स्वयं को अपने से छोटा न करें और अपनी ईमानदार तारीफ़ को सहजता के साथ स्वीकार करें – 26 नवंबर 2015

जर्मनी में रहते हुए मुझे अब लगभग दो हफ्ते हो चुके हैं और इस बीच हम बहुत से मित्रों से मिल चुके हैं और वापस भारत लौटने से पहले अभी और भी कुछ मित्रों से मिलने वाले हैं। हाल ही में हम एक मित्र से मिले जिसके विषय में हमने एक ऐसी बात नोटिस की जिसे लेकर, मेरा विश्वास है कि मेरे बहुत से पाठकों को भी समस्या होगी: आत्मविश्वास की असाधारण कमी, जिसमें आप अपनी साधारण प्रशंसा को भी शक की निगाह से देखते हैं।

मैं इस मित्र से दो साल बाद मिल रहा था इसलिए इस बीच हमने एक-दूसरे को देखा तक नहीं था। अभिवादनों के शुरूआती लेनदेन, गले मिलने और एक-दूसरे का हालचाल पूछने के बाद हमारी बातचीत इस ओर मुड़ गई कि हम लोग इस बीच क्या करते रहे। उसने जो बताया उससे तुरंत मैंने नोटिस किया कि इस बार वह अपनी उपलब्धियों को बहुत कमतर आँक रही है। कुछ देर बाद रमोना भी, जो मेरी मित्र को पहले से जानती थी, बातचीत में शामिल हो गई। उन दोनों ने भी एक-दूसरे का अभिवादन किया और फिर रमोना ने उससे कहा कि वह बहुत शानदार, खुश और स्वस्थ लग रही है।

इस प्रशंसा की प्रतिक्रिया में उस मित्र ने जो कहा, वही आज के ब्लॉग को लिखने का कारण बना है। उसने कहा, 'ओह! शुक्रिया, अच्छा किया जो आपने यह कहा!'

जैसे ही मैंने यह वाक्य सुना, मुझे पता चल गया कि ये शब्द शुक्रिया कहने के लिए कहे गए हैं-लेकिन जो यह कह रहा है, वह दरअसल विश्वास नहीं कर रहा है कि रमोना द्वारा कहे गए शब्द वास्तव में सही हैं! वे सिर्फ सौजन्यतावश कहे गए हैं- भले ही उसके मस्तिष्क में वे शब्द सही नहीं थे!

इतना साधारण सा वाक्य ही बता देता है कि कोई व्यक्ति खुद अपने बारे में क्या सोचता है। हमारी वह दोस्त कह सकती थी, ' शुक्रिया, हाँ, मेरा पिछला समय बड़ा अच्छा रहा' और उसके बाद बता सकती थी कि कैसे उसने अपने खान-पान में परिवर्तन किया और कैसे छुट्टियाँ बिताई। उसकी जगह उसने तुरंत रमोना की बात का यह आशय लिया कि वह कुछ अच्छा कहने के लिए ऐसा कह रही है। और इस बात को उसने अपने उत्तर से स्पष्ट भी किया। उसे खुश करने के लिए झूठ बोलने की मेहरबानी कर रही है!

वह इस प्रशंसा को अपनी सच्ची प्रशंसा मान ही नहीं सकती थी! वह यह नहीं समझ पाई कि पिछली बार जब हम मिले थे, उसके मुकाबले इस बार उसके चेहरे पर जो चमक है और जैसी शांत और संयत वह लग रही है, उसे रमोना ने महसूस कर लिया था!

इस कथा से हम सभी को, पुरुष हों या महिलाएँ, एक छोटी सी शिक्षा मिलती है: अगर कोई आपकी प्रशंसा करता है तो उसे झूठ मानकर सीधे-सीधे खारिज मत कर दीजिए। प्रशंसा झूठी भी हो सकती है मगर यह भी उतना ही संभव है कि किसी व्यक्ति को आप सुंदर, आकर्षक, अच्छे या सुखी, बुद्धिमान, मिलनसार, मित्रवत या आगे बढ़कर मदद करने वाले लगते हों!

अपने आपको कमतर न समझें, अपनी क्षमताओं को कम न आँकें। उन्हें जानें और उचित सम्मान दें-दूसरों को भी आपकी क्षमता का या आपकी अच्छाइयों का एहसास है और वे उसका सम्मान करते हैं। उनकी प्रशंसा को सहजता के साथ स्वीकार करें!

प्रिय योग-शिक्षकों, योग को और मुश्किल न बनाएँ – 1 अक्टूबर 2015

पिछले दो दिनों में मैंने संक्षेप में बताया कि हम किस तरह अपने छात्रों और सहभागियों के लिए योग को आसान बनाकर प्रस्तुत करना पसंद करते हैं। परसों के ब्लॉग में मैंने बताया था कि अक्सर हम योग सीखने वाले छात्र-छात्राओं की मुद्राओं को सुधारते नहीं हैं और कल मैंने कुछ विस्तार से बताया कि क्यों हम विभिन्न योग-मुद्राओं के लिए संस्कृत नामों का इस्तेमाल नहीं करते। वास्तव में मेरा विश्वास चीजों को आसान बनाने में होता है और मुझे लगता है कि यह दूसरों के लिए भी मददगार सिद्ध होता होगा।

मैं जानता हूँ कि लोगों का रुझान चीजों को कठिन और जटिल बनाकर प्रस्तुत करने में होता है। मैंने देखा है कि योग-शिक्षक योग को अत्यधिक कठिन विज्ञान की तरह प्रस्तुत करते हैं जिसे तब तक कोई नहीं समझ सकता जब तक कि किसी न किसी रूप में वे किसी योग-गुरु द्वारा दीक्षित नहीं किए जाते। ऐसे योग-शिक्षक भी हैं जो नए से नए छात्रों को योग की कठिन से कठिन मुद्राएँ दिखाते हैं। कुछ दूसरे होते हैं जो ज़्यादा से ज़्यादा संस्कृत शब्दों का इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं।

मैं नहीं समझता कि सिखाने का यह उचित तरीका है और जब कि आपको यह एहसास हो सकता है कि आप कोई असामान्य व्यक्ति हैं, आपका शरीर दूसरों से बेहतर, अधिक लचीला है और आपकी मुद्रा एकदम त्रुटिहीन, लेकिन इसका प्रदर्शन करने की वास्तव में कोई ज़रूरत नहीं होती।

वास्तव में किसी साधारण सी चीज़ को खींच-तानकर बड़ा करने की ज़रूरत नहीं है, उसे लंबे-चौड़े व्याख्यानों में समझाने की भी आवश्यकता नहीं है! आप सीधे, सहज शब्दों में भी उसे समझा सकते हैं! आप निश्चय ही दूसरों को दिखा सकते हैं कि बहुत सी कठिन और जटिल योग-मुद्राओं के लिए भी आपका शरीर कितना लचीला है लेकिन इससे दूसरों के अंदर यह भावना जागनी चाहिए कि इसमें कुछ भी कठिन नहीं है और वे भी नियमित अभ्यास से वहाँ तक पहुँच सकते हैं!

