आक्रामक टूरिस्ट गाइड्स भारत में स्वच्छंद घूमने-फिरने का मज़ा किरकिरा कर देते हैं – 11 अक्टूबर 2015

मैं पहले ही आपको बता चुका हूँ कि टूरिस्ट सीज़न शुरू हो चुका है और हमारे यहाँ आश्रम में कई मेहमान आ चुके हैं। स्वाभाविक ही वे भी बाहर घूमने जाते हैं लेकिन कभी-कभी उन्हें कई अप्रिय अनुभवों से गुज़रना पड़ता है-विशेष रूप से सामान बेचने वालों, गाइडों और आसपास मौजूद दूसरे भारतीयों के कारण। इसलिए हमने कुछ दर्शनीय स्थानों की अनुशंसा करना बंद कर दिया है। आज ही हमारे दो मेहमानों के साथ यहीं, वृंदावन में ऐसी ही एक घटना हुई!

जर्मनी से आई हुई दो महिलाएँ वृंदावन के कुछ दर्शनीय स्थल देखने निकलीं। वे वृंदावन के शाहजी मंदिर के पास स्थित निधि वन पहुँचीं और जैसे ही अपने इलेक्ट्रिक रिक्शा से उतरीं, उन्हें कुछ धार्मिक टूरिस्ट गाइडों ने घेर लिया, जो उन्हें मंदिर इत्यादि के दर्शन कराना चाहते थे और विशेष रूप से निधि वन के भीतर यहाँ से वहाँ घुमाना-फिराना चाहते थे, जहाँ हिन्दू आस्थावान मानते हैं कि हर रात भगवान कृष्ण नृत्य करते हैं। टूरिस्टों और तीर्थयात्रियों द्वारा अर्पित की जाने वाली दान-दक्षिणा में से घुमाने-फिराने वाले गाइड अच्छा-खासा कमीशन पाते हैं। स्वाभाविक ही, वे गैर-भारतीय टूरिस्टों और भक्तों को वहाँ की सैर कराने के लिए लालायित रहते हैं क्योंकि अक्सर वे दान-दक्षिणा में अच्छी ख़ासी रकम देते हैं।

तो इस तरह हमारी जर्मन मित्रों ने अपने आपको अचानक इतने सारे उत्तेजित पुरुषों के बीच घिरा पाया और सभी चाहते थे कि वे दोनों उनके साथ निधि वन की सैर करें। दोनों परेशान हो गईं और रिक्शावाला किसी तरह उन्हें निधि वन के द्वार तक छोड़कर आया। इस बीच सभी गाइड चिल्ला-चिल्लाकर उनसे उनकी सेवाएँ लेने की गुहार लगाते ही रहे। आखिरकार, हारकर उन महिलाओं ने उनमें से एक गाइड चुन ही लिया और तब जाकर बाकी सारे गाइड पीछे हटे और फिर उस रिक्शावाले पर अपना गुस्सा उतारने लगे, यहाँ तक कि उसके रिक्शे के टायरों को नुकसान पहुँचाने से भी बाज़ नहीं आए!

गाइड ने अपेक्षानुरूप हिन्दू मिथकों की बहुत सी कहानियाँ सुनाईं, कई जगहों पर उन्हें दान-दक्षिणा अर्पित करने पर मजबूर किया और अंत में अपनी सेवाओं के मुआवजे के रूप में तगड़ी रकम ऐंठने की कोशिश करने लगा। उनके बीच लगभग झगड़ा होने की नौबत आ गई, वह बहुत गुस्से में था कि उसके द्वारा अनुचित रूप से मांगी जा रही विशाल राशि वे देना नहीं चाहतीं। किसी तरह उनके बीच सहमति बनी-हालांकि उसने उनसे अच्छी खासी रकम ठग ली थी!

उनके लिए यह एक अच्छा-खासा रोमांचक अनुभव था और अंत में महिलाएँ अच्छे मूड में ही आश्रम वापस आईं-लेकिन उस पल उस अनुभव से गुजरना उनके लिए कतई सुखकर नहीं था और इसलिए वे दोबारा वहाँ जाने की सोच भी नहीं सकतीं। इसके अलावा भी हमारे कई मित्र विभिन्न दर्शनीय स्थलों से इसी तरह दुखी, व्यथित, विचलित होकर लौटे हैं, यहाँ तक कि कई बार भीड़-भाड़ के ऐसे हमलों के चलते उनकी आँखों में आँसू आ गए हैं!

इसीलिए हमने सबसे पहले पास ही स्थित एक दर्शनीय स्थान, बरसाना की अनुशंसा करना बंद कर दिया। यहाँ खूबसूरत मंदिर हैं लेकिन साथ ही बड़ी संख्या में जिद्दी भिखारी, आक्रामक गाइड और पंडे-पुजारी भी हैं! उसके बाद हमने फ़तेहपुर सीकरी जाने की सलाह देना बंद किया, जब कि सालों से ताजमहल देखने जाने वाला हर यात्री इस भुतहा शहर की बेहद सुंदर और अनमोल वास्तुकला देखने अवश्य जाता था। वहाँ के गाइड आपकी टॅक्सी को पार्किंग तक पहुँचने से पहले ही रोक लेते है और तब तक अलग नहीं होते जब तक कि आप उतरकर उनमें से किसी एक गाइड का चुनाव नहीं कर लेते या फिर जब तक कि आप जल्दी से उतरकर गाइडों और तरह-तरह का सामान बेचने वालों की भीड़ के बीच से बचकर प्रवेशद्वार की ओर निकल नहीं जाते!

कोई भी इन स्थानों को शांतिपूर्वक नहीं देख सकता! उन्हें देखने का मज़ा ही किरकिरा हो जाता है, वास्तव में दूसरों को अपने सामने से अलग करना लगातार संघर्ष जैसा महसूस होता है। स्वाभाविक ही, अक्सर इस पर काबू पाया जा सकता है-लेकिन काफी मशक्कत के बाद ही और उसके बाद उस स्थान का पूरा आनंद लेने की ताकत ही नहीं बची होती!

इसीलिए अब हम कुछ जगहों की अनुशंसा नहीं करते-और कुल मिलाकर यह भारतीय टूरिज़्म उद्योग को हानि पहुँचाता है! यह सबके लिए बुरा है: यात्रियों के लिए, क्योंकि वे स्वच्छंद घूम-फिर नहीं पाते, दर्शनीय स्थलों का आनंद नहीं ले पाते और दोबारा वहाँ आने से कतराते हैं; सामान बेचने वालों के लिए, जिनका व्यापार बढ़ सकता था अगर यात्री खुश होकर लौटते और, यहाँ तक कि सामान्य भले व्यक्तियों के लिए भी, जो वहाँ बेहतर माहौल बनाए रखना चाहते हैं या जो विदेशी यात्रियों की सुरक्षा की चिंता करते हैं, उन्हें इन आक्रमणों से बचाए रखना चाहते हैं! इन झूठे पंडे-पुरोहितों, आक्रामक गाइडों और सामान बेचने वालों के विरुद्ध कुछ न कुछ किया जाना बहुत ज़रूरी है जिससे लोग शांति और सुकून के साथ इस देश की पुरातात्विक सम्पदा और दर्शनीय स्थानों का भरपूर आनंद ले सकें!

