क्या सोशल नेटवर्किंग साइट्स जीवन में अकेलापन पैदा कर रहीं हैं? 14 दिसंबर 2015

क्या सोशल नेटवर्किंग साइट्स जीवन में अकेलापन पैदा कर रहीं हैं

मैं कभी-कभी सोच में पड़ जाता हूँ कि अंततोगत्वा, लंबे अंतराल के बाद सोशल मीडिया का हमारे समाज पर क्या असर होगा। हालांकि सोशल नेटवर्किंग की शुरुआत ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को आपस में जोड़ने के उद्देश्य से की गई थी, मुझे लगता है कि वास्तव में वह लोगों में अकेलापन पैदा कर रही हैं।

मैं इस नतीजे पर कैसे पहुँचा? बहुत आसान है: मैंने इस बात पर गौर किया है कि अधिकतर लोग सोशल नेटवर्किंग साइटों पर क्या देखते हैं और उस पर उनकी प्रतिक्रिया क्या होती है! उन साइटों के साथ उनका संबंध अत्यंत विरोधाभासी होता है: ऐसा प्रतीत होता है जैसे वहाँ उन्हें अपनी पसंद का पर्याप्त मसाला नहीं मिल पा रहा है और वे बार-बार उन्हीं साइटों को खोलते हैं लेकिन फिर खिन्न होकर उन्हें बार-बार बंद भी कर देते हैं। जो कुछ वे देखते हैं, उसी से यह उदासी पैदा होती है: वे क्या देखते हैं? पार्टियाँ करते हुए, प्रसन्नचित्त होकर समय बिताते हुए और कुल मिलाकर जीवन का आनंद लेते हुए मित्रों के चित्र-परिवार के साथ, अन्य मित्रों के साथ, बहुत सारे लोगों के बीच!

और आप? आप यहाँ बैठे हैं अकेले, अपने मोबाइल फोन, टेबलेट या कंप्यूटर स्क्रीन पर टकटकी लगाए। आप उस मौज-मस्ती का हिस्सा नहीं हैं। पार्टी आपके बगैर जारी है। आपका कोई अपना, साथी या जीवन साथी, नहीं है जो आपको कैंडल लाइट डिनर पर बुलाकर अचरज में डाल दे, जैसा कि एक मित्र ने पोस्ट किया है। आप किसी हिप पार्टी में नहीं जाते, जहाँ हर व्यक्ति झूम-झूमकर नाचता-गाता है और उल्लास में सुध-बुध भूल जाता है। और लगता है, आप उन सब मित्रों से भी दूर हैं, जो इनका विवरण नेट पर पोस्ट करते हैं।

आपका सोशल नेटवर्क, जिसे आपको दूसरे लोगों से जोड़ने के लिए बनाया गया है, वही आपको पूरी तरह अपने हाल पर छोड़ देता है, अकेला और तनहा। वह अगर न होता तो आपको पता ही नहीं चल पाता कि दूसरे किस प्रकार आपकी अनुपस्थिति में आपस में मिल-जुलकर मौज कर रहे हैं। संभव है, तब आप घर में कोई किताब पढ़ते हुए या नहाते हुए या कोई भी अपनी मर्ज़ी का काम करते हुए अपने आप में मस्त रहे आते।

या, कम्प्यूटर के पर्दे को ताकते हुए, नेट पर लिखने के लिए कोई समझदारी से भरी बात पर अपना दिमाग खपाते हुए या ख़ुशी मनाते हुए अपनी कोई पुरानी फोटो तलाशते हुए आप भी वास्तव में बाहर निकल सकते हैं। दोस्त क्या-क्या मौज-मस्ती कर रहे हैं, इसकी ऑनलाइन ताक-झाँक करने की जगह आप किसी दोस्त को फोन कर सकते हैं, उससे रूबरू बात कर सकते हैं!

इस तरह सोशल मीडिया आपको अकेलेपन की ओर ले जा सकता है, जैसा कि इंटरनेट के आने से पहले संभव नहीं था। तब आप हर वक़्त उपलब्ध होते थे, तब आप अपने सभी स्कूली और कॉलेज के दोस्तों से, अपने कार्यालयीन सहकर्मियों से और अपने रिश्तेदारों से एक साथ और हर समय जुड़े होते थे।

इस बात को तब आप अधिक शिद्दत के साथ नोटिस करते हैं जब आप किसी परेशानी में होते हैं और किसी दोस्त की मदद चाहते हैं, जब आप संदेशों के ज़रिए तो लोगों के सम्पर्क में होते हैं लेकिन उनसे रूबरू सम्पर्क नहीं होता। क्योंकि जब आप पर आसमान टूट पड़ा है, आपको किसी गले लगाने वाले की ज़रूरत होती है, न कि किसी आभासी आलिंगन की। कोई वास्तविक कंधा, जिस पर सिर रखकर आप आँसू बहा सकें। कोई आपके पास आए और आपकी बात सुने, आपके वास्तविक जीवन में आपके साथ खड़ा होने वाला ऐसा कोई शख्स।

न भूलें कि सोशल नेटवर्क महज साधन है, ऐसी सुविधा, जिससे आप वास्तविक जीवन के अनुभवों को अधिक गतिशील और पुख्ता बना सकें, न कि वह यथार्थ का विकल्प है कि उसमें लिप्त होकर आप अपनी वास्तविक दुनिया से ही कट जाएँ। अपने सामाजिक जीवन में उसे आनंद-वृद्धि का साधन बनाएँ। उसके गुलाम बनकर उसे यह इजाज़त न दें कि वह आपको अकेलेपन और अवसादग्रस्तता की ओर खींच ले जाए!

संबंधों में आने वाली कठिनाइयों के समय मानसिक संतुलन न खोना – 27 अक्टूबर 2015

हमारी सभी समस्याएँ पैसे से संबंधित नहीं होती। कल के ब्लॉग में मैंने मुख्य रूप से सिर्फ उन समस्याओं पर अपने विचार व्यक्त किए थे जो व्यापार और वित्त से जुड़ी होती हैं लेकिन निश्चित ही कुछ दूसरी समस्याएँ भी होती हैं जो कभी-कभी आर्थिक समस्याओं से भी अधिक मुश्किल नज़र आती हैं: दोस्तों, रिश्तेदारों और सबसे बढ़कर, अपने जीवन साथी जैसे दूसरे लोगों के साथ संबंधों में पैदा होने वाली समस्याएँ या खटास! इन समस्याओं से कैसे निजात पाएँ?

पहली बात तो यह कि वही पुराना सिद्धांत यहाँ भी लागू होता है: कोई कदम उठाने से पहले समस्या पर शांत-चित्त होकर विचार करें। स्वाभाविक ही, किसी प्रियकर के साथ कोई कलह, कोई असहमति वाली बात या कोई वाद-विवाद, मतभेद या झड़प आपको बुरी तरह विचलित कर सकते हैं। आप बुरी तरह क्रोधित हो सकते हैं या आपको ऐसा लग सकता है कि आपका संसार टूटकर बिखर गया है, आपकी आँखों से आँसू निकल सकते हैं और विषाद से आप थर-थर काँपने लग सकते हैं। आप सोच सकते हैं कि आपकी बात सही थी या आप खुद अपनी करनी पर पछता रहे हो सकते हैं लेकिन फिर भी इससे आगे विचार करने से पहले या अगली कार्यवाही करने से पहले आपको अपनी भावनाओं पर काबू करते हुए अपना मानसिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए।

इसका अर्थ यह नहीं है कि आप सामने वाले के प्रति कोई कोई सहानुभूति न रखें या यही भूल जाएँ कि उसने आपके साथ कोई बुरा व्यवहार किया है! बल्कि इसका अर्थ यह है कि आप अपनी भावनाओं को समझने की कोशिश कर रहे हैं और जानते हैं कि उसका उद्गम क्या है। इसका विश्लेषण करें: आपके मन में इस तरह की भावनाएँ पैदा होने का मूल कारण क्या है? क्या सामने वाले की कोई बात इसका कारण है? या आपके किसी व्यवहार के चलते ऐसा हुआ है? आपको ऐसा क्यों महसूस हो रहा है? क्या वाकई ऐसा व्यवहार आपकी ओर से या सामने वाले की ओर से हुआ है या यह महज आपकी कल्पना है, जो आपको परेशान कर रही है?