वास्तव में दूसरे कई क्षेत्रों में भी मैंने यह बात देखी है। यह आदत सिर्फ योग-शिक्षकों तक ही महदूद नहीं है! मैंने यह व्यवहार सामान्य रूप से उन लोगों में पाया है, जिनमें आत्मसम्मान या स्वाभिमान की कमी होती है। वे जिन चीजों पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेते हैं उन्हें इस तरह प्रस्तुत करते हैं जैसे वे बहुत कठिन काम हों जिससे वे अपने बारे में अच्छा महसूस कर सकें। ये वे लोग हैं जो सरल चीजों को भी जटिल बनाते हुए अंजाम देते हैं और स्वयं खुश हो लेते हैं कि वे कठिन चीजों को अंजाम देने में कामयाब हुए।

जब कि यह पूरी तरह तार्किक है और इसलिए समझ में आने वाली बात भी है-और अगर आप भी ऐसा ही कर रहे हैं तो मैं आपको सलाह दूँगा कि अपने बारे में प्रसन्न होने के दूसरे तरीके ढूँढ़ने की कोशिश कीजिए। यह समझने की कोशिश कीजिए कि आपने भी जीवन में कई उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं, आपमें भी अपनी निजी खूबियाँ हैं और आप और भी कई उपलब्धियाँ प्राप्त करके उसी तरह बहुमूल्य हो सकते हैं जैसे कि दूसरे लोग अपनी उपलब्धियों से हो रहे हैं। आपको ऐसी कोई चीज़ करने की ज़रूरत नहीं है जिसे ‘कोई दूसरा न कर सकता हो’ या ‘सिर्फ सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति ही कर सकता हो’।

इन बातों को अपने आत्मसम्मान या स्वाभिमान का आधार न बनाएँ-क्योंकि उसकी नींव बहुत भुरभुरी होगी! आप जैसे भी हैं, उसी रूप में अपने लिए मूल्यवान हैं-अपने आप से प्यार करिए, क्योंकि आप वैसे हैं!

आपके जीवन में आदर्शों की भूमिका – और वयस्क हो जाने के बाद क्यों उनकी ज़रूरत नहीं है – 5 फरवरी 2015

आज मैं आदर्शों के बारे में लिखना चाहता हूँ। उन व्यक्तियों के बारे में, जिन्हें हम अपने लिए एक उदाहरण के रूप में देखते हैं, कोई ऐसा, जिसके चरित्र की कुछ विशेषताएँ हमें प्रभावित करती हैं और हम सोचते हैं कि ये विशेषताएँ ऐसी हैं, जिनकी नकल की जानी चाहिए या हमें उनके जैसा बनने की कोशिश करनी चाहिए। मैं आपको वह पूरी प्रक्रिया विस्तार से बताता हूँ जिससे पता चलेगा कि क्यों और कैसे उम्र बीतने के साथ इस धारणा में परिवर्तन होना चाहिए।

जब आप बच्चे होते हैं, आपके माता-पिता या आपका लालन-पालन करने वाला कोई भी वयस्क सहज ही आपके लिए अनुकरणीय बन जाते हैं। यह एक ऐसी बात है जिसे आप बदल नहीं सकते और न ही उसे किसी तरह से प्रभावित कर सकते हैं। जन्मते ही सबसे पहले उन्हें देखना और जीवन की मूलभूत क्रियाएँ सीखने ले लिए उनका अनुकरण करना आपकी नियति होती है।

धीरे-धीरे आपके आसपास मौजूद परिवार के दूसरे सदस्य आपके अतिरिक्त आदर्श या extended ideals बनते जाते हैं। बड़े भाई या बहनें, चाचा-चाची, अकसर घर आने वाले मेहमान आदि। आप अपने संसार को विस्तार देने की प्रक्रिया में होते हैं और उसके साथ अपने आदर्शों को भी विस्तार देते चलते हैं। आप स्कूल जाना शुरू करते हैं और आपके शिक्षक आपके आदर्श बन जाते हैं। यार-दोस्त, पड़ोसी और यहाँ तक कि वे लोग भी जिन्हें आप व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते, जैसे गायक, अभिनेता या अभिनेत्रियाँ आदि भी इस सूची में स्थान पाने लगते हैं।

जब आप छोटे थे, ये सभी लोग कुल मिलाकर आम तौर पर आपके लिए महान थे। वे जैसे भी हों, आप उन्हें दोषरहित और उत्तम मानते हैं। एक सामान्य मनुष्य की तरह उनमें भी कोई खामी हो सकती है या वे भी कोई गलती कर सकते हैं, इसे आप देख नहीं पाते, उस समय यह आप सोच भी नहीं सकते। जैसे-जैसे आप बड़े होते हैं और परिदृश्य आपके सामने खुलता जाता है, धीरे-धीरे यह सब आपको सीखना पड़ता है। अचानक आपको पता चलता है कि वे किसी खास क्षेत्र में तो बहुत निपुण हैं लेकिन किसी दूसरे क्षेत्र में अनाड़ी हैं और उस क्षेत्र में आपके लिए उनकी नकल करना ठीक नहीं होगा।

न सिर्फ आपको सम्पूर्ण परिदृश्य की जानकारी होती जाती है बल्कि आप स्वयं भी परिपक्व होते जाते हैं और आपको स्वयं यह निर्णय करना होता है कि आप अपने अंदर कौन सी चारित्रिक विशेषताएँ चाहते हैं, जिन्हें पाने की आपको पूरी कोशिश करनी चाहिए और किन विशेषताओं की आपको नकल करनी है और किनकी नहीं। और किसी न किसी बिन्दु पर आकर आपको यह सोचना चाहिए कि आपको किसी दूसरे जैसा होने की ज़रूरत नहीं है। नकल करने के लिए आपको किसी आदर्श की आवश्यकता नहीं है क्योंकि कोई भी दो व्यक्ति एक जैसे नहीं हो सकते और इसलिए आप भी निराले और अद्वितीय हैं।

प्रेरणा के लिए आप हमेशा ही दूसरों की ओर देख सकते हैं। किसी की सफलता या उसकी विशेषता की सराहना करें और देखें कि उसके पास कुछ ऐसा है जिसे आप भी अपने जीवन का हिस्सा बना सकते हैं। किसी भी हालत में हमें यह बचपना नहीं करना चाहिए कि हम उसे एक सम्पूर्ण रूप से दोषरहित आदर्श मानने लगें-इससे हम उनकी गलतियों पर तरह-तरह के बहाने बनाकर और झूठ का सहारा लेते हुए अनावश्यक पर्दा डालने की कोशिश करने लगते हैं।

कोई भी दोषरहित नहीं है लेकिन हम सब अद्वितीय हैं-इसलिए जैसे भी हों, अपने जैसे बने रहें, ज़्यादा से ज़्यादा अपने आपको बेहतर बनाने की कोशिश करते हुए!

