सही या गलत का निर्धारण दृष्टिकोण है या तथ्य! 5 नवंबर 2014

आत्मविश्वास

दूसरों के साथ बातचीत का रोचक पहलू यह है कि आप अक्सर ऐसे लोगों से मिलते हैं जिनके अनुभव, विचार और जानकारियाँ आपसे भिन्न होते हैं। जब आवश्यकता हो, आप उनसे लाभ उठा सकते हैं और प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं। आपको उपयोगी जानकारियाँ प्राप्त हो सकती हैं, जिन्हें आप दूसरों तक भी पहुँचा सकते हैं। लेकिन एक अप्रिय बात भी हो सकती है: आप संदेह में पड़ सकते हैं कि आप जो कर या सोच रहे हैं, वह ठीक है या नहीं।

यह असामान्य बात नहीं है: कामकाज के दौरान हाल ही में हुई कोई घटना आप अपने दोस्तों को बताते हैं और वे आपकी प्रतिक्रिया पर आश्चर्यचकित रह जाते हैं कि आपने ऐसा क्यों सोचा! क्या ऐसी स्थिति में शांत रहना उचित नहीं होता? या इसके विपरीत, क्या आखिरकार इस मामले में सख्त रवैया अपनाना ज़्यादा ठीक नहीं होता? यह भी हो सकता है कि दोनों में से एक आपकी प्रतिक्रिया का ज़ोरदार समर्थन करे और दूसरा अविश्वास में महज सिर हिलाकर रह जाए कि ये आप क्या कर बैठे।

क्या जीवन जीने का कोई सही तरीका हो सकता है? या कोई गलत तरीका?

स्वाभाविक ही कुछ बातें स्पष्ट रूप से, हर लिहाज से और हर जगह गलत होती हैं: किसी का क़त्ल करना गलत है और चोरी, डकैती और इस तरह की दूसरी सभी गतिविधियाँ भी सामान्यतः सर्वत्र गलत मानी जाती हैं। लेकिन ऐसी स्थितियाँ भी पेश आती हैं, जहाँ सही और गलत में इस तरह दिन और रात की तरह स्पष्ट अंतर करना संभव नहीं होता!

आप यह भी कह सकते हैं कि अपने माता-पिता का अपमान करना गलत है- लेकिन यह अपमान वाली बात कहाँ लागू होती है? क्या आपके लिए उनके द्वारा लिए गए निर्णयों पर न चलना उनका अपमान करना माना जाएगा? क्या उनके नैतिक मानदंडों और मूल्यों का अनुपालन न करना गलत होगा? यह निश्चित रूप से हो सकता है कि वे इसे गलत मानें जबकि आप पूरी तरह अलग विचार रखते हों!

क्या मैं ठीक कर रहा हूँ?

यह सामान्य प्रश्न जीवन के किसी भी मुकाम पर सामने आ सकता है! व्यवसाय, आपसी सम्बन्ध, बच्चों की शिक्षा, मित्रता- आप कभी भी ऐसी स्थिति में आ सकते हैं, जहाँ आपको लगेगा कि अब क्या किया जाए। भले ही अक्सर आप अपने निर्णय आत्मविश्वास के साथ लेते हों, अक्सर होने वाली आलोचनाओं को आसानी के साथ दरकिनार कर देते हों मगर एक ऐसा बिंदु होता है, जहाँ आप खुद अपनी ओर और उस परिस्थिति की ओर देखते हैं और सोच में पड़ जाते हैं:

मुझे क्या करना चाहिए?

मैं आपको एक बात बताता हूँ: कोई दूसरा कभी नहीं बता सकता कि आपको क्या करना चाहिए और न ही कोई दैवी हस्तक्षेप या प्रेरणा होती है, जो अचानक हर चीज़ ठीक कर दे। फिर भी, कहा जाना चाहिए कि न तो कुछ गलत होता है और न सही और सभी कभी-कभार ऐसी परिस्थितियों से गुज़रते ही रहते है।

मन ही मन उन बातों का जायजा लीजिए, जो आप वास्तव में जानते हैं, उन निर्णयों, विचारों को याद कीजिए, जिनके बारे में आप सुनिश्चित हैं कि वे ठीक हैं और उन्हें बदलने की ज़रूरत नहीं है। भले ही लोग कहते रहें कि आप गलत हैं। फिर उस बिन्दु से धीरे-धीरे आगे बढ़िए और अपनी भावनाओं और विचारों के सहारे आगे बढ़िए। सलाह लीजिए, जब आपको लगे कि यह उचित है-और पता कीजिए कि आप किस बात को वास्तव में अनुचित समझते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह एहसास अक्सर अस्थाई होता है। कभी-कभी उस परिस्थिति से कुछ देर के लिए या रात भर के लिए दूर हो जाना भी मदद करता है। उसके बाद फिर नए उत्साह और साहस के साथ शुरू हो जाइए और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़िए!

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