सामान्य टूरिस्ट गाइडों से हम किस तरह अलग हैं? 22 जुलाई 2015

पिछले दो ब्लॉगों में मैंने आपको बताया कि कैसे हमारे आश्रम में एक टूर गाइड आया जो चाहता था कि अपने कमीशन में से एक हिस्सा हमें नियमित रूप से दे दे। बिल्कुल शुरू ही में मैंने ज़िक्र किया था कि आम टूर गाइडों से हम बहुत अलग तरह से यह काम करते हैं और इसी अंतर को अपने व्यापार के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं। ठीक इसी बात को और स्पष्ट करने के लिए मैं आज का ब्लॉग लिखना चाहता हूँ।

पिछले दो दिनों के ब्लॉग पढ़कर आप भी इस बारे में समझ गए होंगे। मैंने बताया था कि हमारे कर्मचारी लोगों से टिप (बख्शीश) नहीं माँगते, बल्कि इसके विपरीत, हम अपने मेहमानों से हमारे किसी भी कर्मचारी को टिप न देने की गुज़ारिश करते हैं। कारण है- समानता, निष्पक्षता। हम चाहते है लोग प्रसन्न और संतुष्ट हों। यह उनके लिए भी सच है जो यहाँ काम करते हैं और उनके लिए भी जो यहाँ विश्रांति प्राप्त करने या किसी प्रशिक्षण हेतु आते हैं या पर्यटक के रूप में आते हैं! संतोष की मुख्य बात यह होती है कि जो उन्हें प्राप्त होता है, उसकी जायज़ कीमत वे अदा करते हैं और कोई उनका गलत लाभ नहीं उठाता। हम सिर्फ ग्राहक नहीं बनाना चाहते, हम दोस्त बनाना चाहते हैं!

भारत भर के टूर और पर्यटन प्रस्ताव हम तब लेकर आए जब दोस्तों ने हमसे इनके लिए खुद कहा। उन लोगों ने कहा, जो पहले से हमें जानते थे और जो इस आशा से हमारे आश्रम में मेहमान बनकर आते थे कि हम उनके पर्यटन कार्यक्रमों की व्यवस्था में सहायता करेंगे। उन्हें आशंका होती थी कि कहीं उनके साथ धोखाधड़ी न हो, कोई दुर्व्यवहार न हो। कुछ लोगों के साथ पहले ऐसा हो चुका होता था और वे आश्वस्त होना चाहते थे, इसलिए हमारे पास आते थे कि हम उन्हें सही जानकारियाँ और घूमने-फिरने की उचित राय देंगे और मदद करेंगे।

इन सब बातों का ध्यान रखते हुए हमने यह प्रस्ताव रखा कि खुद मेरे भाई यशेन्दु और पूर्णेन्दु उनके साथ गाइड के रूप में जाएँगे और आज तक यही व्यवस्था लागू है। अगर वे यहाँ नहीं हैं तो हम कोई टूर कार्यक्रम नहीं रखते क्योंकि आज तक हमें ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिल पाया है, जो इतना विश्वसनीय हो कि अपने मेहमानों के साथ उसे भेजा जा सके। अपने मेहमानों को हम उसके भरोसे छोड़कर निश्चिन्त हो सकें। वास्तव में इसे हम अपना कर्तव्य समझते हैं कि अपने मित्रों को हर तरह के कमीशन व्यापार से मुक्त रखें, जिसमें सामान्य टूर गाइड खुले आम, धड़ल्ले के साथ लिप्त रहते हैं!

आप कल्पना नहीं कर सकते कि न जाने कितनी बार मेरे भाइयों को विदेशी पर्यटकों की खरीदी पर दुकानदारों ने 80-80 प्रतिशत तक कमीशन देने का प्रस्ताव रखा! लेकिन हम यह नहीं करते! वे आपके साथ दुकान पर खड़े होंगे और अगर आप चाहेंगे तो दुकानदार के साथ मोल-भाव भी करेंगे, जिससे आपको उचित कीमत पर आपकी मनचाही वस्तु मिल सके! जब आप पूछेंगे कि दुकानदार द्वारा बताई जा रही कीमत पर सामान खरीदना ठीक होगा या नहीं, वे आपको सच्चा और प्रामाणिक जवाब देंगे! जहाँ आप सैर करना चाहेंगे, जहाँ जाना चाहेंगे, वे पूरी कोशिश करेंगे कि आप उचित खर्च पर वहाँ जाकर वहाँ का लुत्फ उठा सकें। भारत में गाइडेड टूर लेना हो तो हमारे साथ दूसरी और सुविधाओं के अलावा यह एक अतिरिक्त लाभ भी आपको हो जाता है!

इसके साथ ही, हमारा ड्राईवर भी पूरी तरह विश्वास-योग्य है अतः जो भी उसके साथ कहीं आना-जाना चाहता है, निश्चिंत होकर उसके साथ कहीं भी जा सकता है। न दुर्घटना की चिंता, न ही पर्यटन-स्थलों से बाहर निकलने पर उसे खोजने की ज़रूरत। न कहीं भटकने का डर, न इस बात का कि वह किसी मिलीभगत वाली दुकान पर आपको ले जाएगा और बाद में आकर अपना मोटा कमीशन प्राप्त लेगा!

हम आशा करते हैं कि किसी न किसी दिन हमें एक ऐसा गाइड मिल जाएगा, जिस पर हम पूरा भरोसा कर सकेंगे लेकिन तब तक हमें खुद अपने आप पर निर्भर रहना होगा। लेकिन एक बात तय है, मैं किसी को भी एक ऐसे व्यक्ति के साथ कहीं नहीं भेज सकता, जिस पर मुझे पूरा भरोसा नहीं है कि वह उसके साथ धोखेबाज़ी नहीं करेगा!

और इसी बात पर, मेरे मित्रों, हम दूसरे गाइड टूरों से अलग हैं!

पूरी ईमानदारी के साथ बेईमानी – भारत में टूर-गाइडों का कमीशन व्यापार – 21 जुलाई 2015

कल मैंने आपको हमारे यहाँ से काम पाने की आशा से आए एक सरकारी मान्यता प्राप्त टूर गाइड के साक्षात्कार के बारे में बताया था। उसका कहना था कि लोग उसे जबरदस्ती पैसे दे देते हैं तो मजबूरी में लेना पड़ता है। मैंने आपसे कहा था कि आम तौर पर टूर गाइड, सीधे तौर पर या घुमा-फिराकर पैसों की उम्मीद रखते ही हैं। आज मैं जो उदाहरण आपके सामने रखूँगा, उससे आपके सम्मुख स्पष्ट हो जाएगा कि कैसे यह आदमी भी कोई अलग बात नहीं कह रहा था- बल्कि उसे लग रहा था कि वह हम पर कोई एहसान कर रहा है।

‘टिप’ (बख्शीष) पर उस आदमी के इस रवैये से मैं यह जान गया कि यह आदमी हम लोगों के लिए किसी काम का नहीं है। उसने आगे जो कहा, उससे मेरा यह शक सही सिद्ध हो गया:

‘फिक्र न करें, आप ब्राह्मण हैं, मैं ब्राह्मण हूँ, इसलिए मैं आपके साथ काम करने के लिए तैयार हूँ। मैं इन लोगों को बाज़ार की सैर कराऊँगा और कमीशन का हिस्सा नियमित रूप से लाकर आपको देता रहूँगा। हम लोग ब्राह्मण हैं, मै ईमानदारी से कमीशन का आपका हिस्सा आप तक पहुँचाता रहूँगा!”

