंत में मैं अपने अतीत पर नज़र दौड़ा रहा था। साल बीतने के साथ मुझे अवसर मिला था कि मैं अपने गुफा-त्याग के बाद के पाँच सालों पर दृष्टिपात करूँ। इस बीच कितना कुछ हुआ, कितना कुछ बदल गया और खुद मैंने कितना और किस रूप में विकास किया!

जब मैं गुफा से बाहर निकला तब मैं काफी लंबा समय अकेलेपन में, अपने आपसे बातें करते हुए, चिंतन-मनन करते हुए गुज़ार चुका था और जानता था कि इन सालों में मुझमें आए परिवर्तनों का भविष्य में मेरे जीवन पर भी असर होगा। लेकिन कैसा असर होगा? मैं जानता था कि मैं अपना आगे का जीवन उस तरह व्यतीत नहीं करूंगा जैसा कि पहले करता रहा था लेकिन मुझे बिल्कुल पता नहीं था, कोई कल्पना नहीं थी कि आखिर उसकी दिशा क्या होगी, भविष्य में मैं क्या करने वाला हूँ। और परिवार के भरण-पोषण के लिए मेरी आमदनी का जरिया क्या होगा!

मैं बदल गया था। भारत छोड़कर बाहर चला गया, विदेश घूमा। नई परियोजनाएं, नए काम शुरू किए। मैं योग की कार्यशालाएँ लेता, व्यक्तिगत सत्रों में असंख्य लोगों से मिलता और उनकी समस्याओं पर अपनी राय रखता, सलाह देता। लोगों से मेरा कई स्तरों पर गहरा जुड़ाव स्थापित होता गया और इस काम में मुझे बहुत आनंद मिलता था। मैंने अपनी गुरु की भूमिका त्याग दी और लोगों से मित्रता स्थापित की।

शुरू में मैं पश्चिमी देशों में बसे भारतीय समाज के बीच काम करता था, जो स्वाभाविक ही धर्म से गहरे रूप में जुड़ा हुआ होता था और इसलिए पहले मैं जो काम करता था, उसमें भी बड़ा परिवर्तन आया। जहां भी मैं जाता, वहाँ भारतीय समाज से बाहर भी, यानी स्थानीय लोगों के साथ भी अपने संपर्क का विस्तार करना शुरू किया। ये विदेशी लोग हिन्दू धर्म से या हिन्दू धर्मग्रंथों से कोई संबंध नहीं रखते थे। मुझे भी अपने आपको उन धार्मिक विषयों से मुक्त होकर अच्छा ही लगता था क्योंकि अब मैं समझ चुका था कि ये धार्मिक सिद्धान्त उन नए विचारों और नई, जीवंत संवेदनाओं को प्रतिबिम्बित नहीं करते, जिन्हें मैं अपने भीतर महसूस करने लगा था। धर्म से मेरी दूरी बढ़ती जा रही थी और मैंने भी नहीं सोचा था कि मैं उससे इतना दूर निकल जाऊंगा।

लेकिन मैं बच निकला। मेरे परिवार का कुछ नहीं बिगड़ा। बल्कि, हमारा विकास हुआ, हम फले-फूले! आश्रम की इमारत लगातार बढ़ती जा रही है और हम लोग ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की मदद कर पा रहे हैं: हमारे कर्मचारी और उनके परिवार, जो आश्रम और चैरिटी स्कूल द्वारा प्राप्त वेतन पर पल रहे हैं, संस्कृत भाषा के युवा विद्यार्थी, जो अपने अध्ययन के दौरान हमारे साथ रहा करते थे और वे बहुत से बच्चे, जो प्राथमिक विद्यालयों में मुफ्त शिक्षा पाते हैं।

इस बात का पता चलने पर मैंने क्या किया? अपने दिल की गहराइयों से मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया। हालांकि अब मैं धार्मिक प्रवचन नहीं करता था फिर भी अब भी मैं यही विश्वास करता था कि यह सब मुझे ईश्वर प्रदत्त है। इन पाँच सालों में इतने आमूल-चूल परिवर्तनों के बाद भी मैं यही मानता था कि मुझ पर और मेरे परिवार पर ईश्वर का आशीर्वाद बरकरार है।

उस वक़्त मैं सोच भी नहीं सकता था कि अगले पाँच साल के बाद मैं उसी ईश्वर को एक हवाई, मिथकीय कथा-नायक से ज़्यादा कुछ नहीं मानूंगा तथा अपने और अपने परिवार के परिश्रम और अथक प्रयासों से प्राप्त फल को मानव-मस्तिष्क की उस रचना का आशीर्वाद या प्रसाद नहीं मानूँगा और न ही उसे धन्यवाद ज्ञापित करने का विचार ही मेरे मन में आएगा।

समय गुजरने के साथ लोग बदलते हैं, उनके विचार बदलते हैं और उनकी आस्थाओं में परिवर्तन होता है।

जब मैंने अपने गुरु को बताया कि मैंने अपना गुरु का चोला त्याग दिया है- 17 नवंबर 2013