सही या गलत का निर्धारण दृष्टिकोण है या तथ्य! 5 नवंबर 2014

दूसरों के साथ बातचीत का रोचक पहलू यह है कि आप अक्सर ऐसे लोगों से मिलते हैं जिनके अनुभव, विचार और जानकारियाँ आपसे भिन्न होते हैं। जब आवश्यकता हो, आप उनसे लाभ उठा सकते हैं और प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं। आपको उपयोगी जानकारियाँ प्राप्त हो सकती हैं, जिन्हें आप दूसरों तक भी पहुँचा सकते हैं। लेकिन एक अप्रिय बात भी हो सकती है: आप संदेह में पड़ सकते हैं कि आप जो कर या सोच रहे हैं, वह ठीक है या नहीं।

यह असामान्य बात नहीं है: कामकाज के दौरान हाल ही में हुई कोई घटना आप अपने दोस्तों को बताते हैं और वे आपकी प्रतिक्रिया पर आश्चर्यचकित रह जाते हैं कि आपने ऐसा क्यों सोचा! क्या ऐसी स्थिति में शांत रहना उचित नहीं होता? या इसके विपरीत, क्या आखिरकार इस मामले में सख्त रवैया अपनाना ज़्यादा ठीक नहीं होता? यह भी हो सकता है कि दोनों में से एक आपकी प्रतिक्रिया का ज़ोरदार समर्थन करे और दूसरा अविश्वास में महज सिर हिलाकर रह जाए कि ये आप क्या कर बैठे।

क्या जीवन जीने का कोई सही तरीका हो सकता है? या कोई गलत तरीका?

स्वाभाविक ही कुछ बातें स्पष्ट रूप से, हर लिहाज से और हर जगह गलत होती हैं: किसी का क़त्ल करना गलत है और चोरी, डकैती और इस तरह की दूसरी सभी गतिविधियाँ भी सामान्यतः सर्वत्र गलत मानी जाती हैं। लेकिन ऐसी स्थितियाँ भी पेश आती हैं, जहाँ सही और गलत में इस तरह दिन और रात की तरह स्पष्ट अंतर करना संभव नहीं होता!

आप यह भी कह सकते हैं कि अपने माता-पिता का अपमान करना गलत है- लेकिन यह अपमान वाली बात कहाँ लागू होती है? क्या आपके लिए उनके द्वारा लिए गए निर्णयों पर न चलना उनका अपमान करना माना जाएगा? क्या उनके नैतिक मानदंडों और मूल्यों का अनुपालन न करना गलत होगा? यह निश्चित रूप से हो सकता है कि वे इसे गलत मानें जबकि आप पूरी तरह अलग विचार रखते हों!

क्या मैं ठीक कर रहा हूँ?

यह सामान्य प्रश्न जीवन के किसी भी मुकाम पर सामने आ सकता है! व्यवसाय, आपसी सम्बन्ध, बच्चों की शिक्षा, मित्रता- आप कभी भी ऐसी स्थिति में आ सकते हैं, जहाँ आपको लगेगा कि अब क्या किया जाए। भले ही अक्सर आप अपने निर्णय आत्मविश्वास के साथ लेते हों, अक्सर होने वाली आलोचनाओं को आसानी के साथ दरकिनार कर देते हों मगर एक ऐसा बिंदु होता है, जहाँ आप खुद अपनी ओर और उस परिस्थिति की ओर देखते हैं और सोच में पड़ जाते हैं:

मुझे क्या करना चाहिए?

मैं आपको एक बात बताता हूँ: कोई दूसरा कभी नहीं बता सकता कि आपको क्या करना चाहिए और न ही कोई दैवी हस्तक्षेप या प्रेरणा होती है, जो अचानक हर चीज़ ठीक कर दे। फिर भी, कहा जाना चाहिए कि न तो कुछ गलत होता है और न सही और सभी कभी-कभार ऐसी परिस्थितियों से गुज़रते ही रहते है।

मन ही मन उन बातों का जायजा लीजिए, जो आप वास्तव में जानते हैं, उन निर्णयों, विचारों को याद कीजिए, जिनके बारे में आप सुनिश्चित हैं कि वे ठीक हैं और उन्हें बदलने की ज़रूरत नहीं है। भले ही लोग कहते रहें कि आप गलत हैं। फिर उस बिन्दु से धीरे-धीरे आगे बढ़िए और अपनी भावनाओं और विचारों के सहारे आगे बढ़िए। सलाह लीजिए, जब आपको लगे कि यह उचित है-और पता कीजिए कि आप किस बात को वास्तव में अनुचित समझते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह एहसास अक्सर अस्थाई होता है। कभी-कभी उस परिस्थिति से कुछ देर के लिए या रात भर के लिए दूर हो जाना भी मदद करता है। उसके बाद फिर नए उत्साह और साहस के साथ शुरू हो जाइए और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़िए!

हर मुश्किल में भी अपना आत्मसम्मान बनाए रखें! 4 सितंबर 2014

कल मैंने ज़िक्र किया था कि एक सफल व्यवसाय चलाने के लिए आपको आत्माभिमान, आत्मगौरव (खुद अपने आपसे प्रेम करने की) और आत्मसम्मान की ज़रूरत होती है। तभी आप अपने दिल का कहा मानते हुए अपना काम भी करेंगे और आपको कोई अपराधबोध भी नहीं होगा कि आपने अपने दैनिक काम का मेहनताना क्यों लिया। बहुत से लोगों के लिए एक कठिन विषय मगर साथ ही बहुत महत्वपूर्ण भी! लेकिन इसे गंभीरता से लें- वरना हर कोई आपकी भलमनसाहत का फायदा उठाने की कोशिश करेगा!