अरे भाई, मुझे पता है कि भ्रष्टाचार के सभी कार्य पूरी ईमानदारी से किए जाते हैं! उसी तरह यह आदमी भी ईमानदारों का सरताज नज़र आ रहा था! वह पूरी ईमानदारी के साथ हमारे मेहमानों को ताजमहल के बिल्कुल आसपास स्थित अत्यधिक महँगी दुकानों पर ले कर जाएगा, उनको विश्वास दिलाएगा कि इन दुकानों द्वारा बेची जा रही घटिया वस्तुएँ सबसे अच्छी हैं, वैसी यादगार-निशानियाँ आगरा में कहीं और नहीं मिल सकतीं और उनसे उन दुकानदारों को दस गुना कीमत दिलवाएगा! पूरी ईमानदारी से वह दुकानदार से अपना कमीशन लेगा, हमारा हिस्सा अलग निकालकर बाकी अपनी जेब के हवाले करेगा!

इस प्रकार बहुत से लोग इन परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए काफी पैसा कमा लेते हैं, लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। हम ऐसे आदमी के साथ अपने मेहमानों को कैसे भेज सकते हैं?

बिदा लेने से पहले उस आदमी ने कहा: “यह अच्छा होगा कि एक ब्राह्मण दूसरे ब्राह्मण की मदद करे। मैं आपकी मदद करूँ, आप मेरी!”

मेरा मित्र इस आदमी को हमसे मिलवाने लाया था और मेरी बगल में बैठा था। सिर्फ यही कारण था कि मैंने अपने आपको यह कहने से रोक लिया: “आपको गलत जानकारी प्राप्त हुई है, मैं तो अछूत या निम्न जाति से हूँ! और अब आपने मेरे घर में पानी भी पी लिया है और चाय भी।”

मैं अपने मित्र को किसी असुविधाजनक स्थिति से दूर रखना चाहता था इसलिए मैंने इस तरह की कोई बात नहीं की। लेकिन मैंने फोन पर उससे साफ कह दिया कि ऐसे व्यक्ति की हमें ज़रूरत नहीं है। इसलिए जब तक हमें कोई ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिल जाता, जिस पर हम वाकई पूरा भरोसा कर सकें, तब तक हमारे मेहमानों की सभी यात्राओं में यशेंदु या पूर्णेन्दु ही साथ जाते रहेंगे!

क्या भारत में टिप की अपेक्षा न रखने वाला पर्यटन-गाइड मिलना असंभव है? 20 जुलाई 2015

स्वाभाविक ही, हमारे योग और आयुर्वेद शिविरों में विदेशों से आने वाले अधिकांश मेहमान पर्यटक होते हैं। हम खुद भी उन्हें गाइडेड पर्यटन के लिए उनके मनपसंद स्थानों पर ले जाते हैं या अपनी टैक्सी उनके साथ भेज देते हैं, जिससे वे भारत की सुंदरता को करीब से देख सकें। यही ‘टूर गाइड’ और ‘पर्यटक’ की परिभाषा है- लेकिन फिर भी हमारा दावा है कि हम सबसे बहुत अलग हैं। भारत के आम ‘टूर गाइडों’ से बिल्कुल अलग और इसके अलावा हमारे साथ हुए अनुभवों के चलते हमारे ‘पर्यटक’ भी सिर्फ पर्यटक नहीं बल्कि उससे बढ़कर कुछ होते हैं। आज मैं आपको बताना चाहता हूँ कि यह विचार मेरे मन में कैसे आया और क्यों मैं समझता हूँ कि ऐसा ही है।

एक दिन मेरा एक करीबी मित्र एक व्यक्ति को लेकर आया और मुझसे मिलवाया। क्योंकि मेरा मित्र जानता था कि हमारे यहाँ अक्सर ऐसे मेहमान आते रहते हैं, जो ताजमहल और आगरा के आसपास के दर्शनीय स्थलों की सैर करना चाहते हैं, स्वाभाविक ही, दोस्त को लगा कि हम उसे काम दे सकते हैं क्योंकि वह अधिकृत सरकारी गाइड था।

अधिकृत होने के कारण पहले-पहल हमें उसका व्यवहार बहुत पेशेवर लगा: एक दिन की आगरा यात्रा का फिक्स्ड रेट, एक व्यक्ति का इतना, दस के समूह के लिए एक ख़ास शुल्क और ज़्यादा लोगों के लिए कुछ और-लेकिन सब कुछ फिक्स्ड! वह इतिहास, इतिहास-पुरुषों और महिलाओं या ऐतिहासिक तारीखों का जानकार और ऐतिहासिक कहानी-किस्सों से पूरी तरह वाकिफ था और ग़रज़ यह कि, जो भी आप जानना चाहें, उसकी ज़बान पर मौजूद!

मैं उसे रखने के लिए तैयार हो गया और कहा कि फिक्स्ड रेट तो ठीक है मगर आश्रम आने वाले हर मेहमान के लिए हमारी एक शर्त होगी: आपके शुल्क का भुगतान हम करेंगे और आपके साथ जाने वाले हमारे मेहमान से आप अलग से एक रुपया भी नहीं माँगेंगे।

उत्तर मिला: ओह, मैं नहीं माँगूंगा। उसकी कोई बात नहीं, लेकिन आप तो जानते ही हैं, जब आप किसी के साथ बाहर होते हैं, उन्हें जानकारी देते हुए और जो कुछ भी बन पड़ता है, उनके लिए अच्छा से अच्छा करते हुए उनकी सेवा में हर वक़्त तत्पर होते हैं तो उन्हें भी लगता है, कुछ इनामो-इकराम दे दिया जाए! सभी देते हैं कुछ न कुछ, तब ऐसी हालत में क्या किया जाए?… जी, शायद वे आपको पकड़कर आपकी जेब में जबरदस्ती पैसे ठूँस देते होंगे? है न?

निश्चित ही ऐसा नहीं होता! हमारे बहुत से मेहमान अपने एक दिनी सफर में ऐसा करके देख चुके हैं और जबकि कुछ लोग टिप देना पसंद करते हैं, ज़्यादातर लोग टिप नहीं देते क्योंकि वे कार और गाइड-शुल्क सहित पूरे पैकेज का पूरा शुल्क अदा कर चुके होते हैं! यह सिर्फ यह दर्शाता है कि आप इसकी अपेक्षा रखते हैं कि कोई आपको टिप या बख्शीश दे, अन्यथा आप अपना काम पूरी ज़िम्मेदारी से नहीं करेंगे!

मैंने उससे कहा कि हमारे आश्रम में टिप देने की प्रथा नहीं है। बल्कि, सच्चाई यह है कि हम अपने ग्राहकों से कहते हैं कि हमारे कर्मचारियों को पैसे न दें! जो अनुभव उन्हें यहाँ प्राप्त होते हैं, जो सुविधा और सेवा वे यहाँ पाते हैं, उसमें बहुत से लोगों का योगदान होता है और अगर आप मालिशकर्ता या ड्राईवर को टिप देते हैं तो रसोइये या बगीचे के मालियों को कुछ नहीं मिल पाता, अनजाने में ही सही, उनकी उपेक्षा होती है। हम समानता के समर्थक हैं और इसलिए हम समय-समय पर सभी को उनके वेतन पर बोनस भी देते हैं। हमारे उस बोनस-फंड में कोई भी अपना योगदान दे सकता है।

लेकिन मैं जानता हूँ कि सामान्य रूप से टूरिस्ट-गाइड अपने तयशुदा शुल्क के अलावा अतिरिक्त पैसों की अपेक्षा भी करते हैं- सीधे तौर पर या घुमा-फिराकर! या तो वे सीधे तौर पर माँग लेते हैं या फिर पर्यटकों को अपने दोस्तों की दुकानों पर ले जाते हैं, जहाँ दुकानदार पर्यटकों से सस्ते स्मारक-चिह्नों की ऊँची कीमत वसूल करते हैं और लाभ में से गाइडों को उनके इस अनुग्रह का अच्छा-खासा कमीशन अदा करते हैं।

कल मैं आपको बताऊँगा कि कैसे यह व्यक्ति भी उन गाइडों से कतई अलग नहीं था- और कैसे हम उन सबसे वाकई बहुत अलग हैं!