मैं खुद भी बहुत भावुक व्यति हूँ लेकिन जबकि कुछ लोगों के लिए यह दिमागी प्रक्रिया बहुत जटिल और कष्टदायी लग सकती है, मेरा मानना है कि समस्या की जड़ तक पहुँचने के लिए कभी-कभी ऐसी पहेलियों से जूझना ही पड़ता है। अगर मैं इतना भावुक हूँ कि मुझे यह भी पता नहीं चल पाता कि मेरी भावनाएँ ऐसी क्यों है तो यह मेरे व्यवहार में भी व्यक्त हो सकता है।

अपने गुस्से पर काबू में न रख पाने के कारण लोग बड़े भयानक और हास्यास्पद अपराध कर बैठते हैं। बाद में अक्सर ऐसा होता है कि उन्हें समझ में भी नहीं आता कि ऐसा उन्होंने क्यों किया! वे क्रोधित थे-लेकिन गुस्सा उतरने पर वे अच्छी तरह जान रहे होते हैं कि उनका व्यवहार कतई तर्कसंगत और न्यायोचित नहीं था। कि किसी दुख या पीड़ा के चलते उन्हें क्रोध आया था, यह सही है लेकिन सामने वाला बेचारा यह भी नहीं जानता होगा कि उनकी पीड़ा का जिम्मेदार वह है।

इसलिए, अगर आपको पता चल जाए कि आप वैसा क्यों महसूस कर रहे हैं तो आप उस समस्या का समाधान निकाल सकते हैं।

अगर आपसे कोई गलती हुई है और अब आपको पछतावा हो रहा है तो मेरे खयाल से तुरंत माफी मांग लेनी चाहिए। लेकिन सामने वाले से आप यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि हर हाल में वह आपकी माफी स्वीकार कर ही ले लेकिन आपके लिए यह कदम उठाना और खुद अपने आपको यह तसल्ली देना कि आपसे गलती हुई थी और आपने माफी मांगली, उचित ही होगा। क्योंकि भले ही सामने वाले ने माफ नहीं किया लेकिन आपने कोशिश तो की। और इतना करने के बाद आप अपने मन में शांति का अनुभव करेंगे और प्रकरण को वहीं विराम देकर आगे बढ़ सकेंगे।

यदि सामने वाले ने आपके साथ कोई दुर्व्यवहार किया है, तब आपके पास मौका होता है कि आपको इस विषय में क्या करना चाहते हैं। आप उसके सामने अपनी भावनाएँ रख सकते हैं या यह तय कर सकते हैं कि आप इस विषय में आगे क्या करेंगे। ऐसी स्थिति में आपके पास क्रोध के आवेश में व्यक्त क्षणिक व्यवहार के अलावा अपने मन की वास्तविक भावनाओं के अनुरूप व्यवहार करने का मौका होता है।

अंत में यही कि कुछ भी हो, संदेश एक ही है: कोई भी समस्या सामने हो, आपका संसार टूटकर बिखरने वाला नहीं है। शांत बने रहें और इस बारे में विचार करें कि आप इस विषय में क्या कर सकते हैं!

क्या आपके ‘जीवन का सबसे खराब समय’ चल रहा है? उससे बाहर निकलिए! 9 सितंबर 2015

कल मैंने आपको एक आस्ट्रियन मित्र के बारे बताया था, जिसने मुझे फोन पर अपनी एक समस्या के बारे में बताया, जिस पर वह अपने करीबी मित्रों के साथ चर्चा नहीं कर सकता था। चर्चा के दौरान किसी बिन्दु पर उसने कहा कि जिन परिस्थितियों से वह अभी गुज़र रहा है, वह उसके जीवन का सबसे अशुभ समय है। अपने जीवन में न जाने कितनी बार मैं ये शब्द सुन चुका हूँ। मेरे सलाह-सत्रों में अक्सर लोग इस ‘अशुभ समय’ की चर्चा करते हैं और इसलिए मैंने सोचा, आज के ब्लॉग में कुछ पंक्तियाँ इसी विषय पर लिखी जाएँ- इन परिस्थितियों पर और उनसे उपजी अनुभूतियों पर।

जब भी आपको लगे कि आप ऐसी किसी परिस्थिति से गुज़र रहे हैं तो सबसे पहले उसे ठीक-ठीक जान-समझ लें। जब आपको पूरी तरह विश्वास हो जाए कि आप ‘जीवन के सबसे खराब समय’ से गुज़र रहे हैं, तभी आप शांतिपूर्वक चीजों को तब्दील करने का उपाय कर सकते हैं।

ऐसी परिस्थिति तब उत्पन्न होती है, जब जीवन में अचानक, अनपेक्षित और अप्रत्याशित परिवर्तन आते हैं; जब ऐसी बातें होती हैं, जिनसे निपटने की तैयारी आपने नहीं की होती, आपके पास सोचने का इतना समय ही नहीं होता कि इस परिस्थिति का मुक़ाबला कैसे किया जाए। कोई अपघात, बीमारी, प्राकृतिक आपदाएँ, अपने किसी प्रियकर की मृत्यु, नौकरी छूटना, जीवनसाथी, रिश्तेदारों या मित्रों से संबंध-विच्छेद या परस्पर संबंधों में छल-कपट का अंदेशा। स्वाभाविक ही, इनमें और भी बहुत सी बातें जोड़ी जा सकती हैं लेकिन मूल बात यह है कि ये बातें आपको निराश करती हैं, आप दुखी और इतने अवसाद-ग्रस्त हो जाते हैं कि आपका मस्तिष्क कोई सकारात्मक बात सोच ही नहीं पाता। अक्सर ऐसा इसलिए होता है कि कई चीज़ें, एक के बाद एक, बहुत तेज़ी से घटित होती हैं और वास्तव में सोचने का समय ही नहीं मिल पाता।

जिस किसी भी घटना के कारण आप उन परिस्थितियों से दो-चार हो रहे हों, उस पर ठहरकर समग्र विचार करें। समझने की कोशिश करें कि इस परिवर्तन का या इस परिस्थिति का ठीक-ठीक कारण क्या है और अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करें। थोड़ा सा समय इस दुख को दें क्योंकि जिसके खोने का दुख आपको हो रहा है या जो तकलीफ आपको पहुँची है, उसका बाहर निकलना आवश्यक है। यह पूरी तरह सामान्य बात है और आपको इस भावनात्मक दौर से गुज़रना ही होगा। और उसके बाद आप उससे बाहर निकल आएँ।

सुनने में आसान लगता है न? लेकिन अमल में लाना मुश्किल है! क्योंकि उसके प्रति आपका रवैया गलत है! असल में लोग उसकी छोटी-मोटी बातों के विस्तार को पीछे छोड़ना नहीं चाहते। वे उसके मामूली 'अगर-मगर' में उलझे रह जाते हैं- अगर यह होता तो क्या होता, वैसा होता तो अच्छा होता, आदि आदि- जबकि ये बातें उन्हें कहीं नहीं ले जातीं। वे घटनाओं के मुख्य हिस्सों को मन में दोहराते रहते हैं या किसी तरह उन्हीं पिछली बातों पर आने की कोशिश करते हैं और इस तरह वहीं गोल-गोल घूमते रहते हैं।

और जब अंततः समझ में आ जाता है कि यह संभव ही नहीं है, कितना भी संघर्ष या कोशिश कर लें, पीछे नहीं लौटा जा सकता तो अत्यंत निराश हो जाते हैं, अवसादग्रस्त हो जाते हैं। आप समय को वापस नहीं ला सकते, घटित हो चुकी बातों को अघटित नहीं किया जा सकता और अतीत के अपने कर्मों को आप बदलकर ठीक नहीं कर सकते। लेकिन जो हो चुका है, आपके सामने घटित हो रहा है, उस पर अपना सोचने का तरीका आप बदल सकते हैं, उस पर अपना नजरिया बदल सकते हैं-और इस तरह उस परिस्थिति से और उस पर अपने नकारात्मक सोच से पार पा सकते हैं।

जो हो चुका है, उसका विश्लेषण करने और उसे समझने के लिए आपको समय चाहिए। लेकिन एक समयांतराल के बाद आपको अतीत के बारे में सोचना छोड़ना ही होगा और यह समझना होगा कि आपके सामने, आगे एक नया सबेरा है। ये भावनाएँ और ये एहसासात ताउम्र नहीं रहने वाले हैं! अच्छा समय फिर आएगा और हमेशा से हम रोज़ सबेरे उठकर इसी दिशा में प्रयत्न करते हैं!

