स्वयं को अपने से छोटा न करें और अपनी ईमानदार तारीफ़ को सहजता के साथ स्वीकार करें – 26 नवंबर 2015

जर्मनी में रहते हुए मुझे अब लगभग दो हफ्ते हो चुके हैं और इस बीच हम बहुत से मित्रों से मिल चुके हैं और वापस भारत लौटने से पहले अभी और भी कुछ मित्रों से मिलने वाले हैं। हाल ही में हम एक मित्र से मिले जिसके विषय में हमने एक ऐसी बात नोटिस की जिसे लेकर, मेरा विश्वास है कि मेरे बहुत से पाठकों को भी समस्या होगी: आत्मविश्वास की असाधारण कमी, जिसमें आप अपनी साधारण प्रशंसा को भी शक की निगाह से देखते हैं।

मैं इस मित्र से दो साल बाद मिल रहा था इसलिए इस बीच हमने एक-दूसरे को देखा तक नहीं था। अभिवादनों के शुरूआती लेनदेन, गले मिलने और एक-दूसरे का हालचाल पूछने के बाद हमारी बातचीत इस ओर मुड़ गई कि हम लोग इस बीच क्या करते रहे। उसने जो बताया उससे तुरंत मैंने नोटिस किया कि इस बार वह अपनी उपलब्धियों को बहुत कमतर आँक रही है। कुछ देर बाद रमोना भी, जो मेरी मित्र को पहले से जानती थी, बातचीत में शामिल हो गई। उन दोनों ने भी एक-दूसरे का अभिवादन किया और फिर रमोना ने उससे कहा कि वह बहुत शानदार, खुश और स्वस्थ लग रही है।

इस प्रशंसा की प्रतिक्रिया में उस मित्र ने जो कहा, वही आज के ब्लॉग को लिखने का कारण बना है। उसने कहा, 'ओह! शुक्रिया, अच्छा किया जो आपने यह कहा!'

जैसे ही मैंने यह वाक्य सुना, मुझे पता चल गया कि ये शब्द शुक्रिया कहने के लिए कहे गए हैं-लेकिन जो यह कह रहा है, वह दरअसल विश्वास नहीं कर रहा है कि रमोना द्वारा कहे गए शब्द वास्तव में सही हैं! वे सिर्फ सौजन्यतावश कहे गए हैं- भले ही उसके मस्तिष्क में वे शब्द सही नहीं थे!

इतना साधारण सा वाक्य ही बता देता है कि कोई व्यक्ति खुद अपने बारे में क्या सोचता है। हमारी वह दोस्त कह सकती थी, ' शुक्रिया, हाँ, मेरा पिछला समय बड़ा अच्छा रहा' और उसके बाद बता सकती थी कि कैसे उसने अपने खान-पान में परिवर्तन किया और कैसे छुट्टियाँ बिताई। उसकी जगह उसने तुरंत रमोना की बात का यह आशय लिया कि वह कुछ अच्छा कहने के लिए ऐसा कह रही है। और इस बात को उसने अपने उत्तर से स्पष्ट भी किया। उसे खुश करने के लिए झूठ बोलने की मेहरबानी कर रही है!

वह इस प्रशंसा को अपनी सच्ची प्रशंसा मान ही नहीं सकती थी! वह यह नहीं समझ पाई कि पिछली बार जब हम मिले थे, उसके मुकाबले इस बार उसके चेहरे पर जो चमक है और जैसी शांत और संयत वह लग रही है, उसे रमोना ने महसूस कर लिया था!

इस कथा से हम सभी को, पुरुष हों या महिलाएँ, एक छोटी सी शिक्षा मिलती है: अगर कोई आपकी प्रशंसा करता है तो उसे झूठ मानकर सीधे-सीधे खारिज मत कर दीजिए। प्रशंसा झूठी भी हो सकती है मगर यह भी उतना ही संभव है कि किसी व्यक्ति को आप सुंदर, आकर्षक, अच्छे या सुखी, बुद्धिमान, मिलनसार, मित्रवत या आगे बढ़कर मदद करने वाले लगते हों!

अपने आपको कमतर न समझें, अपनी क्षमताओं को कम न आँकें। उन्हें जानें और उचित सम्मान दें-दूसरों को भी आपकी क्षमता का या आपकी अच्छाइयों का एहसास है और वे उसका सम्मान करते हैं। उनकी प्रशंसा को सहजता के साथ स्वीकार करें!

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