हम इस बात की चर्चा कर चुके हैं कि व्यापार-व्यवसाय में यह किस तरह सामने आता है। लोग आपसे कोई चीज़ मुफ्त प्राप्त करना चाहते हैं और अगर आप पर्याप्त भले या भोले हैं तो वे अपने उद्देश्य में सफल हो जाते हैं। एक बार दे देने के बाद आप वापस नहीं लौट सकते और देते चले जाते हैं, बहुत ज़्यादा मुफ्त दे बैठते हैं और फिर दुखी और गुस्सा होते रहते हैं मगर कुछ नहीं कर पाते-जो चीज़ आप बेच रहे हैं उसकी कीमत के बारे में अनिश्चित, उसके महत्व के बारे में संदेहग्रस्त।

परिवार और मित्रों के बीच मामला पैसे का नहीं होता। कम से कम अक्सर नहीं होता। अक्सर मुद्दा यह होता है कि आपने दूसरों के लिए क्या किया और खुद अपने लिए कितना करते हैं। अपने व्यक्तिगत सत्रों में अक्सर मैं ऐसे लोगों से मिलता हूँ, जिन्हें आत्माभिमान या अपने आपसे प्रेम नहीं होता और अपनी नज़र में खुद की कोई कीमत ही नहीं होती क्योंकि उनके मन में दबा हुआ तीखा गुस्सा और अक्सर परिवार के सदस्यों या कुछ मित्रों के साथ अनबन होती है। वे देते हैं, देते हैं, देते चले जाते हैं, जैसे देते रहना ही उनका काम हो- लोग भी उन्हें इसी लायक समझने लगते हैं! लेकिन उनके मन में यह एहसास मौजूद होता है कि उनका शोषण हो रहा है, आसपास के लोग आखिरी बूँद तक चूस लेना चाहते हैं और बदले में उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होता।

पहली सीढ़ी है आत्माभिमान और आत्मगौरव (खुद से प्यार करना)। यह तब होगा जब आप अपने आपकी कद्र करेंगे, अपने समय और अपने श्रम की कीमत आँकेंगे, आप जो कुछ कर रहे हैं, उसका आदर करेंगे। आप अपने शरीर, मन-मस्तिष्क और अपने काम से उनकी अच्छाइयों और उनकी बुराइयों सहित प्यार करते हैं। लेकिन आपको एक और चीज़ की दरकार होगी: लोगों के सामने उस आत्मगौरव को प्रकट करने की क्षमता और साहस की! और यह क्षमता और साहस ही आपका आत्मसम्मान या स्वाभिमान है जिसे आपको दूसरों के सामने व्यक्त करते रहना है।

जब आप पूरे आत्मविश्वास के साथ बता सकेंगे कि दूसरों के लिए कुछ करने की आपकी सीमा क्या है। जब आप जानेंगे और उन्हें बताएँगे कि इस बिंदु के बाद आपको अपने लिए समय चाहिए या आपको लगे कि इसके आगे वे आपके काम की या आपके श्रम की बेईज्ज़ती कर रहे हैं, उसकी उचित कीमत नहीं लगा रहे हैं और आपके साथ नाइंसाफी कर रहे हैं।

अगर आपको इस विषय में कोई दिक्कत रही है तो यहाँ तक पहुँचना काफी मुश्किल होगा लेकिन यह संभव है। आपको अपने आप से अपने प्रेम को मजबूती प्रदान करनी होगी यानी कि आपको अपने आत्माभिमान और आत्मगौरव को ऊँचा उठाना होगा। जब भी आपको लगे कि कोई दूसरा आपका अनुचित लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है, जब आपको लगे कि आप पर किसी काम को करने का दबाव बनाया जा रहा है या किसी काम को कम कीमत पर करने का दबाव बनाया जा रहा है तो सोचने के लिए अपना समय लीजिए। जो आप कर रहे हैं उससे एक कदम पीछे हट जाइए, कुछ समय के लिए अपने आप से माफ़ी माँगिए कि आप पूर्वनिर्धारित तरीके से काम नहीं कर रहे हैं और शांत हो जाइए, सुकून अनुभव करने का प्रयास कीजिए। अगर आपकी भावनाएँ तीव्र होंगीं तो आप ठीक ढंग से सोच नहीं पाएँगे, और आपके विचारों में स्पष्टता नहीं होगी और आप उचित निर्णय नहीं ले पाएँगे।

एक बार शांत होने के बाद आपको विश्लेषण करना होगा कि क्या दूसरों के दबाव के चलते आपके भीतर वैसी भावनाएँ पैदा हो गई हैं, कुछ ऐसा करने का दबाव जो आपकी इच्छा या सहूलियत में हस्तक्षेप करता है। अगर ऐसी बात है तो उस सीमा को टटोलिए जहाँ आप सहूलियत महसूस करते हैं, जहाँ तक आप ख़ुशी-ख़ुशी वह काम कर सकते हैं। अपने आपको याद दिलाते रहिए कि आपकी इतनी कीमत तो है कि आप खुद अपने आपके लिए, अपने आत्मसम्मान के लिए खड़े हों। और उसके बाद उस स्थिति पर वापस लौटिए।

शांत रहें मगर उसी जगह, जहाँ आपको ठीक लगता है, जहाँ आपकी इच्छा है। आप देखेंगे कि एक बार आप सफलता पूर्वक इस प्रक्रिया से गुज़र जाएँगे तो आपको बड़ा अच्छा लगेगा! भले ही वह अपनी सास से एक छोटी सी बात कहना हो कि पारिवारिक मीटिंग के लिए आप एक और मिठाई तैयार नहीं कर सकते क्योंकि आप अपने बच्चे के साथ खेल रहे हैं, अपने काम में व्यस्त हैं और दो दूसरे व्यंजन पहले ही आप बना चुके हैं! आपके लिए और आपके आत्माभिमान, आत्मसम्मान के लिए यह एक छोटी सी जीत होगी!

तो, शुरू कीजिए-मजबूत बनिए, अपना महत्व पहचानिए और अपने आपसे प्रेम कीजिए!

अगर आप अपने आप से प्यार करते हैं तो अपना काम किसी को भी कम कीमत में न बेचें – 3 सितम्बर 2014

कल के ब्लॉग में यह लिखने के बाद कि क्यों आपको अपने दिल का कहा मानना चाहिए न कि पैसे के पीछे भागना चाहिए, मुझे कुछ लोगों के सन्देश प्राप्त हुए हैं, जो बताते हैं कि अगर कुछ लोग अपने दिल का कहा मानने लगें तो उनकी भूखों मरने की नौबत आ जाएगी और वे एक धेला भी कमा नहीं पाएंगे। ऐसा सोचने वालों से मुझे सिर्फ यह कहना है: खुद से प्यार करना सीखें!

जी हाँ, किसी भी व्यवसाय में लगे व्यक्ति को इस प्रश्न का सामना करना ही पड़ता है: अपने काम का कितना हिस्सा मैं दूसरों के लिए करता हूँ और कितना अपने लिए? जितना मैं दूसरों के लिए करता हूँ उसकी कितनी उजरत मुझे लेनी चाहिए? और क्या मुझे यह काम मुफ्त में करना चाहिए?

स्वाभाविक ही काम के कुछ स्थान ऐसे होते हैं जहाँ कोई इसकी अपेक्षा नहीं करता। फलवाले या सब्ज़ीवाले से कोई मुफ्त फल या सब्जियों की अपेक्षा नहीं करता, न ही किराने वाले से अनाज मुफ्त चाहता है। अगर आप रेल यात्रा कर रहे हैं तो वह मुफ्त नहीं होती, आप टिकिट खरीदते हैं। जब किसी ठोस वस्तु का मामला होता है तो इसका निर्णय आसान होता है। मुश्किल उनके सामने पेश आती है जो कोई वस्तु नहीं बल्कि अपनी सेवाएँ बेचते हैं। और हमेशा कोई न कोई होगा जो आपसे कम से कम पैसों में काम कराना चाहेगा या फिर बिना कुछ दिए, मुफ्त में ही!