पिछले हफ्ते मैंने आपको बताया था कि मेरे दोस्त और पुराने शिष्य मेरे विचारों और मेरी दर्शनिक मान्यताओं में आए परिवर्तन को किस तरह जान सके। मैं अब गुरु नहीं रहा था और 2005 आते-आते मेरे आसपास के अधिकांश लोग यह बात जान चुके थे, कम से कम टुकड़ों में। स्वाभाविक ही मेरे परिवार वाले तो जानते ही थे कि मेरे भीतर क्या चल रहा है और मैं भी उनके साथ अपनी भावनाएं साझा करना चाहता था! लेकिन मैं यह नहीं जानता था कि मेरे इन विचारों को जानकर वे लोग क्या सोचेंगे, खासकर मेरे पिताजी, जिन्होंने अपना सारा जीवन एक गुरु के रूप में व्यतीत किया था।

एक अति-धार्मिक गुरु से एक अधार्मिक, सामान्य व्यक्ति में मेरी तब्दीली का संक्रमण-काल काफी लंबा रहा। यह सामान्य है-मैंने अपने जीवन के तीस साल धर्म की सेवा में, एक गुरु के रूप में गुज़ारे थे! परिवर्तन एक दिन में तो होता नहीं है लेकिन 2005 में एक समय ऐसा भी आया जब मैंने पीछे मुड़कर देखा और महसूस किया कि मैं अब तक कितना बदल चुका हूँ और परिवर्तन की यह प्रक्रिया अब भी जारी है! इतने सारे अनुभव और भावनाएँ थीं-और मैं अपने परिवार वालों को सब कुछ बताना चाहता था।

मैं बहुत बचपन में ही अपने पिताजी के साथ भ्रमण करने लगा था। जब मैं बहुत छोटा था तभी से उनके कार्यक्रमों में चला जाता और जब मैं नौ साल का हुआ, वे मुझे अपने साथ स्टेज पर भी बिठा लिया करते थे और कुछ मंत्र और श्लोक आदि सुनाकर मैं उनके कार्यक्रमों में थोड़ा-बहुत योगदान भी किया करता था। उन्होंने मुझे सारी बातें सिखाईं और मुझे अपने तरीके से बात कहने की पूरी स्वतन्त्रता प्रदान की। वे मुझे पुराने धर्मग्रंथों में निहित धारणाओं और सिद्धांतों की नए तरीके से व्याख्या करने और उसके अनुसार अपने विचार रखने के लिए प्रोत्साहित किया करते थे। न सिर्फ वे हजारों दूसरे लोगों के गुरु थे बल्कि मेरे भी गुरु थे और जो कुछ भी मैंने सीखा या जाना वह उन्हीं की देन है।

जब मैं तेरह साल का था, मैंने अपने स्वतंत्र प्रवचन देना और उस किशोरावस्था में ही स्वतंत्र रूप से भ्रमण करना भी शुरू कर दिया था। मुझे लोकप्रियता प्राप्त हो रही थी और मुझे हमेशा ख्याल रहता था कि यह सफलता मुझे अपने पिताजी द्वारा प्रदत्त ज्ञान के चलते ही मिल रही है। अगर मैं उनसे कहता कि मैं यह सब छोड़ रहा हूँ तो उन्हें कैसा लगता? अगर मैं उन्हें बताऊँ कि मैं पूरी तरह बाहर नहीं हुआ हूँ, लेकिन अब मेरे और अपने गुरु के पुराने अवतार के बीच दूरी पैदा हो गई है?

सन 2000 में अपने गुफावास से बाहर निकलने के बाद मैंने दुनिया भर का सफर किया और हालांकि उतने समय के लिए मेरे परिवार वाले मेरे दैनिक जीवन से बहुत हद तक अनभिज्ञ रहा करते थे मगर वे पहले ही मेरे अंदर धीरे-धीरे आ रहे कुछ बदलावों को देख और महसूस कर रहे थे। वे जान गए थे कि घुटने का लिगामेंट टूटने के बाद से मैं रोज़ की जाने वाली हवन-क्रिया अब नहीं कर रहा हूँ। उन्होंने यह भी नोटिस किया कि भारत में प्रवचन देने में मेरी अब रुचि नहीं रह गई है। वे यह भी देख रहे थे कि पहले अक्सर मुझसे मिलने आने वाले अपने शिष्यों से मेरा संपर्क टूटता जा रहा है। जब मैं गुफा में निवास कर रहा था तब भी ये लोग नियमित आया करते थे लेकिन अब उनका आना लगभग बंद हो गया है।

अपने परिवार में हम सभी आपस में बहुत खुले हुए हैं और किसी से कोई बात छिपी नहीं रह सकती थी, इसलिए मैं इसे लेकर परेशान नहीं था-फिर भी मैं यह अनुमान लगाने में असमर्थ था कि मेरे पिताजी इस बारे में क्या सोचेंगे, क्या कहेंगे! क्या वह मुझसे निराश होंगे? क्या वह मुझे समझने की कोशिश करेंगे या समझ पाएंगे? मुझमें आए इन परिवर्तनों के विषय में वे क्या महसूस करेंगे?