प्यार का कोई विलोम नहीं है – 7 सितंबर 2015

मेरे लिए प्रेम जीवन का एक प्रमुख विषय है। सदा से रहा है। वास्तव में मैं समझता हूँ कि अधिक से अधिक लोगों को अपने जीवन में प्रेम को अधिक से अधिक प्रमुखता देनी चाहिए क्योंकि उससे उन्हें लाभ हो सकता है। प्रेम पर चर्चा करने वाले लोगों यानी आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले लोगों के प्रचार के विपरीत मैं यह मानता हूँ कि प्रेम का विलोम कुछ भी नहीं है। ऐसी कोई विपरीत भावना नहीं है, जिसका अस्तित्व प्रेम की उपस्थिति में असंभव हो।

परस्पर विरोधी चीज़ें एक साथ नहीं रह सकतीं, ठीक? कोई व्यक्ति एक साथ लंबा और ठिगना नहीं हो सकता। तापमान एक साथ ठंडा और गरम नहीं हो सकता। आपके बाल एक साथ लंबे और छोटे नहीं हो सकते। इसी तरह लोग सोचते हैं कि घृणा या डर भी प्रेम के विलोम हैं। कई लोग मुझसे कहते रहते हैं: "जहाँ प्रेम होगा वहाँ घृणा नहीं हो सकती" या अगर "आपमें प्रेम का भाव है तो फिर डर के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।" मैं नहीं समझता कि ये दोनों वक्तव्य सच हैं।

मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि प्रेम दूसरी किसी भी भावना के साथ एक साथ रह सकता है! प्रेम छल के साथ रह सकता है, वह जूनून के साथ एक साथ रह सकता है। यहाँ तक कि प्रेम का अस्तित्व नापसंदगी (अरुचि) के साथ, अज्ञान या विरक्ति के साथ भी हो सकता है।

आपने भी ऊपर उल्लिखित एहसासों (भावनाओं) को प्रेम के साथ, एक साथ मौजूद देखा होगा लेकिन आप शायद कल्पना भी नहीं कर सकते कि घृणा और डर के साथ भी प्रेम अपना सहअस्तित्व बना लेता है।

क्या आपने कभी लव-हेट रिलेशनशिप नहीं देखी? क्या आपके सामने कभी भी ऐसी परिस्थिति उत्पन्न नहीं हुई, जहाँ ऐसा हुआ हो कि जिससे आप प्रेम करते हैं, उसने आपका कोई अहित किया हो? भले ही यह बहुत कम समय के लिए हुआ हो लेकिन जब आप क्रोधित या अपमानित हुए तो क्या उसमें कुछ मात्रा में घृणा भी नहीं मिली हुई थी। और उस समय, क्षण भर के लिए ही सही, क्या आपने यह नहीं सोचा कि आपके बीच प्रेम नहीं रह गया है।

इसी तरह मेरा विश्वास है कि भय के साथ भी यही होता है। वह भी एक ही समय में एक साथ मौजूद हो सकता है। आप प्रेम भी कर रहे हो सकते हैं और उसी वक़्त आपको डर भी लग रहा हो सकता है कि यदि आप कुछ ज़्यादा खुलेंगे तो पता नहीं क्या हो। क्या आपको फिर बुरा लगेगा? क्या आपकी बहुमूल्य भावनाओं का गलत इस्तेमाल कर लिया जाएगा? इससे आपके प्रेम पर कोई असर नहीं होगा लेकिन आप इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि उसी वक़्त आपके मन में भय भी मौजूद था- एक साथ दोनों!

तो यह बहुत स्पष्ट है: जितनी शिद्दत से मेरा भरोसा है कि प्रेम है, उतनी ही शिद्दत से मेरा मानना है कि उसके साथ डर या घृणा भी मौजूद हो सकती है। और ये दोनों भी महज नैसर्गिक भावनाएँ हैं, जिन्हें हम अपने अस्तित्व का हिस्सा मान सकते हैं!

पश्चिमी महिलाओं के साथ संबंधों के प्रति गंभीर हो रहे भारतीय पुरुषों और पश्चिमी महिलाओं के लिए कुछ टिप्स – 18 जून 2015

पिछले कुछ दिनों से मैं उन पश्चिमी महिलाओं पर ब्लॉग लिख रहा हूँ, जो भारतीय पुरुषों के साथ ऑनलाइन चैटिंग करने के बाद उनके प्रेम में लिप्त हो जाती हैं और फिर उनसे मिलने भारत चली आती हैं। इसी सन्दर्भ में एक ब्लॉग मैंने उन पुरुषों के बारे में भी लिखा था, जो समय काटने के लिए चैटिंग करते हैं और उसी ब्लॉग में मैंने एक स्थान पर ज़िक्र किया था कि अलग-अलग लोगों के साथ परिस्थितियाँ अलग-अलग हो सकती हैं। जैसे, एक क्षीण सी संभावना हो सकती है कि कोई भारतीय पुरुष इस मामले में वाकई गंभीर हो। आज का ब्लॉग मैंने इसी संभावना पर चर्चा करने के लिए सुरक्षित किया है- इस विषय पर अपने कुछ विचार, कुछ टिप्पणियाँ, जिन्हें आपको, इस रास्ते पर आगे कदम रखते हुए, याद रखना चाहिए।

सबसे पहले तो आप दोनों को बधाई कि इतनी भौगोलिक दूरी के बावजूद सिर्फ आधुनिक मीडिया की बदौलत आपको अपना मनपसंद साथी और प्रियकर मिल गया है! मैं आप दोनों के दीर्घकालीन और सुखी सहजीवन के लिए शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ। लेकिन साथ ही मैं चाहता हूँ कि पूरी गंभीरता के साथ वचनबद्ध होने से पहले आप अपने आपको तैयार कर लें। पुनः मैं कहना चाहता हूँ कि मेरे ये विचार उन लोगों के साथ मेरे वार्तालाप और अनुभवों का नतीजा हैं, जो ऐसी परिस्थितियों से गुज़र चुके हैं या ऐसे दंपतियों के साथ, जो भिन्न-भिन्न देशों और संस्कृतियों से संबंध रखते हैं।

जिस व्यक्ति को आप उसके लिखे शब्दों से या फोन पर बात करके और वीडियो संवाद के ज़रिए जानते हैं, पूरी संभावना है कि उसका सोचने का तरीका आपसे पूरी तरह भिन्न हो। निश्चित ही, आपके देश के भी सारे पुरुष और सारी महिलाएँ अलग-अलग व्यक्तित्व रखते हैं लेकिन यहाँ हम संस्कृतियों के बीच की गहरी खाई को भी उसमें जोड़ रहे हैं। और तब, आपके जीवन में पदार्पण करने वाले इस व्यक्ति को अपने जीवन में पूरी तरह समाहित कर लेना या पराए देश में रहकर अपने आपको पूरी तरह उसके जीवन में विलीन कर लेना आसान नहीं होगा। ऐसी-ऐसी दिक्कतें पेश आएँगी, जिनकी अभी, जब कि आपके जीवन की शुरुआत होने ही जा रही है, आप कल्पना भी नहीं कर सकते। इसीलिए मैं आपसे कुछ तैयारियाँ करने की गुजारिश कर रहा हूँ, जिससे ये मामले विशाल समस्याओं का रूप न ले लें।

किसी भी रूप में हो, ऑनलाइन संवाद एक बात है और वास्तव में दूसरे के साथ रहना, भौतिक रूप से एक छोटे से इलाके में, सीमित विस्तार और सीमाबद्ध वातावरण में एक साथ रहना बिल्कुल दूसरी बात है। हम समझ सकते हैं कि किसलिए ये पश्चिमी महिलाएँ यहाँ आती हैं और यहाँ आकर क्या जानने की कोशिश करती हैं: आपको दोनों में से एक देश में जाकर आपस में मिलना होगा और व्यक्तिगत रूप से मिलकर एक-दूसरे के व्यक्तित्व को जानना-समझना होगा!