किसी योग शिक्षक, मालिश से चिकित्सा करने वाले मसाज थेरापिस्ट या ध्यान शिक्षक से लोग अपेक्षा नहीं करते कि वह मुफ्त में उनके लिए काम करे लेकिन इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के दिल में हमेशा यह प्रश्न तो रहता ही है कि वे अपने काम की कितनी कीमत वसूल करें। और जबकि एक तरफ उन्हें मुँहमांगी रकम अदा करने वाले लोग होंगे तो दूसरी तरफ यह कहने वाले भी होंगे कि वे बहुत महंगे हैं।

एक भला व्यक्ति जो अपने काम से प्रेम करता है, चाहेगा कि वह अपना उत्पाद या सेवा मुफ्त में लोगों को दे दे। यह ठीक है और अच्छी बात है- अगर आप किसी ज़रूरतमंद की इस तरह मदद करते हैं तो यह बहुत अच्छी बात होगी। समस्या तब शुरू होती है जब आप अक्सर ऐसा महसूस करने लगते हैं और वह भी बाहरी दबावों के वशीभूत होकर कि आपको कम पैसे लेने चाहिए या मुफ्त लोगों की सेवा करनी चाहिए। और फिर ऊपर से अगर आपको अपराधबोध होने लगे!

अपने काम की कीमत जानना आवश्यक है। समान व्यवसाय में लगे लोगों से तुलना करके अपनी कीमत तय कीजिए। अपने श्रम को कम कीमत में मत बेचिए और अपने आत्माभिमान के लिए डटकर खड़े होने की हिम्मत जुटाइए! अगर कोई सोचता है कि आपको मुफ्त में काम करना चाहिए, तो उसे सोचने दीजिए। उसका कोई महत्व नहीं है- आप जानते हैं कि आपको भी जीना है, अपने खर्चे चलाने हैं और अपने श्रम और अपनी सेवा की वाजिब कीमत वसूल करने में कोई बुराई नहीं है।

अगर आप अपने आप से प्यार करते हैं तो आप जानते होंगे कि आप अपने श्रम की उचित कीमत ही वसूल कर रहे हैं। अगर आपका दिल साफ़ है तो आप कभी-कभी अपनी सेवा को पैसे के अलावा किसी और चीज़ से अदल-बदल कर सकते हैं- किसी भी ऐसी चीज़ से जो सामने वाला दे सके। बीच-बीच में आप कोई सेवा मुफ्त भी दे सकते हैं मगर किसी भी हालत में आपमें अपराधबोध पैदा नहीं होना चाहिए कि आपने अपने श्रम को मुफ्त दे दिया। अगर आप खुद से प्रेम करते हैं तो आप अपने दिल के कहे अनुसार भी चल सकते हैं और इसके बावजूद अपनी सेवा की कीमत भी मांग सकते हैं।

स्वास्थ्य के मुकाबले अपनी बीमारी से ज्यादा प्यार मत कीजिए! 5 मई 2014

आज मुझे अपने ज़ख्म (घुटने) के टाँके निकलवाने अस्पताल जाना है। मैं अब काफी स्वस्थ हो चुका हूँ मगर मुझे इस बात की विशेष ख़ुशी है कि जर्मनी के लिए उड़ान भरने से पहले मुझे अपने आप को तैयार करने के लिए दस दिन का अवकाश और मिल जाएगा। आज मैं जिस स्थिति में हूँ, उसमें अनायास ही मुझे यह विचार करने का मौका मिला है कि जब आप घायल या बीमार होते हैं तो आपकी दिमागी हालत का उस पर बड़ा प्रभाव पड़ता है: आप चाहें तो उस बीमारी या तकलीफ का मज़ा लेते रह सकते हैं या जितना चाहें स्वस्थ महसूस कर सकते हैं।

अपने सलाह-सत्रों की वजह से मुझे कई ऐसे लोगों से मिलने का मौका मिलता रहता है, जिन्हें बीमार पड़ना अच्छा लगता है। अपने सलाह सत्र की शुरुआत ही वे अपने बीमार पड़ने की कहानी से करते हैं। कोई बड़ी बीमारी नहीं होती मगर जब वे दूसरों से बार-बार उसका ज़िक्र करते हैं तो वे सहानुभूति व्यक्त करने लगते हैं-जो स्वाभाविक ही, उन्हें बहुत अच्छी लगती है। धीरे-धीरे, अगली बार बीमार पड़ने तक या उनकी तकलीफ कुछ ज़्यादा समय तक बनी रहे तो वे समझ जाते हैं कि बहुत सी चीज़ों के लिए यह बहाना बहुत कारगर सिद्ध होता है। और बिना अशिष्ट दिखाई दिए ‘नहीं’ कहने के मामले में यह सबसे अधिक उपयोगी होता है।

उनमें आत्मविश्वास की कमी होती हैं और साफ मना करने की जगह कि वे उनसे कहा गया काम नहीं करना चाहते, वे कहते हैं कि बीमार हैं इसलिए वे यह काम नहीं कर पाएंगे। यह पूरी तरह सही न भी हो कि उनमें आत्मविश्वास की कमी होती है तो भी काम टालने का यह आसान तरीका होता है और दूसरों को उनकी बात पर भरोसा करना ही पड़ता है। वह काम वे नहीं करना चाहते, यह सच कहने के लिए उन्हें अपने आत्मविश्वास और शक्ति का प्रदर्शन नहीं करना पड़ता।

तो वे बीमार बने रहते हैं। भले ही वे पूरी तरह स्वस्थ और ठीक-ठाक हों या उन्हें कोई छोटी मोटी, मामूली तकलीफ हो मगर वे जिद पकड़ लेंगे कि वे बीमार हैं। जितनी तकलीफ है, उससे कहीं ज़्यादा गंभीर रूप से बीमार! यह आवश्यक नहीं कि वे जानते हों कि वे क्या कर रहे हैं, क्या कह रहे हैं। उनका अवचेतन इतना शक्तिशाली होता है कि वे सचाई को अपने आपसे छिपा लेते हैं और इस तरह छिपाते हैं कि वह झूठ उन्हें अच्छा लगने लगता है। वे हर तरह से अपने आपको विश्वास दिला देते हैं कि वाकई वे बीमार हैं और परिणाम यह होता है कि वे उसी तरह व्यवहार करने लगते हैं।