3 तरह के लोग, जो हमारे आश्रम में रहना पसंद करते हैं – 12 फरवरी 2015

कल मैंने आपको बताया था कि हमारे पास धार्मिक रुचियों वाले कई लोगों के ईमेल आते हैं, जो हमारे आश्रम आना चाहते हैं लेकिन स्वाभाविक ही उनकी धार्मिक अपेक्षाओं को पूरा करना हमारे लिए संभव नहीं होता। मैंने यह भी बताया था कि कैसे उनके ईमेल या चिट्ठियों की पंक्तियों से या उनकी भाषा से ही आप उनके सोच की दिशा और उनके इरादे भाँप सकते हैं। यह सही है कि आश्रम आने की इच्छा व्यक्त करते हुए कभी-कभी हमें ऐसे सन्देश प्राप्त होते हैं लेकिन अधिकतर संदेश ऐसे लोगों के होते हैं, जो इनसे ठीक विपरीत विचार और भावनाएँ रखते हैं।

वास्तव में दूसरी तरह के ईमेल हमारे पास ज़्यादा आते हैं। खुले तौर पर धार्मिक लोगों के अलावा, जिनके बारे में मैंने कल लिखा था, तीन तरह के लोगों से आज आपको मिलवाना चाहता हूँ, जो हमसे आश्रम के बारे में पूछताछ करते हैं।

1) सामान्य स्त्री पुरुष जो तनाव मुक्ति की खोज में यहाँ आते हैं

पहले 'वर्ग' में वही 'मुख्यधारा' के लोग होते हैं, जो कॉर्पोरेट दुनिया की तनाव और भागदौड़ वाली ज़िन्दगी से ऊबकर और अपने काम की, घर की और आम जीवन की गुमनामी से आजिज़ आकर सुकून की खोज में यहाँ आते हैं। ये लोग जीवन में अकेलापन और अवसाद महसूस करते हैं और शान्ति, तनाव मुक्ति, यहाँ तक कि अपनी शारीरिक तकलीफों के इलाज के लिए यहाँ आते हैं। वे ऐसे उपाय चाहते हैं, जिनकी सहायता से उनके विभिन्न व्यसनों, शारीरिक व्याधियों का इलाज हो सके, कुछ ऐसे व्यायाम सीख सकें, जो उन्हें उनके मौजूदा दर्द से राहत प्रदान कर सकें और भविष्य में भी उन्हें होने से रोक सके।

निश्चय ही हर तरह के लोगों के लिए हमारे दरवाज़े खुले हैं क्योंकि हम जानते हैं कि योग और आयुर्वेद विज्ञान के अंग हैं, जो न सिर्फ शारीरिक व्याधियों में बल्कि मानसिक शान्ति के लिए भी बहुत उपयोगी हैं। हमारे आश्रम में कुछ दिन ठहरकर ही उन्हें बहुत लाभ हो सकता है-और हम जीवन के हर पड़ाव पर स्थित, हर स्तर के, हर क्षेत्र में काम करने वाले और हर जगह के लोगों को मित्र बनाकर और उनके बारे में जानकर खुश होते हैं!

2) स्वास्थ्य-सचेत लोग जिन्हें अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करने की लालसा होती है

हमसे पूछताछ करने वाले दूसरे प्रकार के लोग वे होते हैं, जो अपने शरीर और इस धरती के लिए निरापद वैकल्पिक जीवन-चर्या में रुचि रखते हैं। वे निरामिष, शाकाहारी, कच्चा खाने वाले, चिकित्सक, मालिश इत्यादि और वैकल्पिक चिकित्सा में दिलचस्पी रखने वाले और ऐसे ही कई तरह के लोग होते हैं। कोई भी, जो यह जानता है कि योग और आयुर्वेद उसे एक और दृष्टिकोण, अतिरिक्त ज्ञान और बहुत सी नई टिप्स और जीवन-शैली से परिचित कराएगा, उन्हें जानने-समझने में मदद करेगा, जीवन में नए परिवर्तन लाने में सहायक होगा।

हम इन लोगों का खुले मन से, बाहें फैलाकर स्वागत करते हैं और हमारे पास जो कुछ भी है, उनके साथ साझा करके खुश होते हैं और हम खुद भी उनके ज्ञान और अनुभवों से बहुत कुछ सीखते हैं। ज्ञान का आदान-प्रदान और एक दूसरे की सहायता-शानदार!

3) भारत यात्रा का सपना देखने वाले गूढ़ और रहस्यमय हिप्पी

गूढ़ और रहस्यमय बातों में रुचि रखने वाले लोग अगले वर्ग में आते हैं। ये लोग अपने आपको आध्यात्मिक या रूहानी कहते हैं लेकिन धार्मिक कहलाना पसंद नहीं करते। जो पुरुष और महिलाएँ दर्शन-शास्त्र और एक अलग तरह की जीवन-शैली में रुचि रखते हैं, जो दूसरों से, अपने समाज से अपने आपको ‘कुछ खास और अलग’ पाते हैं और उनके साथ तालमेल नहीं बिठा पाते। अपने आपकी खोज में वे अक्सर लंबी यात्राएँ करने के लिए तैयार होते है। इस बात को समझने के लिए कि आखिर वे क्या चाहते हैं, वे कौन हैं और उन्हें कौन सी बात खुश कर सकती है। वे अपने जीवन का गहरा अर्थ खोजना चाहते हैं और उसे योग और आयुर्वेद के माध्यम से समझने की कोशिश करने के लिए तत्पर हैं।

मैं हिप्पी शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ लेकिन बहुत से लोग, भले ही इस वर्ग में आते हों, अपने आपको इस नाम से जोड़ना नहीं चाहेंगे और इस ओर ध्यान नहीं देंगे। मैं जानता हूँ कि इन लोगों के लिए भी हमारे दिल खुले हुए हैं और हमें इस बात की खुशी है कि अक्सर हम इन लोगों के लिए स्वर्ग साबित हो सकते हैं, ऐसी शीर्ष जगह, भारत में आने के बाद जिनके यहाँ वे निःसंकोच भ्रमण कर सकते हैं-क्योंकि अक्सर देखा यह गया है कि यह देश उनकी उम्मीदों से बिल्कुल अलग सिद्ध होता है। जैसा कि मैंने कल बताया, निश्चय ही हमारे आश्रम में उन्हें एक ऐसी जगह मिल जाती हैं, जहाँ धार्मिक कट्टरता और कूपमंडूकता का कोई स्थान नहीं है। इस दीवाने मुल्क से हम धीरे-धीरे उनका परिचय करवाते हैं और अपने जीवन में उन्हें शामिल करके, अपने प्यार और जीवंतता से उन्हें अपना बनाकर, हम आशा करते हैं कि उनकी तलाश में, उनकी खोज में उनकी मदद कर सकेंगे।

सुन्दर द्वीप, ग्रान कनारिया को बिदाई – 30 जून 2014

आज हम ग्रान कनारिया से बिदा ले रहे हैं। बल्कि इस वक़्त जबकि मैं ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ, हम लोग जर्मनी वापस जाने के लिए हवाई जहाज़ पर सवार हो चुके हैं। अपरा मेरे साथ वाली सीट पर लेटी हुई है और उसके पैर मेरी गोद पर टिके हुए हैं। दरअसल वह नींद की गोद में समा चुकी है। इस सुन्दर द्वीप पर हमने बहुत शानदार वक़्त गुज़ारा और हमारी मित्र बेट्टी के सौजन्य से हम लोग बड़ी संख्या में कनारिया के बाशिंदों से मिल सके, बल्कि कहें, उन्हें और उनकी संस्कृति को करीब से जान-समझ सके। बेट्टी की बदौलत हम जान सके कि किसी द्वीप पर लोगों का जीवन हमसे बिलकुल अलग होता है!