दोनों में से कोई एक देश चुनें- लेकिन वीजा की पाबंदियों के कारण भारतीय पुरुषों के लिए पश्चिमी देशों की यात्रा के मुकाबले वहाँ की महिलाओं के लिए भारत की यात्रा करना आसान है। आप कोई अच्छी जगह चुन सकते हैं, जो स्वाभाविक ही व्यक्तिगत रुचि और आपकी परिस्थितियों पर निर्भर है। भारत के किसी अलग कोने में कोई जगह, जिसे एक तटस्थ स्थान कहा जा सके, बात करने के लिए बढ़िया जगह हो सकती है। महिला एक संयुक्त परिवार के घरेलू अनुभवों और झंझटों से विचलित होना नहीं चाहेगी और भारतीय पुरुष भी इससे बचना चाहेगा क्योंकि वह भी नहीं चाहेगा कि उसके परिवार में इसका अन्यथा अर्थ निकाला जाए।

आपको बार-बार और लगातार बात करते रहना होगा, जिससे चीज़े साफ़ हो सकें। विस्तार में जाने में ज़रा भी न हिचकिचाएँ और दूसरों की देखादेखी सिर्फ यही न पूछते रहें: 'तुम्हें यह अच्छा लगा?', 'तुम्हें वह कैसा लगा?' आदि। स्पष्ट बात करें कि आपकी क्या अपेक्षाएँ हैं, क्या अनिवार्य है और आप किन चीजों को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर सकते!

महिलाओं, भारत के बारे में आपके मन में जो भी पूर्वाग्रह हैं, सुनी-सुनाई बातें हैं, उन्हें साफ-साफ दूसरे के सामने रखें। उनमें से बहुत सी बातें सही हैं और आपके होने वाले जीवन साथी को चाहिए कि उनके बारे अपने विचार स्पष्ट करे, जिससे आप जान सकें कि उनमें खतरे के निशान तो नहीं हैं कि समय रहते अपने पैर पीछे खींच लिए जाएँ!

पुरुषों, पश्चिमी महिलाओं के साथ आप भी वही करें जो आपने उनके बारे में सुना है, उनकी जीवन चर्या और उनकी पसंद-नापसंद। वह सब पूछें जो आप हमेशा से पूछना चाहते थे और कुछ भी न छोड़ें-अगर आप चाहते हैं कि आप अपनी होने वाली जीवन साथी को सदा प्यार करते रहें तो उसके बारे में आपको पहले से सब कुछ जानना होगा!

मैं चाहूँगा कि आप किसी एक विशेष बिन्दु पर पहुँचें जो उभयनिष्ठ हो, कि आपके बीच प्रेम के अलावा भी अधिकतर बातें समान हों, अनुकूल हों। और यह भी कि याद रखें, एक शानदार संबंध की यह सिर्फ शुरुआत है!

मुझे इस विषय में लोगों की बहुत रुचि नज़र आई इसलिए मैं इससे संबन्धित कुछ और विषयों और प्रश्नों को, जिन पर आपको भी खुलकर चर्चा करनी चाहिए, अपने ब्लॉग का विषय बनाते हुए और अधिक विस्तार से लिखूँगा।

यदि आप पश्चिमी महिलाओं के साथ ऑनलाइन सेक्स चैट करने वाले भारतीय पुरुष हैं तो इसे अवश्य पढ़ें! 17 जून 2015

पश्चिमी महिलाओं की निराशा हमने अपनी आँखों से देखी है और उनके मुख से उनकी दास्तान सुनी है। उनकी निराशाजनक परिस्थितियों के बारे में मैं पिछले ब्लॉगों में आपको बता चुका हूँ। यह भी कि किस तरह वे भारतीय पुरुषों के साथ ऑनलाइन चैट करती हैं, उनके प्रेम में लिप्त हो जाती हैं, उनसे मिलने इतनी दूर भारत चली आती हैं। पिछले दो दिनों से मेरे शब्दों का रुख इन महिलाओं की ओर था लेकिन आज मैं यह ब्लॉग भारतीय पुरुषों के बारे में लिखना चाहता हूँ, जो इन परिस्थितियों की जड़ हैं।

मैं एक बार फिर स्पष्ट कर दूँ कि मेरे शब्द उन महिलाओं के अनुभवों पर आधारित हैं, जो ऐसी परिस्थिति से दो-चार हुईं और जिन्होंने यहाँ आकर अपनी दास्तानें हमें सुनाई हैं।

मेरे प्रिय भारतीय मित्रों, मुझे इस बात से कतई कोई एतराज़ नहीं होगा अगर आप मेरे मित्रों से सोशल नेटवर्क पर संपर्क करते हैं। अगर वे आपको जवाब देते हैं और आपके बीच मित्रता हो जाती है, चर्चाएँ होने लगती हैं, सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता है तो मैं आप दोनों के लिए बड़ा खुश होऊँगा, बधाई दूँगा! लेकिन याद रखिए, इस बात की पूरी संभावना है कि जिस महिला के साथ आप इस तरह की चर्चा कर रहे हैं, मुझसे संपर्क करके मुझसे आपके बारे में पूछे और आपके बीच होने वाली बातों की चर्चा भी करे।

अगर उसके बाद मुझे पता चलता है कि आप उनके साथ इश्कबाज़ी कर रहे हैं और वे अब आप से मिलने के लिए भारत आने का विचार कर रही हैं तो मैं उनसे सतर्क रहने की गुज़ारिश अवश्य करूँगा, जैसा कि मैं अपने पिछले दो ब्लॉगों में बता चुका हूँ। क्योंकि मैं जानता हूँ कि वे इस संबंध को लेकर बहुत गंभीर हैं जबकि हो सकता है कि आप इस बारे में गंभीर न हों।

मैं इस बात को बिल्कुल स्पष्ट कर देना चाहता हूँ: वास्तव में यह महिला इंटरनेट पर एक ऐसे व्यक्ति से प्रेम कर बैठी है, जो बहुत दूर बैठा है, जिसे वह बिल्कुल नहीं जानती और वह व्यक्ति आप हैं! आप जो कुछ भी उससे कह रहे हैं, उस पर और आपकी चिकनी-चुपड़ी बातों पर वह ईमानदारी से विश्वास कर रही है। मैं हमेशा प्रेम के खुले इज़हार के पक्ष में रहा हूँ और सभी को इस बात की स्वतंत्रता है कि वह अपनी मर्ज़ी से अपनी राह चुनें और अपने जीवन साथी की खोज करें- लेकिन वह आपके प्रेम में लिप्त हो गई है और मुझे संदेह है कि आप खुद अपने शब्दों को लेकर उतने गंभीर नहीं हैं जितनी कि वह है!

आप किसी की भावनाओं के साथ ऐसा खिलवाड़ क्यों करते हैं? हो सकता है, आप वास्तव में न जानते हों कि सामने वाला आपकी मज़ाकिया छेड़छाड़, लटकों-झटकों और इश्कबाज़ी को गंभीरता से ले रहा है। हो सकता है, आप समझ रहे हों कि ऐसी ऑनलाइन बातें वह आप जैसे दस और लोगों के साथ कर रही होगी, जैसा कि आप स्वयं दस और महिलाओं के साथ कर रहे हैं। यह भी हो सकता है कि किसी भारतीय महिला के साथ आपका अनुभव रहा हो कि World Wide Web पर उसने भी आपसे गुमनाम रहकर बातें तो की थीं लेकिन उसका कोई गंभीर नतीजा नहीं निकला था। आप लोग सिर्फ मज़ाकिया छेड़छाड़ करते रहे, इस बात का मज़ा लेते रहे कि आप दोनों, इंटरनेट पर ही सही, इतने खुले मन से आपस में सेक्स की बातें कर पा रहे हैं। सच बात तो यह है कि भारत में आप सेक्स के बारे में बात नहीं कर पाते, वास्तविक सेक्स तो कर ही नहीं पाते क्योंकि ऐसा करना हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। न तो आपने, न उस लड़की ने भी सोचा होगा कि कभी आपकी मुलाक़ात हो सकती है। भले ही आपने आपस में संभोग करने का सपना तक देख डाला हो!