एक बार उस राह पर चल पड़े तो फिर वे अपनी बीमारी से इतना प्यार करने लगते हैं कि उनके लिए उससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। उन्हें इस बात का ज़रा सा भी गुमान नहीं होता कि लोग उनका नाटक समझ रहे हैं, दूसरे यह जान रहे हैं कि वे ज़रुरत से ज़्यादा बन रहे हैं मगर वे भी इसका मज़ा लेने लगते हैं। मित्र उन्हें दिलासा देने लगते हैं कि सब ठीक हो जाएगा। लेकिन इससे बहुत नुकसान होता है और इसी बिंदु पर लोग मेरे पास सलाह लेने आते हैं।

अधिकतर मैं उन्हें स्वस्थ जीवन के आनंद को अनुभव करने की सलाह देता हूँ। मैं उनसे यह नहीं कहता कि वे बिल्कुल बीमार नहीं हैं-सत्र कुछ देर का होता है और इतने कम समय में मैं कैसे जान सकता हूँ उन्हें क्या हुआ है? लेकिन मेरा कहना है कि आप वाकई बीमार हों तब भी जितना संभव ही, भले-चंगे होने का नाटक कीजिए। नियमित जीवन बिताइए, बीमारी से पैदा असुविधाओं के साथ जीने के नए तरीके ढूँढ़िए और सामान्य जीवन जीने की कोशिश कीजिए। अपनी बीमारी के पीछे छिपने और उसकी आड़ में ‘न’ कहने की अपेक्षा सीधे ‘नहीं’ कहने की आदत डालिए। जो हैं, वही बने रहिए और जीवन का आनंद लीजिए!

इन दिनों भी मैं सिर्फ बिस्तर पर लेटा नहीं रहता: मैं अपनी फिजियोथेरपी के व्यायाम करता रहा हूँ, अपरा के साथ खेलता रहा हूँ, फोन पर बात करता रहा हूँ और कम्प्यूटर पर काम करता रहा हूँ। मेरे ये दिन भी सामान्य दिनों की तरह ही गुज़र रहे हैं, बस थोड़ी गतिशीलता और गतिविधियाँ कम हो गई है। सामान्य रूप से जो कुछ मैं करता रहा हूँ वह सब बिस्तर पर बैठे-बैठे, अब भी कर रहा हूँ। बिस्तर पर बीमार पड़े रहना मुझे बिल्कुल नहीं सुहाता इसलिए मैं इस बात को बिल्कुल महत्व नहीं देता। जितना काम कर सकता हूँ, करता रहता हूँ- और मुझे लगता है कि इस बात ने भी मुझे तेज़ी के साथ स्वस्थ होने में मदद की है।

अब देखना यह है कि आज डॉक्टर क्या कहते हैं-लेकिन मुझे लगता है कि मैं दस दिन में इतना स्वस्थ हो जाऊंगा कि आराम से जर्मनी के लिए रवाना हो सकता हूँ!

अपने बच्चों को स्वाभिमानी वयस्क बनाइए – उन्हें ‘नहीं’ कहना सिखाइए! 14 अप्रैल 2014

दो साल से ज़्यादा हो गए, जब से मैं एक स्वाभिमानी पिता हूँ। बच्चों की परवरिश करना एक ऐसा काम है, जिसका आनंद मेरे लिए कल्पनातीत है। अपनी बच्ची को अच्छे जीवन की बुनियादी बातें सिखाना, आसपास के वातावरण की खोजबीन करने में और खुद अपने आपको जानने में उसकी मदद करना अद्भुत है! इतनी सारी महत्वपूर्ण बाते हैं, जिन्हें, मैं चाहता हूँ कि वह सीखे और आज मैं उनमें से एक बात की चर्चा यहाँ करना चाहता हूँ: मैं चाहता हूँ कि मेरी बेटी 'नहीं' कहना सीखे, खासकर तब, जब लोग उसके इतना करीब आने लगें कि उसे असुविधा महसूस होने लगे। मैं समझता हूँ कि खासकर भारत के संदर्भ में इस बात को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

चलिए, ऐसी परिस्थितियों का एक उदहारण देता हूँ। रमोना अपनी कुछ सहेलियों के साथ वृन्दावन के मुख्य बाज़ार में खरीदी करने गई थी। स्वाभाविक ही, अपरा भी उसके साथ थी। तो, जब सब महिलाएं कपड़े देख रही थीं, पहनकर, उनके बारे में चर्चा कर रही थीं और हर तरफ कपड़े बिखरे पड़े थे, रमोना और अपरा एक आईने के सामने खड़े होकर खेल रहे थे।

तभी एक सेल्सवूमन आई और दोनों का मुस्कुराकर स्वागत किया। रमोना ने उसके अभिवादन का प्रत्युत्तर दिया मगर अपरा खेलने में इतनी निमग्न थी कि उस सेल्सवूमन की ओर उसका ध्यान ही नहीं गया। इसलिए अपरा का ध्यान अपनी ओर खींचने के उद्देश्य से वह महिला घुटनों के बल नीचे झुकी और अपरा की ओर हाथ बढ़ाया। उसने अपरा को पकड़कर कुछ इस तरह की कोशिश की, जिसे बच्चे बिल्कुल पसंद नहीं करते मगर जो बड़ों की आदत में शुमार है: उसने अपरा के गाल अपने अंगूठे और मध्यमा के बीच लेकर कुछ ऐसा किया जैसे चिकोटी काटना चाहती हो। स्वाभाविक ही, वह ऐसा करने नहीं जा रही थी मगर अपरा को यह बिल्कुल पसंद नहीं आया। वह दो कदम पीछे हटकर रमोना के करीब आ गई। इस महिला ने इस संकेत की कोई परवाह नहीं की और दूसरा हाथ भी आगे बढ़ाया और हमारी बच्ची के दोनों गाल अपने हाथों में भर लिए।

यही वह बिंदु है, जहाँ हम चाहते हैं कि हमारी बच्ची खुद कह सके कि वह उनका स्पर्श नहीं चाहती। उस अजनबी के मुंह पर, मैं अपरा का साफ़ और तीखा इंकार ('नहीं!') सुनना चाहता हूँ। मैं उसे यह नहीं सिखाना चाहता कि उसे अपने चेहरे पर किसी की चिकोटियों को बर्दाश्त करना होगा!

आखिर यह किस तरह की आदत है, भई? मैं जानता हूँ कि मेरी बच्ची आपको बहुत मोहक लग रही है- मुझे भी लगती है- लेकिन क्या आप हर किसी अजनबी के गालों पर हाथ फेरते रहेंगे क्योंकि वह आपको आकर्षक लग रहा है? अगर आप और हम सब आपस में और वयस्कों के साथ भी इसी तरह व्यवहार करें तब तो कोई बात नहीं। तब अपरा को कोई परेशानी नहीं होती क्योंकि वह इसे हर वक़्त, हर किसी के साथ होता हुआ देखती। लेकिन आप ऐसा नहीं करते!