स्वाभाविक ही, पहली बात तो यह कि आप हर वक़्त समुद्र के बहुत करीब होते हैं। ग्रान कनारिया पर इसका अर्थ यह है कि यहाँ आप कहीं पर भी हों, कार में एक घंटा किसी भी दिशा में निकल जाएँ, आप समुद्र किनारे होंगे-या तो वह खूबसूरत, रेतीला, मंथर लहरों वाला समुद्री बीच होगा या सीधे समुद्र में उतरने वाला पथरीला, सीढ़ीदार समुद्र किनारा या फिर काले गोल पत्थरों (पेबल्स) वाला बीच।

विशेषकर ग्रान कनारिया में, जोकि महाद्वीपों का लघुरूप है, आप लगभग सभी मौसमों और तरह-तरह के भूदृश्यों का आनंद ले सकते हैं: पहाड़ों पर चले जाइए, एक तरफ आल्प्स जैसा दृश्य होगा तो दूसरी तरफ चट्टानें होंगी, जो विशाल पथरीले पहाड़ों की याद दिलाएँगी। और बाकी जगहों में आपको लगेगा, आप ज्वालामुखी के द्वीपों पर खड़े हैं क्योंकि वहाँ आप लावा से बने हुए पहाड़ों को देखेंगे, जो आपको पिघलते आइसक्रीम जैसे नज़र आएँगे। मैंने सुना है कि यहाँ के एक द्वीप पर एक ज्वालामुखी दो साल पहले तक सक्रिय था!

लेकिन अगर आप कुछ अधिक दूर तक जाना चाहते हैं, आप किसी दूसरे देश की यात्रा करना चाहते हैं और अगर आप सीमा पार करके लम्बी यात्रा पर निकलना चाहते हैं तो आपको पानी का जहाज़ या हवाई जहाज़ लेना होगा। कोई दूसरा उपाय नहीं है। यहाँ जर्मनी की तरह नहीं है, जहाँ आप एक ही कार में सफ़र करते हुए कुछ घंटों में फ़्रांस, स्विट्ज़रलैंड, डेनमार्क और यहाँ तक कि इटली की यात्रा कर सकते हैं! यहाँ आपको हवाई जहाज़ या पानी का जहाज़ पकड़ना होगा। इस कारण आपको न सिर्फ अधिक पैसा खर्च करना होगा बल्कि समय का तालमेल भी रखना होगा, जिससे समय के अपव्यय से भी आप बच नहीं सकते। यहाँ पिछले हफ्ते हमें पता चला कि इसी कारण कनारिया निवासी सप्ताहांत अपने द्वीपों में गुज़ारना ही ठीक समझते हैं!

जी हाँ, यह सच है और हमें यह दिलचस्प लगा। दरअसल जर्मनी में भी आजकल इसका चलन शुरू हो गया है: अपने ही देश में छुट्टियाँ मनाने का चलन। लेकिन इसका अर्थ यह होता है कि आप आठ घंटे की सड़क-यात्रा करके उत्तरी समुद्र पहुँचिए और बीच के किनारे कोई होटल ले लीजिए। या इसके विपरीत, दक्षिण में एल्प्स की चोटियों पर स्कीइंग कीजिए! भारत में तो खैर तीन घंटे की हवाई यात्रा के बाद भी आप उसी देश में होते हैं!

ग्रान कनारिया द्वीपों पर लोगों को लम्बी सड़क यात्रा नहीं करनी पड़ती: वे सिर्फ अपनी कार निकालते हैं और एक या डेढ़ घंटे में किसी मनपसंद जगह पहुँचकर एक फ़्लैट किराए पर ले लेते हैं! यह जगह राजधानी में ही कहीं हो सकती है या सूर्य-किरणों से रोशन किसी समुद्री बीच पर या द्वीप के उत्तरी भाग में तूफानी समुद्र के किनारे स्थित मछुआरों की बस्ती में या पहाड़ की किसी चोटी पर, वहाँ के अद्भुत नज़ारों के बीच।

वे घर से बाहर रहते हैं इसलिए उसे छुट्टियाँ कहा जा सकता है। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि भारत में और यहाँ जर्मनी में भी, जहाँ मैं खुद को अजनबी नहीं समझता, दो घंटे की दूरी पर होने पर भी शाम को आप घर लौटना ही ठीक समझेंगे! यह सोचने का अपना-अपना तरीका है। इसके अलावा यह परिस्थितिजन्य भी है। यह सब आपके मस्तिष्क में घटित होता है। और इस तरह सोचने पर कहा जा सकता है कि आप अपने घर में भी छुट्टियाँ मना सकते हैं, बिस्तर से कदम नीचे रखे बगैर!

बस अपने नज़रिये को बदलने की ज़रूरत है-शायद दिमाग को ‘द्वीप-दृष्टि’ से देखना होगा! 🙂

ग्रान कनारिया में अपरा खूब मज़े लूट रही है – 26 जून 2014

कल ग्रान कनारिया और टेनेरिफ की यात्राओं के अपने अनुभवों के बारे में आपको बताने के बाद आज मैं सिर्फ अपनी नन्ही अपरा के बारे में और इस यात्रा में उसकी मौज-मस्ती के बारे संक्षेप में लिखना चाहता हूँ!

हम पहले से ही जानते थे कि यह एक चीज़ तो उसे ज़रूर भाएगी: समुद्र-तट (बीच)। मुलायम रेत का इतना बड़ा जखीरा उसे वहीं मिल सकता था और ऊपर से सोने में सुहागा कि पास में ही पानी का इतना विशाल कुंड! तो जैसी की अपेक्षा थी, जैसे ही हम बीच पर पहुंचे, और हम रोज़ ही कोशिश करते थे कि वहाँ जाएँ, वह रेत पर आलथी-पालथी मारकर बैठ गई और खेलना शुरू कर दिया! पहले उसने रेत में एक गड्ढा खोदा और उसमें पैर डालकर बैठ गई और पानी की बोतल को भी साथ रख लिया, जिससे वह ठंडी हो जाए! फिर रेत लेकर उससे खाना पकाने लगी और जब उससे भी मन भर गया तो ख़ुशी के मारे हँसते-खिलखिलाते रेत में लोटने लगी और पैरों, कपड़ों और टॉवेल को रेत में सराबोर कर लिया! जब मैं हाल ही में शल्यक्रिया हुए घुटने के लिए व्यायाम करने लगा तो वह भी मेरे पास आ गई और व्यायाम करना शुरू कर दिया। फिर मेरा टहलने का कोटा पूरा करने के लिए मेरे साथ रेत पर टहलती भी रही।

रमोना के साथ वह पानी में चली गई। हालाँकि स्वाभाविक ही, ऊँची लहरों से थोड़ा डरती भी रही लेकिन जब लहरें कुछ मंद होतीं तो उसके रोमांच से वह सिहर उठती और जैसे कह उठती-इसके बाद ऐसी लहर कब आएगी, जो पानी की ठंडी बौछार से मेरे चेहरे को भिगो दे! और जब लहर आती तो ख़ुशी में उल्लसित होकर चीख उठती!