मैं आपको एक बात बताना चाहता हूँ: एक पश्चिमी महिला के लिए यह सब पूरी तरह भिन्न होता है। उसकी संस्कृति अलग है। वह बिल्कुल दूसरी तरह से सोचती है और हो सकता है कि उसने यौनिकता के दमन की वैसी पीड़ा न भुगती हो जैसी आपने भुगती है। यही कारण है कि बिना वास्तविक सेक्स की संभावना के ऐसी सेक्स की चर्चा करना उसके लिए आवश्यक नहीं है। वह गंभीर है क्योंकि वह जीवन के ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ वाकई उसे एक आत्मीय, स्थिर और टिकाऊ संबंध की आवश्यकता है! वह कभी भी यहाँ, आपके दरवाजे पर आकर खड़ी हो सकती है और वह सब मांग सकती है, जिसे देने का वादा आपने ऑनलाइन किया था!

क्या आपको डर लग रहा है? बढ़िया! बढ़िया इसलिए कि अगर आप डर रहे हैं तो इसका अर्थ है कि आप वाकई इस मामले में गंभीर नहीं हैं और अगर गंभीर नहीं हैं तो आपको तुरंत इसे यहीं समाप्त कर देना चाहिए! आप जिस राह पर चल रहे हैं, वहाँ और आगे बढ़ने पर किसी के दिल पर ज़बरदस्त ठेस लग सकती है। उसके सामने स्पष्ट कर दें कि आप हँसी-ठट्ठा करके टाइम पास कर रहे थे, यह भी स्पष्ट करें कि आप कुछ साल बाद उस लड़की से शादी करने वाले है जिसे आपके अभिभावक आपके लिए चुनेंगे या आप वास्तव में शादीशुदा है और आप सिर्फ बातें करके मन बहलाना चाहते हैं। यह ठीक है और मैं दावा करता हूँ कि ज़्यादातर महिलाएँ इतना सब हो जाने के बाद भी एक मित्र के रूप में आपसे बात करती रहेंगी- लेकिन तब तक ही, जब तक कि आप उन्हें धोखा देने की कोशिश नहीं करते और उनके साथ झूठे वादे नहीं करते!

जिस भारतीय पुरुष के साथ आप प्यार और सेक्स के बारे में ऑनलाइन चैट कर रही हैं, वास्तव में वह आपके साथ विवाह क्यों नहीं करेगा! 16 जून 2015

कल मैंने एक बहुत महत्वपूर्ण मामले पर लिखना शुरू किया था: उन पश्चिमी महिलाओं के बारे में, जो भारतीय पुरुषों के ऑनलाइन प्रेम में पड़ जाती हैं और फिर इस आशा में कि शायद उन्हें एक जीवन साथी मिल गया है, उनसे मिलने भारत आ जाती हैं। जब कि मैं वास्तव में सकारात्मकता का समर्थक हूँ और चाहता हूँ कि लोग अपनी भावनाओं और इच्छाओं के अनुसार काम करें, इस मामले में मैं सतर्कता बरतने की सलाह भी दूँगा। हाल ही में हमने बहुत से ऐसे मामले देखे हैं, जिनकी परिणति निराशा और अवसाद में हुई है और इसलिए मैं एक बार पुनः स्पष्ट करना चाहता हूँ कि ऐसा क्यों होता है। आज मैं पुनः पश्चिमी महिलाओं पर ही अपना ध्यान केन्द्रित कर रहा हूँ लेकिन कल मैं उन भारतीय पुरुषों के लिए भी कुछ पंक्तियाँ लिखूँगा, जो इन महिलाओं की निराशा और उनके अवसाद का कारण बनते हैं।

मैं आपकी परिस्थिति समझता हूँ। आप उम्र के उस पड़ाव पर हैं, जहाँ आप बहुत कुछ देख चुकी हैं, किसी संबंध में स्थिर होने की आपने काफी कोशिश की है। आपको अपने हिस्से का प्यार और सेक्स प्राप्त हुआ है तथा उसी अनुपात में संबंध टूटने की कसक भी। अब आप एक परिपक्व महिला हैं, आप क्या चाहती हैं, यह आपको अच्छी तरह पता है और जो आप चाहती हैं वह बहुत ठोस, गंभीर और उदात्त है।

शायद आपने भारतीय संस्कृति के बारे में सुना है और वहाँ के युवकों के बारे में ये अच्छी बातें भी सुनी होंगी कि वे भोले-भाले होते हैं, दूसरों को धोखा नहीं देते और उनकी बहुत सी गर्लफ्रेंड्स नहीं होतीं बल्कि वे एक स्थिर और चिरस्थायी संबंधो के हामी होते हैं। आँकड़ों की भाषा में यह बात सत्य प्रतीत होती है लेकिन जब आप वाकई भारत की धरती पर कदम रखते हैं तो बहुत जल्द आपको उसके विडंबनापूर्ण कटु यथार्थ के दर्शन हो जाते हैं।

जिस पुरुष के साथ आप चैट करती रही थीं, वह एक युवक है, जिसे महिलाओं के साथ बर्ताव का बहुत थोड़ा सा अनुभव है या बिल्कुल ही नहीं है और जो अपने अभिभावकों द्वारा तय की गई लड़की से विवाह करने से पहले, कुछ वर्ष महज थोड़ी-बहुत मौज मस्ती चाहता है। अब उसके सामने एक विदेशी महिला के साथ रोमांचक समय गुजारने का अवसर उपस्थित हो गया है, जिसके बारे में उसके मन में सिर्फ एक विचार है कि वह ‘गोरी चमड़ी वाली है और आसानी से उपलब्ध’ हो जाती है।

यह आपको बहुत कटु और निष्ठुर बात लग रही होगी और मैं मानता हूँ कि इससे भिन्न प्रकरण भी हो सकते हैं लेकिन मैंने यह अनुभव किया है और ऐसे विचार रखने वाले बहुत से भारतीयों को देखा है, जिनके साथ सिर्फ पश्चिमी महिलाएँ ही इस स्थिति से दो-चार नहीं होतीं। बहुत से पुरुषों के लिए यह इससे ज़्यादा कुछ नहीं होता। वे जानते हैं कि आप किसी अन्य देश में, कहीं बहुत दूर बैठी हैं और इस बात की संभावना बहुत कम है कि आप वाकई उड़कर यहाँ आ जाएँगी और उसे ढूँढ़ना शुरू कर देंगी। वास्तव में वे नहीं समझते कि आप इस संबंध को इतनी गंभीरता के साथ ले रही होंगी!