हमारे बीच हुए वार्तालाप के बारे में मैं आपको अगले हफ्ते बताऊंगा।

क्यों आप खुद कठपुतली बनकर अपने जीवन को किसी गुरु के हवाले करना चाहते हैं?- 22 जुलाई 2013

आज गुरु-पूर्णिमा है, जिसे आचार्य दिवस भी कहा जा सकता है। इस दिन हर शिष्य अपने गुरु का सम्मान करता है। सारा साल भले ही वह उसे भूला हुआ हो, आज के दिन वह गुरु के पास अवश्य आएगा, गुरु के पाँव पखारेगा, उसके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करेगा और उसे दक्षिणा के रूप में कुछ धन अर्पित करेगा। अगर वह बहुत दूर रह रहा है तो वह उससे फोन पर बात करेगा और उनसे आशीर्वाद लेगा। मैं खुद भी बहुत समय तक गुरु की भूमिका में रहा हूँ और इस स्थिति से वाकिफ हूँ। मैं अब बदल चुका हूँ, इतना बदल चुका हूँ कि जिस बात की मैं सालों पहले खुद अनुशंसा किया करता था उसी का आज मैं कड़ाई के साथ विरोध करता हूँ। इसके साथ ही गुरुवाद के इस चलन का भी।

मैं धर्म-ग्रन्थों में लिखी बातों पर भरोसा किया करता था और उसी का उपदेश देते हुए उसका प्रचार-प्रसार करता था। वह यह कि: "गुरु के बिना आपकी मुक्ति नहीं है। मुक्ति ही मनुष्यमात्र का लक्ष्य होना चाहिए और मुक्ति प्राप्त करने के लिए उसे जीवन भर प्रयास करते रहना चाहिए-इसलिए हर एक को चाहिए कि पहले वह एक ऐसे गुरु की तलाश करे जो उसे मुक्ति दे सकता है।"

आज मैं महसूस करता हूँ कि लोगों की यही हालत इस क्षेत्र में होने वाले भ्रष्टाचार की जड़ है। भोले भाले, मासूम लोग उनके पास आते हैं और उन्हें तीन बातें सिखाई जाती हैं:

1) आपको मुक्ति तभी मिलेगी जब आप किसी को गुरु बना लें।

2) जैसे आपके एक ही पिता हो सकते हैं उसी तरह आप जीवन में सिर्फ एक ही व्यक्ति को गुरु बना सकते हैं।

3) आपको अपना सर्वस्व गुरु को समर्पित करना होगा। वह आपकी सारी ज़िम्मेदारी वहन करेगा और बदले में आपको वही करना होगा जो उसका आदेश हो।

जिस पल आप अपने गुरु से दीक्षा ग्रहण करते हैं, आप अपने सारे कर्मकांड उसे अर्पित कर देते हैं। आप उसकी सलाह पर चलते हैं और अपनी प्रार्थनाएँ, मन ही मन, उसके साथ ही करते हैं। उसके इस दावे पर

कि वह आपको इस मृग-माया से निकालकर मुक्ति दिलाएगा, आप अपनी सहमति से और खुशी-खुशी उसकी कठपुतली बनने के लिए तैयार हो जाते हैं। स्वाभाविक ही गुरु इसे और इसके साथ आने वाली हर चीज को पसंद करते हैं। इसीलिए वे कहते हैं कि गुरु से दीक्षा लेना अनिवार्य है। अपने शिष्यों को अपने साथ बनाए रखने के लिए वे इस नियम का प्रचार करते हैं कि किसी भी शिष्य का एक ही गुरु हो सकता है।

यह पूरी व्यवस्था ही मेरे विचार में, दुरुपयोग तथा शोषण करने के इरादे से ही बनाई गई है और यही कई दशकों से, बल्कि सदियों से हो रहा है। ये गुरु अपने शिष्यों के मस्तिष्क पर पूरा अधिकार रखते हैं और वे जान-बूझकर दौलत पाने और न सिर्फ अपने शारीरिक सुख बल्कि अपनी स्वैर, अप्राकृतिक यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए भी उनका दुरुपयोग करते हैं। वहाँ होने वाले कृत्य बेहद अनैतिक और समाजविरोधी होते है।

मेरे विचार में गुरु महज एक शिक्षक होता है, जो कि उसका शाब्दिक अर्थ भी है। अगर आप कुछ सीखना चाहते हैं तो आपको गुरु की आवश्यकता पड़ती है। जब मैं स्कूल जाता था तो कक्षा के सारे बच्चे शिक्षकों को आदर के साथ ‘गुरुजी’ कहा करते थे। इस बात से कोई मतलब नहीं होता था कि वह व्यक्ति कौन है। कोई भी, जिससे आप कुछ सीखते हैं, आपका गुरु हो सकता है, भले ही वह आपसे उम्र में छोटा ही क्यों न हो। और इस तरह आपके कई गुरु हो सकते हैं, जो भी आपको शिक्षा प्रदान करता है।