लेकिन समुद्र से ज़्यादा उसे टेनेरिफ के छोटे से पानी के पूल में मज़ा आया, जहाँ लहरें नहीं थीं और जो उसकी ऊँचाई के लिए पूरी तरह उपयुक्त था। वहाँ दरअसल उसने पानी को दूर तक जाँचा-परखा भी और यहाँ तक कि दूसरे बड़े वाले पूल में मेरे साथ आकर मेरी पीठ पर सवारी करते हुए तैरने का मज़ा भी लिया!

बाहर सूरज की गर्मी में इन सब गतिविधियों के बाद अपरा का रंग थोड़ा साँवला पड़ गया। कुछ ज़्यादा ही। कल हम आपस में तुलना करते हुए मज़ाक कर रहे थे कि उसकी माँ का सबसे उजला रंग थोड़ा फीका पड़ गया है जबकि मेरे और यशेंदु के रंग में भी आप थोडा-बहुत अंतर पाएंगे मगर जब आप अपरा को गौर से देखेंगे तो उसकी बाँहें और पैर हमसे भी ज़्यादा काले पड़ गए हैं!

लेकिन ऐसा नहीं कि सिर्फ बीच पर ही अपरा ने मस्ती की हो! हवाई जहाज़ से उतरते ही, पानी के जहाज़ पर, हमारी मित्र बेट्टी से मिलने से लेकर उसके कुत्ते के साथ खेलते हुए, डांस पार्टियों में भाग लेने से लेकर जू में व्हेल और डोल्फिन शो का बारीकी से मुआयना करने तक अपरा ने सारी गतिविधियों का भरपूर मज़ा लिया!

वह अच्छी तरह जानती है कि आजकल हम लोग ग्रान कनारिया में रह रहे हैं और यह भी कि वह भारत या जर्मनी से अलग है। स्वाभाविक ही उसने यह नोटिस किया है कि यहाँ की भाषा भी अलग है! जबकि शुरू में वह बेट्टी के साथ जर्मन में बात करने का प्रयास करती रही मगर जल्द ही समझ गई कि बेट्टी उसकी बात समझ नहीं पाती है। वह इतनी समझदार है कि उसने कुछ समय बाद ही हमसे कहना शुरू कर दिया 'बेट्टी को उसकी भाषा में बताओ कि मैंने आज नई ड्रेस पहनी है!' या इसी तरह की दूसरी बातें। लेकिन बाद में उसे बेट्टी के साथ अकेले खेलने का मौका मिल गया और फिर उसने कुछ अंग्रेजी के शब्दों को आजमाना शुरू कर दिया और जल्द ही समझने लगी कि बेट्टी क्या कह रही है या क्या पूछ रही है और उसे दोहराने लगी। वैसे भी वह हर वक़्त अंग्रेजी सुनती रहती है इसलिए वह उसके लिए नई भाषा नहीं है।

लेकिन उसने यह तुरंत नोटिस किया कि स्पैनिश इन सबसे अलग है! जब बेट्टी के कुछ दोस्त हमारे साथ खाना खाने आए तो अपरा ने नोटिस किया कि वे लोग जो कुछ भी बोल रहे हैं वह उन सभी भाषाओँ से अलग है, जिनसे वह वाकिफ है-इसलिए उसने कुछ भी बोलना शुरू कर दिया, अलग-अलग भाषाओँ के शब्दों को बेतरतीबी से जोड़कर! संभव है उसने सोचा हो कि दूसरी भाषा में शायद इसी तरह बोला जाता है! हम सब सुनकर बहुत हँसे! वैसे इस बीच वह स्पैनिश भाषा के कुछ शब्द सीख गई है जैसे: ओला, वाले, वेंगा और ग्रासियास- और कल हिंदी और जर्मन मिलाकर मुझसे बोल रही थी: 'अब मैं स्पैनिश भी बोल लेती हूँ!'

हम लोग कितना आनंद ले रहे हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि जब हम अपरा को आनंद मनाते हुए देखते हैं तो हमारी ख़ुशी हज़ार गुना बढ़ जाती है-और इसलिए उसके साथ किसी जगह की यात्रा करना और उसे संसार का दर्शन कराना इतना सुन्दर है!

अपरा के यूरोप दौरे के फोटो यहाँ देखें।

इस यात्रा के अपरा के वीडिओ यहाँ देखें।

खूबसूरत ग्रान कनारिया द्वीप पर आनंद मनाते हुए – 25 जून 2014

ग्रान कनारिया के हमारे दौरे का यह अंतिम सप्ताह है और मैं सोचता हूँ, यहाँ की अपनी गतिविधियों की एक झलक आपके सम्मुख प्रस्तुत करने का यह उचित समय है। आपको भी तो पता चले कि यहाँ क्या चल रहा है, हम लोग क्या कर रहे हैं, कैसे इस सुंदर द्वीप की खुली वादियों में मौज-मस्ती कर रहे हैं!

क्योंकि अपने कुछ कार्यक्रम प्रस्तुत करने हम यहाँ आए हैं इसलिए शुरू में ही तरह-तरह की कार्यशालाएँ और कई व्यक्तिगत सत्र आयोजित कर चुके हैं। लेकिन हमारी प्यारी मित्र बेट्टी के साथ हमें न सिर्फ काम करने का बल्कि ग्रान कनारिया में घूमने-फिरने और वहाँ रहने वाले लोगों को नजदीक से जानने-समझने का मौका भी मिला कि वे कैसे जीवन बिताते हैं, उनका यह द्वीप कैसा नज़र आता है, यहाँ क्या-क्या देखने लायक हैं!

इसे महाद्वीपों का लघु रूप (miniature continent) कहा जाता है और हमने पाया कि यह बात पूरी तरह सच है। हम मज़ाक-मज़ाक में कहते रहते हैं कि यह भारत की तरह है, जहाँ साल के किसी भी समय किसी भी मौसम का आनंद लिया जा सकता है-फर्क सिर्फ इतना है कि ऊपर से नीचे तक इस द्वीप को कार द्वारा ज़्यादा से ज़्यादा तीन घंटे में पार किया जा सकता है! ग्रान कनारिया और कैनेरी द्वीप स्पेन के अधिपत्य में है मगर वास्तव में दोनों ही मुख्य भूमि से बहुत दूर हैं और अफ्रीका से ज़्यादा नजदीक पड़ते हैं। मोरक्को यहाँ से सिर्फ 95 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और आप आराम से जहाज़ से वहाँ पहुँच सकते हैं!