आपकी यह बात सही है कि भारतीय पुरुष आम तौर पर आसानी से एक संबंध तोड़कर दूसरे संबंध पर नहीं लपकते। अधिकतर इसलिए कि उन्हें अधिक संबंध उपलब्ध ही नहीं हो पाते! शादी से पहले ऐसे किसी सम्बन्ध में लिप्त होना भारतीय संस्कृति में आम तौर पर संभव ही नहीं है, बहुत से परिवारों के लिए किसी अविवाहित बच्चे का कोई साथी होना अर्थात, संभवतः किसी के साथ सेक्स संबंध होना, किसी कलंक या हादसे से कम नहीं है! लड़कों को यह बात लड़कियों से भी अधिक ज़ोर देकर सिखाई जाती है क्योंकि लड़कियाँ पहले ही इस बारे में बहुत सतर्क होती हैं और किसी लड़के के साथ प्रेम और सेक्स के बारे में चैट करके कलंकित होने का खतरा मोल नहीं लेतीं।

यही बात आपको इस चक्र में खींच लाती है: आप उन देशों से आती हैं जहाँ लोग समझते हैं कि उनकी संस्कृति सेक्स को लेकर बहुत उदार और खुली है। यह सही है कि आपके देशों में लोग आसानी से यौन संबंध बना लेते हैं और एक-दूसरे के साथ जीवन-साथी के रूप में रहने लगते हैं, जहाँ दोनों एक-दूसरे का पूरा सम्मान करते हैं लेकिन बहुत से भारतीय इसे बिल्कुल दूसरी निगाह से देखते हैं। मुझसे अक्सर पूछा जाता है, 'तुम पश्चिमी देशों में जाते रहते हो, क्या वहाँ किसी के साथ भी सेक्स संबंध बनाना वाकई आसान है?' इसके अलावा कई पश्चिमी महिलाओं ने मुझे बताया है कि कैसे बिल्कुल अजनबी भारतीयों ने उनसे पूछा, 'आपके देश में तो ओपन सेक्स कल्चर है न?’ वास्तव में वे सोचते हैं कि पश्चिमी देशों में लोग बिना किसी भावनात्मक अनुराग के ही सेक्स संबंध बना लेते हैं- आखिर वे शादीशुदा तो नहीं होते! वे सोच ही नहीं पाते कि आप सारी भावनात्मकता के साथ किसी संबंध में लिप्त होते हैं!

अपनी आशाओं को उस दिशा में आगे बढ़ने की इजाज़त देने से पहले आपको यह भी समझना चाहिए कि आप उनके लिए विवाह योग्य प्रत्याशी नहीं हैं! सामान्य भारतीय अपने जीवन की योजना इस तरह बनाते हैं कि उनके माता-पिता उनका विवाह उनके धर्म और जाति की किसी युवा लड़की से तय कर देते हैं जो उनके लिए बच्चे पैदा करेगी और इस तरह वे अपने वंश को आगे बढ़ाएँगे।

यहाँ आप कहाँ फिट होती हैं? अधिकतर परिवारों में, जहाँ लगभग पूरी तरह परंपरागत मूल्यों का पालन किया जाता है, महज इसलिए भी आप स्वीकार योग्य नहीं होंगी कि आप भारतीय नहीं हैं, हिन्दू नहीं हैं और न उनकी जाति की हैं। इसके अलावा, शायद आप उस उम्र को भी पार कर चुकी हैं, जिसे वे बच्चे पैदा करने के लिहाज से उपयुक्त उम्र मानते हैं! एक औसत भारतीय व्यक्ति अपने परिवार वालों से बहुत जुड़ा होता है और यह मुश्किल है कि वह आपकी खातिर उनका दिल तोड़ दे। भारतीय पुरुष अपने माता-पिता की खुशी के लिए अपनी प्रेमिकाओं को, जिनका उनके जीवन में आना उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना होता है, बड़ी आसानी से छोड़ देते हैं और फिर परिवार की मर्ज़ी से विवाह रचा लेते हैं। एक विदेशी के साथ जीवन बिताने के लिए वे अपने परिवार के साथ शायद ही वैमनस्य मोल लें, जब कि वह विदेशी महिला स्वयं अपने बारे में बहुत आश्वस्त नहीं है।

अंत में इतना ही कहा जा सकता है कि वे सिर्फ मज़ा लेना चाहते हैं और इस संबंध को लेकर गंभीर नहीं होते। अगर आप भारत आकर उनके साथ झगड़ा करना चाहेंगी तो वे डर जाएँगे।

और यह सिर्फ युवकों के बारे में ही सच नहीं है! आपको कोई विवाहित पुरुष भी मिल सकता है जो प्यार और सेक्स की बातें करने के लिए आपको मनाने के उद्देश्य से कुछ भी कह सकता है, जैसे यह कि उसकी पत्नी मर गई है या उसका तलाक हो चुका है। हो सकता है, उसका विवाह उतना सुखद न रह गया हो और वह अपनी पत्नी से अक्सर दूर रहना ही पसंद करता हो। वह मात्र आपके साथ सेक्स की बातें करके या एकाध बार स्काइप पर रूबरू चैटिंग करके ही संतुष्ट हो सकता है। लेकिन जब आप भारत आ जाती हैं तो आपसे मिलने की उनकी हिम्मत ही नहीं होती क्योंकि उन्हें डर लग रहा होता है कि कहीं उनकी पत्नियों को पता न चल जाए। या फिर वे आपसे सिर्फ एक रात के लिए भर मुलाक़ात कर लेते हैं और पुनः आपको हमेशा के लिए निराशा के गर्त में धकेल देते हैं।

आखिर में, मैं आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि इंटरनेट की दुनिया यथार्थ नहीं है। मेरे भी फेसबुक पर बहुत से मित्र हैं और आप आपस में दोस्त हो सकते हैं लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ। मैं किसी के भी बारे में कोई गारंटी नहीं दे सकता, इसलिए कृपा करके यह मत सोचिए कि सिर्फ इसलिए कि वे मेरे संपर्क में हैं, वे ईमानदार हैं, नैतिक रूप से सच्चे हैं या बहुत अच्छे लोग हैं।

आप कुछ भी करें, कहीं भी दिल लगाएँ, मगर सतर्कता पूर्वक। अगर आप वास्तव में इस आदमी से मुलाक़ात करना चाहती हैं, कम से कम उससे मिलने की कोशिश करना चाहती हैं तो यहाँ, भारत में हमारे दरवाजे आपका स्वागत करने के लिए हमेशा तैयार हैं। इतना याद रखें कि परिस्थितियाँ आपकी अपेक्षा से बहुत अलग भी हो सकती हैं।

भारतीय पुरुष, जैसा कि वादा है, मैं आपके लिए कुछ पंक्तियाँ कल लेकर आऊँगा।

प्रेम आपके जींस से ज्यादा महत्वपूर्ण है – 23 फरवरी 2014

पिछले सप्ताह मैंने एक माँ के बारे में आपको बताया था, जो अपनी 18 वर्षीय बेटी को लेकर मेरे व्यक्तिगत सत्र में आई थी। उसने अपनी बेटी के 18वें जन्मदिन पर उसे बताया कि जिस व्यक्ति ने उसका लालन पालन किया था और जिसे वह अपना पिता मानती है वह दरअसल उसका जैविक पिता नहीं है। लड़की का जैविक पिता एक और व्यक्ति था, जिसके साथ अतीत में उस महिला का कुछ दिनों का विवाहेतर संबंध रहा था मगर अब उसके बारे में वह कुछ भी नहीं जानती थी। अब यह ज़िम्मेदारी मुझ पर आ पड़ी थी कि उस लड़की से बात करूँ जो, स्वाभाविक ही, मानसिक रूप से बुरी तरह हिल गई थी।

माँ व्यथित थी और अपराधबोध से ग्रसित नज़र आ रही थी क्योंकि उसने अपनी बेटी को इस मानसिक हड़कंप में डाल दिया था। उसने विस्तार के साथ मुझे बताया कि क्यों उसने इतने लंबे अंतराल के बाद अपनी बेटी पर यह रहस्य उजागर किया। दरअसल बेटी को इतने साल झूठ और धोखे में रखना उसे अनैतिक लग रहा था और यह अपराधबोध उसे भीतर से खा रहा था। इस झूठ को उसने अपने दिल में छिपाकर रखा था और उसे लगता था कि उसके बढ़ते बोझ से एक दिन वह फट पड़ेगा।