क्योंकि अभी वह हाथ भर का है इसलिए आपको लगता है कि आप मेरे बच्चे की धैर्य-सीमा का उल्लंघन करते रहेंगे क्योंकि वह अभी एक मीटर ऊंचा भी नहीं है।

किसी वयस्क मगर कम उम्र के लड़के या लड़की से पूछिए कि इस तरह का व्यवहार उन्हें कितना अपमानजनक लगता है! किसी भी किशोर से पूछ लीजिए, यहाँ तक कि युवा वयस्कों से भी, और वे आपको बताएंगे कि वे इसे बेहद नापसंद करते थे। किसी अपरिचित द्वारा छुआ जाना। एक ऐसा व्यवहार, जो आपके साथ बचपन में तो अक्सर होता है मगर जब आपका शरीर यह ज़ाहिर करने लगता है कि अब आप बड़े और सम्मान के काबिल हो गए हैं, तब अचानक रुक जाता है। गरिमा और व्यक्तिगत मर्यादा वाले एक ऐसे व्यक्ति हो गए हैं, जिसकी सीमाओं का उल्लंघन उचित नहीं है।

लेकिन बच्चों के साथ आप ऐसा क्यों करते हैं?

क्योंकि वे 'नहीं' नहीं कह सकते? क्योंकि वे प्रतिवाद नहीं कर सकते? लेकिन यही कारण पर्याप्त होना चाहिए कि आप वैसा न करें और मुझे उम्मीद है कि मैं अकेला ऐसा व्यक्ति नहीं होऊंगा जो अपने बच्चे को इसका बिल्कुल विपरीत सिखा रहा होऊंगा। अगर आप ऐसा नहीं करते तो आपका बच्चा कभी भी 'नहीं' कहना नहीं सीख पाएगा, वयस्क हो जाने के बाद भी! आपके यहाँ ऐसे लोग होंगे जो 'नहीं' नहीं कह पाएंगे और जो वही करते रहेंगे, जो उनसे करने के लिए कहा जाएगा, जो लोगों को मौका देंगे कि कोई भी आकर उनके व्यक्तिगत मामलों में हस्तक्षेप कर सके, उनके धैर्य की परीक्षा ले सके। उनके साथ स्वाभिमान और आत्मबोध (आत्मसम्मान) की समस्या होगी। इसके विरुद्ध कुछ कीजिए और अपने बच्चे को 'नहीं' कहना सिखाइए!

कल मैं आपको बताऊंगा कि उस मौके पर अपरा और रमोना ने क्या प्रतिक्रिया दी और इस समस्या पर संभावित उपचार भी, जिन्हें बाद में चर्चा के दौरान मैंने और रमोना ने पाया।

आत्मविश्वास बढ़ाने वाला एक पांच-सूत्री कार्यक्रम- 29 अगस्त 2013

मैंने कई दिन और कई ब्लॉग यह समझाने में खर्च किए हैं कि कैसे लोग अक्सर अपनी तुलना दूसरों से करते हैं और इस तरह अपना आत्मविश्वास और उसके साथ ही अपना स्वाभिमान भी खो देते हैं। वे अवसादग्रस्त हो जाते हैं, अपने शरीर के साथ उन्हें समस्या हो जाती है और वे सोचने लगते हैं कि उनके कार्य और भावनाओं का कोई महत्व नहीं है। अगर आपकी यह बीमारी यहाँ तक पहुँच गई है या अगर आप चाहते हैं कि वह बिगड़कर यहाँ तक न पहुँचे तो मैं आपको अपने आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए कुछ करने की सलाह दूँगा। नीचे पाँच बिन्दुओं वाला एक कार्यक्रम मैं आपको बता रहा हूँ। उसे पढ़ें और शुरू हो जाएँ:

  1. जब भी आपके पास कुछ मिनट का अवकाश हो, एक कोरा कागज और कलम लेकर आराम से बैठ जाएँ। अब उस पर अपने बारे में उन बातों को लिखना शुरू करें जिन्हें आप समझते हैं कि वे आपके लिए बहुमूल्य हैं। वह सब कुछ, जिस पर आप गर्व कर सकते हैं, वह सब कुछ, जिन्हें आप अच्छा समझते हैं। यह "मैं फुटबाल अच्छा खेलता हूँ", या "जींस में मेरे कूल्हे शानदार लगते हैं" से लेकर "मैं लोगों की भावनाओं के प्रति संवेदनशील हूँ" या "मेरे अंदर बहुत ज़्यादा संयम है" तक कुछ भी हो सकता है। आपके पास इस सूची में ऐसी कम से कम पाँच बातें अवश्य होनी चाहिए-और इस बात की कोई सीमा नहीं है कि आप कितने बिंदु और जोड़ना चाहते हैं।
  2. अगर आपको अपने बारे में इस सूची के लिए विश्वसनीय बातें नहीं मिल रही हैं तो अपने करीबी मित्रों, या परिवार के किसी सदस्य से पूछिए कि वे आपमें कौन सी बहुमूल्य बातें देखते हैं। आप गौर करेंगे कि सिर्फ इतना करना ही आपमें सकारात्मक भावनाओं और स्वाभिमान का संचार कर देगा! अगर आप किसी और से पूछने में संकोच कर रहे हैं तो याद रखें कि आप भी चाहेंगे कि वे भी आपसे, आवश्यकता पड़ने पर, अपने बारे में पूछें!
  3. इस सूची को कम से कम एक बार रोज़ पढ़ें। इसमें आपका ज़्यादा समय ज़ाया नहीं होगा-सोने से पहले या सबेरे उठने के बाद या हो सके तो दोनों बार, बैठ जाएँ और सचेत होकर पढ़ें कि आपने अपने बारे में क्या लिखा है। आप अपने बारे में अच्छे विचारों को जज़्ब करते चले जाएंगे और कुछ समय बाद, आपको लिखे हुए शब्दों की ज़रूरत तक नहीं पड़ेगी, आप सिर्फ उस सूची के बारे में सोचेंगे और अच्छा महसूस करेंगे।
  4. अगर आप ध्यान करते हैं या श्वसन-क्रिया का अभ्यास करते हैं तो इस सूची को ध्यान-साधना के लिए एक उद्घोषक की तरह इस्तेमाल करें। अपने भीतर संचरित हो रही सकारात्मक ऊर्जा पर ध्यान केन्द्रित करें।
  5. अंत में, जब भी आप ऐसी किसी परिस्थिति में हों, जो आपको वापस अपने लिए आने वाले बुरे ख़यालों के गर्त में धकेल रही है तो मानसिक रूप से आप भी अपने बारे में बहुमूल्य लगने वाले बिन्दुओं पर आ जाएँ जिन्हें दूसरे भी आपके बारे में बहुमूल्य मानते हैं। याद रखें, कोई भी महामानव नहीं है, कोई भी जीवन के हर क्षेत्र में पूरी तरह निपुण नहीं है। अपने गुणों को जानिए और इस बात को स्वीकार कीजिए कि आपमें कुछ कम प्रभावशाली विशेषताए भी हैं।

अपने आप पर एकाग्र हों, किसी और से अपनी तुलना न करें और अपने गुणों को खोजें और उन पर ध्यान दें-आप नोटिस करेंगे कि ऐसा करने से आपके दैनिक जीवन में कितना बदलाव आ गया है। कोशिश करें-इसमें क्या लगना है? एक कोरा कागज़, कुछ स्याही और रोज़ के कुछ मिनट! लेकिन इस प्रयास का आप पर अच्छा असर होगा और आप प्रसन्न रह सकेंगे!