किसी की कठपुतली मत बनिए। जिससे भी आप कुछ सीखते हैं उसे आप आदरपूर्वक शिक्षक का दर्जा दे सकते हैं। लेकिन किसी एक व्यक्ति पर पूरी तरह निर्भर न रहिए। अपने संबंध को सिर्फ शिक्षक और विद्यार्थी का संबंध ही बना रहने दें और उसमें किसी दैवत्व के पहलू को जगह न दें।

लोग यह तर्क कर सकते हैं कि अगर आप धर्मग्रंथों और धार्मिक दर्शन का अध्ययन करना चाहते हैं तो आपको एक आध्यात्मिक और धार्मिक गुरु की आवश्यकता हो सकती है। मैंने अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा इसी काम में खर्च किया है। आज मैं आपसे पूछना चाहता हूँ: आखिर आप क्यों इस धार्मिक दर्शन का अध्ययन करना चाहते हैं? मेरे विचार में यह बिलकुल व्यर्थ है। आप एक ईमानदार और सुखपूर्ण जीवन जीना चाहते हैं। इसके लिए वेदों, कुरान या बाइबल की आपको कहाँ आवश्यकता है? उन्हें पढ़कर आप अपने ज्ञान के क्षितिज को सीमित कर लेंगे, अपने रास्ते को संकरा कर लेंगे और संदेहग्रस्त हो जाएंगे। तो अगर आपको ऐसे दर्शन की आवश्यकता ही नहीं है तो फिर धार्मिक गुरु की आवश्यकता क्यों होगी?

अपने गुरु आप खुद बनिए। आपका प्रेम, आपकी सहज विनम्रता और नैतिकता आपकी गुरु है। यही चीज़ें आपको सही रास्ता दिखाएंगी। बस, उन्हें वैसा करने आज़ादी दे दीजिए।

अपनी जिम्मेदारियों से बचने का गुरु प्रदत्त सम्मोहक प्रस्ताव – 3 अप्रैल 2013

कल मैंने उन जिम्मेदारियों के बारे में लिखा था जो एक लेखक और पाठक, दोनों पर, आयद होती हैं और यह भी कि अपने जीवन और अपने कर्मों की सम्पूर्ण ज़िम्मेदारी उन्हें उठानी ही चाहिए। हर व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिए और उन्हें अपने कंधों पर उठाने का साहस होना चाहिए। इस बात पर सभी सहमत होंगे कि ऐसा ही होना चाहिए मगर हिन्दू धर्म और प्रचलित गुरुवाद, दुर्भाग्य से, कुछ दूसरी ही बात सिखाते हैं: आप अपनी सारी जिम्मेदारियों का बोझ अपने गुरु पर डाल सकते हैं और आपको ऐसा करना भी चाहिए।

जी हाँ, यही सब बड़े से बड़े धर्मग्रंथों में लिखा हुआ है और यही सब कुछ सैकड़ों सालों से गुरुओं का उपदेश रहा है जिसे उनके शिष्य निष्पादित करने की कोशिश में लगे रहते हैं। इसके पीछे का विचार यह है कि आप अपने आपको पूरी तरह गुरु के चरणों में निछावर कर दें। अपने साथ आप अपने बुरे कर्मों को और अपने अच्छे कर्मों को भी गुरु को समर्पित कर दें और अपने लिए बिना किसी अपेक्षा के जैसा गुरु कहता है वैसा करते चले जाएँ। फिर आप उस स्थिति को प्राप्त हो जाएंगे जहां आपके सारे कर्म आपके नहीं रह जाएंगे और इस तरह मृत्यु के बाद आपको स्वर्ग प्राप्त हो जाएगा।

यही वह आधार है जिस पर सारे गुरुवाद की इमारत खड़ी है। गुरु लोगों का आह्वान करते हैं: आओ, अपने सारे कर्म मुझे सौंप दो, वही करो जिसके लिए मैं तुम्हें प्रेरित कर रहा हूँ और फिर तुम्हें इस जीवन की, यहाँ तक कि उसके बाद की भी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। अपने आप को समर्पित कर दो, निछावर कर दो, तुम्हारे इस जन्म की और अगले जन्मों की भी चिंता मैं करूंगा।

कितना आकर्षक विचार है! किसी भोले-भाले, साधारण धर्मभीरु व्यक्ति के लिए यह एक ललचाने वाला प्रस्ताव है! हर हिन्दू जो ऐसे धार्मिक वातावरण में बड़ा हुआ है यह विश्वास कर सकता है कि यही एकमात्र उचित राह है। कोई भी इसके मोहक स्वरों को समझ सकता है: मेरी नौका में सवार हो जाओ, मैं तुम्हें उस पार पहुंचा दूँगा! तुम्हें सोचने की, चिंता करने की ज़रूरत नहीं, तुम वहाँ सुरक्षित पहुँच जाओगे। तुम नौका को हिला नहीं सकते, लहरों के तेज़ थपेड़े तुम्हें डिगा नहीं सकेंगे, डूबने की तो कोई संभावना ही नहीं- यहाँ तक कि तुम गीले तक नहीं होगे!

