प्रिय योग-शिक्षकों, योग को और मुश्किल न बनाएँ – 1 अक्टूबर 2015

योग

पिछले दो दिनों में मैंने संक्षेप में बताया कि हम किस तरह अपने छात्रों और सहभागियों के लिए योग को आसान बनाकर प्रस्तुत करना पसंद करते हैं। परसों के ब्लॉग में मैंने बताया था कि अक्सर हम योग सीखने वाले छात्र-छात्राओं की मुद्राओं को सुधारते नहीं हैं और कल मैंने कुछ विस्तार से बताया कि क्यों हम विभिन्न योग-मुद्राओं के लिए संस्कृत नामों का इस्तेमाल नहीं करते। वास्तव में मेरा विश्वास चीजों को आसान बनाने में होता है और मुझे लगता है कि यह दूसरों के लिए भी मददगार सिद्ध होता होगा।

मैं जानता हूँ कि लोगों का रुझान चीजों को कठिन और जटिल बनाकर प्रस्तुत करने में होता है। मैंने देखा है कि योग-शिक्षक योग को अत्यधिक कठिन विज्ञान की तरह प्रस्तुत करते हैं जिसे तब तक कोई नहीं समझ सकता जब तक कि किसी न किसी रूप में वे किसी योग-गुरु द्वारा दीक्षित नहीं किए जाते। ऐसे योग-शिक्षक भी हैं जो नए से नए छात्रों को योग की कठिन से कठिन मुद्राएँ दिखाते हैं। कुछ दूसरे होते हैं जो ज़्यादा से ज़्यादा संस्कृत शब्दों का इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं।

मैं नहीं समझता कि सिखाने का यह उचित तरीका है और जब कि आपको यह एहसास हो सकता है कि आप कोई असामान्य व्यक्ति हैं, आपका शरीर दूसरों से बेहतर, अधिक लचीला है और आपकी मुद्रा एकदम त्रुटिहीन, लेकिन इसका प्रदर्शन करने की वास्तव में कोई ज़रूरत नहीं होती।

वास्तव में किसी साधारण सी चीज़ को खींच-तानकर बड़ा करने की ज़रूरत नहीं है, उसे लंबे-चौड़े व्याख्यानों में समझाने की भी आवश्यकता नहीं है! आप सीधे, सहज शब्दों में भी उसे समझा सकते हैं! आप निश्चय ही दूसरों को दिखा सकते हैं कि बहुत सी कठिन और जटिल योग-मुद्राओं के लिए भी आपका शरीर कितना लचीला है लेकिन इससे दूसरों के अंदर यह भावना जागनी चाहिए कि इसमें कुछ भी कठिन नहीं है और वे भी नियमित अभ्यास से वहाँ तक पहुँच सकते हैं!

वास्तव में दूसरे कई क्षेत्रों में भी मैंने यह बात देखी है। यह आदत सिर्फ योग-शिक्षकों तक ही महदूद नहीं है! मैंने यह व्यवहार सामान्य रूप से उन लोगों में पाया है, जिनमें आत्मसम्मान या स्वाभिमान की कमी होती है। वे जिन चीजों पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेते हैं उन्हें इस तरह प्रस्तुत करते हैं जैसे वे बहुत कठिन काम हों जिससे वे अपने बारे में अच्छा महसूस कर सकें। ये वे लोग हैं जो सरल चीजों को भी जटिल बनाते हुए अंजाम देते हैं और स्वयं खुश हो लेते हैं कि वे कठिन चीजों को अंजाम देने में कामयाब हुए।

जब कि यह पूरी तरह तार्किक है और इसलिए समझ में आने वाली बात भी है-और अगर आप भी ऐसा ही कर रहे हैं तो मैं आपको सलाह दूँगा कि अपने बारे में प्रसन्न होने के दूसरे तरीके ढूँढ़ने की कोशिश कीजिए। यह समझने की कोशिश कीजिए कि आपने भी जीवन में कई उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं, आपमें भी अपनी निजी खूबियाँ हैं और आप और भी कई उपलब्धियाँ प्राप्त करके उसी तरह बहुमूल्य हो सकते हैं जैसे कि दूसरे लोग अपनी उपलब्धियों से हो रहे हैं। आपको ऐसी कोई चीज़ करने की ज़रूरत नहीं है जिसे ‘कोई दूसरा न कर सकता हो’ या ‘सिर्फ सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति ही कर सकता हो’।

इन बातों को अपने आत्मसम्मान या स्वाभिमान का आधार न बनाएँ-क्योंकि उसकी नींव बहुत भुरभुरी होगी! आप जैसे भी हैं, उसी रूप में अपने लिए मूल्यवान हैं-अपने आप से प्यार करिए, क्योंकि आप वैसे हैं!

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