अपने बच्चों को स्वाभिमानी वयस्क बनाइए – उन्हें ‘नहीं’ कहना सिखाइए! 14 अप्रैल 2014

दो साल से ज़्यादा हो गए, जब से मैं एक स्वाभिमानी पिता हूँ। बच्चों की परवरिश करना एक ऐसा काम है, जिसका आनंद मेरे लिए कल्पनातीत है। अपनी बच्ची को अच्छे जीवन की बुनियादी बातें सिखाना, आसपास के वातावरण की खोजबीन करने में और खुद अपने आपको जानने में उसकी मदद करना अद्भुत है! इतनी सारी महत्वपूर्ण बाते हैं, जिन्हें, मैं चाहता हूँ कि वह सीखे और आज मैं उनमें से एक बात की चर्चा यहाँ करना चाहता हूँ: मैं चाहता हूँ कि मेरी बेटी 'नहीं' कहना सीखे, खासकर तब, जब लोग उसके इतना करीब आने लगें कि उसे असुविधा महसूस होने लगे। मैं समझता हूँ कि खासकर भारत के संदर्भ में इस बात को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

चलिए, ऐसी परिस्थितियों का एक उदहारण देता हूँ। रमोना अपनी कुछ सहेलियों के साथ वृन्दावन के मुख्य बाज़ार में खरीदी करने गई थी। स्वाभाविक ही, अपरा भी उसके साथ थी। तो, जब सब महिलाएं कपड़े देख रही थीं, पहनकर, उनके बारे में चर्चा कर रही थीं और हर तरफ कपड़े बिखरे पड़े थे, रमोना और अपरा एक आईने के सामने खड़े होकर खेल रहे थे।

तभी एक सेल्सवूमन आई और दोनों का मुस्कुराकर स्वागत किया। रमोना ने उसके अभिवादन का प्रत्युत्तर दिया मगर अपरा खेलने में इतनी निमग्न थी कि उस सेल्सवूमन की ओर उसका ध्यान ही नहीं गया। इसलिए अपरा का ध्यान अपनी ओर खींचने के उद्देश्य से वह महिला घुटनों के बल नीचे झुकी और अपरा की ओर हाथ बढ़ाया। उसने अपरा को पकड़कर कुछ इस तरह की कोशिश की, जिसे बच्चे बिल्कुल पसंद नहीं करते मगर जो बड़ों की आदत में शुमार है: उसने अपरा के गाल अपने अंगूठे और मध्यमा के बीच लेकर कुछ ऐसा किया जैसे चिकोटी काटना चाहती हो। स्वाभाविक ही, वह ऐसा करने नहीं जा रही थी मगर अपरा को यह बिल्कुल पसंद नहीं आया। वह दो कदम पीछे हटकर रमोना के करीब आ गई। इस महिला ने इस संकेत की कोई परवाह नहीं की और दूसरा हाथ भी आगे बढ़ाया और हमारी बच्ची के दोनों गाल अपने हाथों में भर लिए।

यही वह बिंदु है, जहाँ हम चाहते हैं कि हमारी बच्ची खुद कह सके कि वह उनका स्पर्श नहीं चाहती। उस अजनबी के मुंह पर, मैं अपरा का साफ़ और तीखा इंकार ('नहीं!') सुनना चाहता हूँ। मैं उसे यह नहीं सिखाना चाहता कि उसे अपने चेहरे पर किसी की चिकोटियों को बर्दाश्त करना होगा!

आखिर यह किस तरह की आदत है, भई? मैं जानता हूँ कि मेरी बच्ची आपको बहुत मोहक लग रही है- मुझे भी लगती है- लेकिन क्या आप हर किसी अजनबी के गालों पर हाथ फेरते रहेंगे क्योंकि वह आपको आकर्षक लग रहा है? अगर आप और हम सब आपस में और वयस्कों के साथ भी इसी तरह व्यवहार करें तब तो कोई बात नहीं। तब अपरा को कोई परेशानी नहीं होती क्योंकि वह इसे हर वक़्त, हर किसी के साथ होता हुआ देखती। लेकिन आप ऐसा नहीं करते!

क्योंकि अभी वह हाथ भर का है इसलिए आपको लगता है कि आप मेरे बच्चे की धैर्य-सीमा का उल्लंघन करते रहेंगे क्योंकि वह अभी एक मीटर ऊंचा भी नहीं है।

किसी वयस्क मगर कम उम्र के लड़के या लड़की से पूछिए कि इस तरह का व्यवहार उन्हें कितना अपमानजनक लगता है! किसी भी किशोर से पूछ लीजिए, यहाँ तक कि युवा वयस्कों से भी, और वे आपको बताएंगे कि वे इसे बेहद नापसंद करते थे। किसी अपरिचित द्वारा छुआ जाना। एक ऐसा व्यवहार, जो आपके साथ बचपन में तो अक्सर होता है मगर जब आपका शरीर यह ज़ाहिर करने लगता है कि अब आप बड़े और सम्मान के काबिल हो गए हैं, तब अचानक रुक जाता है। गरिमा और व्यक्तिगत मर्यादा वाले एक ऐसे व्यक्ति हो गए हैं, जिसकी सीमाओं का उल्लंघन उचित नहीं है।

लेकिन बच्चों के साथ आप ऐसा क्यों करते हैं?

क्योंकि वे 'नहीं' नहीं कह सकते? क्योंकि वे प्रतिवाद नहीं कर सकते? लेकिन यही कारण पर्याप्त होना चाहिए कि आप वैसा न करें और मुझे उम्मीद है कि मैं अकेला ऐसा व्यक्ति नहीं होऊंगा जो अपने बच्चे को इसका बिल्कुल विपरीत सिखा रहा होऊंगा। अगर आप ऐसा नहीं करते तो आपका बच्चा कभी भी 'नहीं' कहना नहीं सीख पाएगा, वयस्क हो जाने के बाद भी! आपके यहाँ ऐसे लोग होंगे जो 'नहीं' नहीं कह पाएंगे और जो वही करते रहेंगे, जो उनसे करने के लिए कहा जाएगा, जो लोगों को मौका देंगे कि कोई भी आकर उनके व्यक्तिगत मामलों में हस्तक्षेप कर सके, उनके धैर्य की परीक्षा ले सके। उनके साथ स्वाभिमान और आत्मबोध (आत्मसम्मान) की समस्या होगी। इसके विरुद्ध कुछ कीजिए और अपने बच्चे को 'नहीं' कहना सिखाइए!

कल मैं आपको बताऊंगा कि उस मौके पर अपरा और रमोना ने क्या प्रतिक्रिया दी और इस समस्या पर संभावित उपचार भी, जिन्हें बाद में चर्चा के दौरान मैंने और रमोना ने पाया।

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