वे समर्पण कर देते हैं। यह बहुत आसान है और यह समाज में अच्छा भी माना जाता है! यह घोषणा करते हुए वे गर्व से भर उठते हैं: "मैंने सर्वस्व परित्याग किया है, मैं उपासना में लीन हो गया हूँ, मैं भक्त हूँ और सिर्फ वही करता हूँ जो मेरे गुरु की वाणी मुझसे करवाती है। मैं कुछ भी नहीं हूँ।" यह विनम्रता ही उनसे अपेक्षित है। उनसे कहा गया है कि ‘अपने अहं को खत्म करो’ अन्यथा गुरु आपकी ज़िम्मेदारी नहीं ले सकता। आपके कर्मों कि ज़िम्मेदारी वह तभी लेगा जब आपके कर्मों पर उसका अधिकार होगा।

लेकिन गुरु की इस सेवा के बदले आपको एक निश्चित फीस भी अदा करनी होगी। कुछ गुरु सीधे यह फीस वसूल नहीं करते। कुछ बैंक की तरह होते हैं जहां कुछ विशिष्ट सेवाओं के लिए आपका एक तरह का बीमा किया जाता है। लेकिन आपको भुगतान करना अवश्य पड़ता है, सीधे सीधे या फिर किसी और माध्यम से।

ये गुरु आपकी इस मनोवृत्ति का लाभ सिर्फ मोटी रकम वसूल करके ही नहीं उठाते। उनके कई शिष्य इतने समर्पित होते हैं कि वे उनकी ज़बान खुलते ही उनके लिए कुछ भी कर सकते हैं। उनके शिष्यों द्वारा प्रदत्त यह शक्ति उनके लिए यौन शोषण की राह भी खोल देती है। पहले शिष्य रहीं कुछ महिलाओं ने मुझे बताया कि वे तो अपने गुरु को भगवान ही समझती थीं। उन्होंने अपने आपको पूरी तरह समर्पित कर दिया था, इस विश्वास के साथ कि गुरु के आदेश का पालन करने पर वे उनके माध्यम से पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी। जब उनसे कहा गया कि गुरु की सेवा हेतु उनके बेडरूम में जाओ, उनके जननांगों का मर्दन करो और यहाँ तक कि उनके साथ संभोग करो तो उनमें से बहुत सी इंकार नहीं कर सकीं। ऐसे कई प्रकरण हैं जहां गुरुओं ने अपनी शिष्याओं का इस तरह शोषण किया क्योंकि वे अपने भोलेपन में यह सोचती थीं कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

इस तरह आप देखते हैं कि अपनी ज़िम्मेदारी स्वयं न उठाकर उन्हें किसी और को सौंपने का आसान रास्ता अख्तियार करके आप कहाँ पहुँच सकते हैं। यह किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। अपनी ज़िम्मेदारी स्वयं उठाओ, अपने कर्मों और उनसे उपजे परिणामों की पूरी ज़िम्मेदारी आपकी है। समझिए कि जीवन का आनंद उठाने के लिए किसी गुरु की आपको कोई आवश्यकता नहीं है।

‘धार्मिक हूँ, अंधविश्वासी नहीं’ – संभव तो नहीं परन्तु यह सोच भी शुभ संकेत है – 11 फरवरी 2013

जब मैं धार्मिक लोगों और उनके अंधविश्वासों के बारे में लिखता हूँ कि धर्म कैसे उनके बीच मूर्खतापूर्ण और भय पैदा करने वाले विचारों का प्रचार-प्रसार करता है तो अकसर मुझसे यह कहा जाता है कि "मैं धार्मिक तो हूँ मगर अन्धविश्वासी नहीं हूँ!" मुझे विश्वास है कि आपने भी इस तरह की बात सुनी होगी। मगर मैं समझता हूँ कि ऐसा संभव ही नहीं है। इसके बावजूद मैं उनके इस सोच को भी एक सकारात्मक बात मानता हूँ। मैं अपनी बात समझाकर कहता हूँ।