और मैं सोच रहा था कि इतने लंबे अंतराल के बाद इस सत्य को उजागर करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। लड़की अब बालिग हो चुकी थी और इस भयावह सच से दूर, जिस स्थिति में थी, उसी में खुश थी। यह सत्य उसे कोई लाभ नहीं पहुँचाने वाला था। उसकी चिंता करने कोई और व्यक्ति नहीं आने वाला था क्योंकि उस व्यक्ति का कोई संपर्क-सूत्र उनके पास नहीं था। इसके विपरीत इस रहस्योद्घाटन से उसने उस पिता को भी खो दिया था, जिसे वह पिता मानती आई थी और जो हमेशा-हमेशा के लिए उसका पिता रहा आता! लेकिन अब ये विचार व्यर्थ थे क्योंकि उसने पहले मुझसे कोई सलाह नहीं ली थी। तब मैंने लड़की से बात की।

लड़की के दिमाग में वह पुरुष, जिसके जींस वह लिए हुए थी, पूरी तरह मौजूद था। मैं उससे किस तरह मिल सकती हूँ? अगर मैं उसकी खोज करूँ और पा जाऊँ तो वह मेरे साथ कैसा व्यवहार करेगा? और मेरे माँ के पूर्व-पति का क्या, जिसे मैं अपना पिता मानती हूँ? समझ में नहीं आता क्या सोचूँ, क्या करूँ। मैं सिर्फ बैठकर रो सकती हूँ क्योंकि मेरा सारा जीवन ही झूठ का पुलिंदा बन गया है! मैं आज तक एक झूठी ज़िंदगी जी रही थी! मुझे महसूस होता है जैसे मेरे शरीर का कोई महत्वपूर्ण हिस्सा मुझसे टूटकर अलग हो गया है!

मैंने उससे कहा कि वह अब एक वयस्क है और चीजों को देखने-समझने का उसके पास एक परिपक्व नज़रिया होना चाहिए। एक मजबूत महिला की तरह उसे अपने भीतर इस झटके को, जो महज एक जानकारी है, झेलने की हिम्मत पैदा करनी चाहिए और उसे देखना चाहिए, जो पीछे छूट रहा है: तब वह पाएगी कि वास्तव में कुछ भी नहीं बदला है।

मेरी नज़र में यह बिल्कुल महत्वपूर्ण नहीं था कि कौन उसका जैविक पिता है। आप उसका नाम नहीं जानते, उसके बारे में अब तक कभी सोचा भी नहीं और उसके बगैर आपने किसी बात की कमी भी महसूस नहीं की-अब उसकी कमी क्यों महसूस हो? अब वह अचानक इतना महत्वपूर्ण क्यों हो जाए कि उसके विचार मात्र से आप अपनी ज़िंदगी तहस नहस कर बैठें?

अगर आप मजबूत नहीं हैं तो यह बात आपको भ्रमित करती रहेगी। इसके विपरीत अगर आप उसे सही परिप्रेक्ष्य में देखने की हिम्मत जुटा लें तो पाएंगे कि आप अब भी उसी ठोस ज़मीन पर खड़े हुए हैं, दुनिया में आपकी जगह ज़रा भी नहीं बदली है। जिस पुरुष ने आपका लालन-पालन किया और जो आपसे प्रेम करता है और जिससे आप भी बहुत प्रेम करती हैं वही हमेशा आपका पिता था और हमेशा-हमेशा के लिए आपका पिता बना रहेगा! आपका जींस उस प्रेम के सामने कोई मानी नहीं रखता, जो उस व्यक्ति से आपको अब तक प्राप्त होता रहा है और आगे भी जीवन भर प्राप्त होता रहेगा!

आप जैसी भी हैं, एक परिपूर्ण व्यक्ति हैं और सबसे पहले आपको अपने जीवन में स्थिरता प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए। बाद में अगर आपका दिल चाहे तो उस व्यक्ति की खोज भी कर सकती हैं मगर इस खोज से कोई बड़ी आशा न रखें। यह खोज तभी शुरू करें जब आपको लगे कि उस खोज के परिणाम आपकी मौजूदा ज़िंदगी पर कोई असर नहीं डाल पाएंगे।

वही बने रहें जो आप अब तक थीं। प्रेम आपके जींस से ज़्यादा महत्वपूर्ण है!

जनवरी से जून 2013 तक के अपने जीवन की समीक्षा – 31 दिसंबर 2013

साल का यह आखिरी दिन है। ये 365 दिन इतनी तेज़ी के साथ गुज़र गए कि आश्चर्य होता है! हर साल की तरह यह साल भी घटनाओं से भरा हुआ और भावपूर्ण रहा और मैं इस वर्ष में हुए अपने व्यक्तिगत अनुभवों की समीक्षा को आपके साथ साझा करना चाहता हूँ।

जनवरी

जनवरी 2013 में हमारे आश्रम में कुछ मित्रों का आगमन हुआ और हमने उनके साथ साल की शुरुआत की। इस तरह नए साल के स्वागत के लिए थॉमस, आइरिस और कुछ दूसरे मित्र हमारे साथ थे। इसलिए वैसे तो जनवरी की शुरुआत बहुत आह्लाददायक रही मगर कुछ समय पहले हुए अम्माजी के देहावसान के दुख की छाया से भी हम पूरी तरह बच नहीं सके। दर्द अभी ताज़ा था और अपने मित्रों के साथ अम्माजी को याद करते हुए कई बार हमारे आँसू निकल पड़ते थे।

इसी कारण इस साल अपरा के जन्मदिन पर हमने कोई बड़ा समारोह आयोजित नहीं किया। फिर भी उसके लिए उपहार खरीदे गए और स्वाभाविक ही वह उन्हें पाकर बहुत खुश हुई। उपहार और सबका अवधान (तवज्जो)-ऐसा कौन सा बच्चा होगा जो इन्हें पाकर खुश नहीं होगा!

फरवरी

फरवरी में आयुर्वेद और योग के हमारे कार्यक्रम शुरू हुए और अपने आश्रम में हमें कुछ समूहों का स्वागत करने का अवसर प्राप्त हुआ। उस समय हमें पुनः वही चिरपरिचित अनुभव हुआ कि अनुचित अपेक्षाएं लेकर आने वाले लोगों को खुश करना हमारे लिए संभव नहीं होता। लेकिन जो लोग पूर्वसूचना देकर आश्रम में आए थे, उन लोगों ने यहाँ बहुत सुखद समय व्यतीत किया और अपने अवकाश से बहुत लाभ भी प्राप्त किया।

फरवरी में ही हमने एक और शुभ कार्य प्रारम्भ किया: अपने स्कूल-भवन की पहली मंज़िल के निर्माण की ओर पहला कदम रखा गया।

मार्च

मेरे लिए मार्च की शुरुआत आश्रम से अलग कुछ अप्रत्याशित व्यस्तता के साथ हुई: मेरा प्रिय मित्र, गोविंद एक अपघात में घायल होकर अस्पताल में भर्ती था। मैं उसका हालचाल लेने रोज आगरा के एक अस्पताल जाया करता था। उसके साथ यह समय बिताना बहुत अच्छा रहा-भले ही इसका कारण बिल्कुल सुखद नहीं था!

मार्च के मध्य में रमोना के पिताजी हमसे मिलने और रमोना का जन्मदिन हमारे साथ मनाने आए। कई साल बाद यह पहली बार था, जब वे इस अवसर पर एकत्र हुए थे और इसलिए यह जन्मदिन सन 2013 का सबसे स्मरणीय अवसर बन गया! वे होली तक यहाँ रुके और थॉमस, आइरिस, सिल्विया, मेलेनी और दूसरे कई मित्रों के साथ उन्होंने भी इस रंगारंग उत्सव का आनंद उठाया। फिर वे हिमालय के आयोजित सफर पर निकल गए!

अप्रैल

अप्रैल में आश्रम आने वालों की संख्या घटने लगी और गर्मियों की शुरुआत के चलते यह स्वाभाविक ही था। इसी माह यशेंदु यूरोप दौरे पर निकले। इसके बावजूद आश्रम में रहते हुए हम कतई बोर नहीं हुए: मेरे और रमोना के लिए अपरा के साथ अपने प्रथम जर्मनी प्रवास की तैयारियों से संबन्धित पर्याप्त व्यस्तताएँ थीं!