हम लोग यहाँ की राजधानी, लास पामास डी ग्रान कनारिया में रह रहे हैं। हमारा फ्लैट समुद्र किनारे बीच पर ही है-और इसलिए हम लगभग रोज़ ही बीच पर घूमने निकल जाते हैं! यह शहर द्वीप के दक्षिणी भाग में है मगर हमारे कुछ कार्यक्रम उत्तरी भाग में भी आयोजित थे और एक दिन हम उस तरफ घूमने-फिरने और पर्यटन के इरादे से भी चले गए थे। मैं अचंभित रह गया था: हम लोग विशाल सैंड ड्यून्स (रेट के टीलों) पर खड़े थे और जैसे सामने विशाल रेगिस्तान था और पीछे समुद्र! यह अद्भुत जगह मास पालोमास कहलाती है।

रेत के टीलों के बाद हम पर्यटन के लिए ग्रान कनारिया के सबसे मशहूर समुद्री बीच पर घूमने गए और एक बार फिर वहाँ की नर्म रेत और समुद्र का आनंद लिया। तो इस तरह निश्चय ही हम पर्यटकों के रूप में भी इस जगह पूरा-पूरा मज़ा ले रहे हैं-और यह सब उस जगह, जहाँ जर्मन पर्यटक इतनी अधिक संख्या में आते हैं कि यहाँ के सभी सूचना-पट्ट स्पेनिश और अंग्रेजी के अतिरिक्त जर्मन भाषा में भी लिखे गए हैं और रेस्तराँ में वेटर जर्मन भाषा भी बात करते हैं। यहाँ तक कि यहाँ जर्मन टीवी कार्यक्रमों की जानकारी युक्त पत्रिकाएँ भी प्राप्त हो सकती हैं।

एक दिन बेट्टी हमें पहाड़ियों पर ले गई-बहुत ऊंचे नहीं- और हमें इलाके के अंदरूनी हिस्सों में स्थित गाँवों, चित्ताकर्षक प्राकृतिक दृश्यों और वहाँ की सुन्दर इमारतों का दर्शन कराया। वहाँ हमें पर्यटक दिखाई नहीं दिए, केवल स्थानीय लोग अपने दैनिक कार्यों में लगे हुए। दरअसल यह द्वीप इतना छोटा है कि सिर्फ गाँवों में ही नहीं, पूरे द्वीप में अधिकांश लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते हैं! बेट्टी के साथ हम जहाँ भी गए उसके जान-पहचान का कोई न कोई मिल ही जाता-यहाँ तक कि ग्रान कनारिया से टेनेरिफ आते और वापस जाते हुए जहाज़ पर भी!

टेनेरिफ द्वीप कैनेरी द्वीप समूह का ही एक द्वीप है, जहाँ हम तीन दिन पहले गए थे। वहाँ हमारी तीन डांस-पार्टियाँ संपन्न हुईं-और थोड़ा पर्यटन भी। टेनेरिफ द्वीप पर आप और स्पष्टता से देख सकते हैं कि कैनेरी द्वीप-समूह ज्वालामुखी से उत्त्पन्न द्वीप-समूह है। सारे द्वीप पर कई ऊँची-नीची पहाड़ियाँ हैं और समुद्र किनारे आप देख सकते हैं कि यहाँ के पत्थर कभी पिघला लावा रहे होंगे और बाद में ठन्डे होकर पत्थरों और चट्टानों में तब्दील हो गए। वहाँ चट्टानों और नीले समुद्र के बीच रमोना, यशेंदु और बेट्टी ने तैराकी का खूब मज़ा लिया! बाद में, मैंने और अपरा ने भी स्वीमिंग पूल का एक चक्कर लगाकर कसर पूरी की!

और इस वक़्त मैं ज़ायकेदार, ताज़े संतरे के रस से भरे गिलास को उठाकर आप सभी शानदार मित्रों के लिए कामना कर रहा हूँ कि आपका समय भी इसी तरह खुशगवार हो- दुनिया में एक से एक जगहें हैं, जहाँ मित्रों और परिवार के साथ सुखद समय व्यतीत किया जा सकता है!

अपरा का पहला भारत-भ्रमण और उसकी मौज-मस्ती – 26 दिसंबर 2013

पिछले दिनों हमारे लखनऊ प्रवास के बारे में आपको बताने के बाद अब मैं चाहता हूँ कि इस सैरसपाटे में अपरा की मौजमस्ती और उसके अनुभवों के बारे में भी आपको बताऊँ कि स्थान परिवर्तन को और बहुत सी नई चीजों को उसने किस तरह देखा, अनुभव किया और उनके प्रति उसकी कैसी प्रतिक्रिया रही।

मैंने पहले आपको बताया था कि किस तरह गुरुवार की शाम ट्रेन में न चढ़ पाने को लेकर अपरा बहुत निराश हो गई थी और फिर कैसे अपने आपको दिल्ली विमान-तल पर पाकर खुशी से भर उठी थी। होटल में नई जगह को लेकर वह ज़्यादा परेशान नहीं थी; कोई हिचकिचाहट नहीं, सिर्फ जोश और उत्तेजना और हर नयी चीज़ की जांच-परख और हर चीज़ को जान-समझ लेने की उत्सुकता।

शाम के बाद जाकर ही कहीं वह थोड़ा सुस्ताई और खाना खाते समय थोड़ा मायूस दिखाई दी। होटल का खाना अच्छा था मगर वह वहाँ बैठने के लिए तैयार नहीं थी, रेस्तरां में उसकी चुलबुलाहट भी नज़र नहीं आई। बस, वह वहाँ से किसी तरह निकलना चाहती थी। तो हमने जल्दी-जल्दी अपना खाना खत्म किया और अपने कमरे की तरफ चले आए। हम सोच रहे थे कि हर हाल में खुश रहने वाली हमारी लाड़ली अचानक इतना चिड़चिड़ा क्यों रही है और कमरे की तरफ आते हुए हमें पता चला कि उसे घर की याद आ रही है!

इसलिए अपने कमरे में आकर हमने तुरंत स्काइप ऑन करके आश्रम कॉल किया और जब उसने सबसे बात कर ली तब जाकर उसके चेहरे पर संतोष और खुशी लौटी और फिर उसने अपने नए जूते उन्हें दिखाए और अपनी दिन भर के कारनामों के बारे में विस्तार से उन्हें बताया। और आखिर में पूरी तरह थककर नींद की आगोश में समा गई। नींद में भी उसके चेहरे पर हंसी खिली हुई थी।

पूरे सप्ताह में घर की याद का यही एकमात्र दौरा उस पर पड़ा और बाकी की छुट्टियों में वह पूरी तरह आनंद में डूबी रही! जब हम बाहर घूमने निकले, वह सो रही थी लेकिन जब एक बार उठी तो फिर, चाहे स्मारक स्थल हो या बाग़-बग़ीचा हो, इधर से उधर दौड़ना-भागना शुरू कर दिया। वह जहां जाती उसके आसपास दूसरे बच्चे इकट्ठा हो जाते और वह उनके साथ खेलना शुरू कर देती और कई बार वहाँ से कुछ न कुछ ले आती, जैसे एक बार बिस्किट ले आई थी।

एक बार बड़ा इमामबाड़ा में हुआ यह कि वहाँ हमें जूते उतारने थे। अपरा ने जूते उतार लिए परन्तु साथ ही मोज़े भी उतारना चाहती थी। वह मोज़े पहनकर फर्श पर खड़े नहीं होना चाहती थी, "मेरे मोज़े गंदे हो जाएंगे!" वह चीखी और जब हमने उसके मोज़े भी उतार दिये तभी मानी और फिर नंगे पाँव ठंडे फर्श पर चलते हुए उसे बड़ा मज़ा आया।

उसके लिए सबसे आकर्षक जगह थी चिड़ियाघर, जहां वह हमें एक एक जानवर दिखाने लगी। मगरमच्छ देखकर वह इतनी मंत्रमुग्ध हो गई कि मेरे मुख से पहले कई बार सुनी मगरमच्छ की कहानी बार-बार सुनना चाहती थी। मेरे मित्र मनीष की बेटी, अलीशा, जो उससे आधा साल बड़ी है, के साथ उसकी पक्की दोस्ती हो गई थी। वे दोनों हाथ में हाथ डाले, एक-दूसरे के कंधे पर बांह झुलाते घूमते रहे और बहुत देर खेलते-कूदते रहे।

इसके अलावा कुछ ऐसे जानवर भी थे, जिनके पास वह बहुत करीब चली जाती थी: मेरे फेसबुक मित्र अवधेश जी के कुत्ते से उसकी अच्छी ख़ासी दोस्ती हो गई थी, जो अपरा से उम्र में तो छोटा था मगर आकार में निश्चय ही बहुत विशाल था! जब वह अपरा से खेलने की कोशिश करता तो वह खुशी से चहक उठती और उसे हल्का सा छूकर किलकारी मारते हुए हमारी तरफ देखने लग जाती। शहर में हमने एक तांगा देखा और रिक्शा की जगह उसे किराए पर ले लिया-फिर तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह तांगे वाले से उसकी लगाम ले लेती और सगर्व हमसे कहती कि वह तांगा चला रही है!