सबसे पहले यह कि मैं क्यों कहता हूँ कि आप धार्मिक होते हुए अंधविश्वासों से अलग नहीं रह सकते। यह थोड़ा सा "धार्मिक" की परिभाषा पर भी निर्भर करता है लेकिन अगर आप वास्तव में, यानी उसकी स्थापित परिभाषा के अनुसार धार्मिक हैं तो इसका मतलब है कि आप किसी संगठित धर्म के धर्मग्रंथों पर भरोसा करते हैं। और ये धर्मग्रंथ अंधविश्वासों से भरे पड़े हैं। अब तक तो मैंने कोई धर्म नहीं देखा जिसके धर्मग्रंथों में अंधविश्वास के तत्व नहीं हों। अगर आप किसी ऐसे धर्म को जानते हैं तो आप कृपया मुझे उसकी जानकारी दें। तब तक मैं आपसे यही कहूँगा कि धर्म सैकड़ों सालों से समाज में अंधविश्वास फैलाता रहा है और आप धर्म को अंधविश्वास से अलग करके देख ही नहीं सकते। फिर भी जब मैं यह प्रतिवाद सुनता हूँ कि "मैं अंधविश्वासी नहीं हूँ मगर धर्म में विश्वास रखता हूँ!" तो मैं सोचता हूँ कि कम से कम इस व्यक्ति ने यह समझना शुरू कर दिया है कि अंधविश्वास एक बुरी चीज़ है। यह पहला कदम है। अगर किसी व्यक्ति के भीतर यह एहसास पैदा हो रहा है कि उसे अंधविश्वासी कहलाना पसंद नहीं है तो स्वाभाविक ही उसके भीतर यह भय पैदा हो गया है कि कहीं लोग यह तो नहीं समझते कि वह काली बिल्ली से डरता है या ऐसी ही किसी बेहूदी बात पर भरोसा करता है। वह ऐसे अंधविश्वासों के साथ अपने आपको सम्बद्ध नहीं करना चाहता मगर अभी धर्म के साथ बने रहने में उसे कोई दिक्कत नहीं है।

अधिकतर मामलों मुझे लगता है कि ऐसे लोग अभी धर्म को नकारने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं। कभी-कभी इनमें अंदरूनी संघर्ष भी दिखाई पड़ता है जैसे वे सोचते हैं कि इतने साल जो चीज़ें उन्होंने सीखी और जानी क्या वे सही नहीं थीं। किसी ऐसे विचार को स्वीकार करना, जो बचपन से जाने, सीखे और आपकी रगों में बसे विचारों से इतना भिन्न हो, बहुत मुश्किल होता है और इसमें समय लगता है। लेकिन एक समय आएगा जब आप यह बात समझ जाएंगे कि सौभाग्य हेतु लकड़ी ठकठकाना या इसी काम के लिए धार्मिक कर्मकांड करते हुए नदियों में दूध विसर्जित करना सिवा मूर्खता के कुछ भी नहीं है।

लेकिन ऐसी हिचकिचाहट के पीछे अक्सर बाहरी दबाव भी काम करते हैं। मैं अगर धर्म-कर्म न मानूँ तो मेरा परिवार क्या कहेगा? मेरे बारे में लोग क्या बातें बनाएँगे? ये और ऐसे ही बहुत से सवाल लोगों के मन में पैदा हो जाते हैं और इसके बावजूद कि वे धार्मिक विचारों से सहमत नहीं होते फिर भी उनमें इतनी हिम्मत नहीं होती कि उसके खिलाफ कुछ कह सकें। लेकिन अंधविश्वास इतने बेतुके और हास्यास्पद होते हैं कि उससे वे अब किसी तरह सम्बद्ध नहीं हो सकते।

मेरा विश्वास है कि भले ही किसी व्यक्ति के लिए अपने जीवन काल में पूर्ण रूप से धर्म छोडना संभव नहीं है मगर वह शुरुआत कर सकता है और अगली पीढ़ी उसे और आगे बढ़ा सकती है। यह हो सकता है और दरअसल यह हो भी रहा है। धर्म ने हजारों साल लोगों के दिमागों पर हुकूमत की है और उसके प्रभाव से मुक्ति किसी के लिए भी इतनी आसान नहीं है जब कि उसके चारों ओर का समाज आज भी धार्मिक ही है। लेकिन हम जानते हैं कि परिवर्तन की शुरुआत हो चुकी है और हम सकारात्मक और आशावान हो सकते हैं कि यह और तेज़ होगा और एक समय आएगा जब लोग यह कहने में झिझकेंगे नहीं कि "मैं न तो अंधविश्वासी हूँ न ही धार्मिक!"

आपका धर्म कहता है कि ईश्वर को सिद्ध करने की कोशिश मत करो-फिर आप तर्क क्यों करते हैं?-8 फरवरी 2013

जब भी मैं ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह व्यक्त करते हुए या ईश्वर पर अपने अविश्वास को ज़ाहिर करते हुए कोई ब्लॉग लिखता हूँ कुछ लोग मुझे गलत सिद्ध करने की कोशिश में लग जाते हैं. कभी-कभी ईश्वर पर विश्वास करने वालों और नास्तिकों में यह चर्चा शुरू हो जाती है कि ईश्वर है या नहीं. विशेषकर जब विश्वासु एक हिन्दू होता है तो मैं सोच में पड़ जाता हूँ कि वह इस वाद-विवाद में क्यों उलझ रहा है क्योंकि यह धर्म तो साफ़-साफ कहता है कि आप तर्क की सहायता से ईश्वर के अस्तित्व का प्रमाण प्राप्त नहीं कर सकते.

वेदों में कई जगह यह कहा गया है कि ईश्वर बुद्धि और तर्क से परे की चीज़ है और आप विचार-विमर्श करके या किसी से बात करके उसे नहीं जान सकते. निश्चित रूप से हिन्दू धर्म इस मामले में अकेला नहीं है जो अपने अनुयायियों को ऐसी अक्लमंदी प्रदान करने की कोशिश करता है. ईश्वर बुद्धि से परे है, आप उसका प्रमाण नहीं खोज सकते, इसलिए आप उस प्रमाण को खोजने की कोशिश भी मत कीजिए!