खूबसूरती अलग-अलग रूपों में सामने आती है! खूबसूरती के गलत मानदंडों से हानि- 28 अगस्त 2013

कल मैंने समझाया था कि कैसे कुछ लोग, खासकर औरतें, अपने आप की तुलना दूसरों से करते हैं, अपनी संदेहास्पद विजय के लिए अपने स्वाभिमान को ताक पर रख देते हैं और जब तुलना में वे हार जाते हैं तो उन्हें बुरा लगता है। यह तो होता ही है कि अकेले में इस विषय में सोचकर आपको दुख होता है, लेकिन आप यह भी समझें कि खूबसूरती के जिस आदर्श के पीछे आप भाग रहे हैं वह आपके लिए और भी बहुत सी समस्याएँ लेकर आता है।

मुझे लगता है कि इस बारे में चर्चा करके वक़्त बरबाद करने की कोई ज़रूरत नहीं है कि खूबसूरती के जिन आदर्शों से अधिकांश महिलाएं अपने शरीर की तुलना करती हैं वह वास्तविकता पर आधारित है या नहीं। मीडिया जिस छवि को दर्शा रहा है उन्हें कम्प्युटर द्वारा सुधारा गया है, जिन्हें दिखाया जा रहा है उन्होंने उस वक़्त काफी मेकअप किया हुआ होता है, प्रकाश-व्यवस्था उनके पक्ष में होती है, परन्तु वे वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में अभिनय नहीं कर रही होतीं और सबसे बढ़कर, वैसा दिखाई देना उनका व्यवसाय होता है। इस तरह, जो छवि आप आम तौर पर पोस्टर्स पर, पत्र-पत्रिकाओं में, टीवी पर देखती हैं वह आपके दिमाग में ज़बरदस्ती प्रवेश कर जाता है और आप भूल जाती हैं कि यह आपको इसलिए दिखाया गया है कि आप उस विज्ञापित वस्तु को खरीदें। और आप इसे सुन्दरता का मानदंड मान लेते हैं कि आपको और सभी महिलाओं को खूबसूरत कहलाने के लिए उसके जैसा दिखाई देना चाहिए!

मुख्यधारा का मीडिया इस बात की परवाह नहीं करता कि कई तरह के शरीर वाले लोग होते है! आखिर जिन्हें आप देखते हैं, पुरुष और महिलाएं, वे बहुत थोड़े से चुनिन्दा लोग होते हैं, कड़े मानकीकरण और कसौटियों से, जिन पर अधिकांश लोग पूरा नहीं उतर सकते, गुज़रकर आए हुए लोग।

इसका नतीजा स्पष्ट है: सभी लोग सोचते हैं कि यह साधारण और सामान्य-सी बात है और उनकी तरह दिखना चाहते हैं। अगर वे इसमें असफल होते हैं तो वे सोचते हैं कि वे उतने खूबसूरत नहीं हैं-जब कि यह वास्तव में बिल्कुल असंभव है! और यह सत्य बहुत सी महिलाओं को निराश कर देता है, जो बड़ी ईमानदारी से अपना वज़न कम करने की कोशिश कर रही थीं, या टीवी में दिखाई जा रही महिला की तरह की देहयष्टि बनाने की कोशिश कर रही थी! वे इसमें सफल नहीं हो सकतीं और इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे, हो सकता है कि उनकी शारीरिक बनावट ही बिल्कुल अलग हो!

यह देखते हुए, कई इस प्रयास से ही अपने आपको मुक्त कर लेती हैं। वे देखती हैं कि ‘खूबसूरत’ माने जाने का एकमात्र तारीका यही है कि उनके जैसा दिखाई दिया जाए-लेकिन वे कभी भी उसमें सफल नहीं हो पाएँगी, इसलिए कोशिश करने से क्या लाभ? उनमें कसरत करने का उत्साह नहीं रह जाता, घूमने-फिरने और अपने शरीर के लिए कुछ करने की इच्छा ही नहीं रह जाती। सिर्फ एक ही कारण वे देखती हैं और वह है प्रतिस्पर्धा या एक लक्ष्य, जिसे पाना है, मगर जब यह संभव ही नहीं है तो कोशिश ही क्यों करें? वे जानती हैं कि वे कभी भी जीत नहीं पाएँगी।

समाज जिस तरह से चल रहा है और खूबसूरती के अस्वाभाविक, और अवास्तविक मानदंडों को बढ़ावा दे रहा है, उसे बदलने के अलावा इस समस्या का एक समाधान यह है कि कसरत, स्वास्थ्यप्रद खान-पान और अपने शरीर के प्रति अपने नज़रिये को बदला जाए। आपको समझना चाहिए कि आप स्वास्थ्यवर्धक भोजन इसलिए नहीं करते कि आपका वज़न कम हो और आप किसी और की तरह दिखें। आप सबेरे सैर करने इसलिए नहीं जातीं या दौड़ इसलिए नहीं लगातीं या तैरने इसलिए नहीं जातीं कि आपका शरीर किसी दूसरे जैसा हो जाए। आपको यह सब किसी दूसरे के लिए नहीं बल्कि अपने लिए करना चाहिए!

यह सब अपने लिए कीजिए! अच्छा, स्वास्थ्यवर्धक भोजन कीजिए क्योंकि आप अच्छा महसूस करें! व्यायाम कीजिए क्योंकि आपका मन प्रसन्न रहे और आपका शरीर पुनः तरोताजा हो जाए, आप स्फूर्ति महसूस करें! वज़न सीमा में रहेगा तो आपको लाभ होगा किसी और को नहीं! स्वस्थ रहने के लिए यह सब कीजिए क्योंकि आप अपने शरीर से प्रेम करती हैं, क्योंकि आप खुद से प्रेम करती हैं!

अगर पर्याप्त लोग इस तरह व्यवहार करें तो हो सकता है कि विज्ञापन कंपनियाँ, फिल्म इंडस्ट्री और समाज भी धीरे-धीरे यह समझ जाएंगे कि हर व्यक्ति के अंदर सुंदरता है, अलग-अलग अनंत आकारों और रूपों में!