इतवार को जब हम वापस लौटने के लिए ट्रेन में सवार हुए तब वह सो रही थी और चलती ट्रेन में सबेरे-सबेरे उसकी नींद खुली। आखिर ट्रेन में बैठने का उसका सपना पूरा हुआ था और वह इस बात से बहुत खुश हुई। मगर उसके लिए सबसे बड़ी खुशी थी घर वापसी! वापसी में भी ट्रेन पाँच घंटा लेट हो गई थी लेकिन हमें कोई परवाह नहीं थी। हम ट्रेन में बैठे थे और हमें वापस घर पहुँचना था। ट्रेन कभी भी पहुंचे हमें क्या फर्क पड़ने वाला था, विशेषकर तब, जब अपरा को कोई परेशानी नहीं थी और हम उसे प्रसन्नचित्त रख पा रहे थे। इसके अलावा उसके पास उसके खिलौने भी थे, जिनके साथ वह खेलती रही।

इस तरह हमने यह लंबा सप्ताहांत बहुत आनंद और उल्लास के साथ व्यतीत किया। मुख्य बात यह कि अपरा ने सफर के दौरान भरपूर मौजमस्ती की। अब हमें पता चल चुका है कि हम कहीं भी, कभी भी अपनी लाड़ली के साथ घूमने निकल सकते हैं!

अपने ही देश मेँ एक देसी सैलानी को विदेशी समझ लिया जाए तो? 25 दिसंबर 2013

स्वाभाविक ही, लखनऊ मेँ हम सिर्फ ख़रीदारी ही नहीं करते रहे बल्कि खूब घूमे-फिरे और लखनऊ वाले बहुत से मित्रों से मुलाक़ात भी की।

जब हम थोड़ा घूमने-फिरने होटल से बाहर निकले तो रिक्शा वाले ने, शायद मेरी विदेशी पत्नी को देखकर हमें विदेशी समझ लिया और दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित शहर के मुख्य दर्शनीय स्थलों तक की सवारी के लिए हमसे 1000 रुपए की मांग करने लगा। मैंने मज़ाक में कहा कि हजार नहीं, दो हजार ले लो! तो वह समझ गया और फिर पहले मांगी गई रकम के दसवें हिस्से 100 रुपए मेँ तैयार हो गया। लेकिन मैंने उससे कहा कि फ्री में भी ले जाएगा तो भी अब मैं उसके साथ नहीं जाऊंगा। फिर हमने दूसरे रिक्शे वाले से बात की और वह हमें आधे पैसे में यानी 50 रुपए में ले गया।

हम होटल से निकल रहे थे इसलिए रिक्शा वाले ने हमें टूरिस्ट समझ लिया, शायद भारतीय मगर विदेश में बसा हुआ और विदेशी पत्नी और विदेशी बच्चे वाला। हमें देखकर बहुत से लोगों को यही लगता रहा क्योंकि जब हम लखनऊ के मशहूर पर्यटन स्थल, बड़ा इमामबाड़ा पहुंचे और एक गाइड से कहा कि हमें गाइड की ज़रूरत नहीं है तो उसने आश्चर्य से कहा, “अरे! आप तो बड़ी अच्छी हिन्दी बोलते हैं!” हाँ भाई, मैं इसी देश में पैदा हुआ हूँ और हिन्दी मेरी मातृभाषा है! मैं जवाब देने जा रहा था मगर मेरी पत्नी ने मुझे मात देते हुए हिन्दी में कहा, “क्योंकि हम भारत में ही रहते हैं!” उस व्यक्ति का आश्चर्यचकित चेहरा देखने लायक था!

फिर भी भारतीय नागरिक की हैसियत से मुझे प्रवेश-पत्र के 50 रुपए अदा करने पड़े और रमोना के 500 रुपए लगे क्योंकि वह जर्मन है। गनीमत यह रही कि अपरा अभी 5 साल की नहीं हुई है और उसका कोई टिकिट नहीं लगने वाला था, अन्यथा हमें इस मुद्दे पर कर्मचारियों से बातचीत करनी पड़ती। रिक्शा वाला कुछ भी गलत नहीं कर रहा था; जब सरकार 10 गुनी कीमत वसूल कर सकती है तो रिक्शा वाला क्यों नहीं! 

हम इस बात पर बहुत हँसे और बाद में अपने मित्रों से मिले तो ये घटनाएँ उन्हें सुनाईं। उस दिन मेरे सबसे पुराने स्कूल के जमाने के मित्रों में से एक, मनीष हमें लखनऊ घुमाने साथ आया था। मैं पहले भी कई बार लखनऊ आ चुका हूँ लेकिन एक पर्यटक के रूप में नहीं, इसलिए इस बार हमने वहाँ बहुत रोमांचक और शानदार समय व्यतीत किया। विशेषकर अपरा और मनीष की छोटी बच्ची, अलीशा के साथ होने से हमारा घूमना बड़ा आनंददायक रहा।

पहले दिन हमने होटल में ही खाना खाया लेकिन शनिवार को मेरे एक और मित्र, अवधेश निगम ने हमें आमंत्रित किया था। वे मेरे फेसबुक मित्र हैं और एक बार हमारे आश्रम आ चुके हैं। उनकी पत्नी ने हमारे लिए बड़ा ही स्वादिष्ट भोजन तैयार किया था। उनके बेटे और बहू ने भी हमारे साथ भोजन किया और यह सोचकर मैं बड़ा खुश हुआ कि इंटरनेट ने मुझे इतने अच्छे मित्रों से नवाजा!

फिर रविवार को हम पूरा दिन मनीष और उसके परिवार के साथ रहे-उसके बच्चों के साथ चिड़ियाघर गए, कुछ ख़रीदारी की और फिर रात का खाना उनके साथ खाया। मनीष कई बार आश्रम आ चुका है और हर बार मुझे बुलाता रहता था कि लखनऊ आओ। आखिर अब जाकर यह अवसर आया था कि हम पति-पत्नी अपनी बेटी अपरा के साथ उनके सान्निध्य और उनकी खातिरदारी का मज़ा ले सके! वाकई हमने यही किया, एक-एक पल का आनंद उठाया।

यह हमारे इस सफर की सबसे बड़ी उपलब्धि थी: हमने छुट्टियाँ का आनंद लिया, घूमे-फिरे और साथ ही अपने मित्रों से मिले, उनके साथ, उनके घर में इतना सुखद और प्रेम में सराबोर वक़्त गुज़ारा!

यहाँ आप लखनऊ में बिताए हमारे सप्ताहांत के कुछ फोटो देख सकते हैं