ईश्वर विश्वास का मामला है. आप अवश्य ही ईश्वर पर विश्वास कर सकते हैं; ईमानदारी से कहता हूँ, मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन आप इस प्रश्न पर बहस क्यों करना चाहते हैं कि वह है या नहीं! आपका धर्म ही आपसे कहता है कि आप इसकी कोशिश भी मत कीजिए! आप अपने ईश्वर को किसी सिद्धांत या दर्शन में सीमाबद्ध क्यों करना चाहते हैं?

अगर आप ईश्वर पर भरोसा करना चाहते हैं तो कीजिए, आपको ऐसा करने का पूरा अधिकार है. लेकिन इस बात का ध्यान रखिये कि यह आपका सिर्फ विश्वास है, आपका निजी विश्वास. किसी दूसरे को उसका प्रमाण देने की आपको कोई ज़रुरत ही नहीं है. किसी को अपने विश्वास का कायल करने की आपको क्या आवश्यकता है? यह सिद्ध करने की आपको क्या ज़रुरत है कि आप सही हैं और वह गलत! आपको ऐसा बिल्कुल नहीं करना चाहिए, आपका धर्म ही बताता है कि उस दूसरे व्यक्ति को ईश्वर का अनुभव करना होगा, उसे स्वयं महसूस करना होगा तभी वह ईश्वर पर विश्वास कर सकेगा.

सबसे बड़ी बात यह कि अपने विश्वास को प्रमाण की तरह इस्तेमाल न करें. आपका विश्वास प्रमाण नहीं है और वह हो भी नहीं सकता. विश्वास सिर्फ विश्वास है और विश्वास ही रहेगा. वह सच हो सकता है मगर यह आवश्यक नहीं है कि हो ही. बहुत से लोग भूत-प्रेत पर विश्वास करते हैं मगर वे नहीं होते. वे जोर देकर कहते हैं कि उनके पास प्रमाण है, वे प्रमाण खोजने की कोशिश करते हैं लेकिन उनका विश्वास सिर्फ विश्वास ही होता है! इसका मतलब यह नहीं कि वह सचमुच है! पुराने ज़माने में लोग और भी कई बातों पर विश्वास करते थे- कि धरती समतल है और आप बहुत दूर तक चलते जाएँगे तो किसी विशाल कुएं में गिर जाएँगे, कि सूर्य, चन्द्र और तारे सिर्फ हमारे लिए अस्तित्व में आए हैं और सूर्य पृथ्वी के चक्कर लगाता है. उनके लिए वही सच था, भले ही हम आज जान गए हैं कि उनकी बात गलत थी. आपको अपना विश्वास दूसरों पर लादना नहीं चाहिए.

मैं यह मानने के लिए तैयार हूँ कि आपका विश्वास आपको शांति प्रदान करता है, कि आप दुनिया में होने वाली बहुत सी बातों के लिए इस विश्वास को उत्तरदायी मानते हैं. यह विश्वास कि कोई है जो आपके हित-अहित का ख्याल रखता है, जिसने इस संसार को बनाया है और जो संसार में होने वाली एक-एक बात जानता है, आपके ह्रदय को आश्वस्ति और प्रेम से भर देता है. यह विश्वास आपके जीवन में आने वाली परेशानियों में आपको ढाढ़स बंधा सकता है, आपकी सहायता कर सकता है.

लेकिन अंततः यह आपका अपना विश्वास ही है और इसका यह मतलब नहीं है कि वह सही भी है. विश्वास प्रमाण नहीं है और इसलिए आपके धर्मग्रंथों के बहुत ही विवेकशील और ज्ञानी लेखकों ने शुरू में ही आपको सलाह दी है कि आप उसे सिद्ध करने की कोशिश भी न करें और न ही उसके बारे में कोई तर्क करें. इससे कोई लाभ नहीं होगा, उससे कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकेगा. आप अपने ईश्वर को अपने तर्कों की सीमा में बाँध देंगे और सामने वाले को उसका कायल भी नहीं कर पाएँगे. इस बात को स्वीकार करें कि यह आपका विश्वास है; उसी विश्वास के साथ जिएँ और दूसरों को भी उनके अपने विश्वासों या अविश्वासों के साथ जीने दें!