मई

इस बीच हमारे स्कूल का काम चल ही रहा था और मई आते-आते उसकी इमारत का आकार स्पष्ट होने लगा। इधर हम अपने, यानी रमोना, अपरा और मेरे, जर्मनी रवाना होने से पहले की आखिरी तैयारियों में लगे हुए थे।

जर्मनी में वीज़बाडन हमारी बेटी के पहले यूरोप दौरे का पहला पड़ाव था। वहाँ कुछ आवश्यक वस्तुओं, जैसे कार-सीट, बच्चा-गाड़ी आदि, की ख़रीदारी करने के उपरांत हम आगे बढ़े। आसपास के नए माहौल और नई-नई चीजों को देखकर अपरा चमत्कृत हो उठी थी और उसे आनंदित देखकर हम भी प्रसन्न हो रहे थे। जब हम उसके जर्मन नाना-नानी के घर पहुंचे तब भी उसका आश्चर्य और उत्तेजना समाप्त नहीं हुए थे।

जून

पूरे जून माह हम जर्मनी में हर जगह घूमे-फिरे और एर्केलेंज में सोनिया और पीटर के यहाँ, लूनेबर्ग में माइकल और आंद्रिया के यहाँ गए। इसके अलावा बाल्टिक सी बीच पर रेगीना और सेलिना से और कई दूसरी जगहों में कई और मित्रों से मुलाक़ात की। अंत में हम वापस आउसबर्ग और वीज़बाडन पहुंचे और कुछ सप्ताह के इस शानदार दौरे के बाद वहाँ से आश्रम (भारत) लौट आए। वाह! ये कुछ सप्ताह इस वर्ष के हमारे सबसे सुखद दिन थे!

क्योंकि यह ब्लॉग कुछ लंबा हो चला है और अभी बहुत कुछ लिखा जाना बाकी है, मैं फिलहाल विराम लेता हूँ और कल साल के अगले छह माह का विवरण लिखूंगा। मैं कामना करता हूँ कि साल के आखिरी माह का यह आखिरी दिन आपके लिए हर्ष और उल्लास से भरा हो और आने वाला नया साल भी आपके लिए सुखद और शुभ हो!

अपने दुख का मुकाबला कैसे करें? क्या उसे दबाकर? क्या उसका दमन करके? 12 दिसंबर 2013

कल मैंने बताया था कि मेरे विचार में अपने प्रियकर के निधन की पीड़ा में धार्मिक दर्शन किसी तरह मदगार साबित नहीं होते। मैंने कहा था कि आपको यह दर्दनाक सत्य स्वीकार करना ही पड़ता है। निश्चय ही यह एक वास्तविकता है लेकिन इस दुख के कई चरण होते हैं और मैं चाहूँगा कि खुद अपने अनुभवों का संदर्भ लेकर उन पर कुछ प्रकाश डालूँ।

पहला चरण होता है, ज़बरदस्त सदमा। इसकी विकरालता और मियाद इस बात पर निर्भर करती है कि आप उसकी मृत्यु की संभावना और स्वाभाविकता से किस हद तक वाकिफ थे तथा मृतक से आपके कितने प्रगाढ़ संबंध थे।

अगर अपने बारे में कहूँ तो यह मियाद एक हफ्ते की रही, जब मैं 2006 में विदेश दौरे पर था और वहीं मुझे एक दर्दनाक कार हादसे में अपनी छोटी बहन के देहांत की खबर मिली। मैं अपना होशोहवास खो बैठा और यह हालत पूरे एक सप्ताह रही। मैं इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं था कि ऐसा हो सकता है। मैं रोया नहीं और अपने दर्द को बाहर निकालना मेरे लिए मुश्किल हो गया। एक दिन, सबेरे-सबेरे मैंने अपने छोटे भाई से कहा, उसे गूगल में देखो, वह हमें वहाँ मिल जाएगी, चलो हम उससे बात करते हैं। मैं मानने के लिए तैयार ही नहीं था कि वह अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन अंततः एक दिन वास्तविकता मेरे सामने अपने विराट रूप में प्रकट हुई और मेरे आंसुओं का बांध टूटकर बह निकला।

और अम्माजी के देहांत के वक़्त हम सब उनके पास थे और जब अम्माजी को दिल का दौरा पड़ा, हम सब उनके आसपास ही थे लेकिन अस्पताल ले जाने की हमारी हर कोशिश के बावजूद वे हमें छोड़ कर चली गईं। यह स्पष्ट होने के बाद से कि वह सदा-सदा के लिए हमें छोड़ कर चली गई हैं उनके दाहसंस्कार तक मेरी आँख से आंसू नहीं निकले। लेकिन जब मैं आश्रम वापस आया तो बिना माँ का आश्रम बहुत खाली-खाली लगा और दुख अचानक आंसुओं के रूप में फूट निकाला। फिर हम सब साथ-साथ रोने लगे।

मेरे विचार में यह दूसरा चरण होता है और बहुत महत्वपूर्ण होता है। दुख को पूरी तीव्रता के साथ महसूस करें। फिर उसे बाहर निकलने दें, आंसुओं की, सिसकियों की शक्ल में रोएँ। इस प्रक्रिया का पूरा होना आवश्यक है, इस दौरान अपनी भावनाओं को रोकने की कोशिश बिल्कुल न करें!

मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग इस प्रक्रिया को ठीक तरह से पूरा नहीं होने देते। अपनी प्रकृति और स्वभाव के चलते या अपनी सांस्कृतिक परंपरा के चलते, वे अपने दिल के चारों ओर पत्थर की कठोर दीवार निर्मित कर लेते हैं और अपने दर्द को बाहर नहीं निकलने देते। वे संयमी होने का नाटक करते हुए उसका दमन करते हैं, जो कि ठीक नहीं है। उसे बाहर निकलने का रास्ता दें। चाहें तो बंद कमरे में आँसू बहाएँ लेकिन मैं कहता हूँ कि लोग उन आंसुओं को देखकर आपके विषय में कोई धारणा नहीं बनाने वाले! अपने दुख को दूसरों के साथ साझा करने पर आप अधिक शीघ्रता के साथ उससे मुक्त हो सकेंगे और आप दूसरों के साथ स्थायी रूप से जुड़ पाएंगे!

जीवन रुकता नहीं है। अपने आपको परिस्थितियों के अनुकूल ढालना पड़ता है और संभव है मृतक द्वारा छोड़ी जगह कभी भर न पाए। कुछ समय के लिए मैं अपनी बहन की तस्वीर की तरफ देख भी नहीं पाता था। अम्माजी की तस्वीर की तरफ देखना भी बहुत समय तक बड़ा मुश्किल था। लेकिन उन स्मृतियों को बीच-बीच में बाहर निकालकर उसमें डूब जाना अच्छी बात है, अतीत की ऐसी स्मृतियाँ सुखद ही होती हैं।

ऐसी परिस्थितियों में कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं जो भविष्य में गकड़िया (जलते कोयले पर सिंकी मोटी रोटियाँ) या गाजर का हलुवा नहीं खाएँगे क्योंकि हमारी माँ ये व्यंजन दुनिया में सबसे अच्छा बनाती थीं। और हमेशा वह उनके हाथों ही उपलब्ध हुआ करता था। लेकिन हम ये व्यंजन बनाना जानते हैं और हमारे पास अम्माजी से सीखे हुए कर्मचारी भी हैं इसलिए हम अक्सर उन्हें बनाते-खाते हैं। जब हम उन्हें खाते हैं तो उन गकड़ियों और गाजर के हलुवे की याद करते हैं, जिसे अम्माजी हमें बनाकर खिलाया करती थीं और साथ-साथ एकाध आँसू बहा लेते हैं या बस उनकी याद में भीगे हुए चुपचाप खाते रहते हैं।

संसार (जीवन) चलता रहता है और उसके अनुसार हमारा जीवन गुज़रता रहता है। हमारे मस्तिष्क में सुखद स्मृतियाँ होती हैं और दिल में प्रेम। स्मृतियों को अपने दिल से दूर न करें। उन्हें जियेँ, उनसे प्रेम करें और आप अनुभव करेंगे कि वह व्यक्ति आपके बिल्कुल करीब आ गया है, आपके दिल में बस गया है।