पापों को धोने वाला कुम्भस्नान – धर्म का सिनेमा स्वर्ग के टिकट को बेचता है – 23 जनवरी 2013

मुझसे यह पूछा गया कि कुम्भ मेले के बारे में सामान्यतः मैं क्या सोचता हूं इसके बारे में भी मैं आने वाले दिनों में कुछ विस्तार से लिखूं, जैसे कि मैने कल बताना शुरू किया था। इसलिये मुझे लगता है कि कुम्भ मेले से साधारणतः मैं क्या समझता हूं, थोड़ा इसके बारे में भी आपको बताऊं।

हिन्दू धर्म यह कहता है कि कुम्भ मेले के समय हमें वहां जाकर कुम्भ स्नान जरूर करना चाहिये। इससे आपके सारे पाप धुल जाते है और जब आपकी मृत्यु होती है तो आप स्वर्ग जाते है। आप अपना शेष जीवन नर्क में न बिताकर स्वर्ग में बिताते हैं। ये भी कोई बात है कि आप पूरी जिन्दगी पाप करते रहें और कुम्भ स्नान करते ही आपके सारे पाप धुल जायेंगे। इसका मतलब लोगों को पाप करने में भी कोई झिझक नही होगी क्योकि वो तो अपने सारे पाप धुल ही लेंगे। फिर आप के पास कोई अवगुण ही नही होगा सिर्फ गुण ही गुण होंगे और आपके अच्छे कर्म ही आपको स्वर्ग ले जायेंगे।

अतः धर्म यह बताता है कि आपके पुण्य काल्पनिक धन है जिसके माध्यम से आप स्वर्ग में जाने की टिकट खरीद सकते हो, ठीक उसी प्रकार से जैसे किसी फिल्म को देखने के पहले एक टिकट खरीदी जाती है जिससे आप सिनेमा देख सकें। अगर आप अधिक धनी है तो आपको और भी अच्छा स्थान दिया जायेगा। कुछ लोग ऐसे भी होते है जो फिल्मों का विज्ञापन देते हैं और टिकट भी बेचते हैं और हां धर्म तो यह चाहता ही है कि फिल्म हाउसफुल जाये और लोग पूरा-पूरा शो देखें। इसलिये विज्ञापनदाता हमेशा से यह कोशिश करते आ रहे हैं कि वह दर्शकों को लुभा सकें और बहुत सालों बाद उनकी कोशिशों का ही यह परिणाम है कि दर्शक स्वतः ही आ रहे हैं।

अगर आप इन गुरू, महात्मा, धार्मिक नेता, साधू और बाबाओं को विज्ञापनदाता के रूप में देखें तो आपको यह लगेगा कि इनकी पूरी कोशिश रहती है कि आप यह फिल्म पूरी देखें। अगर आपकी आंखे हैं तो आप यह देख सकते है यह सिर्फ एक कथा, भ्रम व एक नाटक है। कुम्भ मेले में कोई भी व्यक्ति बड़ी आसानी से यह सारी चीजें देख सकता है।

ये पुण्य लोग कुम्भ मेलें के मुख्य आकर्षण होते हैं, ये शिविरों में अपना प्रवचन देते है, धन के खिलाफ कर्मकाण्ड व आयोजन करते हैं और हां निश्चित रूप से नये अनुयायियों एक संख्या भी बढ़ा लेते हैं। समाचार पत्र में मैने एक तस्वीर देखी जिसमें आध्यात्मिक लोगों का एक समूह था, जिन्होंने भगवा वस्त्र, नारंगी पगड़ी पहनी हुयी थी और उनके हाथों में शस्त्र थे जैसे कि वो सैनिक हो। उनके पास पुराने समय की सिर्फ तलवारें और हथियार ही नही थे जिसका उल्लेख शास्त्रों में मिलता है बल्कि उनके पास बन्दूकें भी थी। अपने आग्नेयास्त्रों को पकड़े हुए हवा में वे गोली चला रहे थे क्योकि वह कुम्भ मेले का प्रारम्भ इस तरह गोली चलाकर ही करते है। इससे आपको धर्म का एक दूसरा ही चेहरा दिखता है।

इन गुरू, साधुओं और विज्ञापनदाताओं का एक ही मकसद रहता है कि लोग आये और उनके इस नाटकीय व भ्रमपूर्ण सिनेमा को देखें क्योकि अगले तीन साल के बाद कुम्भ मेला किसी अन्य स्थान पर आयोजित होगा और तब तक के लिये ये अपने अनुयायियों से किसी भी तरह से खूब धन इकट्ठा कर लेंगे, इसलिये इनका उद्देश्य रहता है कि ज्यादा से ज्यादा लोग वहां आये। जो लोग वहां जाते हैं वे भी इस बात को बदल नही सकते है कि यह सब नाटकीय और काल्पनिक है।

अब आपका प्रश्न होगा कि क्या इलाहाबाद के इस कुम्भ मेले में मैं शामिल होने जा रहा हूं तो इसका उत्तर है बिल्कुल नही, मेरा ऐसा कोई इरादा नही है। मैं इस बात को बिल्कुल भी नहीं मानता कि मलिन नदी में स्नान करने से किसी के सारे पाप धुल जायेंगे बल्कि यह मैं बहुत अच्छी तरह से समझता हूं ये धर्म, सिनेमा यह सब धन कमाने का एक ज़रिया है, और लोगों के मनोरंजन के लिये है। इस प्रकार मैं देखता हूं उस व्यक्ति के लिये इस मेले में शामिल होने का कोई मतलब नही बनता, जिसे यह मेला धर्म का एक मायावी चेहरा दिखाता हो।